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वास्तव में इनस्क्रिप्ट सीखने का एक और सिर्फ़ एक कारण है: आजकल यहीं कीबोर्ड सर्वव्यापक है, हर ऑपरेटिंग सिसटम में पहले से इनस्टॉल्ड मिलता है।
लेकिन “इनस्क्रिप्ट से हर भारतीय लिपि की टाइपिंग में समानता आती है” सुन-सुनकर बोर हो चुका हूँ। इसे मंत्र की तरह जपने वालों के विचार तो बदल नहीं सकता, लेकिन निष्पक्ष श्रोताओं के ज्ञान के लिए इस अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज़ उठाना मुझे उचित लगता है।
इस दावे को “अंधविश्वास” क्यों कह रहा हूँ? पहला कारण: इनस्क्रिप्ट के नवीनतम संस्करण को ध्यान में रखते हुए ये दावा सरासर गलत है, तथ्यों के विपरीत है। लिपियों के बीच समानता लाने की बात छोड़िए, इस संस्करण में एक ही लिपि वाली भाषाओं के बीच भी असमानता है। Guiding Principles का पाँचवाँ बिंदु है
PRINCIPLE 5: LANGUAGE-DRIVEN KEYBOARDS
Implementation of Indian Languages on the digital medium is over two decades old
and with the experience gained in the area, a necessity to distinguish between
SCRIPT and LANGUAGE has made itself felt. In certain cases script and language
are co-terminus; but in scripts such as Devanagari or Bangla, there is no one-to-one
correspondence between script and language. Thus Devanagari itself caters to official
languages: Hindi, Sanskrit, Marathi, Konkani, Nepali, Bodo, Dogri and Santhali (co-
terminus with Ol-Chiki) whereas Bangla is used for Bengali, Assamese and Manipuri
(co-terminus with Meetei-Mayek). Instituting this dichotomy between SCRIPT and
LANGUAGE has certain advantages:
Greater knowledge of the script grammar of languages has shown that
each language draws from a script a certain number of graphemes and uses
them in its own pertinent manner. It was therefore felt that key-boards be
made Language compliant instead of Script compliant.This would not only cater to national identity by giving each official
language its own keyboard and font but would also allow for better high-
end NLP by making the key-board exclusive to a given language rather
than its script.In addition it will also lead to economy of representing characters on the
key-board. Thus 0973 Chandra A is coterminous with 090D Devanagari
Letter Chandra E, since depending on the language (Marathi or Hindi)
both characters represent the same conceptual grapheme: the English AE
as used in /at/ /and/ etc. The economy derived from the language-driven
key-board will allow for new high-frequency characters to be
accommodated on the existing key-board without resorting to an over-lay
(see Principle 6 below).Finally the dichotomy of script/language does not abrogate the principle of
usability: experiments have shown that a language-wise key-board is
better acceptable.
उदाहरण के रूप में उसी PDF में दिए गए हिंदी कीबोर्ड (पृष्ठ ३०) और मराठी कीबोर्ड (पृष्ठ ४३) के चित्र देखें। मराठी कीबोर्ड में जहाँ “ॲ” है वहाँ हिंदी कीबोर्ड में “ऍ” है। “ड़” और “ढ़” हिंदी कीबोर्ड के AltGr (extended) layer पर है, लेकिन मराठी कीबोर्ड में ये अक्षर नहीं है। “ळ” मराठी कीबोर्ड में shift layer में है लेकिन हिंदी कीबोर्ड में AltGr layer पर।
जो मानक एक ही लिपि में भाषानुसार अनेकरूपता लाता है, उससे हर लिपि में समानता लाने की आशा कैसे कर सकते हैं?
समानतावादियों के दावे को अंधविश्वास मानने का दूसरा कारण:
मान लीजिए ये संस्करण प्रकाशित न किया गया होता। वास्तव में हर लिपि का कीबोर्ड एकरूपी होता।
फ़िर भी इस एकरूपता का लाभ सिर्फ़ और सिर्फ़ दो तरह के लोग ही उठा पाते:
समानतावादी दावा करते हैं कि इसका लाभ एक और तरह के लोग भी उठा सकते हैं: वो लोग जिन्हें कोई लिपि न आती हों, लेकिन सुनकर ही उस लिपि में टंकण करना चाहें। लेकिन ऐसे दावे से साफ़ पता चलता है कि वक्ता देवनागरी छोड़के किसी भारतीय लिपि से अवगत नहीं है।
अन्य लिपियों की बात फ़िलहाल छोड़ दें। मान लीजिए सिर्फ़ हिंदी जानने वाला एक टाइपिस्ट मराठी डिकटेशन सुनकर टाइप करने की कोशिश कर रहा है। कुछ सवाल उठते हैं:
इन उदाहरणों से ये स्पष्ट है कि मराठी में सही ढंग से टाइप करने के लिए हिंदी से प्राप्त देवनागरी का ज्ञान काफ़ी नहीं हैं। लेकिन समानतावादी कहते हैं कि ये ज्ञान मराठी के लिए तो क्या, अन्य लिपियों में लिखी जाने वाली भाषाओं के लिए भी पर्याप्त है।
अभी अन्य लिपियों की बात करते हैं। बांगला भाषा की लिपि अंग्रेज़ी के समान है; लेखन और उच्चारण में कोई सीधा-सा मेल नहीं होता।
अभी आप खुद ही सोचिए कि कोई अगर अंग्रेज़ी स्पेलिंग के नियमों के बारे में कुछ भी न जानते हुए, सिर्फ़ शब्द सुनकर टाइप करने की कोशिश करे, तो क्या होगा? हमारे टाइपिस्ट के बांगला प्रयासों का भी ठीक वहीं अंजाम निकलेगा।
सिर्फ़ उच्चारण सुनकर वो “बांला” के बजाय “बांग्ला” टाइप कर देगा, “बाङाली” के बजाय “बांगाली”, “ब्याङ्क” के बजाय “बैंक”, “क्यान्सार” के बजाय “कैंसर”, “मत” के बजाय “मौत”, “लक्ष्मी” के बजाय “लोक्खी”, “खाओय़ा” के बजाय “खाबा”, “ब्यथा” के बजाय “बैथा”, “बिज्ञान” के बजाय “बिग्गैन”… ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं।
और तो और, बांगला में “ज” की ध्वनि के लिए दो वर्ण हैं (জ, য) और “श” की ध्वनि के लिए तीन (স, শ, ষ)। कौन-सा वर्ण कहाँ लिखना है, ये हमारा टाइपिस्ट सिर्फ़ सुनकर कैसे बता पाएगा?
मैंने ऐसा भी सुना है कि पंजाबी में घ,झ,ढ,ध,भ वर्णों से अक्षर की ध्वनि नहीं, शब्द का सुर दर्शाया जाता है। गुजराती में कभी-कभी ह वर्ण से “ह” व्यंजन के बजाय पिछले स्वर का महाप्राण रूप दर्शाया जाता है। हमारा हिंदी-भाषी टाइपिस्ट शायद ऐसे पहलुओं को सुन भी न पाएगा, टाइप करना दूर की बात है।
अतः समानतावादियों का दूसरा दावा (“सिर्फ़ सुनकर किसी भी लिपि में टाइप किया जा सकता है”) भी १००% गलत है।
अभी एक बार फ़िर-से उन लोगों को देखते हैं, जो कीबोर्डों में एकसमानता से सचमुच लाभान्वित होते:
खैर, ये पूरी चर्चा academic है। आजकल भारतीय भाषाओं की स्थिति देखकर लगता है कि दस-बीस साल में sabhi Bhartiya bhashaein Roman lipi mein hi milengi.
अनुनाद जी,
उस संदेश के प्रसंग को नज़रअंदाज़ न करें।
१) इंस्क्रिप्ट में कुछ अक्षरों का स्थान भाषा के अनुसार अलग-अलग है।
इसमें पहले वाले पर पहले आते हैं। मुझे यह बताइए कि तथाकथित ‘फोनेटिक कुंजीपटल’ में कितना मानकीकरण है? इसमें व्यंजनों/मात्राओं आदि के लिए कुंजी/कुंजी समूह कितना मानकीकृत है? यदि अलग से मैपिंग न दी हो तो क्या तथाकथित फोनेटिक टंकण से कोई नया व्यक्ति टंकण कर पाएगा? कितने तरह के फोनेटिक प्रणालियाँ प्रचलित हैं?
फ़ोनेटिक कुंजीपटलों की बात मैंने सिर्फ़ ये पॉइंट आउट करने के लिए उठाई है कि ये दोनों तर्क समान हैं:
इनस्क्रिप्ट के कुछ समर्थक पहला तर्क निरंतर पेश करते हैं लेकिन दूसरे तर्क को नज़रअंदाज़ करके उलटा फ़ोनेटिक को दुतकारते हैं। ये डबल स्टैंडर्ड वाली बात है।
मेरा न इनस्क्रिप्ट से कोई खुन्नस है, न फ़ोनेटिक से कोई लगाव। कौन क्या सोचके कौन-सा कीबोर्ड इस्तेमाल करता है, इससे मुझे कोई मतलब नहीं है। लेकिन मैं किसी चीज़ को अर्धसत्यों और बेतुके तर्कों के ज़रिए प्रमोट करने में विश्वास नहीं रखता।
२) देवनागरी मात्र के ज्ञान से मराठी या बांग्ला टाइप नहीं किया जा सकता।
अब आपके दूसरे तर्क पर। कोई ‘ब्यांक’ लिखेगा या ‘बैंक’ लिखेगा इसका कीबोर्ड से क्या लेना-देना?
कोई संबंध नहीं है। यहीं तो मैं कह रहा हूँ, कि कीबोर्ड लेआउट और स्पेलिंग के बीच कोई भी संबंध नहीं है।
लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि भारतीय भाषाएँ जादुई हैं और इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड जादू की छड़ी है। बस हर लिपि के मिलते-जुलते अक्षर एक कुंजी पर रख दिए जाए, तो लोग सिर्फ़ सुनकर ही कोई भी भारतीय भाषा टाइप कर सकेंगे।
ये दावा पूरी तरह से गलत है। लेकिन कुछ लोग ऐसे दावों से धोखा खा जाते हैं, इसलिए इसके खिलाफ़ उदाहरण इकट्ठे करना मुझे उचित लगा।
"फ़ोनेटिक में सबसे बड़ी समस्या हिंदी के जटिल व संस्कृतनिष्ठ शब्दों को टाइप करने की आती है. उदाहरणार्थ, "क्वचिदन्यतोऽपि" जैसे जटिल शब्दों (यह एक लोकप्रिय हिंदी ब्लॉग का शीर्षक है) को फ़ोनेटिक में टाइप करने पर कई ट्रायल एंड एरर प्रयास करने पड़ते हैं, .....
.... यदि हिंदी टाइपिंग नया नया सीख रहे हों और इसमें तेज गति से अधिक मात्रा में टाइप करने की महारत (टच टाइपिंग) हासिल करनी है तो डिफ़ॉल्ट हिंदी कुंजीपट इनस्क्रिप्ट.ही सीखें. शौकिया टाइप करने वालों के लिए तो खैर, सौ विकल्प हैं और हजार तर्क!रवि
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कीबोर्ड एवं कंप्यूटर स्क्रीन को बिना देखे, केवल लिखित पाठ को देखते हुए (ब्लाइंड रूप से) हिन्दी (व अन्य भारतीय लिपि) के पाठ को निम्नतम त्रुटियों से टंकित करने की तीव्रगति इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड से ही मिल पाती है।
फोनेटिक में कई शब्दों के लिए कुछ विशेष चिह्न, आदि का प्रयोग करना पड़ता है, जिसके लिए कीबोर्ड व स्क्रीन देखना पड़ता है, फिर जाँचना पड़ता है कि सही शब्द टंकित हुआ या नहीं…
इस तथाकथित ‘फोनेटिक’ इनपुट प्रणाली का सही नाम तो गूगल ने पहले “गूगल ट्रांसलिट्रेशन” रखा था। क्योंकि यह लेटिन लिपि के मूल अल्फाबेट्स एवं कीबोर्ड पर उपलब्ध अन्य चिह्नों के मिश्रण को येन-केन प्रकारेण इण्डिक वर्णों में लिप्यन्तरित करती है।
लगता है आप और रतलामी जी दोनों “फ़ोनेटिक” का अर्थ गलत समझ बैठे हैं। यहाँ “फ़ोनेटिक” से “गूगल ट्रांसलिटरेट” जैसे सॉफ़्टवेयर का तात्पर्य नहीं है।
भारतीय भाषाओं के संदर्भ में, “फ़ोनेटिक लेआउट” ऐसे लेआउटों को कहते हैं जिनमें यथासंभव देवनागरी (या अन्य भारतीय लिपि) के अक्षर मिलते-जुलते अंग्रेज़ी अक्षरों की कुंजी पर रखे गए हों। इनमें ब्लाइंड टच-टाइपिंग आराम से की जा सकती है क्योंकि कुंजी और अक्षर में सीधा मेल होता है, “येन-केन प्रकारेण” लिप्यंतरण नहीं।
लेटिन लिपि के कीबोर्ड के माध्यम से भारतीय लिपियों को टंकित करने की इस प्रक्रिया का नाम “फोनेटिक” रखना सर्वथा अनुचित लगता है? जबकि बेसिक लेटिन लिपि अपने आप में फोनेटिक है ही नहीं।
सही मायने में देखें तो “इन्स्क्रिप्ट” कीबोर्ड ही वस्तुत फोनेटिक है।
बांग्ला, और असमिया लिपियाँ भी फ़ोनेटिक नहीं हैं। मराठी, पंजाबी, और गुजराती लिपियाँ भी कुछ हद तक फ़ोनेटिक नहीं हैं। अतः आपके तर्क से इन भाषाओं के इनस्क्रिप्ट कीबोर्डों को भी फ़ोनेटिक नहीं कहा जा सकता।
खैर, आपकी बात से सहमत हूँ कि ऐसी प्रणालियों के लिए “फ़ोनेटिक” नाम उचित नहीं है। लेकिन ये नाम अब प्रचलित हो चुका है।
ध्वनिविज्ञान की कसौटी पर तो देवनागरी लिपि को ही विश्व के वैज्ञानिकों ने खरा पाया है।
कृपया ऐसे तीन-चार वैज्ञानिकों के नाम, उनके यूनिवर्सिटी अफ़िलिएशन, और देवनागरी-संबंधी पेपरों के शीर्षक प्रदान करने का कष्ट लें।
किसी भी लिपि को ध्वन्यात्मक बनाया जा सकता है। आम तौर पर फ़ोनॉलोजी वगैरह के पेपरों में देवनागरी नहीं, IPA पढ़ने को मिलता है, इसलिए अंदाज़ा लगा रहा हूँ कि विश्व के वैज्ञानिक IPA को देवनागरी से अधिक ध्वन्यात्मक मानते हैं। लेकिन IPA की उपज तो अंग्रेज़ी लिपि से ही हुई थी।
किसी भी लिपि को अ-ध्वन्यात्मक भी बनाया जा सकता है। अंग्रेज़ी लिपि कभी मोटा-मोटी ध्वन्यात्मक हुआ करती थी, लेकिन कुछ सदियों पहले कथित भाषा की स्वर ध्वनियों में बड़े बदलाव आएँ। लेकिन वर्तनी नहीं बदली गई। शायद उस समय के पढ़े-लिखे लोग सोचते होंगे कि ये देहाती तो “अपभ्रंश” बोलते हैं, इनके उच्चारण के अनुसार हम अपनी लेखनशैली क्यों बदलें। परिणाम सबके सामने है: आज अंग्रेज़ी शब्दों के लेखन और उच्चारण में संबंध कठिनाई से ही समझा जा सकता है।
हिंदी में प्रयुक्त देवनागरी भी पूर्णतया ध्वन्यात्मक नहीं है। इस बारे में मैंने पहले भी चर्चा की है। अन्य भाषाओं की देवनागरी की बात करें तो नेपाल की कई भाषाएँ देवनागरी अपना रही हैं, लेकिन देवनागरी इन भाषाओं के कई पहलू दर्शा नहीं सकती। अतः इन भाषाओं के लिए देवनागरी को “ध्वन्यात्मक” बिल्कुल नहीं कहा जा सकता।
इन उदाहरणों का सार ये है कि कोई भी लिपि अंतर्निहित रूप से ध्वन्यात्मक या अध्वन्यात्मक नहीं होती। लिपि की ध्वन्यात्मकता उसके प्रयोग पर निर्भर है।
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मुझे लगता है कि अधिकांश लोगों को ऐसा आभास होता है (या भ्रम है) कि (तथाकथित) फोनेटिक कुंजीपटल को याद नहीं करना पड़ता है जबकि इंस्क्रिप्ट को याद करना पड़ेगा या अभ्यास करना पड़ेगा।
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-- अनुनाद... ...यदि हजार लोगों को किसी टंकण परीक्षा के लिए बुलाया जाता है तो उनको कौन सा कीबोर्ड मुहैया कराया जाएगा? क्या कहा जाएगा कि आप अपना टाइपिंग प्रोग्राम स्वयं लेकर आइये? क्या किसी स्वतंत्र (स्वाभिमानी) देश की भाषा(ओं) के लिए कोई मानक कुंजीपटल जरूरी नहीं है? यदि जरूरी है तो उसमें क्या गुण होने चाहिए?
... ...
फ़ोनेटिक का मानक नहीं है तो फ़ोनेटिक का मानक बनाना पड़ेगा।
फ़ोनेटिक का मानक बनाने का समय आ गया है।
सच्चाई यह है कि कोई मानक फोनेटिक मैपिंग योजना है ही नहीं। एक प्रोग्राम ‘राम’ के लिए ram टाइप करने को कहेगा, दूसरा raam , तीसरा rAm, चौथा raama आदि। अन्य मात्राओं और अक्षरों में भी भांति-भांति की विभिन्नता है।
जबकि हम लोग फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउट को फ़ोनेटिक कह रहे हैं, जैसे कि मेरा ख़ुद का शुशा कीबोर्ड है। इन लेआउटों में यूनीकोड के एक वर्ण की कीबोर्ड की किसी एक की पर मैपिंग होती है जो माइक्रोसॉफ़्ट कीबोर्ड लेआउट क्रिएटर से बनाई गई है। इसलिए राम के लिए ram या raam या rama लिखने का सवाल ही नहीं है। राम के लिए र ा म लिखना पड़ता है अर्थात r a m कीज़ दबानी पड़ती हैं।
फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउट में k से क आता है, a से ा आता है A से अ आता है, यह फ़ोनेटिक होता है।
लगता है सब लोग यहाँ “फ़ोनेटिक” का अलग-अलग मतलब निकाल रहे हैं, इसलिए मेरा “फ़ोनेटिक” से क्या आशय है, स्पष्ट करना चाहता हूँ।
मेरे मत में “फ़ोनेटिक” लेआउटों के दों महत्त्वपूर्ण गुण हैं:
गूगल ट्रांसलिटरेशन और इसकी जैसी विधियों में ये दूसरा गुण नहीं है। कीबोर्ड पर कोई कुंजियाँ दबाने के बाद प्रयोक्ता बिना स्क्रीन देखे निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि कौन-सा शब्द टंकित हुआ है। टंकित शब्द को “सजेशन” से बदल भी सकता है। इसलिए ऐसे सिस्टमों पर टाइप करना ट्रायल ऐंड एरर का मामला है। लगता है रविजी और हरिरामजी ऐसे सिस्टमों के बारे में ही शिकायत कर रहे हैं।
शुशा जैसे जिन सिस्टमों का वर्णन रावत जी ने किया है, उनमें फ़ोनेटिक के दोनों गुण हैं।
अनुनाद जी जिन सिस्टमों की बात कर रहे हैं, उन्हें भी मैं “फ़ोनेटिक” की श्रेणी में ही रखता हूँ। अगर किसी सिस्टम में सिर्फ़ “m” टाइप करने से हमेशा “म्” मिले, सिर्फ़ “ma” टाइप करने से “म”, और “maa” टाइप करने से “मा”, तो उस सिस्टम में भी इनपुट और आउटपुट के बीच नियमित संबंध है, और इस संबंध को आसानी से समझा जा सकता है। अतः ये भी फ़ोनेटिक ही है। (ITRANS ऐसे सिस्टम का एक उदाहरण है।)
ऐसे सिस्टमों में एक अक्षर लाने के लिए शायद दो-तीन कुंजियाँ दबानी पड़े, लेकिन महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इन कुंजियों को दबाकर क्या आउटपुट मिलेगा, ये निश्चित रूप से कहा जा सकता है। अतः टाइपिंग में ट्रायल ऐंड एरर की कोई गुंजाइश ही नहीं है।
(लेकिन हाँ, इन्हें सीखना तो ज़रूर पड़ता है।)
खैर, इस चर्चा से लगता है कि गूगल ट्रांसलिटरेट जैसे सिस्टमों के लिए भी “फ़ोनेटिक” नाम प्रचलित है। गलतफ़हमियाँ अवॉइड करने के लिए शायद शुशा और ITRANS जैसे सिस्टमों को किसी और नाम से बुलाना उचित होगा।
अगर मुझे कहीं टाइपिंग परीक्षा के लिए बुलाया जाएगा तो मैं तो अपना शुशा फ़ोनेटिक लेआउट पेनड्राइव में लेकर जाउँगा उसे इन्स्टॉल करवाऊँगा और उसी पर टाइप करूँगा, वरना मैं परीक्षा दूँगा ही नहीं।
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इनस्क्रिप्ट बहुत कठिन है। जो रूढ़िवादी लोग दशकों पहले के किसी वक़्त, बाकी विकल्प न होने के कारण इनस्क्रिप्ट सीख चुके थे वही आज भी बेहतर विकल्पों के बावजूद इनस्क्रिप्ट पर आदतन डटे हुए हैं, बेहतर चीज़ें नहीं सीखना चाहते हैं।
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we have this expert who has the ability to touch type on both phonetic and inscript layouts .. i have a question .. does the very frequent need for shift-key for typing the aspirated consonants and the vowels irritating ? would a method be preferred in which shift-key would NOT be needed for typing 50% of the data ?--Use own language . . its easy .. www.SimpleKeyboard.in
अंग्रेजी की टाइपिंग में अच्छी गति होने से मेरी फोनेटिक पर भी बहुत अच्छी गति थी। .....अंग्रेजी की टाइपिंग जानने से मैं इसके साथ बिना कीबोर्ड देखे भी टाइप कर लेता था।
-- अनुनादपीके शर्मा जी,कृपया 'विज्ञापन' शैली में एक बहुअर्थी वाक्य लिखने के बजाय अपनी बात को तर्क सहित लिखिए कि आप क्या कहना चाहते हैं, किस कथन से सहमत/असहमत हैं, इसके बारे में आपके पास तथ्य क्या हैं?
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मेरा सुझाव है कि इनस्क्रिप्ट जैसे जटिल कीबोर्डों से बँध जाना आज के युग में बुद्धिमानी नहीं
है जिनमें कीज़ से आने वाले हिन्दी वर्ण का उस की के अंग्रेज़ी अक्षर से कोई संबंध नहीं होता
है।
http://en.wikipedia.org/wiki/Dvorak_Simplified_Keyboard