हिंदी इनस्क्रिप्ट (यूनीकोड) टाइपिंग सीखने के लिए अभ्यास-माला/अभ्यास-पुस्तिका/Practice Booklet

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चोपड़ा

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Dec 6, 2013, 1:26:09 PM12/6/13
to technic...@googlegroups.com
मित्रो,

मेरा एक दोस्त हिंदी यूनीकोड टाइपिंग सीखना चाहता है और उसे कुछ कुंजियों का ज्ञान है। वह कोई ऐसी अभ्यास-माला/अभ्यास-पुस्तिका/Practice Booklet की खोज कर रहा है जिससे चरण-दर-चरण रूप से इसे सुविधापूर्वक सीखा जा सके। इसकी मदद से आसानी से और व्यवस्थित रूप से टाइपिंग सीखी जा सकती है क्योंकि पहले तीन-चार कुंजियाँ याद कराई जाती हैं, फिर उनसे बनने वाले शब्दों का अभ्यास कराया जाता है और फिर इसके बाद अगले चरण की कुंजियाँ याद कराई जाती हैं और फिर पहली सीखी गई कुंजियों और नई सीखी गई कुंजियों के मेल से नए शब्दों का अभ्यास कराया जाता है। इससे अनाड़ी व्यक्ति बिना भ्रमित हुए क्रमबद्ध रूप से सीख पाता है।

अगर आप किसी ऐसी अभ्यास-माला/अभ्यास-पुस्तिका/Practice Booklet का लिंक दे सकें या इस समूह पर अपलोड कर सकें, तो उपकार  होगा।

सादर,

चोपड़ा

Leena Mehendale

unread,
Dec 6, 2013, 2:32:26 PM12/6/13
to technic...@googlegroups.com, चोपड़ा
Chopadaji pl see these 4 lessons in Hindi. Your friend may also follow the 10 Marathi lessons of the second link although some words may be unknown to him(being typical marath words)
1.INSCRIPT Hindi Practice board, Key board and ppt about inscript

2.  तुकबंदी सहित हिंदीमें व मराठीमें इनस्क्रिप्ट अभ्यास के बीस पाठ

3. पाँच मिनटोंमें संगणकपर हिंदी सीखें

I would also be happy if U can call me on 0832-2425100 . That way I would like to discuss some important aspects
--lm



6 दिसम्बर 2013 10:26 am को, चोपड़ा <lingua...@gmail.com> ने लिखा:

--
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ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।
for learning  easy HINDI TYPING click here  बालसुलभ भारतीय टंकलिपी
Leena Mehendale
Goa State Chief Information Commissioner
Ground floor, Shram shakti Bhavan
Patto, Panaji
Goa 403001
Ph (Res) 0832-2425100
Mo. 09422055740


रवि-रतलामी

unread,
Dec 6, 2013, 11:33:15 PM12/6/13
to technic...@googlegroups.com
इसके लिए हिंदी इनस्क्रिप्ट टाइपिंग ट्यूटर नामक प्रोग्राम अधिक बेहतर सिद्ध होगा. डाउनलोड लिंक -


सादर,
रवि

शुक्रवार, 6 दिसम्बर 2013 11:56:09 pm UTC+5:30 को, चोपड़ा ने लिखा:

V S Rawat

unread,
Dec 7, 2013, 1:37:12 AM12/7/13
to technic...@googlegroups.com
सबसे पहली बात,
टाइपिंग सीखने के लिए मानक कीबोर्ड लेआउट की ज़रूरत पड़ती है। हिन्दी का मानक कीबोर्ड
मतजलन है जिसका टाइपराइटर के ज़माने में उपयोग होता था।

लेकिन यूनीकोड में और कम्प्यूटर में सुविधा है कि विभिन्न कीबोर्ड लेआउटों को बदला जा सके,
जिस कारण पीसी पर बहुत से कीबोर्ड लेआउट बन पाए हैं।

अपने मित्र से पूछ कर बताइए कि वो कौन से कीबोर्ड लेआउट का इस्तेमाल कर रहा है।

मेरा सुझाव है कि इनस्क्रिप्ट जैसे जटिल कीबोर्डों से बँध जाना आज के युग में बुद्धिमानी नहीं
है जिनमें कीज़ से आने वाले हिन्दी वर्ण का उस की के अंग्रेज़ी अक्षर से कोई संबंध नहीं होता
है। इनस्क्रिप्ट मतजलन क़िस्म की पुराने ज़माने की वस्तु है जिसका लोग आदतन इस्तेमाल करते आ
रहे हैं क्योंकि कभी प्राचीन काल में उन्होंने इसे सीख लिया था।

इसकी जगह पर पीसी पर कई फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउट उपलब्ध हैं जिनमें यथासंभव वही हिन्दी
वर्ण आता है जैसा उस की पर अंग्रेजी वर्ण है जैसे a से ा की मात्रा, A से अ, k से क, t से
त, T से ट आदि आते हैं। यह बहुत इन्ट्यूटिव होता है। स्वाभाविक ही कोई ढूँढ सकता है कि
वर्ण प p पर आता होगा। यह बहुत सरल हो जाता है।

लेकिन अंग्रेजी में वर्ण कम हैं, और हिन्दी में उसके लगभग दुगने, इसलिए यह होता ही है कि कई
हिन्दी वर्णों को असंबंधित अंग्रेज़ी कीज़ पर रखना ही पड़ता है। फिर भी यह इनस्क्रिप्ट के
सभी असंबंधित वर्णों की तुलना में बहुत कम हो जाती हैं।

इसलिए किसी फ़ोनेटिक लेआउट को सीखने को बोलें अपने मित्र से, तो उसे बहुत सुविधा रहेगी
और एक दो दिन में ही फटाफट सीख जाएगा। फिर प्रयास से रफ़्तार बढ़ाता रहेगा वह। इनके
लिए किसी अभ्यास माला की ज़ऱूरत भी नहीं पड़ेगी क्योंकि अभ्यास माला मतजलन और
इनस्क्रिप्ट जैसे असंबंधित कीबोर्डों को दिमाग़ में बिठाने के लिए होती है, जबकि इनमें तो
दिमाग़ को पहले से पता रहता है कि हिन्दी वर्ण अंग्रेजी की किस की पर आएँगे।

धन्यवाद।
रावत

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Dec 7, 2013, 2:50:03 AM12/7/13
to technical-hindi
रावत जी कम्प्यूटर के लिये मानक मतलजन नहीं इन्स्क्रिप्ट है। और ये ऐसा कठिन नहीं जैसा बता कर आप चोपड़ा जी को डरा रहे हैं। :)

दरअसल फोनेटिक में जो शुरु में सरलता रहती है वो महंगी पड़ती है, बाद में उसकी कमियाँ सामने आती हैं। हमने इन्स्क्रिप्ट को प्राचीन काल में नहीं सीखा, कुछ ही साल पहले सीखा है। और ये रेमिंगटन वाले मतलजन से सौ गुणा सरल है।

जिस व्यक्ति को नियमित रूप से हिन्दी में टंकण करना हो तो इन्स्क्रिप्ट से बेहतर कुछ भी नहीं। यह पच्चीसों किस्म के कीबोर्ड लेआउटों व टाइपिंग औजारों से मुक्ति दिलाता है। इन्स्क्रिप्ट सीखने के बाद ही व्यक्ति समझ पाता है कि फोनेटिक एवं रेमिंगटन में कितनी कमियाँ हैं।

अब चोपड़ा जी के सवाल का जवाब, वर्तमान में इन्स्क्रिप्ट सीखने हेतु तो अच्छे ट्यूटर निम्न हैं।

आसान हिन्दी टाइपिंग ट्यूटर
http://download.cnet.com/Aasaan-Hindi-Typing-Tutor/3000-2051_4-10845175.html

स्पर्श


7 दिसम्बर 2013 12:07 pm को, V S Rawat <vsr...@gmail.com> ने लिखा:
--
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Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

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V S Rawat

unread,
Dec 7, 2013, 3:05:22 AM12/7/13
to technic...@googlegroups.com
On 12/7/2013 1:20 PM, ePandit | ई-पण्डित wrote:
> रावत जी कम्प्यूटर के लिये मानक मतलजन नहीं इन्स्क्रिप्ट है। और ये ऐसा कठिन नहीं जैसा
> बता कर आप चोपड़ा जी को डरा रहे हैं। :)

हा हा, ऐसी कोई मंशा नहीं थी।

अब इसका समाधान तो "मेलोडी खाओ, ख़ुद जान जाओ" ही हो सकता है।

वो इन्स्क्रिप्ट भी आज़मा सकते हैं, कोई फ़ोनेटिक भी आज़मा सकते हैं, फिर जो उनको आसान लगे।

जब लोग सदियों से मतजलन में भी बढ़िया स्पीड लाते रहे थे, इस्तेमाल कर-कर के सीख के, तो
फिर तो स्पीड किसी भी लेआउट से आ ही जाएगी। बस सीखने के दौरान जो पहाड़ ढकेलने की
मुसीबत आती है उसके लिए मतजलन और इन्स्क्रिप्ट से दूर जा कर फ़ोनेटिक इस्तेमाल करना
चाहिए। बहुत आसान रहता है इसमें सीखना।

मैं ख़ुद 10 साल से फ़ोनेटिक इस्तेमाल कर रहा हूँ और एक दिन में 5000-6000 शब्दों का अनुवाद
तक किया है मैंने। "अब क्या जान लेंगे बच्चे की?" और कितनी स्पीड चाहिए?

वैसे उन्होंने इन्स्क्रिप्ट का ही ज़िक़्र किया था, इसलिए उसका ही समाधान उनके लिए उचित
रहेगा।

रावत।



>
> दरअसल फोनेटिक में जो शुरु में सरलता रहती है वो महंगी पड़ती है, बाद में उसकी कमियाँ
> सामने आती हैं। हमने इन्स्क्रिप्ट को प्राचीन काल में नहीं सीखा, कुछ ही साल पहले सीखा है।
> और ये रेमिंगटन वाले मतलजन से सौ गुणा सरल है।
>
> जिस व्यक्ति को नियमित रूप से हिन्दी में टंकण करना हो तो इन्स्क्रिप्ट से बेहतर कुछ भी
> नहीं। यह पच्चीसों किस्म के कीबोर्ड लेआउटों व टाइपिंग औजारों से मुक्ति दिलाता है।
> इन्स्क्रिप्ट सीखने के बाद ही व्यक्ति समझ पाता है कि फोनेटिक एवं रेमिंगटन में कितनी कमियाँ हैं।
>
> अब चोपड़ा जी के सवाल का जवाब, वर्तमान में इन्स्क्रिप्ट सीखने हेतु तो अच्छे ट्यूटर निम्न हैं।
>
> आसान हिन्दी टाइपिंग ट्यूटर
> http://download.cnet.com/Aasaan-Hindi-Typing-Tutor/3000-2051_4-10845175.html
>
> स्पर्श
> http://www.balendu.com/web/sites/balendu/sparsh/
>
>
> 7 दिसम्बर 2013 12:07 pm को, V S Rawat <vsr...@gmail.com
> <mailto:vsr...@gmail.com>> ने लिखा:
> वह कोई ऐसी अभ्यास-माला/अभ्यास-पुस्तिका/__Practice Booklet की खोज कर
> रहा है जिससे
> चरण-दर-चरण रूप से इसे सुविधापूर्वक सीखा जा सके। इसकी मदद से आसानी से और
> व्यवस्थित
> रूप से टाइपिंग सीखी जा सकती है क्योंकि पहले तीन-चार कुंजियाँ याद कराई जाती
> हैं, फिर
> उनसे बनने वाले शब्दों का अभ्यास कराया जाता है और फिर इसके बाद अगले चरण की
> कुंजियाँ
> याद कराई जाती हैं और फिर पहली सीखी गई कुंजियों और नई सीखी गई कुंजियों के
> मेल से नए
> शब्दों का अभ्यास कराया जाता है। इससे अनाड़ी व्यक्ति बिना भ्रमित हुए क्रमबद्ध
> रूप से
> सीख पाता है।
>
> अगर आप किसी ऐसी अभ्यास-माला/अभ्यास-पुस्तिका/__Practice Booklet का
> लिंक दे सकें या
> इस समूह पर अपलोड कर सकें, तो उपकार होगा।
>
> सादर,
>
> चोपड़ा
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Vineet Chaitanya

unread,
Dec 7, 2013, 5:16:56 AM12/7/13
to technic...@googlegroups.com
मैं ई-पण्डित जी से पूरी तरह सहमत हूँ. जिन्हें अधिकतर काम अंग्रेजी में करना है उनके लिये phonetic कहे जाने वाले layout सुविधा जनक हो सकते हैं किन्तु जिन्हें अधिकतर काम हिन्दी में करना है उन्हें तो INSCRIPT सीख लेना चाहिये.


2013/12/7 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
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Hariraam

unread,
Dec 7, 2013, 5:59:47 AM12/7/13
to technic...@googlegroups.com
चूँकि इन्स्क्रिप्ट भारत सरकार द्वारा मानकीकृत कीबोर्ड-लेआउट है एवं संविधान में मान्यताप्राप्त सारी 22 भाषाओं की लिपियों में टंकण के लिए एक ही कीबोर्ड विन्यास होता है, (यथा- जिस अंगुली से जिस कुंजी से देवनागरी 'क' टाइप होता है, चाहे ओड़िआ हो, चाहे बंगला हो, चाहे तेगलू हो, चाहे.... हो, सभी भारतीय लिपियों को टाइप करने के लिए 'क' उसी कुंजी से टाइप होगा।) अतः यदि किसी को इन्स्क्रिप्ट में कन्नड़ में टाइप करना आता है, तो वह आँख पर पट्टी बाँध कर भी केवल सुनकर ओड़िआ, बंगला, पंजाबी, हिन्दी आदि किसी भी लिपि में टाइप कर सकता है।
 
Inscript = Indian+Script दो शब्द मिलकर बना है। यह सारी भारतीय लिपियों के लिए एक ही की बोर्ड है। इसे 1991 में ISCII Codes के साथ ही मानकीकृत किया गया।
 
अतः भारत सरकार एवं सभी राज्य सरकारों का स्पष्ट निदेश है कि इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड लेआउट पर ही कर्मचारियों को भारतीय लिपियों में टंकण सिखाया जाए।
 
भारत भर में भाषाई एकसूत्रता की दृष्टि से मानक इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड का महत्व अनुपम है।
 
इसके लिए अनेक ट्यूटर प्रोग्राम उपलब्ध हैं। हमें मानकों के अनुसार चलना चाहिए।
 
भारतीय रुपये के चिह्न, युनिकोड में एनकोडेड नए वर्णों, वैदिक संस्कृत स्वर चिह्नों आदि को भी टाइप करने की व्यवस्था करते हुए भारत सरकार द्वारा Enhanced Inscript कीबोर्ड का निर्धारण किया जा रहा है, जिसे मानक बनाया जाएगा।
हरिराम
प्रगत भारत <http://hariraama.blogspot.com>

Anubhav Chattoraj

unread,
Dec 7, 2013, 12:06:20 PM12/7/13
to technic...@googlegroups.com

वास्तव में इनस्क्रिप्ट सीखने का एक और सिर्फ़ एक कारण है: आजकल यहीं कीबोर्ड सर्वव्यापक है, हर ऑपरेटिंग सिसटम में पहले से इनस्टॉल्ड मिलता है।

लेकिन “इनस्क्रिप्ट से हर भारतीय लिपि की टाइपिंग में समानता आती है” सुन-सुनकर बोर हो चुका हूँ। इसे मंत्र की तरह जपने वालों के विचार तो बदल नहीं सकता, लेकिन निष्पक्ष श्रोताओं के ज्ञान के लिए इस अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज़ उठाना मुझे उचित लगता है।

इस दावे को “अंधविश्वास” क्यों कह रहा हूँ? पहला कारण: इनस्क्रिप्ट के नवीनतम संस्करण को ध्यान में रखते हुए ये दावा सरासर गलत है, तथ्यों के विपरीत है। लिपियों के बीच समानता लाने की बात छोड़िए, इस संस्करण में एक ही लिपि वाली भाषाओं के बीच भी असमानता है। Guiding Principles का पाँचवाँ बिंदु है

PRINCIPLE 5: LANGUAGE-DRIVEN KEYBOARDS

Implementation of Indian Languages on the digital medium is over two decades old
and with the experience gained in the area, a necessity to distinguish between
SCRIPT and LANGUAGE has made itself felt. In certain cases script and language
are co-terminus; but in scripts such as Devanagari or Bangla, there is no one-to-one
correspondence between script and language. Thus Devanagari itself caters to official
languages: Hindi, Sanskrit, Marathi, Konkani, Nepali, Bodo, Dogri and Santhali (co-
terminus with Ol-Chiki) whereas Bangla is used for Bengali, Assamese and Manipuri
(co-terminus with Meetei-Mayek). Instituting this dichotomy between SCRIPT and
LANGUAGE has certain advantages:

  • Greater knowledge of the script grammar of languages has shown that
    each language draws from a script a certain number of graphemes and uses
    them in its own pertinent manner. It was therefore felt that key-boards be
    made Language compliant instead of Script compliant.

  • This would not only cater to national identity by giving each official
    language its own keyboard and font but would also allow for better high-
    end NLP by making the key-board exclusive to a given language rather
    than its script.

  • In addition it will also lead to economy of representing characters on the
    key-board. Thus 0973 Chandra A is coterminous with 090D Devanagari
    Letter Chandra E, since depending on the language (Marathi or Hindi)
    both characters represent the same conceptual grapheme: the English AE
    as used in /at/ /and/ etc. The economy derived from the language-driven
    key-board will allow for new high-frequency characters to be
    accommodated on the existing key-board without resorting to an over-lay
    (see Principle 6 below).

  • Finally the dichotomy of script/language does not abrogate the principle of
    usability: experiments have shown that a language-wise key-board is
    better acceptable.

उदाहरण के रूप में उसी PDF में दिए गए हिंदी कीबोर्ड (पृष्ठ ३०) और मराठी कीबोर्ड (पृष्ठ ४३) के चित्र देखें। मराठी कीबोर्ड में जहाँ “ॲ” है वहाँ हिंदी कीबोर्ड में “ऍ” है। “ड़” और “ढ़” हिंदी कीबोर्ड के AltGr (extended) layer पर है, लेकिन मराठी कीबोर्ड में ये अक्षर नहीं है। “ळ” मराठी कीबोर्ड में shift layer में है लेकिन हिंदी कीबोर्ड में AltGr layer पर।

जो मानक एक ही लिपि में भाषानुसार अनेकरूपता लाता है, उससे हर लिपि में समानता लाने की आशा कैसे कर सकते हैं?

समानतावादियों के दावे को अंधविश्वास मानने का दूसरा कारण:

मान लीजिए ये संस्करण प्रकाशित न किया गया होता। वास्तव में हर लिपि का कीबोर्ड एकरूपी होता।

फ़िर भी इस एकरूपता का लाभ सिर्फ़ और सिर्फ़ दो तरह के लोग ही उठा पाते:

  1. वो लोग जो पहले से ही दो या उससे अधिक लिपियों में पारंगत हो
  2. वो लोग जो किसी एक लिपि को न जानते हों, लेकिन जिन्हें उस लिपि की सामग्री किसी ज्ञात लिपि में लिप्यंतरित (transliterated) रूप में दी जाएँ

समानतावादी दावा करते हैं कि इसका लाभ एक और तरह के लोग भी उठा सकते हैं: वो लोग जिन्हें कोई लिपि न आती हों, लेकिन सुनकर ही उस लिपि में टंकण करना चाहें। लेकिन ऐसे दावे से साफ़ पता चलता है कि वक्ता देवनागरी छोड़के किसी भारतीय लिपि से अवगत नहीं है।

अन्य लिपियों की बात फ़िलहाल छोड़ दें। मान लीजिए सिर्फ़ हिंदी जानने वाला एक टाइपिस्ट मराठी डिकटेशन सुनकर टाइप करने की कोशिश कर रहा है। कुछ सवाल उठते हैं:

  1. क्या टाइपिस्ट “ळ” को ठीक से सुन पाएगा, या उस अक्षर के स्थान पर “ल”, “र”, या “ड़” टाइप कर देगा?
  2. “माझं” इत्यादि शब्दों के अंत में “अ” कि ध्वनि आती है, जिसे ं या े से दर्शाया जाता है। (“माझं”/“माझे”) क्या हमारे टाइपिस्ट को इस ध्वनि को लिखने की सही विधि पता है? इस शब्द को “माझ”/“माझा” नहीं टाइप कर देगा न?
  3. मराठी में “त्स” की ध्वनि है, जिसे “च” लिखा जाता है। हमारे टाइपिस्ट ने कहीं इसे “स” सुनकर टाइप कर दिया तो?
  4. मराठी में इ/ई और उ/ऊ में ह्रस्व-दीर्घ का अंतर phonemic नहीं है, इसलिए ह्रस्व स्वर कहाँ लिखना है और दीर्घ स्वर कहाँ ये पूरी तरह से स्पेलिंग का मामला है। अब “पाटील” जैसा शब्द सुनने से तो लगता है कि इसमें छोटा इ होना चाहिए, हमारे टाइपिस्ट ने इसे गलती से “पाटिल” टाइप कर दिया तो?
  5. मराठी में “ऐ”, “औ” का उच्चारण हिंदी “अइ”, “अउ” के जैसे होता है। हमारा टाइपिस्ट “ऐ”, “औ” के स्थान पर गलती से “अइ”, “अउ” नहीं टाइप कर देगा न?
  6. मराठी में “ऋ” का उच्चारण हिंदी “रु” की तरह होता है। “ऋ” के स्थान पर हर जगह “रु” टाइप कर दिया तो?
  7. मराठी में “ज्ञ” का उच्चारण “द्न्य” की तरह होता है। “ज्ञ” की जगह “द्य” या “न्य” टाइप कर दिया तो?

इन उदाहरणों से ये स्पष्ट है कि मराठी में सही ढंग से टाइप करने के लिए हिंदी से प्राप्त देवनागरी का ज्ञान काफ़ी नहीं हैं। लेकिन समानतावादी कहते हैं कि ये ज्ञान मराठी के लिए तो क्या, अन्य लिपियों में लिखी जाने वाली भाषाओं के लिए भी पर्याप्त है।

अभी अन्य लिपियों की बात करते हैं। बांगला भाषा की लिपि अंग्रेज़ी के समान है; लेखन और उच्चारण में कोई सीधा-सा मेल नहीं होता।

अभी आप खुद ही सोचिए कि कोई अगर अंग्रेज़ी स्पेलिंग के नियमों के बारे में कुछ भी न जानते हुए, सिर्फ़ शब्द सुनकर टाइप करने की कोशिश करे, तो क्या होगा? हमारे टाइपिस्ट के बांगला प्रयासों का भी ठीक वहीं अंजाम निकलेगा।

सिर्फ़ उच्चारण सुनकर वो “बांला” के बजाय “बांग्ला” टाइप कर देगा, “बाङाली” के बजाय “बांगाली”, “ब्याङ्क” के बजाय “बैंक”, “क्यान्सार” के बजाय “कैंसर”, “मत” के बजाय “मौत”, “लक्ष्मी” के बजाय “लोक्खी”, “खाओय़ा” के बजाय “खाबा”, “ब्यथा” के बजाय “बैथा”, “बिज्ञान” के बजाय “बिग्गैन”… ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं।

और तो और, बांगला में “ज” की ध्वनि के लिए दो वर्ण हैं (জ, য) और “श” की ध्वनि के लिए तीन (স, শ, ষ)। कौन-सा वर्ण कहाँ लिखना है, ये हमारा टाइपिस्ट सिर्फ़ सुनकर कैसे बता पाएगा?

मैंने ऐसा भी सुना है कि पंजाबी में घ,झ,ढ,ध,भ वर्णों से अक्षर की ध्वनि नहीं, शब्द का सुर दर्शाया जाता है। गुजराती में कभी-कभी ह वर्ण से “ह” व्यंजन के बजाय पिछले स्वर का महाप्राण रूप दर्शाया जाता है। हमारा हिंदी-भाषी टाइपिस्ट शायद ऐसे पहलुओं को सुन भी न पाएगा, टाइप करना दूर की बात है।

अतः समानतावादियों का दूसरा दावा (“सिर्फ़ सुनकर किसी भी लिपि में टाइप किया जा सकता है”) भी १००% गलत है।

अभी एक बार फ़िर-से उन लोगों को देखते हैं, जो कीबोर्डों में एकसमानता से सचमुच लाभान्वित होते:

  1. जो लोग पहले से ही दो या दो से अधिक लिपियों में पारंगत हों। ध्यान दें कि कम्प्यूटर पर हिंदी टाइप करने वाले अधिकांश लोग इस कैटेगरी में हैं: वे हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी लिपि का भी ज्ञान रखते हैं। अतः समानतावादियों के तर्कों का आशय ये निकलता है कि ऐसे सभी लोगों को फ़ोनेटिक कीबोर्ड इस्तेमाल करना चाहिए।
  2. जो लोग कोई लिपि न जानते हो, लेकिन जिनके पास उस लिपि से किसी ज्ञात लिपि में ट्रान्सलिटरेटेड सामग्री है। मुझे लगता है ऐसे लोग कम ही होंगे, लेकिन इनका काम किसी लिप्यंतरण सॉफ़्टवेयर से काफ़ी आसान हो जाएगा। इस काम के लिए हर लिपि के लिए समान कीबोर्ड बनाने की ज़रूरत नहीं है।

खैर, ये पूरी चर्चा academic है। आजकल भारतीय भाषाओं की स्थिति देखकर लगता है कि दस-बीस साल में sabhi Bhartiya bhashaein Roman lipi mein hi milengi.

Anunad Singh

unread,
Dec 9, 2013, 4:33:21 AM12/9/13
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
अनुभव जी,
ऊपर आपने जो तर्क दिए हैं मैं उसे मोटा-मोटी दो भागों में बाँत रहा हूँ-

१) इंस्क्रिप्ट में कुछ अक्षरों का स्थान भाषा के अनुसार अलग-अलग है।

२) देवनागरी मात्र के ज्ञान से मराठी या बांग्ला टाइप नहीं किया जा सकता।

इसमें पहले वाले पर पहले आते हैं। मुझे यह बताइए कि तथाकथित 'फोनेटिक कुंजीपटल' में कितना मानकीकरण है? इसमें व्यंजनों/मात्राओं आदि के लिए कुंजी/कुंजी समूह कितना मानकीकृत है? यदि अलग से मैपिंग न दी हो तो क्या तथाकथित फोनेटिक टंकण से कोई नया व्यक्ति टंकण कर पाएगा? कितने तरह के फोनेटिक प्रणालियाँ प्रचलित हैं?

अब आपके दूसरे तर्क पर। कोई 'ब्यांक' लिखेगा या 'बैंक' लिखेगा इसका कीबोर्ड से क्या लेना-देना? एक ही कुंजीपटल से 'मन्दिर', 'मंदिर', 'मंदीर', 'मन्दीर' सब लिखे जा सकते हैं।

-- अनुनाद

Anubhav Chattoraj

unread,
Dec 9, 2013, 8:00:41 AM12/9/13
to technic...@googlegroups.com

अनुनाद जी,

उस संदेश के प्रसंग को नज़रअंदाज़ न करें।

१) इंस्क्रिप्ट में कुछ अक्षरों का स्थान भाषा के अनुसार अलग-अलग है।

इसमें पहले वाले पर पहले आते हैं। मुझे यह बताइए कि तथाकथित ‘फोनेटिक कुंजीपटल’ में कितना मानकीकरण है? इसमें व्यंजनों/मात्राओं आदि के लिए कुंजी/कुंजी समूह कितना मानकीकृत है? यदि अलग से मैपिंग न दी हो तो क्या तथाकथित फोनेटिक टंकण से कोई नया व्यक्ति टंकण कर पाएगा? कितने तरह के फोनेटिक प्रणालियाँ प्रचलित हैं?

फ़ोनेटिक कुंजीपटलों की बात मैंने सिर्फ़ ये पॉइंट आउट करने के लिए उठाई है कि ये दोनों तर्क समान हैं:

  1. हर भाषा/लिपि का इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड मोटा-मोटी मेल खाता है, इसलिए इनस्क्रिप्ट इस्तेमाल करना चाहिए।
  2. फ़ोनेटिक कीबोर्ड अंग्रेज़ी कीबोर्ड से मोटा-मोटी मेल खाता है, इसलिए फ़ोनेटिक इस्तेमाल करना चाहिए।

इनस्क्रिप्ट के कुछ समर्थक पहला तर्क निरंतर पेश करते हैं लेकिन दूसरे तर्क को नज़रअंदाज़ करके उलटा फ़ोनेटिक को दुतकारते हैं। ये डबल स्टैंडर्ड वाली बात है।

मेरा न इनस्क्रिप्ट से कोई खुन्नस है, न फ़ोनेटिक से कोई लगाव। कौन क्या सोचके कौन-सा कीबोर्ड इस्तेमाल करता है, इससे मुझे कोई मतलब नहीं है। लेकिन मैं किसी चीज़ को अर्धसत्यों और बेतुके तर्कों के ज़रिए प्रमोट करने में विश्वास नहीं रखता।

२) देवनागरी मात्र के ज्ञान से मराठी या बांग्ला टाइप नहीं किया जा सकता।

अब आपके दूसरे तर्क पर। कोई ‘ब्यांक’ लिखेगा या ‘बैंक’ लिखेगा इसका कीबोर्ड से क्या लेना-देना?

कोई संबंध नहीं है। यहीं तो मैं कह रहा हूँ, कि कीबोर्ड लेआउट और स्पेलिंग के बीच कोई भी संबंध नहीं है।

लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि भारतीय भाषाएँ जादुई हैं और इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड जादू की छड़ी है। बस हर लिपि के मिलते-जुलते अक्षर एक कुंजी पर रख दिए जाए, तो लोग सिर्फ़ सुनकर ही कोई भी भारतीय भाषा टाइप कर सकेंगे।

ये दावा पूरी तरह से गलत है। लेकिन कुछ लोग ऐसे दावों से धोखा खा जाते हैं, इसलिए इसके खिलाफ़ उदाहरण इकट्ठे करना मुझे उचित लगा।

V S Rawat

unread,
Dec 9, 2013, 9:51:20 AM12/9/13
to technic...@googlegroups.com
On 12/9/2013 3:03 PM, Anunad Singh wrote:
> अनुभव जी,
> ऊपर आपने जो तर्क दिए हैं मैं उसे मोटा-मोटी दो भागों में बाँत रहा हूँ-
>
> १) इंस्क्रिप्ट में कुछ अक्षरों का स्थान भाषा के अनुसार अलग-अलग है।
>
> २) देवनागरी मात्र के ज्ञान से मराठी या बांग्ला टाइप नहीं किया जा सकता।
>
> इसमें पहले वाले पर पहले आते हैं। मुझे यह बताइए कि तथाकथित 'फोनेटिक कुंजीपटल' में कितना
> मानकीकरण है? इसमें व्यंजनों/मात्राओं आदि के लिए कुंजी/कुंजी समूह कितना मानकीकृत है? यदि
> अलग से मैपिंग न दी हो तो क्या तथाकथित फोनेटिक टंकण से कोई नया व्यक्ति टंकण कर
> पाएगा? कितने तरह के फोनेटिक प्रणालियाँ प्रचलित हैं?

फोनेटिक कुंजीपटल को मानकीकृत किया किस संस्था ने है?
मैंने जो अपना फोनेटिक कुंजीपटल बनाया है वो अपनी समझ से, अपनी सुविधा से बना लिया है,
बढ़िया चल रहा है। सिर्फ़ हिन्दी का है, बाकी भाषाओं के लिए बनाने की आवश्यकता नहीं
पड़ी इसलिए नहीं बनाया। कभी कोई माँगेगा तो बना भी दूँगा। उसमें कीज़ भी वही रखूँगा कि
सारी भाषाओं में एक ही रहे।

बात फोनेटिक कुंजीपटल के मानकीकृत या विभिन्न भाषाओं में समान होने की नहीं है।
बात है कि इन्स्क्रिप्ट के लिए इसके पक्ष में जो तर्क दिए जा रहे हैं वो सत्य नहीं हैं। जैसा
कि कुछ उदाहरण अनुभव जी ने दिए हैं। मुझे तो ये कमियाँ पता भी नहीं थीं। मैंने इन्स्क्रिप्ट
कभी इस्तेमाल नहीं किया है। मेरा काम चल रहा है।

हर व्यक्ति जो कीबोर्ड सीख लेता है उसे वह सरल सहज लगने लगता है और वह उसी का
इस्तेमाल करता रहता है।

नए व्यक्ति को कठिन और जटिल इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड का सुझाव देना ग़लत है, क्योंकि फ़ोनेटिक
को सीखना बहुत आसान होता है।

अगर कोई हमसे सुझाव माँगता है तो हमें इन बातों का ध्यान रखना चाहिए, न कि अपनी आदत
को आगे दूसरों में बढ़ाना चाहिए।

धन्यवाद
रावत

>

V S Rawat

unread,
Dec 9, 2013, 9:54:54 AM12/9/13
to technic...@googlegroups.com
आपके सभी तर्क बहुत अच्छे हैं अनुभव जी।

मैं फ़ोनेटिक इस्तेमाल करता हूँ, क्योंकि मैंने इसी से शुरू किया था, उस समय इनस्क्रिप्ट मुझे
नहीं मिला था। मिला होता तो मैं उसी को सीख लेता। मुझे भी आपकी तरह ना फ़ोनेटिक से
कोई लगाव या नफ़रत है, न ही इनस्क्रिप्ट से कोई लगाव या नफ़रत है। बस मेरा काम
फ़ोनेटिक से चल रहा है।

मैं आपके इस मुद्दे का पूरी तरह से समर्थन करता हूँ कि लोगों को सच बोलना चाहिए, सही
सुझाव देना चाहिए। कमियों को छुपा कर किसी थोड़ी अच्छी चीज़ को और अच्छी बनाना
बताना भी ग़लत है, अनैतिक है।

आपने बहुत काम की जानकारी दी इनस्क्रिप्ट के बारे में।

रावत

On 12/9/2013 6:30 PM, Anubhav Chattoraj wrote:
> अनुनाद जी,
>
> उस संदेश के *प्रसंग* को नज़रअंदाज़ न करें।
>
> १) इंस्क्रिप्ट में कुछ अक्षरों का स्थान भाषा के अनुसार अलग-अलग है।
>
> इसमें पहले वाले पर पहले आते हैं। मुझे यह बताइए कि तथाकथित ‘फोनेटिक कुंजीपटल’ में
> कितना मानकीकरण है? इसमें व्यंजनों/मात्राओं आदि के लिए कुंजी/कुंजी समूह कितना
> मानकीकृत है? यदि अलग से मैपिंग न दी हो तो क्या तथाकथित फोनेटिक टंकण से कोई
> नया व्यक्ति टंकण कर पाएगा? कितने तरह के फोनेटिक प्रणालियाँ प्रचलित हैं?
>
> फ़ोनेटिक कुंजीपटलों की बात मैंने सिर्फ़ ये पॉइंट आउट करने के लिए उठाई है कि ये दोनों तर्क
> समान हैं:
>
> 1. हर भाषा/लिपि का इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड मोटा-मोटी मेल खाता है, इसलिए इनस्क्रिप्ट
> इस्तेमाल करना चाहिए।
> 2. फ़ोनेटिक कीबोर्ड अंग्रेज़ी कीबोर्ड से मोटा-मोटी मेल खाता है, इसलिए फ़ोनेटिक

रवि-रतलामी

unread,
Dec 10, 2013, 11:56:02 PM12/10/13
to technic...@googlegroups.com
"इनस्क्रिप्ट के कुछ समर्थक पहला तर्क निरंतर पेश करते हैं लेकिन दूसरे तर्क को नज़रअंदाज़ करके उलटा फ़ोनेटिक को दुतकारते हैं। ये डबल स्टैंडर्ड वाली बात है।"

मैं भी इनस्क्रिप्ट का अंध समर्थक हूँ. 
क्यों?
कारण -
मैं 1988 से  डॉस के जमाने से हिंदी कंप्यूटरी का प्रयोग कर रहा हूँ. अक्षर और शब्दरत्न जैसे डॉस आधारित हिंदी वर्डप्रोसेसर का प्रयोग करते हुए शुरूआत की है, जिसमें रेमिंगटन हिंदी कुंजीपट था.
फिर सुषा (सेमी फ़ोनेटिक) कृतिदेव (फिर से रेमिंगटन), फ़ोनेटिक (बोलनागरी),  इनस्क्रिप्ट, गूगल ट्रांसलिट्रेशन, और अब मोबाइल टैबलेटों में ऑनस्क्रीन वर्णमालाक्रम के कुंजीपट आदि सभी का  डॉस, विंडोज, लिनक्स, एण्ड्रायड आदि ओएस में भरपूर प्रयोग किया है.

और, ऐसा भी नहीं है कि मैने कोई छोटा मोटा या शौकिया कार्य किया है, मैंने पेशेवराना तरीके से केडीई और छत्तीसगढ़ी के लाखों वाक्यांशों का स्थानीयकरण रेकॉर्ड कम समय में किया है :), और अभी भी मेरा अधिकांश समय हिंदी कंपयूटरी में ही बीतता है.

तो, मेरे अनुभव व निष्कर्ष के आधार पर मैं आंख मूंद कर कह सकता हूँ कि  पीसी और लेपटॉप कंप्यूटरों पर टच टाइपिंग (त्वरित गति से बिना देखे टाइप करने) के लिए अंतर्निहित इनस्क्रिप्ट हिदी कुंजीपट से बेहतर कोई औजार नहीं है. दूसरे नंबर पर रेमिंगटन भी ठीक है, परंतु सर्वाधिक लोकप्रिय विंडोज ओएस (तथा लिनक्स में भी) के लिए भी जो रेमिंगटन कुंजीपट उपलब्ध हैं, उनमें तमाम दिक्कतें (नवीनतम विंडोज 8 के आईएमई 3 में भी रेमिंगटन कुंजीपट में समस्या है जिससे त्वरित टाइपिंग में रुकावटें आती हैं) आती हैं.

फ़ोनेटिक में सबसे बड़ी समस्या हिंदी के जटिल व संस्कृतनिष्ठ शब्दों को टाइप करने की आती है. उदाहरणार्थ,  "क्वचिदन्यतोऽपि" जैसे जटिल शब्दों (यह एक लोकप्रिय हिंदी ब्लॉग का शीर्षक है) को फ़ोनेटिक में टाइप करने पर कई ट्रायल एंड एरर प्रयास (यदि प्रेडिक्टिव इनपुट जैसे कि गूगल ट्रांसलिट्रेशन नहीं है तो कई बार बहुत मुश्किल आती है) करने पड़ते हैं, जबकि इनस्क्रिप्ट और रेमिंगटन जैसे कुंजीपटों में यह समस्या नहीं आती.

सार यह, कि यदि हिंदी टाइपिंग नया नया सीख रहे हों और इसमें तेज गति से अधिक मात्रा में टाइप करने की महारत (टच टाइपिंग) हासिल करनी है तो डिफ़ॉल्ट हिंदी कुंजीपट इनस्क्रिप्ट.ही सीखें. शौकिया टाइप करने वालों के लिए तो खैर, सौ विकल्प हैं और हजार तर्क!

सादर,
रवि

सोमवार, 9 दिसम्बर 2013 6:30:41 pm UTC+5:30 को, Anubhav Chattoraj ने लिखा:

Hariraam

unread,
Dec 11, 2013, 1:01:26 AM12/11/13
to technic...@googlegroups.com
बिल्कुल सही कहा है रवि जी ने....
 
कीबोर्ड एवं कंप्यूटर स्क्रीन को बिना देखे, केवल लिखित पाठ को देखते हुए (ब्लाइंड रूप से) हिन्दी (व अन्य भारतीय लिपि) के पाठ को निम्नतम त्रुटियों से टंकित करने की तीव्रगति इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड से ही मिल पाती है।
 
फोनेटिक में कई शब्दों के लिए कुछ विशेष चिह्न, आदि का प्रयोग करना पड़ता है, जिसके लिए कीबोर्ड व स्क्रीन देखना पड़ता है, फिर जाँचना पड़ता है कि सही शब्द टंकित हुआ या नहीं...
 
सबसे कठिनाई तब अनुभव होती है, जब हिन्दी में लिखित पाठ को देखते हुए  (फोनेटिक में) टाइप करने के लिए हिन्दी वर्णों के लिए कौन-से लेटिन वर्ण की कुंजी दबाएँ यह मन ही मन लिप्यन्तरण करके निर्णय लेना पड़ता है।
 
लेटिन लिपि के कीबोर्ड के माध्यम से भारतीय लिपियों को टंकित करने की इस प्रक्रिया का नाम "फोनेटिक" रखना सर्वथा अनुचित लगता है? जबकि बेसिक लेटिन लिपि अपने आप में फोनेटिक है ही नहीं। ध्वनिविज्ञान की कसौटी पर तो देवनागरी लिपि को ही विश्व के वैज्ञानिकों ने खरा पाया है।
 
सही मायने में देखें तो "इन्स्क्रिप्ट" कीबोर्ड ही वस्तुत फोनेटिक है।
 
इस तथाकथित 'फोनेटिक' इनपुट प्रणाली का सही नाम तो गूगल ने पहले "गूगल ट्रांसलिट्रेशन" रखा था। क्योंकि यह लेटिन लिपि के मूल अल्फाबेट्स एवं कीबोर्ड पर उपलब्ध अन्य चिह्नों के मिश्रण को येन-केन प्रकारेण इण्डिक वर्णों में लिप्यन्तरित करती है।
 
इसी तरह की पद्धति का नामकरण पहले "ITrans" हुआ था, 1988 के पूर्व के उस जमाने में संस्कृत के पाठ की सामग्री को कम्प्यूटरीकरण करने के लिए बेसिक लेटन लिपि का सहारा लेना पड़ा था, क्योंकि तब इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड, ISCII Codes, व युनिकोड विकसित नहीं हुए थे। केवल ASCII code ही सुलभ थे।
 
किन्तु, अनुभव जी का यह कथन बिल्कुल सही है कि सभी भारतीय लिपियों के लिए इन्स्क्रिप्ट कोबोर्ड एकदम या सम्पूर्णतः एक समान नहीं है, कुछ न कुछ विशेष वर्णों के लिए अलग अलग कुंजियों का प्रयोग होता है। फिर भी इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड में ब्राह्मी आधारित सभी भारतीय लिपियों के मुख्य/मूल वर्णों के कुंजीस्थान में एकरूपता रखी गई है।
हरिराम

2013/12/11 रवि-रतलामी <ravir...@gmail.com>
"
फ़ोनेटिक में सबसे बड़ी समस्या हिंदी के जटिल व संस्कृतनिष्ठ शब्दों को टाइप करने की आती है. उदाहरणार्थ,  "क्वचिदन्यतोऽपि" जैसे जटिल शब्दों (यह एक लोकप्रिय हिंदी ब्लॉग का शीर्षक है) को फ़ोनेटिक में टाइप करने पर कई ट्रायल एंड एरर प्रयास करने पड़ते हैं, .....
 
.... यदि हिंदी टाइपिंग नया नया सीख रहे हों और इसमें तेज गति से अधिक मात्रा में टाइप करने की महारत (टच टाइपिंग) हासिल करनी है तो डिफ़ॉल्ट हिंदी कुंजीपट इनस्क्रिप्ट.ही सीखें. शौकिया टाइप करने वालों के लिए तो खैर, सौ विकल्प हैं और हजार तर्क!

रवि

 

V S Rawat

unread,
Dec 11, 2013, 2:33:54 AM12/11/13
to technic...@googlegroups.com
मैं "शौकिया टाइप करने वाला" नहीं हूँ। सन 2010 में एक साल के दौरान मैंने एक मिलियन
(दस लाख) शब्दों का अनुवाद - प्रूफ़ रीडिंग की थी। मैंने एक दिन में 6000 शब्दों के अनुवाद
किए हुए हैं। मेरे घर का चूल्हा मेरे हिन्दी के कामों से ही चल रहा है।

फिर भी मैं इनस्क्रिप्ट या रेमिंगटन का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूँ, न आज तक किया है। मुझे
इनसे कोई बैर नहीं है, बस जब ज़रूरत थी तो इनके बारे में पता नहीं चला, और फिर मैंने अपना
फ़ोनेटिक बना लिया, तो उसी पर हाथ जम गया। अब बदलने की ज़रूरत नहीं लगती, न इतने
प्रयास करने की इच्छा होती है।

वैसे मैं भी पहले सुशा में, फिर जावा के एक प्रोग्राम में यूनीकोड में, फिर अपने इस फ़ोनेटिक
पर बदल चुका हूँ। दिक़्क़त आती है बदलने में, इसीलिए जानता हूँ कि फ़ोनेटिक को सीखना बहुत
आसान है।


और मैं स्वयं को भाषाई नीच, या मंदबुद्धि या शोषित या दलित नहीं महसूस करता हूँ।

आपका यह क्वचिदन्यतोऽपि मैं अभी अपने फ़ोनेटिक पर टाइप कर रहा हूँ, दो त्रुटियाँ हुई हैं,
शायद क्योंकि ऽ वर्ण का अधिक प्रचलन नहीं है इसलिए याद नहीं रहता कहाँ है और अप्रचलित
शब्दों को पहली बार टाइप करने पर त्रुटि तो आती है या गति कम ही होती है। इसलिए
आपकी इस परीक्षा में मेरी सप्लीमेंटरी तो आ गई है, फ़ेल नहीं हुआ।

इस तरह से आपके वाले तरीके का इस्तेमाल न करने वालों को गैर-ज़िम्मेदार, "शौकिया टाइप
करने वाला" करार देना कोई बहुत मान्य तरीका नहीं लगा मुझे।

धन्यवाद।
--
रावत
> उस संदेश के *प्रसंग* को नज़रअंदाज़ न करें।
>
> १) इंस्क्रिप्ट में कुछ अक्षरों का स्थान भाषा के अनुसार अलग-अलग है।
>
> इसमें पहले वाले पर पहले आते हैं। मुझे यह बताइए कि तथाकथित ‘फोनेटिक कुंजीपटल’
> में कितना मानकीकरण है? इसमें व्यंजनों/मात्राओं आदि के लिए कुंजी/कुंजी समूह कितना
> मानकीकृत है? यदि अलग से मैपिंग न दी हो तो क्या तथाकथित फोनेटिक टंकण से
> कोई नया व्यक्ति टंकण कर पाएगा? कितने तरह के फोनेटिक प्रणालियाँ प्रचलित हैं?
>
> फ़ोनेटिक कुंजीपटलों की बात मैंने सिर्फ़ ये पॉइंट आउट करने के लिए उठाई है कि ये दोनों
> तर्क समान हैं:
>
> 1. हर भाषा/लिपि का इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड मोटा-मोटी मेल खाता है, इसलिए
> इनस्क्रिप्ट इस्तेमाल करना चाहिए।
> 2. फ़ोनेटिक कीबोर्ड अंग्रेज़ी कीबोर्ड से मोटा-मोटी मेल खाता है, इसलिए फ़ोनेटिक
> इस्तेमाल करना चाहिए।
>
> इनस्क्रिप्ट के कुछ समर्थक पहला तर्क निरंतर पेश करते हैं लेकिन दूसरे तर्क को नज़रअंदाज़
> करके उलटा फ़ोनेटिक को दुतकारते हैं। ये डबल स्टैंडर्ड वाली बात है।
>
> मेरा न इनस्क्रिप्ट से कोई खुन्नस है, न फ़ोनेटिक से कोई लगाव। कौन क्या सोचके
> कौन-सा कीबोर्ड इस्तेमाल करता है, इससे मुझे कोई मतलब नहीं है। लेकिन मैं किसी चीज़
> को अर्धसत्यों और बेतुके तर्कों के ज़रिए प्रमोट करने में विश्वास नहीं रखता।
>
> २) देवनागरी मात्र के ज्ञान से मराठी या बांग्ला टाइप नहीं किया जा सकता।
>
> अब आपके दूसरे तर्क पर। कोई ‘ब्यांक’ लिखेगा या ‘बैंक’ लिखेगा इसका कीबोर्ड से
> क्या लेना-देना?
>
> कोई संबंध नहीं है। यहीं तो मैं कह रहा हूँ, कि कीबोर्ड लेआउट और स्पेलिंग के बीच कोई
> भी संबंध नहीं है।
>
> लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि भारतीय भाषाएँ जादुई हैं और इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड जादू की
> छड़ी है। बस हर लिपि के मिलते-जुलते अक्षर एक कुंजी पर रख दिए जाए, तो लोग सिर्फ़
> सुनकर ही कोई भी भारतीय भाषा टाइप कर सकेंगे।
>
> ये दावा पूरी तरह से गलत है। लेकिन कुछ लोग ऐसे दावों से धोखा खा जाते हैं, इसलिए
> इसके खिलाफ़ उदाहरण इकट्ठे करना मुझे उचित लगा।
>
> --

Anunad Singh

unread,
Dec 11, 2013, 7:57:21 AM12/11/13
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
मुझे लगता है कि अधिकांश लोगों को ऐसा आभास होता है (या भ्रम है) कि (तथाकथित) फोनेटिक कुंजीपटल को याद नहीं करना पड़ता है जबकि इंस्क्रिप्ट को याद करना पड़ेगा या अभ्यास करना पड़ेगा।

सच्चाई यह है कि कोई मानक फोनेटिक मैपिंग योजना है ही नहीं। एक प्रोग्राम 'राम' के लिए  ram टाइप करने को कहेगा, दूसरा raam , तीसरा rAm, चौथा   raama  आदि। अन्य मात्राओं और अक्षरों में भी भांति-भांति की विभिन्नता है।  इसका मतलब यह हुआ कि आप जिस फोनेटिक प्रोग्राम की सहायता से टाइप करते हैं उसके अलावा किसी दूसरे फोनेटिक प्रोग्राम पर टाइप करना पड़ जाय तो बहुत कठिनाई होती है। यदि हजार लोगों को किसी टंकण परीक्षा के लिए बुलाया जाता है तो उनको कौन सा कीबोर्ड मुहैया कराया जाएगा? क्या कहा जाएगा कि आप अपना टाइपिंग प्रोग्राम स्वयं लेकर आइये? क्या किसी स्वतंत्र (स्वाभिमानी) देश की भाषा(ओं) के लिए कोई मानक कुंजीपटल जरूरी नहीं है? यदि जरूरी है तो उसमें क्या गुण होने चाहिए?

ऊपर मैने मानक की बात की। किन्तु किसी भी फोनेटिक योजना के कुछ अन्य दोष भी हैं -
(१) भारतीय भाषाओं में जो वर्ण/मात्राएँ बहुत अधिक मात्रा में प्रयुक्त होतीं हैं उनको लिखने के लिए दो या कभी-कभी तीन कुंजियाँ दबाना। उदाहरण के लिए 'दीर्घ ई की मात्रा' ( ी) के लिए ii या ee या  शिफ्ट + i  दबाना ;  इसी प्रकार  ा  ू  ,  ौ ,   ै,   आदि की मात्राओं के लिए प्रायः दो कुंजियाँ दबानी पड़तीं है।

(२) तेज गति से टाइप करने के लिए केवल यही जरूरी नहीं है कि कम से कम कुंजियाँ दबानी पड़ें, इसके अलावा यह भी जरूरी है कि प्रायः प्रयुक्त कुंजियाँ ऐसे स्थान पर हों जिससे हाथ को कम से कम चलाना/घुमाना/स्थानान्तरित करना पड़े। इस कसौटी पर फोनेटिक के 'पास' होने की सम्भावना  कैसी होगी जब हमको पता है कि जब आप फोनेटिक स्वीकार कर रहे हैं तो आपके पास विकल्प ही नहीं हैं।

इंस्क्रिप्ट की सबसे अच्छी बातें ये ही हैं-
* यह एक मानक है,
* इसमें अधिकांश प्रायः प्रयुक्त मात्राओं/वर्णों के लिए एक कुंजी दबाने से ही काम हो जाता है।
* कुंजियों का स्थान सोचविचार कर निश्चित किया गया है।

और जहाँ तक कुंजी-योजना को याद करने/अभ्यास करने की बात है, दोनों में ही याद करना पड़ता है। और याद करने के बाद इंस्क्रिप्ट सब जगह और सब समय के लिए हो गयी जबकि एक प्रोग्राम का फोनेटिक याद करने के बाद भी दूसरे प्रोग्राम पर पर्याप्त रूप से काम नहीं देगा।

अन्त में कहना चाहता हूँ कि आजकल लिखने के लिए बिना कुंजी दबाए (माउस क्लिक द्वारा) भी लिखा जा सकता है। लेकिन जब रोज दस-बीस पेज लिखने की बात हो तो दक्षता (वर्ण प्रति मिनट आदि) बहुत माने रखता है। मेरा अनुमान है कि इंस्क्रिप्ट में २०-३०% अधिक दक्षता मिलेगी।

-- अनुनाद




11 दिसम्बर 2013 1:03 pm को, V S Rawat <vsr...@gmail.com> ने लिखा:
--
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--
जब भी देश पर विपत्ति, जुल्म, गुलामी की मुसीबत आई है।
अपनी यह हिंदी ही काम आई है।
रामानंद और रामानुजाचार्य से लेकर
अन्ना तक सबने हिंदी ही अपनाई है।

Anubhav Chattoraj

unread,
Dec 11, 2013, 8:02:27 AM12/11/13
to technic...@googlegroups.com

कीबोर्ड एवं कंप्यूटर स्क्रीन को बिना देखे, केवल लिखित पाठ को देखते हुए (ब्लाइंड रूप से) हिन्दी (व अन्य भारतीय लिपि) के पाठ को निम्नतम त्रुटियों से टंकित करने की तीव्रगति इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड से ही मिल पाती है।

फोनेटिक में कई शब्दों के लिए कुछ विशेष चिह्न, आदि का प्रयोग करना पड़ता है, जिसके लिए कीबोर्ड व स्क्रीन देखना पड़ता है, फिर जाँचना पड़ता है कि सही शब्द टंकित हुआ या नहीं…

इस तथाकथित ‘फोनेटिक’ इनपुट प्रणाली का सही नाम तो गूगल ने पहले “गूगल ट्रांसलिट्रेशन” रखा था। क्योंकि यह लेटिन लिपि के मूल अल्फाबेट्स एवं कीबोर्ड पर उपलब्ध अन्य चिह्नों के मिश्रण को येन-केन प्रकारेण इण्डिक वर्णों में लिप्यन्तरित करती है।

लगता है आप और रतलामी जी दोनों “फ़ोनेटिक” का अर्थ गलत समझ बैठे हैं। यहाँ “फ़ोनेटिक” से “गूगल ट्रांसलिटरेट” जैसे सॉफ़्टवेयर का तात्पर्य नहीं है।

भारतीय भाषाओं के संदर्भ में, “फ़ोनेटिक लेआउट” ऐसे लेआउटों को कहते हैं जिनमें यथासंभव देवनागरी (या अन्य भारतीय लिपि) के अक्षर मिलते-जुलते अंग्रेज़ी अक्षरों की कुंजी पर रखे गए हों। इनमें ब्लाइंड टच-टाइपिंग आराम से की जा सकती है क्योंकि कुंजी और अक्षर में सीधा मेल होता है, “येन-केन प्रकारेण” लिप्यंतरण नहीं।

लेटिन लिपि के कीबोर्ड के माध्यम से भारतीय लिपियों को टंकित करने की इस प्रक्रिया का नाम “फोनेटिक” रखना सर्वथा अनुचित लगता है? जबकि बेसिक लेटिन लिपि अपने आप में फोनेटिक है ही नहीं।

सही मायने में देखें तो “इन्स्क्रिप्ट” कीबोर्ड ही वस्तुत फोनेटिक है।

बांग्ला, और असमिया लिपियाँ भी फ़ोनेटिक नहीं हैं। मराठी, पंजाबी, और गुजराती लिपियाँ भी कुछ हद तक फ़ोनेटिक नहीं हैं। अतः आपके तर्क से इन भाषाओं के इनस्क्रिप्ट कीबोर्डों को भी फ़ोनेटिक नहीं कहा जा सकता।

खैर, आपकी बात से सहमत हूँ कि ऐसी प्रणालियों के लिए “फ़ोनेटिक” नाम उचित नहीं है। लेकिन ये नाम अब प्रचलित हो चुका है।

ध्वनिविज्ञान की कसौटी पर तो देवनागरी लिपि को ही विश्व के वैज्ञानिकों ने खरा पाया है।

कृपया ऐसे तीन-चार वैज्ञानिकों के नाम, उनके यूनिवर्सिटी अफ़िलिएशन, और देवनागरी-संबंधी पेपरों के शीर्षक प्रदान करने का कष्ट लें।

किसी भी लिपि को ध्वन्यात्मक बनाया जा सकता है। आम तौर पर फ़ोनॉलोजी वगैरह के पेपरों में देवनागरी नहीं, IPA पढ़ने को मिलता है, इसलिए अंदाज़ा लगा रहा हूँ कि विश्व के वैज्ञानिक IPA को देवनागरी से अधिक ध्वन्यात्मक मानते हैं। लेकिन IPA की उपज तो अंग्रेज़ी लिपि से ही हुई थी।

किसी भी लिपि को अ-ध्वन्यात्मक भी बनाया जा सकता है। अंग्रेज़ी लिपि कभी मोटा-मोटी ध्वन्यात्मक हुआ करती थी, लेकिन कुछ सदियों पहले कथित भाषा की स्वर ध्वनियों में बड़े बदलाव आएँ। लेकिन वर्तनी नहीं बदली गई। शायद उस समय के पढ़े-लिखे लोग सोचते होंगे कि ये देहाती तो “अपभ्रंश” बोलते हैं, इनके उच्चारण के अनुसार हम अपनी लेखनशैली क्यों बदलें। परिणाम सबके सामने है: आज अंग्रेज़ी शब्दों के लेखन और उच्चारण में संबंध कठिनाई से ही समझा जा सकता है।

हिंदी में प्रयुक्त देवनागरी भी पूर्णतया ध्वन्यात्मक नहीं है। इस बारे में मैंने पहले भी चर्चा की है। अन्य भाषाओं की देवनागरी की बात करें तो नेपाल की कई भाषाएँ देवनागरी अपना रही हैं, लेकिन देवनागरी इन भाषाओं के कई पहलू दर्शा नहीं सकती। अतः इन भाषाओं के लिए देवनागरी को “ध्वन्यात्मक” बिल्कुल नहीं कहा जा सकता।

इन उदाहरणों का सार ये है कि कोई भी लिपि अंतर्निहित रूप से ध्वन्यात्मक या अध्वन्यात्मक नहीं होती। लिपि की ध्वन्यात्मकता उसके प्रयोग पर निर्भर है।

Hariraam

unread,
Dec 11, 2013, 8:11:45 AM12/11/13
to technic...@googlegroups.com
फोनेटिक या अन्य किसी कुंजीपटल का उपयोग करनेवालों के लिए "शौकिया", "गैर-जम्मेदार" जैसे शब्द कोई नहीं कहता। अनेक बड़े बड़े साहित्यकार भी फोनेटिक (जिसे लेटिन ट्रांसलिट्रेशन कहना सही होगा) के माध्यम से ही टंकण करते हैं। सारांश यह है कि अभ्यास ही मुख्य पहलू है, जिसका जिसमें अभ्यास है, उसके लिए वही अच्छा है।
 
भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा रही इनपुट प्रणालियों/सुविधाओं में 1. इन्स्क्रिप्ट, 2. फोनेटिक, 3. रेमिंगटन  तीनों का ही विकल्प मौजूद रहता है। जिसको जो सुविधाजनक लगे उसमें कार्य करे।
 
किन्तु जहाँ लाखों केन्द्रीय सरकारी एवं राज्य सरकारी कर्मचारियों को नवीनतः हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर में टंकण सिखाना है, मानकीकृत "इनस्क्रिप्ट" की बोर्ड के माध्यम से ही प्रशिक्षण दिए जाने को प्राथमिकता दी जा रही है। जो सर्वथा उचित है।
 
कुछ बड़े अधिकारियों व तकनीकी कर्मचारियों को जिन्हें दिन में कुछेक शब्द/पंक्ति मात्र टंकण करना पड़ता है, उनको लेटिन ट्रांसलिट्रेशन (फोनेटिक) ही सरल लगता है।
 
 

हरिराम
प्रगत भारत <http://hariraama.blogspot.com>


2013/12/11 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
इस समूह से अनसब्सक्राइब करने के लिए और इससे ईमेल प्राप्त करना बंद करने के लिए, technical-hin...@googlegroups.com को एक ईमेल भेजें.

Anunad Singh

unread,
Dec 11, 2013, 8:47:49 AM12/11/13
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
अनुभव जी,
(१) जिसका  आधिकारिक नाम  'गूगल ट्रांसलिटरेशन' है उसमें कुछ तो टंकित करना पड़ता है, जिसके बाद 'सजेस्सन' आते हैं। इसमें 'जो कुछ' टाइप करना पड़ता है वह निश्चित रूप से 'फोनेटिक' की जमीन पर खड़ा है। अतः गूगल ट्रांसलिटरेशन को 'फोनेटिक' कहने को गलत नहीं कहा जा सकता।

(२) देवनागरी (भारतीय लिपियों) के फोनेटिक न होने या आईपीए से कम फोनेटिक होने का जो तर्क आपने दिया है वह कहाँ तक उचित है? भारतीय लिपियों के पर्याप्त फोनेटिक होने का प्रमाण यह है कि भारतीय कोशों में कहीं भी शब्दों का अलग से उच्चारण देने की न प्रथा रही है न किसी को कभी उसकी आवश्यकता जान पड़ी होगी। रोमन के केस में यह बहुत जरूरी है। हममें से अधिकांश लोग अंग्रेजी शब्दों के उटपटांग वर्तनी-उच्चारण-असंगति से ही परिचित हैं। किन्तु मेरा अनुभव है कि फ्रेंच भाषा में यह असंगति और भी बढ़ी हुई है।

यदि बाल की खाल निकालने लगें तो बताइए कि आईपीए के कितने संस्करण आ चुके हैं? क्यों? यह भी बताइए कि क्या सभी लोग उच्चारण के लिए आईपीए का प्रयोग करते हैं? मैने तो सुना है अमेरिका में निर्मित अधिकांश शब्दकोश उच्चारण के लिए अपनी ही प्रणाली का प्रयोग करते हैं? विश्व में (और भारत में) कितने प्रतिशत लोग ठीक से आईपीए  लिख/समझ सकते हैं? दूसरी बात, क्या आईपीए के वर्ण रोमन से मिलते-जुलते हैं इसलिए वे फोनेटिक हैं या डिजाइन के कारण या सोच-समझकर वर्णमाला डिजाइन करने के कारण? निश्चित ही यहाँ वे अपने आकार के कारण फोनेटिक नहीं हैं (जैसा की आपके कथन   'लेकिन IPA की उपज तो अंग्रेज़ी लिपि से ही हुई थी'  का मतलब निकलता है!)

(३) जब आप बांग्ला आदि को 'पूर्णतः फोनेटिक नहीं' कहते हैं तो शायद आपका संकेत 'भाल' लिखकर 'भालो' बोलना (या हिन्दी वालों द्वारा  'राम' को 'राम्' जैसा उचारण करने की तरफ है। लेकिन यहाँ एक व्यवस्था है जिसकी अंग्रेजी और फ्रेंच  की  लेखन-वाचन-असंगति से कोई तुलना नहीं की जा सकती।

लेकिन भाषा के फोनेटिक होने / न होने को यहाँ लाना ही अप्रासंगिक है। यहाँ तो चर्चा यह है कि हमारा उद्देश्य 'भाल' लिखना है- इसे किन-किन कुंजियों को दबाकर लिखा जाय?

-- अनुनाद


Anubhav Chattoraj

unread,
Dec 11, 2013, 10:47:28 AM12/11/13
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी,

>इसमें 'जो कुछ' टाइप करना पड़ता है वह निश्चित रूप से 'फोनेटिक' की जमीन पर खड़ा है।
अतः गूगल ट्रांसलिटरेशन को 'फोनेटिक' कहने को गलत नहीं कहा जा सकता।

आपका तर्क उचित है, लेकिन हम जिन इनपुट विधियों की बात कर रहे हैं वो गूगल
ट्रांसलिटरेट, माइक्रोसॉफ़्ट आई॰एम॰ई॰ इत्यादि से काफ़ी अलग हैं। इन्हें और गूगल ट्रांसलिटरेट
को एक ही नाम से पुकारकर सिर्फ़ कनफ़्यूझ़न ही पैदा होगा।

आपके अन्य प्रश्नों और संदेहों के जवाब मेरे पिछले संदेशों में हैं, कृपया इन्हें ठीक से पढ़ने का कष्ट
उठाएँ।

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Dec 11, 2013, 8:31:54 PM12/11/13
to technical-hindi
मुझे लगता है कि अधिकांश लोगों को ऐसा आभास होता है (या भ्रम है) कि (तथाकथित) फोनेटिक कुंजीपटल को याद नहीं करना पड़ता है जबकि इंस्क्रिप्ट को याद करना पड़ेगा या अभ्यास करना पड़ेगा।

यह बिलकुल सही बात है कि ऐसा भ्रम फैला है कि कथित फोनेटिक कुंजीपटल को याद नहीं करना पड़ता। अंग्रेजी अक्षरों से साम्यता से व्यक्ति को ऐसा भ्रम होता है लेकिन किसी फोनेटिक औजार (माना बरह) से पूरी तरह से हिन्दी लिखने लायक सीखने में काफी समय लग जाता है। इतना अवश्य है कि व्यक्ति कुछ न कुछ टाइप करना तत्काल शुरु कर देता है। लेकिन किसी अंग्रेजी प्रयोक्ता को पहली बार फोनेटिक पर बैठाइये और उससे एक हिन्दी पैराग्राफ टाइप करने को कहें तो स्थिति सामने आ जायेगी। पूरी तरह सीखने में उसे भी कम से कम एकाध महीना लग ही जाता है। और जिस दिन औजार बदलना पड़े (जैसे बरह के नये संस्करणों के पेड हो जाने पर लोग गूगल आइऍमई पर आये हैं) तो नई लर्निंग कर्व। मेरे एक कवि मित्र गूगल आइऍमई पर शुरु किये थे लेकिन उसमें बार-बार शब्दों को बनाने में आने वाली कठिनाई से परेशान हो इन्स्क्रिप्ट सीखे। इन्स्क्रिप्ट के मुकाबले फोनेटिक का जो एक प्लस प्वाइंट है (तत्काल लिखना शुरु) वह यदि कीबोर्ड पर स्टीकर चिपका लिये जायें तो इन्स्क्रिप्ट में भी तत्काल लिखना शुरु हो जाता है। इन्स्क्रिप्ट देवनागरी के यूनिकोड के अनुकूल ही है, वास्तव में इन्स्क्रिप्ट में लिखना शुरु करने के बाद ही से मुझे कई संयुक्ताक्षरों का विग्रह समझ आया।

और हाँ फोनेटिक एवं रेमिंगटन कितने अवैज्ञानिक हैं यह मुझे एक प्रोग्रामर के तौर पर समझ आया जब मैंने इस प्रकार के टूल बनाये। कम्प्यूटर में देवनागरी की व्यवस्था के अनुकूल होने से जहाँ इन्स्क्रिप्ट लेआउट के लिये कोडिंग बिलकुल सरल है वहीं फोनेटिक या रेमिंगटन के लिये अत्यन्त दुरूह। छोटी इ की मात्रा इसका एक उदाहरण है। फोनेटिक या रेमिंगटन लेआउट की कोडिंग में इतना झोलझाल रहता है कि पूछिये मत।

और अन्त में बताता चलूँ कि मैंने भी रतलामी जी की तरह सभी लेआउटों पर काम किया है। किसी जमाने में टाइपराइटर पर रेमिंगटन सीखी थी। फिर कम्प्यूटर पर कई फोनेटिक औजारों पर कुछ साल काम किया, दिल संतुष्ट न हुआ तो इन्स्क्रिप्ट सीखी और फिर उसी पर टिक गया। सही तुलना वही कर सकता है जिसने सभी लेआउट स्वयं कुछ समय प्रयोग किये हों। (खाली लेआउट देखकर या एक बार ट्राइ करके नहीं) यह बात भी काबिलेगौर है कि बहुत से लोग फोनेटिक एवं रेमिंगटन से इन्स्क्रिप्ट पर गये हैं पर आजतक एक भी इन्स्क्रिप्ट से इन पर नहीं गया। इससे अन्दाजा आ जायेगा कि कौन बेहतर है।


11 दिसम्बर 2013 6:27 pm को, Anunad Singh <anu...@gmail.com> ने लिखा:
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--

Anunad Singh

unread,
Dec 11, 2013, 10:46:20 PM12/11/13
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
अनुभव जी,
आपने मेरे 'अन्य प्रश्नों' के उत्तर कहाँ दिए हैं, फिर ढ़ूंढ़ता हूँ।

किन्तु यदि आप 'गूगल ट्रांसलिटरेशन' को फोनेटिक की श्रेणी में नहीं रखते तो कृपया यह स्पष्ट करें कि अभी तक जिसे आप 'फोनेटिक कीबोर्ड' कहकर चर्चा कर रहे थे उससे आपका मतलब क्या है? अब तो यह लग रहा है कि 'फोनेटिक कीबोर्ड' को या तो मैं नहीं समझ रहा हूँ या आप नहीं समझ रहे हैं या दोनों ही नहीं समझ रहे हैं।

-- अनुनाद

Hariraam

unread,
Dec 11, 2013, 11:42:25 PM12/11/13
to technic...@googlegroups.com
अनुभव जी,
 
आप तर्क बहुत अच्छे व व्यापक पेश करते हैं। इस विषय पर बहस बहुत हो चुकी है। अंतिम निर्णय पर पहुँचना चाहिए। कृपया अनुनाद जी के पिछले संदेश में किए गए निम्न प्रश्न का उत्तर दें।
 
अन्य सभी माननीय सदस्यों से भी इस प्रश्न का उत्तर देने का निवेदन है।
हरिराम


2013/12/11 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
... ...यदि हजार लोगों को किसी टंकण परीक्षा के लिए बुलाया जाता है तो उनको कौन सा कीबोर्ड मुहैया कराया जाएगा? क्या कहा जाएगा कि आप अपना टाइपिंग प्रोग्राम स्वयं लेकर आइये? क्या किसी स्वतंत्र (स्वाभिमानी) देश की भाषा(ओं) के लिए कोई मानक कुंजीपटल जरूरी नहीं है? यदि जरूरी है तो उसमें क्या गुण होने चाहिए?
... ...
-- अनुनाद
 

V S Rawat

unread,
Dec 12, 2013, 12:31:42 AM12/12/13
to technic...@googlegroups.com

On 12/11/2013 6:27 PM, Anunad Singh wrote:
> मुझे लगता है कि अधिकांश लोगों को ऐसा आभास होता है (या भ्रम है) कि (तथाकथित)
> फोनेटिक कुंजीपटल को याद नहीं करना पड़ता है जबकि इंस्क्रिप्ट को याद करना पड़ेगा या
> अभ्यास करना पड़ेगा।
>
> सच्चाई यह है कि कोई मानक फोनेटिक मैपिंग योजना है ही नहीं। एक प्रोग्राम 'राम' के
> लिए ram टाइप करने को कहेगा, दूसरा raam , तीसरा rAm, चौथा raama आदि। अन्य
> मात्राओं और अक्षरों में भी भांति-भांति की विभिन्नता है।

अब आया मेरी समझ में।
अभी अनुभव जी की मेल में यह बिन्दु देखा तब सबझा।

आप लोग गूगल ट्रांसलिटरेशन आदि को फ़ोनेटिक समझ रहे हैं।

जबकि हम लोग फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउट को फ़ोनेटिक कह रहे हैं, जैसे कि मेरा ख़ुद का शुशा
कीबोर्ड है। इन लेआउटों में यूनीकोड के एक वर्ण की कीबोर्ड की किसी एक की पर मैपिंग
होती है जो माइक्रोसॉफ़्ट कीबोर्ड लेआउट क्रिएटर से बनाई गई है। इसलिए राम के लिए ram
या raam या rama लिखने का सवाल ही नहीं है। राम के लिए र ा म लिखना पड़ता है
अर्थात r a m कीज़ दबानी पड़ती हैं।

फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउट में k से क आता है, a से ा आता है A से अ आता है, यह फ़ोनेटिक होता है।

इसे याद रखना बहुत सरल है।

आशा है स्पष्ट हो गया होगा कि आपके और हमारे समझने में अन्तर था जिसकी वजह से यह बहस
बढ़ रही थी।

अब इस तरह के फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउटों की इन्स्क्रिप्ट से तुलना कर सकते हैं।

--
रावत
> <mailto:vsr...@gmail.com>> ने लिखा:

V S Rawat

unread,
Dec 12, 2013, 12:34:26 AM12/12/13
to technic...@googlegroups.com
On 12/11/2013 6:41 PM, Hariraam wrote:
> फोनेटिक या अन्य किसी कुंजीपटल का उपयोग करनेवालों के लिए "शौकिया",
> "गैर-जम्मेदार" जैसे शब्द कोई नहीं कहता।

कहा है हरिराम जी,
कल ही श्री रवि रतलामी जी ने एकदम यही कहा है।

- उनकी पोस्ट का अंश
शौकिया टाइप करने वालों के लिए तो खैर, सौ विकल्प हैं और हजार तर्क!

सादर,
रवि
-

देख लीजिए। वो प्रोफ़ेशनल हैं, हम शौक़िया हैं।

--
रावत

अनेक बड़े बड़े साहित्यकार भी फोनेटिक (जिसे लेटिन
> ट्रांसलिट्रेशन कहना सही होगा) के माध्यम से ही टंकण करते हैं। सारांश यह है कि अभ्यास ही
> मुख्य पहलू है, जिसका जिसमें अभ्यास है, उसके लिए वही अच्छा है।
> भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा रही इनपुट प्रणालियों/सुविधाओं में 1. इन्स्क्रिप्ट, 2.
> फोनेटिक, 3. रेमिंगटन तीनों का ही विकल्प मौजूद रहता है। जिसको जो सुविधाजनक लगे
> उसमें कार्य करे।
> किन्तु जहाँ लाखों केन्द्रीय सरकारी एवं राज्य सरकारी कर्मचारियों को नवीनतः हिन्दी व
> अन्य भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर में टंकण सिखाना है, मानकीकृत "इनस्क्रिप्ट" की बोर्ड के
> माध्यम से ही प्रशिक्षण दिए जाने को प्राथमिकता दी जा रही है। जो सर्वथा उचित है।
> कुछ बड़े अधिकारियों व तकनीकी कर्मचारियों को जिन्हें दिन में कुछेक शब्द/पंक्ति मात्र टंकण
> करना पड़ता है, उनको लेटिन ट्रांसलिट्रेशन (फोनेटिक) ही सरल लगता है।
>
> हरिराम
> प्रगत भारत <http://hariraama.blogspot.com>
>
>
> 2013/12/11 Anunad Singh <anu...@gmail.com <mailto:anu...@gmail.com>>
> <mailto:vsr...@gmail.com>> ने लिखा:

V S Rawat

unread,
Dec 12, 2013, 12:39:04 AM12/12/13
to technic...@googlegroups.com
जी हाँ, सही कह रहे हैं।

फ़ोनेटिक लेआउट को भी याद तो करना ही पड़ता है। अग्रेज़ी के 26 वर्णों पर जब हिन्दी के
50-55 वर्णों को मैप किया जाएगा तो वन टू वन मैपिंग हो ही नहीं पाएगी यह व्यवहारिक
सीमा है। और अंग्रेजी के एक ही वर्ण के समान हिन्दी के कई वर्ण हैं इसलिए एक ही की पर
उन्हें न रख कर अलग अलग असंबंधित कीज़ पर रखना पड़ता है। जैसे हलन्त के लिए अंग्रेजी का
कोई वर्ण नहीं है, इसलिए उसे किसी अन्य असंबंधित की पर ही मैप करना पड़ेगा।

इन "अंतर" वाली कीज़ को बिल्कुल याद रखना पड़ेगा।

लेकिन जैसा आपने माना, फ़ोनेटिक में अधिकांश हिन्दी वर्ण संबंधित अंग्रेजी कीज़ पर मैप होते हैं
इसलिए यह इन्ट्यूटिव हो जाता है कि क टाइप करना है तो k आज़माओ। इसलिए फ़ोनेटिक पर
प्रारंभ करना बहुत सरल होता है।

रावत
> <mailto:anu...@gmail.com>> ने लिखा:
> <mailto:vsr...@gmail.com>> ने लिखा:

V S Rawat

unread,
Dec 12, 2013, 12:46:18 AM12/12/13
to technic...@googlegroups.com
फ़ोनेटिक का मानक नहीं है तो फ़ोनेटिक का मानक बनाना पड़ेगा।

फ़ोनेटिक का मानक बनाने का समय आ गया है। लेकिन मानक नहीं है तो यह तो नहीं कहा जा
सकता कि मतजलन या रैमिंगटन या इनस्क्रिप्ट का ही इस्तेमाल करो। वो मानक भी तो कभी
बनाए गए थे।

जब यूनीकोड नहीं था, तो यूनीकोड बनाया गया। यह तो नहीं कह दिया गया कि लिपियों
का कोई मानक नहीं है इसलिए अंग्रेजी से ही काम चलाओ।

अगर मुझे कहीं टाइपिंग परीक्षा के लिए बुलाया जाएगा तो मैं तो अपना शुशा फ़ोनेटिक लेआउट
पेनड्राइव में लेकर जाउँगा उसे इन्स्टॉल करवाऊँगा और उसी पर टाइप करूँगा, वरना मैं परीक्षा
दूँगा ही नहीं।

करता भी यही हूँ, यदि किसी साइबर में जाकर हिन्दी में काम करना होता है (पीसी, नेट
लैंडलाइन न चलने के ज़माने में, अब तो डॉन्ग़ल में सालों से यह समस्या नहीं आई), तो मैं अपना
शुशा फ़ोनेटिक लेआउट पेनड्राइव में लेकर जाता था, उसे इन्स्टॉल करता या करवाता था, और
उसी पर टाइप करता था, जो साइबर वाला इन्स्टॉल करने से मना कर देता था, वहाँ से मैं
दूसरे साइबर चला जाता था।

रावत

On 12/12/2013 10:12 AM, Hariraam wrote:
> अनुभव जी,
> आप तर्क बहुत अच्छे व व्यापक पेश करते हैं। इस विषय पर बहस बहुत हो चुकी है। अंतिम निर्णय
> पर पहुँचना चाहिए। कृपया अनुनाद जी के पिछले संदेश में किए गए निम्न प्रश्न का उत्तर दें।
> अन्य सभी माननीय सदस्यों से भी इस प्रश्न का उत्तर देने का निवेदन है।
> हरिराम
>
>
> 2013/12/11 Anunad Singh <anu...@gmail.com <mailto:anu...@gmail.com>>

Hariraam

unread,
Dec 12, 2013, 1:53:26 AM12/12/13
to technic...@googlegroups.com
रावत जी एवं अनुभव जी,
2013/12/12 V S Rawat <vsr...@gmail.com>

फ़ोनेटिक का मानक नहीं है तो फ़ोनेटिक का मानक बनाना पड़ेगा।

फ़ोनेटिक का मानक बनाने का समय आ गया है।

भारत सरकार द्वारा लेटिन (रोमन) लिपि के माध्यम से हिन्दी आदि की लिपियों में इनपुट प्रणाली (तथाकथित फोनेटिक) कीबोर्ड के मानक विकसित करने के प्रयास किए जा चुके हैं। ड्राफ्ट जारी किए गए थे... देखें...
 
 
तथा
 
 
लेकिन अभी तक मानकीकरण संभव नहीं हो सका ...
 
आप इस बारे में रुचि रखते हैं, कृपया अपना सक्रिय सहयोग दें...
 
-- हरिराम 
 

Anubhav Chattoraj

unread,
Dec 12, 2013, 1:58:46 AM12/12/13
to technic...@googlegroups.com

सच्चाई यह है कि कोई मानक फोनेटिक मैपिंग योजना है ही नहीं। एक प्रोग्राम ‘राम’ के लिए ram टाइप करने को कहेगा, दूसरा raam , तीसरा rAm, चौथा raama आदि। अन्य मात्राओं और अक्षरों में भी भांति-भांति की विभिन्नता है।

जबकि हम लोग फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउट को फ़ोनेटिक कह रहे हैं, जैसे कि मेरा ख़ुद का शुशा कीबोर्ड है। इन लेआउटों में यूनीकोड के एक वर्ण की कीबोर्ड की किसी एक की पर मैपिंग होती है जो माइक्रोसॉफ़्ट कीबोर्ड लेआउट क्रिएटर से बनाई गई है। इसलिए राम के लिए ram या raam या rama लिखने का सवाल ही नहीं है। राम के लिए र ा म लिखना पड़ता है अर्थात r a m कीज़ दबानी पड़ती हैं।

फ़ोनेटिक कीबोर्ड लेआउट में k से क आता है, a से ा आता है A से अ आता है, यह फ़ोनेटिक होता है।

लगता है सब लोग यहाँ “फ़ोनेटिक” का अलग-अलग मतलब निकाल रहे हैं, इसलिए मेरा “फ़ोनेटिक” से क्या आशय है, स्पष्ट करना चाहता हूँ।

मेरे मत में “फ़ोनेटिक” लेआउटों के दों महत्त्वपूर्ण गुण हैं:

  1. यथासंभव हर देवनागरी अक्षर मिलते-जुलते अंग्रेज़ी अक्षर वाली कुंजी पर रखा गया हो। (“यथासंभव” कह रहा हूँ क्योंकि ये शर्त कभी १००% रूप में पूरी नहीं की जा सकती।)
  2. दबाई गई कुंजियों और स्क्रीन पर आने वाले अक्षरों में सरल और नियमित संबंध हो।

गूगल ट्रांसलिटरेशन और इसकी जैसी विधियों में ये दूसरा गुण नहीं है। कीबोर्ड पर कोई कुंजियाँ दबाने के बाद प्रयोक्ता बिना स्क्रीन देखे निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि कौन-सा शब्द टंकित हुआ है। टंकित शब्द को “सजेशन” से बदल भी सकता है। इसलिए ऐसे सिस्टमों पर टाइप करना ट्रायल ऐंड एरर का मामला है। लगता है रविजी और हरिरामजी ऐसे सिस्टमों के बारे में ही शिकायत कर रहे हैं।

शुशा जैसे जिन सिस्टमों का वर्णन रावत जी ने किया है, उनमें फ़ोनेटिक के दोनों गुण हैं।

अनुनाद जी जिन सिस्टमों की बात कर रहे हैं, उन्हें भी मैं “फ़ोनेटिक” की श्रेणी में ही रखता हूँ। अगर किसी सिस्टम में सिर्फ़ “m” टाइप करने से हमेशा “म्” मिले, सिर्फ़ “ma” टाइप करने से “म”, और “maa” टाइप करने से “मा”, तो उस सिस्टम में भी इनपुट और आउटपुट के बीच नियमित संबंध है, और इस संबंध को आसानी से समझा जा सकता है। अतः ये भी फ़ोनेटिक ही है। (ITRANS ऐसे सिस्टम का एक उदाहरण है।)

ऐसे सिस्टमों में एक अक्षर लाने के लिए शायद दो-तीन कुंजियाँ दबानी पड़े, लेकिन महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इन कुंजियों को दबाकर क्या आउटपुट मिलेगा, ये निश्चित रूप से कहा जा सकता है। अतः टाइपिंग में ट्रायल ऐंड एरर की कोई गुंजाइश ही नहीं है।

(लेकिन हाँ, इन्हें सीखना तो ज़रूर पड़ता है।)

खैर, इस चर्चा से लगता है कि गूगल ट्रांसलिटरेट जैसे सिस्टमों के लिए भी “फ़ोनेटिक” नाम प्रचलित है। गलतफ़हमियाँ अवॉइड करने के लिए शायद शुशा और ITRANS जैसे सिस्टमों को किसी और नाम से बुलाना उचित होगा।

Anunad Singh

unread,
Dec 12, 2013, 8:12:56 AM12/12/13
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
अनुभव जी,
आपने दूसरा वाला गुण 'फोनेटिक' के ऊपर थोप दिया है और शायद गूगल ट्रांसलिटरेशन को अ-फोनेटिक सिद्ध करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। ऐसे में 'फोनेटिक' का भाव ही आपने बहुत नीचे गिरा दिया।

मेरा खयाल है कि यदि 'सजेस्सन' को नजरअंदाज किया जाय तो वहाँ भी टाइप की गयी कुंजी और स्क्रीन पर प्रकट वर्ण/मात्रा में एकैकी सम्बन्ध ही होता है। इसके अलावा, ऐसा प्रोग्राम लिखा जा सकता है जिसमें टाइप इंस्क्रिप्ट के अनुसार किया जाय किन्तु वह 'सजेस्सन' भी दे। तो क्या 'सजेस्सन' का गुण आ जाने के कारण यह 'इन्स्क्रिप्ट' नहीं रहा?

-- अनुनाद

रवि-रतलामी

unread,
Dec 13, 2013, 12:31:13 AM12/13/13
to technic...@googlegroups.com
कृपया मेरे कथन को संदर्भानुसार लिया जाए, संदर्भ से हटकर नहीं. मैंने शौकिया शब्द उन नए-सीखने वालों के लिए कहा है जो हिंदी में यदा कदा टाइप करना चाहते हैं, न कि प्रोफ़ेशनल कैरियर जैसा कुछ करना चाहते हैं - मैं उस पूरे वाक्य को फिर से दोहराता हूं -

"सार यह, कि यदि हिंदी टाइपिंग नया नया सीख रहे हों और इसमें तेज गति से अधिक मात्रा में टाइप करने की महारत (टच टाइपिंग) हासिल करनी है तो डिफ़ॉल्ट हिंदी कुंजीपट इनस्क्रिप्ट.ही सीखें. शौकिया टाइप करने वालों के लिए तो खैर, सौ विकल्प हैं और हजार तर्क!"

बताता चलूं कि, मेरी पत्नी रेमिंगटन प्रयोग करती हैं (तमाम परेशानियों के बावजूद, क्योंकि उसमें उनकी टाइपिंग स्पीड अधिक है) और मेरा पुत्र फ़ोनेटिक लिप्यंतरण (क्योंकि उसे यदा कदा ही टाइप करना होता है, परंतु इसमें उसे महारत हासिल है, और उसका काम बढ़िया चलता है).

तो मेरा यह कथन गैर-जिम्मेदाराना कैसे हो गया? मैंने सोच समझ कर कहा है, और मैं अपनी राय पर कायम हूं कि जिन्हें शौकिया तौर पर हिंदी टाइपिंग करनी है, वो भले फ़ोनेटिक अपनाएं, अन्यथा गंभीरता से इनस्क्रिप्ट सीखें!


सादर,
रवि

बृहस्पतिवार, 12 दिसम्बर 2013 11:04:26 am UTC+5:30 को, Rawat ने लिखा:

V S Rawat

unread,
Dec 13, 2013, 2:08:32 AM12/13/13
to technic...@googlegroups.com
आप जो भी करते हों, आपका परिवार जो भी करता हो, वो सब आपको मुबारक़।

हम जो भी करते हों, हमारा परिवार जो भी करता हो, वो सब हमको मुबारक़।

आपने जो लिखा उसमें आप अपनी पीठ थपाथपा रहे थे, ख़ुद को महान समझ रहे थे, बाकियों को
हीन-तुच्छ बता रहे थे, यही स्पष्ट हो रहा था।

अब विनम्रता से कह दिया, फिर भी आप अपने कथन पर डटे हुए हैं, सफाई दे रहे हैं, नेताओं की
तरह कह रहे हैं कि आपके कथन को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया...

आपके कथन को ग़ैर-ज़िम्मेदाराना किसी ने नहीं कहा था, हरिराम जी ने तो उल्टा यह कहा
था कि "फोनेटिक या अन्य किसी कुंजीपटल का उपयोग करनेवालों के लिए "शौकिया",
"गैर-जम्मेदार" जैसे शब्द कोई नहीं कहता।" जो कि आपने कहा था "शौक़िया" शब्द।

आपका यह सुझाव या आदेश या डाँट "अन्यथा गंभीरता से इनस्क्रिप्ट सीखें!" व्यर्थ की है। नहीं
सीखना हमें इनस्क्रिप्ट, चाहे कोई हमें गंभीर कामकाजी माने या ना माने।

ख़ैर, सारांश यह है कि मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ। फ़ोनेटिक सबसे अच्छा होता है।
इनस्क्रिप्ट बहुत कठिन है। जो रूढ़िवादी लोग दशकों पहले के किसी वक़्त, बाकी विकल्प न
होने के कारण इनस्क्रिप्ट सीख चुके थे वही आज भी बेहतर विकल्पों के बावजूद इनस्क्रिप्ट पर
आदतन डटे हुए हैं, बेहतर चीज़ें नहीं सीखना चाहते हैं।

नए आधुनिक सीखने वालों को फ़ोनेटिक ही इस्तेमाल करना चाहिए।

धन्यवाद।
--
रावत

> > 2013/12/11 Anunad Singh <anu...@gmail.com <javascript:>
> <mailto:anu...@gmail.com <javascript:>>>
> <javascript:>
> > <mailto:vsr...@gmail.com <javascript:>>> ने लिखा:

Hariraam

unread,
Dec 13, 2013, 5:24:06 AM12/13/13
to technic...@googlegroups.com
निवेदन है कि व्यक्तिगत रुचि / सुविधा / अभ्यास को महत्व न देकर व्यापक रूप में लाखों / करोड़ों लोगों को भारतीय लिपियों में गलतीरहित तीव्रगति से टंकण सिखाने के लिए उपलब्ध साधनों में बेहतर व मानक प्रणाली की मान्यता को महत्व दिया जाए।
हरिराम

रवि-रतलामी

unread,
Dec 14, 2013, 12:48:16 AM12/14/13
to technic...@googlegroups.com
मैंने अपने परिवार का तो मात्र उदाहरण दिया था कि जिसे जिस कुंजीपट में महारत हासिल है वो उसका प्रयोग करता रहे, ऐसे में कुंजीपट बदलना या बदलने के लिए कहना तो मूर्खता ही होगी.

रहा सवाल नए सीखने वालों के लिए तो इस चर्चा कड़ी से यह पूरी तरह से सिद्ध हो चुका है कि टचटाइपिंग जैसी अच्छी गति प्राप्त करने, न्यूनतम प्रयास में शीघ्रता से टाइप करने, व हर प्लेटफ़ॉ्र्म पर उपलब्ध, तथा हिंदी वर्णमाल क्रम में व्यवस्थित होने के कारण सरल, डिफ़ॉल्ट इनस्क्रिप्ट कुंजीपट से बेहतर कोई नहीं. इसीलिए नए सीखने वालों को इसे ही प्रयोग करना चाहिए. इसलिए नहीं कि यह मेरी व्यक्तिगत पसंद है!


इस समूह को लक्ष्य कर प्रेषित संदेशो को जिस तरह से व्यक्तिगत रूप से लिया जाता है और जिस भाषा-शैली में जवाब दिया जाता है, तो लगता है कि अब इससे एक न्यूनतम दूरी बना लेनी चाहिए :)

सादर,
रवि

शुक्रवार, 13 दिसम्बर 2013 12:38:32 pm UTC+5:30 को, Rawat ने लिखा:

Hariraam

unread,
Dec 14, 2013, 4:37:27 AM12/14/13
to technic...@googlegroups.com
इनस्क्रिप्ट की बोर्ड भारत के अनेक लिपियों के अनेक तकनीकी विद्वानों द्वारा अनेक
बैठकों/विचार-विमर्श के बाद भारत सरकार के भारतीय मानक संगठन द्वारा 1991 में
मानकीकृत किया गया था। यह सभी कम्प्यूटर प्रणालियों में इनबिल्ट रूप से उपलब्ध रहता है।
यह व्यक्तिगत नहीं है।

भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे सॉफ्टवेयरों में इनस्क्रिप्ट, फोनेटिक व रेमिंगटन
तीनों का ही विकल्प मौजूद रहता है।

लेकिन रावत जी जिस की-बोर्ड (फोनेटिक) पर अभ्यस्त हैं, जैसा पिछले संदेश में उन्होंने स्वयं
कहा कि यह उनके द्वारा स्वयं विकिसत किया गया है। हू-ब-हू उसी की-बोर्ड का प्रयोग
कितने लोग करते हैं? क्या सार्वजनिक रूप से यह सबके उपयोग के लिए उपलब्ध है? अतः उसे
व्यक्तिगत ही माना जाएगा।

रावत जी जैसे बुजुर्ग होने के नाते माननीय सदस्य को अपनी भाषा-शैली पर ध्यान/नियंत्रण
रखना चाहिए कि किसी को कोई व्यक्तिगत आघात महसूस न हो।


On 14-12-2013 11:18, रवि-रतलामी wrote:
> ....इस चर्चा कड़ी से यह पूरी तरह से सिद्ध हो चुका है कि टचटाइपिंग जैसी अच्छी गति

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Dec 16, 2013, 6:34:15 AM12/16/13
to technical-hindi
अगर मुझे कहीं टाइपिंग परीक्षा के लिए बुलाया जाएगा तो मैं तो अपना शुशा फ़ोनेटिक लेआउट पेनड्राइव में लेकर जाउँगा उसे इन्स्टॉल करवाऊँगा और उसी पर टाइप करूँगा, वरना मैं परीक्षा दूँगा ही नहीं।

जहाँ परीक्षा हो रही हो यदि उन कम्प्यूटरों पर लिनक्स या ओऍस ऍक्स हुआ तो क्या करेंगे? MSKLC से बनाया इंस्टालर उन पर नहीं चलेगा। बताने की जरूरत नहीं कि इन्स्क्रिप्ट इन सब में इनबिल्ट होता है।


12 दिसंबर 2013 को 11:16 am को, V S Rawat <vsr...@gmail.com> ने लिखा:
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ePandit | ई-पण्डित

unread,
Dec 16, 2013, 6:59:22 AM12/16/13
to technical-hindi
इनस्क्रिप्ट बहुत कठिन है। जो रूढ़िवादी लोग दशकों पहले के किसी वक़्त, बाकी विकल्प न होने के कारण इनस्क्रिप्ट सीख चुके थे वही आज भी बेहतर विकल्पों के बावजूद इनस्क्रिप्ट पर आदतन डटे हुए हैं, बेहतर चीज़ें नहीं सीखना चाहते हैं।

मुझ रुढ़िवादी ने दशकों पहले नहीं केवल चार-पाँच साल पहले ही इन्स्क्रिप्ट सीखा था। :)

अंग्रेजी की टाइपिंग में अच्छी गति होने से मेरी फोनेटिक पर भी बहुत अच्छी गति थी। मैं बरह आइऍमई प्रयोग करता था जो कि उस समय का ही नहीं अब का भी सर्वाधिक उन्नत फोनेटिक टंकण औजार है। इसमें लगभग हर यूनिकोडित देवनागरी वर्ण शामिल है। साथ ही गूगल आइऍमई की तरह तुक्के वाला काम न होकर (जैसा अनुभव जी ने कहा) पहले से पता होता था कि क्या टाइप होगा। अंग्रेजी की टाइपिंग जानने से मैं इसके साथ बिना कीबोर्ड देखे भी टाइप कर लेता था। जीवन लगभग ठीक चल रहा था पर मन में कहीं न कहीं फोनेटिक की कमियाँ अटकती थी। इन्स्क्रिप्ट प्रयोक्ताओं से उसकी तारीफ सुनी थी तो सोचता सीख लिया जाय पर 
संशय में था फोनेटिक पर ही रहूँ या इसे सीखूँ।

http://epandit.shrish.in/167/some-questions-about-inscript/

अन्ततः मैंने निर्णय लिया कि सीख कर ही असलियत पता लगेगी, यदि ठीक न निकला तो फोनेटिक तो है ही। शुरु में फोनेटिक की आदत होने से थोड़ा अटपटा लगा पर जल्द ही सीख लिया। एक बार सीख लेने के बाद अपने निर्णय पर सन्तोष हुआ।

फिर कहूँगा सही तुलना वही कर सकता है जिसने फोनेटिक और इन्स्क्रिप्ट दोनों में नियमित काम किया हो, केवल ट्राइ करने से नहीं। यदि इन्स्क्रिप्ट वाकयी इतना खराब होता तो मैं फोनेटिक छोड़कर उसे क्यों अपनाता। इन्स्क्रिप्ट पर टिके रहने या इसकी सलाह देने के लिये मुझे सरकार से कोई अनुदान तो मिलता नहीं। :)



13 दिसंबर 2013 को 12:38 pm को, V S Rawat <vsr...@gmail.com> ने लिखा:
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PK

unread,
Dec 16, 2013, 10:07:22 PM12/16/13
to technic...@googlegroups.com
would you "learn" such a layout to be able to authoritatively give an opinion ?

--
Use own language . . its easy .. www.SimpleKeyboard.in

On 17-Dec-2013, at 8:36 am, PK <pksharm...@gmail.com> wrote:

we have this expert who has the ability to touch type on both phonetic and inscript layouts .. i have a question .. does the very frequent need for shift-key for typing the aspirated consonants and the vowels  irritating ? would a method be preferred in which shift-key would NOT be needed for typing 50% of the data ? 

--
Use own language . . its easy .. www.SimpleKeyboard.in

On 16-Dec-2013, at 5:29 pm, ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com> wrote:


अंग्रेजी की टाइपिंग में अच्छी गति होने से मेरी फोनेटिक पर भी बहुत अच्छी गति थी। .....अंग्रेजी की टाइपिंग जानने से मैं इसके साथ बिना कीबोर्ड देखे भी टाइप कर लेता था। 

Anunad Singh

unread,
Dec 16, 2013, 11:28:53 PM12/16/13
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
पीके शर्मा जी,
कृपया 'विज्ञापन' शैली में एक बहुअर्थी वाक्य लिखने के बजाय अपनी बात को तर्क सहित लिखिए कि आप क्या कहना चाहते हैं, किस कथन से सहमत/असहमत हैं, इसके बारे में आपके पास तथ्य क्या हैं?

-- अनुनाद

mukesh harsh

unread,
Feb 3, 2014, 12:09:23 AM2/3/14
to technic...@googlegroups.com
यदि‍ नया व्‍यक्‍ि‍त सुझाव मांगे तो मानक ही प्रयोग में लेने की राय देनी चाहि‍ये मैने भी 1995 से कम्‍प्‍यूटर पर हि‍न्‍दी में टंकण सीखा है वि‍भि‍न्‍न कीबोर्ड लेआउट पर कार्य कि‍या है परंतु अब मैं भी अनुनाद जी एवं श्रीश जी से पूर्णतया सहमत हूं और मैने भी मानक कीबोर्ड पर अभ्‍यास करना प्रारंभ कर दि‍या है यह हमारा दायि‍त्‍व है कि‍ हम भारत के लोग सभी लि‍पि‍यों के लि‍ये इनस्‍ि‍क्रप्‍ट  मानक कीबोर्ड  का प्रयोग में लेकर इसका सम्‍मान करें यही भारत का सम्‍मान होगा हमें भारत के मानक कीबोर्ड को ही बढावा देना चाहि‍ये,हम नि‍ज भाषा के लि‍ये कब तक इस्‍की को पकडे रहेंगे नि‍जी सुवि‍धा एवं अनुभव हमारे नि‍जी व सतत अभ्‍यास से बना है, यह अनुभव प्रति‍ व्‍यक्‍ि‍त अलग अलग हो सकता है, आवश्‍यकता मानकीकरण के प्रयासों व उन कि‍ये जा रहे प्रयासों में हमारी भागीदारी की है, यदि‍ कोई कमी समझ में आती है तो उसे उजागर उसे दुरूस्‍त करवाने व नवीन सुवि‍धाओं  हेतु सुझाव दि‍ये जाने की है, हम नि‍जी अनुभव को मानकीकरण पर तरजीह दे रहे है जो सर्वथा अनुचि‍त है, अनुभव जी ने कमि‍यां बताई परंतु इसके समाधान को सुझाने के स्‍थान पर वे मानक कीबोर्ड को ही व्‍यर्थ ठहरा रहे है, रावत जी अनुभव के खजाने को लेकर बैठे है और धीरे धीरे यह प्रसंग व्‍यापक होने के स्‍थान पर नि‍जी एवं पारि‍वारि‍क स्‍तर पर जाने लगा है, यह ठीक नहीं है, कल वसंत पंचमी है यह समय है कि‍ हम कल की तैयारि‍यां करें हम सब शारदासुत/सुता मां शारदा का ध्‍यान व वंदन करें
मुकेश हर्ष


2013-12-17 Anunad Singh <anu...@gmail.com>:
पीके शर्मा जी,
कृपया 'विज्ञापन' शैली में एक बहुअर्थी वाक्य लिखने के बजाय अपनी बात को तर्क सहित लिखिए कि आप क्या कहना चाहते हैं, किस कथन से सहमत/असहमत हैं, इसके बारे में आपके पास तथ्य क्या हैं?

-- अनुनाद

--
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--


Mukesh Harsh
For
Indira Creations
Near Bhairuji Temple Street,Mohta Chowk
Bikaner, Rajasthan
mob. 9351204606
mukeshhrs.blogspot.com

V S Rawat

unread,
Feb 3, 2014, 3:28:30 AM2/3/14
to technic...@googlegroups.com
आप मानक को इसलिए आगे बढ़ा रहे हैं क्योंकि आप ख़ुद मानक का इस्तेमाल कर रहे हैं।

और अब आप फतवा जारी कर रहे हैं कि बाकी सबको क्या करना चाहिए। कह रहे हैं कि सब
वही करें जो आप चाहते हैं।

दूसरों का मखौल उड़ा रहे हैं, दूसरों के सुझाव को अनुचित बता रहे हैं।

व्यर्थ का मेल है आपका। आपके अहंकार और जड़बुद्धि का द्योतक है बस।

मैं आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता।

धन्यवाद
--
रावत

On 2/3/2014 10:39 AM, mukesh harsh wrote:
> यदि‍ नया व्‍यक्‍ि‍त सुझाव मांगे तो मानक ही प्रयोग में लेने की राय देनी चाहि‍ये मैने भी
> 1995 से कम्‍प्‍यूटर पर हि‍न्‍दी में टंकण सीखा है वि‍भि‍न्‍न कीबोर्ड लेआउट पर कार्य
> कि‍या है परंतु अब मैं भी अनुनाद जी एवं श्रीश जी से पूर्णतया सहमत हूं और मैने भी मानक
> कीबोर्ड पर अभ्‍यास करना प्रारंभ कर दि‍या है यह हमारा दायि‍त्‍व है कि‍ हम भारत के
> लोग सभी लि‍पि‍यों के लि‍ये इनस्‍ि‍क्रप्‍ट मानक कीबोर्ड का प्रयोग में लेकर इसका
> सम्‍मान करें यही भारत का सम्‍मान होगा हमें भारत के मानक कीबोर्ड को ही बढावा देना
> चाहि‍ये,हम नि‍ज भाषा के लि‍ये कब तक इस्‍की को पकडे रहेंगे नि‍जी सुवि‍धा एवं अनुभव
> हमारे नि‍जी व सतत अभ्‍यास से बना है, यह अनुभव प्रति‍ व्‍यक्‍ि‍त अलग अलग हो सकता
> है, आवश्‍यकता मानकीकरण के प्रयासों व उन कि‍ये जा रहे प्रयासों में हमारी भागीदारी की
> है, यदि‍ कोई कमी समझ में आती है तो उसे उजागर उसे दुरूस्‍त करवाने व नवीन सुवि‍धाओं
> हेतु सुझाव दि‍ये जाने की है, हम नि‍जी अनुभव को मानकीकरण पर तरजीह दे रहे है जो
> सर्वथा अनुचि‍त है, अनुभव जी ने कमि‍यां बताई परंतु इसके समाधान को सुझाने के स्‍थान पर
> वे मानक कीबोर्ड को ही व्‍यर्थ ठहरा रहे है, रावत जी अनुभव के खजाने को लेकर बैठे है और
> धीरे धीरे यह प्रसंग व्‍यापक होने के स्‍थान पर नि‍जी एवं पारि‍वारि‍क स्‍तर पर जाने
> लगा है, यह ठीक नहीं है, कल वसंत पंचमी है यह समय है कि‍ हम कल की तैयारि‍यां करें हम
> सब शारदासुत/सुता मां शारदा का ध्‍यान व वंदन करें
> मुकेश हर्ष
>
>
> 2013-12-17 Anunad Singh <anu...@gmail.com <mailto:anu...@gmail.com>>:
>
> पीके शर्मा जी,
> कृपया 'विज्ञापन' शैली में एक बहुअर्थी वाक्य लिखने के बजाय अपनी बात को तर्क सहित
> लिखिए कि आप क्या कहना चाहते हैं, किस कथन से सहमत/असहमत हैं, इसके बारे में आपके
> पास तथ्य क्या हैं?
>
> -- अनुनाद
>
> --
> आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "Scientific and
> Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)" समूह की सदस्यता ली है.
> इस समूह से अनसब्सक्राइब करने के लिए और इससे ईमेल प्राप्त करना बंद करने के लिए,
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> अधिक विकल्‍पों के लिए, https://groups.google.com/groups/opt_out पर जाएं.
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>

सोनू

unread,
Feb 14, 2014, 12:53:49 AM2/14/14
to technic...@googlegroups.com

मेरा सुझाव है कि इनस्क्रिप्ट जैसे जटिल कीबोर्डों से बँध जाना आज के युग में बुद्धिमानी नहीं
है जिनमें कीज़ से आने वाले हिन्दी वर्ण का उस की के अंग्रेज़ी अक्षर से कोई संबंध नहीं होता
है।

अंग्रेज़ी का एक और कीबोर्ड है Dvorak जिसे इसी नाम के बंदे ने तैयार किया था। इसकी ख़ासियत थी कि इससे जल्दी टाइप किया जा सकता था, क्वैर्टी की निस्बत। ड्वोराक के डिज़ायन के पीछे ये सिद्धांत थे—
  • Letters should be typed by alternating between hands (which makes typing more rhythmic, increases speed, reduces error, and reduces fatigue). On the Dvorak, vowels are all on the left home row, the most used symbols are on the left, while the most used consonants are on the right.
  • For maximum speed and efficiency, the most common letters and digraphs should be the easiest to type. This means that they should be on the home row, which is where the fingers rest, and under the strongest fingers (Thus, about 70% of keyboard strokes on the Dvorak Simplified Keyboard are done on the home row and only 22% and 8% on the top and bottom rows respectively).
  • The least common letters should be on the bottom row which is the hardest row to reach.
  • The right hand should do more of the typing because most people are right-handed.


http://en.wikipedia.org/wiki/Dvorak_Simplified_Keyboard


V S Rawat

unread,
Feb 14, 2014, 1:45:23 AM2/14/14
to technic...@googlegroups.com
मुझे भी ऐसा ही लगता है। इनस्क्रिप्ट के बिना भी मेरा जीवन बहुत बढ़िया चल रहा है।
इसलिए यह कोई अत्यावश्यक अनिवार्य चीज़ नहीं है जैसा कि कुछ लोग इसे प्रस्तुत कर रहे हैं।

मूल रूप से इनस्क्रिप्ट का इस्तेमाल करने वाले ही इसकी तारीफ़ें कर रहे हैं। उन्होंने अन्य
आधुनिक तक़नीकों को आज़माया नहीं है।

धन्यवाद।
रावत

सोनू

unread,
Feb 14, 2014, 12:13:10 PM2/14/14
to technic...@googlegroups.com
कोई अंधा भी देख सकता है कि इंस्क्रिप्ट में ड्वारोक के उस सिद्धांत नंबर एक का इस्तेमाल किया गया है, जबकि रैमिंग्टन और रोमन-आधारित कीबोर्ड लेआउटों में ये गुण नहीं है।

शुक्रवार, 14 फरवरी 2014 12:15:23 pm UTC+5:30 को, Rawat ने लिखा:

V S Rawat

unread,
Feb 14, 2014, 12:25:07 PM2/14/14
to technic...@googlegroups.com
On 2/14/2014 10:43 PM, सोनू wrote:
> कोई अंधा भी देख सकता है

अंधों की आप बेहतर जानते होंगे।
मैं आँख वाला हूँ, मुझे इंस्क्रिप्ट की ज़रूरत नहीं।

मैं ड्वारोक नहीं, क्वर्टी ही इस्तेमाल करता हूँ। और मुझे लगता है कि ज़्यादातर इनस्क्रिप्ट
इस्तेमाल करने वाले भी ड्वारोक नहीं, क्वर्टी ही इस्तेमाल करते होंगे।

--
रावत
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