गोरक्षा और शाकाहार
चुनावी तैयारियो में जोर-शोर से जुटे राजनीतिक दल जहाँ पूरी जी जान से
लोकलुभावन मुद्दे तलाश रहे है, वहीं कई सामाजिक संगठन व समाज सेवा के
कार्यों से जुड़े समाजिक कार्यकर्ता चाहते है कि इस बार नेताओं को
भावनात्मक मुद्दों के बजाय ऐसे ठोस मुद्दे उठाने चाहिये,जिनसे सही मायनों
में देश या समाज का कल्याण हो. हैदराबाद में जीव रक्षा,गो रक्षा,अहिंसा
व शाकाहार के प्रचार-प्रसार से जुड़े कई स्वयंसेवी संगठन इस बात के लिए
पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि इस बार के चुनाव में राजनीतिक दल गोरक्षा के
मुद्दे पर खुल कर अपनी नीति स्पष्ट करें.ये संगठन चाहते हैं कि देश में
गोवध पर पूर्ण रुप से पाबंदी लगनी चाहिये.ये संगठन इस बात से काफी निराश
हैं कि देश के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल ने लगभग हर चुनाव में गोवध पर
पूरी तरह से पाबंदी लगने का वादा किया,लेकिन केंद्र में लगभग 7 वर्ष तक
सत्ता में रहने के बावजूद उस वादे को पूरा नही किया.
जीव रक्षा,गोरक्षा व शाकाहार आंदोलन से संबंधित कई संगठनों
में महत्वपूर्ण दयित्यो का निर्वहन कर रहे महेश अग्रवाल का इस सम्बन्ध
में कहना है कि इस चुनाव में निश्चित रुप से गोवध पर पाबंदी को मुद्दा
बनाया जाना चाहिये तथा जनता को भी वोट माँगने आने वाले उम्मीदवारो से इस
संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट करने के लिए कहना चाहिये.आंध्र
प्रदेश व देश के कई अन्य राज्यों में गोरक्षा से जुड़े आंदोलनो में शिरकत
करके इस क्षेत्र में अपनी एक ख़ास पहचान बना चुके महेश अग्रवाल इस बात से
काफी व्यथित हैं कि राजनीतिक दलों में इस मुद्दे पर आम सहमति नहीं बन पा
रही है.
महेश अग्रवाल का कहना है कि भारतीय संस्कृति में गोमाता का हमेशा से ही
अहम स्थान रहा है. सनातन काल से यह देश गाय को पूजता आया है तथा ऐसे देश
में गोवध पर पूर्ण पाबंदी न होना चिंताजनक तो है ही,हास्यास्पद भी
है.अग्रवाल का कहना है कि यदि धार्मिक आधार की बात को दरकिनार भी कर दिया
जाएँ तो भी भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गाय के महत्व की अनदेखी नहीं
की जा सकती.
महेश अग्रवाल कहते हैं कि माँ तो हमें सिर्फ़ कुछ ही महीने
दूध पिलाती है,जबकि गोमाता हमें आजीवन दूध उपलब्ध करती हैं.इस तरह गाय का
दर्जा माँ से भी ऊपर है. इसलिए इस पावन देश की पवित्र भूमि पर एक भी गाय
का वध होता है तो यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है.
अग्रवाल के अनुसार आज महँगी दरों पर रासायनिक खादो को खरीदने के कारण
किसानों पर जहाँ एक ओर आर्थिक बोझ पड़ रहा है,वही जमीन की उर्वरा शक्ति
पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. रासायनिक खादो से उत्पादित अनाज खाने
से लोगों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है.यदि प्राचीन काल की
तरह हर किसान के घर में गोपालन हो तथा रासायनिक खादो की जगह गाय के गोबर
का इस्तेमाल हो तो इन समस्याओं से बचा जा सकता है. इसके अलावा गोमय व
गोमूत्र से बनने वाली औषधियों का प्रभाव जगजाहिर है.इन औषधियों के शोध को
प्रोत्साहन देकर औषधियों के निर्माण के लिए वैज्ञानिक प्रणाली विकसित की
जा सकती है.इससे देश का तो भला होगा ही,गोपालन करने वाले किसानों की माली
हालत में भी काफी सुधार आएगा.
महेश अग्रवाल चाहते हैं कि गोरक्षा के साथ- साथ शाकाहार का
प्रचार-प्रसार भी देश की राजनीति का एजेंडा बनना चाहिए. किसी प्राणी की
जान लेकर अपनी क्षुधा पूर्ति करने को सही नहीं कहा जा सकता.वे कहते है कि
इस चुनाव में वे स्वय और उनके सहयोगी उसी उम्मीदवार का समर्थन करेंगे जो
गोरक्षा व शाकाहार के प्रचार प्रसार का वादा करेगा.