प्रो. जीडी अग्रवाल आमरण अनशन के इक्कीस दिन

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Nai Azadi

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Aug 10, 2010, 12:57:57 AM8/10/10
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लोहारी नागपाल परियोजना बंद कराने को बाबा रामदेव का धरना

Source: 
जनसत्ता, 10 अगस्त, 2010
Author: 
सुनील दत्त पांडेय
हरिद्वार, 9 अगस्त। आज अगस्त क्रांति दिवस के रोज योग गुरु बाबा रामदेव ने सड़कों पर जाम लगाया। शंकराचार्य चौक पर धरना दिया। केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर जहर उगला। रामदेव ने उत्तरकाशी-गंगोत्री के बीच बन रही लोहारी नागपाला जल बिजली परियोजना को तुरंत बंद करने की मांग की। साथ ही गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की बजाय गंगा को राष्ट्रीय धरोहर व विश्व धरोहर घोषित करने की मांग केंद्र सरकार से की और गंगा की धारा अविरल व निर्मल बहते रहने की मांग की।

सोमवार को बाबा रामदेव ने अगस्त क्रांति की सालगिरह के रोज शंकराचार्य चौक में मजमा लगाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार खास तौर से प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने संतों के साथ धोखा किया है। वायदा खिलाफी की है। साधु संतों से प्रधानमंत्री ने वायदा किया था कि गंगा की धारा को अविरल बहने दिया जाएगा। परंतु प्रधानमंत्री ने लोहारी नागपाला परियोजना को मंजूरी देकर गंगा की अविरल धारा को बाधित करने का काम किया।

ऐतिहासिक रूप से विख्यात मगध प्रमण्डल (पूर्व में गया जिला) बिहार का दक्षिणी भाग है। मगध प्रमण्डल में चार जिले गया, औरंगाबाद, जहानाबाद तथा नवादा हैं। मगध क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक गौरव और इसके अविछिन्न इतिहास का आधार इस इलाके की अद्भुत सिंचाई व्यवस्था रही है। फल्गु , दरधा, सकरी, किउल, पुनपुन और सोन मगध क्षेत्र की मुख्य नदियाँ हैं। दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहमान ये नदियाँ गंगा में मिलती हैं। ‘बराबर पहाड़’ के बाद फल्गु कई शाखाओं में बँट कर बाढ़ - मोकामा के टाल में समा जाती है। बौद्धकाल से ही मगध वासियों ने सामुदायिक श्रम से फल्गु, पुनपुन आदि इन नदियों से सैंकडों छोटी-छोटी शाखायें निकालीं, जिससे बरसात में पानी कोसों दूर खेतों तक पंहुचाया जा सके।

पानी-पर्यावरण के देशी वैज्ञानिक

Author: 
 प्रमोद भार्गव
पानी की साइकिलपानी की साइकिलभारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। लेकिन सरकारी उदासीनता और ज्ञान के संस्थानीकरण की वजह से तमाम खोजकर्ता और हुनरमंद गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं। ऐसे ही कुछ देशी वैज्ञानिकों की खोज और सरकारी रवैए की पड़ताल कर रहे हैं प्रमोद भार्गव।

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। लेकिन स्कूली तालीम और डिग्री को ही ज्ञान का आधार मानने की वजह से तमाम शिल्पकारों, हुनरमंदों और किसानों को अज्ञानी और अकुशल मान लिया गया है। यही वजह है कि देशी तकनीक और स्थानीय संसाधनों से तैयार उन आविष्कारों और आविष्कारकों को नकार दिया जाता है जो ऊर्जा, सिंचाई, मनोरंजन और खेती की वैकल्पिक प्रणाली को बचाने वाले होते हैं। जबकि जलवायु संकट से निपटने और धरती को प्रदूषण से छुटकारा दिलाने के उपाय इन्हीं देशी तकनीकों से ही संभव है। 

आजादी के पहले प्रतिकूल परिस्थितियां होने के बावजूद रामानुजम, जगदीशचंद्र बोस, चंद्रशेखर वेंकट रमन, मेघनाद साहा और सत्येंद्रनाथ बोस, जैसे वैज्ञानिक पैदा हुए। आजादी के बाद एक भी बड़ा वैज्ञानिक देश में नहीं हुआ, जबकि इस बीच भारतीय संस्थान संसाधन, तकनीक के स्तर पर समृद्ध हुए हैं। जाहिर है कि ज्ञान-पद्धति में गहरा खोट है। 

दुनिया में वैज्ञानिक और अभियंता पैदा करने के लिहाज से भारत तीसरे स्थान पर है। लेकिन विज्ञान संबंधी साहित्य सृजन में पश्चिमी लेखकों का बोलबाला है।

कुछ खास 

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सिराज केसर
TREE (ट्री), ब्लू-ग्रीन मीडिया
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मो- 9211530510
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