- वलनीः छब्बीस बरस की गवाही

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Nai Azadi

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Sep 1, 2011, 10:37:29 PM9/1/11
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वलनीः छब्बीस बरस की गवाही

वलनीः छब्बीस बरस की गवाही

 

यह कहानी है नागपुर तालुका के गांव वलनी के लोगों की। वलनी में उन्नीस एकड़ का एक तालाब है। वलनीवासी 1983 से आज तक वे अपने एक तालाब को बचाने के लिए अहिंसक आंदोलन चला रहे हैं। छब्बीस वर्ष गवाह हैं इसके। न कोई कोर्ट कचहरी, न तोड़ फोड़, न कोई नारेबाजी। तालाब की गाद-साद सब खुद ही साफ करना और तालाब को गांव-समाज को सौंपने की मांग। हर सरकारी दरवाजे पर अपनी मांगों के साथ कर्तव्य भी बखूबी निभा रहा है यह छोटा-सा गांव। योगेश अनेजा, जो अब इस गांव के सुख-दुख से जुड़ गये हैं, वे 26 वर्ष के इस लम्बे दांस्तान को बयान कर रहे हैं

हम सब कलेक्टर के पास अर्जी लेकर गए थे। उन्होंने कहा कि मैं तो यहां नया ही आया हूं। मैं देखता हूं कि मामला क्या है। अर्जी के हाशिए में कोई टिप्पणी लिखकर उसे एस.डी.ओ. की तरफ भेजते हुए कहा कि अभी तो मंत्रीजी आ रहे हैं, मैं उन्हें लेने हवाई अड्डे जा रहा हूं। आप बाद में मिलिए।
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बरास्ता गाँधी, जीवन बदलता एक पानीदार गाँव

रहिमन कह गए हैं, बिन पानी सब सून...., नागपुर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव ने पानी की महत्ता को कैसे समझा और स्वीकारा बता रहे हैं ….। इस बार वलनी के ग्राम तालाब की पार पर खड़ा हुआ तो दिल भर आया। हरे, मटमैले पानी पर हवा लहरें बनाती और इस किनारे से उस किनारे तक ले जाती। लगता दिल में भी हिलोरें उठ रही है। कहाँ था ऐसा तालाब ? जो था, वो सपनो में हीं था। सपने अगर सच हो जाएं तो दुनिया, दुनिया ना रह जाए। मगर आँखें तो सच देख रही थीं। कितने साल, मई की भरी दुपहरी में, जब भीतर तक जला देने वाली लू और देह से सारा जल निचोड़ लेने वाला सूरज धरती के सीने में भी बिबाई बो देता, तब उस सूखे तलहट में चहलकदमी करते हुए सोचा करते कि यहाँ से वहां तक, इधर से उधर तक, भर जाये पूरा तालाब पानी से। आमीन ! तथास्तु !! 
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एक माह में बन गए 120 शौचालय

बीडीओ और अन्य अफसर आए तो अचरज से भर गए। लेकिन, योगेश और केशव निर्मल ग्राम पुरस्कार लेने नहीं गए। उस सरपंच को भेजा, जो राजनीतिक रंजिश में सारे कामों में पलीता लगाए हुए था। वह लौटा तो इस टीम का फैन बन गया। वह दिन था और आज का दिन है, गाँव में कोई गुट नहीं बचा।

किसी भी गाँव की साफ-सफाई में शौचालय का होना बेहद महत्त्वपूर्ण है। अगर गाँव वाले खुले में शौच करें तो गंदगी घर, शरीर और दिमाग में कब्ज़ा कर लेती है। वलनी तो आदर्श गाँव योजना में शामिल था। लेकिन, उसकी हालत भी दूसरे गाँव की तरह थी। लोग खुले में शौच करते। हमेशा बदबू आना गाँव का अभिशाप था। लेकिन, क्या हो सकता था? सब चाहते थे कि घर में ही शौचालय हो, पर सबसे बड़ी समस्या थी पानी का अभाव। एक बार शौचालय जाने में दो बाल्टी पानी खर्च होता। गाँव का एकमात्र हैण्डपम्प सैकड़ों बार चलने पर एक बाल्टी पानी देता। ये सबके बूते के बाहर था। तालाब के काम के लिये योगेश और केशव एक दिन बीडीओ के पास गए तो उन्होंने बताया कि निर्मल ग्राम पुरस्कार मिलने वाला है। एक लाख रुपये मिलेंगे। लेकिन, यहाँ के किसी गाँव को नहीं मिल सकता क्योंकि किसी भी गाँव में 100 फीसदी शौचालय नहीं हैं। योगेश और केशव ने कहा, हमारे गाँव को मिल सकता है। बीडीओ चकित। बोले-नहीं मिल सकता, क्योंकि 98 फ़ीसदी घरों में शौचालय नहीं हैं। योगेश-केशव ने कहा-बन जाएंगे। बीडीओ ने कहा-अगर ऐसा हो जाए तो क्या बात है। मैं अपनी जेब से 5000 रुपये दूंगा। 
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हमारा फार्मूला चल गया तो सारी व्यवस्था बदल जाएगी


Author: 
सुनील सोनी

योगेश अनेजा से साक्षात्कार


योगेश अनेजा वलनी गाँव के रूपांतरण में भागीदार और साक्षी रहे हैं। वे हालाँकि खुद को उत्प्रेरक भी कहलाना पसंद नहीं करते, पर हमारी नज़र में बदलाव के मूल तत्त्व वे ही रहे हैं। अच्छा और प्रयोगशील समाज का निर्माण उनकी कल्पना है। वलनी में ऐसे समाज के पहले दौर के प्रयोग वे कर रहे हैं। गाँधी, तोलस्तोय उनकी प्रेरणा हैं। वे नागपुर में मूलतः ऑटो पार्ट्स का छोटा सा व्यवसाय करते हैं, पर समाजकर्मी उनका मुख्य काम है। 

कोई 18 साल पहले की बात है। वाणिज्य से ताज़ा-ताज़ा ग्रेजुएट एक नौजवान नागपुर शहर के महल इलाके में एक जनसभा के बाहर अपनी कार के हुड पर बैठकर उस वक्ता को एकटक घूरे जा रहा था। 50-60 के बीच का धोती-कुर्ता पहने वह वक्ता गाँधी टोपी लगाए हुए सूचना के अधिकार और भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण दे रहा था। सभा ख़त्म हुई। अगला भाषण उमरेड तहसील के किसी गाँव में था। नौजवान उनके पीछे चल पड़ा और फिर उसका भाषण सुना। उसे भाषण में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस आदमी में थी। आख़िरकार आधी रात को सभा ख़त्म होने के बाद उसने उनको पकड़ ही लिया और अपनी कार में नागपुर ले आया। लेकिन, नौजवान का उद्देश्य पूरा ही नहीं हो पाया, क्योंकि उस बुजुर्ग ने उसे कहा कि वह घर लौट जाए और सबसे पहले अपने माता-पिता की सेवा करे। उससे वक्त बच जाए तो आस-पास नज़र डाले, कई काम ऐसे हैं, जो समाज के लिये वह कर सकता है। जरूरी नहीं कि ये काम करने के लिये वह उनके गाँव ही आएं। नौजवान आसमान से सीधे धरती पर आ गिरा, पर उसका सपना टूटा नहीं। सिर्फ दिशा नई मिल गई। वे बुजुर्ग थे अन्ना हजारे; और वह नौजवान था योगेश अनेजा। 
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सिराज केसर
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