उधार की आंखों से देखना-समझना

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Nai Azadi

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Jun 27, 2010, 10:58:08 PM6/27/10
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धरती का बुखार

 

सभी को लगा कि गर्मी इस बार थोड़ा पहले आ गई है और कुछ ज्यादा ही तेजी से आई है। अखबार वाले बता रहे हैं कि कम से कम तापमान में पिछले बीस साल का रिकॉर्ड टूटा है तो चालीस साल का रिकॉर्ड ज्यादा से ज्यादा तापमान में टूटा है। इस तरह के आंकड़े हमारे सामने रोज आते रहे हैं और लोग अपने-अपने साधनों से, अपने-अपने तरीके से इस गर्मी को झेलने का रास्ता निकालते रहे हैं। लू से होने वाले नुकसान भी सामने आए हैं। गुजरात और राजस्थान में इस बार अनेक लोगों की मृत्यु हुई है।

इससे पहले ठंड के मौसम में भी इसी तरह की बात सुनते रहे कि इस बार ठंड कुछ ज्यादा पड़ी है और देर तक पड़ी है। और उस मौसम में भी अभाव में किसी तरह जी रहे लोगों में से कुछ को अपनी जान देनी पड़ी थी। तब बेघरबार लोगों की चिंता नगरपालिकाओं को तो नहीं हुई पर देश की बड़ी अदालत ने जरूर इस बारे में न सिर्फ अपनी संवेदनाएं दिखाईं,


Author: 
धर्मपाल

राजस्थान की पंचायतों का अध्ययन करते हएु सन् 1961 में मुझे अपने गांवों के बारे में एक बिल्कुल दूसरी समझ हासिल हुई। सवाई माधोपुर जिले के एक गांव में हमें पता चला कि वहां सिंचाई के कुछ तालाब हैं। पंचायत के दस्तावेजों में उनका कोई जिक्र नहीं था। इसलिए मैंने लोगों से पूछा कि कौन उनकी मरम्मत करता है। जवाब मिला हम। मैंने पूछा ‘हम से क्या मतलब है? पंचायत से? उन्होंने बताया कि इसका मतलब पंचायत से नहीं, उन लोगों से है जिनके खेतों को इससे पानी मिलता है। 

उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह इन तालाबों की मरम्मत के लिए श्रम और दूसरे साधन एकत्र किए जाते हैं। जब मैंने पूछा कि पंचायत उनकी मरम्मत क्यों नहीं करती तो उन्होंने बताया कि यह पंचायत का काम नहीं है! मेरे पूछने पर, कि फिर पंचायत का क्या काम है, उन्होंने जवाब दिया कि पंचायत का काम है विकास करना और विकास का मतलब होता है, वे कार्यक्रम जिन्हें सरकार उनके लिए तय करे

दफ्न होते दरिया

Source: 
जनसत्ता, 27 जून, 2010
Author: 
पंकज चतुर्वेदी
देश के बत्तीस फीसदी हिस्से को अब पानी की किल्लत के लिए गर्मी का इंतजार नहीं करना पड़ता। सरकार संसद में बता चुकी है कि देश की ग्यारह फीसदी आबादी साफ पीने के पानी से महरूम है। कुछ दशक पहले लोग स्थानीय स्रोतों की मदद से इफरात पानी जुटाते थे। फिर अंधाधुंध नलकूप लगाए जाने लगे, जब तक संभलते तब तक भूजल का स्तर काफी नीचे जा चुका था। पारंपरिक तालाबों की देखभाल करने वाले लोग किसी और काम में लग गए और तालाब सहेजने की तकनीक नदारद हो गई। तभी तो 2001 से 
अब तक तालाबों से गाद निकालने के नाम पर सरकार ने आठ सौ करोड़ रुपये से ज्यादा फूंक दिए और नतीजा ढाक के त

खाद्य सुरक्षा से ज्यादा जरूरी जल सुरक्षा

पानी पर राष्ट्रीय सेमिनारपानी पर राष्ट्रीय सेमिनार

भास्कर फाउंडेशन द्वारा आयोजित पानी पर राष्ट्रीय सेमिनार


भोपाल. केंद्रीय जल संसाधन और संसदीय मामलों के मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा है कि वर्तमान में खाद्य सुरक्षा से ज्यादा जल सुरक्षा की जरूरत है। इसमें शीघ्र ही आत्मनिर्भर बनना होगा, क्योंकि देश में मांग और उपलब्धता के बीच बहुत तेजी से अंतर बढ़ रहा है। 

जल सुरक्षा की जरूरत आज खाद्य सुरक्षा से कहीं ज्यादा है। इसमें शीघ्र आत्मनिर्भर होने की जरूरत है क्योंकि देश में जल की मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। यह बात केंद्रीय जल संसाधन और संसदीय मामलों के मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहीं। वे शुक्रवार को दैनिक भास्कर द्वारा राजधानी के होटल नूर-उस-सबाह में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। सेमिनार का विषय था ‘प्रभावशाली जल प्रबंधन : चुनौतियां एवं समाधान’। 


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सिराज केसर
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