महोदय, जब ध्वनि प्रदूषण कानून में यह बात जोड़ी जा चुकी है कि शोर को रोकने का कार्य पुलिस भी कर सकती है तो ये बात भी समझ से परे है कि कानून के रखवाले के रूप में आप अपने सभी थानेदारों और चौकी प्रभारियों को डेसीबल मीटर से लैस क्यों नहीं करते? रात 10 से सुबह 6 के बीच 100% स्विच आफ का कानून है मगर दिन के लिए भी डेसीबल सीमा है। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि 1 स्पीकर बाक्स वाला डी.जे. भी सीमा से बहुत अधिक शोर कर सकता है और ऐसा होने पर बवाल होना तय है और यह सब बातें मीडिया के माध्यम से आये दिन सामने आ रही हैं।
मुख्यमंत्री महोदय, सुप्रीम कोर्ट ने डी.जे. को जो अनुमति दी है वह सशर्त अनुमति दी है। एक निश्चित सीमा से ऊपर वाला डी.जे. केवल साउंड प्रूफ सभागार में ही बजाया जा सकता है। कानून यह भी कहता है कि दिन हो या रात - आप शांत क्षेत्र (Silence Zone) यानी अस्पताल, स्कूल, कचहरी और पूजा-इबादत स्थलों के 100 मीटर के दायरे में बैंड-बाजा, पटाखा, डी.जे., लाउडस्पीकर, ट्रक-बस, स्कूटर- मोटरसाईकिल - स्कूटी का हार्न आदि भी नहीं बजा सकते। शांत क्षेत्र (Silence Zone) में यह सब 100% प्रतिबंधित है और दोषी के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम- 1986 के अंतर्गत मुकदमा और 1 लाख रूपये तक का जुर्माना या 5 साल तक की जेल या एक साथ दोनों सजा हो सकती है। माननीय मुख्यमंत्री जी, अब जरा आप ही सोच कर बताइये कि ऐसी कौन सी सड़क है जिसके 100 मीटर के दायरे में अस्पताल-नर्सिंग होम / स्कूल-कालेज-विश्वविद्यालय/ कचहरी/मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-गिरिजाघर (Silence Zone) नहीं हो? तो फिर सड़क पर धार्मिक जुलूस में शोर शराबा करके आम जन जीवन को खतरे में डालने वाली तालिबानी संस्कृति पर आप पूर्ण विराम क्यों नहीं लगाते ?
आदरणीय मुख्यमंत्री जी, यह भी बताना चाहूँगा कि धार्मिक स्थलों के अंदर लाउडस्पीकर पर नियंत्रण को लेकर आपकी मशीनरी बिल्कुल गंभीर नहीं है और कानून की मनमाने ढंग से व्याख्या की जा रही है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार किसी भी मस्जिद-मंदिर या धार्मिक स्थल में रात 10 से सुबह 6 के बीच, लाउडस्पीकर को 100% स्विच आफ करने का कानून है और दिन के दौरान यानी सुबह 6 बजे से रात 10 बजे के बीच भी लाउडस्पीकर की ध्वनि धार्मिक स्थल के अंदर तक ही सीमित रहना चाहिए। दिन के दौरान भी स्पीकर की ध्वनि को धार्मिक स्थल के भीतर सीमित रखने के लिए माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने जनवरी 2012 में आदेश दिया है कि लाउडस्पीकर की ऊंचाई जमीन से अधिकतम 8 फ़ीट ही हो सकती है और स्पीकर बॉक्स का मुंह अंदर की तरफ होना चाहिए। महोदय, 'सत्या फाउंडेशन' का आपसे आग्रह है कि व्यापक जन हित में उक्त आदेश को पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किया जाये।
मुख्यमंत्री महोदय, मजहब नहीं सिखाता लाउडस्पीकर बजाना। डी.जे. और लाउडस्पीकर आने से पहले भी धर्म था और आगे भी पारम्परिक वाद्य यंत्रों के उपयोग से हमारा धर्म और ज्यादा मजबूत होता रहेगा। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में शोर के खिलाफ जो ऐतिहासिक फैसला दिया था, उसके मूल में वह बलात्कार पीड़िता थी जिसके घर के पास बज रहे तेज लाउडस्पीकर के शोर में उस पीड़िता की चीख की आवाज दब गयी थी। महोदय, शादी विवाह, धार्मिक कार्यक्रम और धार्मिक जुलूस में तेज ध्वनि प्रदूषण के चलते हिंसा और प्रतिहिंसा में आये दिन होने वाले बवाल और हत्याओं के प्रदेश, उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में आम जनता के बीच जाकर लोगों को समझाना चाहिए कि धर्म और परम्परा की आड़ में तेज शोर के चलते धर्म की गरिमा खंडित और धूल धूसरित हो रही है। आपको जनता के बीच जाकर समझाना चाहिए कि कोई भी धर्म, खिड़की-दरवाजे हिलवा कर लोगों में अनिद्रा, बेचैनी, भय, हिंसा-प्रतिहिंसा और हत्या कराने वाले डी.जे. और स्पीकर की वकालत नहीं कर सकता। यह तो धर्म की आड़ में घोर पाप है जिसे रोक कर पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे ढोल, शहनाई और मजीरा के साथ बरात या धार्मिक जुलूस निकालने से सनातन धर्म और सनातन संस्कृति का झंडा बेहतर ढंग से पूरे उत्तर प्रदेश में लहराएगा।
आशा ही नहीं बल्कि अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप हमारे पत्र में लिखी हुई बातों को सकारात्मक रूप से लेते हुए उचित कार्यवाही और दिशा निर्देश जारी करते हुए आम जनता को राहत देने का कार्य करेंगे।
(चेतन उपाध्याय)
संस्थापक सचिव
'सत्या फाउण्डेशन'
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