प्रामाणिक पातञ्जल ध्यान विधि
एक सादगीपूर्ण कार्यक्रम में श्रीमती (डॉ.) राकेश और श्री जितेन्द्र कुमार अब्बी ने पातंजल ध्यान शीर्षक एक पन्ने के पर्चे के विश्वव्यापी वितरण का उद्घाटन किया। यह ध्यान विधि -
* शुद्ध है कि सांख्य और योग के सिद्धांतों पर आधारित है
* आसान है कि ऋषियों की शिक्षा के अनुसरण से एक गोता लगाना और मोती पाना
* समग्र है कि चित्त की अशुद्धि, मन के अवांछित संस्कार को नष्ट कर जीवन्मुक्त बनने का रास्ता प्रशस्त होता है, संसार में रहते हुए दुःखों से मुक्ति
डॉ हरिश्चन्द्र द्वारा लिखे सांख्य दर्शन के भाष्य से इस ध्यानविधि का आविष्कार हुआ है। लेखक ने इस अवसर पर तीन मौलिक बिन्दुओं पर विचार व्यक्त किये जिन कारणों से पातंजल ध्यान की विधि वर्तमान में प्रचलित विधियों से एकदम अलग बन जाती है :-
१) बुद्धि और चित्त का अन्तर जानना आवश्यक है क्योंकि ध्यान के लिए चित्तवृत्तिनिरोध का अभ्यास किया जाता है। बुद्धि डिफॉल्ट अवस्था में विचार-चिन्तन करती है जिसे उसका अध्यवसाय कहते हैं। जब वह अध्यवसाय नहीं करती है तब चित्त बन जाती है। बुद्धि को चित्त के स्तर पर लाने के लिए यत्न करना पड़ता है जो इस विधि में समाहित है।
२) बुद्धि का चित्त बनने पर ही भीतरी योग में प्रवेश सम्भव होता है जिसमें धारणा और ध्यान के अंग गिने जाते हैं।
३) सांख्य ३.३३ में बताये ढंग से आसानी से ध्यान में पहुंचा जा सकता है। पिछली अनेक शताब्दियों से इस सांख्य सूत्र का सही अर्थ लुप्त था। जिसके परिणामस्वरूप आधुनिक काल में ध्यान का अभ्यास करने वाले करोड़ों मनुष्यों में विरले कोई भीतरी योग में प्रवेश कर पाते हैं। अधिकांश बाहरी योग में ही विचरते रहते हैं जिस कारण उन्हें अत्यल्प लाभ प्राप्त होते हैं।
पातंजल ध्यान विधि से संबंधित विभिन्न सैद्धांतिक पहलुओं को "ध्यान-उपासना पर श्वेतपत्र" में समझाया गया है जिसे भी अब्बी दंपती ने हिन्दी और अंग्रेजी में जारी किया। इन्हें
इस अवसर पर लिये गये चित्र में अब्बी दंपती बैठे हुए हैं। बायें से खड़े हुए हैं :- श्रीमती गीता गुप्ता, डॉ कविता वाचक्नवी, डॉ हरिश्चन्द्र और श्री नितिन गुप्ता।