Jo ishwar ko manata hai.kyunki bhale woh paap kare use aur ek mouka jarror milega.lekin jo nahi manta ishwar ko wo ek bar gira to sidha narak me hi ja thega.mera anubav hai.aap chahe to detail me bata sakta hu.
Smita behen maine 98se 2011 tak bahut paap kiye ya mujse ho gaye lekin main uske satj bahut mala japata tha aur prarhana karta tha ke hai eshwar mujhe bachana.mere punya ne jor pakda aur mujhe bapuji sadguru ke rup me mil gaye.ladai vikaronse abhibhi jari hai.isme jitna yani aatmbhav me pana hi hai.kyon mukeshji.bhagwan ka lakh lakh shukar hai ki vikar chehi hai.unpar kabu karna hai yahi aatmasaksatkar hai.kaansh yeh itna saral hota jitna type krna.
तो फिर हम जब शारीर छोड़ देते है तो हमारी पवित्र आत्मा बहार निकलती है? हमने तो पञ्च तत्त्व से बना शारीर छोड़ दिया होता है, तो फिर से कर्म नए जन्म में काटने क्यों पड़ते है?
On May 28, 4:52 pm, Rupesh Rane <rup...@gmail.com> wrote:
> तो फिर हम जब शारीर छोड़ देते है तो हमारी पवित्र आत्मा बहार निकलती है? हमने
> तो पञ्च तत्त्व से बना शारीर छोड़ दिया होता है, तो फिर से कर्म नए जन्म में
> काटने क्यों पड़ते है?
>
> 2012/5/28 budh pal singh Chandel <bps1chan...@gmail.com>
>
> > हा .....हा.. भाई जी ,अछे/बुरे कर्म आत्मा से नहीं सिर्फ हमारे पञ्च
> > तत्वा-निर्मित शरीर से चिपके रहते है ,आत्मा तो ईश्वरीय शक्ति है ,उस से कोई
> > लिपट नहीं सकता ,कृपया मनन करे \
>
> > 2012/5/28 Rupesh Rane <rup...@gmail.com>
>
> >> आपकी बात सत्य है, लेकिन मुझे यह प्रश्न है की, आत्मा अगर परम पवित्र है तो
> >> उसको हमारे अच्छे-बुरे कर्म चिपकते क्यों है?
>
> >> 2012/5/28 budh pal singh Chandel <bps1chan...@gmail.com>
>
> >>> बिलकुल सत्य ,आत्मा सबकी सत्याधारित होती है ,मानव -मानव में कार्यो के
> >>> हिसाब से उनका निर्धारण अछे /बुरे में किया जाता है \
>
On May 28, 5:16 pm, mukesh bhatia <shivoham...@gmail.com> wrote:
> Jaise aapkaa bank account hai, aise hee karmo kaa khaata hai, marne ke baad
> chitra gupt aapke karmo kaa khata kholtaa hai aur aapke karmo ke anusar
> aapki aage kee yaatra hoti hai...
>
> Regards,
> Mukesh
>
> 2012/5/28 Rupesh Rane <rup...@gmail.com>
>
> > तो फिर हम जब शारीर छोड़ देते है तो हमारी पवित्र आत्मा बहार निकलती है? हमने
> > तो पञ्च तत्त्व से बना शारीर छोड़ दिया होता है, तो फिर से कर्म नए जन्म में
> > काटने क्यों पड़ते है?
>
> > 2012/5/28 budh pal singh Chandel <bps1chan...@gmail.com>
>
> >> हा .....हा.. भाई जी ,अछे/बुरे कर्म आत्मा से नहीं सिर्फ हमारे पञ्च
> >> तत्वा-निर्मित शरीर से चिपके रहते है ,आत्मा तो ईश्वरीय शक्ति है ,उस से कोई
> >> लिपट नहीं सकता ,कृपया मनन करे \
>
> >> 2012/5/28 Rupesh Rane <rup...@gmail.com>
>
> >>> आपकी बात सत्य है, लेकिन मुझे यह प्रश्न है की, आत्मा अगर परम पवित्र है तो
> >>> उसको हमारे अच्छे-बुरे कर्म चिपकते क्यों है?
>
> >>> 2012/5/28 budh pal singh Chandel <bps1chan...@gmail.com>
>
> >>>> बिलकुल सत्य ,आत्मा सबकी सत्याधारित होती है ,मानव -मानव में कार्यो के
> >>>> हिसाब से उनका निर्धारण अछे /बुरे में किया जाता है \
>
On May 28, 6:25 pm, Rupesh Rane <rup...@gmail.com> wrote:
> तो फिर आत्मा को सूक्ष्म शरीर से मुक्ति कैसे मिलेगी? मुझे पुनर्जन्म नहीं
> लेना है तो क्या करना होगा?
>
> 2012/5/28 naman_hariom <rastog...@gmail.com>
कोई भले ही धर्म की दुहाइयाँ देता हो पर उसका आचरण वेदान्ती नहीं है तो वह दुःखी रहेगा। कोई कितना भी धार्मिक हो लेकिन आधार में वेदान्त नहीं है तो वह पराधीन रहेगा। कोई व्यक्ति कितना भी अधार्मिक दिखे लेकिन उसका आचरण वेदान्ती है तो वह सफल होगा, सब पर राज्य करेगा। चाहे किसी देवी-देवता, ईश्वर, धर्म या मजहब को नहीं मानता फिर भी भीतर सच्चाई है, किसी का बुरा नहीं चाहता, इन्द्रियों को वश में रखता है, मन शान्त है, प्रसन्न है तो यह ईश्वर की भक्ति है।
यह जरूरी नहीं कि मंदिर-मस्जिद में जाकर गिड़गिड़ाने से ही भक्ति होती है। अन्तर्यामी परमात्मा से तुम जितने जुड़ते हो, सच्चाई और सदगुणों के साथ उतनी तुम्हारी ईश्वर-भक्ति बन जाती है। जितना अन्तर्यामी ईश्वर से नाता तोड़कर दूर जाते हो, भीतर एक और बाहर दूसरा आचरण करते हो तो कार्य-कारण के नियम भी तुम पर बुरा प्रभाव डालेंगे।
On May 28, 6:34 pm, Rupesh Rane <rup...@gmail.com> wrote:
> तो फिर शादी नहीं की, और गरीब हो गए तो फिर मुक्ति मिल जाएगी?
>
> 2012/5/28 naman_hariom <rastog...@gmail.com>
On May 28, 6:34 pm, Rupesh Rane <rup...@gmail.com> wrote:
> तो फिर शादी नहीं की, और गरीब हो गए तो फिर मुक्ति मिल जाएगी?
>
> 2012/5/28 naman_hariom <rastog...@gmail.com>
On May 28, 11:43 pm, Naveen Tirthani <naveentirth...@gmail.com> wrote:
> कोई भले ही धर्म की दुहाइयाँ देता हो पर उसका आचरण वेदान्ती नहीं है तो वह
> दुःखी रहेगा। कोई कितना भी धार्मिक हो लेकिन आधार में वेदान्त नहीं है तो वह
> पराधीन रहेगा। *कोई व्यक्ति कितना भी अधार्मिक दिखे लेकिन उसका आचरण वेदान्ती
> है तो वह सफल होगा, सब पर राज्य करेगा। चाहे किसी देवी-देवता, ईश्वर, धर्म या
> मजहब को नहीं मानता फिर भी भीतर सच्चाई है, किसी का बुरा नहीं चाहता,
> इन्द्रियों को वश में रखता है, मन शान्त है, प्रसन्न है तो यह ईश्वर की भक्ति
> है।***
>
> यह जरूरी नहीं कि मंदिर-मस्जिद में जाकर गिड़गिड़ाने से ही भक्ति होती है।
> अन्तर्यामी परमात्मा से तुम जितने जुड़ते हो, सच्चाई और सदगुणों के साथ उतनी
> तुम्हारी ईश्वर-भक्ति बन जाती है। जितना अन्तर्यामी ईश्वर से नाता तोड़कर दूर
> जाते हो, भीतर एक और बाहर दूसरा आचरण करते हो तो कार्य-कारण के नियम भी तुम पर
> बुरा प्रभाव डालेंगे।
>
> Sakshi jyon ka tyon
> --------------------------------------
> visithttp://www.ashram.org/http://www.hariomgroup.org/
>
> 2012/5/29 Naveen Tirthani <naveentirth...@gmail.com>
>
> > Copied from Ashram Book : Jivan Vikas
>
> > कोई भले ही धर्म की दुहाइयाँ देता हो पर उसका आचरण वेदान्ती नहीं है तो वह
> > दुःखी रहेगा। कोई कितना भी धार्मिक हो लेकिन आधार में वेदान्त नहीं है तो वह
> > पराधीन रहेगा। *कोई व्यक्ति कितना भी अधार्मिक दिखे लेकिन उसका आचरण
> > वेदान्ती है तो वह सफल होगा, सब पर राज्य करेगा। चाहे किसी देवी-देवता, ईश्वर,
> > धर्म या मजहब को नहीं मानता फिर भी भीतर सच्चाई है, किसी का बुरा नहीं चाहता,
> > इन्द्रियों को वश में रखता है, मन शान्त है, प्रसन्न है तो यह ईश्वर की भक्ति
> > है।*
>
> > Sakshi jyon ka tyon
> > --------------------------------------
> > visit
> >http://www.ashram.org/
> >http://www.hariomgroup.org/
>
2012/5/29 naman_hariom <rast...@gmail.com>:
How to overcome old bad habbits.mala ghumanese kaam ban jayega
On May 30, 12:48 pm, sushil shinde <shindesu...@gmail.com> wrote:
> How to overcome old bad habbits.mala ghumanese kaam ban jayega
> On 30 May 2012 12:42, "Anita Bhadoriya" <anita...@gmail.com> wrote:
>
> > Hari Om,
> > i would like to say that the person who has faith in God will
> > eventually become a nice human being and the one who is nice and has
> > no faith in god is living a life full of dangers because any time his
> > ego can get inlated and his heart will change.
> > anita
>
> > 2012/5/29 naman_hariom <rastog...@gmail.com>: