इस बार गर्मियों की छुट्टियाँ में कुछ अलग करने की अभिलाषा थी | ‘अलग’ अगर मैं आम समाज की भाषा में कहूँ पर मेरे लिए यह तो एक कर्तव्य था जोकि मैं समझता हूँ इस संसार में हर किसी व्यक्ति विशेष का भी होना चाहिए | समाज सेवा कहने के बजाय मैं अपने इस कर्तव्य को खुशी बाँटने का जरिया बोलता हूँ | सबसे बढिया बात तो यह है कि जब आप इस जरिये का इस्तेमाल करतें हैं तो दोगुनी खुशी आपको वापस नसीब होती है और फिर आज कल तो सुकून और खुशी भी इतनी ‘सस्ती’ नहीं मिलती |
शायद मेरे कुछ सवाल थे जो मुझे खाए जा रहे थे और जिनका जवाब मुझे सिर्फ एक ऐसी जगह ही मिल सकता था जहाँ पर हर कोई निरंतर बिना थके इसी काम में लगा है जिससे दूसरों के जीवन में खुशियाँ और सम्पूर्णता आ सके | इन्ही जवाबों के लिए मुझे ‘थिंक इंडिया’ ने एक मौका दिया स्नेहालय में |
१५ दिन के इस सफर ने मेरे जिंदगी को देखने के नज़रिए को ही बदल के रख दिया | जुलाई मॉस के सुहाने मौसम में मैं पहुंचा महाराष्ट्र के अहमदनगर शहर में | मेरी खुशनसीबी थी कि मेरे साथ दो बहुत ही सुलझे हुए और मस्तमौला इंसान थे | चिन मनिपुर से थी और जागृत सूरत से, इनके साथ ने इस सफर को मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत सफरों में शुमार कर दिया | हम तीनों ने इस सफर की शुरुआत स्नेहालय के सभी प्रकल्पों को समझने से की | पहले कुछ ४-५ दिन हमने सारे प्रकल्पों का भ्रमण किया और उनकीं बारीकियों तथा कर्मचारियों से मुलाकात की | इतना कुछ जान कर पहली बार महसूस हुआ कि डर से निर्भीक होकर आप भी सिर्फ पांच हज़ार की नौकरी में अपनी जान की परवाह किये बगैर सिर्फ सकून और खुशी से ही अपना पेट भर सकते हैं | बस ज़रूरत होती है अपने अंदर के डर को दूर करने की | लोगों से बातचीत करते समय सभी के चेहरे पर एक अलग सुकून, तेज और उत्साह था जोकि आप किसी भी ‘आम’ इनसान के चेहरे पर महसूस नहीं कर सकते | शायद इसी ठंडक को सही मायनों में ‘आनंद’ कहतें हैं जो सिर्फ नसीब वालों को ही मिलती है |
हमने बालभवन प्रकल्प में अपने इस सुगम पर दुर्गम तजुर्बे की कहानी को शकल दी | पहले दिन लुईस सर के साथ लालटाकी स्थित झोपड़पट्टी इलाके में वहाँ के घरों का जायजा लिया और लोगों से उनकी दिक्कतों के बारे में जानने की कोशिश करी | इस भ्रमण के बाद काफी कुछ तस्वीर साफ़ हुई और बालभवन के कार्यों के बारे में पता चला | पूरे छेत्र में सिर्फ चलने भर की ही जगह थी, ज्यादातर इलाके में कूड़ा-कबाड और गन्दगी थी जोकि सरकार की उपेक्षा को दर्शा रही थी | किसी भी मकान में गुसलखाना नहीं था, कपडे सड़क पर ही धोए जाते थे | कुछ देर बाद हमें बगल के ही बालभवन में एक कार्यक्रम में शामिल किया गया जोकि दसवीं के छात्रों के मार्गदशन और किशोरावस्था की जानकारी के लिए आयोजित किया गया था | हमने कुछ छात्रों से बात करी और उन्हें आगे बढने के लिए प्रोत्साहित किया | सभी छात्रों में पढ़ने की खूब जिज्ञासा थी पर थोड़ी देर बात करने पर ही हकीकत का सामना हुआ | इन सभी को गरीबी की मार से घर पर काम करने का बोझ, दो पैसे कमाने की मशकत के बाद ही पढ़ने का मौका मिलता था | कुछ लोगों ने तो बताया कि वो सुबह छुप छुप अपने माता-पिता की आखों से बच कर पढतें थे | खैर हमने उन सभी के साथ खूब मज़े किये बल्कि कैमरे से खूब तस्वीरें खिचवायीं | पहली रात में ही इतने सवालों के साथ सोना मुश्किल था | पर अगले दिन के इंतज़ार ने आखों में निद्रा का काज़ल लगा दिया |
अगले कुछ दिनों तक हमने बालभवन में ही अपना कार्य जारी रखा और वहाँ की कार्य प्रणाली को अच्छी तरह समझाने की कोशिश की | इसी जद्दोजेहद में हमने बालभवन शुरू होने के मूल कारण को जाना | झोपड़पट्टी में रहने वालों की एक अटल मानसिकता सी बन जाती है कि वो इस स्तिथि से बाहर ही नहीं निकलना चाहते हैं | उनकी आखों पें गन्दगी का पर्दा डला हो जैसे | एक दिन पैसे कमाना और फिर उसी दिन उन पैसों को खाने-दारू में खर्च कर देना उनकी आदत थी, जिसका मतलब उनकी कोई आमदनी नहीं थी | आमदनी न होने का मतलब न बाल-बच्चों की पढाई का ख्याल न ही अपने भविष्य की चिंता थी | ज्यादातर लोग अनपढ़ थे जो उनके शोषण का कारण बन जाता है | इसी बीमार मानसिकता को बदलने का काम बालभवन अहमदनगर के ८ झोपड़पट्टी छेत्रों में कर रहा है | यह काम बहुत ही मुश्किल है क्योंकि आपको असीम धैर्य रखना पड़ता है, उनकी बातें, दिक्कतें को समझना और फिर उनको आमदनी,पढाई के महत्व के बारे में सलाह देना पड़ता है | इसी मशक्कत में बालभवन में दोपहर से लेकर रात के ९ बजे तक कक्षाएं हुआ करतीं थीं | हमने भी घरेलू औरतों की कक्षाएं लीं और वाकई में ये काम टेडी खीर से कम नहीं था जब हर कोई अलग अलग स्तरों पर था | कोई सिर्फ अंग्रेजी के अल्फाबेट्स जानता था, किसी को सिर्फ मराठी आती थी तो कई को शब्दों और वाक्यों की जानकारी थी | सबसे मुश्किल काम था इन सभी को एक कक्षा में एक साथ पढाना पर हमने कोशिश की और काफी हद्द तक सफल भी हुए |
पढ़ाते-पढ़ाते हमने खूब बातें भी कीं और उनकी दिनचर्या, कामकाज के बारे में जानने की कोशिश भी की | मेरे ख्याल से ये कार्य ही इस सफर का सबसे मुश्किल पहलू था | रोज सुबह लालटाकी पहुचना फिर पूरे इलाके में घूमना और पता करना कि सब बच्चे स्कूल गए हैं कि नहीं हमारी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन गया था | वहाँ पे लोग हमें जानने लगे थे | हमारी घरेलूँ ‘छात्राएं’ अब हम ही से पढ़ना चाहती थीं जैसे कोई बेनाम रिश्ता सा बन गया हो बालभवन लोगों की हर तरह से मदद करता है जैसे अगर कोई कोर्ट-कचहरी का चक्कर हो या सरकारी कार्य में देरी हो रही हो या किसी भी तरह की आवेदन हो तो बालभवन के कर्मचारी हमेशा मदद के तयार रहते थे | समय लगता है पर धीरे धीरे लोगों को सोचने का नजरिया बदल रहा है | अब लोग आखें खोल कर चलना चाहतें हैं और इस गरीबी चक्र से बहार निकलना चाहते हैं | काबिलेतारीफ है तो बालभवन के कर्मचारियों का जोश, उनका जूनून, जज्बा जो कभी भी किसी भी दिन खत्म नहीं होता है |
सफर तो अधूरा रह जाता अगर हम स्नेहालय के संस्थापक गिरीश कुलकर्णी जी से न मिले होते | मौका भी बड़ा शुभ था मिलने का जोकि था ४ छोटे छोटे बचों के गोद लेने का | अब इसे इत्तेफाक कहिये या किस्मत, हमें उन परिवारों से विमर्श करने का मौका मिला जो उनको गोद ले रहे थे | उनसे बात करने के बाद जिंदगी की कई अनसुलझीं गुथियों पर रोशनी गयी | आज के इस भाग-दौड के जमाने में इंसान छोटी छोटी खुशियों को किस तरह पीछे छोड़ देता उसकी पीड़ा उनकी बातों में साफ़ झलक रही थी | खैर गिरीश जी से मुलाकात हुई और उनसे खूब लंबी बातें हुईं फिर उनकी पत्नी प्राजक्ता जी से भी भेंट हुई | अब उन बातों का विवरण देना चाहूँ तो शायद लिखते लिखते थक जाऊं | पर जिस जवाब के खोज में मैं अहमदनगर आया था वो मुझे और कोई नहीं सिर्फ गिरीश जी ही दे सकते थे |
‘पागलपन’ ही जवाब था जो मैं हमेशा सोचता था कि क्या है जो गिरीश जी जैसे पुरुषों की को इस खुशी बांटने के कर्तव्य को पूरी जिंदगी निभाने की शक्ति देता है | इस पागलपन की अध्यवसाय, दृढ़ता ही है जो इन सभी को निरंतर कार्यरत रहने की उर्जा देती रहती है | उस रात मैं सबसे गहरी नींद सोया ,एक अलग ही सुकून था पर वो पागलपन, अपने अंदर लाने की चेष्टा मैं अभी भी नहीं कर पा रहा था |
चिन और जाग्रत के जाने के बाद मैंने वेबसाइट के कार्य को संभाला और कुछ दिन उसी पर काम किया| उसी दौरान मुझे कुछ कहानियाँ पड़ने का मौका मिला जिन्होंने मुझे झकझोर के रख दिया | वो कहानियां थीं कुछ लड़कियों के बारे में जोकि समाज की कुप्रथा या अत्याचार का शिकार थीं |
मैंने कुछ ही दिनों में इतने मित्र बना लिए थे कि जब जाने का समय आया तो जाने का मन ही नहीं कर रहा था जैसे एक डोर सी बंध गयी हो, कुछ खाली खाली सा लग रहा था | मेरा ये सफर उन बहनों और दोस्तों के जिक्र के बिना पूरा नहीं हो सकता जिनको मैं कभी भी नहीं भूल पाउँगा | साफ़ दिल से बात करने वालों का इस दुनिया में सूखा पड़ा हुआ है पर जब मैं उनसे बात करता था तो एक अलग ही सुकून और प्यार महसूस करता था | यह सब थे स्नेहालय में रहने वाले छात्र और छात्राएं जिनका समाज ने बहिष्कार कर दिया था | जब भी मैं उनको याद करता हूँ तो आज भी आखों में आसूं आ जाते हैं |
वैसे हम अन्ना हजारे से भी मिले थे उन्ही के गांव ‘रालेगन सिद्धि’ में | अगर मैं अपने अनुभव का पिटारा खोल दूं तो शायद मैं इस सफर का विवरण खत्म ही न कर पाऊँ | अब तो एक अटूट रिश्ता सा बंध चुका है जो मुझे यकीन है कि मुझे बार बार वहाँ खीचेगा |
अभिनव गोपाल, आई.आई.टी.- मद्रास.
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