र वर्ण का महाप्राण रूप

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narayan prasad

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Apr 2, 2011, 7:29:02 AM4/2/11
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
हिन्दी की कुछ भाषाओं / उपभाषाओं में र वर्ण का महाप्राण रूप भी प्रयोग में है, परन्तु इसके लिए देवनागरी लिपि में कोई स्वतन्त्र चिह्न नहीं है । जैसे ड़ का महाप्राण रूप ढ़ है, उसी प्रकार र वर्ण के लिए एक महाप्राण रूप की कल्पना कर सकते हैं । जिस प्रकार महाप्राण वर्ण ख के लिए क्ह, घ के लिए ग्ह आदि का प्रयोग न करके इनके लिए स्वतन्त्र वर्ण चिह्न सभी भारतीय लिपियों में बनाए गए हैं, उसी प्रकार र के महाप्राण वर्ण के लिए र्ह का प्रयोग न कर इसके स्थान पर एक स्वतन्त्र वर्ण की आवश्यकता है । आपलोगों में से यदि कोई फोंट डिजाइनर हों तो इसके बारे में कृपया जरूर सोचें ।

उदाहरण के लिए मगही भाषा से कुछ शब्द दिए जा रहे हैं जिनमें र के महाप्राण रूप का प्रयोग किया जाता है । स्वतन्त्र वर्ण चिह्न न होने के कारण इसके स्थान पर र्ह का प्रयोग किया जा रहा है ।
(1) अर्हाना = कोई काम करने के लिए किसी को आदेश देना या कहना, काम में प्रवृत्त करना
(2) बिर्हनी = बिढ़नी, ततैया
(3) पर्हे = परसाल

हिन्दी की किसी अन्य उपभाषा में या किसी भी भारतीय भाषा में यदि र के महाप्राण रूप का प्रयोग होता हो तो कृपया इस पर प्रकाश डालें ।
---नारायण प्रसाद

Hariraam

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Nov 15, 2011, 9:51:49 AM11/15/11
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क्या U+0931 ऱ
यह महाप्राण रूप नहीं है?

narayan prasad

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Nov 15, 2011, 11:29:04 AM11/15/11
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ऱ का उच्चारण लगभग र्र जैसा होता है, जबकि महाप्राण होने के लिए एक ही साथ रकार के बाद ह का उच्चारण होना चाहिए - अर्थात् र्+ह, परन्तु अलग-अलग नहीं, बल्कि दोनों का एक साथ, जैसे क का महाप्राण क्ह नहीं, ख होता है । तुलना कीजिए - ड़ का महाप्राण ढ़ ।

 ---नारायण प्रसाद

2011/11/15 Hariraam <hari...@gmail.com>

Arun Upadhyay

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Nov 15, 2011, 9:13:40 PM11/15/11
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वेद में दो प्रकार के ल थे, जिनका प्रयोग अभी केवल दक्षिण भारत की भाषाओं (ओड़िया भी) में सीमित है-ल, ळ । इस दूसरे ळ का उच्चारण ड़ जैसा होता है। यह भी एक प्रमाण है कि वेद की प्राचीन परम्परायें दक्षिण भारत में थीं, न कि तथा-कथित सिन्धु-घाटी से वैदिक आर्यों ने इसका प्रचार दक्षिण तथा पूर्व में किय। कई प्राचीन वैदिक शब्द केवल दक्षिण भारत में ही हैं। हम इसका उल्लेख भागवत माहात्म्य में ५००० वर्षों से करते आ रहे हैं, पर भारत में पराधीन मनोवृत्ति के कारण अपने शास्त्रों में विश्वास नहीं करते, केवल अंग्रेजों का अनुकरण करते हैं-
अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ।
ज्ञान वैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४५॥
उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
तत्र घोर कलेर्योगात् पाखण्डैः खण्डिताङ्गका। दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मन्दताम्॥४९॥
वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी। जाताहं युवती सम्यक् श्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥५०॥
(
पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
यजुर्वेद की प्राचीन तैत्तिरीय शाखा भी दक्षिण भारत के तैत्तिरिक में ही थी, जिसे अभी उडुपी कहते हैं-
अथापरे जनपदा दक्षिणापथवासिनः ॥४७॥
तथा तैत्तिरिकाश्चैव दक्षिणापथवासिनः॥५०॥
(मत्स्य पुराण, अध्याय ११४)
केवल दक्षिण भारत में नगर के लिये उरु शब्द का व्यवहार है, जैसे बेंगलूरु, मंगलूरु, एल्लुरु-
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद /२४/)
शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग् वेद /९०/)
केवल आन्ध्र प्रदेश में समुद्र तट भूमि के पालन-कर्त्ता को रेड्डी कहते हैं, जो वैदिक उच्चारण रेळ्हि का एक रूप है-
एकः सुपर्णः समुद्रमाविवेश इदं भुवनं वि चष्टे
तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं
, माता रेऴ्हि रेऴ्हि मातरम् (ऋग् वेद १०/११४/)
यहां प्रयुक्त सुपर्ण शब्द भी नौसेना-प्रमुख के लिये व्यवहार होता था। स्पष्टतः समुद्र सम्बन्धी शब्द उत्तर प्रदेश या पंजाब के नहीं हो सकते। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में ही दिन-रात के लिये दोषा-वस्ता का प्रयोग है, जिनका प्रयोग केवल दक्षिण में है। वस्ता = दिन, इसका दिनकर सूर्य के रूप में भी प्रयोग है-रमैया वस्ता-वैया मैंने दिल तुझको दिया। दोषा = रात्रि, अतः रात्रि के मुख्य भोजन को दोषा कहते हैं। उत्तर भारत में केवल प्रदोष शब्द का प्रयोग है, दोषा के पूर्व सन्ध्या को प्रदोष कहते हैं।
इसके अतिरिक्त गुरु-वर्ष की प्राचीन स्वायम्भुव (पितामह) पद्धति दक्षिण में तथा बाद की वैवस्वत (सूर्य-सिद्धान्त) उत्तर में है।
-अरुण कुमार उपध्याय, कटक, ९४३७०३४१७२
 
 
 


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narayan prasad

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Nov 16, 2011, 12:21:10 AM11/16/11
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<<वेद में दो प्रकार के थे, जिनका प्रयोग अभी केवल दक्षिण भारत की भाषाओं (ओड़िया भी) में सीमित है-, >>

 

का प्रयोग उत्तर भारत की भाषाओं में भी होता है - जैसे गुजराती, पंजाबी आदि

<<केवल दक्षिण भारत में नगर के लिये उरु शब्द का व्यवहार है, जैसे बेंगलूरु, मंगलूरु, एल्लुरु->>

 

उरु नहीं, बल्कि "ऊरु" या "ऊर्"

 

<<माता रेऴ्हि रेऴ्हि मातरम् (ऋग् वेद १०/११४/) >>

 

ऊपर आपने वेद में दो तरह के की बात की और अभी उदाहरण तीसरे प्रकार के (अर्थात् ) का दिया

 

---नारायण प्रसाद



 
2011/11/16 Arun Upadhyay <arunupa...@yahoo.in>
वेद में दो प्रकार के ल थे, जिनका प्रयोग अभी केवल दक्षिण भारत की भाषाओं (ओड़िया भी) में सीमित है-ल, ळ । इस दूसरे ळ का उच्चारण ड़ जैसा होता है। यह भी एक प्रमाण है कि वेद की प्राचीन परम्परायें दक्षिण भारत में थीं, न कि तथा-कथित सिन्धु-घाटी से वैदिक आर्यों ने इसका प्रचार दक्षिण तथा पूर्व में किय। कई प्राचीन वैदिक शब्द केवल दक्षिण भारत में ही हैं। हम इसका उल्लेख भागवत माहात्म्य में ५००० वर्षों से करते आ रहे हैं, पर भारत में पराधीन मनोवृत्ति के कारण अपने शास्त्रों में विश्वास नहीं करते, केवल अंग्रेजों का अनुकरण करते हैं-
------------------------
 
तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं
,
माता रेऴ्हि रेऴ्हि मातरम् (ऋग् वेद १०/११४/)
--------------------------------------------------

Yashwant Gehlot

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Nov 16, 2011, 1:24:43 AM11/16/11
to technic...@googlegroups.com
का प्रयोग मराठी, गुजराती और राजस्थानी में भी होता है.
 
मैं यह जानना चाहता था कि क्या का कहीं उपयोग होता है...
 
यशवंत

2011/11/16 narayan prasad <hin...@gmail.com>

narayan prasad

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Nov 16, 2011, 1:39:41 AM11/16/11
to technic...@googlegroups.com
<<मैं यह जानना चाहता था कि क्या का कहीं उपयोग होता है...>>
 
बंगला और उड़िया में । बिना नुक्ता वाले य का उच्चारण ज जैसा होता है, जैसे- यमुना = जमुना ।

--- नारायण प्रसाद

2011/11/16 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>

Vineet Chaitanya

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Nov 16, 2011, 1:50:38 AM11/16/11
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2011/11/16 narayan prasad <hin...@gmail.com>

<<मैं यह जानना चाहता था कि क्या का कहीं उपयोग होता है...>>
 
बंगला और उड़िया में । बिना नुक्ता वाले य का उच्चारण ज जैसा होता है, जैसे- यमुना = जमुना ।

    इसलिये जब य का उच्चारण य ही करना होता है तो य़ का प्रयोग किया जाता है.

--- नारायण प्रसाद

2011/11/16 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>
का प्रयोग मराठी, गुजराती और राजस्थानी में भी होता है.
 
मैं यह जानना चाहता था कि क्या का कहीं उपयोग होता है...
 
यशवंत

--

Yashwant Gehlot

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Nov 16, 2011, 2:09:27 AM11/16/11
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धन्यवाद. संभवतः इसीलिए उस क्षेत्र के लोग मुझे जसवंत/जसबंत नाम से संबोधित करते हैं.
मेरे विचार से हिंदी के मानक कीबोर्ड (इन्स्क्रिप्ट) में की आवश्यकता नहीं थी.
 
यशवंत

Vineet Chaitanya

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Nov 16, 2011, 2:33:04 AM11/16/11
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2011/11/16 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>

धन्यवाद. संभवतः इसीलिए उस क्षेत्र के लोग मुझे जसवंत/जसबंत नाम से संबोधित करते हैं.
मेरे विचार से हिंदी के मानक कीबोर्ड (इन्स्क्रिप्ट) में की आवश्यकता नहीं थी.

    इन्स्क्रिप्ट केवल हिन्दी का ही नहीं वरन् सभी भारतीय भाषाओं के लिये मानक कीबोर्ड है.
 
यशवंत


2011/11/16 narayan prasad <hin...@gmail.com>
<<मैं यह जानना चाहता था कि क्या का कहीं उपयोग होता है...>>
 
बंगला और उड़िया में । बिना नुक्ता वाले य का उच्चारण ज जैसा होता है, जैसे- यमुना = जमुना ।

    इसलिये जब य का उच्चारण य ही करना होता है तो य़ का प्रयोग किया जाता है.

--- नारायण प्रसाद

 

--

Yashwant Gehlot

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Nov 16, 2011, 4:06:21 AM11/16/11
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मेरे विचार से हिंदी के मानक कीबोर्ड (इन्स्क्रिप्ट) में की आवश्यकता नहीं थी.

    इन्स्क्रिप्ट केवल हिन्दी का ही नहीं वरन् सभी भारतीय भाषाओं के लिये मानक कीबोर्ड है.
 
विनीत जी, मैं यह जानना चाहता था कि हिंदी के इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड में की आवश्यकता /महत्व /उपयोग क्या है....
यशवंत

Anunad Singh

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Nov 16, 2011, 5:09:23 AM11/16/11
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यशवन्त जी,
आप केवल हिन्दी लिखने के सन्दर्भ में इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल में 'य़'  के अस्तित्व को  अनावश्यक/बेकार मान सकते हैं किन्तु सभी भारतीय भाषाओं की टंकण आवश्यकताओं की पूर्ति को ध्यान में रखकर बनाये गये कुंजीपटल में इसकी आवश्यकता पर आपको संदेह क्यों हो रहा है?

दूसरी बात .... मान लीजिये मैं बांग्ला या ओड़िया का देवनागरी में लिप्यन्तरण करना चाहता हूँ या बांग्ला को ही देवनागरी में लिखना चाहता हूँ तो भी इसकी जरूरत पड़ेगी।

Yashwant Gehlot

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Nov 16, 2011, 10:20:13 AM11/16/11
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी,
 
आपकी बात से सहमत हूं. साथ ही मेरा यह मानना है कि ऐसे कई कैरेक्टर हैं जो कुंजीपटल पर सीधे मौजूद नहीं हैं लेकिन कैरेक्टर मैप में उपलब्ध हैं. मेरा यह मत है कि हिंदी कीबोर्ड पर की जगह अगर शृ (जिसे मंगल में टाइप नहीं किया जा सकता), तो उपयोगकर्ताओं को अधिक फायदा होता.
 
यशवंत

2011/11/16 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

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Nov 16, 2011, 8:29:38 PM11/16/11
to technic...@googlegroups.com
यशवन्त जी शृ = श + ृ बटन दबाने से ही बनता है, उसकी कीबोर्ड पर जरूरत नहीं। यह कीबोर्ड बटन नहीं बल्कि फॉण्ट में ग्लिफ न होने की समस्या है। मंगल में शृ का सही ग्लिफ नहीं है जबकि संस्कृत २००३ आदि कुछ फॉण्टों में है।

आप मंगल में लिखे गये शृ को चुनकर फॉण्ट संस्कृत २००३ करके देखें, सही रूप में दिखेगा।

१६ नवम्बर २०११ ८:५० अपराह्न को, Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com> ने लिखा:
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Hariraam

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Nov 16, 2011, 10:14:24 PM11/16/11
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नारायण जी, अनुनाद जी,


ओड़िआ लिपि के युनिकोड कूटों के निर्धारण के वक्त कुछ भूल रह गई थी।
वास्तव में
ओड़िआ ଯ = U0B2F== देवनागरी का य़ = U095F है
ओड़िआ ୟ = U0B5F== देवनागरी का य = U092F है

युनिकोड वालों को ଯ को U095F तथा ୟ को U092F कोड नम्बर देना चाहिए था। इसका विवरण बाद में उनके comments में दे दिया है।

ओड़िआ ୱ = U0B71== देवनागरी का व = U0935 है तथा इसके अलावा
ओड़िआ= U0B35== भी देवनागरी का व = U0935 है (व के दो रूप ओड़िआ में प्रचलित हैं)
ओड़िआ ବ = U0B2C == देवनागरी का ब = U092C है। लेकिन बंगला के प्रभाव में आकर (क्योंकि बंगला में व अक्षर नहीं है)
ओड़िआ में लोग भ्रमवश व के स्थान पर ब का ही अधिकाधिक प्रयोग करते हैं।

'व'-फला युक्त युक्ताक्षरों
यथा श्वास, ध्वंश, पक्व, बिल्व, ज्वाला आदि का सही लिप्यन्तरण
 ଶ୍ୱାସ, ଧ୍ବଂଶ, ପକ୍ୱ, ବିଲ୍ୱ, ଜ୍ୱାଲା होना चाहिए। लेकिन
ओड़िआ भाषी व के स्थान पर ब का प्रयोग करने के कारण वर्तमान 8-बिट ओड़िआ फोंट से युनिकोड में परिवर्तित पाठ में ये शब्द
ଶ୍ବାସ, ଧ୍ବଂଶ, ପକ୍ବ, ବିଲ୍ବ, ଜ୍ବାଲା जैसे गलत रूप में प्रकट होते हैं। जो कि ध्वनिविज्ञान की दृष्टि से गलत है।

इसीलिए ओड़िआ हिन्दी लिप्यन्तरण में भारी भ्रम होता है।

लेकिन दुःख की बात है कि विभिन्न फोंट निर्माता ब-व के भ्रम या विवाद के कारणअलग अलग रेण्डरिंग देनेवाले फोंट्स बना चुके हैं। जिससे युनिकोड का महत्व गड़बड़ा गया है।


उदाहरण के लिेए माइक्रोसॉफ्ट  विण्डोज-7 के kalinga फोंट में  halant+u0b71 टाइप करने पर निम्न संयुक्ताक्षर सही रूप में प्रकट होते हैं।

ଶ୍ୱାସ, ଧ୍ୱଂଶ, ପକ୍ୱ, ବିଲ୍ୱ, ଜ୍ୱାଲା

तथा halanta+u0b2c टाइप करने पर निम्न संयुक्ताक्षर के रूप में प्रकट होते हैं।
ଶ୍ବାସ, ଧ୍ବଂଶ, ପକ୍ବ, ବିଲ୍ବ, ଜ୍ବାଲା
किन्तु आकृति या सीडैक के ओड़िआ युनिकोड फोंट्स में halant+u0b2c टाइप करने पर निम्न संयुक्ताक्षर प्रकट होते हैं। (हालांकि यहाँ मैंने halant+u0b71 ही टाइप किया है क्योंकि इस समूह के सभी/अधिकांश पाठकों के कम्प्यूटरों डिफाल्ट रूप में शायद ओड़िआ का kalinga font ही होगा।
ଶ୍ୱାସ, ଧ୍ୱଂଶ, ପକ୍ୱ, ବିଲ୍ୱ, ଜ୍ୱାଲା

halant+u0b71 या halant+0b35 टाइप करने पर संयुक्ताक्षर नहीं बन पाते, हलन्त युक्त शब्द में प्रकट होते हैं। यथा--

ଶ୍‍ୱାସ


इसी विवाद के कारण युनिकोड ओड़िआ में इण्टरनेट में सामग्री नगण्य-सी ही उपलब्ध होती है।

-- हरिराम

Yashwant Gehlot

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Nov 17, 2011, 3:52:12 AM11/17/11
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मेरे लिए यह मानना कठिन है कि हिंदी के कीबोर्ड में य़ और ऱ का उपयोग शृ (सही ग्लिफ वाला) के उपयोग से अधिक होता है. यह मैं अपने उपयोग के आधार पर कह रहा हूं कि य़ या ऱ के स्थान पर यदि शृ (सही ग्लिफ वाला) होता तो बेहतर होता. विद्वज्जनों की राय इससे भिन्न हो सकती है, मैं उनका सम्मान करता हूं.
 
यशवंत 

2011/11/17 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

narayan prasad

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Nov 17, 2011, 4:16:54 AM11/17/11
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<<यदि शृ (सही ग्लिफ वाला) होता तो बेहतर होता.>>
 
आपकी यह गलतफहमी है कि "शृ" लिखना गलत है । देवनागरी में कई ऐसे वर्ण हैं जो एक से अधिक तरह से लिखे जाते हैं । श तीन तरह से लिखा जाता है ।
---नारायण प्रसाद

2011/11/17 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>

Yashwant Gehlot

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Nov 17, 2011, 8:12:10 AM11/17/11
to technic...@googlegroups.com
'सही ग्लिफ' मैंने किसी अन्य ईमेल से उधार लिया है. हम उसके लिए 'पारंपरिक शृ' या 'प्रचलित शृ' शब्द भी काम में ले सकते हैं.
किसी भी भाषा में किसी वर्ण के एक से अधिक रूप प्रचलित होना कोई ऐसी बात नहीं है जिसका सभी लोग समर्थन करें. अन्य भाषा-भाषियों के लिए यह बात मुश्किलें ही खड़ी करती है.

खैर, मेरा मुद्दा यह नहीं था. मेरा बस यही कहना था कि हिंदी के कीबोर्ड में य़ या ऱ के स्थान पर यदि शृ (पारंपरिक ग्लिफ वाला) होता तो बेहतर होता.

यशवंत

2011/11/17 narayan prasad <hin...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

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Nov 17, 2011, 8:18:29 AM11/17/11
to technic...@googlegroups.com
यशवन्त जी आप अब भी समझ नहीं पाये। दरअसल जिस सही शृ की आप बात कर रहे हैं वह कीबोर्ड से लिखने का मामला नहीं फॉण्ट का मामला है।

संस्कृत २००३ फॉण्ट शृ का सही रूप ही दिखाता है। यह लेख पढ़ें,
http://epandit.shrish.in/327/sanskrit-2003-best-devanagari-unicode-font/
इसमें ऊपर-नीचे मंगल और संस्कृत २००३ में शृ का रूप दिखाया गया है।

आप यहाँ से संस्कृत २००३ डाउनलोड कर इंस्टाल करें। फिर वर्ड में यह फॉण्ट चुनकर पहले श लिखें फिर उस पर ृ (ऋ की मात्रा) लगायें, वह अपने-आप आपके बताये सही रूप में छपेगा।



१७ नवम्बर २०११ २:२२ अपराह्न को, Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com> ने लिखा:
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Anunad Singh

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Nov 17, 2011, 10:23:06 PM11/17/11
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यशवन्त जी,
आप 'शृ' के लिये अलग से कुंजी क्यों चाहते हैं? ऐसे में तो 'कृ' के लिये भी चाहिये, 'वृ' के लिये भी और अन्य के लिये भी। इस प्रकार कोई ३५-३६  अतिरिक्त कुंजियाँ चाहिये।  और यदि यही सभी मात्रों के लिये किया गया तो .... ?

-- अनुनाद




Yashwant Gehlot

unread,
Nov 20, 2011, 6:25:41 AM11/20/11
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(तीन दिन अपने मेलबॉक्स से दूर रहने के बाद)

श्रीश जी,

यदि मैं आपकी बात ठीक-ठीक समझा हूं, तो इसका मतलब यह है कि संस्कृत 2003 फॉण्ट चुनने पर पारंपरिक शृ बन जाएगा और मेरी समस्या दूर हो जाएगी. लेकिन क्या वह पारंपरिक शृ उन लोगों के कम्प्यूटर में भी वैसा ही दिखाई देगा जिनके पास उक्त फॉण्ट नहीं है...

मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है कि भारत सरकार ने इस 'शृ' को मान्यता दी है या नहीं. मेरा यह मानना है कि दोनों में से एक ही स्वरूप का उपयोग होना चाहिए. अन्यथा अनेक लोग भ्रमवश श्रृ का उपयोग भी करते हैं. जिस तरह अब का केवल एक रूप प्रचलित है, वैसा ही कुछ शृ के लिए भी होना चाहिए. और यदि हम पारंपरिक शृ चाहते हैं तो वह या तो बगैर किसी फॉण्ट का चयन किए श और ृ के संयोग से बन जाना चाहिए या उसके लिए कुंजीपटल पर स्थान होना चाहिए.

यशवंत

2011/11/17 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
यशवन्त जी आप अब भी समझ नहीं पाये। दरअसल जिस सही शृ की आप बात कर रहे हैं वह कीबोर्ड से लिखने का मामला नहीं फॉण्ट का मामला है।

Yashwant Gehlot

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Nov 20, 2011, 6:36:42 AM11/20/11
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अनुनाद जी,

आपने बहुत अच्छी बात उठाई. स्वयं मुझे संयुक्ताक्षरों (त्र, ज्ञ, क्ष आदि) के सीधे प्रयोग के बजाए उन्हें मूल वर्णों से बनाने की आदत पड़ गई है. एक लोकेलाइजेशन कम्पनी के सॉफ्टवेयर में संयुक्ताक्षर वाली कुंजियां काम नहीं करती थीं, तो मुझे वैसी ही आदत पड़ गई. लेकिन यही बात नुक्ते वाले य और र पर भी लागू होती है. उन्हें भी नुक्ता लगाकर बनाया जा सकता है. 

यशवंत 

2011/11/18 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Nov 20, 2011, 8:45:54 PM11/20/11
to technic...@googlegroups.com
यशवन्त जी नुक्त युक्त य़, ऱ आदि को अलग कुञ्जियाँ इसलिये दी गयी हैं क्योंकि ये भाषा में एक स्वतन्त्र वर्ण हैं, इसी तरह क्ष, त्र, ज्ञ भी स्वतन्त्र वर्ण हैं (श्र एक अपवाद है जिसे स्वतन्त्र वर्ण न होने पर भी अलग जगह दे दी गयी)। दूसरी ओर शृ आदि स्वतन्त्र वर्ण न होकर व्यञ्जन पर मात्रा लगाकर बने हैं।

२० नवम्बर २०११ ५:०६ अपराह्न को, Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com> ने लिखा:

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Vineet Chaitanya

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Nov 20, 2011, 11:40:55 PM11/20/11
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2011/11/21 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

यशवन्त जी नुक्त युक्त य़, ऱ आदि को अलग कुञ्जियाँ इसलिये दी गयी हैं क्योंकि ये भाषा में एक स्वतन्त्र वर्ण हैं, इसी तरह क्ष, त्र, ज्ञ भी स्वतन्त्र वर्ण हैं (श्र एक अपवाद है जिसे स्वतन्त्र वर्ण न होने पर भी अलग जगह दे दी गयी)। दूसरी ओर शृ आदि स्वतन्त्र वर्ण न होकर व्यञ्जन पर मात्रा लगाकर बने हैं।

   वास्तव में क्ष, त्र और ज्ञ भी  संयुक्ताक्षर ही हैं:

     क्+ष, त्+र, और ज् + ञ

Anunad Singh

unread,
Nov 20, 2011, 11:54:55 PM11/20/11
to technic...@googlegroups.com
वस्तुतः कुंजीपटल का उद्देश्य लिखने की सुविधा देना है। इसमें
कुंजियों पर केवल 'मूल वर्ण' ही रखे जायेंगे ऐसी बंदिश क्यों रहेगी। मान
लीजिये कि किसी कुंजीपटल के डिजाइनर को लगता है कि 'है' शब्द बार-बार
टंकित करना पड़ता है तो वह इसके लिये एक अलग कुंजी प्रदान कर सकता है।
उसका यह निर्णय तर्कपूर्ण और उपयोगी है।

२१-११-११ को, Vineet Chaitanya <v...@iiit.ac.in> ने लिखा:

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Yashwant Gehlot

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Nov 21, 2011, 12:14:55 AM11/21/11
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इस विषय पर चर्चा के लिए मैं सभी सदस्यों का धन्यवाद देते हुए एक आखिरी सवाल पूछना चाहता हूं. क्या इस 'शृ' को केंद्रीय हिंदी निदेशालय या किसी अन्य संस्था ने मान्यता दी है...
यदि मान्यता दी गई है तो इसी शृ का प्रयोग होना चाहिए और पारंपरिक शृ धीरे-धीरे लुप्त हो जाना चाहिए. एक वर्ण का एक ही रूप प्रचलित रहे तो ज़्यादा अच्छा है.
 
यशवंत

Anuradha R.

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Nov 21, 2011, 12:30:48 AM11/21/11
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यह सवाल मेरा भी है, काफी समय से। माना कि देवनागरी में और बाषाएं भी लिखी जाती हैं, लेकिन हिंदी उनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है, कई गुना ज्यादा। ऐसे में पारंपरिक शृ को एक कुंजी दिया जाना सुविधाजनक होगा। ऐसा बदलाव सार्वभौमिक रहे, हर यूनिकोड फॉन्ट में आ जाए तो बात ही क्या है।
-अनुराधा

2011/11/21 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>
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सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित

चंदन कुमार मिश्र

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Nov 21, 2011, 1:39:07 AM11/21/11
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अनुनाद जी का 'है' वाला उदाहरण बहुत पसन्द आया। बढ़िया। धन्यवाद!

चंदन

Anunad Singh

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Nov 21, 2011, 2:10:39 AM11/21/11
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गूगल इंडिक आईएमई तथा कुछ अन्य में  अब ऐसी सुविधा है कि यदि आपके टंकण में कोई शब्द, कोई शब्द-समूह या यहाँ तक कि वाक्य-समूह  बार-बार  आता है तो उसे केवल एक कुंजी दबाकर टंकित किया जा सकता है।

चंदन कुमार मिश्र

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Nov 21, 2011, 2:15:40 AM11/21/11
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गूगल के अलावा और किसमें यह है, बताने का कष्ट करें। मेहरबानी होगी।

--
चंदन कुमार मिश्र

hindibhojpuri.blogspot.com
bhojpurihindi.blogspot.com

Anunad Singh

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Nov 21, 2011, 2:20:15 AM11/21/11
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इस चर्चा में कई बांते मिश्रित हो रहीं हैं-
(१)  कुंजीपटल में कौन से अक्षर कैसे विन्यस्त हों ; 
(२) किन वर्णों को अलग यूनिकोड दिया जाय (और क्या कोड दिया जाय) ;
(३) किस वर्ण का स्क्रीन पर (या छपाई के बाद कागज पर) क्या रूप दिखेगा 
(४) देवनागरी के कुछ अक्षरों के अलग-अलग स्वरूपों में से कौन से मानकृत हैं...

आदि अलग-अलग मुद्दे हैं। ये काफी सीमा तक एक-दूसरे से स्वतंत्र भी हैं।  उदाहरण के लिये 'परम्परागत शृ'  को स्क्रीन पर परम्परागत रूप में दिखाने के लिये जरूरी नहीं है कि इसके लिये एक  अलग 'कोड' हो ही।

-- अनुनाद

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२१ नवम्बर २०११ ११:०० पूर्वाह्न को, Anuradha R. <ranur...@gmail.com> ने लिखा:

Anunad Singh

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Nov 21, 2011, 2:23:57 AM11/21/11
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अभी मुझे केवल गूगल की याद आ रही है। किन्तु सॉफ्तवेयर की द्Rष्टि से यह बहुत आसान काम है। छोटे-मोटे  एडितरों में भी यह सुविधा दी जा सकती है।
-- अनुनाद

२१ नवम्बर २०११ १२:४५ अपराह्न को, चंदन कुमार मिश्र <hindiaur...@gmail.com> ने लिखा:

Anunad Singh

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Nov 21, 2011, 4:04:39 AM11/21/11