[technical-hindi] 'रजिस्टर' - अर्थात् जितने लोग उतनी भाषाएँ !

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Anunad Singh

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May 20, 2010, 1:08:21 AM5/20/10
to technic...@googlegroups.com
कविता जी,

आपका ये 'रजिस्टर' मेरी समझ में नहीं आया इसलिये प्रतिक्रिया देने में भी देरी हो गयी। पहले स्कूलों का हाजिरी वाला रजिस्टर दिमाग में आया ; फिर सोचा कहीं  माइक्रोप्रोसेसर/माइक्रोकन्ट्रोलर/डीएसपी आदि  के सन्दर्भ में प्रयुक्त  'रजिस्टर' तो नहीं है। अन्त में खोजते-खोजते पता चला कि समाजिक-भाषाविज्ञान में भी 'रजिस्टर' है। क्या भाषाविज्ञान के सन्दर्भ में हिन्दी में इसे 'शब्दचयन' या कुछ और सार्थक नाम दिया जा सकता  है?

मुझे लगता है कि वस्तुत: सारा अर्थ  इस 'रजिस्टर' के  सातत्य और अनन्तता में ही निहित है।  जिस तरह आम जनता को और छोटी कक्षा के विद्यार्थिओं को सरलीकृत करके बताया जाता है कि सूर्य के प्रकाश में सात रंग हैं किन्तु आगे बताया जाता है कि  सूर्य के प्रकश में अनन्त रंग हैं ; यह एक सतत वर्णक्रम (कांटिनुअस स्पेक्ट्रम) है - यही हाल भाषा का भी है। भोपाल से मुम्बई जाते समय किस स्थान पर हिन्दी से मराठी हो गयी कौन कह सकता है? कभी यह झगड़ा हुआ था कि ओड़िया स्वतन्त्र भषा नहीं , बंग्ला ही है।

किन्तु शब्दावली तो 'कृत्रिम'  रूप से बनायी गयी वस्तु है। यह किसी समुदाय विशेष (जैसे विधि क्षेत्र में कार्य करने वालों) को लक्ष्य करके बनायी जाती है और एक तरह का मानकीकरण है। मानकीकरण का उद्देश्य ही यह है कि एक व्यक्ति जिस बात को कहना चाहता है, दूसरा उसको वही समझे।  कानून विशेषज्ञों के लिये बनी शब्दावली जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक और इंजीनियर भी समझें। इसी प्रकार वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली किसी साहित्यकार को समझ ही आ जाय, अपेक्षित ही नहीं है।  'तनाव'  का अर्थ  साहित्यकार कुछ समझता है; मनोवैज्ञानिक कुछ और समझता है; भौतिकविद कुछ और तथा आम जनता  कुछ और।

-- अनुनाद सिंह

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१९ मई २०१० ३:४० PM को, Dr. Kavita Vachaknavee <kavita.va...@gmail.com> ने लिखा:
धन्यवाद, रामविलासशर्मा  जी लिखित  इस सामग्री को अग्रेषित करने के लिए।

मैं जितना हिन्दी में नए शब्दों के निर्माण और पुनर्रचना की पक्षधर हूँ उस से कहीं कम इस बात की नहीं कि चुन चुन कर सामान्य दैनंदिन प्रयोग के शब्दों को खींच खींच कर बाहर न निकाला जाए। 

रामविलास जी ने जितने उदाहरण दिए हैं वे पारिभाषिक शब्दों और लगभग भाषा के एक विशिष्ट प्रयुक्ति ( रजिस्टर) से सम्बन्द्ध  हैं। ये प्रयुक्तियाँ तो वैसी क्लिष्ट होनी ही हैं जैसी किसी के लिए अरबी फ़ारसी के किसी भी क्षेत्र की प्रयुक्ति। प्रयुक्ति की तुलना प्रयुक्ति से ही की जानी चाहिए। न कि भाषा के किसी एक रजिस्टर को उठा उसकी प्रयुक्तियों की तुलना दूसरी कम प्रचलित प्रयुक्तियों से की जाए।

शब्द ग्रहण की प्रवृत्ति भाषा की सहज स्वाभाविक व अबाध है, इसके लिए नीति नियन्ताओं को बैठकर शब्दों को लेने के लिए चुनना  ( या  निकाल फेंकने के लिए चुनना ) जितना अ - कारगर हास्यास्पद है उतना ही या उस से अधिक ही यह आवश्यक है कि इस चयन और ग्रहण की नीति के गूढ़ार्थ को भी समझें। संविधान में इसके लिए भी प्रावधान है कि हिन्दी के लिए शब्द ग्रहण कहाँ से कितना करना है। मुख्य रूप से संस्कृत और उसके साथ बोली भाषी क्षेत्रों/ अन्य भाषा क्षेत्रों ( भारतीय भाषा) से मुख्यत: शब्द ग्रहण / निर्माण की नीति तय की गई है। 

हाँ, यह भी सच है कि सामान्य बोलचाल व प्रयोग से अरबी/ फ़ारसी/ उर्दू के शब्दों को चुन चुन कर निकालना भी हास्यास्पद है। कोई भी व्यक्ति भाषा के प्रौढ़ प्रयोक्ता के रूप में ढलते हुए अपने साथ अपने परिवेश की भाषा का संस्कार लेकर ढलता है। मेरे जैसा कोई व्यक्ति जो पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों से आया है, और ऐसे माता-पिता की सन्तान है जिनका अध्ययन अध्यापन फ़ारसी के युग में उस परिवेश में हुआ, उसके दैनन्दिन उपयोग के शब्दों में कई शब्द अरबी फ़ारसी के होंगे। .... किन्तु हमने अपने शैक्षिक संस्कारों से उस भाषाई संस्कार का परिमार्जन भी किया।  मुझे यह कतई सहन न होगा कि मेरे शब्दों से कोई चुन चुन कर यह मीमांसा करने बैठे कि अमुक शब्द उर्दू का क्यों बोला और अमुक क्यों नहीं किन्तु मैं इसे भी सहर्ष स्वीकारूँगी ( और मैंने स्वयं किया भी) कि हिन्दी के ( संस्कृत व बोलियों के सहयोग से बने ) शब्दों के प्रचलन व प्रयोग को इतना सुगम कर दो कि स्वयं ही स्थानापन्न हो जाएँ। आज मेरे बच्चे विदेश में रहते हुए भी सामान्य बोलचाल तक में छुटपन से  ‘बाथरूम’ के स्थान पर ‘स्नानघर’ ही बोलते हैं, ‘बुक’ या ‘किताब’ तो दूर ‘पुस्तक’ ही बोलते हैं, ‘पार्क’ तो दूर ‘उद्यान’ ही बोलते हैं। .... क्योंकि उनके भाषाई संस्कार में हमने यही शब्द रोपे और उनके लिए इनके अतिरिक्त दूसरा शब्द प्रयोग करना मानो शब्द को आरोपित करना है, जबकि तीनों बच्चे युवा हैं और ३-३ ४-४ भाषाओं में पारंगत हैं। रोचक तो यह  है कि वे कई बार मेरी हँसी उड़ा देते हैं ( जैसे अभी ३-४ दिन पूर्व मैंने बेटे से बात करते हुए  ‘ऑफ़कोर्स’ कह दिया तो बेटे ने कहा ’आपने यह क्यों बोला’; मैंने कहा  - "तो  क्या ‘निस्सन्देह’ बोलती, कितना अजब लगता है आपसी बोलचाल में ‘निस्सन्देह’ बोलना"   तो वह तपाक से बोला   -  "क्यों, आप केवल ‘तो और क्या’ कह सकती थीं ना, उस से भी तो यह बात पूरी हो जाती है"।

तो कुल मिला कर मेरा मानना है कि भाषा में ग्रहण और त्याग ( दोनों स्थितियों में) का विवेक रखने वाले लोगों की आवश्यकता है, ऐसे लोगों की नहीं जो भाषा को धर्म के डंडे से हाँकना चाहते हैं ( जैसे हमारे हिन्दी-भारत समूह में एक दो ऐसे अतिवादी लोग हैं जो हिन्दी को हिन्दुत्व की भाषा बनाकर उसकी हत्या के पीछे पड़े हैं और सामान्य जन की तो क्या प्रभु जोशी जी जैसे भाषा चिन्तक की उत्कृष्ट भाषा तक में से भी चुन चुन कर शब्दों को स्थानपन्न करने का दुराग्रह करते है। 

दूसरी ओर,
 रामविलास जी जैसे प्रखर मेधा सम्पन्न भाषा-चिन्तक ने जितना कार्य हिन्दी का/ के लिए किया वह अनुपमेय है, ऐसे में उनकी इन बातों और तर्कों का बड़ा अर्थ है, (या आप जो कार्य भाषा के लिए कर रहे हैं उसका बड़ा अर्थ है) ; किन्तु कोई अंग्रेजी / उर्दू का पक्षधर इस तर्क का आश्रय लेकर इन भाषाओं के शब्दों को बोलचाल और साहित्य में नहीं अपितु विभिन्न भाषाई प्रयुक्तियों ( जैसे पत्रकारिता का रजिस्टर या अन्य) में धड़ल्ले से घुसेड़ने का  शातिर अधिकार सीना ठोंक कर लेना चाहते हैं तो उनके शमन के लिए ( शुद्धतावादी रवैया तो उसे मैं नहीं कहूँगी) सतर्क और सचेष्ट होना ही होगा, इस से न आप ( व न ही रामविलास जी होते तो वे  ) असहमत होते।

अन्यथा तो  आप की व हमारी चिन्ताएँ तो सम्यक् और समान ही हैं और दोनों  ओर की  निष्ठा असंदिग्ध है। किसी को उस पर सन्देह नहीं करना चाहिए। न ही परस्पर कोई विरोध है, न  हम मानें / पालें।

सरकारी पारिभाषिक शब्दावली में कई कठिनाइयाँ, दुरूहताएँ व प्रयोग अक्षमताएँ हैं. होंगी पुनरपि उनका महत्व व प्रासंगिकता निस्सन्देह है। उसे नकारने की पक्षधर मैं नहीं हूँ। इनमें भी त्याग और ग्रहण के विवेक का प्रयोग प्रयोक्ता को लेकर चलना पड़ेगा 

सधन्यवाद।

सादर स‍द्‍भाव सहित

- कविता वाचक्नवी
http://www.google.com/profiles/kavita.vachaknavee


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अजित वडनेरकर

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May 20, 2010, 1:48:35 AM5/20/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनादजी,
आपकी यह प्रतिक्रिया बहुत दिलचस्प और सरल है। प्रस्तुत चर्चा के संदर्भ में सबसे अच्छी प्रतिक्रिया।
मैं लाभान्वित हुआ हूं।
शुक्रिया।

2010/5/20 Anunad Singh <anu...@gmail.com>



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शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/
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Dr. Kavita Vachaknavee

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May 20, 2010, 5:22:08 AM5/20/10
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अनुनाद जी, 

आपका सन्देश कुछ यों है कि  आपकी बात और टिप्पणी मानो गौण हो रही है `रजिस्टर'  पर टिप्पणी के प्राधान्य में| 

यदि आप /हम / कोई और  `तकनीकी' हिन्दी  समूह/वर्ग/ कमेटी आदि से जुड़े हों और  पारिभाषिक शब्दों के निर्माण की प्रक्रिया, औचित्य और चयन पर बात कर रहे हों तो   "रजिस्टर"  (पारिभाषिक शब्द) या हिन्दी में  "प्रयुक्ति" (पारिभाषिक शब्द) शब्द हमें असम्प्रेषणीय  लगता हो तो क्या ही कहा जाए। ऐसी आपत्ति भाषा का बी.ए का विद्यार्थी भी नहीं करेगा । यदि मैं शब्द निर्माण की प्रक्रिया पर भाषा विद् समुदाय में बात करूगी तो इन शब्दों के प्रयोग पर मुझे स्पष्टीकरण देने का औचित्य दिखाई नहीं देता। यदि मैं रेलगाड़ी में, मोहल्ले में किसी से यही बात करूँगी तो इसे दूसरी तरह समझा कर करूँगी ताकि उन्हें पहले बता दिया जाए कि रजिस्टर/ प्रयुक्ति कहते किसे हैं (कि भाषा में प्रत्येक प्रयोग क्षेत्र के लिए अपनी शब्दावली होती है,  जैसे - "सोना लुढ़का चाँदी तेज"  "बाजार नरम" आदि हजारों हजार शब्दों  के अपने अपने विशिष्ट अर्थ व  सन्दर्भ होते हैं ... आदि आदि....आदि।

इसलिए यह भी वैसा ही है कि शब्द निर्माण की प्रक्रिया पर बात करने का भी भाषा का अपना एक रजिस्टर है/ होता है। मैं यह मान कर चल रही थी कि जो लोग इसमें हस्तक्षेप/ अधिकार रख रहे हैं वे तो निश्चित रूप से अधिकारी होंगे ही। अस्तु।

अब मुझे सन्देश और प्रति सन्देश के उत्तर में इतना भर कहना और है कि शब्द निर्माण की प्रक्रिया पर बात करते हुए हम कम से कम अपने आप में तो स्पष्ट हों कि हम बात पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण और प्रक्रिया की कर रहे हैं या बोलचाल की भाषा और अभिव्यक्तियों की। शब्दावली का अर्थ व अभिप्राय आपने स्वयं लिखा ही है। पारिभाषिक शब्द का प्रयोग वर्ग विशेष/ सन्दर्भ विशेष/ विषय विशेष/ प्रयोजन विशेष आदि में ही किया जाता है और इनके उपयोग और निर्माण का औचित्य व अर्थ ही यह है कि सम्प्रेषण सटीक व तुरत हो न कि हर बार अपनी बात कहने के लिए व्यक्ति पहले उसकी पूर्वपीठिका दे। 

वैसे क्या आपको नहीं लगता कि बात को अब पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण के औचित्य पर ला खड़ा किया गया है ?

तो मेरा बस इतना सा निवेदन है कि इस पर प्रत्येक भाषा के, प्रत्येक पीढ़ी के प्रत्येक तत् तत् सम्बन्धी विद्वान ने हम से अधिक व बेहतर ही सोचा होगा तभी तो पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग विश्व की प्रत्येक भाषा में होता है; और तो और अब तो पूरी की पूरी संकल्पना और फ़ार्मूला  को अभिव्यक्त करने के लिए पारिभाषिक शब्द ही नहीं अपितु अक्षरों आदि मात्र से बने सूत्र प्रयोग होते आ रहे हैं। मैथेमैटिकल मॉडलिंग  वालों के पास जाकर देखिए जरा। और हम लोग अभी पारिभाषिक शब्दों की आवश्यकता और औचित्य में अटके हैं।

 किसी अन्य भाषा में भाषा के लोगों का  कदापि हस्तक्षेप नहीं होता है इस शब्दावली के निर्माण में। भाषा वाले होते कौन हैं तत् तत् सम्बन्धी प्रयुक्तियों को पारित करने वाले। यह तो हिन्दी का दुर्भाग्य है कि यहाँ का कथित पढ़ालिखा वर्ग क्योंकि किसी अन्य भाषा से दीक्षित होकर आता है अत: उसके लिए स्थानापन्न हो सकने वाले वाले शब्द हिन्दी में गढ़ने की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियाँ खड़ी हुईं/ हो रही हैं। ाउर शब्द गढ़ने का कार्य शब्दों के वेत्ताओं को दिया गया। निवेदन है कि भाषा के वेत्ताओं को। विज्ञान के या अर्थशास्त्र या किसी भी अन्य ज्ञानशाखा का क ख ग न जानने वाला और फिर न भाषा का भी अधिकारी भला कैसे किसी संकल्पना को अभिहित कर सकता है। है न, हास्यास्पद बात। पर हिन्दी में यह भी होता है, हो रहा है। हा हन्त !!

इस लिए इन दोनों अर्थों में मुझे यह बहस बेमानी और निरर्थक प्रतीत हो रही है। ( बोलचाल और प्रयोजनमूलक भाषा क्षेत्रो को मिलाने के अर्थ में भी और शब्दावली के औचित्य के निर्णायक हो जाने के अर्थ में भी )

यदि मेरे शब्दों से किसी को कष्ट पहुँचे तो क्षमा चाहूँगी। किसी के प्रति व्यक्तिगत अर्थों में इन भावनाओं को न लिया जाए।

सादर
- कविता वाचक्नवी
http://www.google.com/profiles/kavita.vachaknavee


2010/5/20 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
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Anunad Singh

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May 20, 2010, 5:31:28 AM5/20/10
to technic...@googlegroups.com
कविता जी,
मेरे संदेश का प्रथम अनुच्छेद तो बस मजाक की दृष्टि से लिखा गया था।

-- अनुनाद सिंह

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२० मई २०१० २:५२ PM को, Dr. Kavita Vachaknavee <kavita.va...@gmail.com> ने लिखा:
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