१९ मई २०१० ३:४० PM को, Dr. Kavita Vachaknavee
धन्यवाद, रामविलासशर्मा जी लिखित इस सामग्री को अग्रेषित करने के लिए।
मैं जितना हिन्दी में नए शब्दों के निर्माण और पुनर्रचना की पक्षधर हूँ उस से कहीं कम इस बात की नहीं कि चुन चुन कर सामान्य दैनंदिन प्रयोग के शब्दों को खींच खींच कर बाहर न निकाला जाए।
रामविलास जी ने जितने उदाहरण दिए हैं वे पारिभाषिक शब्दों और लगभग भाषा के एक विशिष्ट प्रयुक्ति ( रजिस्टर) से सम्बन्द्ध हैं। ये प्रयुक्तियाँ तो वैसी क्लिष्ट होनी ही हैं जैसी किसी के लिए अरबी फ़ारसी के किसी भी क्षेत्र की प्रयुक्ति। प्रयुक्ति की तुलना प्रयुक्ति से ही की जानी चाहिए। न कि भाषा के किसी एक रजिस्टर को उठा उसकी प्रयुक्तियों की तुलना दूसरी कम प्रचलित प्रयुक्तियों से की जाए।
शब्द ग्रहण की प्रवृत्ति भाषा की सहज स्वाभाविक व अबाध है, इसके लिए नीति नियन्ताओं को बैठकर शब्दों को लेने के लिए चुनना ( या निकाल फेंकने के लिए चुनना ) जितना अ - कारगर हास्यास्पद है उतना ही या उस से अधिक ही यह आवश्यक है कि इस चयन और ग्रहण की नीति के गूढ़ार्थ को भी समझें। संविधान में इसके लिए भी प्रावधान है कि हिन्दी के लिए शब्द ग्रहण कहाँ से कितना करना है। मुख्य रूप से संस्कृत और उसके साथ बोली भाषी क्षेत्रों/ अन्य भाषा क्षेत्रों ( भारतीय भाषा) से मुख्यत: शब्द ग्रहण / निर्माण की नीति तय की गई है।
हाँ, यह भी सच है कि सामान्य बोलचाल व प्रयोग से अरबी/ फ़ारसी/ उर्दू के शब्दों को चुन चुन कर निकालना भी हास्यास्पद है। कोई भी व्यक्ति भाषा के प्रौढ़ प्रयोक्ता के रूप में ढलते हुए अपने साथ अपने परिवेश की भाषा का संस्कार लेकर ढलता है। मेरे जैसा कोई व्यक्ति जो पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों से आया है, और ऐसे माता-पिता की सन्तान है जिनका अध्ययन अध्यापन फ़ारसी के युग में उस परिवेश में हुआ, उसके दैनन्दिन उपयोग के शब्दों में कई शब्द अरबी फ़ारसी के होंगे। .... किन्तु हमने अपने शैक्षिक संस्कारों से उस भाषाई संस्कार का परिमार्जन भी किया। मुझे यह कतई सहन न होगा कि मेरे शब्दों से कोई चुन चुन कर यह मीमांसा करने बैठे कि अमुक शब्द उर्दू का क्यों बोला और अमुक क्यों नहीं किन्तु मैं इसे भी सहर्ष स्वीकारूँगी ( और मैंने स्वयं किया भी) कि हिन्दी के ( संस्कृत व बोलियों के सहयोग से बने ) शब्दों के प्रचलन व प्रयोग को इतना सुगम कर दो कि स्वयं ही स्थानापन्न हो जाएँ। आज मेरे बच्चे विदेश में रहते हुए भी सामान्य बोलचाल तक में छुटपन से ‘बाथरूम’ के स्थान पर ‘स्नानघर’ ही बोलते हैं, ‘बुक’ या ‘किताब’ तो दूर ‘पुस्तक’ ही बोलते हैं, ‘पार्क’ तो दूर ‘उद्यान’ ही बोलते हैं। .... क्योंकि उनके भाषाई संस्कार में हमने यही शब्द रोपे और उनके लिए इनके अतिरिक्त दूसरा शब्द प्रयोग करना मानो शब्द को आरोपित करना है, जबकि तीनों बच्चे युवा हैं और ३-३ ४-४ भाषाओं में पारंगत हैं। रोचक तो यह है कि वे कई बार मेरी हँसी उड़ा देते हैं ( जैसे अभी ३-४ दिन पूर्व मैंने बेटे से बात करते हुए ‘ऑफ़कोर्स’ कह दिया तो बेटे ने कहा ’आपने यह क्यों बोला’; मैंने कहा - "तो क्या ‘निस्सन्देह’ बोलती, कितना अजब लगता है आपसी बोलचाल में ‘निस्सन्देह’ बोलना" तो वह तपाक से बोला - "क्यों, आप केवल ‘तो और क्या’ कह सकती थीं ना, उस से भी तो यह बात पूरी हो जाती है"।
तो कुल मिला कर मेरा मानना है कि भाषा में ग्रहण और त्याग ( दोनों स्थितियों में) का विवेक रखने वाले लोगों की आवश्यकता है, ऐसे लोगों की नहीं जो भाषा को धर्म के डंडे से हाँकना चाहते हैं ( जैसे हमारे हिन्दी-भारत समूह में एक दो ऐसे अतिवादी लोग हैं जो हिन्दी को हिन्दुत्व की भाषा बनाकर उसकी हत्या के पीछे पड़े हैं और सामान्य जन की तो क्या प्रभु जोशी जी जैसे भाषा चिन्तक की उत्कृष्ट भाषा तक में से भी चुन चुन कर शब्दों को स्थानपन्न करने का दुराग्रह करते है।
दूसरी ओर,
रामविलास जी जैसे प्रखर मेधा सम्पन्न भाषा-चिन्तक ने जितना कार्य हिन्दी का/ के लिए किया वह अनुपमेय है, ऐसे में उनकी इन बातों और तर्कों का बड़ा अर्थ है, (या आप जो कार्य भाषा के लिए कर रहे हैं उसका बड़ा अर्थ है) ; किन्तु कोई अंग्रेजी / उर्दू का पक्षधर इस तर्क का आश्रय लेकर इन भाषाओं के शब्दों को बोलचाल और साहित्य में नहीं अपितु विभिन्न भाषाई प्रयुक्तियों ( जैसे पत्रकारिता का रजिस्टर या अन्य) में धड़ल्ले से घुसेड़ने का शातिर अधिकार सीना ठोंक कर लेना चाहते हैं तो उनके शमन के लिए ( शुद्धतावादी रवैया तो उसे मैं नहीं कहूँगी) सतर्क और सचेष्ट होना ही होगा, इस से न आप ( व न ही रामविलास जी होते तो वे

) असहमत होते।
अन्यथा तो आप की व हमारी चिन्ताएँ तो सम्यक् और समान ही हैं और दोनों ओर की निष्ठा असंदिग्ध है। किसी को उस पर सन्देह नहीं करना चाहिए। न ही परस्पर कोई विरोध है, न हम मानें / पालें।
सरकारी पारिभाषिक शब्दावली में कई कठिनाइयाँ, दुरूहताएँ व प्रयोग अक्षमताएँ हैं. होंगी पुनरपि उनका महत्व व प्रासंगिकता निस्सन्देह है। उसे नकारने की पक्षधर मैं नहीं हूँ। इनमें भी त्याग और ग्रहण के विवेक का प्रयोग प्रयोक्ता को लेकर चलना पड़ेगा

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सधन्यवाद।
सादर सद्भाव सहित