आधे र के विविध रूप

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V S Rawat

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Dec 29, 2012, 12:27:15 AM12/29/12
to th
द्र में एक र लगता है, ट्र में एक दूसरा र लगता है, श्री में एक और र लगता है, र्य में एक और र लगता है और यह वाला र तो सारे हलन्त संयुक्ताक्षरों के पीछे ले जाया जाता है और यह तो इ ई की मात्रा जैसा दिखता है।
मानकीकरण में आधे र के इन विविध रूपों के लिए भी कुछ करना चाहिए था।
 
मेरा मानना एक ही अक्षर को कई तरह से लिखने का प्रावधान होना ही नहीं चाहिए। इससे भाषा को नया सीखने वाले के लिए वो नया अक्षर हो जाता है, जिससे  उस छात्र के लिए भाषा के वर्णों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।
 
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रावत

Anunad Singh

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Dec 29, 2012, 1:40:47 AM12/29/12
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मुझे लगता है कि 'र' के साथ संयुक्ताक्षर बनाने की समस्या और संयुक्ताक्षरों पर छोटी इ की मात्रा की समस्या  'बिल्कुल एक ही सम्स्या' हैं और इन पर सदियों तक विचार किया गया होगा।

कैसे? मान लीजिए कि छोटी इ को अक्षर के पहले लगाने का निर्णय ले लिया गया है। अब सुझाए जा रहे ढंग से 'प्लिन्थ' लिखने की कोशिश करें - 'बिना डण्डी-युक्त प' फिर ' ि' फिर 'ल'  आदि। इसमें बिना डंडी-युक्त प ,  ि के साथ  मिलकर 'प' जैसा दिख सकती है और  'प्लिन्थ' को  'पलन्थ' पढ़े जाने का भय है।  इसी का हल निकाला गया होगा कि छोटी इ को 'आधे प' के पहले स्थानान्तरित कर दिया जाय।

यही बात र के लिए भी है।  'र' की आकृति डंडी से बहुत साम्य रखती है। कहने की जरूरत नहीं कि देवनागरी के अधिकांश वर्ण 'डंडी वाले' हैं (ख, ग, घ, च ...) . इनकी डण्डी हटाकर अर्धाक्षर बनाए जाते हैं।  अब 'प्रचार' शब्द को 'सीधे तरीके से' लिखने की कोशिश करें।  'डंडी-रहित प' + र + चार  । यहाँ डंडी-रहित प और र मिलकर 'प' जैसा दिख सकते हैं और 'प्रचार' , 'पचार' बन जायेगा।

इसी तरह विचार करें तो  'कर्म' = क + र् + म  में  क और आधा र मिलकर 'का' जैसा दिख सकते हैं और परिणामतः 'कर्म' के 'काम' बन जाने का डर है।

-- अनुनाद

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29 दिसम्बर 2012 10:57 am को, V S Rawat <vsr...@gmail.com> ने लिखा:

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Hariraam

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Dec 29, 2012, 2:07:11 AM12/29/12
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प्र, क्र, ख्र, ग्र, त्र स्र को स्पष्ट रूप से लिखें तो यों होना चाहिए था--

प्‍र क्‍र ख्‍र ग्‍र त्‍र स्‍र


2012/12/29 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

Hariraam

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Dec 29, 2012, 2:23:55 AM12/29/12
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2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>
Capture.PNG

V S Rawat

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Dec 29, 2012, 2:35:54 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
एकदम सही।
 
कितना स्पष्ट लग रहा है। कोई दुविधा, भ्रम, संदेह नहीं।
ऐसा ही मानकीकरण किया जाना चाहिए।
 
रावत

2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>

--
 
 

V S Rawat

unread,
Dec 29, 2012, 4:43:54 AM12/29/12
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ट्र ढ्र ड्र आदि में र की क्र द्र वाली एक डंडी को किसी वजह से दो डंडियाँ बना दिया जाता है।
 
ऐसा क्यों किया गया यह मेरी समझ में नहीं आया, अगर इनमें भी र की एक ही डंडी रखते तो क्या गड़बड़ हो रही थी?

यदि किसी को पता हो तो कृपया बताएँ।

रावत

 
2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>


--
 
 

ePandit | ई-पण्डित

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Dec 29, 2012, 6:08:31 AM12/29/12
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एक कदम और आगे बढ़ें तो आपका वह सुझाव याद आ रहा है कि हिन्दी को कुछ इस रूप मे ंलिखें।

प्रचार = प् र् अ च् आ र् अ

कुछ इस तरह जैसे विण्डोज ९८ (या बिना हिन्दी स्क्रिप्ट प्रोसैसिंग समर्थन वाले किसी और ओऍस) में हिन्दी फॉण्ट डालने पर हिन्दी दिखती थी। यह तो रोमनागरी पढ़ने जैसा ही दुर्गम हो जायेगा।

29 दिसम्बर 2012 12:37 pm को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
--
 
 



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/

Vinod Sharma

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Dec 29, 2012, 6:12:49 AM12/29/12
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मैंने पठन की इसी दुरूहता की ओर इशारा किया था।
इस प्रकार की हिंदी को पढ़ना बहुत ही मुश्किल होगा।

2012/12/29 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

--
 
 



--
सादर,
विनोद शर्मा

Pk Sharma

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Dec 29, 2012, 6:40:36 AM12/29/12
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2012/12/29 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
एक कदम और आगे बढ़ें तो आपका वह सुझाव याद आ रहा है कि हिन्दी को कुछ इस रूप मे ंलिखें।

प्रचार = प् र् अ च् आ र् अ

कुछ इस तरह जैसे विण्डोज ९८ (या बिना हिन्दी स्क्रिप्ट प्रोसैसिंग समर्थन वाले किसी और ओऍस) में हिन्दी फॉण्ट डालने पर हिन्दी दिखती थी। यह तो रोमनागरी पढ़ने जैसा ही दुर्गम हो जायेगा।



अरे वाह !
हमारे विद्वानों ने तो यह विधि बना ही रखी है !!
बस हर व्यञ्जन के नीचे के हल् को हटाने से ही काम बन जायेगा !!!
टंकित शैली ईतनी बुरी भी नहीं दिखती - अपितु सुन्दर ही दिखती है   :-)

देखें  ;

परअचआर
p r a c a r             (c=च)

बस आदत डालनी होगे

\ r / r     (आशुलिपि) में तो अधिक विचित्र लगता है !

 

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Dec 29, 2012, 6:50:21 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
नहीं शर्मा जी हलन्त नहीं हटा सकते, फिर आधे-पूरे का भेद कैसे करेंगे। 'पआ' है या 'पा' है कैसे पता चलेगा।

29 दिसम्बर 2012 5:10 pm को, Pk Sharma <pksharm...@gmail.com> ने लिखा:

--
 
 

Vineet Chaitanya

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Dec 29, 2012, 7:00:19 AM12/29/12
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यदि हल्-चिह्न हटाना ही हो तो शिरोरेखा भी साथ में हटानी चाहिये जिससे कि कोई
भ्रान्ति न हो! यह एक विकल्प हो सकता है जिसका कुछ परिस्थितियों में प्रयोग किया जा सकता है, एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन कम्प्यूटर पर तो आसानी से हो ही सकेगा.
2012/12/29 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
नहीं शर्मा जी हलन्त नहीं हटा सकते, फिर आधे-पूरे का भेद कैसे करेंगे। 'पआ' है या 'पा' है कैसे पता चलेगा।

29 दिसम्बर 2012 5:10 pm को, Pk Sharma <pksharm...@gmail.com> ने लिखा:



2012/12/29 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
एक कदम और आगे बढ़ें तो आपका वह सुझाव याद आ रहा है कि हिन्दी को कुछ इस रूप मे ंलिखें।

प्रचार = प् र् अ च् आ र् अ

कुछ इस तरह जैसे विण्डोज ९८ (या बिना हिन्दी स्क्रिप्ट प्रोसैसिंग समर्थन वाले किसी और ओऍस) में हिन्दी फॉण्ट डालने पर हिन्दी दिखती थी। यह तो रोमनागरी पढ़ने जैसा ही दुर्गम हो जायेगा।



अरे वाह !
हमारे विद्वानों ने तो यह विधि बना ही रखी है !!
बस हर व्यञ्जन के नीचे के हल् को हटाने से ही काम बन जायेगा !!!
टंकित शैली ईतनी बुरी भी नहीं दिखती - अपितु सुन्दर ही दिखती है   :-)

देखें  ;

परअचआर
p r a c a r             (c=च)

बस आदत डालनी होगे

\ r / r     (आशुलिपि) में तो अधिक विचित्र लगता है !

 

--
 
 



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
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Pk Sharma

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Dec 29, 2012, 7:16:20 AM12/29/12
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इंग्लिश की तरह  pa(प=पअ)     pA (पा=पआ)

पर = पअरअ       = para
पार = पआरअ     = pAra or paara
प्यार = पयआरअ =pyAra or pyaara

sure is a bit wierd ;-)


2012/12/29 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
नहीं शर्मा जी हलन्त नहीं हटा सकते, फिर आधे-पूरे का भेद कैसे करेंगे। 'पआ' है या 'पा' है कैसे पता चलेगा।


Hariraam

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Dec 29, 2012, 7:23:12 AM12/29/12
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श्रीश जी,
 
'दुर्गम' नहीं बल्कि 'ज्या-सुगम' होगा...
 
क्योंकि यह केवल कम्प्यूटर की आन्तरिक प्रोसेसिंग हेतु तथा तीव्र इनपुट (डैटा एंट्री) के लिए है... रेण्डरिंग तो वर्तमान परम्परागत रूप में जैसे होती है, वैसे ही होगी...
 
विण्डोज ९८ (या बिना हिन्दी स्क्रिप्ट प्रोसैसिंग समर्थन वाले किसी और ओऍस) में हिन्दी फॉण्ट डालने पर हिन्दी वर्तमान एनकोडिंग में ऐसे दिखती है--
 
प ् र च ा र, स ् म ि त ा = प्रचार, स्मिता
 
इससे तो बेहतर होता. यदि आन्तरिक रूप में यों प्रोसेसिंग होती-- (यदि हलन्त युक्त वर्ण का एक युनिकोड कोड होता, जबकि वर्तमान दो कोड होते हैं)
(आधे अक्षर के लिए दो कोड, पूरे अक्षर के लिए एक कोड -- क्या यह विज्ञान व गणित सम्मत है?)
 
प् र् अ च् आ र् अ, स् म् इ त् आ
p r a  C A  r  a,  s  m  i  t  A

कम से कम हिन्दी अंग्रेजी दोनों में वर्णो (BYTES) की संख्या तो लगभग एक समान होती। 
FIELD SIZE का आकलन सरल व स्पष्ट होने पर डैटाबेस कार्य तो हिन्दी में सरलता से हो रहे होते...
एसएमएस आदि तत्काल हो रहे होते हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में...
 
रेलवे रिजर्वेशन, हवाई टिकट, बैंकिंग, जनगणना, भूमि पट्टे आदि के डैटाबेस प्रोसेसिंग हेतु डैटा एंट्री में मूलतः हिन्दी व भारतीय भाषाओं में तो सरलता से हो पाती...
 
आज मजबूरन् आम जनता को हिन्दी के पाठ भी अंग्रेजी (बेसिक लेटिन लिपि) में टंकित करके भेजने पड़ रहे हैं, हिन्दी का प्रयोग कम होता जा रहा है वह तो नहीं हो होता...
 
आपरेटिंग सीस्टम्स का रेण्डरिंग इंजन जैसे वर्तमान "प ् र च ा र" को "प्रचार" में बदलकर दिखाता है,
उससे सरल तरीके से सिर्फ ओपेन टाइप फोंट की ग्लीफ रिप्लेसमेंट कमांड "प् र् अ च् आ र् अ" को भी "प्रचार" में बदलकर दिखाता... Uniscribe आदि की कोई जरूरत ही नहीं होती...
 
वर्तमान ओपेन टाइप फोंट में जटिल तर्क "स+्+म+ि' को 'स्मि' में बदल कर प्रकट नहीं कर पाता, आपरेटिंग सीस्टम् के रेण्डरिंग इंजन का सपोर्ट लेना पड़ता है।
सरल प्रणाली में केवल ओपेन टाइप फोंट में ही यह तर्क अधिक तेजी से 'स्+म्+इ' को "स्मि" रूप में प्रकट करता... OS के USP की कोई जरूरत ही नहीं होती।
 
दोनों प्रणाली में फर्क सिर्फ इतना ही है कि ...
 
--- अभी वर्तमान प्रणाली में 'क' आदि व्यञ्जनों में से 'अ' स्वर को घटाने(MINUS) के लिए हलन्त जोड़ कर संयुक्ताक्षर बनाने पड़ते हैं, और अन्य स्वरों की मात्राएँ सीधे जोड़नी पड़ती है, अर्थात् अन्दरुनी प्रोसेसिंग के लिए UNISCRIBE आदि इंजन को कहीं पर घटाव करना पड़ता तो कहीं पर जोड़ करना पड़ता है...
सबसे बड़ी अवैज्ञानिक प्रक्रिया है - कुछ घटाने(MINUS करने) के लिए कुछ जोड़ना(PLUS करना) पड़ता है... सारी प्रोसेसिंग यहीं जटिल बन जाती है।
 
--- प्रस्तावित -- संस्कृत के पुराने विद्वानों द्वारा 1986 से अभिकल्पित सरल प्रणाली में सिर्फ जोड़ना ही पड़ता ... शुद्ध वैज्ञानिकता एवं सरलता के साथ... किसी आपरेटिंग सीस्टम् के रेण्डरिंग इंजन की जरूरत ही नहीं पड़ती। OS Independent रूप से हिन्दी व भारतीय लिपियाँ सार्वभौमिकता जैसा स्थान प्राप्त करती...
 
किन्तु... हिन्दी आदि भारतीय भाषाएँ सरल बन जाएँ, भारत "प्रगत" राष्ट्र हो, एक रुपये में 50 डॉलर मिलने लगें... यह कौन महाशक्ति चाहेगी??
 
दुःख की बात है - भारतीय विद्वान भी इस रहस्य को समझ नहीं पाते...
 
अपने परम्परागत अभ्यास से जरा-सा इतर हटकर, या अपना दृष्टिकोण जरा-सा बदलकर जाँचने/परखने का भी प्रयास नहीं करते... 
 
... यहीं तो मारा गया हिन्दुस्तान!!!!
 

--
हरिराम
प्रगत भारत <http://hariraama.blogspot.com>

 
2012/12/29 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
एक कदम और आगे बढ़ें तो आपका वह सुझाव याद आ रहा है कि हिन्दी को कुछ इस रूप मे ंलिखें।

Hariraam

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Dec 29, 2012, 7:24:32 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
"ज्यादा-सुगम" पढ़ें कृपया...

2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>

Pk Sharma

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Dec 29, 2012, 7:27:09 AM12/29/12
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2012/12/29 Vineet Chaitanya <v...@iiit.ac.in>

यदि हल्-चिह्न हटाना ही हो

हल् चिन्ह तो यूनीकोड में तथा मंगल / अपराजिता फ़ॉन्ट में वर्ण में है ही नहीं
सो वह तो कोई समस्या नहीं है |  

 
तो शिरोरेखा भी साथ में हटानी चाहिये

नये फ़ॉन्ट में यह आसानी से हो सकता है
संयूक्ताक्षर अगर हैं ही नहीं तो गणक के पटल से
केवल फ़ॉन्ट बदल कर इस विधि से आसानी से
टंकन हो जायेगा |

एवम् वर्तमान इंग्लिश वर्णावली को ही आधारित
कर के शीघ्र ही ऐसी टंकन विधि implement करी जा सकती है |



Pk Sharma

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Dec 29, 2012, 7:32:21 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com


2012/12/29 Pk Sharma <pksharm...@gmail.com>

इंग्लिश की तरह  pa(प=पअ)     pA (पा=पआ)

पर = पअरअ       = para
पार = पआरअ     = pAra or paara
प्यार = पयआरअ =pyAra or pyaara

sure is a bit wierd ;-)

लेकिन इस तरह ही खेल खेल में यह विधि वास्तविकता का रूप ले लेगी

लएकइनअ  ईसअ  तअरअहअ  हई   खएलअ  खएलअ   मएअं  यअहअ वइधइ
वआसतवइकअतआ  कआ  रऊपअ  लए  लएगई    

yayy !! 
i could do this !!!

Hariraam

unread,
Dec 29, 2012, 7:40:27 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
शर्मा जी,
 
कृपया मेरे सन्देश को ध्यान से पढ़ें-- यह विधि केवल आन्तरिक प्रोसेसिंग के लिए है,
युनिकोड में यदि
क् ख् ग् से लेकर ह् तक को एक कोड नम्बर दिया जाए, तभी सम्भव होगा...
 
शुद्ध रूप यों होना चाहिए --
 
ल्‍एक्‍इन्‍अ ईस्‍अ त्‍अर्‍अह्‌अ  ....
 
हलन्त को हटाइए नहीं, हलन्त हट गया तो 'अ' स्वर स्वतः जुड़ जाता है...
 
हलन्त नहीं लगाएँ तो यह पढ़ा जाएगा...
 
लअएकअइनअअ ईसअअ तअअरअअहअअ...

2012/12/29 Pk Sharma <pksharm...@gmail.com>

Pk Sharma

unread,
Dec 29, 2012, 7:47:17 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>

दुःख की बात है - भारतीय विद्वान भी इस रहस्य को समझ नहीं पाते...
 
अपने परम्परागत अभ्यास से जरा-सा इतर हटकर, या अपना दृष्टिकोण जरा-सा बदलकर जाँचने/परखने का भी प्रयास नहीं करते... 

समझते तो सब हैं 

बस करना नहीं चाहते

यही हाल अन्य समाजों में भी है
बदलाव का घोर विरोध होता आया है
चींटी की चाल से बदलाव ठीक है
घोड़े की गति से ? ना रे बाबा ! ना !! जैसे कि कोई अनर्ध होगा ही !!!

ओर फ़िर सफ़ेद चमड़ी की आराधना भारतीय परम धर्म भी तो बना हुआ है !
भारतीय coach ? useless !  foreign coach ? sure ! even if 10 times costlier !

 

--





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Pk Sharma

unread,
Dec 29, 2012, 7:55:23 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>

यह केवल कम्प्यूटर की आन्तरिक प्रोसेसिंग हेतु तथा तीव्र इनपुट (डैटा एंट्री) के लिए है... रेण्डरिंग तो वर्तमान परम्परागत रूप में जैसे होती है, वैसे ही होगी...

oops .. 
टंकन एक विधि से 
दीखेगा पुरानी विधि से ??

टंकन करना होगा -  परअदईपअ
दीखेगा - प्रदीप

अयी ययी यो जी
ये तो बहुत गड़ बढ़ जी

अहम् एकम् विधिम् स्विकारम् करोमी
द्वि विधिम् गड़बड़म् अस्ति !
क्षमा कुरु गुरु श्री !!

Pk Sharma

unread,
Dec 29, 2012, 8:07:53 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
sorry for my folly

but this is an uphill task sir jee !

a separate  unicode 
a different method of input in forms
an old method of seeing script
convincing the powers that are .. here and abroad
convincing the user(s) that this is good
changing the long established habits of govt 'form-fillers' 

hmmm...

maybe this can happen

i will always be h2h .. happy to help :-))


2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>
शर्मा जी,
 
कृपया मेरे सन्देश को ध्यान से पढ़ें-- यह विधि केवल आन्तरिक प्रोसेसिंग के लिए है,
युनिकोड में यदि
क् ख् ग् से लेकर ह् तक को एक कोड नम्बर दिया जाए, तभी सम्भव होगा...
 
शुद्ध रूप यों होना चाहिए --
 
ल्‍एइन्‍अ ईस्‍अ त्‍अर्‍अह्‌अ  ....
 
हलन्त को हटाइए नहीं, हलन्त हट गया तो 'अ' स्वर स्वतः जुड़ जाता है...

yes .. as per old rules of sanskrit, the vertical bar represents the
first vowel 'a' .. pure consonants are just oral positions which cannot
be pronounced without the help of a vowel (which is represented by a maatraa)
so -
 क is       क्‍  +  अ  =   क्‍   +   ा   
and
  की is      क्‍  +  ई  =   क्‍   +     ी

 
 
हलन्त नहीं लगाएँ तो यह पढ़ा जाएगा...
 
लअएकअइनअअ ईसअअ तअअरअअहअअ...

2012/12/29 Pk Sharma <pksharm...@gmail.com>
लेकिन इस तरह ही खेल खेल में यह विधि वास्तविकता का रूप ले लेगी

लएकइनअ  ईसअ  तअरअहअ  हई   खएलअ  खएलअ   मएअं  यअहअ वइधइ
वआसतवइकअतआ  कआ  रऊपअ  लए  लएगई    

--
 
 

Vineet Chaitanya

unread,
Dec 29, 2012, 8:20:33 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com


2012/12/29 Pk Sharma <pksharm...@gmail.com>

2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>
यह केवल कम्प्यूटर की आन्तरिक प्रोसेसिंग हेतु तथा तीव्र इनपुट (डैटा एंट्री) के लिए है... रेण्डरिंग तो वर्तमान परम्परागत रूप में जैसे होती है, वैसे ही होगी...

oops .. 
टंकन एक विधि से 
दीखेगा पुरानी विधि से ??

   जी नहीं, आप जिस भी रूप में देखना चाहेंगे देख पायेंगे. 

टंकन करना होगा -  परअदईपअ
दीखेगा - प्रदीप

अयी ययी यो जी
ये तो बहुत गड़ बढ़ जी

अहम् एकम् विधिम् स्विकारम् करोमी
द्वि विधिम् गड़बड़म् अस्ति !
क्षमा कुरु गुरु श्री !!


--





now use indian languages on pc more easily with :
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--
 
 

Pk Sharma

unread,
Dec 29, 2012, 10:12:40 AM12/29/12
to technic...@googlegroups.com


2012/12/29 Vineet Chaitanya <v...@iiit.ac.in>

2012/12/29 Pk Sharma <pksharm...@gmail.com>
2012/12/29 Hariraam <hari...@gmail.com>
यह केवल कम्प्यूटर की आन्तरिक प्रोसेसिंग हेतु तथा तीव्र इनपुट (डैटा एंट्री) के लिए है... रेण्डरिंग तो वर्तमान परम्परागत रूप में जैसे होती है, वैसे ही होगी...

oops .. 
टंकन एक विधि से 
दीखेगा पुरानी विधि से ??

   जी नहीं, आप जिस भी रूप में देखना चाहेंगे देख पायेंगे. 

wyriwys
what you write is what you see 

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Dec 29, 2012, 8:16:53 PM12/29/12
to technic...@googlegroups.com
अच्छा, आपका आशय आन्तरिक भण्डारण हेतु था। हाँ निश्चित ही यह देवनागरी की मूल संरचना के अनुकूल है और आपके बताये अनुसार इससे देवनागरी की कम्प्यूटिंग सरल होती लेकिन जैसा कि आप स्वयं ही पहले कई बार बता चुके हैं कि यूनिकोड एक बार जैसा बन गया, वह (गलत होने के बावजूद) बदला नहीं जा सकता फिर ऐसा 'काश!' करके क्या लाभ?

यदि कोई रास्ता आपको सूझता है तो वह बतायें।

29 दिसम्बर 2012 5:53 pm को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
--
 
 

Hariraam

unread,
Dec 30, 2012, 8:04:55 AM12/30/12
to technic...@googlegroups.com
उपाय जारी है... जैसा कि निर्णय लिया गया अनुसंधान संबंधी ईमेल ऑफलाइन भेजे जाएँगे... ताकि समूह के अन्य सदस्यों को तकलीफ नहीं हो...

-- हरिराम

2012/12/30 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
अच्छा, आपका आशय आन्तरिक भण्डारण हेतु था। हाँ निश्चित ही यह देवनागरी की मूल संरचना के अनुकूल है और आपके बताये अनुसार इससे देवनागरी की कम्प्यूटिंग सरल होती लेकिन जैसा कि आप स्वयं ही पहले कई बार बता चुके हैं कि यूनिकोड एक बार जैसा बन गया, वह (गलत होने के बावजूद) बदला नहीं जा सकता फिर ऐसा 'काश!' करके क्या लाभ?

यदि कोई रास्ता आपको सूझता है तो वह बतायें।

29 दिसम्बर 2012 5:53 pm को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
श्रीश जी,
 
'दुर्गम' नहीं बल्कि 'ज्यादा-सुगम' होगा...
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