Re: [Hindi] हिंदी वर्तनी में अनेकरूपता

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narayan prasad

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Feb 5, 2009, 12:56:18 PM2/5/09
to hi...@googlegroups.com, Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)

हिन्दी की मानक वर्तनी के लिए जो कुछ नियम दिए गए हैं वे तब बनाए गए थे जब कम्प्यूटर का युग नहीं था और उपलब्ध टंकण यन्त्र में पर्याप्त सुविधा नहीं थी । आज वह बात नहीं है । इसलिए उन नियमों में, विशेष रूप से अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु सम्बन्धी नियमों में, परिवर्तन की आवशयकता है ।

यथासम्भव उच्चारण और हिन्दी की प्रकृति के अनुसार वर्तनी के नियम बनाने चाहिए । विदेशी भाषाओं से लिए गए शब्दों का हिन्दीकरण करना आवश्यक है । हिन्दी में अरबी-फारसी, अंग्रेजी आदि गृहीत शब्दों को हिन्दी की प्रकृति के अनुसार ढालकर ही देवनागरी अक्षरों की ध्वनि पर आधारित अन्तरतम (nearest) वर्तनी का प्रयोग किया जाना चाहिए । अन्य सभी भाषाओं में ऐसा ही किया जाता है । अतः सामान्य रूप से हिन्दी में तिर्यक्-बिन्दु (नुक्ता) का प्रयोग मेरे विचार में बिलकुल अनावश्यक है । हाँ, भाषा-विज्ञान सम्बन्धी विशेषताओं को जब निर्दिष्ट करना अभीष्ट हो तो इसका प्रयोग किया जा सकता है । उसी प्रकार अन्य भारतीय भाषाओं के पाठ को यदि देवनागरी में परिवर्तित करना अपेक्षित हो, तो विस्तारित (extended) देवनागरी अक्षरों का प्रयोग आवश्यक होगा ।

शुद्ध उच्चारण की दृष्टि से वर्ग के पञ्चम वर्ण का यथासम्भव प्रयोग ही अभीष्ट है - जैसे, हिंदी के बदले हिन्दी, चंपक के बदले चम्पक, ठंडा के बदले ठण्डा । अनुस्वार का शुद्ध उच्चारण बहुत कम लोगों को ही मालूम होता है । इसका उच्चारण लगभग कवर्ग के पञ्चम वर्ण "ङ" जैसा होता है । अतः हिंदी का उच्चारण लगभग "हिङ्दी" जैसा होगा जो बिलकुल भ्रष्ट उच्चारण होगा । और इसलिए हिन्दी की वैकल्पिक वर्तनी हिंदी मुझे बिलकुल पसन्द नहीं । कई लोगों को अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु के उच्चारण में अन्तर मालूम नहीं होता । इसलिए इन दोनों के प्रयोग में लोग गलती करते हैं ।
 
जहाँ कहीं विभक्ति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो, उस परिस्थिति में विभक्ति को पृथक् ही लिखना चाहिए (ताकि इसका नाम भी सार्थक हो सके यानी विभक्त या पृथक् करके जिसे लिखा जाय)- चाहे वह शब्द तिर्यक्-कारक (oblique case) का सर्वनाम ही क्यों न हो । उदाहरणस्वरूप - राम ने, उस ने, मुझ को इत्यादि । हमें, मुझे, उसे आदि शब्दों में विभक्ति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती । अतः ऐसे शब्दों को एक शब्द के रूप में ही लिखा जा सकता है ।
 
अब चूँकि नहीं के स्थान पर नहीँ, छींट के स्थान पर छीँट, ईंट के स्थान पर ईँट लिखने में कोई परेशानी नहीं तो शुद्ध रूप से उच्चरित अनुनासिक (चन्द्रबिन्दु) का ही प्रयोग क्यों न किया जाय ? प्रसिद्ध कोश "हिन्दी शब्दसागर" में ऐसा ही किया गया है ।

--- नारायण प्रसाद 

2009/2/3 Suyash Suprabh <translate...@gmail.com>
हर भाषा में वर्तनी की अनेकरूपता देखने को मिलती है, लेकिन हिंदी वर्तनी
में यह 'अराजकता' का रूप ले चुकी है।

मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा। English को हिंदी में अँग्रेज़ी, अँग्रेजी,
अंग्रेजी, अंग्रेज़ी, अँगरेज़ी, अँगरेजी, अंगरेजी या अंगरेज़ी लिखते हैं।
वर्तनी की इस अराजकता से भाषा की शुद्धता को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा
होती है। इससे भाषा का विकास भी बाधित होता है।

मानक हिंदी के नियमों पर विचार-विमर्श करना आवश्यक है। इंटरनेट पर मानक
हिंदी से संबंधित निम्नलिखित नियम उपलब्ध हैं (http://www.giitaayan.com/
hindispelling.asp
):

1. The case-signs in Hindi should always be written as separate words,
except in case of pronouns where they should be tagged on to the stems
(प्रतिपादिक); e.g. १. राम ने २. स्त्री को ३. उसने ४. मुझको.
Exception:
1. Where pronouns have two case-signs at a time, the first should be
tagged on to the stem while the second should be written separately;
e.g. १. उसके लिये २. इसमें से.
2. When the particles ही, तक etc. fall in between a pronoun and its
case-sign be written as a separate word; e.g. आप ही के लिये, मुझ तक
को.
2. In case of compound verbs, all subsidiaries should be written
separately; e.g. १. पड़ा करता है २. आ सकता है.
3. The indeclinables तक, साथ etc. should always be written as separate
words; e.g. आपके साथ, यहाँ तक.
4. The absolutive forms should always be written as single words; e.g.
मिलाकर, खा-पीकर, रो-रोकर.
5. In case of co-ordinative compounds, hyphen should be placed in
between the constituent words; e.g. राम-लक्ष्मण, शिव-पार्वती-संवाद.
6. Hyphen should be placed before particles like सा, जैसा; e.g. तुम-
सा, राम-जैसा, चाकू-से तीखे.
7. In case of dependent determinative compounds, hyphen should be used
only to avoid risk of ambiguity; e.g. भू-तत्व.
8. Where the use of glidal य, व is optional, it may be avoided, i.e.,
in the words like गए-गये, नई-नयी, हुआ-हुवा, etc. using only the former
(vowel) forms. This rule is applicable in all cases viz., verbal,
adjectival and undeclinable forms.
9. ऐ and औ express two distinct sounds in Hindi. First as in words
like है, और, etc. and the other in words like गवैया, कौवा, etc. The
use of these symbols to express these two distinct sounds should
continue. Modifications like गवय्या, कव्वा, etc. are unnecessary.
10. तत्सम words borrowed from Sanskrit should ordinarily be spelt in
their original Sanskrit form. But where the use of Hal sign (right
slanting stroke \) has already discontinued in Hindi, words like महान
(न्‌), विद्वान (न्‌), it need not be revived.
11. Where the fifth letter of a class of consonants (वर्ग) precedes
any of the four remaining letters of the same class, the अनुस्वार
should be invariably used instead of the fifth letter; e.g. अंत, गंगा,
संपादक.
12. Use of nasalisation sign (अँ) (चंद्रबिंदु) is sometimes necessary
to avoid ambiguity in meaning and to mark out distinction between
words like हंस-हँस etc. Except where it is difficult to write or
print, चंद्रबिंदु must necessarily be used in poetry to maintain
metric sequence. Similarly, in the primers for children where
introduction of चंद्रबिंदु is desired, चंद्रबिंदु must invariably be
used; e.g. नहीँ, मेँ, मैँ, etc.
13. Words of Arabo-Persian origin which have been adapted in Hindi
vocabulary should continue to be used as such; e.g. जरूर. But where
their use in innate form is desired, dots (नुक़्ते) must be used to
denote alien origin; e.g. राज़, नाज़.
14. Where use of English words with half-open औ sound is desired,
अर्ध-
चंद्र symbol should be placed over आ as in ऑनरेरी, डॉक्टर.
15. If Sanskrit words with विसर्ग have to be used in Hindi in their
तत्सम form, the विसर्ग should be placed appropriately as in
दुःखानुभूति. But if such words are to be used in their modified
(तद्भव) form, विसर्ग can easily be omitted as in दुख-सुख के साथी.

उपर्युक्त नियमों को लेकर हिंदी के विद्वानों और लेखकों में मतैक्य नहीं
है, लेकिन मानक हिंदी के संदर्भ में इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है।

क्या आप इनमें से किसी नियम को गलत मानते हैं?

सुयश

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
Feb 5, 2009, 1:19:53 PM2/5/09
to technic...@googlegroups.com
बहुत सुंदर प्रसादजी,
यदि अपनी पसंद के अनुसार वर्तनी लिखी जाने लगे, तब तो सारा विवाद ही
समाप्त हो जाएगा।
मैं एक जानकारी चाहता हूँ -
जो लोग क वर्ग और च वर्ग के पंचमाक्षरों ( ङ और ञ ) का मोह नहीं रखते, वे
ण, न और म का मोह क्यों नहीं छोड़ पाते?
क्या इसका कोई विशेष कारण है?


--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका
रावेंद्रकुमार रवि
http://saraspaayas.blogspot.com/

narayan prasad

unread,
Feb 5, 2009, 7:58:48 PM2/5/09
to technic...@googlegroups.com
<< मैं एक जानकारी चाहता हूँ -
जो लोग क वर्ग और च वर्ग के पंचमाक्षरों ( ङ और ञ ) का मोह नहीं रखते, वे ण, न और म का मोह क्यों नहीं छोड़ पाते?
क्या इसका कोई विशेष कारण है?>>
 
कोई विशेष कारण नहीं है । ऐसे लोग तो इ ई उ ऊ स्वर वर्णों को त्यागकर उनके स्थान पर अ‍ि अ‍ी अ‍ु अ‍ू के प्रयोग के पक्ष में होंगे ।
 
लोग चाहे चवर्ग के पञ्चमाक्षर "ञ" का प्रयोग न करें, परन्तु "वाङ्मय", "पराङ्मुख" जैसे शब्दों में कवर्ग के पञ्चमाक्षर "ङ" के बिना कैसे काम चला पाएँगे ? आश्चर्य तो इस बात का है कि तथाकथित शिक्षाविदों द्वारा बच्चों की आधुनिक पहली पुस्तक में ङ और ञ को वर्णमाला से भी निष्कासित किया हुआ दिखाई देता है । इसलिए कई बच्चे ङ और ञ अक्षर से अपरिचित होते हैं ।

--- नारायण प्रसाद

५ फरवरी २००९ २३:४९ को, रावेंद्रकुमार रवि <raavend...@gmail.com> ने लिखा:
बहुत सुंदर प्रसादजी,
यदि अपनी पसंद के अनुसार वर्तनी लिखी जाने लगे, तब तो सारा विवाद ही
समाप्त हो जाएगा।
मैं एक जानकारी चाहता हूँ -
जो लोग क वर्ग और च वर्ग के पंचमाक्षरों ( ङ और ञ ) का मोह नहीं रखते, वे
ण, न और म का मोह क्यों नहीं छोड़ पाते?
क्या इसका कोई विशेष कारण है?शुभकामनाओं के साथ -

Anunad Singh

unread,
Feb 6, 2009, 8:58:53 AM2/6/09
to technic...@googlegroups.com
मुझे लगता है कि हिन्दी में "वर्तनी की अराजकता"  जैसी स्थिति नहीं है।  इस सन्देश में  जिस शब्द का उदाहरण लिया गया है वह  कई दृष्टियों से  असामान्य है।  एक तो यह हिन्दी का  तत्सम या तद्भव शब्द नहीं है। दूसरे इसको  अनुक्ता/सनुक्ता  की मार झेलनी पड़ रही है।  उसके उपर से अनुस्वार एवं चन्द्रबिन्दु   का बोझ भी इस पर हाबी है।

किन्तु हिन्दी के अधिसंख्य शब्दों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है।


-----------------------------------------------------

६ फरवरी २००९ ०६:२८ को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:

Suyash Suprabh

unread,
Feb 9, 2009, 2:57:12 AM2/9/09
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
हिंदी वर्तनी की अराजकता का सबसे बड़ा उदाहरण 'हिंदी' शब्द है। प्रिंट और
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस शब्द के दो रूपों का प्रयोग होता है: 'हिंदी'
और 'हिन्दी'। इन दोनों रूपों को व्यापक मान्यता मिली हुई है। अराजकता की
स्थिति तो तब उत्पन्न होती है जब किसी आलेख या पाठ में ये दोनों रूप
दिखते हैं।

अनुस्वार के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। कई बार तो लेखक यह तय
नहीं कर पाते हैं कि उन्हें अनुस्वार का प्रयोग करना है कि पंचमाक्षर का।
वर्तनी की अनेकरूपता के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:

शब्द गूगल के परिणाम

1. (क) लिए 9,230,000
(ख) लिये 2,680,000

2. (क) भाषायी 4,720
(ख) भाषाई 18,800

3. (क) कंपन 9,310
(ख) कम्पन 6,000

4. (क) ज़रूरत 186,000
(ख) जरूरत 666,000

5. (क) महत्त्वपूर्ण 61,100
(ख) महत्वपूर्ण 732,000

हिंदी की अधिकतर पत्रिकाओं में वर्तनी की यह अराजकता दिखती है।

क्या यह संभव नहीं है कि हम मानक वर्तनी के कुछ ऐसे नियम निर्धारित करें
जो अधिकतर लोगों को स्वीकार्य हों? इस संदर्भ में भारत सरकार की सक्रियता
भी अपेक्षित है।

सादर,

सुयश


On Feb 6, 6:58 pm, Anunad Singh <anu...@gmail.com> wrote:
> मुझे लगता है कि हिन्दी में "वर्तनी की अराजकता"  जैसी स्थिति नहीं है।  इस
> सन्देश में  जिस शब्द का उदाहरण लिया गया है वह  कई दृष्टियों से  असामान्य
> है।  एक तो यह हिन्दी का  तत्सम या तद्भव शब्द नहीं है। दूसरे इसको
> अनुक्ता/सनुक्ता  की मार झेलनी पड़ रही है।  उसके उपर से अनुस्वार एवं
> चन्द्रबिन्दु   का बोझ भी इस पर हाबी है।
>
> किन्तु हिन्दी के अधिसंख्य शब्दों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है।
>
> -----------------------------------------------------
>
> ६ फरवरी २००९ ०६:२८ को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:
>
> > << मैं एक जानकारी चाहता हूँ -
> > जो लोग क वर्ग और च वर्ग के पंचमाक्षरों ( ङ और ञ ) का मोह नहीं रखते, वे ण, न
> > और म का मोह क्यों नहीं छोड़ पाते?
> > क्या इसका कोई विशेष कारण है?>>
>
> > कोई विशेष कारण नहीं है । ऐसे लोग तो इ ई उ ऊ स्वर वर्णों को त्यागकर उनके
> > स्थान पर अ‍ि अ‍ी अ‍ु अ‍ू के प्रयोग के पक्ष में होंगे ।
>
> > लोग चाहे चवर्ग के पञ्चमाक्षर "ञ" का प्रयोग न करें, परन्तु "वाङ्मय",
> > "पराङ्मुख" जैसे शब्दों में कवर्ग के पञ्चमाक्षर "ङ" के बिना कैसे काम चला
> > पाएँगे ? आश्चर्य तो इस बात का है कि तथाकथित शिक्षाविदों द्वारा बच्चों की
> > आधुनिक पहली पुस्तक में ङ और ञ को वर्णमाला से भी निष्कासित किया हुआ दिखाई
> > देता है । इसलिए कई बच्चे ङ और ञ अक्षर से अपरिचित होते हैं ।
>
> > --- नारायण प्रसाद
>

> > ५ फरवरी २००९ २३:४९ को, रावेंद्रकुमार रवि <raavendra.r...@gmail.com> ने

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
Feb 9, 2009, 10:52:08 AM2/9/09
to technic...@googlegroups.com
वाह सुयशजी,
आपने हिंदी वर्तनी की अराजकता और अनेकरूपता के उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत
कर चकित कर दिया है।


--

narayan prasad

unread,
Feb 9, 2009, 12:17:26 PM2/9/09
to technic...@googlegroups.com
<< क्या यह संभव नहीं है कि हम मानक वर्तनी के कुछ ऐसे नियम निर्धारित करें
जो अधिकतर लोगों को स्वीकार्य हों?
>>
 
1. (क) लिए                         9,230,000
    (ख) लिये                        2,680,000

क्रिया-विशेषण के रूप में (अर्थात् "के लिए") हमेशा "लिए" लिखें ।
लिया (लेना क्रिया का भूतकाल, पुं॰, एकवचन रूप) का बहुवचन "लिये" लिखा जा सकता है ।
2.  (क) भाषायी                    4,720
    (ख) भाषाई                     18,800
साधारणतः आकारान्त तत्सम शब्द से "ई" प्रत्यय लगाते समय यकार का आगम होता है -
उत्तरदायी, अनुयायी, स्थायी,  स्तनपायी (पा = पीना), भाषायी ।
उपर्युक्त उदाहरणों में यदि "ई" प्रत्यय सीधे धातु से [जैसे - दा (=देना), या (=जाना), स्था (=ठहरना), पा (=पीना)] लगाया जाता है तो यकार आगम आवश्यक होता है [पाणिनि सूत्र "आतो युक् चिण्-कृतोः" (७.३.३३) से] ।
उत्तरदाई, अनुयाई, स्थाई इत्यादि व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध हैं ।
3.  (क) कंपन                        9,310
    (ख) कम्पन                     6,000
मेरे मतानुसार "कम्पन" शुद्ध है, "कंपन" अशुद्ध ( संस्कृत में तो अशुद्ध है ही) ।


4.   (क) ज़रूरत                    186,000
     (ख) जरूरत                    666,000
जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ, हिन्दी की प्रकृति के अनुसार "जरूरत" लिखना ही ठीक है ।
 
5.  (क) महत्त्वपूर्ण                61,100
    (ख) महत्वपूर्ण               732,000
महत् + त्व = महत्त्व
महत् + ता = महत्ता
अतः महत्व लिखना व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है ।
उसी तरह,
तत् + त्व = तत्त्व (तत्व नहीं)
सत् + त्व = सत्त्व (सत्व नहीं)

----नारायण प्रसाद
 
 
९ फरवरी २००९ १३:२७ को, Suyash Suprabh <translate...@gmail.com> ने लिखा:

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
Feb 10, 2009, 8:46:45 AM2/10/09
to technic...@googlegroups.com
प्रसाद जी!
आपका अधिक समय न लेते हुए केवल दो शब्दों ''गंगा और कंचन'' के बारे में आपका मत जानना चाहता हूँ। आपके मतानुसार इनकी यह वर्तनी शुद्ध है या अशुद्ध?

2009/2/9 narayan prasad <hin...@gmail.com>



--

Neeraj Sharmaa

unread,
Feb 11, 2009, 2:11:29 AM2/11/09
to technic...@googlegroups.com
प्रसादजी मैं भी आपका मत जानना चाहूँगा कि
 
क्‍या  दिनांक सही शब्‍द है।
2009/2/10 रावेंद्रकुमार रवि <raavend...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
Feb 26, 2009, 7:51:29 AM2/26/09
to technic...@googlegroups.com
यों तो गंगा, कंचन, दिनांक आदि शब्द हिन्दी में अनुस्वार रूप में ही प्रचलित हैं, परन्तु जनता इनके उच्चारण गङ्गा, कञ्चन, दिनाङ्क आदि ही करती है । संस्कृत में इन शब्दों के लिए पञ्चमाक्षर का प्रयोग ही शुद्ध माना जाता है ।
---नारायण प्रसाद
१० फरवरी २००९ १९:१६ को, रावेंद्रकुमार रवि <raavend...@gmail.com> ने लिखा:

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
Feb 26, 2009, 8:24:18 AM2/26/09
to technic...@googlegroups.com
क्या गंगा को गङ्गा से भिन्न रूप में उच्चरित किया जा सकता है?

वॉयस मेल से बताने की कृपा कीजिए। अगर कई साथी वॉयस मेल करेंगे, तो
ज़्यादा अच्छी तरह से समझ में आएगा।

नीरजजी से मेरी विशेष प्रार्थना है कि अभी बीच में कोई अन्य नया शब्द या
प्रश्न न डालें। नई बात, नए शब्द या नए प्रश्न के लिए नई चर्चा प्रारंभ
की जानी चाहिए।

--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका

रावेंद्रकुमार रवि

http://saraspaayas.blogspot.com/

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