On 15-Jan-26 9:36 PM, Anunad Singh wrote:
> ये कथन बहुत प्रसिद्ध हो रहा है - "AI won't replace you, but a person using AI
> will."
एकदम यही होगा।
"person using AI " वो व्यक्ति होगा जो लाखों रुपए का एआई टूल ख़रीदना वहन
कर सकेगा, जिसे ख़रीदना हम आम लोग वहन नहीं कर सकेंगे।
या फिर वो व्यक्ति किसी बड़े कॉरपोरेट का कर्मचारी होगा जो कॉरपोरेट करोड़ों
रुपए का एआई टूल ख़रीद सकेगा जो हम आम लोग नहीं ख़रीद सकेंगे।
लिहाज़ा एआई न ख़रीद सकने वाले लोग प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिए जाएँगे।
आज भी दुनिया में कई मुफ़्त सॉफ़्टवेयर हैं, उनमें से कुछ तो बहुत अच्छी हैं।
फिर भी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर उतनी पॉपुलर नहीं हो पाती है। इसकी एक वजह है लोग
अपनी-अपनी पसन्द से मुफ़्त सॉफ़्टवेयर का यूज़ करते हैं जिससे
स्टैण्डर्डाइज़ेशन नहीं आ पाता है और वो सॉफ़्टवेयर हर जगह पर उपलब्ध नहीं हो पाती है।
और फिर जैसे ही आप कॉरपोरेट के लिए काम करना शुरू करते हैं, क्योंकि
कॉरपोरेट महँगी सॉफ़्टवेयर ख़रीद सकता है इसलिए कॉरपोरेट उन महँगी सॉफ़्टवेयर
पर आपसे काम करवाता है और कॉरपोरेट वो सॉफ़्टवेयर आपको ख़रीद कर नहीं देता
है, तो आपको ख़ुद ख़रीदना पड़ेगा और अगर आप नहीं ख़रीदेंगे या पायरेसी नहीं
करेंगे तो आपको काम नहीं मिलेगा।
जैसे एमएस ऑफ़िस - ऑफ़िस के आथा दर्जन अच्छे व्यापक मुफ़्त वर्जन उपलब्ध हैं
लेकिन कॉरपोरेट एमएस ऑफ़िस को ख़रीद कर आपसे उसमें ही काम करवाता है इसलिए
मुफ़्त वाले ऑफ़िस पर काम करने का आपका हुनर किसी काम नहीं आता है।
या विण्डोज़ - जिसके लिए लीनक्स उपलब्ध जो पूरी तरह मुफ़्त नहीं, लेकिन कुछ
संस्करण मुफ़्त भी हैं, या विण्डोज़ से बहुत सस्ते दाम पर मिलते हैं। लेकिन
कॉरपोरेट विण्डोज़ को ख़रीद कर आपसे उसमें ही काम करवाता है इसलिए मुफ़्त या
सस्ते वाले लीनक्स पर काम करने का आपका हुनर किसी काम नहीं आता है।
और कॉरपोरेट निजी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर को ख़रीद कर अपनी प्रतिस्पर्धा कम करते
हैं, अगर आप उस मुफ्त सॉफ़्टेयर को सीखे हुए थे, तो आपका वो हुनर बेकार चला
जाता है। पहले वीडियो का सब कुछ फ़्लैश से चलता था, लेकिन फिर एक कॉरपोरेट
ने उसे ख़रीद कर उसको अपडेट करना बन्द कर दिया और आज फ़्लैश पूरी तरह से ग़ायब हो चुका है।
कॉरपोरेट निजी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर के डेवलपर को साम-दाम-दण्ड-भेद से
इनफ़्ल्युएन्स भी करता है जिससे निजी मुफ़्त सॉफ़्टवेयर का विकास अवरुद्ध हो
जाता है। पहले नेटस्केप सबसे पॉपुलर ब्राउज़र और ईमेल रीडर था, वो ग़ायब हो
गया। फिर फ़ायरफ़ॉक्स और थण्डरबर्ड आए, वो भी ग़ायब होने की क़गार पर हैं। गूगल
क्रोम और माइक्रोसॉफ़्ट एज हर जगह छाए हुए हैं।
कॉरपोरेट जो टूल फ़ीअल्हाल मुफ़्त में देते भी हैं, बाद को उन्हें चार्जेबल
कर दे देते हैं या उनके काम को सीमित कर देते हैं। जैसे गूगल ट्रान्सलेट
पहले अनलिमिटेड फ़्री था, लेकिन फिर उसमें 5000 कैरेक्टर की लिमिट डाल कर
यूज़र का काम बहुत बढ़ा दिया या असम्भव कर दिया। इस चक्कर में जिन लोगों को
गूगल ट्रान्सलेट या अन्य कम्प्यूटर ऐडेड ट्रान्सलेशन की लत पड़ चुकी थी, अब
उनमें मैनुअली ट्रान्सलेट करने की इच्छा बची ही नहीं और वो मैदान से बाहर हो गए हैं।
या फिर कॉरपोरेट अपने टूल्स में बेहूदे अन्तहीन विज्ञापन दिखाएगा जिसमें
आपका समय और बैण्डविड्थ बरबाद होगा, और आज लगभग सभी वेबसाइटें विज्ञापन
दिखाती हैं वरना आपको साइट को देखने ही नहीं देती हैं।
मेरा तो पूरा जीवन ही कम्प्यूटर पर बीता है, मैं कम्प्यूटर या ऑटोमेशन या
मशीनों का विरोध नहीं करता हूँ। लेकिन हमें कम्प्यूटर या ऑटोमेशन या मशीनों
का उपयोग एक सुविधा-सहायता-असिस्टैण्ट के लिए ही करना चाहिए, न ही उन पर
पूरी तरह निर्भर होकर उन टूल्स के बिना काम कर सकने की अपनी क्षमता को गँवा देना चाहिए।
यही बात एआई पर लागू होती है, कॉरपोरेट हमें एआई का एडिक्ट बना कर हमारे
हुनर की हत्या कर रहे हैं।
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रावत