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यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।
मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।
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एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं।
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सन् 1991 में CDAC के तत्वावधान में भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग के लिए ISCII-1991 (Indian Script Code for information interchange) का मानकीकरण भारत सरकार के भारतीय मानक संस्थान द्वारा BIS - ISI द्वारा किया गया था।
इसी के साथ ISFOC (Indian Script Font Code) की डिजाइनिंग की गई थी, ISFOC fonts का निर्माण हुआ था। किन्तु दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया।
भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के TDIL द्वारा भी Font-codes के draft जारी किए गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया। कई तकनीकी-सामाजिक कारण रहे होंगे।
कालक्रम में ISFOC fonts में समय की मांग के अनुसार अनेक परिवर्तन होते रहे, - Monolingual, Bilingual, Mono.Web, Bi.-Web, ISO आदि कई समूह बन गए। विभिन्न साफ्टवेयर निर्माताओं द्वारा अपने अपने फोंट्स बना लिये गए। किन्तु Font Code निर्धारित न होने के कारण किसी में कोई एकरूपता नहीं रही।
Internet का विकास होने पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर Unicode की जरूरत महसूस हुई और इसके प्रचलन के बाद ISCII लगभग मृत हो गया। हालांकि आरम्भ में युनिकोड भी ISCII की हूबहू कॉपी ही था। किन्तु कालक्रम में अन्य वर्ण-चिह्नों को जोड़े जाते रहते रहते आज Unicode वर्सन 6.0 में देवनागरी के कूटों में अनेक वर्णों, चिह्नों, मात्राओं आदि के code number निर्धारित किए जा चुके हैं। लेकिन इसका Latin के Unicode-समूहों की तरह Basic और Extended समूहों में तार्किक रूप से सजाकर न रखे जाने, वर्णक्रमानुसार छाँटने (Sorting, indexing) की सरल व्यवस्था न होने के कारण, तथा Complex Script वर्ग में होने, आदि कई कारणों से Indic Unicode समस्याग्रस्त रहा है।
सबसे बड़ी समस्या आई है Unicode की stability policy के कारण -- जिसके कथन का आशय है "Even if completely wrong, once encoded character, can't be corrected, deleted or edited", इस कारण कई त्रुटियाँ रह गईं हैं जिनके कारण जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
और सबसे बड़ी समस्या आती है, विश्व मंच पर भारतीय विद्वानों को कम दर्जे का आँका जाने, IBM, ADOBE, Microsoft तथा विकसित राष्ट्रों के विद्वानों/तकनीकी-गुरुओं का वीटो पावर ज्यादा होने के कारण भारतीय भाषाओं की समस्याओं को सही रीति समझा नहीं जाता और सरल समाधान प्रदान करने की वजाय, (शायद जान-बूझकर) या अनजाने में जटिल प्रक्रियाओं को ठूँस-ठाँस कर भारतीय लिपियों की परम्परागत रूप में rendering की व्यवस्था की जाती है।
वर्तमान जरूरत -
-- जैसा कि Unicode भी एक प्राईवेट मानक संस्थान है, कोई सरकारी नहीं।
-- जैसा कि ISO-9000, ISO-14000, ISO-xxxx आदि मान्यताएँ प्रदान करनेवाले संस्थान भी प्राईवेट संस्थान हैं, कोई सरकारी नहीं।
-- इसी प्रकार हम कुछ विद्वान मिलकर निजी क्षेत्र में एक मानक संस्थान गठित कर पंजीकरण करवा सकते हैं।
-- सर्वप्रथम हिन्दी(देवनागरी) के लिए फोंट कोड (Font code) के मानक निर्धारित करें।
-- फिर बाद में भारत के संविधान में मान्यता-प्राप्त 22 भाषाओं के font-code के लिए भी मानकीकरण का कार्य करें।
-- Font code के मानकीकरण के पश्चात, Indic sorting order के मानकीकरण, संयुक्ताक्षरों, पूर्णाक्षरों के लिए मानकों का निर्धारण, ...... समय की जरूरत के मुताबिक अन्य मानकों के निर्धारण के लिए कार्य करें।
-- इस मानक संस्थान के by-law में Unicode की stability policy के विपरीत ऐसी व्यवस्था हो कि निर्धारित मानकों में यदि भविष्य में कोई त्रुटि या गलती पाई जाए तो मानक का अगला वर्सन रिलीज करने के वक्त सुधार कर लिया जाएगा।
-- जब कोई एक मानक होगा, तो लोग उसका अनुकरण करेंगे ही। क्रमशः मानकों को क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी, प्रयोग बढ़ेगा। फिर राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सकेगी। और अन्ततः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल पाएगी।
-- Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।
-- इस बारे में एक गूगल समूह <https://groups.google.com/group/indicoms?hl=en> अलग से बनाकर कुछ प्रयास किया गया है।
-- कुछ सकारात्मक समान विचारों वाले विद्वानों/तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके एक संगठन बनाकर इस दिशा में कार्य आगे बढ़ाने हेतु सभी से मदद का अनुरोध है।
-- हरिराम
On 10-04-2011 15:06, Anuradha R. wrote:हरिराम जी,मैं सचमुच आभारी हूं कि आपने यह मसला उठाया।
कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक मेल में भी ऐसी ही राय जाहिर की थी कि क्यों नहीं मानक फॉन्ट का इस्तेमाल करके/मानक फॉन्ट विकसित करके हम हिंदी में काम को एकदम सरल बना लेते। बजाए इसके कि हर फॉन्ट के कनवर्टर्स बनाने और उनके प्रसार में ढेरों समय और संसाधन कर्च करें। फॉन्ट कनवर्टर की जरूरत सबको होती है, लेकिन कितनों के पास ये लिंक, ये सुविधा पहुंच पाती है? ये परिवर्तन तकनीक मिल जाए, उसके बाद भी कई दिक्कतें रह जाती हैं, कई फॉन्ट बिना बदले रह जाते हैं, जो लोगों को हिंदी कंप्यूटिंग से हतोत्साहित करने का काम बखूबी करते हैं।
एक मसला है कि कई प्रकाशन संस्थान अब भी अपने बनाए पुराने फॉन्टों पर ही काम करते हैं, कई कारणों से।
दूसरा मसला है कि विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां, जिनके सॉफ्टवेयर हम आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं, हिंदी के कंपैटिबल सॉफ्टवेयर तत्काल नहीं बनातीं। उनके बेहिसाब बिकने वाले भारतीय वर्जन्स में भी अंग्रेजी की ही ज्यादा सुविधा ही रहती है। एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं।
लेकिन, क्या हम सब, कंप्यूटर को हिंदी इस्तेमाल करने वाले मिलकर एक प्रेशर ग्रुप बना सकते हैं कि इन कंपनियों को अपने भारतीय एडीशंस को यूनिकोड कंपैटिबल बनाना पड़े, जैसा कि चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के लिए होता है। वैसे भी, भारत उनके लिए बड़ा बाजार है, इसकी मांग को वो नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हम हिंदी कंप्यूटिंग के मानकीकरण के लिए संबद्ध एजेंसियों पर दबाव नहीं डाल सकते? यह तकनीक विकसित करने से ज्यादा, उस तकनीक की सुविधा को ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहज पहुंच के दायरे के भीतर लाना है।
मैं इस पर काम करने को तैयार हूं। किसी के पास कोई रास्ता/उपाय/योजना/सुझाव है, तो कृपया शेयर करें।सादर,-अनुराधा
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अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास
करें।...."
वस्तुतः ऐसा नहीं है. आमतौर पर सभी सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर यूनिकोड
यूटीएफ 8 तथा भविष्य में यूटीएफ 16 का परिपूर्णता से पालन करेंगे, और
पुराने सारे फ़ॉन्ट प्रचलन से स्वतः ही बाहर हो जाएंगे. यह मात्र कुछ
वर्षों की ही बात है. तब ये समस्या नहीं रहेगी. अभी ही चहुँ ओर आधे से
ज्यादा काम (सरकारी उपक्रमों को छोड़ दें तो, क्योंकि वहाँ निर्णय लेने
की प्रक्रिया बेहद उबाऊ, लंबी और लालफीता शाही युक्त होती है - मैं स्वयं
भी कभी उस तंत्र का हिस्सा रह चुका हूँ) पूरी तरह से यूनिकोड हिंदी में
होने लगे हैं. और, यूनिकोड हिंदी का विकल्प नहीं है. यह एक तरह से
स्टैण्डर्डाइज्ड हो चुका है, वैश्विक स्तर पर - ओपन सोर्स से लेकर निजी
सॉफ़्टवेयर निर्माताओं सब जगह. और न सिर्फ हिंदी, अन्य भारतीय भाषाओं -
तमिल, तेलुगु, पंजाबी इत्यादि सभी के लिए भी यूनिकोड स्टैण्डर्ड मानक बन
चुका है.
सादर,
रवि
> *इसी प्रकार किसी भी फोंट के लिए बने कनवर्टर उस फोंट की उसी कॉपी/वर्सन के लिए
> शतप्रतिशत सही परिणाम दे पाएँगे। अन्य वर्शन/कॉपी के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम नहीं
> मिलेगा। *
>
> क्योंकि विभिन्न फोंट्स के निर्माताओं ने यूजर की फीडबैक के अनुसार समय समय पर अपने फोंट के
> अगले वर्सन में परिवर्तन/सुधार किए होते हैं।
>
> *और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा।
> इसलिए यदि शत-प्रतिशत सही परिणाम चाहें तो केवल हरेक फोंट के हरेक वर्सन के लिए अलग
> अलग वर्शन के कनवर्टर बनाने पड़ेंगे।
> जैसा कि CDAC के ISM software के साथ दिए जानेवाले फोंट्स तथा Font-code-converter
> में किया जाता रहा है। *
>
> अतः Font-code-converter बनाने का कार्य अनन्त काल तक चलते रहनेवाला होगा।
> सार्वत्रिक नहीं हो पाएगा। एक कनवर्टर जो एक यूजर के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम दे
> रहा है, दूसरे के लिए शायद 20% गलतियों वाला परिणाम दे।
>
> अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास करें।
>
> -- हरिराम
>
> On 10-04-2011 05:17, ePandit | ई-पण्डित wrote:
>
>
>
>
>
>
>
>
>
> > यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक
> > कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।
>
> > पहले मैंने भी यही सोचा था परन्तु जब मैंने अपने पास मौजूद ट्रू-टाइप के लिये कन्वर्टर
> > बनाकर एक मित्र को भेजा जिसके पास टाइप-१ था तो उसने बताया कि कन्वर्जन में फर्क है
> > तब मैंने जाँचा तो पाया कि उनमें दस-बारह ग्लिफ का अन्तर है।
>
> > आम तौर पर टीटीऍफ फॉण्टों में वर्जन नम्बर लिखा होता है लेकिन चाणक्य के इन दोनों
> > फॉण्टों (टीटीऍफ और पोस्ट स्क्रिप्ट) में अंकित नहीं है, जिस कारण में उनके लिये Type-1
> > तथा TrueType नाम ही प्रयुक्त कर रहा हूँ।
>
> > मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।
>
> > पहले मैं भी यही सोचता था कि अब के जमाने में कौन पुराने लिगेसी फॉण्ट प्रयोग करता है
> > लेकिन पहली बार मुझे इनकी उपयोगिता समझ आयी जब मेरे यमुनानगर के एक साथी
> > चिट्ठाकार ने मुझसे अपनी कृतिदेव में लिखी तीस-चालीस कवितायें यूनिकोड में बदलने का
> > उपाय पूछा। दूसरी बार उपयोगिता तब मालूम पड़ा जब उनके यूनिकोड में भेजे मैटर को
> > अखबार वालों ने कचरा हुआ बताकर चाणक्य में भेजने की माँग की। कन्वर्टरों की उपयोगिता
> > वही समझता है जिसका काम अटका
>
> ...
>
> read more »
और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा।
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युनिकोड में भी किसी संयुक्ताक्षर का मानकीकरण नहीं हुआ है।
ओपेन टाइप फोंट्स में अन्तर्निहित अल्गोरिद्म के तहत ग्लीफ, संयुक्ताक्षर आदि स्वतः प्रकट होते हैं।
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हरिराम जी ने एकदम सही कहा कि फॉन्ट कोड कनवर्ट करते रहना तो लगातार पीछा करते रहने जैसा है- कोई नया फॉन्ट आया तो कनवर्ट करें, पुराने फॉन्ट में कोई मैटर है, तो भी कनवर्ट करें और तो और वही फॉन्ट(उदा.- चाणक्य) है, तो उसका अनंकित वर्जन आपके वर्जन से अलग है तो फिर कनवर्जन। यानी बालू को मुट्ठी में भींचने की कोशिश, जो लगातार फिसलती ही जाती है। यह कनवर्जन का मामला तो अनंत है और अनंत काल तक चलता रहेगा, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया।
विंडोज (माइक्रोसॉफ्ट), गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे लिए इतना तक तक दिया है कि हमें एक यूनिकोड से सुसज्जित सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सुविधा दे दी है। अब हमें सिर्फ यह करना है कि किसी तरह इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला फॉन्ट-कोड बनाना है, ताकि परिवर्तन के झमेले से छुटकारा मिले।
निश्चय ही, हिंदी का आधे से ज्यादा व्यावसायिक काम गैर-यूनिकोड में हो रहा है। हो सकता है, यह भी महत्वपूर्ण बात हो कि यूनिकोड के फॉन्ट उतने सुंदर नहीं होते। लेकिन, यूनिकोड की जो सार्वभौमिकता है, टाइपिंग की सहजता- सरलता है, और तकनीकी रूप से विकसित स्थिति है, उसके चलते इसे प्रमुखता देनी ही चाहिए। इसको सभी इस्तेमाल करें, ऐसा फैसला होने के बाद इसमें सुंदर फॉन्ट जोड़े भी जा सकते हैं।
NGO बनाने से बेहतर होगा, सरकार में संबंधित कार्यालयों, अधिकारियों और इस पर काम कर चुके लोगों को जोड़ें जो फिर आगे, फैसला लेने में सक्षम/महत्वपूर्ण लोगों को प्रभावित करें, मनाएं और बताएं कि यह समस्या आसानी से सुलझ सकती है, थोड़ी सी राजनीतिक/प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्हें यह प्रस्ताव भी दिया जा सकता है कि सरकार की तकनीकी टीम को सभी तरह का सपोर्ट देने के लिए तकनीकी जानकार और गैर-तकनीकी अनुभवी उपयोगकर्ता सेवाएं देने के लिए उपलब्ध हैं।
गैर यूनीकोड फ़ॉण्ट निर्माताओं को उनके फ़ॉण्टों से यूनीकोड में और यूनीकोड से उनके फ़ॉण्टों
में परिवर्तित करने के सॉफ़्टवेयर बना कर मुफ़्त उपयोग के लिए उपलब्ध कराने चाहिए।
यदि वो ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह उन निर्माताओं का गैरज़िम्मेदाराना व्यवहार और
मानसिकता है जिससे लाखों लोगों के प्रयास और समय व्यर्थ हो रहे हैं।
सरकार यह नियम बना सकती है कि निर्माता उपरोक्त कामों को करें अन्यथा उनके
सॉफ़्टवेयरों को भारत में बेंचने और उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
रावत
> *रही सरकारी तंत्र की बात। इसकी आलोचना करने का हमें कोई हक नहीं है। सरकारी तंत्र
> की अपनी मजबूरियाँ होती हैं।*
>
> *हमें सरकारी तंत्र को सर्वदा सहयोग करते रहने के बारे में ही सोचना चाहिए।* NGO से
> सरकारी तंत्र को काफी मदद मिल जाती है।
>
> -- हरिराम
>
>
>
>
> On 12-04-2011 01:02, Anuradha R. wrote:
>>
>> हरिराम जी ने एकदम सही कहा कि फॉन्ट कोड कनवर्ट करते रहना तो लगातार पीछा
>> करते रहने जैसा है- कोई नया फॉन्ट आया तो कनवर्ट करें, पुराने फॉन्ट में कोई मैटर है,
>> तो भी कनवर्ट करें और तो और वही फॉन्ट(उदा.- चाणक्य) है, तो उसका अनंकित वर्जन
>> आपके वर्जन से अलग है तो फिर कनवर्जन। यानी बालू को मुट्ठी में भींचने की कोशिश, जो
>> लगातार फिसलती ही जाती है। यह कनवर्जन का मामला तो अनंत है और अनंत काल तक
>> चलता रहेगा, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया।
>>
>> विंडोज (माइक्रोसॉफ्ट), गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे लिए इतना तक तक दिया
>> है कि हमें एक यूनिकोड से सुसज्जित सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सुविधा दे दी है। अब हमें
>> सिर्फ यह करना है कि किसी तरह इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला फॉन्ट-कोड
>> बनाना है, ताकि परिवर्तन के झमेले से छुटकारा मिले।
>> *
>> *
>> *निश्चय ही, हिंदी का आधे से ज्यादा व्यावसायिक काम गैर-यूनिकोड में हो रहा है। हो
>> सकता है, यह भी महत्वपूर्ण बात हो कि यूनिकोड के फॉन्ट उतने सुंदर नहीं होते।*
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दूसरी बात, युनिकोड देवनागरी के सुंदर सुंदर फ़ांट बनाना कितना बड़ा काम
है? हर काम में केवल एक बार की मेहनत है पर उसका फल पूरा हिंदी उद्योग
भोगेगा, हमेशा के लिए।
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> दूसरी बात, युनिकोड देवनागरी के सुंदर सुंदर फ़ांट बनाना कितना बड़ा काम
> है? हर काम में केवल एक बार की मेहनत है पर उसका फल पूरा हिंदी उद्योग
> भोगेगा, हमेशा के लिए।
सुंदर फ़ॉण्ट भी बन जाएँगे, और जब कोई पाठ यूनीकोड में है तो एक यूनीकोड फ़ॉण्ट से दूसरी
यूनीकोड फ़ॉण्ट में एकल कमांड से फटाफट बदल जाएगा। अभी तो आवश्यकता है कि लोग अपने
पाठों को यूनीकोड में लिखना शुरू करें ताकि सुंदर फ़ॉण्ट उपलब्ध हो जाने पर उनको पहले
यूनीकोड में बदलना न पड़े।
रावत
दूसरी बात, युनिकोड देवनागरी के सुंदर सुंदर फ़ांट बनाना कितना बड़ा काम
है? हर काम में केवल एक बार की मेहनत है पर उसका फल पूरा हिंदी उद्योग
भोगेगा, हमेशा के लिए।
एक और हैरानी वाली बात है कि समाचार पत्रों में हिंदी या हिंदी ब्लॉगिंग
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हालांकि अनुनाद जी ने जब 1997 में यह गूगल ग्रुप बनाया तब से इससे लोग जुड़ रहे हैं।
अधिकांश साफ्टवेयर निर्माता युनिकोडित वर्सन निकाल चुके है। शेष निकाल रहे हैं। सबके
प्रोग्राम में युनिकोड कनवर्टर उपलब्ध है।
किन्तु मुफ्त नहीं।
Indic Software producers की हालत खस्ता है। विकास कार्य में लाखों खर्च होते हैं।
किन्तु माल बिकता कम है। लाभ मिलना तो दूर, उलटे घाटा हो रहा है। सकरकारी अनुदान
भी नहीं है।
अतः वे अपने सॉफ्टवेयर/फोंट/कनवर्टर/युटिलिटिज की मोनोपोली की नीति अपनाकर ही जीने
को मजबूर रहे हैं।
हमें उनके हित के बारे में भी सोचना होगा।
किन्तु मानकों के निर्धारण की जरूरत है
और सभी निर्माताओं को मानकों अनुपालन करना अनिवार्य होना चाहिए।
-- हरिराम
पर जैसा कि आदरणीय हरिराम जी ने कहा है कि हमें इसकी आलोचना करने का कोई हक नहीं,( महोदय आपके प्रयास और जिजीविषा तो हमारे लिए स्तुत्य है,- समूह के अधिकांश सदस्य आपके जुझारुपन से मेरी तरह से व्यक्तिगत परिचित नहीं हैं ) लेकिन -- बाकी हम सब चाहते हैं कि भगतसिंह जैसा क्रांतिकारी फिर इस देश को चाहिए--- लेकिन मेरा बेटा नही ।।।।।--
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> <<क्या हम समूह की चर्चाओं को दो भागों में करें- सरकारी कार्यालयों में राजभाषा में काम
> के प्रतिशत को बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़े सरोकार और दूसरे में -फोंट, कनवर्टर, साफ्टवेयर
> आदि जैसे तकनीकी विषय़ों के जानकार अपने अनुभव एवं खोजों के ज्ञान को व्यवहार में कैसे
> लाएं, - इस पर दिशा निर्देश दें । >>
> "सरकारी कार्यालयों में राजभाषा में काम के प्रतिशत को बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़े सरोकार"
> पर चर्चा करना इस समूह का उद्देश्य नहीं है । इस प्रकार की चर्चा सम्बद्ध कार्यालय में
> ही कर सकते हैं । इस समूह को केवल तकनीकी हिन्दी के बारे में सीमित रखेंगे तो अच्छा होगा ।
लोग अपने कार्यालय में या मित्रों परिवार में हिन्दी के उपयोग पर चर्चा करें, और इसमें
दूसरे लोगों को जो समस्याएँ आती हैं उनका ज़िक्र यहाँ पर करें तो यह अवश्य इस समूह के
स्कोप में होगा कि हममें से कोई उन समस्याओं के कोई तकनीकी समाधान देने का प्रयास करेंगे।
रावत
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इसलिए सावधानी रखें परंतु ज्यादा परेशान मत होएँ।
हाँ, हममें से जो लोग इन कन्वर्टरों का व्यावसायिक उपयोग करके धन अर्जित कर रहे हैं,
उनको नियमों का पता लगाना चाहिए। ध्यान रखें कि कानून का पता न होने से आपको सजा
में छूट नहीं मिलने वाली।
रावत
On 4/17/2011 10:22 AM India Time, _Anuradha R._ wrote:
> मुझे लगता है हरिराम जी ने कॉपीराइट का मसला सही उठाया है। हम बिना सोचे-समझे ही
> फॉन्ट कनवर्टरों का इस्तेमाल किए जा रहे हैं और दूसरों को भी लिंक आदि भेज रहे हैं। पर
> इन पर किसी कंपनी या समूह के एकाधिकार के बारे में भी पता होना चाहिए। अगर श्रीश
> जी का हाल में विकसित चाणक्य फॉन्ट कनवर्टर या फिर दूसरे, इस ग्रुप में उपलब्ध कनवर्टर
> कॉपीराइट से बाहर हैं, ओपन सोर्स के हैं, तो उनका भी पता रहे तो बेहतर ताकि बिना
> कानूनी कार्रवाई के डर के और बिना कानून तोड़े बेबाक उनका इस्तेमाल और प्रसार कर सकें।
>
> और यह काम भी फॉन्ट कनवर्टर विकसित करने और उनके प्रसार जितना ही महत्वपूर्ण है,
> बल्कि उसका हिस्सा ही है।
>
> सादर,
> -अनुराधा
>
> 2011/4/16 Hariraam <hari...@gmail.com <mailto:hari...@gmail.com>>
>
> कुछ वर्ष पहले मैंने Font converter बनाने में iiit.net <http://iiit.net> का
> सहयोग करने का कार्य किया था।
> देखें --
> http://ltrc.iiit.ac.in/showfile.php?filename=downloads/FC-1.0/fc.html
> फिर पाया कि -
> ये सिर्फ text मोड में सही कार्य करते हैं। मूल पाठ की फार्मेटिंग व डिजाइन व
> ले-आऊट सही बना रहे, ऐसे html कनवर्टर जरूरी थे।
> चूँकि मेरे पास CDAC के ISM का खरीदा गया लाईसैंसवाला वर्सन हैं, उसके font-code
> converter से काम चल जाता है। लेआऊट सहित भी पाठ कनवर्ट हो जाता है। आऊटपुट
> पाठ में त्रुटियाँ भी नगण्य रहती हैं। किन्तु सभी लोग तो ऐसे सॉफ्टवेयर खरीद नहीं सकते।
> अतः फिर बेहतर लगा SIL font-code-coverter, इसके कुछ कोड में परिवर्तन करके
> काम चलाया, जो MSword की Doc फाइलों को हूबहू लेआउट-सहित कनवर्ट करने में
> समर्थ हैं।
> फिर अनुनाद जी के मार्गदर्शन अनुसार FireFox में foxreplace के कनवर्टर बेहतर
> लगे, जो layout को हूबहू रखते हुए html पाठ को कनवर्ट कर पाते हैं।
> मेरे विचार में --
> Font-code-converter अस्थायी समाधान हैं। स्थायी समाधान के लिए
> Font-code-standardisation पर हमें अधिक जोर लगाना चाहिए। और सरकारी
> संस्थाओं का सहयोग करना चाहिए।
> यदि माईक्रोसॉफ्ट के TBIL converter
> या
> ildc.in <http://ildc.in> पर उपलब्ध 'परिवर्तन'
> 2011/4/15 narayan prasad <hin...@gmail.com <mailto:hin...@gmail.com>>
--
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ये सिर्फ text मोड में सही कार्य करते हैं। मूल पाठ की फार्मेटिंग व डिजाइन व ले-आऊट सही बना रहे, ऐसे html कनवर्टर जरूरी थे।
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कुछ वर्ष पहले मैंने Font converter बनाने में iiit.net का सहयोग करने का कार्य किया था।
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इण्टीग्रेटिड से आपका क्या आशय है? क्या यह कि एक ही इण्टरफेस में कई फॉण्टों के लिये कन्वर्टर उपलब्ध हों?
मेरा कुछ और फॉण्ट परिवर्तक जोड़ने का इरादा परन्तु हर फॉण्ट के लिये नहीं। मैं केवल कुछ सर्वाधिक प्रचलित फॉण्टों हेतु ही परिवर्तक बनाने का इच्छुक हूँ।
ये सिर्फ text मोड में सही कार्य करते हैं। मूल पाठ की फार्मेटिंग व डिजाइन व ले-आऊट सही बना रहे, ऐसे html कनवर्टर जरूरी थे।
हालिया कन्वर्टर बनाते समय मेरे दिमाग में यह भी था कि फॉर्मेटिंग बरकरार रखते हुये कन्वर्ट हो सके लेकिन मैंने पाया कि रिच टैक्स्ट में रिप्लेस फंक्शन चलाने पर लातिन पाठ में तो फॉर्मेटिंग ठीक रहती है लेकिन यूनिकोड पाठ में नष्ट हो जाती है। यह देखकर मुझे काफी निराशा हुयी थी। हालाँकि लिगेसी फॉण्ट से यूनिकोड परिवर्तक में शायद फॉर्मेटिंग बरकरार रखी जा सकती है।
समस्या ये है कि ज्यादातर कन्वर्टर टैक्स्ट बॉक्स या फाइल से एक string वैरियेबल में इनपुट डलवाते हैं जो कि फॉर्मेटिंग हैण्डल नहीं कर सकता। इसके अलावा डॉट नेट या जावा आदि में विभिन्न प्रकार की फाइलों (जैसे ऑफिस फाइलें आदि) में सीधे काम किया जा सकता है लेकिन उनके लिये उस सॉफ्टवेयर का रैफरेंस जोड़ना होता है। अब इसमें दो समस्यायें हैं, एक तो वह सॉफ्टवेयर कम्प्यूटर में इंस्टाल होना चाहिये, ऊपर से कन्वर्टर केवल उस वर्जन वाले सॉफ्टवेयर पर ही कार्य करेगा। उदाहरण के लिये वर्ड 2007 के लिये बनाया गया कन्वर्टर वर्ड 2003 के लिये काम नहीं करेगा तथा 2007 के लिये भी तभी काम करेगा जब कम्प्यूटर में वह इंस्टाल हो। यानि केवल वर्ड के लिये ही हर संस्करण के लिये अलग कन्वर्टर (मतलब अलग कोड) बनाना पड़ेगा, साथ ही प्रोग्राम बनाते वक्त भी वह सॉफ्टवेयर इंस्टाल होना चाहिये और प्रयोक्ता द्वारा चलाते वक्त भी उसके कम्प्यूटर पर होना चाहिये। इन सारे झंझटों के कारण इस तरह का कन्वर्टर बनाने का इरादा मैंने त्याग दिया।
किन्तु हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य अपने अपने बहुमूल्य समय से समय निकाल कर कुछ कुछ योगदान दे रहे हैं। कोई एकीकृत प्लेटफार्म नहीं है। कोई निश्चित open source tools से deveop नहीं किए गए हैं
जैसा कि श्रीश जी, .Net, C# से कनवर्टर आदि टूल्स बनाकर निःशुल्क उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन .Net, C# आदि माईक्रोसॉफ्ट के कॉपीराइट हैं, इनका उपयोग कर उत्पाद विकसित कर दूसरों को प्रदान करने के लिए भी शायद लाईसेंस व कापीराइट संबंधी मामले खड़े हो सकते हैं।
और फिर legacy फोंट विभिन्न बहुभाषी सॉफ्टवेयर निर्माताओं के कॉपीराइट हैं, इनके आधार पर कुछ कनवर्टर आदि विकसित करके लोगों को मुफ्त बाँटना भी जोखिम वाला कार्य है। क्योंकि इनके निर्माता चाहें तो कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। क्योंकि इस प्रकार मुफ्त कनवर्टर उपलब्ध करवा देने से उनके सॉफ्टवेयर की बिक्री पर बुरा असर पड़ता है।
उदाहरण के लिए यदि चाणक्य फोंट से युनिकोड व युनिकोड से चाणक्य फोंट का कनवर्टर निःशुल्क उपलब्ध हो तो कोई Indica जैसा सॉफ्टवेयर क्यों खरीदेगा, वह OS की default IME से देवनागरी युनिकोड में पाठ इनपुट कर लेगा, फिर चाणक्य में कनवर्ट करके मुद्रण हेतु उपयोग करेगा।
कुछ वर्ष पहले मैंने Font converter बनाने में iiit.net का सहयोग करने का कार्य किया था।
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अगर श्रीश जी का हाल में विकसित चाणक्य फॉन्ट कनवर्टर या फिर दूसरे, इस ग्रुप में उपलब्ध कनवर्टर कॉपीराइट से बाहर हैं, ओपन सोर्स के हैं, तो उनका भी पता रहे तो बेहतर ताकि बिना कानूनी कार्रवाई के डर के और बिना कानून तोड़े बेबाक उनका इस्तेमाल और प्रसार कर सकें।
ऐसे में कॉपीराइट की जानकारी कनवर्टर के साथ ही मिल जाए तो अच्छा रहे।
..... जिस फॉन्ट के आधार पर या जिस सॉफ्टवेयर से फॉन्ट कनवर्टर विकसित किए गए हैं, उस मूल सामग्री के कॉपीराइट के बारे में तो डेवेलपर ही बता सकता है। इन कनवर्टर्स का प्रसार गैर-सदस्यों तक भी हो रहा है, जिनमें से कुछ व्यावसायिक इस्तेमाल भी कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कोई पुस्तक या पत्रिका प्रकाशक या संपादक किसी और फॉन्ट में प्राप्त संपादकीय सामग्री को अपनी संस्था के मानक फॉन्ट में बदलता है तो वह व्यावसायिक काम हुआ। पर उसे उस कनवर्टर के सोर्स और आधार सामग्री का पता कैसे चले?-अनुराधा
इसी विषय के अन्य एक ईमेल के उत्तर में लिख चुका हूँ, हालांकि आजकल इन पुराने फोंट्स के बारे
में कोई कापीराइट संबंधी दावा करेगा, यह आशंका नहीं है।
लेकन 1997-98 के दौरान जब भारतीय लिपियों में कम्प्यूटिंग के लिए सीडैक के ISM, LEAP,
मॉड्यूलर के Srilipi, तथा अन्य संस्थाओं के आकृति, इंडिका, एपीएस आदि सॉफ्टवेयर पैकेज
बाजार में फैले हुए थे। तथा किसी के फोंट में किया गया पाठ किसी अन्य के फोंट में खुलना
असम्भव था।
उस दौरान मैंने ओड़िआ लिपि के फोंट्स के परिवर्तक बनाए थे, ISCII आधारित तकनीकी के
द्वारा। तो मुझे उन सॉफ्टवेयर के विक्रेताओं द्वारा काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा था।
और अनन्तः मुझे अपने वे सारे कार्य delete करने पड़े थे। क्योंकि उनके आर्थिक स्वार्थ में आँच आ
रही थी।
-- हरिराम
मैं दो दिन बाहर था इसलिये उत्तर नहीं दे पाया। हरिराम जी ने दो तरह के प्रश्न उठाये हैं। एक तो प्रोग्रामिंग भाषा सम्बन्धी दूसरा फॉण्ट सम्बन्धी।
पहले प्रोग्रामिंग भाषा सम्बन्धी।
किन्तु हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य अपने अपने बहुमूल्य समय से समय निकाल कर कुछ कुछ योगदान दे रहे हैं। कोई एकीकृत प्लेटफार्म नहीं है। कोई निश्चित open source tools से deveop नहीं किए गए हैं
पता नहीं लोगों को ये गलतफहमी क्यों है कि मुक्त स्रोत (ओपन सोर्स) सॉफ्टवेयर सिर्फ जावा में ही बनाये जा सकते हैं।
इस समूह पर उपलब्ध अधिकांश कन्वर्टर जावास्क्रिप्ट में बने हैं जिसमें बने प्रोग्राम का सोर्स कोई भी देख सकता है,
हालाँकि जब तक प्रोग्रामर खुद मुक्त घोषित न करे ये भी कॉपीराइट के अन्तर्गत आते हैं। इसलिये कोई भी चाहे तो उस प्रोग्राम के विकासकर्ता से अनुमति लेकर उसके कोड का प्रयोग कर सकता है।
ओपन सोर्स टूल बनाने के लिये प्रयोग की जा रही भाषा का खुद में ओपन सोर्स होना जरुरी नहीं है। जावा भी कुछ समय पहले ही ओपन सोर्स हुयी है (मुफ्त हमेशा से थी)। डॉट नेट ओपन सोर्स नहीं है लेकिन क्या फर्क पड़ता है। जावा ओपन सोर्स है लेकिन कितने जावा प्रोग्रामर हैं जो उसके कोड को सुधारने में योगदान देते हैं। यदि आप जावा भाषा में सुधार हेतु योगदान देना चाहते हैं तो बात अलग है वरना आप चाहे किसी भाषा में टूल बनायें, उसे ओपन सोर्स कर सकते हैं।
जैसा कि श्रीश जी, .Net, C# से कनवर्टर आदि टूल्स बनाकर निःशुल्क उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन .Net, C# आदि माईक्रोसॉफ्ट के कॉपीराइट हैं, इनका उपयोग कर उत्पाद विकसित कर दूसरों को प्रदान करने के लिए भी शायद लाईसेंस व कापीराइट संबंधी मामले खड़े हो सकते हैं।
C# या VB.NET प्रोग्रामिंग भाषायें हैं, .NET एक सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म जबकि Visual Studio उनमें सॉफ्टवेयर बनाने हेतु एक IDE (Integral Development Environment - एक सॉफ्टवेयर जिसमें प्रोग्रामिंग हेतु कई तरह की सुविधायें होती हैं)। मूल्य IDE का होता है प्रोग्रामिंग भाषा का नहीं।
जावा के लिये प्रोग्राम बिना IDE के केवल उसके SDK का प्रयोग करके किसी टैक्स्ट ऍडीटर (यथा नोटपैड) का प्रयोग करके भी बनाये जा सकते हैं या फिर उसके लिये Eclipse तथा Netbeans आदि मुफ्त IDE उपलब्ध हैं।
इसी प्रकार माइक्रोसॉफ्ट के विजुअल स्टूडियो के कई संस्करण हैं - प्रोफैशनल, ऍण्टरप्राइज आदि जिनमें Express Edition (जिसमें थोड़ी कम सुविधायें हैं) माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। आपके मेरे जैसे बन्दों के काम के लिये ये पर्याप्त है, हमें विजुअल स्टूडियो के पेड संस्करण खरीदने की जरुरत नहीं। यह मुफ्त ऍडीशन भी जावा के IDE से ज्यादा यूजर फ्रैण्डली है। इसके अलावा माइक्रोसॉफ्ट कुछ योजनाओं के अन्तर्गत प्रोग्रामिंग सीखने वालों को विजुअल स्टूडियो के मुफ्त लाइसेंस भी देता है।
इसके अतिरिक्त डॉट नेट में सॉफ्टवेयर बनाने हेतु Mono नामक एक मुफ्त IDE भी है। लिनक्स में डॉट नेट प्रोग्राम बनाने/चलाने हेतु MonoDevelop नामक IDE है। यही नहीं मोनो के आइओऍस हेतु MonoTouch तथा ऍण्ड्रॉइड हेतु Mono for Android नाम से भी विजुअल स्टूडियो प्लगइन हैं (हालाँकि वे शायद मुफ्त नहीं हैं)।
यानि मोनो के जरिये जावा की तरह डॉट नेट भी क्रॉस प्लेटफॉर्म हो गयी है। तो आप डॉट नेट में भी मुफ्त में प्रोग्राम बना सकते हैं। उन्हें चाहे मुफ्त रखिये चाहे मुक्त स्रोत रखिये चाहे क्रॉस प्लेटफॉर्म बनाइये।
अब बात आती है कि हम डॉट नेट में प्रोग्राम बना कर उन्हें मुफ्त बाँट सकते हैं या नहीं। हम चाहे ऊपर बताये किसी भी तरीके से डॉट नेट में प्रोग्राम बनायें, उन्हें मुफ्त बाँट सकते हैं या बेच सकते हैं। पहली बात तो मैं बता ही चुका हूँ कि डॉट नेट में प्रोग्राम बनाने के लिये मुफ्त IDE उपलब्ध हैं। दूसरी बात आप किसी सॉफ्टवेयर को देख-जाँच कर बता नहीं सकते कि वह कौन से विजुअल स्टूडियो से बना है मुफ्त के Express Edition या Professional/Enterprize या किसी और, वह वर्जन लाइसेंस्ड था या पाइरेटिड। और तो और बिना किसी विशेष तरीके के आप ये भी नहीं बता सकते कि वह किस डॉट नेट प्रोग्रामिंग भाषा से बना है (C# से या VB.NET से)।
इसलिये निश्चिंत रहें और डॉट नेट में मजे से प्रोग्राम बनायें, IDE का रोल टूल बनाने तक ही है, उसके बाद नहीं।और फिर legacy फोंट विभिन्न बहुभाषी सॉफ्टवेयर निर्माताओं के कॉपीराइट हैं, इनके आधार पर कुछ कनवर्टर आदि विकसित करके लोगों को मुफ्त बाँटना भी जोखिम वाला कार्य है। क्योंकि इनके निर्माता चाहें तो कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। क्योंकि इस प्रकार मुफ्त कनवर्टर उपलब्ध करवा देने से उनके सॉफ्टवेयर की बिक्री पर बुरा असर पड़ता है।
देखिये इस बारे में हमारे पास ऍक्सक्यूज है कि हम उनका मालिकाना फॉण्ट नहीं बाँट रहे, उसे बाँटें तो कॉपीराइट उल्लंघन होता है। तमाम सॉफ्टवेयरों के लिये अन्य थर्ड पार्टी टूल जैसे प्लगइन आदि बनते हैं। और वैसे भी ये कन्वर्टर असल में फॉण्ट कन्वर्टर न होकर फॉण्ट कोड कन्वर्टर ही हैं जो केवल एक मैपिंग को दूसरी मैपिंग में बदलते हैं, इस काम में उनका फॉण्ट कहीं भी शामिल नहीं होता, ये कन्वर्टर तब भी काम करते हैं चाहे वह फॉण्ट कम्प्यूटर में न हो।
और फिर मुझे तो लगता है कि ये कन्वर्टर उनके फॉण्टों के लिये लाभदायक ही हैं क्योंकि इन कन्वर्टरों की आउटपुट रॉ ऑस्की डाटा होता है, उसे प्रयोग या प्रिण्ट करने के लिये तो प्रयोक्ता को उनका फॉण्ट (खरीदकर) ही प्रयोग करना होगा जिससे उनके फॉण्ट की बिक्री बढ़ेगी है। उन्हें तो प्रसन्न होना चाहिये कुछ बड़े प्रकाशन उद्योगों को छोड़कर जहाँ उनके फॉण्टों का प्रयोग समाप्त होता जा रहा है, इन कन्वर्टरों के जरिये नये लोग भी थोड़ा-बहुत प्रयोग कर लेंगे।उदाहरण के लिए यदि चाणक्य फोंट से युनिकोड व युनिकोड से चाणक्य फोंट का कनवर्टर निःशुल्क उपलब्ध हो तो कोई Indica जैसा सॉफ्टवेयर क्यों खरीदेगा, वह OS की default IME से देवनागरी युनिकोड में पाठ इनपुट कर लेगा, फिर चाणक्य में कनवर्ट करके मुद्रण हेतु उपयोग करेगा।
वही बात, मुद्रण हेतु बन्दे को चाणक्य फॉण्ट तो प्रयोग करना (खरीदना) ही पड़ेगा, नहीं तो केवल लातिन काँटे-छुरी छपेंगे। तो इससे चाणक्य निर्माता का नुक्सान कहाँ हुआ।
हाँ अगर बात ये है कि बन्दा बिना खरीदे चाणक्य प्रयोग करे तो वो तो वैसे भी कर सकता है, पाइरेसी तो उनके मालिकाना सॉफ्टवेयरों की भी हो सकती है (होती है)।
यदि किसी का कॉपीराइट हो तो वहाँ सूचना मिलती है, यदि नहीं तो समझिए यह 'सर्वभूमि गोपाल की' अर्थात् कॉपीराइट मुक्त है।
--
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जावा में बने प्रोग्राम किसी भी OS में चल सकते हैं
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और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hi पर इस समूह पर जाएं.
>
> *JAVA और Javascript दोनों बिल्कुल अलग हैं। *
>
> -- हरिराम*
>
JAVA एक प्रोग्रामिंग भाषा है जैसे विजुअल बेसिक, पास्कल फ़ोर्ट्रान, कोबोल, जो कंप्यूटर
के आवश्यक कई काम कर सकती है। जबकि Javascript किसी ब्राउज़र (जैसे फ़ायरफ़ॉक्स) के
भीतर ही चलने वाली एक छोटी भाषा है जो केवल वही काम कर सकती है जो ब्राउज़र में
हो सकते हैं। इस प्रकार से दोनों अलग हैं, लेकिन फिर भी दोनों के सिन्टेक्सों (कोड लिखने
के तरीके) में काफ़ी समानताएँ हैं। यदि आप दोनों में एक को जानते हैं तो दूसरी को जाने
बिना आप उसका बहुत कुछ भाग समझ जाएँगे।
इसलिए दोनों को "बिल्कुल" अलग तो नहीं कहा जा सकता है।
रावत
> और कुछ कंपनियाँ स्वयं ही चाहती हैं कि उनके सॉफ्टवेयरों की भले ही पाइरेसी होती रहे,
> लेकिन यूजर्स की संख्या बढ़ती रहे।
>
>
> -- हरिराम*
सही कहा। जिस सॉफ़्टवेयर ने बहुत ज्यादा कठोर नियम बनाए कि उसकी पायरेसी नहीं हो
सकी, उसका उपयोग कम रहा और इस तरह से उसके उपयोगकर्ता कम रहे। ज्यादातर छात्र,
हैकर्स, गैर-वित्तीय उपयोगकर्ता मुफ़्त या पायरेटेड सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल ही करते हैं।
जिस सॉफ़्टवेयर के पायरेसी-रोधी नियमों को तोड़ना सरल होता है, उसका उपयोग बढ़ता
है, और इस तरह से उस सॉफ़्टवेयर को खरीदने वाले भी बढ़ते हैं।
रावत
अब डॉट नेट के मामले में भी यही बात है, औरों की बात तो अलग लेकिन लिनक्स के लिये बनाये ही जा सकते हैं।
किन्तु क्या .NET से लिनक्स व अन्य OS में चलनेवाले प्रोग्राम सही काम करेंगे। क्या .Netframework लिनक्स या अन्य OS के लिए भी होता है। क्या Mobile Phone के लिए भी कोई .Netframework होता है?
--
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--
Rawat
On 4/18/2011 7:26 PM India Time, _Hariraam_ wrote:
> यह सच है कि .NET बहुत ही यूजर फ्रेंडली वातावरण प्रदान करता है।
> किन्तु क्या .NET से लिनक्स व अन्य OS में चलनेवाले प्रोग्राम सही काम करेंगे। क्या
> .Netframework लिनक्स या अन्य OS के लिए भी होता है। क्या Mobile Phone के लिए
> भी कोई .Netframework होता है?
> -- हरिराम
>
> 2011/4/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com
> <mailto:sharma...@gmail.com>>