.pfm तथा pfb ऍक्सटेंशन वाले फॉण्ट

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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 7, 2011, 8:36:32 AM4/7/11
to technical-hindi
मित्रों pfm तथा .pfb ऍक्सटेंशन वाले लिगेसी फॉण्ट कैसे होते हैं? ये ट्रू टाइप फॉण्टों से किस तरह अलग होते हैं। मैंने पाया कि इनको किसी मैटर पर प्रोग्रामैटिकली  अप्लाइ नहीं किया जा सकता। इसका क्या कारण हो सकता है?

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Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
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Hariraam

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Apr 8, 2011, 7:59:30 PM4/8/11
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श्रीश जी,

फोंट निर्माण का इतिहास बताता है कि ...

1.  सर्वप्रथम MS DOS के जमाने में bitmap (.bmp) font का प्रयोग होता था। जैसे CouriorN10.bmp = अर्थात् 10 प्वांइट आकार वाला कोरियर normal फोंट,
Courior12.bmp = अर्थात् 12 प्वांइट आकार वाला कोरियर normal फोंट,
...
CouriorB24.bmp = अर्थात् 24 प्वांइट आकार वाला कोरियर Bold फोंट,

हरेक आकार के फोंट के लिए, हरेक स्टाइल (बोल्ड, इटालिक) के लिए, अलग अलग फोंट सेट बनाने पड़ते थे। इससे हार्डडिस्क स्पेस अधिक लगता था।

यो सारे फोंट किसी भी Dot matrick printer या PCL लेजर प्रिंटर पर मुद्रित हो पाते थे।

अतः मुद्रण उद्योग की सुविधा के लिए

2. पोस्टस्क्रिप्ट लेजर प्रिंटर का निर्माण हुआ। उस प्रिंटर के रोम में ऐसी सुविधा होती थी कि किसी एक .pfb फोंट, (जो एक फोंट की mathematical outline मात्र होता था) को जब Ventura publisher या अन्य किसी डिजाइनिंग सॉफ्टवेयर में प्रयोग किया जाता तो वह उसके user की कमांड के अनुसार प्वाइंट साइज आकार में छोटा - बड़ा होकर स्क्रीन पर प्रकट होता था। और पोस्टस्क्रिप्ट लेजर प्रिंटर (जिसके ROM-CARD) में फोंट्स व उसे छोटा बड़ा करनेवाले प्रोग्राम होते थे, से सही रूप में सेट होकर प्रिंट होता था।

3. जब विण्डोज 3.0 आया, तो माईक्रोसॉफ्ट ने .pfb के समरूप .ttf (TrueType) फोंट तकनीकी विकसित की। यह भी किसी फोंट की (Mathematical Outline) मात्र रखता है। तथा OS का TTF इंजन इसे छोटा बड़ा करके प्रकट करता है। 6 प्वाइंट से लेकर 600 प्वांइट तक छोटा बडा किया जा सकता है। हर साईज के अलग अलग फोंट बनाकर हार्डडिस्क में स्टोर करने की जरूरत नहीं पड़ती।

4. विण्डोज में .pfb फोंट्स को भी चलाने के लिए Adobe Type Manager नामक tool का प्रयोग होता था, जो .pfb से .pfm फोंट (postscript font matrics) स्वतः बनाकर यूजर के जरूरत के मुताबिक फोंट को छोटे-बड़े आकार में डिस्प्ले व मुद्रण करने में सहायक होता था।

5. पोस्टस्क्रिप्ट फोंट TTF font से कई माइनें में बेहतर होते हैं। -- शार्पनेस, स्पष्टता, लाइनस्पेसिंग की सटीकता, उन्नत किस्म की छपाई, तथा नेगेटिव प्रिंट व मिरर इमेज प्रिंट आदि जैसे उन्नत मुद्रण उपयोगों के लिए अनुकूल होते हैं।

किन्तु आजकल Open Type font के जमाने में युनिकोड के जमाने में पोस्टस्क्रिप्ट का प्रयोग कम होता जा रहा है।

-- हरिराम
--
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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 9, 2011, 1:07:16 AM4/9/11
to technic...@googlegroups.com
वाह हरिराम जी आपने सभी शंकाये दूर कर दी। मामला ये था कि मैंने अपने निर्माणाधीन चाणक्य कन्वर्टर में ट्रू टाइप फॉण्ट के हिसाब से बनाया था परन्तु फिर रविन्द्र जी से पता चला कि मुद्रण उद्योग में .pfm/.pfb (जिसका आपसे पता चला कि पोस्ट स्क्रिप्ट फॉण्ट है) प्रयोग होता है। इसका कारण वही गुण होंगे जो आपने बताये हैं। खैर मै दोनों ही तरह के फॉण्टों के लिये विकल्प बना दूँगा क्योंकि दोनों में दस-बारह ग्लिफ्स का ही अन्तर है।

९ अप्रैल २०११ ५:२९ पूर्वाह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:

Hariraam

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Apr 9, 2011, 9:29:34 AM4/9/11
to technic...@googlegroups.com
मेरी जानकारी में TTF और PFB/PFM फोंट्स में किन्हीं ग्लीफ का कोई अन्तर नहीं होता। सिर्फ उनको run करने वाले engine अलग होते हैं। जैसा कि सीडैक के सारे TTF और PFB फोंट्स के ग्लीफ व ASCII Codes समान होते हैं।
 
जो कनवर्टर TTF फोंट के लिए प्रयोग होता है, वही PFB/PFM के लिए भी।
 
चाणक्य फोंट के कई प्रारूप प्रचलित हैं। जो समय की मांग के अनुसार बदलते/अपग्रेड होते रहे हैं। यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।
 
----
 
पुनश्च :
 
मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।
 
बेहतर होता कि यदि --- समस्त विभिन्न कूटों वाले 8-bit फोंट को किसी एक निर्धारित 8-bit फोंट को मानकीकृत करके उसमें कनवर्ट तथा इसके विपरीत पुनःकनवर्ट करने का प्रोग्राम होता।
-- फिर उस मानकीकृत 8-bit फोंट से 16-bit-unicoded OT Fonts में कनवर्ट करने का एक स्थायी universal प्रोग्राम होता।
-- तथा 16-bit-unicode OT Fonts से मानकीकृत 8 bit फोंट में कनवर्ट करने का एक स्थायी universal प्रोग्राम होता।
-- इससे हरेक फोंट्स के code-maps को हरेक के साथ तुलना करके options set करके कनवर्ट करने की अनन्त काल तक चलनेवाली दुहरी-तिहरी मेहनत न करनी पड़ती।
 
क्योंकि 8-bit फोंट प्रणाली सहज सरल एक-स्तरीय है। यथा - 'कि' टाइप करने के लिए पहले छोटी-इ की मात्रा टाइप करके फिर 'क' टाइप करना पड़ता है। और वैसा ही स्क्रीन पर प्रकट होता है। और वैसा ही प्रिंट होता है।
 
किन्तु युनिकोड में 'क' पहले टाइप करके फिर छोटी-इ की मात्रा टाइप करनी पड़ती है, जो USP इंजन के द्वारा स्वतः Glyph positioning से स्थान बदलती है।
 
इसी प्रकार रेफ व अन्य कुछ संयुक्ताक्षरों का functional-positioning बदला जाता है। जो हरेक फोंट-कनवर्टर के options के प्रोग्राम में डालना पड़ता है।
 
अतः 8-bit फोंट से 16-bit OT Font में कनवर्ट करने के प्रोग्राम में काफी जटिलताएँ होतीं हैं।
 
किन्तु एक 8-bit फोंट से दूसरे 8-bit font में कनवर्ट के लिए सिर्फ एक कोड को दूसरे से बदलना पड़ेगा, अन्यान्य तकनीकी झंझट नहीं होंगे। और फिर टाइपिस्ट द्वारा input sequence गलत प्रयोग हो तो भी कोई ज्यादा गलत आउटपुट नहीं मिलेगा। कनवर्शन का काम सरल और सार्वत्रिक होगा।
 
मेरी जानकारी में सबसे अच्छा फोंट कनवर्टर APS Corporate 2000 नामक बहुभाषी सॉफ्टवेयर के निर्माताओं द्वारा निर्मित हुआ था। इसकी तकनीकी कार्यप्रणाली का आधार था--
 
Font-x1 -->ISCII -->Font-x1
Font-x2 -->ISCII -->Font-x2
......
Font-xx -->ISCII -->Font-xx
 
इसी के निर्माताओं द्वारा लगभग सभी प्रचलित फोंट के ISCII (ACII) code points वाले system फोंट्स भी बनाए गए थे। इससे कनवर्शन में त्रुटिरहित आउटपुट प्राप्त करने में मदद मिलती थी।
 
खैर, अन्दरुनी रहस्य तो इसके निर्माता ही बता सकते हैं, क्योंकि यह propritory सॉफ्टवेयर है।
 
निष्कर्ष :
 
16 बिट युनिकोडेड OT Fonts का प्रचलन हो जाने के बावजूद अभी भी 8-bit Indic फोंट्स के Font-code का मानकीकरण किए जाने की आवश्यकता है तथा भारी उपयोगिता है। क्योंकि अभी अनेक वर्षों तक आम जनता द्वारा छोटे मोटे प्रकाशन उद्योग द्वारा 8-bit फोंट के आधार पर ही कार्य होता रहेगा।
 
युनिकोड -- विशेषकर देवनागरी युनिकोड तो एक प्रकार से भानुमति का पिटारा बन गया है, जिसमें आम जनता को भ्रम ही भ्रम ही भ्रम होता रहेगा।
 
क्योंकि अनेक फोंट्स के प्रयोग और उनके कनवर्टर के प्रयोग और फिर भी पाठ को मैनुअली सुधार करने में विश्व की जनता के जितने Man-hour बर्बाद होते हैं, जितना E-Space, Server-time-use, मानसिक, शारीरिक परेशानी उठानी होती है, उसका आकलन किया जाए तो लगभग प्रतिवर्ष 2 करोड़ डालर के व्यय के बराबर हो जाएगा।
 
 -- हरिराम

2011/4/9 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

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Apr 9, 2011, 7:47:02 PM4/9/11
to technic...@googlegroups.com
यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।

पहले मैंने भी यही सोचा था परन्तु जब मैंने अपने पास मौजूद ट्रू-टाइप के लिये कन्वर्टर बनाकर एक मित्र को भेजा जिसके पास टाइप-१ था तो उसने बताया कि कन्वर्जन में फर्क है तब मैंने जाँचा तो पाया कि उनमें दस-बारह ग्लिफ का अन्तर है।

आम तौर पर टीटीऍफ फॉण्टों में वर्जन नम्बर लिखा होता है लेकिन चाणक्य के इन दोनों फॉण्टों (टीटीऍफ और पोस्ट स्क्रिप्ट) में अंकित नहीं है, जिस कारण में उनके लिये Type-1 तथा TrueType नाम ही प्रयुक्त कर रहा हूँ।

मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।

पहले मैं भी यही सोचता था कि अब के जमाने में कौन पुराने लिगेसी फॉण्ट प्रयोग करता है लेकिन पहली बार मुझे इनकी उपयोगिता समझ आयी जब मेरे यमुनानगर के एक साथी चिट्ठाकार ने मुझसे अपनी कृतिदेव में लिखी तीस-चालीस कवितायें यूनिकोड में बदलने का उपाय पूछा। दूसरी बार उपयोगिता तब मालूम पड़ा जब उनके यूनिकोड में भेजे मैटर को अखबार वालों ने कचरा हुआ बताकर चाणक्य में भेजने की माँग की। कन्वर्टरों की उपयोगिता वही समझता है जिसका काम अटका पड़ा हो। आजकल हिन्दी चिट्ठाकारी पर जो किताब छापी जा रही है उसमें यूनिकोड को ८ बिट फॉण्ट में कन्वर्टरों के उपयोग से बदलकर ही छापा जा रहा है।

हकीकत ये है कि तमाम प्रकाशन एवं समाचार-पत्र उद्योग अभी भी ८ बिट फॉण्टों का ही उपयोग करता है। आप किसी समाचार-पत्र या प्रकाशन वाले को नहीं समझा सकते कि भइया यूनिकोड में काम करो (जिसके लिये उसे अपनी पूरी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा) या इस फलाने कथित मानक ८ बिट फॉण्ट में काम करो, ऊपर से जो अभी बना ही नहीं है, बना होता तो शायद कोई सोचता भी उस बारे। वैसे मुझे पता चला कि समाचार-पत्रों तथा पुस्तकों के प्रकाशन हेतु चाणक्य अघोषित मानक है इसीलिये मैं उसका शुद्धतम कन्वर्टर बनाने हेतु प्रयासरत हूँ। मेरा इरादा केवल कुछ सर्वाधिक प्रचलित फॉण्ट हेतु ही कन्वर्टर बनाने का है सभी सैकड़ो फॉण्टों के लिये नहीं।

मैं आपकी बातों से सहमत हूँ कि प्रकाशन सम्बन्धी कार्यों के लिये एक मानक फॉण्ट बनाया जाना चाहिये जिसमें देवनागरी के सभी वर्ण-चिह्न हों, जो छपायी हेतु सुन्दर हो, इसके दो संस्करण हों एक जो संयुक्ताक्षरों को पारम्परिक रुप से दिखाये दूसरा सरल रुप से। लेकिन यह सरकार ही कर सकती थी जैसे उसने हिन्दी का मानक कीबोर्ड बनाकर किया। आप मैं कोई फॉण्ट बनाकर लोगों को कह नहीं सकते कि लो जी ये फॉण्ट लो इसे ही प्रयोग करो, .मानक बनाओ।

आप अपने सरकारी/विभागीय सम्पर्कों द्वारा ऐसा प्रस्तावित फॉण्ट बनाने एवं उसे मानक स्थापित करवाने की दिशा में कोई प्रयास करें, उसके लिये तमाम फॉण्टों से कन्वर्टर हम बना देंगे।

प्रसंगवश ये बतायें कि इस्की आधारित सभी फॉण्ट क्या समान कूटों का प्रयोग करते हैं?

९ अप्रैल २०११ ६:५९ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
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Anuradha R.

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Apr 10, 2011, 5:36:58 AM4/10/11
to technic...@googlegroups.com, Hariraam
हरिराम जी,
मैं सचमुच आभारी हूं कि आपने यह मसला उठाया। 

कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक मेल में भी ऐसी ही राय जाहिर की थी कि क्यों नहीं मानक फॉन्ट का इस्तेमाल करके/मानक फॉन्ट विकसित करके हम हिंदी में काम को एकदम सरल बना लेते। बजाए इसके कि हर फॉन्ट के कनवर्टर्स बनाने और उनके प्रसार में ढेरों समय और संसाधन कर्च करें। फॉन्ट कनवर्टर की जरूरत सबको होती है, लेकिन कितनों के पास ये लिंक, ये सुविधा पहुंच पाती है? ये परिवर्तन तकनीक मिल जाए, उसके बाद भी कई दिक्कतें रह जाती हैं, कई फॉन्ट बिना बदले रह जाते हैं, जो लोगों को हिंदी कंप्यूटिंग से हतोत्साहित करने का काम बखूबी करते हैं।

एक मसला है कि कई प्रकाशन संस्थान अब भी अपने बनाए पुराने फॉन्टों पर ही काम करते हैं, कई कारणों से। 

दूसरा मसला है कि विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां, जिनके सॉफ्टवेयर हम आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं, हिंदी के कंपैटिबल सॉफ्टवेयर तत्काल नहीं बनातीं। उनके बेहिसाब बिकने वाले भारतीय वर्जन्स में भी अंग्रेजी की ही ज्यादा सुविधा ही रहती है। एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं। 

लेकिन, क्या हम सब, कंप्यूटर को हिंदी इस्तेमाल करने वाले मिलकर एक प्रेशर ग्रुप बना सकते हैं कि इन कंपनियों को अपने भारतीय एडीशंस को यूनिकोड कंपैटिबल बनाना पड़े, जैसा कि चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के लिए होता है। वैसे भी, भारत उनके लिए बड़ा बाजार है, इसकी मांग को वो नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हम हिंदी कंप्यूटिंग के मानकीकरण के लिए संबद्ध एजेंसियों पर दबाव नहीं डाल सकते? यह तकनीक विकसित करने से ज्यादा, उस तकनीक की सुविधा को ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहज पहुंच के दायरे के भीतर लाना है।

मैं इस पर काम करने को तैयार हूं। किसी के पास कोई रास्ता/उपाय/योजना/सुझाव है, तो कृपया शेयर करें।
सादर,
-अनुराधा


2011/4/9 Hariraam <hari...@gmail.com>
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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 10, 2011, 7:20:06 AM4/10/11
to technic...@googlegroups.com
एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं।

आपसे सहमत हूँ अनुराधा जी। बस एक बात, अडॉबी के लगभग सभी मुख्य उत्पादों के मिडल ईस्टर्न संस्करणों में यूनिकोड समर्थन उपलब्ध है। यह लेख पढ़ें -
 
http://epandit.shrish.in/322/download-photoshop-with-hindi-indic-unicode-support/

१० अप्रैल २०११ ३:०६ अपराह्न को, Anuradha R. <ranur...@gmail.com> ने लिखा:



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Anuradha R.

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Apr 10, 2011, 8:15:49 AM4/10/11
to technic...@googlegroups.com, ePandit | ई-पण्डित
श्रीश जी,
जानकारी बढ़ाने के लिए बहुत धन्यवाद। जरूर, मैं फोटोशॉप का यह वर्जन डाउनलोड करूंगी। लेकिन जो बात मैं कहना चाहती थी, कि बारतीय वर्जन्स में क्यों यह तकनीकी सपोर्ट नहीं मिलता? हमें क्यों ये सॉफ्टवेयर उधार लेने पड़ें जबकि सिर्फ हिंदी नहीं, सभी बारतीय बाषाओं का काम इन वर्जन्स से चल निकलेगा, यानी यहां उन्हें बड़ा बाजार तैयार मिलेगा।
-अनुराधा
2011/4/10 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

Hariraam

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Apr 10, 2011, 8:18:36 AM4/10/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
सन् 1991 में CDAC के तत्वावधान में भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग के लिए ISCII-1991 (Indian Script Code for information interchange) का मानकीकरण भारत सरकार के भारतीय मानक संस्थान द्वारा BIS - ISI द्वारा किया गया था।

इसी के साथ ISFOC (Indian Script Font Code) की डिजाइनिंग की गई थी, ISFOC fonts का निर्माण हुआ था। किन्तु दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया।
भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के TDIL द्वारा भी Font-codes के draft जारी किए गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया। कई तकनीकी-सामाजिक कारण रहे होंगे।

कालक्रम में ISFOC fonts में समय की मांग के अनुसार अनेक परिवर्तन होते रहे, - Monolingual, Bilingual, Mono.Web, Bi.-Web, ISO आदि कई समूह बन गए। विभिन्न साफ्टवेयर निर्माताओं द्वारा अपने अपने फोंट्स बना लिये गए। किन्तु Font Code निर्धारित न होने के कारण किसी में कोई एकरूपता नहीं रही।

Internet का विकास होने पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर Unicode की जरूरत महसूस हुई और इसके प्रचलन के बाद ISCII लगभग मृत हो गया। हालांकि आरम्भ में युनिकोड भी ISCII की हूबहू कॉपी ही था। किन्तु कालक्रम में अन्य वर्ण-चिह्नों को जोड़े जाते रहते रहते आज Unicode वर्सन 6.0 में देवनागरी के कूटों में अनेक वर्णों, चिह्नों, मात्राओं आदि के code number निर्धारित किए जा चुके हैं। लेकिन इसका Latin के Unicode-समूहों की तरह Basic और Extended समूहों में तार्किक रूप से सजाकर न रखे जाने, वर्णक्रमानुसार छाँटने (Sorting, indexing) की सरल व्यवस्था न होने के कारण, तथा Complex Script वर्ग में होने, आदि कई कारणों से Indic Unicode समस्याग्रस्त रहा है।

सबसे बड़ी समस्या आई है Unicode की stability policy के कारण -- जिसके कथन का आशय है "Even if completely wrong, once encoded character, can't be corrected, deleted or edited", इस कारण कई त्रुटियाँ रह गईं हैं जिनके कारण जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

और सबसे बड़ी समस्या आती है, विश्व मंच पर भारतीय विद्वानों को कम दर्जे का आँका जाने, IBM, ADOBE, Microsoft तथा विकसित राष्ट्रों के विद्वानों/तकनीकी-गुरुओं का वीटो पावर ज्यादा होने के कारण भारतीय भाषाओं की समस्याओं को सही रीति समझा नहीं जाता और सरल समाधान प्रदान करने की वजाय, (शायद जान-बूझकर) या अनजाने में जटिल प्रक्रियाओं को ठूँस-ठाँस कर भारतीय लिपियों की परम्परागत रूप में rendering की व्यवस्था की जाती है।

वर्तमान जरूरत -

-- जैसा कि Unicode भी एक प्राईवेट मानक संस्थान है, कोई सरकारी नहीं।
-- जैसा कि ISO-9000, ISO-14000, ISO-xxxx आदि मान्यताएँ प्रदान करनेवाले संस्थान भी प्राईवेट संस्थान हैं, कोई सरकारी नहीं।
-- इसी प्रकार हम कुछ  विद्वान मिलकर निजी क्षेत्र में एक मानक संस्थान गठित कर पंजीकरण करवा सकते हैं।
-- सर्वप्रथम हिन्दी(देवनागरी) के लिए फोंट कोड (Font code) के मानक निर्धारित करें।
-- फिर बाद में भारत के संविधान में मान्यता-प्राप्त 22 भाषाओं के font-code के लिए भी मानकीकरण का कार्य करें।
-- Font code के मानकीकरण के पश्चात, Indic sorting order के मानकीकरण, संयुक्ताक्षरों, पूर्णाक्षरों के लिए मानकों का निर्धारण, ...... समय की जरूरत के मुताबिक अन्य मानकों के निर्धारण के लिए कार्य करें।
-- इस मानक संस्थान के by-law में Unicode की stability policy के विपरीत ऐसी व्यवस्था हो कि निर्धारित मानकों में यदि भविष्य में कोई त्रुटि या गलती पाई जाए तो मानक का अगला वर्सन रिलीज करने के वक्त सुधार कर लिया जाएगा।
-- जब कोई एक मानक होगा, तो लोग उसका अनुकरण करेंगे ही। क्रमशः मानकों को क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी, प्रयोग बढ़ेगा। फिर राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सकेगी। और अन्ततः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल पाएगी।
-- Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।

-- इस बारे में एक गूगल समूह  <https://groups.google.com/group/indicoms?hl=en> अलग से बनाकर कुछ प्रयास किया गया है।

-- कुछ सकारात्मक समान विचारों वाले विद्वानों/तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके एक संगठन बनाकर इस दिशा में कार्य आगे बढ़ाने हेतु सभी से मदद का अनुरोध है।

-- हरिराम

Anuradha R.

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Apr 10, 2011, 8:34:31 AM4/10/11
to technic...@googlegroups.com, Hariraam, indi...@googlegroups.com
मेरी जानकारी इस विषय पर और बढ़ी। :-) 
अब मसला यह भी है कि एक ग्रुप बनाकर खुद यह काम करें या लॉबीइंग (सकारात्मक अर्थ में) के जरिए मौजूदा कंपनियों से कहें। नीचे के स्तर से शुरू करके ऊपर पहुंचा जाए या पहले ही व्यापक फलक को संबोधित किया जाए। मेरा अनुभव तो कुछ नहीं है इस मामले में, लेकिन जब --

" Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।"

ऐसे में क्यों न एकजुटता के साथ उसी स्तर से इस मानकीकरण करने का प्रयास किया जाए। इसमें भारत सरकार और संसद तक मामले को पहुंचाया जाए और उनसे इस पर सहमति ली जाए। ऐसे में यूनिकोड सहज ही यह काम करेगा। (अति- आशावाद तो नहीं है न यह?!) क्या इस बारे में सी-डैक में संबंधित उच्चाधिकारियों/तकनीकी विशेषज्ञों से बात की जाए? वे कुछ कर पाएंगे?

अगर इस ग्रुप में कोई सीडैक से संबंधित हैं तो कृपया बताएं, वरना मैं वहां स्वयं संपर्क करने की कोशिश करूं। 

मैं जानती हूं कि आप सब अनुभवी हैं और इस मसले पर मुझसे पहले से काम कर रहे हैं और इसलिए मेरा अति-उत्साह किसी को बचकाना भी लग सकता है। लेकिन कोई तो उपाय होना चाहिए न!!!
-अनुराधा

2011/4/10 Hariraam <hari...@gmail.com>

--
आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)" समूह की सदस्यता ली है.
इस समूह में पोस्ट करने के लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल भेजें.
इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए, technical-hin...@googlegroups.com को ईमेल करें.
और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hi पर इस समूह पर जाएं.

Anuradha R.

unread,
Apr 10, 2011, 9:23:17 AM4/10/11
to technic...@googlegroups.com, Hariraam, indi...@googlegroups.com
हरिराम जी और श्रीश जी,
मैंने अभी-अभी आप लोगों के पुराने पोस्ट/ चिट्ठे पढ़े और लगा कि और लोग भी मेरी तरह ही सोच रहे हैं (और आप लोग इसमें सक्रिय तकनीकी योगदान भी दे पा रहे हैं।)।  बात आगे जरूर बढ़नी चाहिए। मैं काफी समय से इस मसले पर सोच रही थी और नवंबर 1998 में नवभारत टाइन्स में लेख 'सूचना महामार्ग में कहां है हिंदी' भी लिखा था जो मुख्यतः इसके व्यावहारिक पक्ष को लेकर था। लेकिन आज, 13 साल बाद भी हमें उसी तकनीकी कमी-रुकावट पर उसी जरूरत पर चर्चा करनी पड़े, इससे बुरा क्या हो सकता है? बात सचमुच वहां से आगे नहीं बढ़ी है।  यह संदेश भी फैलना चाहिए।
-अनुराधा

2011/4/10 Anuradha R. <ranur...@gmail.com>

Narendra Sisodiya

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Apr 10, 2011, 8:27:37 AM4/10/11
to indi...@googlegroups.com, Hariraam, technic...@googlegroups.com


2011/4/10 Hariraam <hari...@gmail.com>

सन् 1991 में CDAC के तत्वावधान में भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग के लिए ISCII-1991 (Indian Script Code for information interchange) का मानकीकरण भारत सरकार के भारतीय मानक संस्थान द्वारा BIS - ISI द्वारा किया गया था।

इसी के साथ ISFOC (Indian Script Font Code) की डिजाइनिंग की गई थी, ISFOC fonts का निर्माण हुआ था। किन्तु दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया।
भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के TDIL द्वारा भी Font-codes के draft जारी किए गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया। कई तकनीकी-सामाजिक कारण रहे होंगे।

कालक्रम में ISFOC fonts में समय की मांग के अनुसार अनेक परिवर्तन होते रहे, - Monolingual, Bilingual, Mono.Web, Bi.-Web, ISO आदि कई समूह बन गए। विभिन्न साफ्टवेयर निर्माताओं द्वारा अपने अपने फोंट्स बना लिये गए। किन्तु Font Code निर्धारित न होने के कारण किसी में कोई एकरूपता नहीं रही।

Internet का विकास होने पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर Unicode की जरूरत महसूस हुई और इसके प्रचलन के बाद ISCII लगभग मृत हो गया। हालांकि आरम्भ में युनिकोड भी ISCII की हूबहू कॉपी ही था। किन्तु कालक्रम में अन्य वर्ण-चिह्नों को जोड़े जाते रहते रहते आज Unicode वर्सन 6.0 में देवनागरी के कूटों में अनेक वर्णों, चिह्नों, मात्राओं आदि के code number निर्धारित किए जा चुके हैं। लेकिन इसका Latin के Unicode-समूहों की तरह Basic और Extended समूहों में तार्किक रूप से सजाकर न रखे जाने, वर्णक्रमानुसार छाँटने (Sorting, indexing) की सरल व्यवस्था न होने के कारण, तथा Complex Script वर्ग में होने, आदि कई कारणों से Indic Unicode समस्याग्रस्त रहा है।

सबसे बड़ी समस्या आई है Unicode की stability policy के कारण -- जिसके कथन का आशय है "Even if completely wrong, once encoded character, can't be corrected, deleted or edited", इस कारण कई त्रुटियाँ रह गईं हैं जिनके कारण जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

और सबसे बड़ी समस्या आती है, विश्व मंच पर भारतीय विद्वानों को कम दर्जे का आँका जाने, IBM, ADOBE, Microsoft तथा विकसित राष्ट्रों के विद्वानों/तकनीकी-गुरुओं का वीटो पावर ज्यादा होने के कारण भारतीय भाषाओं की समस्याओं को सही रीति समझा नहीं जाता और सरल समाधान प्रदान करने की वजाय, (शायद जान-बूझकर) या अनजाने में जटिल प्रक्रियाओं को ठूँस-ठाँस कर भारतीय लिपियों की परम्परागत रूप में rendering की व्यवस्था की जाती है।

वर्तमान जरूरत -

-- जैसा कि Unicode भी एक प्राईवेट मानक संस्थान है, कोई सरकारी नहीं।
-- जैसा कि ISO-9000, ISO-14000, ISO-xxxx आदि मान्यताएँ प्रदान करनेवाले संस्थान भी प्राईवेट संस्थान हैं, कोई सरकारी नहीं।
-- इसी प्रकार हम कुछ  विद्वान मिलकर निजी क्षेत्र में एक मानक संस्थान गठित कर पंजीकरण करवा सकते हैं।

परन्तु यूनिकोड  में सारे अक्षर है, फिर दिक्कत  क्या है ?
हम लोग कोई बैठक कर सकते है |


-- सर्वप्रथम हिन्दी(देवनागरी) के लिए फोंट कोड (Font code) के मानक निर्धारित करें।
-- फिर बाद में भारत के संविधान में मान्यता-प्राप्त 22 भाषाओं के font-code के लिए भी मानकीकरण का कार्य करें।
-- Font code के मानकीकरण के पश्चात, Indic sorting order के मानकीकरण, संयुक्ताक्षरों, पूर्णाक्षरों के लिए मानकों का निर्धारण, ...... समय की जरूरत के मुताबिक अन्य मानकों के निर्धारण के लिए कार्य करें।
-- इस मानक संस्थान के by-law में Unicode की stability policy के विपरीत ऐसी व्यवस्था हो कि निर्धारित मानकों में यदि भविष्य में कोई त्रुटि या गलती पाई जाए तो मानक का अगला वर्सन रिलीज करने के वक्त सुधार कर लिया जाएगा।
-- जब कोई एक मानक होगा, तो लोग उसका अनुकरण करेंगे ही। क्रमशः मानकों को क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी, प्रयोग बढ़ेगा। फिर राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सकेगी। और अन्ततः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल पाएगी।
-- Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।

-- इस बारे में एक गूगल समूह  <https://groups.google.com/group/indicoms?hl=en> अलग से बनाकर कुछ प्रयास किया गया है।

-- कुछ सकारात्मक समान विचारों वाले विद्वानों/तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके एक संगठन बनाकर इस दिशा में कार्य आगे बढ़ाने हेतु सभी से मदद का अनुरोध है।

-- हरिराम


On 10-04-2011 15:06, Anuradha R. wrote:
हरिराम जी,
मैं सचमुच आभारी हूं कि आपने यह मसला उठाया। 

कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक मेल में भी ऐसी ही राय जाहिर की थी कि क्यों नहीं मानक फॉन्ट का इस्तेमाल करके/मानक फॉन्ट विकसित करके हम हिंदी में काम को एकदम सरल बना लेते। बजाए इसके कि हर फॉन्ट के कनवर्टर्स बनाने और उनके प्रसार में ढेरों समय और संसाधन कर्च करें। फॉन्ट कनवर्टर की जरूरत सबको होती है, लेकिन कितनों के पास ये लिंक, ये सुविधा पहुंच पाती है? ये परिवर्तन तकनीक मिल जाए, उसके बाद भी कई दिक्कतें रह जाती हैं, कई फॉन्ट बिना बदले रह जाते हैं, जो लोगों को हिंदी कंप्यूटिंग से हतोत्साहित करने का काम बखूबी करते हैं।

एक मसला है कि कई प्रकाशन संस्थान अब भी अपने बनाए पुराने फॉन्टों पर ही काम करते हैं, कई कारणों से। 

दूसरा मसला है कि विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां, जिनके सॉफ्टवेयर हम आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं, हिंदी के कंपैटिबल सॉफ्टवेयर तत्काल नहीं बनातीं। उनके बेहिसाब बिकने वाले भारतीय वर्जन्स में भी अंग्रेजी की ही ज्यादा सुविधा ही रहती है। एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं। 

लेकिन, क्या हम सब, कंप्यूटर को हिंदी इस्तेमाल करने वाले मिलकर एक प्रेशर ग्रुप बना सकते हैं कि इन कंपनियों को अपने भारतीय एडीशंस को यूनिकोड कंपैटिबल बनाना पड़े, जैसा कि चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के लिए होता है। वैसे भी, भारत उनके लिए बड़ा बाजार है, इसकी मांग को वो नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हम हिंदी कंप्यूटिंग के मानकीकरण के लिए संबद्ध एजेंसियों पर दबाव नहीं डाल सकते? यह तकनीक विकसित करने से ज्यादा, उस तकनीक की सुविधा को ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहज पहुंच के दायरे के भीतर लाना है।

मैं इस पर काम करने को तैयार हूं। किसी के पास कोई रास्ता/उपाय/योजना/सुझाव है, तो कृपया शेयर करें।
सादर,
-अनुराधा




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Discussion group for Standardisation needs for Computing in Indian Languages/scripts.



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│    Narendra Sisodiya
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└─────────────────────────┘

Anuradha R.

unread,
Apr 10, 2011, 1:42:02 PM4/10/11
to technic...@googlegroups.com, Narendra Sisodiya, indi...@googlegroups.com, Hariraam
जरूर, किसी एक मंच (वास्तविक या आभासी),  पर एक समय में जुटा जाए।
-अनुराधा

2011/4/10 Narendra Sisodiya <nare...@narendrasisodiya.com>

--
आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)" समूह की सदस्यता ली है.
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Hariraam

unread,
Apr 11, 2011, 8:13:57 AM4/11/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
बन्धुओं,

सर्वप्रथम इस चर्चा का विषय बदल कर Indic Font Code standardisation कर रहा हूँ। ताकि to the point चर्चा ही हो सके।

जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है कि भारतीय लिपियों के फोंट-कूटों का मानकीकरण करने के बारे में अनेक वर्षों से अनेक स्तरों पर (सरकारी और गैर-सरकारी दोनों) काफी प्रयास किया जा चुका है।
लेकिन सफलता नहीं मिल पाने के कारणों में प्रमुख है--
-- उपयोगकर्ताओं को तकनीकी जानकारी कम होना, तकनीकी समस्याओं को न समझ पाने की मजबूरी
-- सरकारी संस्थाओं के कार्य-क्षेत्र की अपनी कुछ सीमाओं में आबद्ध रहने की मजबूरी
-- गैर-सरकारी स्तर पर किसी मंच का अभाव।

अतः एक मंच/संस्था का गठन आवश्यक है।

-- हरिराम

Hariraam

unread,
Apr 11, 2011, 8:17:13 AM4/11/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
श्रीश जी,

चाणक्य फोंट "Summit India" के "इंडिका" नामक सबसे पहले व सबसे पुराने डीटीपी-डिजाइनिंग पैकेज के हिन्दी संस्करण का अंश है। हजारों बार सुधार के बाद इसका वर्तमान रूप प्रचलित हुआ है। हो सकता है कि इसके विकासकर्ता हरेक का वर्सन नं. रिकार्ड न कर पाए हों।

जिस वक्त माईक्रोसॉफ्ट सिर्फ MS DOS के दौर में था। उन दिनों 1985-92 में GUI (Graphical User Interface) सिर्फ Apple Machintos के पर्सनल कम्प्यूटरों के OS में ही होती थी। माईक्रोसाफ्ट सर्वप्रथम 1995 में Windows 95 के साथ GUI वाले OS को लेकर आ पाया। माईक्रोसॉफ्ट apple कम्प्यूटरों से 10 वर्ष पीछे था।

आपने कहा-- "मानकीकरण सरकारी संस्थाओं का दायित्व है।"

यह काफी हद तक सही है।

किन्तु,  सरकारी संस्थाओं की भी अपनी मजबूरियाँ हैं। कोई गैर-सरकारी संगठन  (NGO) हो तो सरकारी संस्थाओं को भी भारी मदद मिल जाती है। उनके सहयोग से काम आसान हो जाता है।

Indic Font Code का मानकीकरण बहुत ही जरूरी है। भले ही वह--
-- 8 bit TTF/PFB font हों या
-- 16 bit Open Type Unicoded Font हों

अतः इस दिशा में एक NGO का गठन हेतु सभी से सहयोग की अपील है।

-- हरिराम

Hariraam

unread,
Apr 11, 2011, 1:14:34 PM4/11/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com

श्रीश जी, अनुनाद जी, नारायण प्रसाद जी, एवं अन्य बन्धुओ,

सर्वप्रथम इस चर्चा का विषय बदलकर Font-code-converter कर रहा हूँ, ताकि to the point चर्चा ही हो सके।

निवेदन है कि कृपया Font-converter शब्द के बदले Font-code-converter का प्रयोग करें, क्योंकि Indic scripts के ये कनवर्टर केवल फोंट को नही बदलते, बल्कि किसी फोंट में टंकित पाठ को glyph by glyph या character by character पढ़कर एक एक कर उनके code-points को बदलते हैं।

मेरे और एक सन्देश में मैंने लिखा था --


"
चाणक्य फोंट "Summit India" के "इंडिका" नामक सबसे पहले व सबसे पुराने डीटीपी-डिजाइनिंग पैकेज के हिन्दी संस्करण का अंश है। हजारों बार सुधार के बाद इसका वर्तमान रूप प्रचलित हुआ है। हो सकता है कि इसके विकासकर्ता हरेक का वर्सन नं. रिकार्ड न कर पाए हों।

जिस वक्त माईक्रोसॉफ्ट सिर्फ MS DOS के दौर में था। उन दिनों 1985-92 में GUI (Graphical User Interface) सिर्फ Apple Machintos के पर्सनल कम्प्यूटरों के OS में ही होती थी। माईक्रोसाफ्ट सर्वप्रथम 1995 में Windows 95 के साथ GUI वाले OS को लेकर आ पाया। माईक्रोसॉफ्ट apple कम्प्यूटरों से 10 वर्ष पीछे था।

"

आपलोग इतना परिश्रम करके जिस चाणक्य फोंट का कनवर्टर बनाए हैं या बना रहे हैं, वह केवल चाणक्य फोंट के उसी वर्शन, उसी कॉपी के लिए अधिकतम accuracy के साथ output देगा। अन्य किसी वर्शन के चाणक्य फोंट के लिए नहीं।
-- क्योंकि चाणक्य फोंट में कालक्रम में हजारों बार सुधार हुए हैं, कई glyphs जोड़े, काटे, सुधारे, स्थानान्तरित करते करते आज इस स्तर तक पहुँचा है।

यदि मेसर्स पद्मालय प्रिंटिंग प्रेस के पास चाणक्य फोंट है, जो उनके द्वारा जून,1992 में खरीदे गए सॉफ्टवेयर के साथ आया था,
यदि मेसर्स नेशनल प्रिंटिंग प्रेस के पास चाणक्य फोंट है, जो उनके द्वारा जनवरी,1994 में खरीदे गए सॉफ्टवेयर के साथ आया था, तो दोनों के पर्सन अलग अलग होंगे। यदि वर्सन कुछ न भी लिखा हो, तो भी उनके character-map को देखने पर उनमें कुछ न कुछ अन्तर अवश्य मिलेगा।

इसी प्रकार अलग अलग यूजर के पास चाणक्य फोंट के अलग अलग वर्सन होंगे। कोई भी परस्पर हूबहू नहीं होगा। कहीं कहीं न कहीं किसी न किसी या कुछ न कुछ ग्लीफ्स में परिवर्तन, key-sequence में कुछ परिवर्तन जरूर रहेगा।

अतः आपके पास चाणक्य फोंट की जो कापी है, उसके लिए बनाया गया कनवर्टर 100% सटीक output दे रहा है, तो...

वही कनवर्टर अन्य किसी के पास चाणक्य फोंट की जो कापी है, जो वर्सन है, उसका भी 100% सही output देगा ही, इसकी आशा करना भी नहीं करनी चाहिए।

इसी प्रकार किसी भी फोंट के लिए बने कनवर्टर उस फोंट की उसी कॉपी/वर्सन के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम दे पाएँगे। अन्य वर्शन/कॉपी के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम नहीं मिलेगा।

क्योंकि विभिन्न फोंट्स के निर्माताओं ने यूजर की फीडबैक के अनुसार समय समय पर अपने फोंट के अगले वर्सन में परिवर्तन/सुधार किए होते हैं।

और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा। इसलिए यदि शत-प्रतिशत सही परिणाम चाहें तो केवल हरेक फोंट के हरेक वर्सन के लिए अलग अलग वर्शन के कनवर्टर बनाने पड़ेंगे।
जैसा कि CDAC के ISM software के साथ दिए जानेवाले फोंट्स तथा Font-code-converter में किया जाता रहा है।


अतः Font-code-converter बनाने का कार्य अनन्त काल तक चलते रहनेवाला होगा। सार्वत्रिक नहीं हो पाएगा। एक कनवर्टर जो एक यूजर के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम दे रहा है, दूसरे के लिए शायद 20% गलतियों वाला परिणाम दे।

अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास करें।

-- हरिराम

Anuradha R.

unread,
Apr 11, 2011, 3:32:40 PM4/11/11
to technic...@googlegroups.com, Hariraam, indi...@googlegroups.com
सभी ग्रुप साथियों का अभिवादन।
मैं एक केंद्र सरकार के दफ्तर में काम करती हूं, सूचना और प्रसारण मंत्रालय में। मुझे कई लोगों से अंग्रेजी और हिंदी, दोनों भाषाओं में सीडी में या ई मेल से भी रचनाएं मिलती हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए और नहीं तो कम से कम आगे प्रकाशन के लिए फॉर्मैटिंग आदि के लिए जरूर ही उनका फॉन्ट बदलना/बदलवाना पड़ता है। इस गूगल ग्रुप की सदस्य होने का मुझे इस मामले में खूब फायदा मिलता है और मैं अब हिंदी फॉन्ट कनवर्टर भी मान ली गई हूं, दफ्तर में। लेकिन मैं इस स्थिति से कतई संतुष्ट नहीं हूं।

हरिराम जी ने एकदम सही कहा कि फॉन्ट कोड कनवर्ट करते रहना तो लगातार पीछा करते रहने जैसा है- कोई नया फॉन्ट आया तो कनवर्ट करें, पुराने फॉन्ट में कोई मैटर है, तो भी कनवर्ट करें और तो और वही फॉन्ट(उदा.- चाणक्य) है, तो उसका अनंकित वर्जन आपके वर्जन से अलग है तो फिर कनवर्जन। यानी बालू को मुट्ठी में भींचने की कोशिश, जो लगातार फिसलती ही जाती है। यह कनवर्जन का मामला तो अनंत है और अनंत काल तक चलता रहेगा, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया। 

विंडोज (माइक्रोसॉफ्ट), गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे लिए इतना तक तक दिया है कि हमें एक यूनिकोड से सुसज्जित सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सुविधा दे दी है। अब हमें सिर्फ यह करना है कि किसी तरह इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल  होने वाला फॉन्ट-कोड बनाना है, ताकि परिवर्तन के झमेले से छुटकारा मिले। 

निश्चय ही, हिंदी का आधे से ज्यादा व्यावसायिक काम गैर-यूनिकोड में हो रहा है। हो सकता है, यह भी महत्वपूर्ण बात हो कि यूनिकोड के फॉन्ट उतने सुंदर नहीं होते। लेकिन, यूनिकोड की जो सार्वभौमिकता है, टाइपिंग की सहजता- सरलता है, और तकनीकी रूप से विकसित स्थिति है, उसके चलते इसे प्रमुखता देनी ही चाहिए। इसको सभी इस्तेमाल करें, ऐसा फैसला होने के बाद इसमें सुंदर फॉन्ट जोड़े भी जा सकते हैं।

कंप्यूटर एक तकनीकी उपकरण है, लेकिन इसके इस्तेमाल के लिए तकनीक का ज्ञान होना कतई आवश्यक नहीं होना चाहिए। जब कोई ब्लॉगिंग करता है, फेसबुक पर कुछ अपलोड करता है, कोई लेख कंप्यूटर पर लिखता है, पावर पॉइंट प्रस्तुतीकरण करता है, या कलाकारी करता है, विज्ञापन बनाता है, आदि इत्यादि, तो उसे अपनी विधा का विशेषज्ञ होने की जरूरत है, न कि कंप्यूटर की। ठीक वैसे ही, जैसे पत्रकार के लिए टाइपराइटर या प्रिंटिंग मशीन का तकनीकी ज्ञान होना अनिवार्य नहीं, पेंटर के लिए पेंट के रसायनों के बनने का तरीका जानने की जरूरत नहीं, विज्ञापन के कॉपी राइटर को स्याही का तकनीकी ज्ञान होना जरूरी नहीं।

मैं कंप्यूटर इस्तेमाल करती हूं क्योंकि यह मेरे स्किल या काम को सरल बनाने का एक जरिया है। काम मैं लिखने का ही करती हूं, पर कंप्यूटर ने इसे आसान बनाया। जैसे, आदमी पहले भी खाता था, लेकिन तरल चीजें खाने में सुविधा के लिए उसने चम्मच का इस्तेमाल किया, पेंटर ने कूची छोड़ कर कंप्यूटर सॉफ्टवेयर पर हाथ साफ किया। लेकिन हिंदी में कंप्यूटर के मामले में थोड़ी सी, जिसे कहते हैं- लास्ट माइल की दिक्कत है, जिसे हमें तय करना है। हम मिलकर क्या करें कि यह इस रास्ते की आखिरी बड़ी रुकावट हट जाए। करना इतना है कि सबको कहें कि आपसी संवाद के लिए किसी एक भाषा का ही इस्तेमाल करें ताकि बातचीत हो सकें, सबको समझ में आए। यानी लिखित सामग्री की सहज साझेदारी के लिए, जो कि कंप्यूटर और इंटरनेट के जरिए आम हो गई है, कोई एक ही फॉन्ट अपनाएं। 

करोड़ों लोगों में इस पर आम सहमति बन पाए, खास तौर पर तब, जबकि असंख्य लोग अपने सुविधाजनक सीमित दायरे से बाहर निकलना नहीं चाहते, यह बड़ा काम होगा। इसके लिए मुझे लगता है कि कोई NGO काम नहीं आ सकता। कारण- एक तो, NGO बनाना, उसे खड़ा करना, उसमें लोगों को जोड़ना, उसकी पहचान और ताकत बनाना ताकि उसकी बात सुनी जाए, सदस्यों की आपसी सहमति पाना और फिर वृहद स्तर पर इस मसले पर जनमत बनाने में जुटना। यह तो ग्रासरूट स्तर से शुरू करने जैसा होगा, जिसमें कब कौन छूट रहा होगा, पता नहीं चलेगा और इतने लोगों का समर्थन पाना आसान नहीं। और बहुत आम होता है कि NGO के सदस्यों में आपसी तालमेल भी लगातार नहीं रहता। वैसे, यह जो गूगल ग्रुप है, इसे ही हम एनजीओ मान ले सकते हैं और इसी आभासी दुनिया में वास्तविक काम की शुरुआत करें।!

NGO बनाने से बेहतर होगा, सरकार में संबंधित कार्यालयों, अधिकारियों और इस पर काम कर चुके लोगों को जोड़ें जो फिर आगे, फैसला लेने में सक्षम/महत्वपूर्ण लोगों को प्रभावित करें, मनाएं और बताएं कि यह समस्या आसानी से सुलझ सकती है, थोड़ी सी राजनीतिक/प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्हें यह प्रस्ताव भी दिया जा सकता है कि सरकार की तकनीकी टीम को सभी तरह का सपोर्ट देने के लिए तकनीकी जानकार और गैर-तकनीकी अनुभवी उपयोगकर्ता सेवाएं देने के लिए उपलब्ध हैं। 

मेरा विश्वास  है कि निर्णय लेने की स्थिति में बैठे, अंग्रेजी में काम करने वाले लोग हिंदी कंप्यूटिंग की इस गुत्थी को समझते हैं, लेकिन इस पर ध्यान नहीं देते, क्योंकि उनके लिए यह स्थिति कोई समस्या पैदा नहीं करती। और जैसी कि समाजशास्त्र की सोशल हेजेमोनी थ्योरी कहती है कि समाज के ऐसे समृद्ध, समर्थ लोग समझते हैं कि अगर उनके काम में कोई रुकावट नहीं आ रही, इसका अर्थ है कि समाज के बाकी हिस्से की चिंता में भी यह शामिल नहीं है। और हिंदी कंप्यूटिंग के मामले में यही विचार काम कर रहा है। इसलिए उस स्तर तक बात पहुंचाना और उनसे यह कहलवाना सबसे जरूरी है, उपयोगकर्ताओं के स्तर पर persuation और व्यवहार- संशोधन ज्यादा आसान होगा।

अगर यहां तक सफलता मिलती है, तो फिर उनके बारे में भी सोचना होगा जिनका रोजगार ही हिंदी कंप्यूटिंग से चलता है और वे यूनिकोड में काम नहीं कर पाते। वे शुरू में जरूर विरोध करेंगे। लेकिन, जिस तरह हिमाचल प्रदेश में पॉलीथीन पर पाबंदी लगी तो सबने विरोध किया कि लोग खरीदारी कैसे करेंगे, सैलानी असुविधा में पड़ेंगे तो उनका आना कम हो जाएगा और राज्य के पर्यटन राजस्व पर असर पड़ेगा। पर अब ऐसा कुछ नहीं है, और पाबंदी भी कायम है। लोगों को उस बेहतर तरीके की आदत हो गई है, प्रदूषण भी कम है। इसी तरह, कुछ लोग मजबूरी में ही सही, पर यूनिकोड टाइपिंग सीख लेंगे, फिर उन्हें आदत हो जाएगी। उन्हें सिस्टम में थोड़े हदलाव करने पड़े तो उसमें भी उनकी भावी सहूलियत छुपी हुई है, क्योंकि फॉन्ट की भिन्नता की समस्या से उन्हें भी दो-चार होना पड़ता है। वैसे ही यूनिकोड ज्यादा आसान और याद रखने लायक है। इसमें अंगुलियों की और दिमाग की ज्यादा कारीगरी नहीं करनी पड़ती। जो लोग चाहें, उनके लिए कुछेक प्रशिक्षण कक्षाएं भी की जा सकती हैं। वैसे, देश की 10 फीसदी जनता ही कंप्यूटर पर काम करती है, उनमें अंग्रेजी के लोग ही ज्यादा हैं। हमारे-आपके जैसे पीड़ित कम ही हैं।

और आखिर अगर यह हो जाता है (तथास्तु! :-) यानी हमारे देश में की बोर्ड ले-आउट और फॉन्ट-कोड का मानकीकरण और एकरूपता, तो फिर यह दुनिया भर में मान्य होगा और सभी देसी-विदेशी सॉफ्टवेयर निर्माता बिना किसी दुविधा या अधूरे मन के, सिर्फ यूनिकोड हिंदी में ही सारे सॉफ्टवेयर अपने भारतीय वर्जन्स में विकसित करेंगे। और इससे सिर्फ हिंदी नहीं, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं में कंप्यूटिंग का भला होगा।

अगर सहमत हों तो शुरुआत की जाए और असहमति हो तो भी अपना मत साझा करें और कोई रास्ता निकालने का उपाय मिलकर सोचें।

-आर. अनुराधा
संपादक, प्रकाशन विभाग
सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार
125, सूचना भवन, सीजीओ कॉम्प्लेक्स
लोदी रोड, नई दिल्ली-110003
टेली- 9811511141





2011/4/11 Hariraam <hari...@gmail.com>
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--

Ravishankar Shrivastava

unread,
Apr 11, 2011, 10:35:06 PM4/11/11
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
"...अतः Font-code-converter बनाने का कार्य अनन्त काल तक चलते रहनेवाला

होगा।
सार्वत्रिक नहीं हो पाएगा। एक कनवर्टर जो एक यूजर के लिए शतप्रतिशत सही
परिणाम दे
रहा है, दूसरे के लिए शायद 20% गलतियों वाला परिणाम दे।

अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास

करें।...."

वस्तुतः ऐसा नहीं है. आमतौर पर सभी सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर यूनिकोड
यूटीएफ 8 तथा भविष्य में यूटीएफ 16 का परिपूर्णता से पालन करेंगे, और
पुराने सारे फ़ॉन्ट प्रचलन से स्वतः ही बाहर हो जाएंगे. यह मात्र कुछ
वर्षों की ही बात है. तब ये समस्या नहीं रहेगी. अभी ही चहुँ ओर आधे से
ज्यादा काम (सरकारी उपक्रमों को छोड़ दें तो, क्योंकि वहाँ निर्णय लेने
की प्रक्रिया बेहद उबाऊ, लंबी और लालफीता शाही युक्त होती है - मैं स्वयं
भी कभी उस तंत्र का हिस्सा रह चुका हूँ) पूरी तरह से यूनिकोड हिंदी में
होने लगे हैं. और, यूनिकोड हिंदी का विकल्प नहीं है. यह एक तरह से
स्टैण्डर्डाइज्ड हो चुका है, वैश्विक स्तर पर - ओपन सोर्स से लेकर निजी
सॉफ़्टवेयर निर्माताओं सब जगह. और न सिर्फ हिंदी, अन्य भारतीय भाषाओं -
तमिल, तेलुगु, पंजाबी इत्यादि सभी के लिए भी यूनिकोड स्टैण्डर्ड मानक बन
चुका है.

सादर,
रवि

> *इसी प्रकार किसी भी फोंट के लिए बने कनवर्टर उस फोंट की उसी कॉपी/वर्सन के लिए


> शतप्रतिशत सही परिणाम दे पाएँगे। अन्य वर्शन/कॉपी के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम नहीं

> मिलेगा। *


>
> क्योंकि विभिन्न फोंट्स के निर्माताओं ने यूजर की फीडबैक के अनुसार समय समय पर अपने फोंट के
> अगले वर्सन में परिवर्तन/सुधार किए होते हैं।
>

> *और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा।


> इसलिए यदि शत-प्रतिशत सही परिणाम चाहें तो केवल हरेक फोंट के हरेक वर्सन के लिए अलग
> अलग वर्शन के कनवर्टर बनाने पड़ेंगे।
> जैसा कि CDAC के ISM software के साथ दिए जानेवाले फोंट्स तथा Font-code-converter

> में किया जाता रहा है। *


>
> अतः Font-code-converter बनाने का कार्य अनन्त काल तक चलते रहनेवाला होगा।
> सार्वत्रिक नहीं हो पाएगा। एक कनवर्टर जो एक यूजर के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम दे
> रहा है, दूसरे के लिए शायद 20% गलतियों वाला परिणाम दे।
>
> अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास करें।
>
> -- हरिराम
>
> On 10-04-2011 05:17, ePandit | ई-पण्डित wrote:
>
>
>
>
>
>
>
>
>
> >     यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक
> >     कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।
>
> > पहले मैंने भी यही सोचा था परन्तु जब मैंने अपने पास मौजूद ट्रू-टाइप के लिये कन्वर्टर
> > बनाकर एक मित्र को भेजा जिसके पास टाइप-१ था तो उसने बताया कि कन्वर्जन में फर्क है
> > तब मैंने जाँचा तो पाया कि उनमें दस-बारह ग्लिफ का अन्तर है।
>
> > आम तौर पर टीटीऍफ फॉण्टों में वर्जन नम्बर लिखा होता है लेकिन चाणक्य के इन दोनों
> > फॉण्टों (टीटीऍफ और पोस्ट स्क्रिप्ट) में अंकित नहीं है, जिस कारण में उनके लिये Type-1
> > तथा TrueType नाम ही प्रयुक्त कर रहा हूँ।
>
> >     मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।
>
> > पहले मैं भी यही सोचता था कि अब के जमाने में कौन पुराने लिगेसी फॉण्ट प्रयोग करता है
> > लेकिन पहली बार मुझे इनकी उपयोगिता समझ आयी जब मेरे यमुनानगर के एक साथी
> > चिट्ठाकार ने मुझसे अपनी कृतिदेव में लिखी तीस-चालीस कवितायें यूनिकोड में बदलने का
> > उपाय पूछा। दूसरी बार उपयोगिता तब मालूम पड़ा जब उनके यूनिकोड में भेजे मैटर को
> > अखबार वालों ने कचरा हुआ बताकर चाणक्य में भेजने की माँग की। कन्वर्टरों की उपयोगिता
> > वही समझता है जिसका काम अटका
>

> ...
>
> read more »

ePandit | ई-पण्डित

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Apr 11, 2011, 11:38:25 PM4/11/11
to technic...@googlegroups.com
और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा।

इसी का फल भुगत रहा हूँ, पहले पंजाब केसरी का साइट से कभी डाउनलोड किये गये ट्रू टाइप चाणक्य के लिये बना चुका था, फिर पता चला कि अखबार वाले आम तौर पर जिस चाणक्य का प्रयोग कर रहे हैं (.pfm, .pfb) उसमें इससे अन्तर है। अब दोनों के लिये विकल्प जोड़ा है, लेकिन आप बता रहे हैं कि और भी वर्जन हैं।

१२ अप्रैल २०११ ८:०५ पूर्वाह्न को, Ravishankar Shrivastava <ravir...@gmail.com> ने लिखा:
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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 11, 2011, 11:53:22 PM4/11/11
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हाँ जी बिलकुल यही बात मेरे दिमाग में आयी थी कि मानक फॉण्ट की बजाय मानक फॉण्ट कोड प्वाइण्ट तय होने चाहिये ताकि जिसे भी फॉण्ट बनाना हो वो उन कोड प्वाइण्ट्स के आधार पर बना सके। साथ ही पुराने फॉण्टों को भी आसानी से उन मानक फॉण्ट कोडों के अनुसार संशोधित किया जा सकता है। एक बार यह फॉण्ट कोड प्रचलित हो जायें तो फिर उनके आधार पर बने नॉन-यूनिकोड फॉण्टों को भी उसी तरह से आपस में केवल फॉण्ट चुनकर बदला जा सकेगा जैसे यूनिकोड फॉण्टों को बदल सकते हैं।

एकमात्र समस्या ये है कि इस प्रकार के फॉण्ट कोड प्वाइण्ट तय करने के लिये पहले सभी देवनागरी संयुक्ताक्षरों के ग्लिफ्स तय करने होंगे। साथ ही उनकी संख्या भी क्योंकि 8 बिट में जितने प्वाइण्ट उपलब्ध हैं उन्हीं से काम चलाना होगा। यदि किसी फॉण्ट निर्माता को बेशक सभी ग्लिफ्स शामिल न भी करने हुये तो वो अपने ग्लिफ्स को मानक कोड प्वाइण्ट्स पर रखकर बाकियों को छोड़ देगा।

रही बात फॉण्ट बनाने की तो हम किसी बने-बनाये फ्री (मुफ्त नहीं मुक्त लाइसेंस) फॉण्ट को संशोधित कर उसे इन कोड प्वाइण्स में ढालकर एक डेमो फॉण्ट बना सकते हैं। या फिर जैसा अनुनाद जी ने स्वयं कामचलाऊ फॉण्ट बनाने सम्बन्धी कुछ लिंक दिये थे, इस तरह से एक कामचलाऊ डेमो फॉण्ट बना सकते हैं।

यानि चरण कुछ इस तरह से होंगे।
  1. सभी अधिकतम  वर्णखण्ड (ग्लिफ्स) तय करना। यह कार्य सभी उपलब्ध नॉन-यूनिकोड फॉण्टों के ग्लिफ्स का अध्ययन कर हो सकता है।
  2. सभी ग्लिफ्स हेतु कोड प्वाइण्ट्स तय करना। यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य होगा।
  3. उपर्युक्त तय किये गये कोड प्वाइण्ट्स के अनुसार एक डेमो फॉण्ट (मानक फॉण्ट कोड वाला) बनाना।
  4. विभिन्न सर्वाधिक प्रचलित एवं प्रसिद्ध फॉण्ट निर्माताओं से अनुरोध करना कि वे अपने नॉन-यूनिकोड फॉण्टों का इन मानक फॉण्ट कोडों के अनुसार नया वर्जन निकालें। फॉण्ट निर्माताओं के लिये तकनीकी तौर पर यह कार्य कोई विशेष मुश्किल नहीं, बस उन्हें यह लगे कि जिस मानक हेतु अनुरोध किया जा रहा है वे वाकयी दमदार हैं।
एक बार प्रचलित फॉण्टों के इस मानक को फॉलो करने पर बाकी छोटे-मोटे फॉण्ट निर्माता स्वयं ही इसका पालन शुरु कर देंगे।

११ अप्रैल २०११ १०:४४ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
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Anuradha R.

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Apr 12, 2011, 1:07:22 AM4/12/11
to technic...@googlegroups.com, ePandit | ई-पण्डित, indi...@googlegroups.com
बात यह है कि कितने भी बदलाव आ जाएं, जब तक पुरानी तकनीक काम करती है, उसे इस्तेमाल करने वाले उसे नहीं बदलना चाहेंगे। साथ ही, जिन प्रकाशनों ने अपने फॉन्ट बनाए हैं या अपनाए हैं, वे समरूपता या सुविधा या एकाधिकार या नकल रोकने,नए खर्च से बचने या किसी भी और कारण से इसे छोड़ना नहीं चाहेंगे, जब तक अनिवार्य न हो। अच्छा, एक और भी पहलू है- कंप्यूटर पर आपका यूनिकोड का टेक्ट दिखाई पड़ने भी लगे तो यह गारंटी नहीं है कि प्रिंट करने पर वैसा ही छपेगा। बहुत बार स्क्रीन पर का टेक्स्ट जंक प्रिंट होता है। वहां भी बदलाव की जरूरत होती है। ऐसे में बार-बार हर मशीन की सेटिंग करना और काम करने से पहले उसका ध्यान रखते रहना तो अनावश्यक ऊर्जा खर्च करने जैसा है, बेवजह।

जिन्हें हम '"छोटे-मोटे" फॉन्ट निर्माता या सरकार आदि जैसे उपयोगकर्ता कह रहे हैं, उनका संसार बहुत बड़ा है, और हिंदी कंप्यूटिंग में हिस्सा भी। कौनसे हिंदी के अखबार और पत्रिकाएं हैं, जिनके वेबसाइट खोलने पर बिना जंक दिखे काम चल जाता है? एकाध ही हैं। अखबार ही क्यों, कई दूसरे वेबसाइट भी जंक नजर आते हैं या बिंदु। पर अंग्रेजी में तो कभी ऐसा नहीं होता?! और जैसी कि हम उम्मी कर रहे हैं कि कुछ साल में जब यह हो जाएगा, तब तक हम क्यों रुके रहें या कनवर्टर खोजते रहें या बनाते रहें? क्या हमें इस असुविधा में रहने की आदत हो गई है, इसी में सुरक्षित महसूस करने लगे हैं? 

और, सबसे बड़ी बात यह है कि आखिर कितने हिंदी इस्तेमाल करने वाले हैं, जिन तक ये कनवर्टर्स किसी भी जरिए से पहुंच सके हैं? अभी कुछ समय पहले तक मैं भी बिल्कुल अंधेरे में थी और कुछ 'विद्वानों' पर निर्भर करती थी कि वे मेरी मदद कर देंगे, वैसे ही, जैसे कई मुझ पर करते हैं। और बहुतों को मैंने इस ग्रुप के फॉन्ट कनवर्टर लिंक भेजे जिससे उनकी समस्याएं कुछ हद तक सुलझीं। पर बाकी लोगों और इस समस्या के बाकी पहलुओं का क्या? 

हम इसे फॉन्ट कनवर्टर कहें या फॉन्ट कोड कनवर्टर (तकनीकी रूप से देनों में अंतर है, जरूर) पर मेरे जैसे उपयोगकर्ता के लिए तो फॉन्ट बदलना ही है। उपयोगकर्ता की जरूरत और सहूलियत के लिए एकरूपता और मानकीकरण जरूरी है।
-अनुराधा

2011/4/12 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
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अजित वडनेरकर

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Apr 12, 2011, 1:32:18 PM4/12/11
to technic...@googlegroups.com
अनुराधाजी,

इस समूह पर आपकी सक्रियता और उत्साहपूर्ण भागीदारी देखकर अच्छा लग रहा है। मैं भी बीते छह सात वर्षों से आपकी तरह ही सोचता रहा हूँ जबसे यूनिकोड प्रयोग कर रहा हूँ। हालात लगातार सुधर रहे हैं। आपको बताऊं, दैनिक भास्कर में अब यूनिकोड अपनाने पर बात चलने लगी है। यहाँ का आईटी विभाग इस बारे मे गंभीरता से सोचने लगा है। हालाँकि ऐसा प्रारम्भिक स्तर पर है। उन कुछ लोगों ने इस ओर ध्यान देना शुरु किया है जो फान्ट संबंधी इस झमेले को अब समझ रहे हैं। उन्हें पता है कि इंटरनेट के साथ अगर हिन्दी को आगे बढ़ना है तो यूनिकोड नाम के टॉनिक बिना हिन्दी का स्वास्थ्य वैश्विक स्तर पर उतना बेहतर नहीं दिखेगा, जितना दिखना चाहिए।

यूनिकोड में भी बेहद सुंदर फांट बने हैं और बनाए जा सकते हैं। तकनीशियनों के लिए यह बहुत रुचिकर और आसान काम है। सिर्फ़ प्रिंट मीडिया को इस ओर गंभीरता से सोचने और बिना वक्त गँवाए मन बनाने की ज़रूरत है। मैं भी उत्साह और चाव से उस दिन की राह देख रहा हूँ। इस समूह के सभी तकनीक विज्ञ सदस्यों के प्रति प्रारम्भ से ही मेरा बेहद आदर का भाव है। उनके प्रयासों से हिन्दी इंटरनेट पर लगातार बढ़ रही है। निश्चित ही हम अपने इच्छित को जल्दी ही प्राप्त करेंगे।

साभार
अजित


2011/4/12 Anuradha R. <ranur...@gmail.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
मोबाइल-09425012329

vinayak kale

unread,
Apr 12, 2011, 1:45:41 PM4/12/11
to technic...@googlegroups.com

University  of Hyedrabad Admission notification 
2011/4/12 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
Vinayak kale,
Research Scholar,
Deptt. of Hindi,
University of Hyderabad,
Hyderabad- 500046,
Mobile:+919490318007

Admissions_Notify_2011.pdf

Hariraam

unread,
Apr 12, 2011, 10:36:59 PM4/12/11
to indi...@googlegroups.com, technic...@googlegroups.com
श्रीश जी,

संयुक्ताक्षरों को फिलहाल प्रारम्भिक चरण में छोड़ दिया जाए।
क्योंकि युनिकोड में कोई पाठ जब save होता है, तो उसमें सिर्फ Basic code ही save होते हैं। कम्प्यूटर के आन्तरिक संसाधन के लिए संयुक्ताक्षरों के ग्लीफ्स की कोई आवश्यकता है। ओपेन टाइप फोंट्स में अन्तर्निहित अल्गोरिद्म के तहत ग्लीफ, संयुक्ताक्षर आदि स्वतः प्रकट होते हैं।

युनिकोड में भी किसी संयुक्ताक्षर का मानकीकरण नहीं हुआ है।

केवल बेसिक कोड प्वाइंट्स का पहले चरण में मानकीकरण किया जाए।
संयुक्ताक्षरों को मूल व्यंजनों में व्यक्त कर प्रकट किया जाए।

फिलहाल इतना ही होने पर ही कम से कम मूल पाठ को लोग त्रुटिरहित रूप से विश्वभर में आदान प्रदान तो कर ही पाएँगे।
संयुक्ताक्षरों के मूल व्यंजनों में बदल कर प्रकट होने पर कोई अर्थ तो बिगड़ेगा नहीं।

और फिल मूल व्यंजनों + स्वरों में saved पाठ को युनिकोड में बदलने में सरलता होगी।

बाद में अगले चरण में संयुक्ताक्षरों के कूट-निर्धारण का काम हाथ में लिया जा सकता है।

-- हरिराम

Hariraam

unread,
Apr 12, 2011, 10:37:29 PM4/12/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@goolglegroups.com
रवि जी,

आपने बिल्कुल सही कहा है -- "कुछ वर्षों की बात है"--

किन्तु इन कुछ वर्षों में और कितने Man-hour बेकार होंगे?
इन कुछ वर्षों तक युनिकोड और पुराने 8-बिट फोंट दोनों का संगमकाल चलता रहेगा।

इन्हीं कुछ वर्षों के लिए ही फोंट कोड का उपयोग आवश्यक होगा।

जबकि फोंट कोड निर्धारित करने का कार्य लगनपूर्वक कार्य करें तो एक सप्ताह में हो सकता है।

-- हरिराम

ePandit | ई-पण्डित

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Apr 13, 2011, 2:49:05 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com, Hariraam, technic...@googlegroups.com
युनिकोड में भी किसी संयुक्ताक्षर का मानकीकरण नहीं हुआ है।
ओपेन टाइप फोंट्स में अन्तर्निहित अल्गोरिद्म के तहत ग्लीफ, संयुक्ताक्षर आदि स्वतः प्रकट होते हैं।

यह सही है हरिराम जी कि यूनिकोड में संयुक्ताक्षरों का मानकीकरण नहीं हुआ है। जहाँ तक मैं समझता हूँ ओऍस का CTL (कॉम्प्लैक्स स्क्रिप्ट लेआउट) रैण्डरिंग इंजन जैसे विण्डोज़ के मामले में USP (यूनिकोड स्क्रिप्ट प्रोसैसर) बेसिक कोडों को फॉण्ट में निहित संयुक्ताक्षर ग्लिफ्स में बदलकर दिखाता है। बिना CTL इंजन के यूनिकोड देवनागरी पाठ बेसिक कोड रुप में ही दिखता है (वही बिखरा हुआ दिखने वाली समस्या)।

यदि प्रस्तावित मानक फॉण्ट कूटों में केवल बेसिक कोड प्वाइण्ट्स ही रखे जायें तो वे स्क्रीन पर कुछ इस तरह दिखेंगे "हिन्‌दी कम्‌प‌यूटि‌ंग"  ऐसी स्थिति में उसे कौन प्रयोग करना चाहेगा।

पाठ को सही दिखाने के लिये या तो यूनिकोड की तरह एक रैण्डरिंग इंजन चाहिये होगा जो कि बेसिक कोड को प्रदर्शन हेतु जोड़कर सही रुप में दिखाये। मैं नहीं समझता कि फॉण्ट अपनी अल्गोरिद्म से ही संयुक्ताक्षरों को जोड़कर दिखा सकता है। रैण्डरिंग इंजन जरुरी होगा, फिर यूनिकोड में ही क्या बुरायी है और प्रकाशन उद्योग ऐसे फॉण्ट को क्यों प्रयोग करेगा, उसे तो बिना रैण्डरिंग के झंझट वाला फॉण्ट ही चाहिये जिसमें संयुक्ताक्षर एक ही कूट बिन्दु से प्रकट होता है।

या फिर लिगेसी 8 बिट फॉण्टों की तरह सभी चिह्नों हेतु अलग कोड प्वाइण्ट्स रखे जानें होगें। जैसे पूरे वर्ण "क" के लिये एक कोड प्वाइण्ट, मूल व्यञ्जन "क्‍" (क्) के लिये अलग कोड प्वाइण्ट तथा क् से बनने वाले संयुक्ताक्षरों के लिये अलग कोड प्वाइण्ट। यहाँ बात वही आ गयी पुराने 8 बिट लिगेसी फॉण्टों वाली। हाँ ये जरुर है कि अधिकतम फॉण्टों का अध्ययन कर सर्वाधिक प्रचलित संयुक्ताक्षर ग्लिफ्स जो कि अपरिहार्य हैं तय किये जायें। 8 बिट के स्थानों (032 से लेकर 255) तक सभी देवनागरी संयुक्ताक्षरों को रख भी नहीं सकते इसलिये सबसे जरुरी ही रखे जायें।

कृपया इस बारे जरा तस्वीर स्पष्ट करें कि केवल बेसिक वर्णों के लिये कोड प्वाइण्ट रखने से कैसे काम चल सकता है?

१३ अप्रैल २०११ ८:०६ पूर्वाह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:

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Hariraam

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Apr 13, 2011, 6:42:42 AM4/13/11
to Anuradha R., technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
अनुराधा जी,

"सच कहा कि आधे से ज्यादा कार्य गैर-युनिकोड में हो रहा है।"

विशेषकर प्रिंट मीडिया व प्रकाशन उद्योग में।

इसका कारण सिर्फ युनिकोड फोंट का सुन्दर नहीं होना ही नहीं है। बल्कि तकनीकी कारण है कि ये पुराने सॉफ्टयेरों के लिए अनुपयुक्त होते हैं।

युनिकोडित ओपेन टाइप फोंट 16-बिट फोंट होते है। जिनमें प्रस्तुत पाठ केवल युनिकोडित मूल वर्णों में ही सेव होता है। परम्परागत रूप में "पूर्णाक्षरों" व "संयुक्ताक्षरों" के वर्ण ओपेन टाइप फोंट में निहित ग्लीफ्स में बदलकर स्क्रीन पर प्रकट होते हैं तथा मुद्रण यंत्रों में वेक्टर या रास्टर ग्राफिक्स रूप में बदलकर संप्रेषित होते हैं।

पुराने सॉफ्टवेयर यथा पेजमेकर, कोरल ड्रा, फोटोशाप आदि के पुराने वर्सन 16 बिट तकनीकी को ढो नहीं पाते। ठीक उसी प्रकार जैसे एक ट्राली रिक्शा की क्षमता 5 बोरी (5 क्विंटल) उठाने की होती है। किन्तु एक 16 चक्कों वाले ट्रक की क्षमता 500 बोरी (50 टन) माल ढोने की होती है। अगर एक ट्राली रिक्शा पर 16 चक्कों वाले ट्रक का माल लादने का प्रयास किया जाए तो क्या होगा?

और अधिकांश भारतीय मुद्रण उद्योग गरीबी की हालत से गुजर रहा है। प्रतियोगितात्मकता, कागज तथा स्याही आदि के भाव बढ़ने, मजदूरी वेतन आदि बढ़ने के बावजूद छपाई की दर उलटे कम होती जा रही है।

युनिकोडित ओपेन टाइप फोंट को सम्भालने वाले आधुनिकतम सॉफ्टवेयर (यथा- Adobe CS5 or CS6 का मिडिल इस्ट वर्सन) खरीदने की क्षमता प्रेसवालों की नहीं है। इनपर कार्य कर सकनेवाले एक्सपर्ट आपरेटरों की संख्या भी नदारद है।

और ऐसे नए आधुनिक सॉफ्टवेयरों की कॉपी भी नहीं हो सकती, खरीदकर (हजारों लाखों में) ऑनलाइन पंजीकरण करना पड़ता है। अतः इनका उपयोग इक्के, दुक्के अति आधुनिक प्रेस ही कर पाएँगे, जो भारी लाभार्जन कर पाते हों।

---

विशेषकर अखबार वालों की आर्थिक हालत बहुत ही खराब होती है। उनकी आय सिर्फ विज्ञापन पर टिकी होती है। कुछ ही बड़े अखबार आर्थिक लाभवान हो पा रहे हैं।

और ऐसी हालत में अखबार वालों को दोहरा कार्य करना पड़ रहा है।

अपने अखबार के ऑनलाइन संस्करण (इंटरनेट संस्करण) के लिए युनिकोड में संसाधित करके प्रकाशित करना।

और

अपने अखबार के मुद्रित संस्करण के लिए 8-बिट पुराने फोंट्स का प्रयोग करके प्रकाशित करना।

ओपेन सोर्स में तथा निःशुल्क रूप से उपलब्ध मुद्रण कार्यों के लिए योग्य, डीटीपी, डिजाइनिंग वाले आधुनिकतम सॉफ्टवेयर के आने, बाजार में प्रचलित होने, उपयोगकर्ताओं के लिए इसका अभ्यस्त होने, इसमें आनेवाली समस्याओं का समाधान करके उनका विकास करने आदि कार्य में कई वर्षों का समय लग जाएगा शायद।

अतः फिलहाल युनिकोड और गैर-युनिकोड के इस संगम या संक्रान्ति काल में 8-बिट Font-code का मानकीकरण तत्काल आवश्यकता है।

रही सरकारी तंत्र की बात। इसकी आलोचना करने का हमें कोई हक नहीं है। सरकारी तंत्र की अपनी मजबूरियाँ होती हैं।

हमें सरकारी तंत्र को सर्वदा सहयोग करते रहने के बारे में ही सोचना चाहिए। NGO से सरकारी तंत्र को काफी मदद मिल जाती है।

-- हरिराम





On 12-04-2011 01:02, Anuradha R. wrote:

हरिराम जी ने एकदम सही कहा कि फॉन्ट कोड कनवर्ट करते रहना तो लगातार पीछा करते रहने जैसा है- कोई नया फॉन्ट आया तो कनवर्ट करें, पुराने फॉन्ट में कोई मैटर है, तो भी कनवर्ट करें और तो और वही फॉन्ट(उदा.- चाणक्य) है, तो उसका अनंकित वर्जन आपके वर्जन से अलग है तो फिर कनवर्जन। यानी बालू को मुट्ठी में भींचने की कोशिश, जो लगातार फिसलती ही जाती है। यह कनवर्जन का मामला तो अनंत है और अनंत काल तक चलता रहेगा, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया। 

विंडोज (माइक्रोसॉफ्ट), गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे लिए इतना तक तक दिया है कि हमें एक यूनिकोड से सुसज्जित सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सुविधा दे दी है। अब हमें सिर्फ यह करना है कि किसी तरह इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल  होने वाला फॉन्ट-कोड बनाना है, ताकि परिवर्तन के झमेले से छुटकारा मिले। 

निश्चय ही, हिंदी का आधे से ज्यादा व्यावसायिक काम गैर-यूनिकोड में हो रहा है। हो सकता है, यह भी महत्वपूर्ण बात हो कि यूनिकोड के फॉन्ट उतने सुंदर नहीं होते। लेकिन, यूनिकोड की जो सार्वभौमिकता है, टाइपिंग की सहजता- सरलता है, और तकनीकी रूप से विकसित स्थिति है, उसके चलते इसे प्रमुखता देनी ही चाहिए। इसको सभी इस्तेमाल करें, ऐसा फैसला होने के बाद इसमें सुंदर फॉन्ट जोड़े भी जा सकते हैं।

NGO बनाने से बेहतर होगा, सरकार में संबंधित कार्यालयों, अधिकारियों और इस पर काम कर चुके लोगों को जोड़ें जो फिर आगे, फैसला लेने में सक्षम/महत्वपूर्ण लोगों को प्रभावित करें, मनाएं और बताएं कि यह समस्या आसानी से सुलझ सकती है, थोड़ी सी राजनीतिक/प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्हें यह प्रस्ताव भी दिया जा सकता है कि सरकार की तकनीकी टीम को सभी तरह का सपोर्ट देने के लिए तकनीकी जानकार और गैर-तकनीकी अनुभवी उपयोगकर्ता सेवाएं देने के लिए उपलब्ध हैं। 


V S Rawat

unread,
Apr 13, 2011, 11:17:49 AM4/13/11
to technic...@googlegroups.com
सॉफ़्टवेयर निर्माताओं को उनके पुराने सॉफ़्टवेयरों को अद्यतन करना चाहिए ताकि उन
सॉफ़्टवेयरों में यूनीकोड फ़ॉण्ट भी चल सके।

गैर यूनीकोड फ़ॉण्ट निर्माताओं को उनके फ़ॉण्टों से यूनीकोड में और यूनीकोड से उनके फ़ॉण्टों
में परिवर्तित करने के सॉफ़्टवेयर बना कर मुफ़्त उपयोग के लिए उपलब्ध कराने चाहिए।

यदि वो ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह उन निर्माताओं का गैरज़िम्मेदाराना व्यवहार और
मानसिकता है जिससे लाखों लोगों के प्रयास और समय व्यर्थ हो रहे हैं।

सरकार यह नियम बना सकती है कि निर्माता उपरोक्त कामों को करें अन्यथा उनके
सॉफ़्टवेयरों को भारत में बेंचने और उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

रावत

> *रही सरकारी तंत्र की बात। इसकी आलोचना करने का हमें कोई हक नहीं है। सरकारी तंत्र
> की अपनी मजबूरियाँ होती हैं।*
>
> *हमें सरकारी तंत्र को सर्वदा सहयोग करते रहने के बारे में ही सोचना चाहिए।* NGO से


> सरकारी तंत्र को काफी मदद मिल जाती है।
>
> -- हरिराम
>
>
>
>
> On 12-04-2011 01:02, Anuradha R. wrote:
>>
>> हरिराम जी ने एकदम सही कहा कि फॉन्ट कोड कनवर्ट करते रहना तो लगातार पीछा
>> करते रहने जैसा है- कोई नया फॉन्ट आया तो कनवर्ट करें, पुराने फॉन्ट में कोई मैटर है,
>> तो भी कनवर्ट करें और तो और वही फॉन्ट(उदा.- चाणक्य) है, तो उसका अनंकित वर्जन
>> आपके वर्जन से अलग है तो फिर कनवर्जन। यानी बालू को मुट्ठी में भींचने की कोशिश, जो
>> लगातार फिसलती ही जाती है। यह कनवर्जन का मामला तो अनंत है और अनंत काल तक
>> चलता रहेगा, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया।
>>
>> विंडोज (माइक्रोसॉफ्ट), गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे लिए इतना तक तक दिया
>> है कि हमें एक यूनिकोड से सुसज्जित सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सुविधा दे दी है। अब हमें
>> सिर्फ यह करना है कि किसी तरह इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला फॉन्ट-कोड
>> बनाना है, ताकि परिवर्तन के झमेले से छुटकारा मिले।

>> *
>> *
>> *निश्चय ही, हिंदी का आधे से ज्यादा व्यावसायिक काम गैर-यूनिकोड में हो रहा है। हो
>> सकता है, यह भी महत्वपूर्ण बात हो कि यूनिकोड के फॉन्ट उतने सुंदर नहीं होते।*

Anuradha R.

unread,
Apr 14, 2011, 1:15:04 AM4/14/11
to technic...@googlegroups.com, V S Rawat
ठीक कहा आपने रावतजी, 
हालांकि फॉन्ट निर्माताओं को कोई परेशानी नहीं होगी यूनिकोड में बनाने में पर समस्या तो इस्तेमाल करने वालों की तरफ से है। उनकी जरूरतों और मांग के मुताबिक ही तो सॉफ्टवेयर निर्माता ये काम करते हैं। यानी इस बारे में सबको यूनिकोड के पक्ष में लाना पड़ेगा।
और मैं सहमत हूं कि इसमें सरकार कड़ाई करके, नियम बनाकर कह सकती है कि यूनिकोड ही इस्तेमाल किए दाएं, दूसरे फॉन्ट नहीं।
-अनुराधा

2011/4/13 V S Rawat <vsr...@gmail.com>
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रजनीश मंगला

unread,
Apr 14, 2011, 1:21:30 AM4/14/11
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
एक और हैरानी वाली बात है कि समाचार पत्रों में हिंदी या हिंदी ब्लॉगिंग
से संबंधित जो लेख छपते हैं, उनमें कभी भी युनिकोड का उल्लेख नहीं होता।
मैंने कभी भी किसी समाचार पत्र में युनिकोड की उपयोगिता पर कोई चर्चा
नहीं देखी। आकिर क्यों?

दूसरी बात, युनिकोड देवनागरी के सुंदर सुंदर फ़ांट बनाना कितना बड़ा काम
है? हर काम में केवल एक बार की मेहनत है पर उसका फल पूरा हिंदी उद्योग
भोगेगा, हमेशा के लिए।

Anuradha R.

unread,
Apr 14, 2011, 2:22:54 AM4/14/11
to technic...@googlegroups.com, रजनीश मंगला
सचमुच, इस विषय पर जितना सोचा जा रहा है, उतना लिखा नहीं गया। कारण मूलतः यह लगता है कि यह तकनीकी विषय है, जिसमें दखल देने में सभी डरते हैं। दूसरे, हमारे देश में तो कोई भी वैज्ञानिक-तकनीकी सुविधा किसी के लिए भी 'देन' है, नेमत है, जिसमें शिकायत की गुस्ताखी कोई नहीं कर सकता। तीसरे, यह उच्च वर्ग से निम्न वर्ग की ओर आने वाली तकनीक है इसलिए जो हिंदी में काम करने वाले 'निम्न वर्गी, 'मुश्किलों का सामना करते हैं, वह कठिनाई 'उच्च वर्ग' के सामने शायद ही कभी आई हो। इस तरह कल्चरल हेजेमनी का सिद्धांत कहता है कि उच्च वर्ग यह मानना नहीं चाहता कि उनकी समस्याओं से अलग किसी की और भी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए हम गरीबों की बातें अनसुनी रह जाती हैं, या नक्कारखाने में तूती की आवाज हो जाती है, जिस पर कोई ध्यान नहीं देता। हालांकि अनुनाद जी ने जब 1997 में यह गूगल ग्रुप बनाया तब से इससे लोग जुड़ रहे हैं। यानी तभी से इस समस्या पर काम चल रहा है। उन सभी ने इस पर लिखा भी होगा। मैंने खुद भी 1998 नवंबर में नवभारत टाइम्स में संपादकीय लेख इसी पर लिखा था, जिस पर मुझे काफी लोगों की प्रतिक्रिया मिली थी, पर उनमें से ज्यादातर लोग ऐसी स्थिति में नहीं थे कि सरकार या संस्थाओं पर असर डाल कर इस पक्ष में राय बना पाते। पर अब जो इंटरनेट का माध्यम आम जन के हाथों में तेजी से पहुंच रहा है तो इस समस्या का सामना करने वाले और बोलने वाले बढ़ रहे हैं। इसलिए बात भी ज्यादा हो रही है। अगर निर्णयकर्ताओं और नीति-निर्माताओं तक यह बात मजबूती से पहुंचा पाए तो जरूर समाधान निकलेगा और फॉन्ट की समस्या मुह बाए खड़ी नहीं रह पाएगी। तथास्तु!
_अनुराधा
2011/4/14 रजनीश मंगला <rajnees...@gmail.com>
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V S Rawat

unread,
Apr 14, 2011, 3:22:16 AM4/14/11
to technic...@googlegroups.com
On 4/14/2011 10:51 AM India Time, _रजनीश मंगला_ wrote:

> दूसरी बात, युनिकोड देवनागरी के सुंदर सुंदर फ़ांट बनाना कितना बड़ा काम
> है? हर काम में केवल एक बार की मेहनत है पर उसका फल पूरा हिंदी उद्योग
> भोगेगा, हमेशा के लिए।

सुंदर फ़ॉण्ट भी बन जाएँगे, और जब कोई पाठ यूनीकोड में है तो एक यूनीकोड फ़ॉण्ट से दूसरी
यूनीकोड फ़ॉण्ट में एकल कमांड से फटाफट बदल जाएगा। अभी तो आवश्यकता है कि लोग अपने
पाठों को यूनीकोड में लिखना शुरू करें ताकि सुंदर फ़ॉण्ट उपलब्ध हो जाने पर उनको पहले
यूनीकोड में बदलना न पड़े।

रावत

Anunad Singh

unread,
Apr 14, 2011, 5:51:44 AM4/14/11
to technic...@googlegroups.com
रजनीश भाई,
हिन्दी के समाचार पत्र यदि यूनिकोड के बारे में कुछ नहीं लिखते हैं तो इस बात के लिये उन्हें यह कहकर  माफ किया जा सकता है कि यह  तकनीकी  विषय है।  किन्तु अधिक दुख की बात यह है कि छापने के लिये हिन्दी के विषय में कोई सकारात्मक समाचार  इन्हें कभी नहीं मिलता  ;  ये आंख मूदकर अंग्रेजी का गुणगान कर रहे हैं ;  इतनी भारी संख्या में प्रसार होने के बाद भी ये अंग्रेजी के सामने घिघियाते हुए दिखते हैं;  सरकारी विज्ञापनों आदि के लिये अंग्रेजी के पक्ष में एवं भारतीय भाषाओं के विरुद्ध जो पक्षपात है उसका  ये कभी  तनकर विरोध नहीं कर पाते ;  अंग्रेजी में घटिया किश्म  का एक पन्ना तो ये जोड़ सकते हैं किन्तु इतना नहीं समझ सकते कि समाचार एवं विचार के लेखन का स्तर उठाया जाय ताकि जनता की सोच का स्तर भी उठे।

-- अनुनाद सिंह

--------------------------------------

१४ अप्रैल २०११ १०:५१ पूर्वाह्न को, रजनीश मंगला <rajnees...@gmail.com> ने लिखा:

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Apr 14, 2011, 6:48:14 AM4/14/11
to technic...@googlegroups.com
दूसरी बात, युनिकोड देवनागरी के सुंदर सुंदर फ़ांट बनाना कितना बड़ा काम
है? हर काम में केवल एक बार की मेहनत है पर उसका फल पूरा हिंदी उद्योग
भोगेगा, हमेशा के लिए।

भूल जाइये, औरों को छोड़िये मैंने हमारे हिन्दीजगत के ही मैथिली जी से दो-तीन बार अनुरोध किया कि वे अपने बहुप्रचलित कृतिदेव फॉण्ट का यूनिकोड संस्करण बनायें पर कोई फायदा नहीं हुआ।

जब तक पूरा प्रकाशन उद्योग यूनिकोड की दिशा में कदम न बढ़ाये फॉण्ट निर्माता भी यूनिकोड फॉण्ट नहीं बनायेंगे।

१४ अप्रैल २०११ १०:५१ पूर्वाह्न को, रजनीश मंगला <rajnees...@gmail.com> ने लिखा:
एक और हैरानी वाली बात है कि समाचार पत्रों में हिंदी या हिंदी ब्लॉगिंग
--
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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 14, 2011, 6:52:44 AM4/14/11
to technic...@googlegroups.com
हालांकि अनुनाद जी ने जब 1997 में यह गूगल ग्रुप बनाया तब से इससे लोग जुड़ रहे हैं। 

१९९७ नहीं जी २००७ में, १९९७ में हम में से कोई भी इण्टरनेटीय हिन्दी से नहीं जुड़ा था।

१४ अप्रैल २०११ ११:५२ पूर्वाह्न को, Anuradha R. <ranur...@gmail.com> ने लिखा:



--

narayan prasad

unread,
Apr 14, 2011, 9:18:38 AM4/14/11
to technic...@googlegroups.com
<<हालांकि अनुनाद जी ने जब 1997 में यह गूगल ग्रुप बनाया तब से इससे लोग जुड़ रहे हैं।>>

यह किस गूगल ग्रुप की बात चल रही है ?
---नारायण प्रसाद

2011/4/14 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

Hariraam

unread,
Apr 14, 2011, 9:38:05 PM4/14/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
आपका कहना सही है।


अधिकांश साफ्टवेयर निर्माता युनिकोडित वर्सन निकाल चुके है। शेष निकाल रहे हैं। सबके
प्रोग्राम में युनिकोड कनवर्टर उपलब्ध है।

किन्तु मुफ्त नहीं।

Indic Software producers की हालत खस्ता है। विकास कार्य में लाखों खर्च होते हैं।
किन्तु माल बिकता कम है। लाभ मिलना तो दूर, उलटे घाटा हो रहा है। सकरकारी अनुदान
भी नहीं है।
अतः वे अपने सॉफ्टवेयर/फोंट/कनवर्टर/युटिलिटिज की मोनोपोली की नीति अपनाकर ही जीने
को मजबूर रहे हैं।

हमें उनके हित के बारे में भी सोचना होगा।

किन्तु मानकों के निर्धारण की जरूरत है
और सभी निर्माताओं को मानकों अनुपालन करना अनिवार्य होना चाहिए।

-- हरिराम

Dr Rajeev kumar Rawat

unread,
Apr 15, 2011, 2:25:34 AM4/15/11
to technic...@googlegroups.com
मैं हर तरह से सहमत हूं। मेरे से जो बन पडे़ करुंगा ।

मैं खुद परेशान हो जाता हूं , इतने सारे फोंट, कनवर्टर........ ऱुचि नहीं रहती फिर आगे पढ़ने में । क्यों कि हमारा सारा सरकारी काम यूनीको़ड में हो जाता है- 

हमारे समूह में जो सरकारी कारिंदे हैं उनकी शायद ही कोई योग्यता कनवर्टर आदि विकसित करने की हो--- आदरणीय हरिराम जी जैसे एक दो तातश्री को छोड़ कर हम सब थोड़े से ज्यादा वेतन प्राप्त बाबू हैं बस-
सरकारी व्यवस्था की मजबूरियां और मजबूतियां ( क्या सही शब्द है ? ) दोनों ही होती हैं , निम्न स्तर के कर्मचारी को खा जाने के लिए बहुत मजबूत हैं और कुछ अच्छा करने के मामले में बहुत मजबूर  पर जैसा कि आदरणीय हरिराम जी ने कहा है कि हमें इसकी आलोचना करने का कोई हक नहीं,( महोदय आपके प्रयास और जिजीविषा तो हमारे लिए स्तुत्य है,- समूह के अधिकांश सदस्य आपके जुझारुपन से मेरी तरह से  व्यक्तिगत परिचित नहीं हैं )   लेकिन -- बाकी हम सब चाहते हैं कि भगतसिंह जैसा क्रांतिकारी फिर इस देश को चाहिए--- लेकिन मेरा बेटा नही ।।।।।

क्या हम समूह की चर्चाओं को दो भागों में करें- सरकारी कार्यालयों में राजभाषा में काम के प्रतिशत को बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़े सरोकार और दूसरे में -फोंट, कनवर्टर, साफ्टवेयर आदि जैसे तकनीकी विषय़ों के जानकार अपने अनुभव एवं खोजों के ज्ञान को व्यवहार में कैसे लाएं, - इस पर दिशा निर्देश दें । 

सादर 

2011/4/13 Hariraam <hari...@gmail.com>

--
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--
डॉ. राजीव कुमार रावत  Dr. R. K. Rawat
हिन्दी अधिकारी          Hindi Officer
राजभाषा विभाग         Rajbhasha Vibhag
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर 721302
Indian Institute of Technology Khargpur
09564156315,09614887714,09641049944,08653807663
off/fax- 03222 281718,res- 03222 281865
dr.raje...@yahoo.co.in , rkr...@hijli.iitkgp.ernet.in


361.gif

Anuradha R.

unread,
Apr 15, 2011, 2:42:49 AM4/15/11
to technic...@googlegroups.com
नारायण प्रसाद जी,
नहीं, यह 2007 की और इसी ग्रुप की बात है। दरअसल इसके पेज पर मैंने अनुनाद जी का नाम मैनेजर के तौर पर देखा तो समझा कि वही इसकी शुरुआत करने वाले हैं। पर अब देख रही हूं कि Group Owner आप हैं। भूल सुधार। अच्छा हुआ, मेरी गलती पकड़ी और इसी बहाने आपके बारे में यह भी पता लगा कि आप दो-दो विदेशी भाषाओं के जानकार हैं और पुणे में रहते हैं। 
शुभकामनाओं के साथ,
-अनुराधा

2011/4/14 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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narayan prasad

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Apr 15, 2011, 3:37:19 AM4/15/11
to technic...@googlegroups.com
<<क्या हम समूह की चर्चाओं को दो भागों में करें- सरकारी कार्यालयों में राजभाषा में काम के प्रतिशत को बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़े सरोकार और दूसरे में -फोंट, कनवर्टर, साफ्टवेयर आदि जैसे तकनीकी विषय़ों के जानकार अपने अनुभव एवं खोजों के ज्ञान को व्यवहार में कैसे लाएं, - इस पर दिशा निर्देश दें । >>
 
"सरकारी कार्यालयों में राजभाषा में काम के प्रतिशत को बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़े सरोकार" पर चर्चा करना इस समूह का उद्देश्य नहीं है ।  इस प्रकार की चर्चा सम्बद्ध कार्यालय में ही  कर सकते हैं । इस समूह को केवल तकनीकी हिन्दी के बारे में सीमित रखेंगे तो अच्छा होगा ।
<<हमारे समूह में जो सरकारी कारिंदे हैं उनकी शायद ही कोई योग्यता कनवर्टर आदि विकसित करने की हो--- आदरणीय हरिराम जी जैसे एक दो तातश्री को छोड़ कर >>
 
आदरणीय हरिराम जी ने यद्यपि यूनिकोड और हिन्दी सम्बन्धी बहुत उपयोगी लेख और सुझाव प्रस्तुत किए हैं, परन्तु उन्होंने कोई फोंट परिवर्तक तैयार किया हो ऐसा कुछ मेरी जानकारी में नहीं है ।
फोंट परिवर्तक तैयार करने के बारे में श्री अनुनाद सिंह जी अग्रगण्य रहे हैं । उनके बारे में मुझे नहीं मालूम कि वे सरकारी व्यक्ति हैं या नहीं, परन्तु मैं तो सरकारी आदमी हूँ । उन्हीं की प्रेरणा से कुछ फोंट परिवर्तक हिन्दी के लिए मैंने भी बनाए । बाद में गुजराती में भी एक परिवर्तक बनाया । यह कार्य मैं अब किसी भी भारतीय लिपि के लिए कर सकता हूँ जिसके लिए यूनिकोड सपोर्ट उपलब्ध है । परन्तु मेरे द्वारा यह सब काम जावास्क्रिप्ट में किया गया जो केवल टेक्स्ट मोड में ही कार्य करता है ।

हाल में श्रीश जी (ई-पंडित) ने भी परिवर्तक का काम चालू कर दिया है ।

---नारायण प्रसाद  

2011/4/15 Dr Rajeev kumar Rawat <dr.raje...@gmail.com>
361.gif

Anuradha R.

unread,
Apr 15, 2011, 5:38:41 AM4/15/11
to technic...@googlegroups.com
नारायण प्रसाद जी, समूह की सीमाओं को स्पष्ट कर दिया आपने। यहां राजभाषा में काम-काज बढ़ाने का मसला नहीं है, सिर्फ हिंदी कंप्यूटिंग को बेहतर बनाने की बात है, ताकि अंततः इस और दूसरी भारतीय भाषाओं को ज्यादा लोग अपनाने को प्रेरित हों और जो लोग इसमें काम करना चाहते हैं, उन्हें सहूलियत हो और वे मजबूरी में भाग-भाग कर अंग्रेजी की शरण में ही न जा पड़ें।
-अनुराधा
2011/4/15 narayan prasad <hin...@gmail.com>
--
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V S Rawat

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Apr 15, 2011, 8:23:05 AM4/15/11
to technic...@googlegroups.com
On 4/15/2011 1:07 PM India Time, _narayan prasad_ wrote:

> <<क्या हम समूह की चर्चाओं को दो भागों में करें- सरकारी कार्यालयों में राजभाषा में काम
> के प्रतिशत को बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़े सरोकार और दूसरे में -फोंट, कनवर्टर, साफ्टवेयर
> आदि जैसे तकनीकी विषय़ों के जानकार अपने अनुभव एवं खोजों के ज्ञान को व्यवहार में कैसे
> लाएं, - इस पर दिशा निर्देश दें । >>

> "सरकारी कार्यालयों में राजभाषा में काम के प्रतिशत को बढ़ाने के उद्देश्य से जुड़े सरोकार"
> पर चर्चा करना इस समूह का उद्देश्य नहीं है । इस प्रकार की चर्चा सम्बद्ध कार्यालय में
> ही कर सकते हैं । इस समूह को केवल तकनीकी हिन्दी के बारे में सीमित रखेंगे तो अच्छा होगा ।

लोग अपने कार्यालय में या मित्रों परिवार में हिन्दी के उपयोग पर चर्चा करें, और इसमें
दूसरे लोगों को जो समस्याएँ आती हैं उनका ज़िक्र यहाँ पर करें तो यह अवश्य इस समूह के
स्कोप में होगा कि हममें से कोई उन समस्याओं के कोई तकनीकी समाधान देने का प्रयास करेंगे।

रावत

Hariraam

unread,
Apr 16, 2011, 9:03:01 AM4/16/11
to technic...@googlegroups.com
कुछ वर्ष पहले मैंने Font converter बनाने में iiit.net का सहयोग करने का कार्य किया था।
देखें --
 
 
फिर पाया कि -
 
ये सिर्फ text मोड में सही कार्य करते हैं। मूल पाठ की फार्मेटिंग व डिजाइन व ले-आऊट सही बना रहे, ऐसे html कनवर्टर जरूरी थे।
 
चूँकि मेरे पास CDAC के ISM का खरीदा गया लाईसैंसवाला वर्सन हैं, उसके font-code converter से काम चल जाता है। लेआऊट सहित भी पाठ कनवर्ट हो जाता है। आऊटपुट पाठ में त्रुटियाँ भी नगण्य रहती हैं। किन्तु सभी लोग तो ऐसे सॉफ्टवेयर खरीद नहीं सकते।
 
अतः फिर बेहतर लगा SIL font-code-coverter, इसके कुछ कोड में परिवर्तन करके काम चलाया, जो MSword की Doc फाइलों को हूबहू लेआउट-सहित कनवर्ट करने में समर्थ हैं।
 
फिर अनुनाद जी के मार्गदर्शन अनुसार FireFox में foxreplace के कनवर्टर बेहतर लगे, जो layout को हूबहू रखते हुए html पाठ को कनवर्ट कर पाते हैं।
 
मेरे विचार में --
Font-code-converter अस्थायी समाधान हैं। स्थायी समाधान के लिए Font-code-standardisation पर हमें अधिक जोर लगाना चाहिए। और सरकारी संस्थाओं का सहयोग करना चाहिए।
 
यदि माईक्रोसॉफ्ट के TBIL converter
या
ildc.in पर उपलब्ध 'परिवर्तन'
 
की तरह integrated converter हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य बना पाते तो भारत सरकार की संस्थाओं के वेबसाइट पर भी डाउनलोड हेतु उपलब्ध करवाने के लिए एक अधिकारी राजी हुए थे, बशर्ते कि निर्माता द्वारा GPL के तहत घोषणा दी जाए, और भविष्य में किसी प्रकार का कोई कानूनी दावा किए जाने की आशंका न हो।
 
 
किन्तु हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य अपने अपने बहुमूल्य समय से समय निकाल कर कुछ कुछ योगदान दे रहे हैं। कोई एकीकृत प्लेटफार्म नहीं है। कोई निश्चित open source tools से deveop नहीं किए गए हैं।
 
जैसा कि श्रीश जी, .Net, C# से कनवर्टर  आदि टूल्स बनाकर निःशुल्क उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन .Net, C# आदि माईक्रोसॉफ्ट के कॉपीराइट हैं, इनका उपयोग कर उत्पाद विकसित कर दूसरों को प्रदान करने के लिए भी शायद लाईसेंस व कापीराइट संबंधी मामले खड़े हो सकते हैं।
 
और फिर legacy फोंट विभिन्न बहुभाषी सॉफ्टवेयर निर्माताओं के कॉपीराइट हैं, इनके आधार पर कुछ कनवर्टर आदि विकसित करके लोगों को मुफ्त बाँटना भी जोखिम वाला कार्य है। क्योंकि इनके निर्माता चाहें तो कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। क्योंकि इस प्रकार मुफ्त कनवर्टर उपलब्ध करवा देने से उनके सॉफ्टवेयर की बिक्री पर बुरा असर पड़ता है।  
 
उदाहरण के लिए यदि चाणक्य फोंट से युनिकोड व युनिकोड से चाणक्य फोंट का कनवर्टर निःशुल्क उपलब्ध हो तो कोई Indica जैसा सॉफ्टवेयर क्यों खरीदेगा, वह OS की default IME से देवनागरी युनिकोड में पाठ इनपुट कर लेगा, फिर चाणक्य में कनवर्ट करके मुद्रण हेतु उपयोग करेगा।
 
इन कारणों से मैंने फोंट कनवर्टर बनाने की ओर ज्यादा ध्यान देना उचित नहीं समझा।
 
बल्कि भारतीय लिपियों की कम्प्यूटिंग की मूलभूत समस्याओं का जड़ से समाधान करने के प्रयासों में लगा हुआ हूँ।
 
भले ही यह भगवान राम के द्वारा सेतु बंधन के दौरान गिलहरी के सहयोग जैसा ही क्यों न हो।
 
सादर।
 
-- हरिराम
 
 


 
2011/4/15 narayan prasad <hin...@gmail.com>

Anuradha R.

unread,
Apr 17, 2011, 12:52:05 AM4/17/11
to technic...@googlegroups.com
मुझे लगता है हरिराम जी ने कॉपीराइट का मसला सही उठाया है। हम बिना सोचे-समझे ही फॉन्ट कनवर्टरों का इस्तेमाल किए जा रहे हैं और दूसरों को भी लिंक आदि भेज रहे हैं। पर इन पर किसी कंपनी या समूह के एकाधिकार के बारे में भी पता होना चाहिए। अगर श्रीश जी का हाल में विकसित चाणक्य फॉन्ट कनवर्टर या फिर दूसरे, इस ग्रुप में उपलब्ध कनवर्टर कॉपीराइट से बाहर हैं, ओपन सोर्स के हैं, तो उनका भी पता रहे तो बेहतर ताकि बिना कानूनी कार्रवाई के डर के और बिना कानून तोड़े बेबाक उनका इस्तेमाल और प्रसार कर सकें।

और यह काम भी फॉन्ट कनवर्टर विकसित करने और उनके प्रसार जितना ही महत्वपूर्ण है, बल्कि उसका हिस्सा ही है।

सादर,
-अनुराधा

2011/4/16 Hariraam <hari...@gmail.com>
--
आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)" समूह की सदस्यता ली है.
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--

V S Rawat

unread,
Apr 17, 2011, 1:04:48 AM4/17/11
to technic...@googlegroups.com
नियम तो होंगे ही इस विषय में, लेकिन कानून का सामान्य दृष्टिकोण यह रहता है कि जब
तक किसी सुविधा से कोई वित्तीय लाभ नहीं उठाया जा रहा है, तब तक उसका इस्तेमाल
करने में कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। वैसे भी यह तो एक तकनीकी समूह है और शिक्षा के
उपयोग के लिए सुविधाओं के प्राय: मुफ़्त उपयोग की अनुमति दे दी जाती है।

इसलिए सावधानी रखें परंतु ज्यादा परेशान मत होएँ।

हाँ, हममें से जो लोग इन कन्वर्टरों का व्यावसायिक उपयोग करके धन अर्जित कर रहे हैं,
उनको नियमों का पता लगाना चाहिए। ध्यान रखें कि कानून का पता न होने से आपको सजा
में छूट नहीं मिलने वाली।

रावत

On 4/17/2011 10:22 AM India Time, _Anuradha R._ wrote:

> मुझे लगता है हरिराम जी ने कॉपीराइट का मसला सही उठाया है। हम बिना सोचे-समझे ही
> फॉन्ट कनवर्टरों का इस्तेमाल किए जा रहे हैं और दूसरों को भी लिंक आदि भेज रहे हैं। पर
> इन पर किसी कंपनी या समूह के एकाधिकार के बारे में भी पता होना चाहिए। अगर श्रीश
> जी का हाल में विकसित चाणक्य फॉन्ट कनवर्टर या फिर दूसरे, इस ग्रुप में उपलब्ध कनवर्टर
> कॉपीराइट से बाहर हैं, ओपन सोर्स के हैं, तो उनका भी पता रहे तो बेहतर ताकि बिना
> कानूनी कार्रवाई के डर के और बिना कानून तोड़े बेबाक उनका इस्तेमाल और प्रसार कर सकें।
>
> और यह काम भी फॉन्ट कनवर्टर विकसित करने और उनके प्रसार जितना ही महत्वपूर्ण है,
> बल्कि उसका हिस्सा ही है।
>
> सादर,
> -अनुराधा
>

> 2011/4/16 Hariraam <hari...@gmail.com <mailto:hari...@gmail.com>>
>
> कुछ वर्ष पहले मैंने Font converter बनाने में iiit.net <http://iiit.net> का


> सहयोग करने का कार्य किया था।
> देखें --
> http://ltrc.iiit.ac.in/showfile.php?filename=downloads/FC-1.0/fc.html
> फिर पाया कि -
> ये सिर्फ text मोड में सही कार्य करते हैं। मूल पाठ की फार्मेटिंग व डिजाइन व
> ले-आऊट सही बना रहे, ऐसे html कनवर्टर जरूरी थे।
> चूँकि मेरे पास CDAC के ISM का खरीदा गया लाईसैंसवाला वर्सन हैं, उसके font-code
> converter से काम चल जाता है। लेआऊट सहित भी पाठ कनवर्ट हो जाता है। आऊटपुट
> पाठ में त्रुटियाँ भी नगण्य रहती हैं। किन्तु सभी लोग तो ऐसे सॉफ्टवेयर खरीद नहीं सकते।
> अतः फिर बेहतर लगा SIL font-code-coverter, इसके कुछ कोड में परिवर्तन करके
> काम चलाया, जो MSword की Doc फाइलों को हूबहू लेआउट-सहित कनवर्ट करने में
> समर्थ हैं।
> फिर अनुनाद जी के मार्गदर्शन अनुसार FireFox में foxreplace के कनवर्टर बेहतर
> लगे, जो layout को हूबहू रखते हुए html पाठ को कनवर्ट कर पाते हैं।
> मेरे विचार में --
> Font-code-converter अस्थायी समाधान हैं। स्थायी समाधान के लिए
> Font-code-standardisation पर हमें अधिक जोर लगाना चाहिए। और सरकारी
> संस्थाओं का सहयोग करना चाहिए।
> यदि माईक्रोसॉफ्ट के TBIL converter
> या

> ildc.in <http://ildc.in> पर उपलब्ध 'परिवर्तन'

> 2011/4/15 narayan prasad <hin...@gmail.com <mailto:hin...@gmail.com>>

Anunad Singh

unread,
Apr 17, 2011, 1:33:58 AM4/17/11
to technic...@googlegroups.com
मुझे लगता है कि हरिराम जी द्वारा प्रस्तुत कॉपीराइट का डर को अतिरंजन का शिकार है।  ऐसा होगा तो लोगों का चलना-फिरना, खाना-पीना  मुश्किल हो जायेगा। उदाहरण के लिये 'सी-हैश'  का लाइसेंस वाला  कम्पाइलर खरीदकर कोई व्यक्ति कोई 'अप्लिकेश' बनाता है तो उसे बेचने में भी कॉपीराइट का अड़ंगा नहीं आना चाहिये, यहाँ तो श्रीश जी ने नि:शुल्क उपयोग के लिये प्रदान किया है।

फॉण्ट परिवर्तक,  माइक्रोसॉफ्ट ने बनाये हैं, सी-डैक ने बनाए हैं। उनको कोई डर नहीं तो आम जनता को कैसा डर?

कम्प्यूटर का सारा काम ही 'परिवर्तन' करना है। कुछ इन्पुट दिया जाता है, उस पर तमाम तरह की प्रक्रियाएं (गणितीय आपरेशन आदि) करके आउटपुट  किया जाता है।  यदि इस समूह के फॉण्ट परिवर्तक कॉपीराइट के घेरे में आ जायेगे तो  सब कुछ कॉपीराइट के घेरे में आ जायेगा।

-- अनुनाद

Anuradha R.

unread,
Apr 17, 2011, 1:36:13 AM4/17/11
to technic...@googlegroups.com
"हाँ, हममें से जो लोग इन कन्वर्टरों का व्यावसायिक उपयोग करके धन अर्जित कर रहे हैं, उनको नियमों का पता लगाना चाहिए। "

नियमों का पता तो होता ही है, व्यावसायिक इस्तेमाल करने वालों को। लेकिन सवाल यह होता है कि जिस फॉन्ट के आधार पर या जिस सॉफ्टवेयर से फॉन्ट कनवर्टर विकसित किए गए हैं, उस मूल सामग्री के कॉपीराइट के बारे में तो डेवेलपर ही बता सकता है। इन कनवर्टर्स का प्रसार गैर-सदस्यों तक भी हो रहा है, जिनमें से कुछ व्यावसायिक इस्तेमाल भी कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कोई पुस्तक या पत्रिका प्रकाशक या संपादक किसी और फॉन्ट में प्राप्त संपादकीय सामग्री को अपनी संस्था के मानक फॉन्ट में बदलता है तो वह व्यावसायिक काम हुआ। पर उसे उस कनवर्टर के सोर्स और आधार सामग्री का पता कैसे चले? 

दूसरी बात, इस समूह के सदस्य शिक्षा आदि के लिए तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, पर उनके शौकिया तौर पर बनाए  उत्पाद सब जगह फैल रहे हैं और लोग अनजाने में ही, उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में कॉपीराइट की जानकारी कनवर्टर के साथ ही मिल जाए तो अच्छा रहे।
-अनुराधा

2011/4/17 V S Rawat <vsr...@gmail.com>
--
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ePandit | ई-पण्डित

unread,
Apr 17, 2011, 2:02:29 PM4/17/11
to technic...@googlegroups.com
ये सिर्फ text मोड में सही कार्य करते हैं। मूल पाठ की फार्मेटिंग व डिजाइन व ले-आऊट सही बना रहे, ऐसे html कनवर्टर जरूरी थे।

हालिया कन्वर्टर बनाते समय मेरे दिमाग में यह भी था कि फॉर्मेटिंग बरकरार रखते हुये कन्वर्ट हो सके लेकिन मैंने पाया कि रिच टैक्स्ट में रिप्लेस फंक्शन चलाने पर लातिन पाठ में तो फॉर्मेटिंग ठीक रहती है लेकिन यूनिकोड पाठ में नष्ट हो जाती है। यह देखकर मुझे काफी निराशा हुयी थी। हालाँकि लिगेसी फॉण्ट से यूनिकोड परिवर्तक में शायद फॉर्मेटिंग बरकरार रखी जा सकती है।

समस्या ये है कि ज्यादातर कन्वर्टर टैक्स्ट बॉक्स या फाइल से एक string वैरियेबल में इनपुट डलवाते हैं जो कि फॉर्मेटिंग हैण्डल नहीं कर सकता। इसके अलावा डॉट नेट या जावा आदि में विभिन्न प्रकार की फाइलों (जैसे ऑफिस फाइलें आदि) में सीधे काम किया जा सकता है लेकिन उनके लिये उस सॉफ्टवेयर का रैफरेंस जोड़ना होता है। अब इसमें दो समस्यायें हैं, एक तो वह सॉफ्टवेयर कम्प्यूटर में इंस्टाल होना चाहिये, ऊपर से कन्वर्टर केवल उस वर्जन वाले सॉफ्टवेयर पर ही कार्य करेगा। उदाहरण के लिये वर्ड 2007 के लिये बनाया गया कन्वर्टर वर्ड 2003 के लिये काम नहीं करेगा तथा 2007 के लिये भी तभी काम करेगा जब कम्प्यूटर में वह इंस्टाल हो। यानि केवल वर्ड के लिये ही हर संस्करण के लिये अलग कन्वर्टर (मतलब अलग कोड) बनाना पड़ेगा, साथ ही प्रोग्राम बनाते वक्त भी वह सॉफ्टवेयर इंस्टाल होना चाहिये और प्रयोक्ता द्वारा चलाते वक्त भी उसके कम्प्यूटर पर होना चाहिये। इन सारे झंझटों के कारण इस तरह का कन्वर्टर बनाने का इरादा मैंने त्याग दिया।

१६ अप्रैल २०११ ६:३३ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 17, 2011, 2:05:42 PM4/17/11
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यदि माईक्रोसॉफ्ट के TBIL converter या ildc.in पर उपलब्ध 'परिवर्तन' 
की तरह integrated converter हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य बना पाते

इण्टीग्रेटिड से आपका क्या आशय है? क्या यह कि एक ही इण्टरफेस में कई फॉण्टों के लिये कन्वर्टर उपलब्ध हों?

मेरा कुछ और फॉण्ट परिवर्तक जोड़ने का इरादा परन्तु हर फॉण्ट के लिये नहीं। मैं केवल कुछ सर्वाधिक प्रचलित फॉण्टों हेतु ही परिवर्तक बनाने का इच्छुक हूँ।

१६ अप्रैल २०११ ६:३३ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
कुछ वर्ष पहले मैंने Font converter बनाने में iiit.net का सहयोग करने का कार्य किया था।
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Hariraam

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Apr 17, 2011, 3:22:35 PM4/17/11
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On 17-04-2011 23:35, ePandit | ई-पण्डित wrote:
यदि माईक्रोसॉफ्ट के TBIL converter या ildc.in पर उपलब्ध 'परिवर्तन' 
की तरह integrated converter हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य बना पाते

इण्टीग्रेटिड से आपका क्या आशय है? क्या यह कि एक ही इण्टरफेस में कई फॉण्टों के लिये कन्वर्टर उपलब्ध हों?

जी हाँ

मेरा कुछ और फॉण्ट परिवर्तक जोड़ने का इरादा परन्तु हर फॉण्ट के लिये नहीं। मैं केवल कुछ सर्वाधिक प्रचलित फॉण्टों हेतु ही परिवर्तक बनाने का इच्छुक हूँ।

सभी के कनवर्टर बनाना हमारे लिए संभव नहीं। न ही जरूरी। डांगी के 'प्रखर' में लगभग सभी हैं। किन्तु यह मुफ्त नहीं है शायद।

-- हरिराम

Hariraam

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Apr 17, 2011, 3:30:24 PM4/17/11
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On 17-04-2011 23:32, ePandit | ई-पण्डित wrote:
ये सिर्फ text मोड में सही कार्य करते हैं। मूल पाठ की फार्मेटिंग व डिजाइन व ले-आऊट सही बना रहे, ऐसे html कनवर्टर जरूरी थे।

हालिया कन्वर्टर बनाते समय मेरे दिमाग में यह भी था कि फॉर्मेटिंग बरकरार रखते हुये कन्वर्ट हो सके लेकिन मैंने पाया कि रिच टैक्स्ट में रिप्लेस फंक्शन चलाने पर लातिन पाठ में तो फॉर्मेटिंग ठीक रहती है लेकिन यूनिकोड पाठ में नष्ट हो जाती है। यह देखकर मुझे काफी निराशा हुयी थी। हालाँकि लिगेसी फॉण्ट से यूनिकोड परिवर्तक में शायद फॉर्मेटिंग बरकरार रखी जा सकती है।

समस्या ये है कि ज्यादातर कन्वर्टर टैक्स्ट बॉक्स या फाइल से एक string वैरियेबल में इनपुट डलवाते हैं जो कि फॉर्मेटिंग हैण्डल नहीं कर सकता। इसके अलावा डॉट नेट या जावा आदि में विभिन्न प्रकार की फाइलों (जैसे ऑफिस फाइलें आदि) में सीधे काम किया जा सकता है लेकिन उनके लिये उस सॉफ्टवेयर का रैफरेंस जोड़ना होता है। अब इसमें दो समस्यायें हैं, एक तो वह सॉफ्टवेयर कम्प्यूटर में इंस्टाल होना चाहिये, ऊपर से कन्वर्टर केवल उस वर्जन वाले सॉफ्टवेयर पर ही कार्य करेगा। उदाहरण के लिये वर्ड 2007 के लिये बनाया गया कन्वर्टर वर्ड 2003 के लिये काम नहीं करेगा तथा 2007 के लिये भी तभी काम करेगा जब कम्प्यूटर में वह इंस्टाल हो। यानि केवल वर्ड के लिये ही हर संस्करण के लिये अलग कन्वर्टर (मतलब अलग कोड) बनाना पड़ेगा, साथ ही प्रोग्राम बनाते वक्त भी वह सॉफ्टवेयर इंस्टाल होना चाहिये और प्रयोक्ता द्वारा चलाते वक्त भी उसके कम्प्यूटर पर होना चाहिये। इन सारे झंझटों के कारण इस तरह का कन्वर्टर बनाने का इरादा मैंने त्याग दिया।


अतः Sil convrter, Foxreplace बेहतर हैं।
यूजर को save as HTML या Save as XML करके पाठ को save करना होगा।
फिर आसानी से replace किया जा सकता है।
फिर html से वर्ड आदि के .doc रूप में सेव करने पर लेकिन कुछ न कुछ फार्मेटिंग फिर भी बदल जाती है।

-- हरिराम

Hariraam

unread,
Apr 17, 2011, 3:41:00 PM4/17/11
to technic...@googlegroups.com
हालांकि सच्चाई है कि इन पुराने फोंट्स के बारे में शायद ही कोई कॉपीराइट का दावा करेगा।
NASCOM के द्वारा भी जो कॉपीराइट संबंधी छापे करवाए जाते हैं, वे उन्हीं संस्थानों/प्रतिष्ठानों पर होते हैं, जहाँ से एक छापे में कम से कम 5 लाख वसूले जा सकें।
छोटे-मोटे कीड़ों को कोई नहीं मारने जाकर कोई अपने हाथ गंदे नहीं करना चाहता, क्योंकि एक चढ़ाई में लगभग 5-10 लाख का खर्चा यों ही आ जाता है।
कानूनी दावा करने में भी लाखों का खर्चा आ जाता है। अतः निश्चिंत रह सकते हैं।
फिर भी इस ग्रूप के सदस्यों को कॉपीराइट संबंधी नियमों की जानकारी होनी चाहिए।
-- हरिराम

ePandit | ई-पण्डित

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Apr 18, 2011, 1:11:22 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
मैं दो दिन बाहर था इसलिये उत्तर नहीं दे पाया। हरिराम जी ने दो तरह के प्रश्न उठाये हैं। एक तो प्रोग्रामिंग भाषा सम्बन्धी दूसरा फॉण्ट सम्बन्धी।

पहले प्रोग्रामिंग भाषा सम्बन्धी।

किन्तु हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य अपने अपने बहुमूल्य समय से समय निकाल कर कुछ कुछ योगदान दे रहे हैं। कोई एकीकृत प्लेटफार्म नहीं है। कोई निश्चित open source tools से deveop नहीं किए गए हैं

पता नहीं लोगों को ये गलतफहमी क्यों है कि मुक्त स्रोत (ओपन सोर्स) सॉफ्टवेयर सिर्फ जावा में ही बनाये जा सकते हैं। आप दुनिया की किसी भी प्रोग्रामिंग भाषा में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर बना सकते हैं। अपना सोर्स कोड नेट पर उपलब्ध करा दीजिये, उसे किसी मौजूदा लाइसेंस प्रणाली (यथा जीपीऍल) के साथ असोशियेट कर दीजिये या फिर अपनी शर्तें तय कीजिये।

इस समूह पर उपलब्ध अधिकांश कन्वर्टर जावास्क्रिप्ट में बने हैं जिसमें बने प्रोग्राम का सोर्स कोई भी देख सकता है, हालाँकि जब तक प्रोग्रामर खुद मुक्त घोषित न करे ये भी कॉपीराइट के अन्तर्गत आते हैं। इसलिये कोई भी चाहे तो उस प्रोग्राम के विकासकर्ता से अनुमति लेकर उसके कोड का प्रयोग कर सकता है।

ओपन सोर्स टूल बनाने के लिये प्रयोग की जा रही भाषा का खुद में ओपन सोर्स होना जरुरी नहीं है। जावा भी कुछ समय पहले ही ओपन सोर्स हुयी है (मुफ्त हमेशा से थी)। डॉट नेट ओपन सोर्स नहीं है लेकिन क्या फर्क पड़ता है। जावा ओपन सोर्स है लेकिन कितने जावा प्रोग्रामर हैं जो उसके कोड को सुधारने में योगदान देते हैं। यदि आप जावा भाषा में सुधार हेतु योगदान देना चाहते हैं तो बात अलग है वरना आप चाहे किसी भाषा में टूल बनायें, उसे ओपन सोर्स कर सकते हैं।

जैसा कि श्रीश जी, .Net, C# से कनवर्टर  आदि टूल्स बनाकर निःशुल्क उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन .Net, C# आदि माईक्रोसॉफ्ट के कॉपीराइट हैं, इनका उपयोग कर उत्पाद विकसित कर दूसरों को प्रदान करने के लिए भी शायद लाईसेंस व कापीराइट संबंधी मामले खड़े हो सकते हैं।

C# या VB.NET प्रोग्रामिंग भाषायें हैं, .NET एक सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म जबकि Visual Studio उनमें सॉफ्टवेयर बनाने हेतु एक IDE (Integral Development Environment - एक सॉफ्टवेयर जिसमें प्रोग्रामिंग हेतु कई तरह की सुविधायें होती हैं)। मूल्य IDE का होता है प्रोग्रामिंग भाषा का नहीं।

जावा के लिये प्रोग्राम बिना IDE के केवल उसके SDK का प्रयोग करके किसी टैक्स्ट ऍडीटर (यथा नोटपैड) का प्रयोग करके भी बनाये जा सकते हैं या फिर उसके लिये Eclipse तथा Netbeans आदि मुफ्त IDE उपलब्ध हैं।

इसी प्रकार माइक्रोसॉफ्ट के विजुअल स्टूडियो के कई संस्करण हैं - प्रोफैशनल, ऍण्टरप्राइज आदि जिनमें Express Edition (जिसमें थोड़ी कम सुविधायें हैं) माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। आपके मेरे जैसे बन्दों के काम के लिये ये पर्याप्त है, हमें विजुअल स्टूडियो के पेड संस्करण खरीदने की जरुरत नहीं। यह मुफ्त ऍडीशन भी जावा के IDE से ज्यादा यूजर फ्रैण्डली है। इसके अलावा माइक्रोसॉफ्ट कुछ योजनाओं के अन्तर्गत प्रोग्रामिंग सीखने वालों को विजुअल स्टूडियो के मुफ्त लाइसेंस भी देता है।

इसके अतिरिक्त डॉट नेट में सॉफ्टवेयर बनाने हेतु Mono नामक एक मुफ्त  IDE भी है। लिनक्स में डॉट नेट प्रोग्राम बनाने/चलाने हेतु MonoDevelop नामक IDE है। यही नहीं मोनो के आइओऍस हेतु MonoTouch तथा ऍण्ड्रॉइड हेतु Mono for Android नाम से भी विजुअल स्टूडियो प्लगइन हैं (हालाँकि वे शायद मुफ्त नहीं हैं)।

यानि मोनो के जरिये जावा की तरह डॉट नेट भी क्रॉस प्लेटफॉर्म हो गयी है। तो आप डॉट नेट में भी मुफ्त में प्रोग्राम बना सकते हैं। उन्हें चाहे मुफ्त रखिये चाहे मुक्त स्रोत रखिये चाहे क्रॉस प्लेटफॉर्म बनाइये।

अब बात आती है कि हम डॉट नेट में प्रोग्राम बना कर उन्हें मुफ्त बाँट सकते हैं या नहीं। हम चाहे ऊपर बताये किसी भी तरीके से डॉट नेट में प्रोग्राम बनायें, उन्हें मुफ्त बाँट सकते हैं या बेच सकते हैं। पहली बात तो मैं बता ही चुका हूँ कि डॉट नेट में प्रोग्राम बनाने के लिये मुफ्त IDE उपलब्ध हैं। दूसरी बात आप किसी सॉफ्टवेयर को देख-जाँच कर बता नहीं सकते कि वह कौन से विजुअल स्टूडियो से बना है मुफ्त के Express Edition या Professional/Enterprize या किसी और, वह वर्जन लाइसेंस्ड था या पाइरेटिड। और तो और बिना किसी विशेष तरीके के आप ये भी नहीं बता सकते कि वह किस डॉट नेट प्रोग्रामिंग भाषा से बना है (C# से या VB.NET से)।

इसलिये निश्चिंत रहें और डॉट नेट में मजे से प्रोग्राम बनायें, IDE का रोल टूल बनाने तक ही है, उसके बाद नहीं।
 
और फिर legacy फोंट विभिन्न बहुभाषी सॉफ्टवेयर निर्माताओं के कॉपीराइट हैं, इनके आधार पर कुछ कनवर्टर आदि विकसित करके लोगों को मुफ्त बाँटना भी जोखिम वाला कार्य है। क्योंकि इनके निर्माता चाहें तो कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। क्योंकि इस प्रकार मुफ्त कनवर्टर उपलब्ध करवा देने से उनके सॉफ्टवेयर की बिक्री पर बुरा असर पड़ता है।

देखिये इस बारे में हमारे पास ऍक्सक्यूज है कि हम उनका मालिकाना फॉण्ट नहीं बाँट रहे, उसे बाँटें तो कॉपीराइट उल्लंघन होता है। तमाम सॉफ्टवेयरों के लिये अन्य थर्ड पार्टी टूल जैसे प्लगइन आदि बनते हैं। और वैसे भी ये कन्वर्टर असल में फॉण्ट कन्वर्टर न होकर फॉण्ट कोड कन्वर्टर ही हैं जो केवल एक मैपिंग को दूसरी मैपिंग में बदलते हैं, इस काम में उनका फॉण्ट कहीं भी शामिल नहीं होता, ये कन्वर्टर तब भी काम करते हैं चाहे वह फॉण्ट कम्प्यूटर में न हो।

और फिर मुझे तो लगता है कि ये कन्वर्टर उनके फॉण्टों के लिये लाभदायक ही हैं क्योंकि इन कन्वर्टरों की आउटपुट रॉ ऑस्की डाटा होता है, उसे प्रयोग या प्रिण्ट करने के लिये तो प्रयोक्ता को उनका फॉण्ट (खरीदकर) ही प्रयोग करना होगा जिससे उनके फॉण्ट की बिक्री बढ़ेगी है। उन्हें तो प्रसन्न होना चाहिये कुछ बड़े प्रकाशन उद्योगों को छोड़कर जहाँ उनके फॉण्टों का प्रयोग समाप्त होता जा रहा है, इन कन्वर्टरों के जरिये नये लोग भी थोड़ा-बहुत प्रयोग कर लेंगे।
 
उदाहरण के लिए यदि चाणक्य फोंट से युनिकोड व युनिकोड से चाणक्य फोंट का कनवर्टर निःशुल्क उपलब्ध हो तो कोई Indica जैसा सॉफ्टवेयर क्यों खरीदेगा, वह OS की default IME से देवनागरी युनिकोड में पाठ इनपुट कर लेगा, फिर चाणक्य में कनवर्ट करके मुद्रण हेतु उपयोग करेगा।

वही बात, मुद्रण हेतु बन्दे को चाणक्य फॉण्ट तो प्रयोग करना (खरीदना) ही पड़ेगा, नहीं तो केवल लातिन काँटे-छुरी छपेंगे। तो इससे चाणक्य निर्माता का नुक्सान कहाँ हुआ।

हाँ अगर बात ये है कि बन्दा बिना खरीदे चाणक्य प्रयोग करे तो वो तो वैसे भी कर सकता है, पाइरेसी तो उनके मालिकाना सॉफ्टवेयरों की भी हो सकती है (होती है)।

१६ अप्रैल २०११ ६:३३ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
कुछ वर्ष पहले मैंने Font converter बनाने में iiit.net का सहयोग करने का कार्य किया था।
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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 18, 2011, 1:20:03 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
अगर श्रीश जी का हाल में विकसित चाणक्य फॉन्ट कनवर्टर या फिर दूसरे, इस ग्रुप में उपलब्ध कनवर्टर कॉपीराइट से बाहर हैं, ओपन सोर्स के हैं, तो उनका भी पता रहे तो बेहतर ताकि बिना कानूनी कार्रवाई के डर के और बिना कानून तोड़े बेबाक उनका इस्तेमाल और प्रसार कर सकें।

अनुराधा जी मैंने टूल के होमपेज पर स्पष्ट रुप से उल्लेख किया है कि यह टूल मुफ्त है, आप इसे पुनर्वितरित कर सकते हैं। बल्कि आप जितने ज्यादा लोगों तक पहुँचायेंगी, मुझे खुशी होगी।

ऐसे में कॉपीराइट की जानकारी कनवर्टर के साथ ही मिल जाए तो अच्छा रहे।

आपके सुझाव के अनुसार अगले संस्करण में About बॉक्स में भी यह जानकारी जोड़ दूँगा।

१७ अप्रैल २०११ १०:२२ पूर्वाह्न को, Anuradha R. <ranur...@gmail.com> ने लिखा:



--

Anuradha R.

unread,
Apr 18, 2011, 1:35:53 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
ई पंडित जी,
तकनीकी बातें इतनी सरलता से समझा देने के लिए आभार। बात समझ में आ गई कि आखिरकार जो कनवर्टर का इस्तेमाल करेगा, उसे परिवर्तित फॉन्ट को पहले से ही अपने कंप्यूटर में रखना पड़ेगा, वरना उस टेक्स्ट को वह देख या उस पर काम कैसे कर पाएगा! इतनी सरल सी बात है। लेकिन मेरी जो चिंता उस फॉन्ट परिवर्तक को बनाने में इस्तेमाल होने वाले सॉप्टवेयर के कॉपीराइट को लेकर थी। इसके लिए कई ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर हैं और इसके अलावा व्यावसायिक सॉप्टवेयर इस्तेमाल करने के पहले खरीदने होते हैं। यहां तक ठीक है। पर आपने साफ कर दिया कि कॉपीराइटेड सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करके जो उत्पाद बना, उस पर तो बनाने वाले का ही हक है, प्लैटफॉर्मदाता का नहीं।
धन्यवाद।
-अनुराधा

2011/4/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>



--

Hariraam

unread,
Apr 18, 2011, 3:03:27 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
Windows Explorer में किसी फोंट फाइल के नाम पर Right Click करके context sensitive menu में से Open या preview चुनने से उस फोंट के विवरण व रूपरेखा प्रकट होती है।

यदि किसी का कॉपीराइट हो तो वहाँ सूचना मिलती है, यदि नहीं तो समझिए यह 'सर्वभूमि गोपाल की'  अर्थात् कॉपीराइट मुक्त है।

-- हरिराम

On 17-04-2011 11:06, Anuradha R. wrote:
..... जिस फॉन्ट के आधार पर या जिस सॉफ्टवेयर से फॉन्ट कनवर्टर विकसित किए गए हैं, उस मूल सामग्री के कॉपीराइट के बारे में तो डेवेलपर ही बता सकता है। इन कनवर्टर्स का प्रसार गैर-सदस्यों तक भी हो रहा है, जिनमें से कुछ व्यावसायिक इस्तेमाल भी कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कोई पुस्तक या पत्रिका प्रकाशक या संपादक किसी और फॉन्ट में प्राप्त संपादकीय सामग्री को अपनी संस्था के मानक फॉन्ट में बदलता है तो वह व्यावसायिक काम हुआ। पर उसे उस कनवर्टर के सोर्स और आधार सामग्री का पता कैसे चले? 

-अनुराधा


Hariraam

unread,
Apr 18, 2011, 3:05:52 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी,

इसी विषय के अन्य एक ईमेल के उत्तर में लिख चुका हूँ, हालांकि आजकल इन पुराने फोंट्स के बारे
में कोई कापीराइट संबंधी दावा करेगा, यह आशंका नहीं है।

लेकन 1997-98 के दौरान जब भारतीय लिपियों में कम्प्यूटिंग के लिए सीडैक के ISM, LEAP,
मॉड्यूलर के Srilipi, तथा अन्य संस्थाओं के आकृति, इंडिका, एपीएस आदि सॉफ्टवेयर पैकेज
बाजार में फैले हुए थे। तथा किसी के फोंट में किया गया पाठ किसी अन्य के फोंट में खुलना
असम्भव था।

उस दौरान मैंने ओड़िआ लिपि के फोंट्स के परिवर्तक बनाए थे, ISCII आधारित तकनीकी के
द्वारा। तो मुझे उन सॉफ्टवेयर के विक्रेताओं द्वारा काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा था।
और अनन्तः मुझे अपने वे सारे कार्य delete करने पड़े थे। क्योंकि उनके आर्थिक स्वार्थ में आँच आ
रही थी।

-- हरिराम

Hariraam

unread,
Apr 18, 2011, 3:38:10 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
श्रीश जी,

दोनों प्रकार की आशंकाओं का सरल समाधान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

कुछ बिन्दुओं के उत्तर नीचे ....


On 18-04-2011 10:41, ePandit | ई-पण्डित wrote:
मैं दो दिन बाहर था इसलिये उत्तर नहीं दे पाया। हरिराम जी ने दो तरह के प्रश्न उठाये हैं। एक तो प्रोग्रामिंग भाषा सम्बन्धी दूसरा फॉण्ट सम्बन्धी।

पहले प्रोग्रामिंग भाषा सम्बन्धी।

किन्तु हमारे इस ग्रूप के माननीय सदस्य अपने अपने बहुमूल्य समय से समय निकाल कर कुछ कुछ योगदान दे रहे हैं। कोई एकीकृत प्लेटफार्म नहीं है। कोई निश्चित open source tools से deveop नहीं किए गए हैं

पता नहीं लोगों को ये गलतफहमी क्यों है कि मुक्त स्रोत (ओपन सोर्स) सॉफ्टवेयर सिर्फ जावा में ही बनाये जा सकते हैं।

इस गलतफहमी के कारण मुक्त स्रोत के लिए JAVA का ज्यादा उपयोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि जावा केवल ओपेन सोर्स ही नहीं, बल्कि Platform Indepdendent भी होता है। जावा में बने प्रोग्राम किसी भी OS में चल सकते हैं, हालांकि हरेक OS के लिए JAVA की IDE अलग अलग होती है। विशेषकर आजकल मोबाइल स्मार्ट फोन, स्मार्ट कार्ड, आदि के युग में जावा लोगों को बेहतर, सरल, और सबसे के लिए उपयोगी लगने लगा है।


इसके विपरीत .NET में विकसित प्रोग्राम सभी OS में चल पाएँगे, इसमें सन्देह है।


इस समूह पर उपलब्ध अधिकांश कन्वर्टर जावास्क्रिप्ट में बने हैं जिसमें बने प्रोग्राम का सोर्स कोई भी देख सकता है,

JAVA और Javascript दोनों बिल्कुल अलग हैं।
हालाँकि जब तक प्रोग्रामर खुद मुक्त घोषित न करे ये भी कॉपीराइट के अन्तर्गत आते हैं। इसलिये कोई भी चाहे तो उस प्रोग्राम के विकासकर्ता से अनुमति लेकर उसके कोड का प्रयोग कर सकता है।

ओपन सोर्स टूल बनाने के लिये प्रयोग की जा रही भाषा का खुद में ओपन सोर्स होना जरुरी नहीं है। जावा भी कुछ समय पहले ही ओपन सोर्स हुयी है (मुफ्त हमेशा से थी)। डॉट नेट ओपन सोर्स नहीं है लेकिन क्या फर्क पड़ता है। जावा ओपन सोर्स है लेकिन कितने जावा प्रोग्रामर हैं जो उसके कोड को सुधारने में योगदान देते हैं। यदि आप जावा भाषा में सुधार हेतु योगदान देना चाहते हैं तो बात अलग है वरना आप चाहे किसी भाषा में टूल बनायें, उसे ओपन सोर्स कर सकते हैं।

जैसा कि श्रीश जी, .Net, C# से कनवर्टर  आदि टूल्स बनाकर निःशुल्क उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन .Net, C# आदि माईक्रोसॉफ्ट के कॉपीराइट हैं, इनका उपयोग कर उत्पाद विकसित कर दूसरों को प्रदान करने के लिए भी शायद लाईसेंस व कापीराइट संबंधी मामले खड़े हो सकते हैं।

C# या VB.NET प्रोग्रामिंग भाषायें हैं, .NET एक सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म जबकि Visual Studio उनमें सॉफ्टवेयर बनाने हेतु एक IDE (Integral Development Environment - एक सॉफ्टवेयर जिसमें प्रोग्रामिंग हेतु कई तरह की सुविधायें होती हैं)। मूल्य IDE का होता है प्रोग्रामिंग भाषा का नहीं।

जावा के लिये प्रोग्राम बिना IDE के केवल उसके SDK का प्रयोग करके किसी टैक्स्ट ऍडीटर (यथा नोटपैड) का प्रयोग करके भी बनाये जा सकते हैं या फिर उसके लिये Eclipse तथा Netbeans आदि मुफ्त IDE उपलब्ध हैं।

इसी प्रकार माइक्रोसॉफ्ट के विजुअल स्टूडियो के कई संस्करण हैं - प्रोफैशनल, ऍण्टरप्राइज आदि जिनमें Express Edition (जिसमें थोड़ी कम सुविधायें हैं) माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। आपके मेरे जैसे बन्दों के काम के लिये ये पर्याप्त है, हमें विजुअल स्टूडियो के पेड संस्करण खरीदने की जरुरत नहीं। यह मुफ्त ऍडीशन भी जावा के IDE से ज्यादा यूजर फ्रैण्डली है। इसके अलावा माइक्रोसॉफ्ट कुछ योजनाओं के अन्तर्गत प्रोग्रामिंग सीखने वालों को विजुअल स्टूडियो के मुफ्त लाइसेंस भी देता है।

इसके अतिरिक्त डॉट नेट में सॉफ्टवेयर बनाने हेतु Mono नामक एक मुफ्त  IDE भी है। लिनक्स में डॉट नेट प्रोग्राम बनाने/चलाने हेतु MonoDevelop नामक IDE है। यही नहीं मोनो के आइओऍस हेतु MonoTouch तथा ऍण्ड्रॉइड हेतु Mono for Android नाम से भी विजुअल स्टूडियो प्लगइन हैं (हालाँकि वे शायद मुफ्त नहीं हैं)।

यानि मोनो के जरिये जावा की तरह डॉट नेट भी क्रॉस प्लेटफॉर्म हो गयी है। तो आप डॉट नेट में भी मुफ्त में प्रोग्राम बना सकते हैं। उन्हें चाहे मुफ्त रखिये चाहे मुक्त स्रोत रखिये चाहे क्रॉस प्लेटफॉर्म बनाइये।

अब बात आती है कि हम डॉट नेट में प्रोग्राम बना कर उन्हें मुफ्त बाँट सकते हैं या नहीं। हम चाहे ऊपर बताये किसी भी तरीके से डॉट नेट में प्रोग्राम बनायें, उन्हें मुफ्त बाँट सकते हैं या बेच सकते हैं। पहली बात तो मैं बता ही चुका हूँ कि डॉट नेट में प्रोग्राम बनाने के लिये मुफ्त IDE उपलब्ध हैं। दूसरी बात आप किसी सॉफ्टवेयर को देख-जाँच कर बता नहीं सकते कि वह कौन से विजुअल स्टूडियो से बना है मुफ्त के Express Edition या Professional/Enterprize या किसी और, वह वर्जन लाइसेंस्ड था या पाइरेटिड। और तो और बिना किसी विशेष तरीके के आप ये भी नहीं बता सकते कि वह किस डॉट नेट प्रोग्रामिंग भाषा से बना है (C# से या VB.NET से)।

इसलिये निश्चिंत रहें और डॉट नेट में मजे से प्रोग्राम बनायें, IDE का रोल टूल बनाने तक ही है, उसके बाद नहीं।
 
और फिर legacy फोंट विभिन्न बहुभाषी सॉफ्टवेयर निर्माताओं के कॉपीराइट हैं, इनके आधार पर कुछ कनवर्टर आदि विकसित करके लोगों को मुफ्त बाँटना भी जोखिम वाला कार्य है। क्योंकि इनके निर्माता चाहें तो कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। क्योंकि इस प्रकार मुफ्त कनवर्टर उपलब्ध करवा देने से उनके सॉफ्टवेयर की बिक्री पर बुरा असर पड़ता है।

देखिये इस बारे में हमारे पास ऍक्सक्यूज है कि हम उनका मालिकाना फॉण्ट नहीं बाँट रहे, उसे बाँटें तो कॉपीराइट उल्लंघन होता है। तमाम सॉफ्टवेयरों के लिये अन्य थर्ड पार्टी टूल जैसे प्लगइन आदि बनते हैं। और वैसे भी ये कन्वर्टर असल में फॉण्ट कन्वर्टर न होकर फॉण्ट कोड कन्वर्टर ही हैं जो केवल एक मैपिंग को दूसरी मैपिंग में बदलते हैं, इस काम में उनका फॉण्ट कहीं भी शामिल नहीं होता, ये कन्वर्टर तब भी काम करते हैं चाहे वह फॉण्ट कम्प्यूटर में न हो।

और फिर मुझे तो लगता है कि ये कन्वर्टर उनके फॉण्टों के लिये लाभदायक ही हैं क्योंकि इन कन्वर्टरों की आउटपुट रॉ ऑस्की डाटा होता है, उसे प्रयोग या प्रिण्ट करने के लिये तो प्रयोक्ता को उनका फॉण्ट (खरीदकर) ही प्रयोग करना होगा जिससे उनके फॉण्ट की बिक्री बढ़ेगी है। उन्हें तो प्रसन्न होना चाहिये कुछ बड़े प्रकाशन उद्योगों को छोड़कर जहाँ उनके फॉण्टों का प्रयोग समाप्त होता जा रहा है, इन कन्वर्टरों के जरिये नये लोग भी थोड़ा-बहुत प्रयोग कर लेंगे।
 
उदाहरण के लिए यदि चाणक्य फोंट से युनिकोड व युनिकोड से चाणक्य फोंट का कनवर्टर निःशुल्क उपलब्ध हो तो कोई Indica जैसा सॉफ्टवेयर क्यों खरीदेगा, वह OS की default IME से देवनागरी युनिकोड में पाठ इनपुट कर लेगा, फिर चाणक्य में कनवर्ट करके मुद्रण हेतु उपयोग करेगा।

वही बात, मुद्रण हेतु बन्दे को चाणक्य फॉण्ट तो प्रयोग करना (खरीदना) ही पड़ेगा, नहीं तो केवल लातिन काँटे-छुरी छपेंगे। तो इससे चाणक्य निर्माता का नुक्सान कहाँ हुआ।

हाँ अगर बात ये है कि बन्दा बिना खरीदे चाणक्य प्रयोग करे तो वो तो वैसे भी कर सकता है, पाइरेसी तो उनके मालिकाना सॉफ्टवेयरों की भी हो सकती है (होती है)।


सच कहा है आपने, यह तो होता ही आया है। पाईरेसी संबंधी छापे आदि बड़े बड़े संस्थानों पर ही पड़ते हैं, जहाँ से एकबारगी कम से कम 5 लाख का जुर्माना वसूला जा सके। क्योंकि छापे आदि की व्यवस्थाओं ही लगभग 5 लाख का खर्च बैठता है। सरकारी संस्थान भी अब घाटे के सौदे में हाथ नहीं डालना चाहते। छोटे-मोटे दुकानदारों, फुटपाथियों पर तो सिर्फ खानापूर्ति या दिखावे के लिए छापे आदि पड़ते हैं।

और कुछ कंपनियाँ स्वयं ही चाहती हैं कि उनके सॉफ्टवेयरों की भले ही पाइरेसी होती रहे, लेकिन यूजर्स की संख्या बढ़ती रहे।

फिर भी, यदि हम JAVA में develop करें, तो बेहतर और हरेक OS (चाहे विण्डोज हो, लिनक्स हो या अन्य) के लिए उपयोगी हो सकेगा।

-- हरिराम

ePandit | ई-पण्डित

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Apr 18, 2011, 5:14:48 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
यदि किसी का कॉपीराइट हो तो वहाँ सूचना मिलती है, यदि नहीं तो समझिए यह 'सर्वभूमि गोपाल की'  अर्थात् कॉपीराइट मुक्त है।

नहीं जी, मैं आपसे सहमत नहीं। कॉपीराइट कानून के अनुसार यदि किसी उत्पाद का कॉपीराइट उल्लेख नहीं किया गया है तो बाइ डिफॉल्ट उसे कॉपीराइटिड ही माना जाता है, कॉपीलैफ्ट नहीं।

उदाहरण के लिये चाणक्य, कृतिदेव आदि फॉण्ट के प्रिव्यू में कॉपीराइट सूचना नहीं है लेकिन आप जानते हैं कि वह कॉपीराइडिट है।

दूसरी बात सदस्यगण मुफ्त तथा मुक्त में भेद समझें। मुफ्त को निःशुल्क प्रयोग कर सकते हैं लेकिन संशोधित नहीं कर सकते। मुक्त को निःशुल्क प्रयोग करने के अलावा उसमें संशोधन करके अपना संस्करण भी बना सकते हैं।थ

१८ अप्रैल २०११ १२:३३ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:

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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 18, 2011, 6:55:41 AM4/18/11
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जावा में बने प्रोग्राम किसी भी OS में चल सकते हैं

जावा में हर ओऍस के लिये प्रोग्राम बनाये जा सकते हैं ये सच है लेकिन एक ही कोड सभी ऑपरेटिंग सिस्टमों के लिये प्रयोग नहीं होता, हर ओऍस के लिये अलग-अलग लिख कर उसके हिसाब से कम्पाइल करना पड़ता है (भले ही उस कोड में थोड़ी भिन्नता हो)। मतलब आप जावा में विण्डोज़ के लिये बने प्रोग्राम को ऍज इट इज लिनक्स में नहीं चला सकते, लिनक्स के लिये कोड को बदलना होगा। अब डॉट नेट के मामले में भी यही बात है, औरों की बात तो अलग लेकिन लिनक्स के लिये बनाये ही जा सकते हैं।

वैसे मेरा जावा से कोई विरोध नहीं है बल्कि वह तो एक बड़ी अच्छी प्रोग्रामिंग भाषा है (कम्प्यूटर साइंस में जावा को robust प्रोग्रामिंग भाषा कहा जाता है) जिसमें बेसिक से लेकर ऍण्टरप्राइज स्तर तक के सॉफ्टवेयर बनाये जा सकते हैं। बस बात ये है कि डॉट नेट जावा की तुलना में ज्यादा प्रोग्रामर फ्रैण्डली है। एक औसत प्रोग्रामर भी डॉट नेट में काम की चीज बना सकता है जबकि जावा में काम की चीज बनाने के लिये अच्छी जानकारी चाहिये।

मैंने पहले जावा ही सीखना शुरु किया था लेकिन उसमें विण्डोज़ रजिस्ट्री तक असैस करना बड़ा टेढ़ा काम था, इसके अलावा उसमें हर काम के लिये ज्यादा कोड लिखना पड़ता है जबकि डॉट नेट में मैनेज्ड कोड (डॉट नेट फ्रेमवर्क में बने रेडीमेड टाइप फंक्शन) के जरिये ये कार्य ज्यादा आसानी से और कम कोड लिखकर हो जाते हैं। इसलिये मैं जावा की बजाय डॉट नेट प्रयोग करता हूँ। बाकी कोई साथी जावा में हिन्दी के लिये टूल बनाये तो बहुत प्रसन्नता की बात होगी।

१८ अप्रैल २०११ १:०८ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:

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V S Rawat

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Apr 18, 2011, 7:19:35 AM4/18/11
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On 4/18/2011 1:08 PM India Time, _Hariraam_ wrote:

>
> *JAVA और Javascript दोनों बिल्कुल अलग हैं। *
>
> -- हरिराम*
>

JAVA एक प्रोग्रामिंग भाषा है जैसे विजुअल बेसिक, पास्कल फ़ोर्ट्रान, कोबोल, जो कंप्यूटर
के आवश्यक कई काम कर सकती है। जबकि Javascript किसी ब्राउज़र (जैसे फ़ायरफ़ॉक्स) के
भीतर ही चलने वाली एक छोटी भाषा है जो केवल वही काम कर सकती है जो ब्राउज़र में
हो सकते हैं। इस प्रकार से दोनों अलग हैं, लेकिन फिर भी दोनों के सिन्टेक्सों (कोड लिखने
के तरीके) में काफ़ी समानताएँ हैं। यदि आप दोनों में एक को जानते हैं तो दूसरी को जाने
बिना आप उसका बहुत कुछ भाग समझ जाएँगे।

इसलिए दोनों को "बिल्कुल" अलग तो नहीं कहा जा सकता है।

रावत

V S Rawat

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Apr 18, 2011, 7:22:35 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
On 4/18/2011 1:08 PM India Time, _Hariraam_ wrote:

> और कुछ कंपनियाँ स्वयं ही चाहती हैं कि उनके सॉफ्टवेयरों की भले ही पाइरेसी होती रहे,
> लेकिन यूजर्स की संख्या बढ़ती रहे।
>
>

> -- हरिराम*

सही कहा। जिस सॉफ़्टवेयर ने बहुत ज्यादा कठोर नियम बनाए कि उसकी पायरेसी नहीं हो
सकी, उसका उपयोग कम रहा और इस तरह से उसके उपयोगकर्ता कम रहे। ज्यादातर छात्र,
हैकर्स, गैर-वित्तीय उपयोगकर्ता मुफ़्त या पायरेटेड सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल ही करते हैं।
जिस सॉफ़्टवेयर के पायरेसी-रोधी नियमों को तोड़ना सरल होता है, उसका उपयोग बढ़ता
है, और इस तरह से उस सॉफ़्टवेयर को खरीदने वाले भी बढ़ते हैं।

रावत

Hariraam

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Apr 18, 2011, 9:56:47 AM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
यह सच है कि .NET बहुत ही यूजर फ्रेंडली वातावरण प्रदान करता है।
 
किन्तु क्या .NET से लिनक्स व अन्य OS में चलनेवाले प्रोग्राम सही काम करेंगे। क्या .Netframework लिनक्स या अन्य OS के लिए भी होता है। क्या Mobile Phone के लिए भी कोई .Netframework होता है?
 
-- हरिराम

2011/4/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
अब डॉट नेट के मामले में भी यही बात है, औरों की बात तो अलग लेकिन लिनक्स के लिये बनाये ही जा सकते हैं।

ePandit | ई-पण्डित

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Apr 18, 2011, 1:20:40 PM4/18/11
to technic...@googlegroups.com
किन्तु क्या .NET से लिनक्स व अन्य OS में चलनेवाले प्रोग्राम सही काम करेंगे। क्या .Netframework लिनक्स या अन्य OS के लिए भी होता है। क्या Mobile Phone के लिए भी कोई .Netframework होता है?

शायद आपने इसी सूत्र में मेरा Mono Project सम्बन्धी पिछला सन्देश नहीं पढ़ा, कृपया दोबारा देखें।

१८ अप्रैल २०११ ७:२६ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
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V S Rawat

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Apr 18, 2011, 1:28:01 PM4/18/11
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.Net microsoft ka hai, aur MS ke zyadatar (ya sabhi) program windows
par hi chalate hain. Linux aur MS me eeint kutte ka bair hai. anyatha
mat lein, sirf muhavra kaha hai.

--
Rawat

On 4/18/2011 7:26 PM India Time, _Hariraam_ wrote:

> यह सच है कि .NET बहुत ही यूजर फ्रेंडली वातावरण प्रदान करता है।
> किन्तु क्या .NET से लिनक्स व अन्य OS में चलनेवाले प्रोग्राम सही काम करेंगे। क्या
> .Netframework लिनक्स या अन्य OS के लिए भी होता है। क्या Mobile Phone के लिए
> भी कोई .Netframework होता है?
> -- हरिराम
>
> 2011/4/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com

> <mailto:sharma...@gmail.com>>

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