2012/12/27 Madhusudan H Jhaveri
<mjha...@umassd.edu>
ऐसे संकरित उच्चारण वाले अक्षरों पर चिंतन हुआ था। और उनके उच्चारण में, संदिग्धता होने के कारण उनकी स्वीकृति नहीं की गयी थी।
axar.in/kpm/svag या में देवनागरी अक्षरों का विस्तृत विवरण देखें |
हर अक्षर के उच्चारण का स्थान है |
अंग्रेजी के उच्चारण वैसे निश्चित नहीं हैं !
पृथक पृथक भाषाओं से आने के कारण उन्हीं भाषाओं के उच्चारणों को
रखा गया है
फ़्रान्सीसी भाषा का अत्यधिक प्रभाव रहा
ग्रीस रोमन लॅटिन के शब्द भी भरे पड़े हैं |
हिन्दी पर संस्कृत का प्रभाव उसे उस के व्याकरण
से काफ़ी हद तक नियन्त्रित कर के रखता है |
तथापि अनेक विदेशी शब्दों का लोगों द्वारा इस्तेमाल
की वजह से ये भी हिन्दी में शामिल हो जाने से अंग्रेज़ी
जैसा गोलमाल हो रहा है |
पी सी पुल्लिंग लेकिन टॅब्लॅट ? स्त्रीलिंग !
फ़ोन पुल्लिंग पर लॅन्ड लाईन स्त्रीलिंग !
मानक पर मतान्तर मानकीकरण के काम को झोत में डाल देता है !
धातु आधार होता है | परन्तु विदेशी शब्दों को धातु के रूप में
स्वीकार करने पर अनेकों स्थापित ज्ञानियों की घोर आपत्ति
रोड़ा अटका देती है | दोनो मॉडरेटरों में भी एकमत नहीं नज़र आता |
मानककीकरण के लिये प्रशाशन के लोगों की अपनी अलग ही
मजबूरियाँ अहम वगैराह बाधक बन जाते हैं |
समय की गति रुकती नहीं और ऍस ऍम ऍस / ई मेल / नॅट के
प्रयेक्ता काम मानक न होने के कारण विचित्र विचित्र काम चलाऊ
चलन आरम्भ कर देते है | नियंत्रनहीन दिशाहीन विकल्प आवाम
में आसानी से मान्यता प्राप्त कर लेते हैं | और शेरनी तथा बाघ के
मिलन से एक विचित्र पशु मान्यता प्राप्त कर लेता है |
काम चलाऊ हल बस काम चलाऊ ही होते हैं |
विद्यामन्दिरों में ज्ञानी हाथ मलते रह जाते हैं |
संस्कृत के अलावा अंग्रेज़ी , उर्दू , ऍस ऍम ऍस / ई मेल / नॅट ,
हिंग्लिश आदि अनाथ हिन्दी के मिले जुले अधिपति बन
बैठते है | गूगल हमें विचित्र विधियों से हिन्दी लिखने को
धकेल देता है ! और हम उदारता दिखाते हुए गूगल , फ़ायर फ़ॉक्स
को सहाता करने में अपने को भाग्यशाली समझने लगते हैं |
अपनी मात्रभाषा को ही रोमन में लिखने की सोचने लगते हैं |
समाधान ?
समस्या पर थोड़ी सहमती तो हो !
फ़िर सोचें कि उचित क्या है
ओर
फ़िर सोचें कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने
के लिये "उचित" कदम न लेने का "बढ़िया"
बहाना क्या हो जो अपने ज़मीर के "ज़्यादा"
न झकोड़े
:-))