[technical-hindi] क्‍या अंग्रेजी बन गयी है राष्‍ट्रभाषा ?

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Dr. Kavita Vachaknavee

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May 14, 2010, 12:49:32 PM5/14/10
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क्‍या अंग्रेजी बन गयी है राष्‍ट्रभाषा ? द संडे इंडियन पब्लिक में पढि़ए ओंकारेश्‍वर पांडेय की आमुख कथा
द संडे इंडियन का अभी यह अंक बाजार में आना है। आप प्रतीक्षा मत कीजिए, तुरंत पढ़ लीजिए। अपनी अच्‍छी बुरी जैसी भी हो, राय अवश्‍य दीजिए। पत्रिका 14 भाषाओं में एक साथ प्रकाशित होती है। एक एक इमेज पर क्लिक करते जाइये और पढ़ते रहिये






























द संडे इंडियन के दिनांक 19 मई से 30 मई 2010 अंक से साभार
प्रस्तुतकर्ता अविनाश वाचस्पति

 -----------------------------------------------------


- कविता वाचक्नवी 
http://www.google.com/profiles/kavita.vachaknavee




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Rajeev Dubey

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May 15, 2010, 4:09:11 AM5/15/10
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जब तक तकनीकी जानकारी हिंदी में उपलब्ध करा दी जाये तब तक हिंदी मनोरंजन, साहित्य  और जन संपर्क की भाषा बनी रहेगीयह एक सत्य हैकटु लगे तो लगता रहेविज्ञान और तकनीकी जगत की पुस्तकों का विशाल स्तर पर हिंदी अनुवाद और मूल लेखन अभियान चलाना होगाबाकी स्वतः होता रहेगाजन सामान्य उचित चुनाव कर लेगा
राजीव दुबे

2010/5/14 Dr. Kavita Vachaknavee <kavita.va...@gmail.com>

Anunad Singh

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May 15, 2010, 6:08:31 AM5/15/10
to technic...@googlegroups.com
मुझे लगता है कि 'हिन्दी में तकनीकी जानकारी की कमी' न  ही वास्तविकता है  और न  ही अंग्रेजी के वर्चस्व का सही कारण ।  इसके पीछे 'काला अंग्रेज बनने की मानसिकता' , 'रोजगार में पिछड़ने का झूठा डर',  'नेहरूवादी  स्वदेशविरोधी सरकारी नीति'  एवं अंग्रेजी का प्रचार तंत्र जिम्मेदार है।

मेरा आकलन है कि अगले पाँच वर्षों में अनुवाद के औजार इतने सक्षम हो जायेंगे कि 'तकनीकी सामग्री की कमी' का बहाना बनाना भी कठिन  बन जायेगा या लोग कहेंगे 'मजाक तो नहीं कर रहे है?'  इस स्थिति में 'सही सामग्री के चयन का विवेक' सबसे कारगर  औजार होगा ।

-- अनुनाद सिंह

========================



१५ मई २०१० १:३९ PM को, Rajeev Dubey <rajeev....@gmail.com> ने लिखा:

जब तक तकनीकी जानकारी हिंदी में उपलब्ध करा दी जाये तब तक हिंदी मनोरंजन, साहित्य  और जन संपर्क की भाषा बनी रहेगीयह एक सत्य हैकटु लगे तो लगता रहेविज्ञान और तकनीकी जगत की पुस्तकों का विशाल स्तर पर हिंदी अनुवाद और मूल लेखन अभियान चलाना होगाबाकी स्वतः होता रहेगाजन सामान्य उचित चुनाव कर लेगा
राजीव दुबे

Rajeev Dubey

unread,
May 15, 2010, 7:02:56 AM5/15/10
to technic...@googlegroups.com
कमी तो बड़ी हैमानें मानेंहाँ दूसरों को दोष देकर समस्या से मुंह  जरूर मोड़ कते हैं ।
 
राजीव दुबे

2010/5/15 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

Shastri JC Philip

unread,
May 15, 2010, 9:22:07 AM5/15/10
to technic...@googlegroups.com
जिस व्यक्ति ने भी मैदाने जंग में उतर कर हिन्दीसेवा की कोशिश की है
वह जानता है कि असली समस्या "कमी" की नहीं है. देश को अंग्रेजी
प्रचार-तंत्र ने इस तरह से जकड रखा है कि साधनसंपन्न होते हुए भी
हिन्दी पिछड रही है.

अंग्रेजी के वर्चस्व का सही कारण काले-अंग्रेज हैं जिनका स्वार्थ अंग्रेजी
के प्रचार-प्रसार और हिन्दी के दमन से जुडा हुआ है.

अनुनाद जी ने दूसरों को जो दोष दिया है वह मूँह मोडने के लिये नहीं
बल्कि सच्चाई को उजागर करने के लिये किया है.

सस्नेह  -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.IndianCoins.Org

Rajeev Dubey

unread,
May 15, 2010, 12:59:23 PM5/15/10
to technic...@googlegroups.com
अंग्रेजी प्रचार तंत्र को कब तक दोष देंगे ...? या फिर काले अंग्रेज को भी क्या कहेंगे ? क्या कहने से बात बदल जायेगी ? क्या हम गुस्सा छोड़ कर आगे बढ़ने और जीतने की सोचें ?
 
मूल समस्या कमी की ही हैइसमें हीन भावना से नहीं बल्कि विश्लेषण की दृष्टि से देखने की जरूरत हैहिन्दी  में गुण हैं और असीम संभावनाएं हैंप्रगति भी हुई है, पर इतनी नहीं की हम जीत जातेइसमें बुरा मानने से ज्यादा जरूरी यह है की हम समय की और अपनी परिस्थिति की परख करेंआप सभी ज्ञानी जन हैं ।  मिल कर चलेंगे तो बात बनेगी
 
समाज सामान्य परिस्थितियों में लाभ की दृष्टि से चुनाव करता हैअगर हिन्दी का चुनाव लाभदायक लगे तो हिन्दी सबकी दृष्टि में सम्मानित और आगे बढानी वाली भाषा अवश्य बनेगीरोजगार दिलाने वाली भाषा बनाने के लिए हिन्दी में अनवरत तकनीकी ज्ञान देने वाली पुस्तकें और शोध पत्रों का प्रकाशन करना होगाअनुवाद के साथ साथ क्रमशः मूल तकनीकी लेखन भी विशाल स्तर पर करना होगा
 
विद्वत जन क्या कहते हैं ?

राजीव दुबे


 
2010/5/15 Shastri JC Philip <shastri....@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
May 15, 2010, 1:34:52 PM5/15/10
to technic...@googlegroups.com
अक्सर हिन्दी में तकनीकी शब्दावली की दुरूहता की बात कही जाती है। यह सही है। आधुनिक विज्ञान की सारी शब्दावली ग्रीक मूल के शब्दों से अंग्रेजी में बनाई गई है। औद्योगिक क्रान्ति के साथ ही आधुनिक विज्ञान का विकास भई हुआ जो पश्चिम की देन है। सरकारी अदूरदर्शिता ने इस वैज्ञानिक शब्दावली का हिन्दी में अनुवाद कराने के काम हाथ में लिया। इसकी जरूरत नहीं थी। क्योंकि यह तय था कि अनुवाद न सिर्फ कठिन था बल्कि इन शब्दों से लोग परिचित भी नहीं थे। जरूरत सिर्फ वैज्ञानिक शब्दावली के देवनागरी रूपांतर की थी। आक्सीजन को ओषजन लिखना मेरी निगाह में मूर्खता है। करोड़ों रुपए इन कामों पर खर्च हो गए और हिन्दी पर बिना बात अपूर्णता का आरोप लगा। जब रिक्शा शब्द को हमने जस का तस स्वीकार किया है, लालटेन थोड़े रूपांतर के साथ हिन्दी में रचा बसा है तब विज्ञान की शब्दावली के साथ गैर जरूरी कसरत क्यों की गई। इसीलिए हिन्दी में विज्ञान व तकनीकी शिक्षण पिछड़ा प्रकारांतर से लगातार युवा पीढ़ी शिक्षा माध्यम के रूप में हिन्दी से दूर होती चली गई। इसिलिए हिन्दी सिर्फ मनोरंजन और संपर्क की भाषा बनने को अभिषप्त हुई।



2010/5/15 Rajeev Dubey <rajeev....@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

mjha...@umassd.edu

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May 15, 2010, 6:10:45 PM5/15/10
to technic...@googlegroups.com, technic...@googlegroups.com

प्रिय बंधुओं ---

मै मानता हूं, कि,
हिंदी/संस्कृतमें किसी
विशेष क्षेत्र में सुसंवादी
पारिभाषिक शब्द रचना की जा
सकती है।
हमारे पास बेजोड़, शब्द रचना
शास्त्र है।
उदाहरण--> नीचे मुख पेशियों के
नाम
(अभिनवं शारीरम्‌ से )
प्रस्तुत है।
इनपर विचार करें।

Anatomy( शरीर रचना शास्त्र)
एक कठिन विषय समझा जाता है।
इस लिए कुछ उदाहरण उसीके देता
हूं।
संस्कृत पर्याय के साथ
तुलनाके लिए, अंग्रेजी
संज्ञाभी दी गई है।

उदा: (अ) भ्रूसंकोचनी: Corrugator supercilli
( भ्रू को संकॊचनेवाली पेशी),
जहां, अंग्रेजी संज्ञा २०
अक्षर, हिंदी ५ अक्षरोमेंही
लिखी जा सकती है।
उदा: (आ) नेत्र निमीलनी: --Orbicularis
Oculi (नेत्र बंद करनेवाली),
उदा: (इ) नासा संकोचनी: Compressor naris
(नाक का संकोच करनेवाली
पेशियां)
उदा: (ई) नासा विस्फारणी: Dilator naris(
नाक विस्फारित करने वाली),
उदा: (उ) नेत्रोन्मीलनी(आंख
खोलनेवाली पेशी/पेशियां)
==========
(१) संस्कृत/हिंदी की सज्ञा
संक्षेपमें, अंग्रेजीकी
अपेक्षा बहुत कम अक्षरोमें
लिखि जाएगी,
(२) संस्कृत/हिंदी की संज्ञा
का स्पेलिंग याद करना नही
पड़ेगा
(२) उसकी व्याख्या,(बहुत बार
अर्थ भी ) संज्ञाके साथ पता
चलती है।
(३)स्पेलिंग और व्याख्या रटते
जो समय बिताएंगे, अनुमानतः ,
उसके 25% समय में आप
हिंदी/संस्कृत में अध्ययन कर
सकते हैं।
विशेष: इन संज्ञाओंका उपयोग
भारतकी सारी प्रादेशिक
भाषाएं कर सकती है।
जो, भारतकी एकतामेंभी योगदान
होगा।
निर्माण अभियांत्रिकी में
कुछ संज्ञाओं की रचना करनेका
काम और उसपर आधारित
निबंध प्रस्तुत कर पाया हूं।

डॉ. झवेरी
Ph D (Structural Ebgineering)
University of Massachusetts
Dartmouth USA

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Anunad Singh

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May 16, 2010, 2:14:32 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
राजीव दुबे जी और अजित जी,

आप लोगों  ने जो कुछ लिखा है ,  उससे मुझे मेरा आकलन यही कहता है कि आपलोगों ने  या तो विज्ञान और तकनीकी की शिक्षा नहीं पायी है या  हिन्दी माध्यम में नही पढ़े हैं। ( अगर यह बात गलत भी हो तो बुरा मत मानियेगा) ।  मैने बारहवीं  तक की शिक्षा हिन्दी मध्यम में  पायी है और मैं पूरी तरह से कह सकता हूँ कि हिन्दी की वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली  अंग्रेजी की शब्दावली से अधिक तर्कपूर्ण, बोधगम्य एवं एकरूपतापूर्ण है। (यदि अजित जी इस पर  उदाहरण सहित चर्चा करना चाहें तो उनका स्वागत है।)

वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति भाषानिरपेक्ष है, यह अनेकों उदाहरणों से दिखाया जा सकता है। जब न्यूटन ने अपना 'प्रिंसपिया मैथेमैठिका'  अंग्रेजी में नहीं, लैटिन में लिखा। जब ब्रिटेन में 'औद्योगिक क्रान्ति' हुई तो  दुनिया में अंग्रेजी का नहीं फ्रेंच का डंका बजता था। आज अंग्रेजी का डंका तो बज रहा है किन्तु  चीन, जापान और कोरिया आदि ने ब्रिटेन और अमेरिका के नाक में  दम कर रखा है।  भारत में बच्चा पेट में रहता है तभी से उसे अंग्रेजपढ़ाने के प्लान बन रहे हैं किन्तु विश्व के  २०० सर्वश्रेष्ठ विद्यालयों में से एक भी भारत में नहीं है। (हम आधिकारिक रूप से सन् १८३५ से अंग्रेजी में पढ़ाये जा रहे हैं।)

सच्चाई यह है कि बारहवीँ तक पढ़ायी जाने वाली अधिकांश चीजें (विज्ञान, प्रौद्योगिकी)  सत्रहवीं-अठारहवीं-उन्नीसवीं  शताब्दी की चीजें  हैं।  स्थिति विज्ञान (स्टैटिक्स), गति-विज्ञान (डाइनेमिक्स), गुरुत्वाकरषण, प्रकाशिकी, विद्युत, चुम्बकत्व, रारायनिक  तत्वों के प्रतीक, रासायनिक क्रियाये लिखना, प्रमुख रासायनिक क्रियायें, प्रमुख तत्व, प्रमुख रसायन, पूरा मेकैनिकल इंजिनियरी, वैद्युत इंजिनियरी, सिविल इंजिनियरी, ....

और तो और, सबसे अधिक 'क्रेज' जिस कम्प्यूटर का  है उसे भी   सामने आये हुए साठ वर्ष से अधिक हो गये।


बिना सोचे-समझे लोग टपाक से पूछ बैठते हैं कि मुझे ' फलां '  विषय में  एमएससी करना है ; हिन्दी में कोई किताब है?  अरे बन्धु, यह प्रश्न ही गलत है।  आप विकासक्रम (इवोलुशन) को समझते ही नहीं हैं। पहले अण्डा आया और बाद में मुर्गी या पहले मुर्गी आयी और बाद में अण्डा ?  दोनो ही नहीं हुए।   जो लोग गणिपढ़े हैं और 'इटरेटिव विधि'  से किसी कठिन समीकरण का मूल निकालने के बारे में परिचित हैं वे जानते हैं कि सबसे पहले  मूल का कोई  'लगभग' मान मान लिया जाता है।  फिर उसे उसी समीकरण में रखा जाता है और जो नया मूल मिलता है वह 'सत्य मूल' के अधिक नजदीक होता है। पाँच-दस  बार 'इटरेट करने' (दोहराने) पर  प्राप्त मूल  इतना अधिक शुद्ध हो जाता है कि उसे असली मूल मान लिया जाता है।


आजकल नियम यह है कि पीएचडी करने के लिये  किसी पहले से पीएचडी किये हुए का  मार्गदर्शन जरूरी है। किन्तु जो सबसे पहले पीएचडी हुआ उसका मार्गदर्शक क्या पीएचडी रहा होगा?

सारांश यह है कि व्यावहारिक विकास का यह नियम है कि जब तक हम  सायकिल पर नहीं चड़ेंगे, दो-चार बार गिरेंगे नहीं, तब तक सायकिल चलाना नहीं आ सकता।  आप नहीं कह सकते कि जब तक मैं अच्छी सायकिल चलाना नहीं सीख लेता तब तक सायकिल को हाँथ नहीं लगाऊँगा।

Rajeev Dubey

unread,
May 16, 2010, 3:38:54 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी आप वैयक्तिक दोषारोपण तो करते ही हैं साथ ही आपके आंकलन भी गलत हैंजब आप इतने गलत आंकलन इतनी छोटी सी बात पर कर रहे हैं तो अंदाज लगाइए की आपके बड़े बड़े आंकलन कितने गलत हो सकते हैंमैं हिन्दी में शिक्षित भी हूँ  और तकनीकी एवं  वैज्ञानिक जगत में कार्यरत भी  हूँ । तकनीकी रूप से उच्च शिक्षित भी हूँ ।  खैर आप फिर भी कुछ वैयक्तिक टिप्पणी कर ही सकते हैं...!
 
सवाल यह नहीं है कि हिन्दी कितनी महान है, सवाल यह है कि किस तरह से यह भाषा अपना स्थान इस देश मे पा सकेतीखी बातें कर और दूसरों को दोष देकर कुछ नहीं होगाजब तकनीकी और वैज्ञानिक पुस्तकें एवं शोध पत्र हिन्दी में अनवरत रूप से बड़े स्तर पर उपलब्ध होंगे तो लोगों को चुनाव करने में संकोच नहीं होगाइस प्रक्रिया में हिंदी अच्छी तरह से जानने वालों को रोजगार भी मिलेगाक्रमशः बात बनेगी
 
राजीव दुबे

2010/5/16 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

Anunad Singh

unread,
May 16, 2010, 4:15:38 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
राजीव जी, मेरा आकलन गलत है यह कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं है। मैं आपसे बहुत कुछ सीखना चाहता हूँ। किन्तु इसके पहले यह जानना चाहता हूँ कि आपका विशेषज्ञता का क्षेत्र क्या है?


-- अनुनाद सिंह
========================

१६ मई २०१० १:०८ PM को, Rajeev Dubey <rajeev....@gmail.com> ने लिखा:

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
May 16, 2010, 4:36:57 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
बहुत बढ़िया चर्चा चल रही है!

--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/

Anunad Singh

unread,
May 16, 2010, 6:46:34 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
बहुभाषी विकिपिडिया आने से एक और लाभ हुआ है जिस पर कम लोगों की निगाह जाती है - वह यह है कि किसी शब्द को दूसरी भाषाओं में क्या कहते हैं, एक साथ बहुत आसानी से पता चल जाता है।

[[af:Suurstof]]
[[als:Sauerstoff]]
[[ar:أكسجين]]
[[an:Oxichén]]
[[ast:Oxíxenu]]
[[az:Oksigen]]
[[bn:অক্সিজেন]]
[[zh-min-nan:O (goân-sò͘)]]
[[be:Кісларод]]
[[be-x-old:Тлен]]
[[bar:Sauastoff]]
[[bs:Kiseonik]]
[[br:Oksigen]]
[[bg:Кислород]]
[[ca:Oxigen]]
[[cv:Йӳçлĕк]]
[[cs:Kyslík]]
[[co:Ossigenu]]
[[cy:Ocsigen]]
[[da:Ilt]]
[[de:Sauerstoff]]
[[nv:Níłchʼi Yáʼátʼéehii]]
[[et:Hapnik]]
[[el:Οξυγόνο]]
[[myv:Чапамо чачтый]]
[[es:Oxígeno]]
[[eo:Oksigeno]]
[[eu:Oxigeno]]
[[fa:اکسیژن]]
[[fr:Oxygène]]
[[fy:Soerstof]]
[[fur:Ossigjen]]
[[ga:Ocsaigin]]
[[gv:Ocsygien]]
[[gd:Àile-beatha]]
[[gl:Osíxeno (elemento)]]
[[gu:ઑક્સીજન]]
[[hak:Yòng]]
[[ko:산소]]
[[haw:‘Okikene]]
[[hy:Թթվածին]]
[[hi:ऑक्सीजन]]
[[hsb:Kislik]]
[[hr:Kisik]]
[[io:Oxo]]
[[id:Oksigen]]
[[ia:Oxygeno]]
[[is:Súrefni]]
[[it:Ossigeno]]
[[he:חמצן]]
[[jv:Oksigen]]
[[kn:ಆಮ್ಲಜನಕ]]
[[pam:Oxygen]]
[[ka:ჟანგბადი]]
[[kk:Оттегі]]
[[sw:Oksijeni]]
[[ht:Oksijèn]]
[[ku:Oksîjen]]
[[la:Oxygenium]]
[[lv:Skābeklis]]
[[lb:Sauerstoff]]
[[lt:Deguonis]]
[[lij:Oscigeno]]
[[li:Zuurstof]]
[[ln:Oksijɛ́ní]]
[[jbo:kijno]]
[[hu:Oxigén]]
[[mk:Кислород]]
[[mg:Ôksizenina]]
[[ml:ഓക്സിജന്‍]]
[[mt:Ossiġenu]]
[[mi:Hāora]]
[[mr:ऑक्सिजन]]
[[ms:Oksigen]]
[[mn:Хүчилтөрөгч]]
[[nah:Ehēcayoh]]
[[nl:Zuurstof (element)]]
[[new:अक्सिजन]]
[[ja:酸素]]
[[no:Oksygen]]
[[nn:Oksygen]]
[[oc:Oxigèn]]
[[mhr:Шопештыш]]
[[om:Oxygen]]
[[uz:Kislorod]]
[[pa:ਆਕਸੀਜਨ]]
[[pnb:آکسیجن]]
[[pap:Oxigeno]]
[[nds:Suerstoff]]
[[pl:Tlen]]
[[pt:Oxigénio]]
[[ksh:Sauerstoff]]
[[ro:Oxigen]]
[[qu:Muksichaq]]
[[ru:Кислород]]
[[stq:Suurstof]]
[[sq:Oksigjeni]]
[[scn:Ossìgginu]]
[[si:ඔක්සිජන්]]
[[simple:Oxygen]]
[[sk:Kyslík]]
[[sl:Kisik]]
[[sr:Кисеоник]]
[[sh:Kiseonik]]
[[su:Oksigén]]
[[fi:Happi]]
[[sv:Syre]]
[[tl:Oksiheno]]
[[ta:ஆக்சிசன்]]
[[te:ఆక్సిజన్]]
[[th:ออกซิเจน]]
[[tg:Оксиген]]
[[tr:Oksijen]]
[[uk:Кисень]]
[[ur:آکسیجن]]
[[ug:ئوكسىگېن]]
[[vi:Ôxy]]
[[zh-classical:氧]]
[[war:Oksiheno]]
[[yi:זויערשטאף]]
[[yo:Ọ́ksíjínì]]
[[zh-yue:氧]]
[[bat-smg:Degounis]]
[[zh:氧]]

आक्सीजन एक गैस का नाम है इस दृष्टि  से व्यक्तिवाचक संज्ञा हुई। यानी किसी का नाम।  इसके बावजूद भी आप देखिये कितनी कम भाषाएँ इसे ज्यों की त्यों 'आक्सीजन '  कहतीं हैं?   इंग्लिस्तान के पड़ोस में स्थित और किसी समय इस पर राज्य किये हुए देश जर्मनी तक में इसे आक्सीजन नहीं कहा जाता है। अपने अजित जी छोटे-बड़े, कठिन-आसान, सभी शब्दों को ज्यों की त्यों स्वीकार करने  की सलाह दे रहे हैं।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने  शब्द-निर्माण से सम्बन्धित  एक लिखित एवं सुस्पष्ट नीति बनायी गयी है।  (और बननी भी चाहिये) । यह नीति  आयोग द्वारा प्रकाशित शब्दावलियों के आरम्भ में ही प्राय: दी गयी होती है। मुझे लगता है कि अजित जी ने उसे कभी नहीं देखा है और जो कुछ लिखा है वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
May 16, 2010, 7:07:35 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
बहुत महत्तपूर्ण जानकारी दी है, अनुनाद जी!

--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/

narayan prasad

unread,
May 16, 2010, 7:21:43 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी, यह सूची आपने कैसे बनाई ?

१६ मई २०१० ४:१६ PM को, Anunad Singh <anu...@gmail.com> ने लिखा:

Anunad Singh

unread,
May 16, 2010, 7:43:32 AM5/16/10
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बहुत आसान है। किसी भी विकिपिडिया लेख पर जाइये।  सबसे उपर  की पंक्ति में आपको  Article , discuss, Edit, History आदि दिखेंगे।  (यदि यह लेख  बिना लॉग-इन किये   सम्पादन  के लिये प्रतिबन्धित है तो  Edit नहीं दिखेगा ; इसके स्थान पर  'View source' दिखेगा।  ) आप 'एडिट' या 'विउ सोर्स' को क्लिक करिये।   जो दिखेगा  उसमें सबसे अन्त में  जाइये। यहाँ विभिन्न भाषाओं  में उस लेख के नाम दिये  हैं ( किन्तु जिस-जिस भाषा में विकि पर वह लेख बन  चुका है उनकी ही प्रविष्टि मिलेगी।)

यह काम  किसी भी भाषा की विकि के सहारे किया जा सकता है।

==============

१६ मई २०१० ४:५१ PM को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
May 16, 2010, 7:51:58 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
कितना काम कर दिया गया है!
--
सोच-सोचकर ख़ुशी के साथ-साथ हैरानी भी होती है!
--
और एक हम हैं : बहुत अधिक हैं : फिर भी मिलकर
अपनी हिंदी को ही नहीं सँभाल पाते!

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शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/

Anunad Singh

unread,
May 16, 2010, 7:56:18 AM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
यदि केवल यह जानना हो कि इस विकिपिडिया लेख का शीर्षक किसी अन्य भाषा में क्या रखा गया है, तो  उस लेख को खोलें। बायीं तरफ  देखें। बहुत सी भाषाओं की सूची उनकी अपनी-अपनी लिपियों में दिखेगी।  कर्सर को किसी भी भाषा के उपर ले जाँय।  आपके विन्डो के  सबसे नीचे वाली पट्टी में उसका  पूरा यूआरएल  दिखेगा जिसका अन्तिम भाग उस भाषा में उस लेख का नाम ही होता है।

narayan prasad

unread,
May 16, 2010, 1:02:52 PM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
I am unable to get the list you posted. So kindly let me know step-by-step the exact procedure to get the complete list as you posted.
---Narayan Prasad

१६ मई २०१० ५:१३ PM को, Anunad Singh <anu...@gmail.com> ने लिखा:

narayan prasad

unread,
May 16, 2010, 1:31:33 PM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
मुझे सूची प्राप्त करने में सफलता मिल गई है । नीचे विभिन्न भाषाओं में "नाइट्रोजन" के लिए सूची दी जा रही है ।
 
भारतीय भाषाओं में कन्नड की शब्दावली मुझे पसन्द आई । इसमें Oxygen, Nitrogen, Hydrogen के लिए क्रमशः आम्लजनक, सारजनक एवं जलजनक दिये गये हैं । अन्यों में साधारणतः अंग्रेजी शब्द ही थोप दिये गये हैं ।

---नारायण प्रसाद
 
[[af:Stikstof]]
[[ar:نيتروجين]]
[[an:Nitrochén]]
[[ast:Nitróxenu]]
[[bn:নাইট্রোজেন]]
[[zh-min-nan:N (goân-sò͘)]]
[[be:Азот]]
[[be-x-old:Азот]]
[[bs:Dušik]]
[[br:Nitrogen]]
[[bg:Азот]]
[[ca:Nitrogen]]
[[cv:Азот]]
[[cs:Dusík]]
[[co:Azotu]]
[[cy:Nitrogen]]
[[da:Kvælstof]]
[[de:Stickstoff]]
[[et:Lämmastik]]
[[el:Άζωτο]]
[[es:Nitrógeno]]
[[eo:Azoto]]
[[eu:Nitrogeno]]
[[fa:نیتروژن]]
[[fr:Azote]]
[[fy:Stikstof]]
[[fur:Azôt]]
[[ga:Nítrigin]]
[[gv:Neetragien]]
[[gl:Nitróxeno]]
[[gu:નાઇટ્રોજન]]
[[hak:Tham]]
[[ko:질소]]
[[haw:Naikokene]]
[[hy:Ազոտ]]
[[hi:नाइट्रोजन]]
[[hsb:Dusyk]]
[[hr:Dušik]]
[[io:Nitro]]
[[id:Nitrogen]]
[[ia:Nitrogeno]]
[[is:Nitur]]
[[it:Azoto]]
[[he:חנקן]]
[[jv:Nitrogen]]
[[kn:ಸಾರಜನಕ]]
[[pam:Nitrogen]]
[[ka:აზოტი]]
[[kk:Азот]]
[[sw:Nitrojeni]]
[[ht:Azòt]]
[[ku:Nîtrojen]]
[[la:Nitrogenium]]
[[lv:Slāpeklis]]
[[lb:Stéckstoff]]
[[lt:Azotas]]
[[lij:Asoto]]
[[li:Stikstof]]
[[ln:Azoti]]
[[jbo:trano]]
[[hu:Nitrogén]]
[[mk:Азот]]
[[ml:നൈട്രജൻ]]
[[mt:Ażotu]]
[[mi:Hauota]]
[[mr:नायट्रोजन]]
[[ms:Nitrogen]]
[[mn:Азот]]
[[nah:Ehēcatehuiltic]]
[[nl:Stikstof (element)]]
[[ja:窒素]]
[[no:Nitrogen]]
[[nn:Nitrogen]]
[[nov:Nitrogene]]
[[oc:Azòt]]
[[uz:Azot]]
[[pa:ਨਾਈਟ੍ਰੋਜਨ]]
[[pnb:نائیٹروجن]]
[[nds:Stickstoff]]
[[pl:Azot]]
[[pt:Nitrogénio]]
[[ksh:Stickstoff]]
[[ro:Azot]]
[[qu:Qullpachaq]]
[[ru:Азот]]
[[stq:Stikstof]]
[[sq:Azoti]]
[[scn:Azzotu]]
[[simple:Nitrogen]]
[[sk:Dusík]]
[[sl:Dušik]]
[[sr:Азот]]
[[sh:Dušik]]
[[fi:Typpi]]
[[sv:Kväve]]
[[tl:Nitroheno]]
[[ta:நைட்ரசன்]]
[[te:నత్రజని]]
[[th:ไนโตรเจน]]
[[tg:Азот]]
[[tr:Azot]]
[[uk:Азот]]
[[ur:نطرساز]]
[[ug:ئازوت]]
[[vi:Nitơ]]
[[war:Nitroheno]]
[[yi:אזאט]]
[[yo:Nítrójínì]]
[[zh-yue:氮]]
[[bat-smg:Azuots]]
[[zh:氮]]

रावेंद्रकुमार रवि

unread,
May 16, 2010, 2:16:38 PM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
नारायण जी,
क्षमा चाहूँगा!
कन्नड़ शब्दावली आपको पसंद आई है, पर ये शब्द मुझे उपयुक्त नहीं लग रहे हैं!
यथा - नाइट्रोजन गैस एक अन्य गैस क्लोरीन से क्रिया करके
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाती है! इस प्रकार तो यह भी "आम्लजननी" हो गई!

--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/

Rajeev Dubey

unread,
May 16, 2010, 3:49:16 PM5/16/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी मैं तो इस समूह की विशेषज्ञता में रूचि रखता हूँ ।  आप सभी विशिष्ट हैंहम दोनों कभी मिल बैठ कर बात कर लेंगें और मुझे विश्वास है कि आप को मेरे साथ कुछ समय बिताना अच्छा लगेगासमूह पर मेरा प्रोफाइल  भी पड़ा हैदेखा जा सकता ।  खैर , बात आगे बढाते हैं
 
हिन्दी में तकनीकी एवं वैज्ञानिक पुस्तकों की रचना - मौलिक एवं अनुवादित - तथा शोध पत्रों का प्रकाशन - मौलिक एवं अनुवादित - विशाल स्तर पर किया जाए ऐसा मेरा मानना हैइस कार्य में आगे बढ़ने से पूर्व विचार विमर्श करना चाहता हूँकृपया अपनी राय बताएं

अजित वडनेरकर

unread,
May 17, 2010, 2:32:42 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
लगता है कि अजित जी ने उसे कभी नहीं देखा है और जो कुछ लिखा है वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।

अनुनाद जी, लगता है आप बेहद अहंकारी हैं तभी इस तरह की बातें लिख सकते हैं। मुझे क्या पड़ी है कि सुनी सुनी बातों के आधार पर दो शब्द भी किसी चर्चा में बतौर हिस्सेदार लिखूं? भ्रष्ट और कामचोरों द्वारा किए गए इस काम के समूचे अतीत की मुझे जानकारी है। किस तरह तकनीकी शब्दावली के नाम पर आजादी के दस साल बाद तक काम चलता रहा और सरकार को उल्लू बनाया जाता रहा।


आप हजारों तकनीकी शब्दों की सूची दे दें, सवाल उनके लोकप्रिय होने का है। जिन देशों में आक्सीजन के वैकल्पिक शब्दों की सूची आप दे रहे हैं क्या वहां वे प्रचलित भी हैं इसे प्रमाणित कौन करेगा? और अगर हैं तो भी सवाल भारत के संदर्भ में जस का तस है कि हमारे यहां यह शब्दावली निष्क्रिय किस्म की सूची में क्यों दफ्न है?

आपको सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना है। गलती हुई जो इस चर्चा में हस्तक्षेप किया। मनमाफिक चलाए चर्चा।
जैजै।

2010/5/17 Rajeev Dubey <rajeev....@gmail.com>

--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Rajeev Dubey

unread,
May 17, 2010, 3:02:35 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अजीत जी नाराज होइए पर साथ मत छोडिये ।  लड़ाई अनुनाद जी से नहीं हैहिन्दी का हित और राष्ट्र हित जुड़े हैंकृपया  जोर लगाए रहियेयह चर्चा लम्बी हो तो भी कोई बात नहीं ।  समाधान चाहिए और फिर क्रियान्वयन भी

राजीव दुबे

2010/5/17 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Anunad Singh

unread,
May 17, 2010, 3:24:54 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अजित जी,
नाराज मत हों। मैने आपसे बहुत ही बिन्दुवार प्रश्न किये हैं। हो सके तो बिन्दुवार जबाब दें।

पहली बात तो मैने भी रसायन विज्ञान में  'आक्सीजन' ही पढ़ा था, न कि 'ओषजन' ; दूसरी बात आप खुद देख सकते हैं कि हिन्दी विकिपिडिया में  'ऑक्सीजन' ही प्रयोग किया गया है।  तीसरी बात कि शब्दावली आयोग के किसी प्रकाशन में भी देख लीजिये - आक्सीजन जरूर होगा। हो सकता है वैकल्पिक रूप में 'ओषजन' भी दिया हुआ हो।  आयोग ने बहुत से पारिभाषिक शब्दों का वैकल्पिक रूप भी दिया हुआ है। यह अच्छी बात है। अंग्रेजी में भी बहुत से तकनीकी शब्दों  के दो रूप प्रचलित हैं।

'सुनी-सुनाई' वाली बात आपको बुरी क्यों लग रही है। मुझे तो अब भी लग रहा है कि जो मैने कहा है वह सत्य है।

Anunad Singh

unread,
May 17, 2010, 3:46:28 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
रावेंद्रकुमार जी,

जिस कारण आपको कन्नड  में ये शब्द पसन्द नहीं आये, वह कारण अंग्रेजी शब्दावली में भरा हुआ है। अगर ध्यान दे तो अंग्रेजी में अधिकांश चीजों या परिघटनाओं (फेनॉमेनन)  के जो नाम  दिये गये हैं, कालान्तर में वे चीजें या परिघटनाएँ उससे बहुत अलग या उससे अधिक  व्यापक  हो गयीं हैं और वे शब्द उस परिघटना या वस्तु का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते।

उदाहरण के लिये 'ट्रायोड'  का शाब्दिक अर्थ है - 'तीन सिरे (एलेक्ट्रोड) वाला'  ; यह नाम  'डायोड'  के ऐतिहासिक विकास क्रम में तो ठीक है क्योंकि डायोड में दो टर्मिनल (एलेक्ट्रोड) होते थे। किन्तु बाद में आने वाली बहुत  सी युक्तियाँ (Devices) तीन टांगों वाली  आयीं।  यदि यह नाम सार्थक होता तो ये भी 'ट्रायोड' हैं।  किन्तु इनको टान्जिस्टर, एससीआर, मॉस्फेट आदि कहा गया।

इसी तरह तमाम उदाहरण हैं।  विकिपिडिया में इन शब्दों का परिचय देते समय प्राय: पहले बताया जाता है कि यह शब्द अमुक ग्रीक या लैटिन शब्दों के योग से बना है जिसका अर्थ हुआ 'यह' ; फिर बताते हैं कि  'किन्तु यह नाम पूरी तरह से सार्थक नहीं है'। इसकी वास्तविक/मानक परिभाषा यह है - " "  ।


उपरोक्त कारण से अंग्रेजी शब्दों  का शब्दानुवाद करना और भी निरर्थक है, (अंग्रेजी शब्दों को ज्यों का त्यों ले लेना तो  निरर्थक है  ही)।


-- अनुनाद सिंह


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१६ मई २०१० ११:४६ PM को, रावेंद्रकुमार रवि <raavend...@gmail.com> ने लिखा:

अजित वडनेरकर

unread,
May 17, 2010, 8:53:55 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनादजी,
मैं भी विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं, मगर सिर्फ हाईस्कूल तक। आपके तमाम अनुमान गलत हैं। मैने हाईस्कूल तक विज्ञान, फिर वाणिज्य में हिन्दी माध्यम से स्नातक किया है। फिर हिन्दी साहित्य में एमए। शुरुआती कक्षाओं में हिन्दी माध्यम से चाहे कोई उत्तीर्ण हो जाए। उच्च शिक्षा के लिए तकनीकी विषयों में कठिन शब्दावली हिन्दी माध्यम वालों को बहुत परेशान करती है। सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलता कि हिन्दी में पाठ्य पुस्तके हैं। कोई विद्यार्थी अगर हिन्दी माध्यम से अच्छे अंक के साथ पास हो भी जाए तो उसे कार्यक्षेत्र में उक्त शब्दावली में व्यवहार करने में दिक्कतें आती हैं। यह सिर्फ विज्ञान शब्दावली के संदर्भ में ही नहीं बल्कि कॉमर्स, लॉ जैसे विषयों के संदर्भ में भी सच है।

ओषजन सिर्फ उदाहरण के लिए शब्द दिया था। मेरी पाठ्यपुस्तक में यह शब्द था। आक्सीजन को ओषजन बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी। अगर ब्रेकेट में आक्सीजन ही लिखना था तो ओषजन का प्रयोग ही क्यों हो जब उसका व्यावहारिक प्रयोग ही नहीं होता। यह सिर्फ मिसाल थी। नाइट्रोजन को नत्रजन कोई नहीं लिखता, फिर हिन्दी के नाम पर ऐसी शब्दावली क्यों बनाई गई कि लोग हिन्दी का उपहास उड़ाने लगें....यह कहना चाहता हूं मैं। आवेदन, प्रतिवेदन जैसे शब्द समझे जा रहे हैं तो ठीक है पर अन्तर्लम्ब, अभिदृष्य, अभ्युपगम, आसंजित, आसुत, समनुदेशिती, धुरा रक्षी, चालू समुत्थान जैसे हजारों शब्दों के संदर्भ में मेरी राय बहुत खराब है। ये हिन्दी की राह में रोड़े थे। दशकों से ऐसे ही शब्दों से भरे पाठ पढ़ने की तुलना में कई छात्रों ने अंग्रेजी माध्यम पढ़ना ही बेहतर समझा।

आप अपनी मान्यता पर दृढ़ रहें। मुझे कुछ भी समझने और कैसी भी धारणा बनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
जैजै




2010/5/17 Anunad Singh <anu...@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Anunad Singh

unread,
May 17, 2010, 9:53:03 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अजित जी,

गुस्सा करके 'कठिन प्रश्नों' से भागना  सबसे बढ़िया तरीका है। खैर मैं नहीं मानूँगा।  जरा बताइये कि 'नत्रजन' क्यों कठिन है?  कठिनाई मापने का  आपका पैमाना क्या है?  नत्रजन  में  नाइट्रोजन  से कम वर्ण हैं;  उच्चारण करने में आसान है;  भारतीयता से भरपूर है (सार्थक है);  इसमें  तो एक मात्रा तक नहीं है!

आप हिन्दी ब्लॉगकारी में 'कोशकार' के रूप में जाने जाते हैं इसलिये आपसे अधिक तर्कपूर्ण उत्तर की जरूरत है।  केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि "हाँ (मैं कहता हूँ) 'नत्रजन' कठिन है" 

आक्सीजन को 'ओषजन' बनाना  बहुत जरूरी था। उसका उत्तर उदाहरण सहित मैने आपको दे दिया है।
आपके इस कथन पर कि  "किसको पता है कि वे शब्द उन देशों में प्रचलित हैं या नहीं'  पर  मेरा प्रतिप्रश्न है कि "क्या लिखने के पहले आपको पता था (या अब भी पता है कि)  ये  शब्द उन देशों में प्रचलित नहीं हैं?"
यदि 'ओषजन'  इतना कठिन है तो आजतक आपको याद कैसे है?   अगर आपके अन्दर का कोषकार यही कहता है कि 'आसुत जल' कठिन है  और   'डिस्टिल्ड वाटर'   सरल है तो मैं यही कहूँगा कि भगवान इस देश का भला करे।  मैने जो अंग्रेजी शब्दों के उदाहरण दिये थे उनके बारे में आपने कुछ नहीं कहा? 


+++++++++++++++++++++++++++



१७ मई २०१० ६:२३ PM को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:

अनुनादजी,
मैं भी विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं, मगर सिर्फ हाईस्कूल तक। आपके तमाम अनुमान गलत हैं। मैने हाईस्कूल तक विज्ञान, फिर वाणिज्य में हिन्दी माध्यम से स्नातक किया है। फिर हिन्दी साहित्य में एमए। शुरुआती कक्षाओं में हिन्दी माध्यम से चाहे कोई उत्तीर्ण हो जाए। उच्च शिक्षा के लिए तकनीकी विषयों में कठिन शब्दावली हिन्दी माध्यम वालों को बहुत परेशान करती है। सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलता कि हिन्दी में पाठ्य पुस्तके हैं। कोई विद्यार्थी अगर हिन्दी माध्यम से अच्छे अंक के साथ पास हो भी जाए तो उसे कार्यक्षेत्र में उक्त शब्दावली में व्यवहार करने में दिक्कतें आती हैं। यह सिर्फ विज्ञान शब्दावली के संदर्भ में ही नहीं बल्कि कॉमर्स, लॉ जैसे विषयों के संदर्भ में भी सच है।

ओषजन सिर्फ उदाहरण के लिए शब्द दिया था। मेरी पाठ्यपुस्तक में यह शब्द था। आक्सीजन को ओषजन बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी। अगर ब्रेकेट में आक्सीजन ही लिखना था तो ओषजन का प्रयोग ही क्यों हो जब उसका व्यावहारिक प्रयोग ही नहीं होता। यह सिर्फ मिसाल थी। नाइट्रोजन को नत्रजन कोई नहीं लिखता, फिर हिन्दी के नाम पर ऐसी शब्दावली क्यों बनाई गई कि लोग हिन्दी का उपहास उड़ाने लगें....यह कहना चाहता हूं मैं। आवेदन, प्रतिवेदन जैसे शब्द समझे जा रहे हैं तो ठीक है पर अन्तर्लम्ब, अभिदृष्य, अभ्युपगम, आसंजित, आसुत, समनुदेशिती, धुरा रक्षी, चालू समुत्थान जैसे हजारों शब्दों के संदर्भ में मेरी राय बहुत खराब है। ये हिन्दी की राह में रोड़े थे। दशकों से ऐसे ही शब्दों से भरे पाठ पढ़ने की तुलना में कई छात्रों ने अंग्रेजी माध्यम पढ़ना ही बेहतर समझा।

आप अपनी मान्यता पर दृढ़ रहें। मुझे कुछ भी समझने और कैसी भी धारणा बनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
जैजै

अजित वडनेरकर

unread,
May 17, 2010, 10:24:03 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनादजी,
बात लोकप्रिय उच्चारणों की है। क्या याद रहता है, कौन सा सरल है कौन सा कठिन इसका कोई तय फार्मूला नहीं होता। भाषा के क्षेत्र में तो लोक स्वभाव के आगे व्याकरण के नियम भी बहुत बाध्यकारी नहीं हो पाते हैं।

नत्रजन आसान है तो नाइट्रोजन क्यों प्रचलन में है? बातों को व्यक्तिगत मत बनाइये। मैं कोशकार भी नहीं हूं और न ही हिन्दी के किसी क्षेत्र का आधिकारिक ज्ञाता। किसी मुगालते में नहीं हूं। यह कई बार स्पष्ट कर चुका हूं। किसी भी आरोपित विशेषज्ञता और उपाधि को खारिज करता हूं। यह साझा मंच है और मेरी शिरकत अपनी सीमाओं में बेहद सामान्य सदस्य के नाते है। निश्चित ही मेरी मान्यताएं बचकानी, अपरिपक्व और उथली हो सकती हैं, पर किसी सुने सुनाए के आधार पर नहीं है, इसका विश्वास है। मैं अपनी बात मनवाने का इच्छुक भी नहीं हूं। क्या आपकी बात से असहमत होने को आप दूसरे व्यक्ति का गुस्सा मान कर खुद हल्का हो लेते हैं? जाहिर है गुस्सा एक दुर्गुण है और यह दुर्गुण दूसरे पर आरोपित कर आप उसे कमजोर तो मान ही रहे हैं :)

मैं गुस्सा नहीं हूं, विरोध जताया है। आपकी शैली पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है जो शायद आपको नागवार गुजरी। आप यकीनन बहस के साथ मजा भी लेते हैं। प्रतिक्रिया तो आपके नाम का हिस्सा भी है :) मैं वैसा नहीं हूं और न ही छेड़छाड़ में दिलचस्पी है।

जितना आप लोग इस विषय में पैठे हैं, उसका शतांश भी मैं नहीं हूं। मैं आपकी बात मान भी लूं तो भी नत्रजन  कठिन है-ध्वनिविज्ञान के हवाले से नहीं बल्कि सहज व्यवहार में। समाज की धारा अपने आप कठिन और सरल तय करती है। यही बात आसुत जल के संदर्भ में भी है। आसवन  का अर्थ जिसे पता है, वह भी आसुत जल नहीं कहता। आप कोई तरीका बता सकते हैं कि इस कड़ी के आसुत, आसवनी, आसवन जैसे शब्दों को आमफहम कैसे बनाया जा सकता है? बहस मुझसे नहीं, हिन्दी समाज से हो रही है। प्रतिप्रश्न छोड़िए, अजित को भूलिए और तरीके सुझाइये।

नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कोर्ट, अदालत, लालटेन, साबुन, दमड़ी (द्रख्म), वजीर, गुर्गा और न जाने कितने शब्दों के होने से हिन्दी कमजोर नहीं, मजबूत हुई है। प्रक्रिया जारी है। मोटर का हिन्दी अनुवाद क्या है? गाड़ी क्या इसका सही अर्थ बताता है? मोटर को क्यों न चलने दिया जाए। जहाज और पोत दोनों ही प्रचलित हैं। तो भी हिन्दी में शिप स्वीकार्य होना चाहिए। एयर क्राफ्ट कैरियर का विमानवाही पोत अनुवाद बीते कई दशकों से सहज और स्वीकार्य बना हुआ है। आप नाइट्रोजन और नत्रजन के संदर्भ में यह बात कह सकते है?
जैजै



2010/5/17 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
अजित जी,

--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Anand D

unread,
May 17, 2010, 10:30:21 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अजीत जी,

मुझे लगता है कि "फिलहाल" वैज्ञानिक एवं तकनीकी आयोग द्वारा प्रदान किए गए शब्दों का प्रयोग किया जाना आवश्‍यक है। मैं इन शब्‍दावलियों का प्रयोग पिछले पाँच छ: वर्षों से कर रहा हूँ। 

यह स्‍वीकार कर लेने में कोई हर्ज नहीं है कि हमारी पढ़ाई का ढांचा अंग्रेजी प्रणाली पर आधारित है। विज्ञान की उच्‍चतर कक्षाओं में अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाई हो रही है। जहाँ हिंदी माध्‍यम है भी, वह भी अंग्रेजी के अनुवाद के रूप में है। इसलिए हम जो पाठ्यक्रम में हिंदी देखते पढ़ते हैं, उसका मूल आधार अंग्रेजी ही है। मैं स्‍वयं हिंदी माध्‍यम से विज्ञान में स्‍नातक रहा हूँ। अपने अध्‍ययन के दौरान पाठ्य पुस्‍तकों में हिंदी में ही शब्‍द, परिभाषाएं पढ़ते हुए तमाम परीक्षाएं दी हैं। कहीं भी चुम्‍बकीय द्विध्रुव या जड़त्‍व आघूर्ण जैसे शब्‍द नहीं खटके। शुरूआत में एकाध बार जरूर अजीब सा लगता है, पर बार-बार पढ़ते रहने से अभ्‍यास हो जाता है। और जब शिक्षक, विद्यार्थी सब एक ही भाषा कहते हैं, वही यदि किताबों में भी मिलती है तो वह परिचित है। कहने का तात्‍पर्य यह है कि यदि मान लें कि आयोग द्वारा किए गए हिंदी अनुवाद बड़े बोझिल और नीरस हैं, तो भी इसलिए स्‍वीकार्य होने चाहिए कि वे अंग्रेजी के शब्‍दों के समानान्‍तर नए शब्‍द गढ़ने का प्रयास हैं। पारिभाषिक शब्‍दों को पृथक दर्शाना बहुत आवश्‍यक है, उदाहरण के लिए यदि "सर्वांगसम" और "समरूप" यह दोनों में पारिभाषिक रूप से अंतर है, इस भिन्‍नता को भी दर्शाने के लिए अजीब से लगने वाले शब्‍द गढ़ने पडें तो वह भी करना जरूरी है। "आसंजक बल" और "ससंजक बल" दो अलग-अलग चीजें हैं, इन्‍हें व्‍यक्‍त करने के लिए आपको न चाहते हुए भी जटिलता को अपनाना पड़ेगा।

आपने समनुदेशिती जैसे शब्‍दों का उल्‍लेख किया है। अनुवाद के दौरान मेरा वास्‍ता भी उससे पड़ चुका है। विधि संबंधी दस्‍तावेजों में प्रावधानों में एक ही अनुच्‍छेद में Assignment, Assign, Assignee यदि आता है, तो इन्‍हें व्‍यक्‍त करने के लिए अलग से शब्‍द कहाँ से लाएँ? यदि समनुदेशिती का प्रयोग न करें तो और क्‍या विकल्‍प है? वह भी तब, जब सारे सरल शब्‍द विभिन्‍न क्रियाओं/ विधियों के लिए पहले ही occupied हो चुके हों।  

इसलिए मैं इस प्रकार की मानक शब्‍दावलियों की अनिवार्यता मानता हूँ और इस प्रयास की प्रशंसा करता हूँ। रही बात दस वर्षों में इसे गढ़ने का क्‍या इतिहास रहा, इसकी जानकारी नहीं है। यह भी आवश्‍यक है कि इसे नए-नए शब्‍दों से अपडेट किया जाए।  

- आनंद 




2010/5/17 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
अजित जी,

गुस्सा करके 'कठिन प्रश्नों' से भागना  सबसे बढ़िया तरीका है। खैर मैं नहीं मानूँगा।  जरा बताइये कि 'नत्रजन' क्यों कठिन है?  कठिनाई मापने का  आपका पैमाना क्या है?  नत्रजन  में  नाइट्रोजन  से कम वर्ण हैं;  उच्चारण करने में आसान है;  भारतीयता से भरपूर है (सार्थक है);  इसमें  तो एक मात्रा तक नहीं है!

Anunad Singh

unread,
May 17, 2010, 10:50:17 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अब आप  मूल विषय से हट रहे हैं।  आपने पहले कहा था कि हिन्दी शब्दावली कठिन है (कठिन निर्मित की गयी है)।   कृपया उसी को केन्द्र में रखकर चर्चा की जाय।

प्रचलन में क्या है उसके अलग कारण हैं। लोग दुकान पर जाकर 'ऐपल' , 'एपुल'  कहते हैं 'सेब' नहीं - इसका अर्थ यह नहीं है कि 'सेब' कठिन है। पचासों उदाहरण दिये जा सकते हैं।

मेरे विचार से 'नत्रजन' कम प्रचलित होने का कारण यह है कि  हिन्दी और अंग्रेजी - दोनो ही माध्यमों  में नाइट्रोजन ही कहा जाता है।  'आसुत जल' का  प्रयोग कोई नहीं करता है तो उसका भी यही कारण है  जो 'ऐपल' और 'सेब' का , या 'इग्जामिनेशन'  और 'परीक्षा'  का है - इसमें कठिनाई की भूमिका कहाँ है? सुनते हैं कि जर्मन लोग 'एक-एक लाइन वाले' शब्दों का भी प्रयोग आसानी से कर लेते हैं!

एक बार नारायण जी ने एक और बहुत महत्व की बात बतायी थी - पारिभाषिक शब्द अकेले नहीं होते; उनका एक 'समुदाय'  ही होता है। सीधे शब्दों में कहूँ तो यदि आप 'डिस्टिल्ड वाटर'  कहते हैं तो आपको 'डिस्टिलेशन' भी लेना पड़ेगा। 'अनडिस्टिल्ड' भी लेना पड़ेगा (अ_डिस्टिल्ड नहीं कह सकते) । और भी कई आयेंगे.....   -- इसलिये भी अंग्रेजी शब्दों को सीधे लेने से बचा जाता है।

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१७ मई २०१० ७:५४ PM को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:
अनुनादजी,
बात लोकप्रिय उच्चारणों की है। क्या याद रहता है, कौन सा सरल है कौन सा कठिन इसका कोई तय फार्मूला नहीं होता। भाषा के क्षेत्र में तो लोक स्वभाव के आगे व्याकरण के नियम भी बहुत बाध्यकारी नहीं हो पाते हैं।

नत्रजन आसान है तो नाइट्रोजन क्यों प्रचलन में है? बातों को व्यक्तिगत मत बनाइये। मैं कोशकार भी नहीं हूं और न ही हिन्दी के किसी क्षेत्र का आधिकारिक ज्ञाता। किसी मुगालते में नहीं हूं। यह कई बार स्पष्ट कर चुका हूं। किसी भी आरोपित विशेषज्ञता और उपाधि को खारिज करता हूं। यह साझा मंच है और मेरी शिरकत अपनी सीमाओं में बेहद सामान्य सदस्य के नाते है। निश्चित ही मेरी मान्यताएं बचकानी, अपरिपक्व और उथली हो सकती हैं, पर किसी सुने सुनाए के आधार पर नहीं है, इसका विश्वास है। मैं अपनी बात मनवाने का इच्छुक भी नहीं हूं। क्या आपकी बात से असहमत होने को आप दूसरे व्यक्ति का गुस्सा मान कर खुद हल्का हो लेते हैं? जाहिर है गुस्सा एक दुर्गुण है और यह दुर्गुण दूसरे पर आरोपित कर आप उसे कमजोर तो मान ही रहे हैं :)

मैं गुस्सा नहीं हूं, विरोध जताया है। आपकी शैली पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है जो शायद आपको नागवार गुजरी। आप यकीनन बहस के साथ मजा भी लेते हैं। प्रतिक्रिया तो आपके नाम का हिस्सा भी है :) मैं वैसा नहीं हूं और न ही छेड़छाड़ में दिलचस्पी है।

जितना आप लोग इस विषय में पैठे हैं, उसका शतांश भी मैं नहीं हूं। मैं आपकी बात मान भी लूं तो भी नत्रजन  कठिन है-ध्वनिविज्ञान के हवाले से नहीं बल्कि सहज व्यवहार में। समाज की धारा अपने आप कठिन और सरल तय करती है। यही बात आसुत जल के संदर्भ में भी है। आसवन  का अर्थ जिसे पता है, वह भी आसुत जल नहीं कहता। आप कोई तरीका बता सकते हैं कि इस कड़ी के आसुत, आसवनी, आसवन जैसे शब्दों को आमफहम कैसे बनाया जा सकता है? बहस मुझसे नहीं, हिन्दी समाज से हो रही है। प्रतिप्रश्न छोड़िए, अजित को भूलिए और तरीके सुझाइये।

नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कोर्ट, अदालत, लालटेन, साबुन, दमड़ी (द्रख्म), वजीर, गुर्गा और न जाने कितने शब्दों के होने से हिन्दी कमजोर नहीं, मजबूत हुई है। प्रक्रिया जारी है। मोटर का हिन्दी अनुवाद क्या है? गाड़ी क्या इसका सही अर्थ बताता है? मोटर को क्यों न चलने दिया जाए। जहाज और पोत दोनों ही प्रचलित हैं। तो भी हिन्दी में शिप स्वीकार्य होना चाहिए। एयर क्राफ्ट कैरियर का विमानवाही पोत अनुवाद बीते कई दशकों से सहज और स्वीकार्य बना हुआ है। आप नाइट्रोजन और नत्रजन के संदर्भ में यह बात कह सकते है?
जैजै

अजित वडनेरकर

unread,
May 17, 2010, 11:23:31 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनादजी,
मूल विषय से हटना सापेक्ष होता है और अक्सर होता है। खासतौर पर ऐसी बहसों-विमर्शों में। डिस्टिल्ड नहीं, हमे डिस्टिल वाटर के लिए भी तैयार रहना चाहिए जो देहातों-कस्बों में बोलते हैं। इस कड़ी के अनडिस्टिल्ड जैसे शब्दों को उच्चारने की अभी तक समाज को जरूरत नहीं पड़ी है। ऐसा हुआ तो राह भी अपने आप निकलेगी। बोलचाल में डिस्टिलेशन ही चल रहा है। लेखन में आसवन चल जाता है। आप किससे पूछ रहे हैं कि कठिनाई की भूमिका कहां है? क्षमा चाहूंगा, एपल ने सेब को चलन से बाहर नहीं किया है। सेब धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है। सेब की अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी वाले एपल को स्वीकार कर लें, यह आग्रह कभी नहीं करूंगा। सेब को कोई खतरा नहीं है। दाड़िम कि तुलना में अंगूर डटा हुआ है और मुहावरेदार भाषा में अंगूरी भी। फिलहाल ग्रेप / ग्रैप के चक्कर में हिन्दीवाले नहीं हैं। आशंका भी नहीं है। वाईन की तुलना में शराब डटी हुई है और मदिरा, मद्य का साहित्यिक संस्कार भी बरकरार है। यह सब किसी सरकारी प्रयास से नहीं हो रहा है। भाषा का समाजवाद करा रहा है यह सब। बीसियों मिसालें सामने हैं। हम हिन्दी को बनते या बिगड़ते देखने की जगह इसके विकास के गवाह बन रहे हैं, इसे उदारता से स्वीकार करने की जरूरत है।

मूल प्रश्न का उत्तर आप दें कि दशकों बाद भी ये शब्द लोकप्रिय क्यों नहीं हुए? कुछ कठिनाई तो होगी ही। "इसके पीछे काला साहब बनने की मानसिकता है" यह बहुत सरलीकरण है। हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते रुझान के संदर्भ में अब भी इस पिटे हुए मुहावरे का प्रयोग अक्सर लोग करते हैं जो प्रभावित नहीं करता। जिस दौर में शहरों में भी धोतीधारी पढ़ालिखा समझा खासी तादाद में मिलता था तब अंग्रेजीयत के आग्रही और सूटबूटधारियों को काला साहब कहा जाता था। अब ऐसा कुछ नहीं है। संस्कृति और शिक्षा में आते बदलाव के चलते अब परिवेशगत मान्यताएं भी बदली है और चीज़ों को आंकने की कसौटी भी (.या बदलनी चाहिए )

अभिव्यक्ति अपनी राह खोजती है। गांव में अगर डिस्टीलरी खुलती है तो वहां आसवनी का बोर्ड नहीं लगता। अगर लगे तो शायद गांव वाले उसे आसवनी कहना सीख जाएं। वे उसे या तो डिस्टीलरी कहेंगे या शराब फैक्टरी। जिन तकनीक से जुड़ा देशज ज्ञान सदियों से हमारे पास है उसकी शब्दावली आज भी वही इस्तेमाल होती है जो बोधगम्य है। फर्मेंटेशन के लिए खमीर उठना जैसी अभिव्यक्ति ही उभरती है। किण्वन किताबी शब्द है। यह कभी प्रचलित रहा होगा, इसमें संदेह है। अब खमीर की बात करें तो सदियों पहले अरबी मूल का यह शब्द हिन्दी की धारा में समा गया। खमीर उठने की प्रक्रिया के लिए निश्चित ही लोक बोलियों में जो अभिव्यक्तियां हैं उन्हें आम बोलचाल की हिन्दी ने नहीं अपनाया।

जैजै



2010/5/17 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
अब आप  मूल विषय से हट रहे हैं।  आपने पहले कहा था कि हिन्दी शब्दावली कठिन है (कठिन निर्मित की गयी है)।   कृपया उसी को केन्द्र में रखकर चर्चा की जाय।

--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Anunad Singh

unread,
May 17, 2010, 11:43:43 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
मेरे खयाल से वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली की बात कर रहे है तो 'गाँव वाले' और 'रिक्षा वाले'  की बात करना बेमानी  होगी।   वे  शब्द विद्यार्थियों, शोधार्थियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों के लिये बने हैं ; वे उनका अधिक प्रयोग करते हैं। 

'ऐपल' और 'सेब' के उदाहरण में आप 'चलन से बाहर'  की बात करने लगे!  यह बताइये कि 'ऐपल' अधिक चल रहा है कि नहीं,  या इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है या नहीं?  आजकल मैं घरेलू काम करने वाली बाइयों (नौकरानियों)  को केवल 'सन्डे' कहते हुए सुनता हूँ ; रविवार नहीं।  इसका कारण सरलता या कठिनाई नहीं है - कारण यह है कि उसके दिमाग में कहीं से यह बात बैठ गयी है कि 'सन्डे' कहने से लोग मुझे अधिक सभ्य, अधिक सुसंस्कृत और 'शिक्षित' मानेंगे ।  इसको ही आधार बनाकर कोई कह सकता है कि हमारे  शब्दावली आयोग वाले 'रविवार' कहलवाना चाहते हैं जबकि नौकरानियाँ तक 'सन्डे' बोलती हैं।


-- अनुनाद सिंह

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१७ मई २०१० ८:५३ PM को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:

अजित वडनेरकर

unread,
May 17, 2010, 11:59:27 AM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
अब सिर्फ पिष्टपेषण ही हो रहा है यहां। हम लगातार एक ही बात अलग अलग मिसालों से कर रहे हैं। मेरे सामाजिक परिवेश में एपल हिन्दी का नहीं हुआ है जैसे मोटर है। उसी तरह संडे की जगह मेरे परिवेश में अभी तक इतवार, रविवार अधिक इस्तेमाल होते हैं। हां, संडे अब हिन्दी में शामिल हो चुका है। यहां सिर्फ संडे की बात हो रही है अन्य दिनों के अंग्रेजी पर्यायों की नहीं।

रविवार शब्द बहुत पुराना है। इसे पारिभाषिक  या शब्दावली आयोग की देन न समझें। कोई कामवाली ज्यादा सुशिक्षित माने जाने के लिए संडे इस्तेमाल नहीं करती बल्कि उसकी सहज बुद्धि ऐसा करने को कहती है। संडे शब्द उसके परिवेश में पहले से उसने सुना है।

2010/5/17 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

Anunad Singh

unread,
May 17, 2010, 11:24:22 PM5/17/10
to technic...@googlegroups.com
'सन्डे'  का उदाहरण देकर मैं यह कहना चाहता था कि भारत में युगों-युगों से चले आ रहे शब्दों की उपेक्षा करके लोग अपने को अंग्रेजी का जानकार सिद्ध करने में लगे हुए हैं उस स्थिति में  ''ओषजन'  जैसे नवनिर्मित शब्दों के प्रचलित न हो पाने को उनका कठिन  होना बताना क्या सही है?

-- अनुनाद सिंह

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१७ मई २०१० ९:२९ PM को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:

अब सिर्फ पिष्टपेषण ही हो रहा है यहां। हम लगातार एक ही बात अलग अलग मिसालों से कर रहे हैं। मेरे सामाजिक परिवेश में एपल हिन्दी का नहीं हुआ है जैसे मोटर है। उसी तरह संडे की जगह मेरे परिवेश में अभी तक इतवार, रविवार अधिक इस्तेमाल होते हैं। हां, संडे अब हिन्दी में शामिल हो चुका है। यहां सिर्फ संडे की बात हो रही है अन्य दिनों के अंग्रेजी पर्यायों की नहीं।

रविवार शब्द बहुत पुराना है। इसे पारिभाषिक  या शब्दावली आयोग की देन न समझें। कोई कामवाली ज्यादा सुशिक्षित माने जाने के लिए संडे इस्तेमाल नहीं करती बल्कि उसकी सहज बुद्धि ऐसा करने को कहती है। संडे शब्द उसके परिवेश में पहले से उसने सुना है।

अजित वडनेरकर

unread,
May 18, 2010, 2:46:34 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
कठिनाई दिमाग में है। पूर्व प्रचलित सहज पर्याय अगर उपलब्ध है तो नए की आजमाईश में जकड़न रहती है। यही है कठिनाई। मध्यप्रदेश के अखबारों में संक्षेपीकरण की परिपाटी है जो प्रांत से बाहरवालों को अजीब लग सकती है,  पर अब ये संक्षिप्त नाम लोकप्रिय हो चुके हैं और इनका खूब प्रयोग होता है। सो इन्हें सामाजिक मान्यता मिल गई है जैसे लघु उद्योग निगम को लउनि कहते हैं। दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को धड़ल्ले से देवैभो लिखा जाता है।

तात्पर्य यही कि कठिनाई को किसी तार्किक आधार पर नहीं परखा जा सकता। ऊहापोह शब्द प्रचलित है मगर किंकर्त्व्यवमूढ़ नहीं। यहां कठिनाई साफ दिख रही है। इस तरह नाईट्रोजन के संदर्भ में नत्रजन चाहे कठिन न लगे पर यह एक लोकप्रिय शब्द का लोकप्रिय विकल्प इसलिए नहीं बन सकता क्योंकि मूल पद पहले से ही प्रचलन में है। यही बात ओषजन के संदर्भ में कही जाएगी।                                               .



2010/5/18 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Rajeev Dubey

unread,
May 18, 2010, 2:48:03 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
शब्दों का कठिन और नया होना भी कोई समस्या नहीं हैअंग्रजी में तो ऐसे शब्द जानना सम्मान की बात हैबात केवल इतनी है की यदि इस सदियों से पिछड़े देश में हमारी अपनी भाषा हमें रोजगार और व्यापार दिलाने में सक्षम बनाती हो तो ऐसी भाषा में पारंगत होना कौन नहीं चाहेगा ?
राजीव दुबे
2010/5/18 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

Dr. Kavita Vachaknavee

unread,
May 18, 2010, 4:29:30 AM5/18/10
to kvacha...@yahoo.com
माननीय मित्रो!

विमर्श रोचक और सार्थक चल रहा है। लगभग ३५ / ३६ प्रतिक्रियाएँ अब तक आ चुकी हैं ।  बहुत धन्यवाद । सोचती हूँ इसे केवल समूह तक सीमित रहने देने की अपेक्षा प्रत्येक टिप्पणी को प्रति टिप्पणी सहित सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
अस्तु!

जब हिन्दी में तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली  की बात चल ही रही है, उसकी दुरूहता, कठिनाइयाँ, असम्बद्धता, भवितव्यता और सम्भवत: निरर्थकता (?) व अनावश्यकता (?) के भी पर्याप्त संकेत आए प्रतीत होते हैं तो विज्ञ जनों की सूचनार्थ इतना जान लेना महत्वपूर्ण हो सकता है कि हिन्दी की एकमात्र पत्रिका, जो अपने प्रकाश्य जीवन का लगभग शतक पूरा करने जा रही है ( वह भी अनवरत प्रकाशन का) वह है -  "विज्ञान"। इसमें केवल और केवल विज्ञान विषयों पर हिन्दी में मौलिक लेखन छपते हुए सौ वर्ष होने को आ गए हैं। ... और यह एक मासिक पत्रिका है। 

भारत का सम्भवत: कोई विरल ही हिन्दी-भाषी वैज्ञानिक होगा, पिछले सौ वर्ष में, जो इस में न छपा हो। और पत्रिका की विषय सूची को आधार बनाएँ तो रसायन से लेकर भौतिकी और वास्तु विज्ञान से लेकर मनोविज्ञान व जैविकी आदि न जाने कितने विषयों पर इसमें धड़ल्ले से ( बिना किसी शब्द के लिए हिन्दी/ देवनागरी की अक्षमता को कोसे) निरन्तर लिखा जाता रहा है। 

किसी हिन्दी - हिन्दी के नामलेवा ( धिक्कार या पुचकार भाव से) को इस अद्भुत पत्रिका  या उसके अद्भुत योगदान या उसकी शतवार्षिकी की मह्त्वपूर्णता का कितना गर्व अथवा पता है .... यह तो भगवान् ही जाने। इस पर भी हम आधिकारिक रूप से हिन्दी की तकनीकी शब्दावली पर आधिकारिक टिप्पणियाँ और विमर्श करते हैं..... हैं न हम महान्  ......!!

सादर, शुभकामनाओं सहित


- कविता वाचक्नवी
http://www.google.com/profiles/kavita.vachaknavee


2010/5/17 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

--
शुभकामनाओं सहित
अजित

Anunad Singh

unread,
May 18, 2010, 5:24:37 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
कविता जी,

इस महान पत्रिका के बारे में बताने के लिये साधुवाद।

मैने  इसके बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करके हिन्दी विकि पर  लिख दिया है।

http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%28%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%29

अधिक जानकार लोग इसका परिवर्तन/परिवर्धन करके इसे और परिपूर्ण बनावें।

--अनुनाद

Shree Devi Kumar

unread,
May 18, 2010, 5:43:00 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
Please also see http://www.srijangatha.com/HindiWishwa3_Oct2k7

हिन्दी और विज्ञान लेखन



2010/5/18 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
May 18, 2010, 5:56:21 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी,
 
On clicking this very long link, I got the following message:
 
विकिपीडिया पर ठीक इसी शीर्षक का लेख फ़िलहाल नहीं है।

१८ मई २०१० २:५४ PM को, Anunad Singh <anu...@gmail.com> ने लिखा:

Anunad Singh

unread,
May 18, 2010, 5:58:57 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com

विज्ञान (हिन्दी पत्रिका)

विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से

यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विज्ञान , हिन्दी में वैज्ञानिक विषयों पर निकलने वाली मासिक पत्रिका है। इसका प्रकाशन सन् १९१५ के अप्रैल मास से आरम्भ हुआ था। इसका प्रकाशन विज्ञान परिषद् , प्रयाग करती है। इसके प्रथम प्रकाशक लाला कर्मचन्द भला एवं सम्पादक लाला सीताराम एवं पण्डित श्रीधर पाठक थे। पिछले लगभग सौ वर्षों से इसका अनवरत प्रकाशन होता आ रहा है। आरम्भ में इसका शुल्क ३ रूपये वार्षिक था। बृजराज, डॉ सत्यप्रकाश, युधिष्ठिर भार्गव प्रभृति सम्पादकों ने इसका सफलतापूर्वक सम्पादन किया। म्प्रति डॉ शिवप्रकाश मिश्र इसके सम्पादक हैं।

[संपादित करें] उद्देश्य

  • हिन्दी भाषा में साहित्य के वैज्ञानिक अंग की पूर्ति करना
  • ग्रन्थों का अनुवाद
  • लेखों का प्रकाशन
  • सरवसाधारण में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करना


१८ मई २०१० ३:२६ PM को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:

Dr. Kavita Vachaknavee

unread,
May 18, 2010, 6:27:59 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
धन्यवाद अनुनाद जी,

१ )
मुझे विकी पर बनाया आपका  लिंक व सामग्री  सही सही दिखाई दे रही है।

२)
राष्ट्रपति कलाम जी द्वारा प्रारम्भ की गई परियोजना और ज्ञान का दुर्लभ खजाना ( डिज़िटल लायब्रेरी ऒफ़ इंडिया ) के इस लिंक द्वारा आपकी इसकी कुछ तहों तक पहुँच सकते हैं -



VIGYAN PATRIKA., 5990010070416. PROF. HEM CHANDRA JOSHI, PREM CHANDRA SHRIVASHTAV, Dr. R.C. GUPTA , VINOD SHANKAR GUPTA, Dr. UMA SHANKAR GUPTA, DEVVART DUVEDI, SHIVESH KUMAR. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070417. Dr. PRADEEP KUMAR MUKHARJI, Dr. J.L. AGRAWAL,VISHWA MOHAN TIWARI, SHIVENDRA KUMAR PANDEY, Dr. R.C. GUPTA.. 0. hindi. SCIENCE. 36 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070418. Dr. P.L. MATHEW, Dr. PRADEEP KUMAR MUKHARJI, RAKESH PATHAK, SHIVENDRA KUMAR PATHAK, Dr. SHIV GOPAL MISHRA, Dr. RAMESH DATT SHARMA. 0. hindi. SCIENCE. 35 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070419. Dr. R.S. DUBEY, Dr. J.L. AGRAWAL, Dr. UMA VERMA, PREM CHANDRA SHRIVASHTAV, SHIVENDRA KUMAR PANDEY, SHYAM SHARAN AGRAWAL, DEV VART DUBEDI, Dr. D.D. OJHA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070420. Dr. M.G.K. MENAN,Dr. KRISHNA KUMAR TIWARI, MANGAL SINGH RODHI,UMESH KUMA R SHUKLA , PREM CHANDRA SHRIVASHTAV. 0. hindi. SCIENCE. 35 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070421. RAM CHANDRA MISHRA, JYOTI BHAI, Dr. R.C. GUPTA, M.P. YADAV, Dr. SHITLA PRASAD VERMA, SANDEEP NIGAM, Dr. UMASHANKAR MISHRA, Dr. D.D. OJHA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070422. Dr. MURLI MANOHAR JOSHI, Dr. DEVENDRA SHARMA, RAKESH PATHAK, SHIVENDRA KUMAR PATHAK, Dr. GANESH KUMAR PATHAK, VISHNU PRASAD CHATURVEDI, Dr. DEVENDRA SHARMA , RAVINDRA KUMAR KHARE, Dr. SHIV GOPAL MISHRA. 0. hindi. SCIENCE. 35 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070423. Dr. MANMOHAN BALA, SANJAY GOSWAMI, Dr. R.C. GUPTA, NARESH VEDI, RAMESH VEDI, VIJAY CHITAURI, Dr. ARUN ARYA. 0. hindi. SCIENCE. 51 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070424. ACHARYA VISHNU KANT SHARMA , Dr. HIRA LA NIGAM, Dr. LALJI SINGH, Dr. RAM CHARAN MEHROTRA, Prof. SHIV BAHAHDUR SINGH, PROF. HIRALA NIGAM. 0. hindi. SCIENCE. 68 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070425. Dr. SHIV GOPAL MISHRA, Dr. HARISH AGRAWAL, Dr. ANUPAM VERMA, GANESH SHANKAR PALIWAL, HIMANSHU JOSHI, PRAMOD JOSHI,JAGDEEP SAXENA, Dr. RAMESH DATT. SHARMA. 0. hindi. SCIENCE. 60 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070426. Dr. SHAMPA CHATERJI, Dr. SHIYA RAM VERMA, M.P. YADAV, DEVRAJ SIKKA , PREM CHAND SHRIVASHTAV. 0. hindi. SCIENCE. 44 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070427. Dr. K.N. UTTAM, PrOF. DEVENDRA SHARMA , Dr. SALIK SINGH, PREM CHAND SHRIVASHTAV, M.P. YADAV. 0. hindi. SCIENCE. 68 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070428. Dr. SUBODH MAHANTI, HEMLATA PANT, RAJESH KUMAR OJHA, RAM CHANDRA MISHRA , Dr. SHIV GOPAL MISHRA. 0. hindi. SCIENCE. 36 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070429. Dr. SIDHNATH UPADYAY, RAM CHANDRA MISHRA, M.P. YADAV, VIMLESH CHANDRA, Dr. SHIV GOPAL MISHRA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070442. Dr. RAMESH DATT SHARMA , RAJIV SAXENA , NILESH KUMAR JAIN , RAMESH BEDI PREM CHAND SHRIVASHTAV. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070443. Dr. SHIV GOPAL MISHRA , RAJESH CHANDRA, SHYAM SUNDAR, SHARMA, LAL JI,. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070444. Prof.B.D. SINGH, VISHVAMOHAN TIWARI , RAMESH VEDI, Dr. KRISHNA KUMAR MISHRA, PREM CHANDRA SHRIVASHTAV, RAKESH SHRIVASTAV, DEVVART DUVEDI. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PATRIKA., 5990010070482. VIRENDRA KUMAR SHARMA P. BALA RAM Dr. SHIV GOPAL MISHRA , Dr. R.C. GUPTA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs.
VIGYAN PRAYAG KA MUKH PATRA., 5990010070447. YASHWANT KOTHARI amp SYAM SUNDAR OJHA. 0. hindi. HINDI- SCIENCE. 517 pgs.
VIGYAN PRAYAG KA MUKH PATRA., 5990010070448. RAMESH KUMAR SHARMA, SUMARI ARUNA, DEVENDRA CHANDRA, DR. BHARTENDU ... 0. hindi. HINDI- SCIENCE. 474 pgs.


- कविता वाचक्नवी
http://www.google.com/profiles/kavita.vachaknavee


2010/5/18 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
May 18, 2010, 9:00:52 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com

बहुत धन्यवाद कविताजी इस जानकारी के लिए। विमर्श का अवसर आपने ही उपलब्ध कराया है। इस चर्चा के संदर्भ में डॉ रामविलास शर्मा के 1948 में प्रकाशित लेख हिन्दी का संस्कृतीकरण के कुछ अंश यहां दे रहा हूं जो आज भी प्रासंगिक हैं। एक काल्पनिक गद्यांश के जरिये वे जो कुछ कहना चाहते हैं, सरकारी दस्तावेजों में ऐसे अनेक उदाहरण आज भी मिलते हैं। अखबारों में छपनेवाली सरकारी, अदालती सूचनाओं में यह भाषा आमतौर पर नजर आती है।


कल्पना कीजिए-"एक अपसर्जित व्यक्ति अपने अपसर्जक पर अभियोग लगाता है और अपसर्जक का मित्र अपचय करता है। आप अदालत में प्रत्याख्यान करते हैं। वकील अत्यय की अभ्युक्ति करता है। इतने ही में एक अपनयन का मुकदमा और पेश होता है लेकिन मुकदमें का लम्बन हो जाता है और वह विकृष्ट हो जाता है। आपका अभिकर्ता शपथ-पत्रक देता है जिससे फिर व्यक्त विकर्षण होता है। इसके बाद पुनर्वाद के अत्यय की नौबत आती है और तब अपचारक से कहा जाता है कि इस वाद का व्यय बाद के परिणाम का अनुसरण करेगा। "


हिन्दी के इस संस्कृतीकरण से हिन्दी का राष्ट्रभाषा बनना तो दूर, उसका प्रानत्तीय भाषा के रूप में भी लोकप्रिय रहना कठिन हो जाएगा। यह हिनन्दी की सेवा करना नहीं , उसका गला घोंटना है। हर हिन्दी प्रेमी को इसका विरोध करना चाहिए।


यह बात नहीं है कि संस्कृत से शब्द लेना एकदम बन्द कर देना चाहिए। लेकिन शब्द लेना एक बात है, भाषा को संस्कृतमय बना देना दूसरी बात। इन कोशकारों की नजर में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसमें जो कुछ और होना चाहिए, वह केवल संस्कृत का। इनके लिए मध्यकाल से लेकर अब तक केवल सांस्कृतिक पतन ही होता आया है और जितनी जल्दी सतयुग की ओर लौट चलें, उतना ही अच्छा। यह हठधर्म कुछ नया नहीं है। जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस रचा था और पंडितगण उनकी रचना को भदेस कहकर हंसते थे , तब से यह क्रम चला आ रहा है । यूरोप में इस प्रकार लैटिन के आगे वल्गर टंग का मजाक उड़ाया जाता था , लेकिन वही भदेस भाषाएं संसार की सबसे समृद्ध भाषाए बन गईं।

 



2010/5/18 Dr. Kavita Vachaknavee <kavita.va...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
May 18, 2010, 9:23:17 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
अजित जी,
   "हिन्दी का संस्कृतीकरण" नामक लेख मैं पूरा पढ़ना चाहता हूँ । क्या आप इसे मेरे व्यक्तिगत इ-मेल से संलग्नक के रूप में प्रेषित कर सकते हैं ?
  सधन्यवाद

 नारायण प्रसाद

१८ मई २०१० ६:३० PM को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:

बहुत धन्यवाद कविताजी इस जानकारी के लिए। विमर्श का अवसर आपने ही उपलब्ध कराया है। इस चर्चा के संदर्भ में डॉ रामविलास शर्मा के 1948 में प्रकाशित लेख हिन्दी का संस्कृतीकरण के कुछ अंश यहां दे रहा हूं जो आज भी प्रासंगिक हैं। एक काल्पनिक गद्यांश के जरिये वे जो कुछ कहना चाहते हैं, सरकारी दस्तावेजों में ऐसे अनेक उदाहरण आज भी मिलते हैं। अखबारों में छपनेवाली सरकारी, अदालती सूचनाओं में यह भाषा आमतौर पर नजर आती है।


कल्पना कीजिए-"एक अपसर्जित व्यक्ति अपने अपसर्जक पर अभियोग लगाता है और अपसर्जक का मित्र अपचय करता है। आप अदालत में प्रत्याख्यान करते हैं। वकील अत्यय की अभ्युक्ति करता है। इतने ही में एक अपनयन का मुकदमा और पेश होता है लेकिन मुकदमें का लम्बन हो जाता है और वह विकृष्ट हो जाता है। आपका अभिकर्ता शपथ-पत्रक देता है जिससे फिर व्यक्त विकर्षण होता है। इसके बाद पुनर्वाद के अत्यय की नौबत आती है और तब अपचारक से कहा जाता है कि इस वाद का व्यय बाद के परिणाम का अनुसरण करेगा। "


हिन्दी के इस संस्कृतीकरण से हिन्दी का राष्ट्रभाषा बनना तो दूर, उसका प्रानत्तीय भाषा के रूप में भी लोकप्रिय रहना कठिन हो जाएगा। यह हिनन्दी की सेवा करना नहीं , उसका गला घोंटना है। हर हिन्दी प्रेमी को इसका विरोध करना चाहिए।


यह बात नहीं है कि संस्कृत से शब्द लेना एकदम बन्द कर देना चाहिए। लेकिन शब्द लेना एक बात है, भाषा को संस्कृतमय बना देना दूसरी बात। इन कोशकारों की नजर में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसमें जो कुछ और होना चाहिए, वह केवल संस्कृत का। इनके लिए मध्यकाल से लेकर अब तक केवल सांस्कृतिक पतन ही होता आया है और जितनी जल्दी सतयुग की ओर लौट चलें, उतना ही अच्छा। यह हठधर्म कुछ नया नहीं है। जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस रचा था और पंडितगण उनकी रचना को भदेस कहकर हंसते थे , तब से यह क्रम चला आ रहा है । यूरोप में इस प्रकार लैटिन के आगे वल्गर टंग का मजाक उड़ाया जाता था , लेकिन वही भदेस भाषाएं संसार की सबसे समृद्ध भाषाए बन गईं।

--

अजित वडनेरकर

unread,
May 18, 2010, 9:34:31 AM5/18/10
to technic...@googlegroups.com
कोशिश करता हूं नारायणजी,
मैं इस लेख को यूनिकोड में अगर कीइन कर पाया तो ठीक वरना इसे स्कैन करूंगा। मैने ये अंश शब्दों का सफर पर भाषा संबंधी लेख के लिए कीइन किया था, मगर यहां चल रही बहस में यह काम आ गया। जरूर भेजता हूं।
जैजै

2010/5/18 narayan prasad <hin...@gmail.com>

--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

narayan prasad

unread,
May 19, 2010, 4:53:43 AM5/19/10
to technic...@googlegroups.com
<<इस चर्चा के संदर्भ में डॉ रामविलास शर्मा के 1948 में प्रकाशित लेख हिन्दी का संस्कृतीकरण के कुछ अंश यहां दे रहा हूं जो आज भी प्रासंगिक हैं।>>
 
लीजिए, मेरी तरफ से भी एक उद्धरण -

एक सज्जन के दाहिने पाँव के अँगूठे में पत्थर से टकराकर चोट लग गई थी, उसपर पन-कपड़ा बाँध रक्खा था, लँगड़ाकर चलते थे । आप कुछ संस्कृत भी जानते हैं और विशुद्ध हिन्दी के पक्षपाती हैं । मैंने पूछा, 'आपके पाँव में क्या हुआ ?' बोले -"दक्षिण पाद के अंगुष्ठ में प्रस्तर के आघात से व्रण हो
गया है, उस पर आर्द्र-वस्त्र-वेष्टन कर रक्खा है, इससे लाभ की पूर्णतया सम्भावना है; अन्य प्रकार की अप्राकृत चिकित्सा प्रणाली का मैं विरोधी हूँ ।"

--- पद्मसिंह शर्मा (1951):"हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी", हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद; पृ॰13 
 
 
-----नारायण प्रसाद
 


 
१८ मई २०१० ६:३० PM को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:

बहुत धन्यवाद कविताजी इस जानकारी के लिए। विमर्श का अवसर आपने ही उपलब्ध कराया है। इस चर्चा के संदर्भ में डॉ रामविलास शर्मा के 1948 में प्रकाशित लेख हिन्दी का संस्कृतीकरण के कुछ अंश यहां दे रहा हूं जो आज भी प्रासंगिक हैं। एक काल्पनिक गद्यांश के जरिये वे जो कुछ कहना चाहते हैं, सरकारी दस्तावेजों में ऐसे अनेक उदाहरण आज भी मिलते हैं। अखबारों में छपनेवाली सरकारी, अदालती सूचनाओं में यह भाषा आमतौर पर नजर आती है।


कल्पना कीजिए-"एक अपसर्जित व्यक्ति अपने अपसर्जक पर अभियोग लगाता है और अपसर्जक का मित्र अपचय करता है। आप अदालत में प्रत्याख्यान करते हैं। वकील अत्यय की अभ्युक्ति करता है। इतने ही में एक अपनयन का मुकदमा और पेश होता है लेकिन मुकदमें का लम्बन हो जाता है और वह विकृष्ट हो जाता है। आपका अभिकर्ता शपथ-पत्रक देता है जिससे फिर व्यक्त विकर्षण होता है। इसके बाद पुनर्वाद के अत्यय की नौबत आती है और तब अपचारक से कहा जाता है कि इस वाद का व्यय बाद के परिणाम का अनुसरण करेगा। "


हिन्दी के इस संस्कृतीकरण से हिन्दी का राष्ट्रभाषा बनना तो दूर, उसका प्रानत्तीय भाषा के रूप में भी लोकप्रिय रहना कठिन हो जाएगा। यह हिनन्दी की सेवा करना नहीं , उसका गला घोंटना है। हर हिन्दी प्रेमी को इसका विरोध करना चाहिए।


यह बात नहीं है कि संस्कृत से शब्द लेना एकदम बन्द कर देना चाहिए। लेकिन शब्द लेना एक बात है, भाषा को संस्कृतमय बना देना दूसरी बात। इन कोशकारों की नजर में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसमें जो कुछ और होना चाहिए, वह केवल संस्कृत का। इनके लिए मध्यकाल से लेकर अब तक केवल सांस्कृतिक पतन ही होता आया है और जितनी जल्दी सतयुग की ओर लौट चलें, उतना ही अच्छा। यह हठधर्म कुछ नया नहीं है। जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस रचा था और पंडितगण उनकी रचना को भदेस कहकर हंसते थे , तब से यह क्रम चला आ रहा है । यूरोप में इस प्रकार लैटिन के आगे वल्गर टंग का मजाक उड़ाया जाता था , लेकिन वही भदेस भाषाएं संसार की सबसे समृद्ध भाषाए बन गईं।

 

Dr. Kavita Vachaknavee

unread,
May 19, 2010, 6:10:54 AM5/19/10
to kvacha...@yahoo.com
धन्यवाद, रामविलासशर्मा  जी लिखित  इस सामग्री को अग्रेषित करने के लिए।

मैं जितना हिन्दी में नए शब्दों के निर्माण और पुनर्रचना की पक्षधर हूँ उस से कहीं कम इस बात की नहीं कि चुन चुन कर सामान्य दैनंदिन प्रयोग के शब्दों को खींच खींच कर बाहर न निकाला जाए। 

रामविलास जी ने जितने उदाहरण दिए हैं वे पारिभाषिक शब्दों और लगभग भाषा के एक विशिष्ट प्रयुक्ति ( रजिस्टर) से सम्बन्द्ध  हैं। ये प्रयुक्तियाँ तो वैसी क्लिष्ट होनी ही हैं जैसी किसी के लिए अरबी फ़ारसी के किसी भी क्षेत्र की प्रयुक्ति। प्रयुक्ति की तुलना प्रयुक्ति से ही की जानी चाहिए। न कि भाषा के किसी एक रजिस्टर को उठा उसकी प्रयुक्तियों की तुलना दूसरी कम प्रचलित प्रयुक्तियों से की जाए।

शब्द ग्रहण की प्रवृत्ति भाषा की सहज स्वाभाविक व अबाध है, इसके लिए नीति नियन्ताओं को बैठकर शब्दों को लेने के लिए चुनना  ( या  निकाल फेंकने के लिए चुनना ) जितना अ - कारगर हास्यास्पद है उतना ही या उस से अधिक ही यह आवश्यक है कि इस चयन और ग्रहण की नीति के गूढ़ार्थ को भी समझें। संविधान में इसके लिए भी प्रावधान है कि हिन्दी के लिए शब्द ग्रहण कहाँ से कितना करना है। मुख्य रूप से संस्कृत और उसके साथ बोली भाषी क्षेत्रों/ अन्य भाषा क्षेत्रों ( भारतीय भाषा) से मुख्यत: शब्द ग्रहण / निर्माण की नीति तय की गई है। 

हाँ, यह भी सच है कि सामान्य बोलचाल व प्रयोग से अरबी/ फ़ारसी/ उर्दू के शब्दों को चुन चुन कर निकालना भी हास्यास्पद है। कोई भी व्यक्ति भाषा के प्रौढ़ प्रयोक्ता के रूप में ढलते हुए अपने साथ अपने परिवेश की भाषा का संस्कार लेकर ढलता है। मेरे जैसा कोई व्यक्ति जो पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों से आया है, और ऐसे माता-पिता की सन्तान है जिनका अध्ययन अध्यापन फ़ारसी के युग में उस परिवेश में हुआ, उसके दैनन्दिन उपयोग के शब्दों में कई शब्द अरबी फ़ारसी के होंगे। .... किन्तु हमने अपने शैक्षिक संस्कारों से उस भाषाई संस्कार का परिमार्जन भी किया।  मुझे यह कतई सहन न होगा कि मेरे शब्दों से कोई चुन चुन कर यह मीमांसा करने बैठे कि अमुक शब्द उर्दू का क्यों बोला और अमुक क्यों नहीं किन्तु मैं इसे भी सहर्ष स्वीकारूँगी ( और मैंने स्वयं किया भी) कि हिन्दी के ( संस्कृत व बोलियों के सहयोग से बने ) शब्दों के प्रचलन व प्रयोग को इतना सुगम कर दो कि स्वयं ही स्थानापन्न हो जाएँ। आज मेरे बच्चे विदेश में रहते हुए भी सामान्य बोलचाल तक में छुटपन से  ‘बाथरूम’ के स्थान पर ‘स्नानघर’ ही बोलते हैं, ‘बुक’ या ‘किताब’ तो दूर ‘पुस्तक’ ही बोलते हैं, ‘पार्क’ तो दूर ‘उद्यान’ ही बोलते हैं। .... क्योंकि उनके भाषाई संस्कार में हमने यही शब्द रोपे और उनके लिए इनके अतिरिक्त दूसरा शब्द प्रयोग करना मानो शब्द को आरोपित करना है, जबकि तीनों बच्चे युवा हैं और ३-३ ४-४ भाषाओं में पारंगत हैं। रोचक तो यह  है कि वे कई बार मेरी हँसी उड़ा देते हैं ( जैसे अभी ३-४ दिन पूर्व मैंने बेटे से बात करते हुए  ‘ऑफ़कोर्स’ कह दिया तो बेटे ने कहा ’आपने यह क्यों बोला’; मैंने कहा  - "तो  क्या ‘निस्सन्देह’ बोलती, कितना अजब लगता है आपसी बोलचाल में ‘निस्सन्देह’ बोलना"   तो वह तपाक से बोला   -  "क्यों, आप केवल ‘तो और क्या’ कह सकती थीं ना, उस से भी तो यह बात पूरी हो जाती है"।

तो कुल मिला कर मेरा मानना है कि भाषा में ग्रहण और त्याग ( दोनों स्थितियों में) का विवेक रखने वाले लोगों की आवश्यकता है, ऐसे लोगों की नहीं जो भाषा को धर्म के डंडे से हाँकना चाहते हैं ( जैसे हमारे हिन्दी-भारत समूह में एक दो ऐसे अतिवादी लोग हैं जो हिन्दी को हिन्दुत्व की भाषा बनाकर उसकी हत्या के पीछे पड़े हैं और सामान्य जन की तो क्या प्रभु जोशी जी जैसे भाषा चिन्तक की उत्कृष्ट भाषा तक में से भी चुन चुन कर शब्दों को स्थानपन्न करने का दुराग्रह करते है। 

दूसरी ओर,
 रामविलास जी जैसे प्रखर मेधा सम्पन्न भाषा-चिन्तक ने जितना कार्य हिन्दी का/ के लिए किया वह अनुपमेय है, ऐसे में उनकी इन बातों और तर्कों का बड़ा अर्थ है, (या आप जो कार्य भाषा के लिए कर रहे हैं उसका बड़ा अर्थ है) ; किन्तु कोई अंग्रेजी / उर्दू का पक्षधर इस तर्क का आश्रय लेकर इन भाषाओं के शब्दों को बोलचाल और साहित्य में नहीं अपितु विभिन्न भाषाई प्रयुक्तियों ( जैसे पत्रकारिता का रजिस्टर या अन्य) में धड़ल्ले से घुसेड़ने का  शातिर अधिकार सीना ठोंक कर लेना चाहते हैं तो उनके शमन के लिए ( शुद्धतावादी रवैया तो उसे मैं नहीं कहूँगी) सतर्क और सचेष्ट होना ही होगा, इस से न आप ( व न ही रामविलास जी होते तो वे  ) असहमत होते।

अन्यथा तो  आप की व हमारी चिन्ताएँ तो सम्यक् और समान ही हैं और दोनों  ओर की  निष्ठा असंदिग्ध है। किसी को उस पर सन्देह नहीं करना चाहिए। न ही परस्पर कोई विरोध है, न  हम मानें / पालें।

सरकारी पारिभाषिक शब्दावली में कई कठिनाइयाँ, दुरूहताएँ व प्रयोग अक्षमताएँ हैं. होंगी पुनरपि उनका महत्व व प्रासंगिकता निस्सन्देह है। उसे नकारने की पक्षधर मैं नहीं हूँ। इनमें भी त्याग और ग्रहण के विवेक का प्रयोग प्रयोक्ता को लेकर चलना पड़ेगा 

सधन्यवाद।

सादर स‍द्‍भाव सहित

- कविता वाचक्नवी
http://www.google.com/profiles/kavita.vachaknavee


2010/5/18 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

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ePandit | ई-पण्डित

unread,
May 19, 2010, 6:40:28 AM5/19/10
to technic...@googlegroups.com
तकनीकी हिन्दी शब्दों की क्लिष्टता बारे मैंने अपने विचार एक लेख में प्रकट किये थे। अति-क्लिष्ट हिन्दी शब्द भाषा को आम आदमी से दूर ले जाने का ही काम करते हैं। कुछ समय पहले एक किताब हाथ लगी जो कि उसके अंग्रेजी संस्करण का हिन्दी अनुवाद थी, हाल ये था कि अंग्रेजी वाली को समझना आसान था और हिन्दी वाली को मुश्किल।

दूसरी ओर कुछ लोग हिन्दी के सरल शब्दों के स्थान पर भी जबरन अंग्रेजी के शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। हिन्दी के जो शब्द सरल हैं उनके स्थान पर अंग्रेजी लादना बिलकुल अनावश्यक और गलत है। उदाहरण के लिये जनगणना शब्द हर कोई समझता है, इसके लिये जबरदस्ती सेंसस इस्तेमाल करना कहीं से उपयुक्त नहीं।

नये शब्दों के निर्माण के मामले में मैं आलोक जी का उदाहरण देना चाहूँगा। वे कोई साहित्यकार या भाषाविज्ञानी नहीं हैं लेकिन उन्होंने इण्टरनेट तथा चिट्ठाकारी सम्बंधी बहुत से शब्द गढ़े और सरल तथा मजेदार होने से वे प्रचलित भी हुये। उदाहरण के लिये ब्लॉग के लिये चिट्ठा, टैग्स के लिये चिप्पियाँ आदि।

कहने का अर्थ ये है कि नए शब्दों के निर्माण में शब्दों की सरलता न होगी तो वे किताबों तक ही सीमित रहेंगे और आम जनता में कभी प्रचलित न होंगे।

१९ मई २०१० ३:४० PM को, Dr. Kavita Vachaknavee <kavita.va...@gmail.com> ने लिखा:



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/
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Anunad Singh

unread,
May 19, 2010, 7:25:37 AM5/19/10
to technic...@googlegroups.com
श्रीश जी,
आपकी बात से सहमत हूँ। बस इतना और जोड़ना चाहता हूँ कि भाषा कि क्लिष्टता  में  शैली और प्रस्तुतीकरण की क्लिष्टता का अधिक योगदान होता है।  मैने कई बार  समाचारपत्रों में कुछ लेख पड़े हैं जो अंग्रेजी से अनुदित थे। उनमें शब्द तो सब परिचित थे किन्तु फिर भी समझने में समस्या हो रही थी। कारण यह था कि अनुवादक ने बिल्कुल अंग्रेजी का हिन्दी अनुवाद  अंग्रेजी शैली में कर दिया था।  इसी तरह किसी विचार को व्यक्त करते समय कुछ लोग इस बात पर विचार ही नहीं करते कि किस क्रम में विचारों को रखा जाय।  इस कारण समझने के लिये कम से कम दो  बार  पढ़ना पड़ता है।  जहाँ छोटे-छोटे सरल वाक्यों का प्रयोग होना चाहिये वहाँ चार-चार लाइन वाले मिश्रित/संयुक्त वाक्य प्रयोग कर देते हैं जिससे कभी-कभी  चार-पाँच बार भी पढ़ने पर  समझ में नहीं आता।

इसके अलावा, जब बहस होती है तो  ऐसा  आभास होता है कि क्लिष्टता का प्रश्न केवल  हिन्दी में है और वह इसलिये है कि संस्कृत के पारिभाषिक शब्द ले लिये गये हैं। सच्चाई यह है कि अंग्रेजी में विधिवत एक आन्दोलन चल रहा है जिसे 'सिम्पल  इंग्लिश मूवमेन्ट' कहते हैं।  ध्यातव्य है कि इंगलिश विकिपिडिया के अतिरिक्त  'सिम्पल इंग्लिश विकिपीडिया'  भी चल रही है। किसी अन्य भाषा में ऐसी दो विकिपिडिया नहीं हैं। इसलिये यह समझना कि अंग्रेजी सरलता का पर्याय है,  सही नहीं  है।


-- अनुनाद सिंह
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१९ मई २०१० ४:१० PM को, ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com> ने लिखा:
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Rajeev Dubey

unread,
May 19, 2010, 7:39:05 AM5/19/10
to technic...@googlegroups.com

हिन्दी को काम चलाऊ बनाना हो और मनोरंजन मात्र के लिए ज़िंदा रखना हो तो हम पारिभाषिक शब्दावलियों को फ़ेंक सकते हैं . अगर इरादे इससे बेहतर हिन्दी बनाने और अपने जीवन काल में ही हिन्दी को तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रचिलित होते देखने के हैं तो फिर पारिभाषिक शब्दावली ही उचित रास्ता है . दैनिक एवं घरेलु कामों में अंग्रेज भी तकनीकी अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं करता . उस लिहाज से ऊपर दिए गए उदाहरण बड़े अजीब लगते हैं .

राजीव दुबे

2010/5/19 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
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narayan prasad

unread,
May 19, 2010, 9:19:06 AM5/19/10
to technic...@googlegroups.com
राजीव जी एवं अन्य सदस्य गण,
    कई सदस्य किसी एक ही सन्देश का उत्तर देते समय भी पूर्व के सभी सन्देशों को पूर्ण रूप से साथ में जोड़ देते हैं (append) । मेरा नम्र निवेदन है कि केवल उसी सन्देश को अपेंड करें जिसका आप उत्तर दे रहे हैं या जिस पर टिप्पणी कर रहे हैं । उसमें भी यदि संगत (corresponding) पूर्व सन्देश बहुत बड़ा हो तो केवल सम्बद्ध अंश (relevant portion) ही अपेंड करें ।
 
अपने उत्तर की अपेक्षा आपने कितने पूर्व अंश को जोड़ा है इसका अन्दाजा आप अपने सन्देश बॉक्स की दायीं तरफ के scroll-bar की लम्बाई से भी लगा सकते हैं ।
  धन्यवाद ।

---नारायण प्रसाद
 
१९ मई २०१० ५:०९ PM को, Rajeev Dubey <rajeev....@gmail.com> ने लिखा:

हिन्दी को काम चलाऊ बनाना हो और मनोरंजन मात्र के लिए ज़िंदा रखना हो तो हम पारिभाषिक शब्दावलियों को फ़ेंक सकते हैं . अगर इरादे इससे बेहतर हिन्दी बनाने और अपने जीवन काल में ही हिन्दी को तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रचिलित होते देखने के हैं तो फिर पारिभाषिक शब्दावली ही उचित रास्ता है . दैनिक एवं घरेलु कामों में अंग्रेज भी तकनीकी अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं करता . उस लिहाज से ऊपर दिए गए उदाहरण बड़े अजीब लगते हैं .

राजीव दुबे

Rajeev Dubey

unread,
May 20, 2010, 6:52:45 AM5/20/10
to technic...@googlegroups.com

नारायण जी एवं माननीय समूह सदस्यों,

चर्चा से प्रोत्साहित होकर एक प्रयास करने की इच्छा हुई है . आप सभी का मार्गदर्शन अपेक्षित है . हिन्दी में मौलिक लेखन को प्रोत्साहन के साथ साथ  तकनीकी विषयों पर मूल्यवान सामग्री बनाकर उसका व्यवसायीकरण करते हुए एक  शोधपत्र मेरी कंपनी की और से निकालने की योजना है . इस कार्य में सभी प्रकार की व्यवस्थाएं हमारी ओर से होंगीं . वर्ष मे चार बार यह शोध पत्र प्रकाशित होगा . प्रारम्भ में केवल गणित की आंकिक संगणना के तरीकों पर शोध पत्र आमंत्रित होंगे . क्रमशः विषय बढाए जायेंगे . इस कार्य को संपादित करने के लिए  एक विशेषज्ञ  समिति का गठन किया जाएगा . पहला मील का पत्थर अक्टूबर में पार करने की योजना है. विस्तृत  जानकारी जून के अंत में उपलब्ध होगी. कृपया खुलकर अपने  विचार व्यक्त करें .

 राजीव दुबे



2010/5/19 narayan prasad <hin...@gmail.com>

Anunad Singh

unread,
May 20, 2010, 8:40:39 AM5/20/10
to technic...@googlegroups.com
सबसे पहले तो इतना बढ़िया विचार आगे लाने के लिये धन्यवाद लीजिये। यह बहुत 'हिट' होगा और बहुत सी अन्य संस्थाएँ भी  इसका अनुसरण करेंगीं।

कुछ सुझाव :

१) शोध पत्रों को हिन्दी में होना अनिवार्य किया जाना चाहिये।

२) व्याख्यान भी हिन्दी में होना अनिवार्य हो लेकिन  अंग्रेजी पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग की छूट हो।

३) महाविद्यालयीन विद्यार्थियों को इसमें शामिल किया जाना चाहिये।

४) गणित  आदि अन्य विषयों के साथ ही  भाषा प्रौद्योगिकी और भाषा-अभिकलन (लैंग्वेज कम्प्युटिंग)  को भी इसमें सम्मिलित किया जाय क्योंकि इस समय प्रोग्रामिंग जानने वालों की संख्या बहुत अधिक है किन्तु  उपयोगी समस्याओं को हल करने के बजाय  अधिकांश लोग ऐसे ही भटक रहे हैं।


-- अनुनाद सिंह

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२० मई २०१० ४:२२ PM को, Rajeev Dubey <rajeev....@gmail.com> ने लिखा:

नारायण जी एवं माननीय समूह सदस्यों,

चर्चा से प्रोत्साहित होकर एक प्रयास करने की इच्छा हुई है . आप सभी का मार्गदर्शन अपेक्षित है . हिन्दी में मौलिक लेखन को प्रोत्साहन के साथ साथ  तकनीकी विषयों पर मूल्यवान सामग्री बनाकर उसका व्यवसायीकरण करते हुए एक  शोधपत्र मेरी कंपनी की और से निकालने की योजना है . इस कार्य में सभी प्रकार की व्यवस्थाएं हमारी ओर से होंगीं . वर्ष मे चार बार यह शोध पत्र प्रकाशित होगा . प्रारम्भ में केवल गणित की आंकिक संगणना के तरीकों पर शोध पत्र आमंत्रित होंगे . क्रमशः विषय बढाए जायेंगे . इस कार्य को संपादित करने के लिए  एक विशेषज्ञ  समिति का गठन किया जाएगा . पहला मील का पत्थर अक्टूबर में पार करने की योजना है. विस्तृत  जानकारी जून के अंत में उपलब्ध होगी. कृपया खुलकर अपने  विचार व्यक्त करें .

 राजीव दुबे


अजित वडनेरकर

unread,
May 20, 2010, 8:51:43 AM5/20/10
to technic...@googlegroups.com
सामुदायिक भावना से किए जाने वाले प्रत्येक प्रयास के लिए मेरे मन में अथाह सम्मान का भाव है। निश्चित ही इस प्रयास को सभी साथियों का सक्रिय सहयोग मिलेगा, ऐसी अपेक्षा है।

बहुत शुभकामनाएं

2010/5/20 Anunad Singh <anu...@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Rajeev Dubey

unread,
May 20, 2010, 9:19:56 AM5/20/10
to technic...@googlegroups.com
अनुनाद जी,
धन्यवाद  .

शोध पत्र हिन्दी में ही होंगे . ओर व्याख्यान भी हिन्दी में ही करने होंगें . इन शोध पत्रों के किसी अन्य भाषा में अनुवाद पर हम मूल्य भी वसूल करेंगे . इन सभी शोध पत्रों पर हम अपने अधिकार सुरक्षित रखेंगे ओर लेखकों को शोध पत्रों के लिखित रूप में बेचने से मिलने वाली  आमदनी में से कुछ हिस्सा प्रथम वर्ष में  बतौर शुल्क मिलेगा . कुछ विशिष्ट शोध पत्रों के आधार पर  बनने वाले सोफ्टवेर    या अन्य किसी चीज पर हम लाइसेंसिंग के रास्ते से धन वसूल करेंगे . या फिर हम खुद ही ऐसे सॉफ्टवेर इत्यादि बनायेंगे .  हम यह कार्य "मुनाफे के लिए " के आधार पर करेंगें .  इससे हमें सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और हम इस कार्य के द्वारा हिन्दी भाषा में रूचि रखने वालों के लिए   रोजगार भी  उपलब्ध करा सकेंगे  तथा धन कमा कर हिन्दी के द्वारा  सम्पदावान  होने का गर्व  भी महसूस कर सकेंगे .

 गणित की इस शाखा का चुनाव इसलिए किया क्योंकि इस क्षेत्र  में  भाषा कम से कम उपयोग करनी पड़ती है . दूसरी बात , हमारे देश के कम अंग्रेज़ी जानने वाले युवा भी गणित में महारथ रखते हैं यह मेरा अनुभव रहा है . और गणित की एक छोटी युक्ति भी बड़ी बहुमूल्य हो सकती है . आगे और विषय भी लाये जायेंगे . 

राजीव दुबे

2010/5/20 Anunad Singh <anu...@gmail.com>
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