













जब तक तकनीकी जानकारी हिंदी में उपलब्ध न करा दी जाये तब तक हिंदी मनोरंजन, साहित्य और जन संपर्क की भाषा बनी रहेगी । यह एक सत्य है । कटु लगे तो लगता रहे । विज्ञान और तकनीकी जगत की पुस्तकों का विशाल स्तर पर हिंदी अनुवाद और मूल लेखन अभियान चलाना होगा । बाकी स्वतः होता रहेगा । जन सामान्य उचित चुनाव कर लेगा ।राजीव दुबे
मै मानता हूं, कि,
हिंदी/संस्कृतमें किसी
विशेष क्षेत्र में सुसंवादी
पारिभाषिक शब्द रचना की जा
सकती है।
हमारे पास बेजोड़, शब्द रचना
शास्त्र है।
उदाहरण--> नीचे मुख पेशियों के
नाम
(अभिनवं शारीरम् से )
प्रस्तुत है।
इनपर विचार करें।
Anatomy( शरीर रचना शास्त्र)
एक कठिन विषय समझा जाता है।
इस लिए कुछ उदाहरण उसीके देता
हूं।
संस्कृत पर्याय के साथ
तुलनाके लिए, अंग्रेजी
संज्ञाभी दी गई है।
उदा: (अ) भ्रूसंकोचनी: Corrugator supercilli
( भ्रू को संकॊचनेवाली पेशी),
जहां, अंग्रेजी संज्ञा २०
अक्षर, हिंदी ५ अक्षरोमेंही
लिखी जा सकती है।
उदा: (आ) नेत्र निमीलनी: --Orbicularis
Oculi (नेत्र बंद करनेवाली),
उदा: (इ) नासा संकोचनी: Compressor naris
(नाक का संकोच करनेवाली
पेशियां)
उदा: (ई) नासा विस्फारणी: Dilator naris(
नाक विस्फारित करने वाली),
उदा: (उ) नेत्रोन्मीलनी(आंख
खोलनेवाली पेशी/पेशियां)
==========
(१) संस्कृत/हिंदी की सज्ञा
संक्षेपमें, अंग्रेजीकी
अपेक्षा बहुत कम अक्षरोमें
लिखि जाएगी,
(२) संस्कृत/हिंदी की संज्ञा
का स्पेलिंग याद करना नही
पड़ेगा
(२) उसकी व्याख्या,(बहुत बार
अर्थ भी ) संज्ञाके साथ पता
चलती है।
(३)स्पेलिंग और व्याख्या रटते
जो समय बिताएंगे, अनुमानतः ,
उसके 25% समय में आप
हिंदी/संस्कृत में अध्ययन कर
सकते हैं।
विशेष: इन संज्ञाओंका उपयोग
भारतकी सारी प्रादेशिक
भाषाएं कर सकती है।
जो, भारतकी एकतामेंभी योगदान
होगा।
निर्माण अभियांत्रिकी में
कुछ संज्ञाओं की रचना करनेका
काम और उसपर आधारित
निबंध प्रस्तुत कर पाया हूं।
डॉ. झवेरी
Ph D (Structural Ebgineering)
University of Massachusetts
Dartmouth USA
>>> http://www.IndianCoins.Org <http://www.indiancoins.org/>
>>>> technical-hin...@googlegroups.com<technical-hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>को
>>>> ईमेल करें.
>>>> और विकल्पों के लिए,
>>>> http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hiपर इस
>>>> समूह पर जाएं.
>>>>
>>>
>>> --
>>> आपको यह संदेश इसलिए
>>> प्राप्त हुआ क्योंकि आपने
>>> Google समूह "Scientific and
>>> Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा
>>> तकनीकी हिन्दी)" समूह की
>>> सदस्यता ली है.
>>> इस समूह में पोस्ट करने के
>>> लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल
>>> भेजें.
>>> इस समूह से सदस्यता समाप्त
>>> करने के लिए,
>>> technical-hin...@googlegroups.com को ईमेल
>>> करें.
>>> और विकल्पों के लिए,
>>> http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hiपर इस
>>> समूह पर जाएं.
>>>
>>> --
>>> आपको यह संदेश इसलिए
>>> प्राप्त हुआ क्योंकि आपने
>>> Google समूह "Scientific and
>>> Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा
>>> तकनीकी हिन्दी)" समूह की
>>> सदस्यता ली है.
>>> इस समूह में पोस्ट करने के
>>> लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल
>>> भेजें.
>>> इस समूह से सदस्यता समाप्त
>>> करने के लिए,
>>> technical-hin...@googlegroups.com<technical-hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>को
>>> ईमेल करें.
>>> और विकल्पों के लिए,
>>> http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hiपर इस
>>> समूह पर जाएं.
>>>
>>
>> --
>> आपको यह संदेश इसलिए
>> प्राप्त हुआ क्योंकि आपने
>> Google समूह "Scientific and
>> Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा
>> तकनीकी हिन्दी)" समूह की
>> सदस्यता ली है.
>> इस समूह में पोस्ट करने के
>> लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल
>> भेजें.
>> इस समूह से सदस्यता समाप्त
>> करने के लिए,
>> technical-hin...@googlegroups.com<technical-hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>को
>> ईमेल करें.
>> और विकल्पों के लिए,
>> http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hiपर इस
>> समूह पर जाएं.
>>
>
>
>
> --
> शुभकामनाओं सहित
> अजित
> http://shabdavali.blogspot.com/
>
> --
> आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त
> हुआ क्योंकि आपने Google समूह
> "Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा
> तकनीकी हिन्दी)" समूह की
> सदस्यता ली है.
> इस समूह में पोस्ट करने के
> लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल
> भेजें.
> इस समूह से सदस्यता समाप्त
> करने के लिए,
> technical-hin...@googlegroups.com को ईमेल
> करें.
> और विकल्पों के लिए,
> http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hi पर इस
> समूह पर जाएं.
>
>
--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/
--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/
>>> technical-hin...@googlegroups.com<technical-hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>को
>>> ईमेल करें.
>>> और विकल्पों के लिए,
>>> http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hiपर इस समूह पर जाएं.
>>>
>>
>> --
>> आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "Scientific and
>> Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)" समूह की सदस्यता ली है.
>> इस समूह में पोस्ट करने के लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल
>> भेजें.
>> इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए,
>> technical-hin...@googlegroups.com<technical-hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>को
>> ईमेल करें.
>> और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hiपर
>> इस समूह पर जाएं.
>>
>
> --
> आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "Scientific and
> Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)" समूह की सदस्यता ली है.
> इस समूह में पोस्ट करने के लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल
> भेजें.
> इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए,
> technical-hin...@googlegroups.com को ईमेल करें.
> और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hi पर
> इस समूह पर जाएं.
>
>
--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/
--
शुभकामनाओं के साथ -
आपका -
रावेंद्रकुमार रवि
http://ravi-man.blogspot.com/
राजीव दुबे
अनुनादजी,
मैं भी विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं, मगर सिर्फ हाईस्कूल तक। आपके तमाम अनुमान गलत हैं। मैने हाईस्कूल तक विज्ञान, फिर वाणिज्य में हिन्दी माध्यम से स्नातक किया है। फिर हिन्दी साहित्य में एमए। शुरुआती कक्षाओं में हिन्दी माध्यम से चाहे कोई उत्तीर्ण हो जाए। उच्च शिक्षा के लिए तकनीकी विषयों में कठिन शब्दावली हिन्दी माध्यम वालों को बहुत परेशान करती है। सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलता कि हिन्दी में पाठ्य पुस्तके हैं। कोई विद्यार्थी अगर हिन्दी माध्यम से अच्छे अंक के साथ पास हो भी जाए तो उसे कार्यक्षेत्र में उक्त शब्दावली में व्यवहार करने में दिक्कतें आती हैं। यह सिर्फ विज्ञान शब्दावली के संदर्भ में ही नहीं बल्कि कॉमर्स, लॉ जैसे विषयों के संदर्भ में भी सच है।
ओषजन सिर्फ उदाहरण के लिए शब्द दिया था। मेरी पाठ्यपुस्तक में यह शब्द था। आक्सीजन को ओषजन बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी। अगर ब्रेकेट में आक्सीजन ही लिखना था तो ओषजन का प्रयोग ही क्यों हो जब उसका व्यावहारिक प्रयोग ही नहीं होता। यह सिर्फ मिसाल थी। नाइट्रोजन को नत्रजन कोई नहीं लिखता, फिर हिन्दी के नाम पर ऐसी शब्दावली क्यों बनाई गई कि लोग हिन्दी का उपहास उड़ाने लगें....यह कहना चाहता हूं मैं। आवेदन, प्रतिवेदन जैसे शब्द समझे जा रहे हैं तो ठीक है पर अन्तर्लम्ब, अभिदृष्य, अभ्युपगम, आसंजित, आसुत, समनुदेशिती, धुरा रक्षी, चालू समुत्थान जैसे हजारों शब्दों के संदर्भ में मेरी राय बहुत खराब है। ये हिन्दी की राह में रोड़े थे। दशकों से ऐसे ही शब्दों से भरे पाठ पढ़ने की तुलना में कई छात्रों ने अंग्रेजी माध्यम पढ़ना ही बेहतर समझा।
आप अपनी मान्यता पर दृढ़ रहें। मुझे कुछ भी समझने और कैसी भी धारणा बनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
जैजै
अजित जी,
गुस्सा करके 'कठिन प्रश्नों' से भागना सबसे बढ़िया तरीका है। खैर मैं नहीं मानूँगा। जरा बताइये कि 'नत्रजन' क्यों कठिन है? कठिनाई मापने का आपका पैमाना क्या है? नत्रजन में नाइट्रोजन से कम वर्ण हैं; उच्चारण करने में आसान है; भारतीयता से भरपूर है (सार्थक है); इसमें तो एक मात्रा तक नहीं है!
बात लोकप्रिय उच्चारणों की है। क्या याद रहता है, कौन सा सरल है कौन सा कठिन इसका कोई तय फार्मूला नहीं होता। भाषा के क्षेत्र में तो लोक स्वभाव के आगे व्याकरण के नियम भी बहुत बाध्यकारी नहीं हो पाते हैं।
नत्रजन आसान है तो नाइट्रोजन क्यों प्रचलन में है? बातों को व्यक्तिगत मत बनाइये। मैं कोशकार भी नहीं हूं और न ही हिन्दी के किसी क्षेत्र का आधिकारिक ज्ञाता। किसी मुगालते में नहीं हूं। यह कई बार स्पष्ट कर चुका हूं। किसी भी आरोपित विशेषज्ञता और उपाधि को खारिज करता हूं। यह साझा मंच है और मेरी शिरकत अपनी सीमाओं में बेहद सामान्य सदस्य के नाते है। निश्चित ही मेरी मान्यताएं बचकानी, अपरिपक्व और उथली हो सकती हैं, पर किसी सुने सुनाए के आधार पर नहीं है, इसका विश्वास है। मैं अपनी बात मनवाने का इच्छुक भी नहीं हूं। क्या आपकी बात से असहमत होने को आप दूसरे व्यक्ति का गुस्सा मान कर खुद हल्का हो लेते हैं? जाहिर है गुस्सा एक दुर्गुण है और यह दुर्गुण दूसरे पर आरोपित कर आप उसे कमजोर तो मान ही रहे हैं :)
मैं गुस्सा नहीं हूं, विरोध जताया है। आपकी शैली पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है जो शायद आपको नागवार गुजरी। आप यकीनन बहस के साथ मजा भी लेते हैं। प्रतिक्रिया तो आपके नाम का हिस्सा भी है :) मैं वैसा नहीं हूं और न ही छेड़छाड़ में दिलचस्पी है।
जितना आप लोग इस विषय में पैठे हैं, उसका शतांश भी मैं नहीं हूं। मैं आपकी बात मान भी लूं तो भी नत्रजन कठिन है-ध्वनिविज्ञान के हवाले से नहीं बल्कि सहज व्यवहार में। समाज की धारा अपने आप कठिन और सरल तय करती है। यही बात आसुत जल के संदर्भ में भी है। आसवन का अर्थ जिसे पता है, वह भी आसुत जल नहीं कहता। आप कोई तरीका बता सकते हैं कि इस कड़ी के आसुत, आसवनी, आसवन जैसे शब्दों को आमफहम कैसे बनाया जा सकता है? बहस मुझसे नहीं, हिन्दी समाज से हो रही है। प्रतिप्रश्न छोड़िए, अजित को भूलिए और तरीके सुझाइये।
नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कोर्ट, अदालत, लालटेन, साबुन, दमड़ी (द्रख्म), वजीर, गुर्गा और न जाने कितने शब्दों के होने से हिन्दी कमजोर नहीं, मजबूत हुई है। प्रक्रिया जारी है। मोटर का हिन्दी अनुवाद क्या है? गाड़ी क्या इसका सही अर्थ बताता है? मोटर को क्यों न चलने दिया जाए। जहाज और पोत दोनों ही प्रचलित हैं। तो भी हिन्दी में शिप स्वीकार्य होना चाहिए। एयर क्राफ्ट कैरियर का विमानवाही पोत अनुवाद बीते कई दशकों से सहज और स्वीकार्य बना हुआ है। आप नाइट्रोजन और नत्रजन के संदर्भ में यह बात कह सकते है?
जैजै
अब आप मूल विषय से हट रहे हैं। आपने पहले कहा था कि हिन्दी शब्दावली कठिन है (कठिन निर्मित की गयी है)। कृपया उसी को केन्द्र में रखकर चर्चा की जाय।
अब सिर्फ पिष्टपेषण ही हो रहा है यहां। हम लगातार एक ही बात अलग अलग मिसालों से कर रहे हैं। मेरे सामाजिक परिवेश में एपल हिन्दी का नहीं हुआ है जैसे मोटर है। उसी तरह संडे की जगह मेरे परिवेश में अभी तक इतवार, रविवार अधिक इस्तेमाल होते हैं। हां, संडे अब हिन्दी में शामिल हो चुका है। यहां सिर्फ संडे की बात हो रही है अन्य दिनों के अंग्रेजी पर्यायों की नहीं।
रविवार शब्द बहुत पुराना है। इसे पारिभाषिक या शब्दावली आयोग की देन न समझें। कोई कामवाली ज्यादा सुशिक्षित माने जाने के लिए संडे इस्तेमाल नहीं करती बल्कि उसकी सहज बुद्धि ऐसा करने को कहती है। संडे शब्द उसके परिवेश में पहले से उसने सुना है।
--
शुभकामनाओं सहित
अजित
विज्ञान , हिन्दी में वैज्ञानिक विषयों पर निकलने वाली मासिक पत्रिका है। इसका प्रकाशन सन् १९१५ के अप्रैल मास से आरम्भ हुआ था। इसका प्रकाशन विज्ञान परिषद् , प्रयाग करती है। इसके प्रथम प्रकाशक लाला कर्मचन्द भला एवं सम्पादक लाला सीताराम एवं पण्डित श्रीधर पाठक थे। पिछले लगभग सौ वर्षों से इसका अनवरत प्रकाशन होता आ रहा है। आरम्भ में इसका शुल्क ३ रूपये वार्षिक था। बृजराज, डॉ सत्यप्रकाश, युधिष्ठिर भार्गव प्रभृति सम्पादकों ने इसका सफलतापूर्वक सम्पादन किया। म्प्रति डॉ शिवप्रकाश मिश्र इसके सम्पादक हैं।
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070416. PROF. HEM CHANDRA JOSHI, PREM CHANDRA SHRIVASHTAV, Dr. R.C. GUPTA , VINOD SHANKAR GUPTA, Dr. UMA SHANKAR GUPTA, DEVVART DUVEDI, SHIVESH KUMAR. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070417. Dr. PRADEEP KUMAR MUKHARJI, Dr. J.L. AGRAWAL,VISHWA MOHAN TIWARI, SHIVENDRA KUMAR PANDEY, Dr. R.C. GUPTA.. 0. hindi. SCIENCE. 36 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070418. Dr. P.L. MATHEW, Dr. PRADEEP KUMAR MUKHARJI, RAKESH PATHAK, SHIVENDRA KUMAR PATHAK, Dr. SHIV GOPAL MISHRA, Dr. RAMESH DATT SHARMA. 0. hindi. SCIENCE. 35 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070419. Dr. R.S. DUBEY, Dr. J.L. AGRAWAL, Dr. UMA VERMA, PREM CHANDRA SHRIVASHTAV, SHIVENDRA KUMAR PANDEY, SHYAM SHARAN AGRAWAL, DEV VART DUBEDI, Dr. D.D. OJHA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070420. Dr. M.G.K. MENAN,Dr. KRISHNA KUMAR TIWARI, MANGAL SINGH RODHI,UMESH KUMA R SHUKLA , PREM CHANDRA SHRIVASHTAV. 0. hindi. SCIENCE. 35 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070421. RAM CHANDRA MISHRA, JYOTI BHAI, Dr. R.C. GUPTA, M.P. YADAV, Dr. SHITLA PRASAD VERMA, SANDEEP NIGAM, Dr. UMASHANKAR MISHRA, Dr. D.D. OJHA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070422. Dr. MURLI MANOHAR JOSHI, Dr. DEVENDRA SHARMA, RAKESH PATHAK, SHIVENDRA KUMAR PATHAK, Dr. GANESH KUMAR PATHAK, VISHNU PRASAD CHATURVEDI, Dr. DEVENDRA SHARMA , RAVINDRA KUMAR KHARE, Dr. SHIV GOPAL MISHRA. 0. hindi. SCIENCE. 35 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070423. Dr. MANMOHAN BALA, SANJAY GOSWAMI, Dr. R.C. GUPTA, NARESH VEDI, RAMESH VEDI, VIJAY CHITAURI, Dr. ARUN ARYA. 0. hindi. SCIENCE. 51 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070424. ACHARYA VISHNU KANT SHARMA , Dr. HIRA LA NIGAM, Dr. LALJI SINGH, Dr. RAM CHARAN MEHROTRA, Prof. SHIV BAHAHDUR SINGH, PROF. HIRALA NIGAM. 0. hindi. SCIENCE. 68 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070425. Dr. SHIV GOPAL MISHRA, Dr. HARISH AGRAWAL, Dr. ANUPAM VERMA, GANESH SHANKAR PALIWAL, HIMANSHU JOSHI, PRAMOD JOSHI,JAGDEEP SAXENA, Dr. RAMESH DATT. SHARMA. 0. hindi. SCIENCE. 60 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070426. Dr. SHAMPA CHATERJI, Dr. SHIYA RAM VERMA, M.P. YADAV, DEVRAJ SIKKA , PREM CHAND SHRIVASHTAV. 0. hindi. SCIENCE. 44 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070427. Dr. K.N. UTTAM, PrOF. DEVENDRA SHARMA , Dr. SALIK SINGH, PREM CHAND SHRIVASHTAV, M.P. YADAV. 0. hindi. SCIENCE. 68 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070428. Dr. SUBODH MAHANTI, HEMLATA PANT, RAJESH KUMAR OJHA, RAM CHANDRA MISHRA , Dr. SHIV GOPAL MISHRA. 0. hindi. SCIENCE. 36 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070429. Dr. SIDHNATH UPADYAY, RAM CHANDRA MISHRA, M.P. YADAV, VIMLESH CHANDRA, Dr. SHIV GOPAL MISHRA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070442. Dr. RAMESH DATT SHARMA , RAJIV SAXENA , NILESH KUMAR JAIN , RAMESH BEDI PREM CHAND SHRIVASHTAV. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070443. Dr. SHIV GOPAL MISHRA , RAJESH CHANDRA, SHYAM SUNDAR, SHARMA, LAL JI,. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070444. Prof.B.D. SINGH, VISHVAMOHAN TIWARI , RAMESH VEDI, Dr. KRISHNA KUMAR MISHRA, PREM CHANDRA SHRIVASHTAV, RAKESH SHRIVASTAV, DEVVART DUVEDI. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PATRIKA., 5990010070482. VIRENDRA KUMAR SHARMA P. BALA RAM Dr. SHIV GOPAL MISHRA , Dr. R.C. GUPTA. 0. hindi. SCIENCE. 52 pgs. |
| VIGYAN PRAYAG KA MUKH PATRA., 5990010070447. YASHWANT KOTHARI amp SYAM SUNDAR OJHA. 0. hindi. HINDI- SCIENCE. 517 pgs. |
| VIGYAN PRAYAG KA MUKH PATRA., 5990010070448. RAMESH KUMAR SHARMA, SUMARI ARUNA, DEVENDRA CHANDRA, DR. BHARTENDU ... 0. hindi. HINDI- SCIENCE. 474 pgs. |
बहुत धन्यवाद कविताजी इस जानकारी के लिए। विमर्श का अवसर आपने ही उपलब्ध कराया है। इस चर्चा के संदर्भ में डॉ रामविलास शर्मा के 1948 में प्रकाशित लेख हिन्दी का संस्कृतीकरण के कुछ अंश यहां दे रहा हूं जो आज भी प्रासंगिक हैं। एक काल्पनिक गद्यांश के जरिये वे जो कुछ कहना चाहते हैं, सरकारी दस्तावेजों में ऐसे अनेक उदाहरण आज भी मिलते हैं। अखबारों में छपनेवाली सरकारी, अदालती सूचनाओं में यह भाषा आमतौर पर नजर आती है।
कल्पना कीजिए-"एक अपसर्जित व्यक्ति अपने अपसर्जक पर
अभियोग लगाता है और अपसर्जक का मित्र अपचय करता है। आप अदालत में प्रत्याख्यान
करते हैं। वकील अत्यय की अभ्युक्ति करता है। इतने ही में एक अपनयन का मुकदमा और
पेश होता है लेकिन मुकदमें का लम्बन हो जाता है और वह विकृष्ट हो जाता है। आपका
अभिकर्ता शपथ-पत्रक देता है जिससे फिर व्यक्त विकर्षण होता है। इसके बाद पुनर्वाद
के अत्यय की नौबत आती है और तब अपचारक से कहा जाता है कि इस वाद का व्यय बाद के
परिणाम का अनुसरण करेगा। "
हिन्दी के इस संस्कृतीकरण से हिन्दी का
राष्ट्रभाषा बनना तो दूर, उसका प्रानत्तीय भाषा के रूप में भी लोकप्रिय रहना कठिन
हो जाएगा। यह हिनन्दी की सेवा करना नहीं , उसका गला घोंटना है। हर हिन्दी प्रेमी
को इसका विरोध करना चाहिए।
यह बात नहीं है कि संस्कृत से शब्द लेना एकदम बन्द कर देना चाहिए। लेकिन शब्द लेना एक बात है, भाषा को संस्कृतमय बना देना दूसरी बात। इन कोशकारों की नजर में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसमें जो कुछ और होना चाहिए, वह केवल संस्कृत का। इनके लिए मध्यकाल से लेकर अब तक केवल सांस्कृतिक पतन ही होता आया है और जितनी जल्दी सतयुग की ओर लौट चलें, उतना ही अच्छा। यह हठधर्म कुछ नया नहीं है। जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस रचा था और पंडितगण उनकी रचना को भदेस कहकर हंसते थे , तब से यह क्रम चला आ रहा है । यूरोप में इस प्रकार लैटिन के आगे वल्गर टंग का मजाक उड़ाया जाता था , लेकिन वही भदेस भाषाएं संसार की सबसे समृद्ध भाषाए बन गईं।
बहुत धन्यवाद कविताजी इस जानकारी के लिए। विमर्श का अवसर आपने ही उपलब्ध कराया है। इस चर्चा के संदर्भ में डॉ रामविलास शर्मा के 1948 में प्रकाशित लेख हिन्दी का संस्कृतीकरण के कुछ अंश यहां दे रहा हूं जो आज भी प्रासंगिक हैं। एक काल्पनिक गद्यांश के जरिये वे जो कुछ कहना चाहते हैं, सरकारी दस्तावेजों में ऐसे अनेक उदाहरण आज भी मिलते हैं। अखबारों में छपनेवाली सरकारी, अदालती सूचनाओं में यह भाषा आमतौर पर नजर आती है।
कल्पना कीजिए-"एक अपसर्जित व्यक्ति अपने अपसर्जक पर अभियोग लगाता है और अपसर्जक का मित्र अपचय करता है। आप अदालत में प्रत्याख्यान करते हैं। वकील अत्यय की अभ्युक्ति करता है। इतने ही में एक अपनयन का मुकदमा और पेश होता है लेकिन मुकदमें का लम्बन हो जाता है और वह विकृष्ट हो जाता है। आपका अभिकर्ता शपथ-पत्रक देता है जिससे फिर व्यक्त विकर्षण होता है। इसके बाद पुनर्वाद के अत्यय की नौबत आती है और तब अपचारक से कहा जाता है कि इस वाद का व्यय बाद के परिणाम का अनुसरण करेगा। "
हिन्दी के इस संस्कृतीकरण से हिन्दी का राष्ट्रभाषा बनना तो दूर, उसका प्रानत्तीय भाषा के रूप में भी लोकप्रिय रहना कठिन हो जाएगा। यह हिनन्दी की सेवा करना नहीं , उसका गला घोंटना है। हर हिन्दी प्रेमी को इसका विरोध करना चाहिए।
यह बात नहीं है कि संस्कृत से शब्द लेना एकदम बन्द कर देना चाहिए। लेकिन शब्द लेना एक बात है, भाषा को संस्कृतमय बना देना दूसरी बात। इन कोशकारों की नजर में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसमें जो कुछ और होना चाहिए, वह केवल संस्कृत का। इनके लिए मध्यकाल से लेकर अब तक केवल सांस्कृतिक पतन ही होता आया है और जितनी जल्दी सतयुग की ओर लौट चलें, उतना ही अच्छा। यह हठधर्म कुछ नया नहीं है। जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस रचा था और पंडितगण उनकी रचना को भदेस कहकर हंसते थे , तब से यह क्रम चला आ रहा है । यूरोप में इस प्रकार लैटिन के आगे वल्गर टंग का मजाक उड़ाया जाता था , लेकिन वही भदेस भाषाएं संसार की सबसे समृद्ध भाषाए बन गईं।
बहुत धन्यवाद कविताजी इस जानकारी के लिए। विमर्श का अवसर आपने ही उपलब्ध कराया है। इस चर्चा के संदर्भ में डॉ रामविलास शर्मा के 1948 में प्रकाशित लेख हिन्दी का संस्कृतीकरण के कुछ अंश यहां दे रहा हूं जो आज भी प्रासंगिक हैं। एक काल्पनिक गद्यांश के जरिये वे जो कुछ कहना चाहते हैं, सरकारी दस्तावेजों में ऐसे अनेक उदाहरण आज भी मिलते हैं। अखबारों में छपनेवाली सरकारी, अदालती सूचनाओं में यह भाषा आमतौर पर नजर आती है।
कल्पना कीजिए-"एक अपसर्जित व्यक्ति अपने अपसर्जक पर अभियोग लगाता है और अपसर्जक का मित्र अपचय करता है। आप अदालत में प्रत्याख्यान करते हैं। वकील अत्यय की अभ्युक्ति करता है। इतने ही में एक अपनयन का मुकदमा और पेश होता है लेकिन मुकदमें का लम्बन हो जाता है और वह विकृष्ट हो जाता है। आपका अभिकर्ता शपथ-पत्रक देता है जिससे फिर व्यक्त विकर्षण होता है। इसके बाद पुनर्वाद के अत्यय की नौबत आती है और तब अपचारक से कहा जाता है कि इस वाद का व्यय बाद के परिणाम का अनुसरण करेगा। "
हिन्दी के इस संस्कृतीकरण से हिन्दी का राष्ट्रभाषा बनना तो दूर, उसका प्रानत्तीय भाषा के रूप में भी लोकप्रिय रहना कठिन हो जाएगा। यह हिनन्दी की सेवा करना नहीं , उसका गला घोंटना है। हर हिन्दी प्रेमी को इसका विरोध करना चाहिए।
यह बात नहीं है कि संस्कृत से शब्द लेना एकदम बन्द कर देना चाहिए। लेकिन शब्द लेना एक बात है, भाषा को संस्कृतमय बना देना दूसरी बात। इन कोशकारों की नजर में हिन्दी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसमें जो कुछ और होना चाहिए, वह केवल संस्कृत का। इनके लिए मध्यकाल से लेकर अब तक केवल सांस्कृतिक पतन ही होता आया है और जितनी जल्दी सतयुग की ओर लौट चलें, उतना ही अच्छा। यह हठधर्म कुछ नया नहीं है। जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस रचा था और पंडितगण उनकी रचना को भदेस कहकर हंसते थे , तब से यह क्रम चला आ रहा है । यूरोप में इस प्रकार लैटिन के आगे वल्गर टंग का मजाक उड़ाया जाता था , लेकिन वही भदेस भाषाएं संसार की सबसे समृद्ध भाषाए बन गईं।
) असहमत होते।
।हिन्दी को काम चलाऊ बनाना हो और मनोरंजन मात्र के लिए ज़िंदा रखना हो तो हम पारिभाषिक शब्दावलियों को फ़ेंक सकते हैं . अगर इरादे इससे बेहतर हिन्दी बनाने और अपने जीवन काल में ही हिन्दी को तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रचिलित होते देखने के हैं तो फिर पारिभाषिक शब्दावली ही उचित रास्ता है . दैनिक एवं घरेलु कामों में अंग्रेज भी तकनीकी अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं करता . उस लिहाज से ऊपर दिए गए उदाहरण बड़े अजीब लगते हैं .
हिन्दी को काम चलाऊ बनाना हो और मनोरंजन मात्र के लिए ज़िंदा रखना हो तो हम पारिभाषिक शब्दावलियों को फ़ेंक सकते हैं . अगर इरादे इससे बेहतर हिन्दी बनाने और अपने जीवन काल में ही हिन्दी को तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रचिलित होते देखने के हैं तो फिर पारिभाषिक शब्दावली ही उचित रास्ता है . दैनिक एवं घरेलु कामों में अंग्रेज भी तकनीकी अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं करता . उस लिहाज से ऊपर दिए गए उदाहरण बड़े अजीब लगते हैं .
राजीव दुबे
नारायण जी एवं माननीय समूह सदस्यों,
चर्चा से प्रोत्साहित होकर एक प्रयास करने की इच्छा हुई है . आप सभी का मार्गदर्शन अपेक्षित है . हिन्दी में मौलिक लेखन को प्रोत्साहन के साथ साथ तकनीकी विषयों पर मूल्यवान सामग्री बनाकर उसका व्यवसायीकरण करते हुए एक शोधपत्र मेरी कंपनी की और से निकालने की योजना है . इस कार्य में सभी प्रकार की व्यवस्थाएं हमारी ओर से होंगीं . वर्ष मे चार बार यह शोध पत्र प्रकाशित होगा . प्रारम्भ में केवल गणित की आंकिक संगणना के तरीकों पर शोध पत्र आमंत्रित होंगे . क्रमशः विषय बढाए जायेंगे . इस कार्य को संपादित करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाएगा . पहला मील का पत्थर अक्टूबर में पार करने की योजना है. विस्तृत जानकारी जून के अंत में उपलब्ध होगी. कृपया खुलकर अपने विचार व्यक्त करें .
राजीव दुबे
नारायण जी एवं माननीय समूह सदस्यों,
चर्चा से प्रोत्साहित होकर एक प्रयास करने की इच्छा हुई है . आप सभी का मार्गदर्शन अपेक्षित है . हिन्दी में मौलिक लेखन को प्रोत्साहन के साथ साथ तकनीकी विषयों पर मूल्यवान सामग्री बनाकर उसका व्यवसायीकरण करते हुए एक शोधपत्र मेरी कंपनी की और से निकालने की योजना है . इस कार्य में सभी प्रकार की व्यवस्थाएं हमारी ओर से होंगीं . वर्ष मे चार बार यह शोध पत्र प्रकाशित होगा . प्रारम्भ में केवल गणित की आंकिक संगणना के तरीकों पर शोध पत्र आमंत्रित होंगे . क्रमशः विषय बढाए जायेंगे . इस कार्य को संपादित करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाएगा . पहला मील का पत्थर अक्टूबर में पार करने की योजना है. विस्तृत जानकारी जून के अंत में उपलब्ध होगी. कृपया खुलकर अपने विचार व्यक्त करें .
राजीव दुबे
शोध पत्र हिन्दी में ही होंगे . ओर व्याख्यान भी हिन्दी में ही करने होंगें . इन शोध पत्रों के किसी अन्य भाषा में अनुवाद पर हम मूल्य भी वसूल करेंगे . इन सभी शोध पत्रों पर हम अपने अधिकार सुरक्षित रखेंगे ओर लेखकों को शोध पत्रों के लिखित रूप में बेचने से मिलने वाली आमदनी में से कुछ हिस्सा प्रथम वर्ष में बतौर शुल्क मिलेगा . कुछ विशिष्ट शोध पत्रों के आधार पर बनने वाले सोफ्टवेर या अन्य किसी चीज पर हम लाइसेंसिंग के रास्ते से धन वसूल करेंगे . या फिर हम खुद ही ऐसे सॉफ्टवेर इत्यादि बनायेंगे . हम यह कार्य "मुनाफे के लिए " के आधार पर करेंगें . इससे हमें सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और हम इस कार्य के द्वारा हिन्दी भाषा में रूचि रखने वालों के लिए रोजगार भी उपलब्ध करा सकेंगे तथा धन कमा कर हिन्दी के द्वारा सम्पदावान होने का गर्व भी महसूस कर सकेंगे .
गणित की इस शाखा का चुनाव इसलिए किया क्योंकि इस क्षेत्र में भाषा कम से कम उपयोग करनी पड़ती है . दूसरी बात , हमारे देश के कम अंग्रेज़ी जानने वाले युवा भी गणित में महारथ रखते हैं यह मेरा अनुभव रहा है . और गणित की एक छोटी युक्ति भी बड़ी बहुमूल्य हो सकती है . आगे और विषय भी लाये जायेंगे .