बृहत् हिन्दी कोश के अनुसार -
अनुत्तर = वि० निरुत्तर, प्रधान, सर्वोत्तम; स्थिर, तुच्छ, दक्षिणी; पु० उत्तर का अभाव, जैन-देवताओं का एक वर्ग
निरुत्तर = वि० जो कोई उत्तर न दे सके, जिसके पास कोई उत्तर न हो, जिसकी जबान बन्द हो गयी हो, चुप; जिससे बड़ा कोई और न हो ।
इन दोनों शब्दों के अंग्रेज़ी अर्थ ऑनलाइन मोनियर विलियम्स के संस्कृत कोश पर CITATON के अन्तर्गत क्रमशः anuttara एवं niruttara निविष्ट करके देख सकते हैं -
Monier Williams Dictionary (2006 revision)
http://www.sanskrit-lexicon.uni-koeln.de/monier/
अनुत्तर के दो परस्पर विरोधी अर्थ "सर्वोत्तम" और "तुच्छ" कैसे निकलते हैं, इसके लिए उत्तर शब्द के मौलिक अर्थ पर विचार करते हैं । देखें उत्तर (uttara) के अर्थ मोनियर विलियम्स में भी ।
उत्तर शब्द उत् उपसर्ग में -तर प्रत्यय लगाने से बनता है ।
तद्धित प्रत्यय -तर एवं -तम साधारणतः विशेषण शब्दों से तुलना हेतु प्रयुक्त होते हैं । जैसे -
अधिक अधिकतर अधिकतम
न्यून न्यूनतर न्यूनतम
लघु लघुतर लघुतम
उत्तर तथा उत्तम शब्द में उत् उपसर्ग विशेषण की तरह कार्य करता है । उत् का अर्थ है - ऊपर । अतः उत्तर का अर्थ होगा - जो कोई ऊपर है उसकी अपेक्षा और ऊपर । उत्तम का अर्थ होगा - सबसे ऊपर ।
उत्तर का अर्थ जवाब (reply) कैसे होता है ? उत् उपसर्ग के मौलिक अर्थ ऊपर को विस्तारित करके अगला, आगे आने वला, बाद वाला अर्थ लेने पर -- पहले किसी ने कुछ कहा, फिर बाद में उस बात पर किसी दूसरे व्यक्ति ने और जो कुछ कहा, वह उत्तर ।
नकारार्थक या विपरीतार्थक अर्थ के लिए शब्द के पहले "न" ( = न् + अ) या इसके अन्य दो रूप "अन् " ( न के दोनों वर्णों के विपर्यय से) एवं "अ" ( न के न् का लोप करके ) का प्रयोग होता है । यदि शब्द का आदि वर्ण स्वर (vowel) हो तो नकारार्थक अर्थ के लिए अन् का प्रयोग होता है । जैसे -
उदार --> अन् उदार = अनुदार
उत्तर --> अन् उत्तर = अनुत्तर
उत्तम --> अन् उत्तम = अनुत्तम
आगे की चर्चा करते समय हमें स्वर शब्द का प्रयोग करना पड़ेगा । स्वर का सामान्य (common) अर्थ स्वर वर्ण (vowel) लिया जाता है । परन्तु, व्याकरण में स्वर का अर्थ accent भी होता है और इसका भी प्रयोग हमें करना पड़ेगा । अतः दुविधा न हो, इसके लिए vowel अर्थ में अच् शब्द का प्रयोग करेंगे और accent अर्थ में स्वर शब्द का । व्यंजन (consonant) के लिए "हल् " शब्द के प्रयोग से आप परिचित हैं, जैसे हलन्त ( = हल् + अन्त) । उसी तरह स्वर (vowel) के लिए "अच्" । अच् से किसी भी स्वरवर्ण एवं हल् से किसी भी व्यंजन का बोध कैसे होता है, इसकी व्याख्या के लिए देखें - पाणिनि के प्रत्याहार सूत्र ।
http://technical-hindi.googlegroups.com/web/pratyahar_sutra.htm
अच् + अन्त = अजन्त ।
अब हम इस बात की व्याख्या करते हैं कि अनुत्तर के दो परस्पर विरोधी अर्थ "सर्वोत्तम" और "तुच्छ" कैसे निकलते हैं । यदि अनुत्तर में तत्पुरुष समास माना जाय तो अर्थ होगा - उत्तर नहीं, उत्तर का अभाव । यहाँ यदि उत्तर का अर्थ जवाब लिया जाय तो उत्तर का अभाव = कोई जवाब नहीं, no reply । यदि उत्तर का अर्थ "बेहतर, और ऊपर", लिया जाय तो अनुत्तर = कोई भी दूसरा इससे बेहतर है अर्थात् तुच्छ । यदि अनुत्तर में बहुव्रीहि समास माना जाय तो अर्थ होगा - जिससे उत्तर (बेहतर, better) और कोई नहीं है अर्थात् सर्वोत्तम । परन्तु किसी विशिष्ट सन्दर्भ में इन दोनों परस्पर विरोधी अर्थों में कौन-सा अर्थ निकाला जाय ? वैदिक संस्कृत में इसका प्रावधान किया गया है और वह है स्वर (accent) में अन्तर । तत्पुरुष समास वाला शब्द अन्तोदात्त (oxytone) होता है अर्थात् उस शब्द का अन्तिम अच् उदात्त (accented) होता है; जबकि बहुव्रीहि समास में पूर्वपद में प्रकृति स्वर होता है अर्थात् उस शब्द के पहले पद में स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त होने पर जिस प्रकार का स्वर होता है, उसी प्रकार का स्वर बहुव्रीहि समास में भी होता है । एक अन्य उदाहरण से बात और स्पष्ट हो जायगी । मान लीजिए कि "इन्द्रशत्रु" शब्द का अर्थ मालूम करना है ।
इन्द्रशत्रु = (तत्पुरुष समास में) इन्द्र का शत्रु अर्थात् इन्द्र का शातन करने वाला, इन्द्र को मारने वाला
इन्द्रशत्रु = (बहुव्रीहि समास में) इन्द्र है शत्रु जिसका अर्थात् इन्द्र है शातन करने वाला जिसका, इन्द्र है मारने वाला जिसका
इन्द्र शब्द स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त होने पर आद्युदात्त (1st syllable accented) होता है । अतः बहुव्रीहि समास में इन्द्रशत्रु भी आद्युदात्त (= आदि+उदात्त) होगा । इस प्रसंग में वैदिक-स्वर-मीमांसा से निम्नलिखित अंश उद्धृत करना उचित होगा ।
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श्लोकबद्ध पाणिनीय शिक्षा में एक वचन है –
मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तदर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ।।
अर्थात् - स्वर (accent) अथवा वर्ण से अशुद्ध उच्चरित हीन मन्त्र उस अर्थ को नहीं कहता [जिसके लिए उच्चारण किया जाता है] । वह वाग् रूपी वज्र यजमान को नष्ट करता है, जैसे स्वर के अपराध से इन्द्रशत्रु ने किया ।
इस वचन में इन्द्रशत्रु की जिस आख्यायिका की ओर संकेत है, उसके अनुसार त्वष्टा नाम के असुर ने अपने पुत्र वृत्रासुर की वृद्धि के लिए जो यज्ञ किया था, उसमें इन्द्र के अथवा उसकी भेदनीति के द्वारा अपनी ओर मिलाए गए ऋत्विजों ने "इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व" (अर्थात् इन्द्रशत्रु की वृद्धि हो) मन्त्र में अन्तोदात्त इन्द्रशत्रु पद के स्थान में "इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व" आद्युदात्त पद का प्रयोग कर दिया, जिससे इन्द्र वृत्रासुर का शत्रु (मारनेवाला), यह अर्थ प्रकट हो गया । फलतः इन्द्र द्वारा वृत्रासुर मारा गया ।
[ सन्दर्भः पं० युधिष्ठिर मीमांसक (1985):"वैदिक-स्वर-मीमांसा", पृ० 55 ]
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अंग्रेज़ी में भी accent में परिवर्तन से अर्थ में परिवर्तन के कई उदाहरण मिलते हैं । जैसे -
invalid = (accent on the 1st syllable) crippled, अपंग
invalid = (accent on the 2nd syllable) not valid, अमान्य
project = (accent on the 1st syllable) n. परियोजना
project = (accent on the 2nd syllable) v. फेंकना, बाहर निकला होना
increase = (accent on the 1st syllable) n. वृद्धि
increase = (accent on the 2nd syllable) v. बढ़ना, वृद्धि होना
परन्तु संस्कृत और अंग्रेज़ी में स्वर की प्रकृति समान नहीं होती । संस्कृत में pitched accent (स्वराघात) होता है, जबकि अंग्रेज़ी में stressed accent (बलाघात) ।
मैं संजय जी का आभारी हूँ जिन्होंने एक मुख्य प्रश्न सामने रखा, जिसके चलते मुझे बहुत कुछ सोचने-समझने का अवसर मिला ।
--- नारायण प्रसाद
अनुत्तर और निरुत्तर में क्या अंतर है ?
दो उदाहरण:
1: मेरे प्रश्न अनुत्तरित रह गए.
2: सवाल सुन कर वह निरुत्तर हो गया
समझाने का कष्ट करें.