["मानक हिंदी वर्तनी के नियम" यूनिकोड में यहाँ उपलब्ध है -
https://sites.google.com/site/hindianuvadaka/manaka-hindi-vartani-ke-niyama-standard-hindi-spelling
सन् 2003 में प्रस्तुत नियम लगभग वे ही हैं, जो सन् 2010 में प्रकाशित किए गए हैं ।
2010 के संस्करण में अनुच्छेद 2 के स्थान पर अनुच्छेद 3 कर दिया गया है । ]
अब खड़ी पाई से अन्त न होने वाले व्यंजनों के संयुक्ताक्षर संबंधी नियम 3.1.2.2-5 पर विचार करें । यहाँ जैसे लिखने की सिफारिश की गई है और जिन रूपों के प्रयोग करने के लिए मनाही है, वे दोनों रूप यहाँ कम्प्यूटर पर एक जैसा ही दिख सकते हैं । इसलिए व्याख्या की जरूरत पड़ेगी । दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि परंपरागत युक्ताक्षर हेतु फोंट बदलकर देखा जाय (जैसे, Sanskrit 2003) ।
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3.1.2 अन्य व्यंजन
3.1.2.2 ङ, छ, ट, ड, ढ, द और ह के संयुक्ताक्षर हल् चिह्न लगाकर ही बनाए जाएँ। यथा:–
वाङ्मय, लट्टू, बुड्ढा, विद्या, चिह्न, ब्रह्मा आदि।
(वाङमय,लट्टू, बुड्ढा, विद्या, चिह्न, ब्रह्मा नहीं)
3.1.2.3 संयुक्त ‘र’ के प्रचलित तीनों रूप यथावत् रहेंगे। यथा:–
प्रकार, धर्म, राष्ट्र।
3.1.2.3 संयुक्त ‘र’ के प्रचलित तीनों रूप यथावत् रहेंगे। यथा:–
प्रकार, धर्म, राष्ट्र।
3.1.2.4 श्र का प्रचलित रूप ही मान्य होगा। इसे ... (इसे मैं टाइप नहीं कर
पा रहा हूँ। क्र में क के बदले श लिखा मान लें) के रूप में नहीं लिखा जाएगा। त+र
के संयुक्त रूप के लिए पहले त्र और ... (इसे मैं टाइप नहीं कर पा रहा हूँ। क्र
में क के बदले त लिखा मान लें) दोनों रूपों में से किसी एक के प्रयोग की छूट दी गई
थी। परंतु अब इसका परंपरागत रूप त्र ही मानक माना जाए। श्र और त्र के अतिरिक्त
अन्य व्यंजन+र के संयुक्ताक्षर 2.1.2.3 के नियमानुसार बनेंगे। जैसे :– क्र, प्र, ब्र, स्र, ह्र आदि।
3.1.2.5 हल् चिह्न युक्त वर्ण से बनने वाले संयुक्ताक्षर के द्वितीय
व्यंजन के साथ इ की मात्रा का प्रयोग संबंधित व्यंजन के तत्काल पूर्व ही किया
जाएगा, न कि पूरे युग्म
से पूर्व। यथा:– कुट्टिम, चिट्ठियाँ, द्वितीय, बुद्धिमान, चिह्नित आदि (कुट्टिम, चिट्ठियाँ, द्वितीय, बुद्धिमान, चिह्नित नहीं)।
टिप्पणी : संस्कृत भाषा के मूल श्लोकों को उद्धृत करते समय संयुक्ताक्षर पुरानी
शैली से भी लिखे जा सकेंगे। जैसे:– संयुक्त, चिह्न, विद्या, विद्वान, वृद्ध, द्वितीय, बुद्धि आदि।
किंतु यदि इन्हें भी उपर्युक्त नियमों के अनुसार ही लिखा जाए तो कोई आपत्ति नहीं
होगी।
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नियम 3.1.2.2-5 के मामले में मेरी टिप्पणी -
(1) "द" का "द", "ध", "म", "य" और "व" के साथ संयुक्ताक्षर परंपरागत रूप में ही मुझे व्यक्तिगत रूप से पसन्द हैं । शेष के साथ द में हल् चिह्न के साथ ।
द्ग, द्घ, द्द, द्ध, द्ब, द्भ, द्म, द्य, द्व ।
उदाहरणार्थ -
मुद्ग, मौद्गलायन, भगवद्गीता
उद्घाटन
मुद्दा, उद्देश्य
बुद्ध, बुद्धि, बुद्धू, सिद्ध
उद्भव
पद्म, पद्माकर
विद्या, पद्य, विद्योतन
विद्वान, द्वंद्व
(2) "ह" का "ण", "न", "म", "ल" के साथ संयुक्ताक्षर मुझे परंपरागत रूप में ही पसन्द हैं । एरियल यूनिकोड एम.एस. में लेकिन ये बहुत खराब दिखते हैं । उससे कहीं अच्छा तो मंगल फोंट में दिखते हैं ।
उदाहरणार्थ - अपराह्ण, पूर्वाह्ण, चिह्न, ब्रह्मा, आह्लाद, प्रह्लाद ।
(3) नियम 3.1.2.2 एक सामान्य नियम है, जबकि नियम 3.1.2.3-4 इसके अपवाद । संस्कृत व्याकरण के अनुसार, अपवाद हमेशा सामान्य नियम से बलवत्तर (अधिक बलवान) होता है । इसलिए 'र' के संयुक्ताक्षर के बारे में नियम 3.1.2.2 लागू नहीं होता । इसलिए "द्र" और "ह्र" में नियम 3.1.2.2 के अनुसार क्रमशः द और ह में हल् चिह्न का जो प्रयोग होना चाहिए वह नहीं होगा । उसी प्रकार शेष वर्णों में भी ।
--- इन दोनों नियमों 3.1.2.3-4 से पूर्णतः सहमत ।
(4) मेरे मत के अनुसार भी यदि हल् चिह्न सहित ही लिखा जाए तो "द्वितीय" लिखना सही है, "दि्वतीय" गलत । उसी प्रकार अन्य संयुक्ताक्षरों के बारे में भी । यही मत मेरा आरम्भ से ही रहा है । संस्कृत साहित्य में (जैसे गोरखपुर से प्रकाशित सप्तशती में) "पट्टिशैः" जैसा शब्द परंपरागत रूप में (अर्थात् एक ट के नीचे दूसरा ट का संयुक्ताक्षर) और 'ट्' के बाद 'टि' का प्रयोग पाया जाता है ।
--- नारायण प्रसाद