इस समूह में विशेषज्ञ इस दिशा में काम करें और शिरोरेखा विहीन देवनागरी
फ़ॉन्ट विकसित करना चाहें, तो भाषा का एक नया-सरल रूप देखने को मिलेगा। जो
लोग फ़ॉन्ट निर्माण पर काम करते है उनके लिए शिरोरेखा को हटाना ज़्यादा
मुश्किल या ज़्यादा समय लेने वाला नहीं होगा।
मैं इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि मेरी शिरोरेखा विहीन हस्तिलिखित हिन्दी में
मुझे कभी किसी अक्षर को पहचानने में भ्रम नहीं हुआ था। और पढ़ने में बहुत
साफ़ लगता था।
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रावत
2012/12/27 Pk Sharma <pksharm...@gmail.com>:
मुझे तो नहीं मिला।
आपके सौंदर्य बोध को नमन।
:-) हा हा।इतने मज़बूत शब्द लिख देते हैं कि आगे की सारी सोच ही बाधित हो जाए। आपका लिखा पढ़ कर अगर कोई फ़ॉन्ट निर्माता शिरोरेखाविहीन फॉन्ट को विकसित करेगा तो वह ख़ुद को अपराधी समझेगा।
फिर भी, यदि किसी दूसरे सदस्य का सौंदर्यबोध इतना गहरा न हो, तो पुन: निवेदन है कि शिरोरेखा विहीन एक फ़ॉन्ट विकसित करने का प्रयास करें। एक प्रयोग करना तो बनता है।--
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हालांकि अभी सबसे ज्यादा मांग हो रही है, केवल मूल व्यंजन एवं केवल मूल स्वरों वाली मात्राओं तथा संयुक्ताक्षरों से रहित देवनागरी की।
बिना शिरोरेखा के लिखने में कम समय लगता है, स्याही कम खर्च होती है, मिटाना कम पड़ता है। कई लाभ भी हैं। दिखने में साफ़-साफ़ दिखता है।
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हरि = "हअरइ" (<- शिरोरेखा के बिना वाले रूप होने चाहिये).
तुलना के लिये: hari
"किसी स्वर की मात्रा" = "हल् चिह्न" + "वही स्वर"
उदाहरण: "ी" = "्" + "ई"
पता नहीं किस बड़े बदलाव की बात कह रहे हैं।
उ नहीं होगा उसमें, ु होगा।
रावत
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