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महासय,
"विण्डोज एक्सपी के मंगल फोंट में संयुक्त रूप में प्रकट होते थे, किन्तु विण्डोज 7 के मंगल फोंट में सरल हलन्त युक्त रूप में प्रकट करने का प्रावधान किया गया है।"
ये प्रावधान किस उद्देश्य से किया गया है? मुझे मेरे विभाग के ४०,००० कर्मचारियों में unicode प्रयोग को प्रोत्साहित करना है.सही जानकारी से मुझे शिक्षित करे
धन्यवाद
गुंजन कुमार
महासय,
"विण्डोज एक्सपी के मंगल फोंट में संयुक्त रूप में प्रकट होते थे, किन्तु विण्डोज 7 के मंगल फोंट में सरल हलन्त युक्त रूप में प्रकट करने का प्रावधान किया गया है।"
ये प्रावधान किस उद्देश्य से किया गया है? मुझे मेरे विभाग के ४०,००० कर्मचारियों में unicode प्रयोग को प्रोत्साहित करना है.सही जानकारी से मुझे शिक्षित करे
धन्यवाद
गुंजन कुमार
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अक्षर keyboard (shift key NOT required ! ) :
् ा ि ी ु ू े ै ो ौ on 1 2 3 4 5 6 7 8 9 0
क ख ग घ ङ स च छ ज झ ञ ह on q w e r t y
u i o p [ ]
ट ठ ड ढ ण ष त थ द ध न on a s d f
g h j k l ; ''
य र ल व श प फ ब भ म on z x c
v b n m , . /
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Thank You
With warm regards
Gunjan Kumar
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<<संयुक्ताक्षरों को पहचानना हिन्दी को नए सीखे लोगों के लिए कठिन होता है।>>
उत्प्रेरणा या मत्स्य लिखना हो तो
उ त् प् रे र णा और म त् स् य का उच्चारण करना ही मुश्किल हो जाता है।
इसको सरल बताया जा रहा है। मुझे तो हिदी के सरलीकरण के हिमायतियों की सोच समझ में नहीं आती। नारायणजी की यह बात ज्यादा संभव लगती है कि किसी तकनीकी समस्या को हल/सरल करने के लिए ये हलन्त वाला तरीका निकाला गया है।
एक हलन्त तक तो चल जाएगा जहाँ 2 या 3 व्यंजन संयुक्त होते हैं वहां अलग अलग लिखे व्यंजनों को मिला कर सही उच्चारण करना बहुत ही मुश्किल काम है।
देवनागरी लिपि अपने आप में संपूर्ण है। तथाकथित वैज्ञानिकता के नाम पर सत्ताधारी चाहे जो खिलवाड़ कर सकते हैं।
अश्वत्थामा को देख कर सही उच्चारण करना आसान है या अश् व त् था मा को देख कर। लोग लेखन में भी छोटी इ की मात्रा हलन्त अक्षर को बाहर छोड़ कर लगाने लगे हैं, जो देखने में ही अटपटा लगता है। शान् ति भक् ति आदि।
मुझे तो ऐसा लगता है कि द्ध,द्म,द्व,श्व आदि की तरह ही 'श्र' को भी विदा करने का समय आ गया है।
इसके साथ ही, वर्तमान समय में जब हम 'ऋ' का 'रि' की तरह ही उच्चारण करते हैं तो 'ऋ' को भी विदाई दे देनी चाहिए।
--
अनुराधा जी,
समर्थन के लिए धन्यवाद। पुनश्च-
..................
अतः
पद्मिनी लिखा जाना वैज्ञानिक रूप से गलत है (क्योंकि हलन्तयुक्त व्यंजन पर छोटी-ई की मात्रा गलती से लगी है), पद्मिनी सही है।
द्वितीय गलत है द्वितीय सही है।
उद्विग्न गलत है, उद्विग्न सही है।
उद्भिज गलत है, उद्भिज सही है।
सद्चित गलत है सद्चित सही है। ..........
--
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On 7/21/12, Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com> wrote:
....इन शब्दों में देखिए कि यह हलन्त पर लगी है या पूर्ण
> अक्षर पर शक्ति, शान्ति, भक्ति, पश्चिम, मेक्सिको, लब्धि
यहाँ संयुक्ताक्षरों में प्रथम व्यञ्जन का हलन्त रूप नहीं है। ये बायें
से दायें जुड़े हुए संयुक्ताक्षर हैं। अतः क्त, न्त, श्च, क्स ब्ध आदि
एक-एक जुड़े हुए वर्ण के बायीं ओर लगी है।
> इनको पढ़ना सहज और स्वाभाविक लग रहा है या शक् ति, शान् ति, भक् ति पश् चिम,
> मेक् सिको को।
विण्डोज के USP में ऐसी व्यवस्था की गई है कि सामान्यतया कोई इन्हें टाइप
कर ही नहीं सकता। डिफाल्ट रूप में क्ति, न्ति, श्चि, क्सि ही प्रकट
होंगे।
यदि क्ति, न्ति, श्चि, क्सि रूप में प्रकट करना हो तो इसके लिए ZWNJ
का सहारा लेना पड़ेगा।
कृपया भ्रम में न पड़ें। यहाँ सिर्फ उन्हीं व्यञ्जनों की बात हो रही है,
जिनकी खड़ी पाई नहीं है, जिन्हें बायें से दायें क्रम में जोड़कर
संयुक्ताक्षर नहीं बनाया जा पा रहा है। ऊपर से नीचे क्रम में जुड़े
संयुक्ताक्षर के विकल्प रूप में बायें से दायें जोड़ने के लिए हलन्त
लगाकर प्रकट करना पड़ रहा है। और वह भी जब ये वर्ण संयुक्ताक्षर के
प्रथम-वर्ण के रूप में आयें।
यथा - 1.ङ, 2.छ, 3.ट, 4.ठ, 5.ड, 6.ढ, 7.द, 8.र
इनमें भी र का तो आधा रूप रेफ के रूप में उपलब्ध है।
छ का किसी संयुक्ताक्षर के प्रथम वर्ण के रूप में प्रयोग नहीं मिलता।
अत: सिर्फ ङ, ट, ठ, ड ढ, द - ये छः ही व्यञ्जन जब किसी संयुक्ताक्षर में
पहले वर्ण के स्थान पर आते हैं तो हलन्त का प्रयोग करके विकल्प रूप में
बायें से दायें जोड़कर प्रकट करने की जरूरत पड़ती है।
क - क् फ - फ् ह - ह् के भी आधे अक्षर उपलब्ध हैं। जिनके आधे अक्षर
उपलब्ध नहीं हैं, सिर्फ उन्हीं को हलन्त के सहारे आधा करने की जरूरत
पड़ती है।
पुनः निवेदन : भ्रम में न पड़ें।
> 2012/7/21 Vineet Chaitanya <v...@iiit.ac.in>
>
>> हरिरामजी,
>> वास्तव में देवनागरी लिपि की प्रकृति के अनुसार "ि" मात्रा को बडा
>> करके पूर्ण संयुक्ताक्षर पर लगाया जाना चाहिये. C-DAC के fonts में इसलिये
>> अलग
>> अलग कई ि मात्राएँ होती थी.
>>
>> विनीत चैतन्य
विनीत जी,
जैसा कि विनोद जी ने पिछले एक सन्देश में प्रश्न उठाया था कि जहाँ दो से
अधिक वर्णों से मिलकर बने संयुक्ताक्षर हों वहाँ क्या व्यवस्था होगी?
उत्प्रेरणा, मत्स्य।
यदि हमें हिन्दी को विश्वभाषा बनाना है तो संसार की समस्त भाषाओं/लिपियों
के सारे पाठ को देवनागरी/हिन्दी में लिखने, टंकित करने और सरलता से
स्पष्ट प्रकट करने की क्षमता हासिल करनी ही होगी।
फिलहाल सिर्फ संसार के सभी व्यक्तियों और स्थानों के नामों को देवनागरी
लिपि में लिखने का अभियान चलायें तो यह कहना मुश्किल होगा कि कौन-कौन-से
वर्णों के संयुक्ताक्षरों की जरूरत नहीं होती।
उदाहरण के लिए संस्कृत में एक संयुक्ताक्षर पाँच वर्णों से मिलकर बना है
- "कार्त्स्न्या" यहाँ र्+त्+स्+न्+या पाँच वर्ण मिलकर एक
संयुक्ताक्षर/पूर्णाक्षर (syllable) है। यदि कोई अपना नाम कार्त्सन्यि रख
ले, तो उसे लिखने/टाइप करने के लिए तो आपको फिर एक इतनी ज्यादा चौड़ी
टोपीवाली छोटी इ की मात्रा बनानी होगी, जो पूरे पाँचों वर्णों को ढँक
सके।
सुना है कि संस्कृत में एक ऐसा भी संयुक्ताक्षर है जो नौ वर्णों से मिलकर
बना है, वहाँ क्या करेंगे, क्या उस पर लगाने के लिए नौगुना चौड़ी टोपी
वाली छोटी-इ की मात्रा बनाएँगे?
दुःख की बात है कि इन्हीं भ्रान्तियों और वैज्ञानिकता पर पुरानी रूढ़ियों
को हावी होने देने के कारण ही देवनागरी/हिन्दी का प्रयोग बाधा प्राप्त हो
रहा है।
विशेषकर डैटाबेस प्रयोगों में हिन्दी का प्रयोग नगण्य हो रहा है, जो
कार्य हाथ से लिखकर आराम से हिन्दी में हो पा रहे थे, वे अब
कम्प्यूटरीकरण के युग में मजबूरी में अंग्रेजी में ही किए जा रहे हैं।
रेलवे रिजर्वेशन फार्म भले ही त्रिभाषी/द्विभाषी रूप में छपा रहता है,
भले की जनता उसे हिन्दी, बंगला, तेलगू आदि भारतीय भाषाओं में भरकर दे,
बुकिंग क्लर्क को कम्प्यूटर में अंग्रेजी में ही प्रविष्टि करनी पड़ती
है। बाद में वह NTrans नामक साफ्टवेयर के माध्यम से लिप्यन्तरित होकर
चार्ट में द्विभाषी छपता है, किन्तु उसमें हिन्दी में छपे नामों में
भयंकर त्रुटियाँ पाईं जाती हैं।
डाकघरों में रजिस्ट्री और स्पीडपोस्ट कम्प्यूटर द्वारा होने लगे हैं, भले
ही लिफाफे पर पता हिन्दी या कन्नड़ में लिखा हो, बुकिंग क्लर्क को
अंग्रेजी में ही कम्प्यूटर में प्रविष्टि करनी पड़ती है, और हिन्दी में
पते लिखे पत्र स्पीडपोस्ट से भी हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में कई दिन बाद
पहुँच पाते हैं।
हवाई टिकट हिन्दी में क्यों नहीं प्रिंट हो पा रहे। उनमें मूलतः यात्री
का नाम हिन्दी में क्यों नहीं आ पाता।
इनकम टैक्स रिटर्न (ऑनलाइन) हिन्दी में क्यों नहीं भर पा रहे हैं?
विभिन्न फार्म आदि आजकल "एक खाने में एक अक्षर भरें" की शैली में छपे
होते हैं, चाहे स्कूल में भर्ती का आवेदनपत्र हो या पासपोर्ट के लिए
आवेदन पत्र हो। ताकि उन्हें OCR के सहारे Automatic database में
कम्प्यूटर में संसाधित किया जा सके। यदि हिन्दी में कोई एक खाने में एक
अक्षर भरे तो क्या भरेगा?
आम जनता एक Syllable को एक अक्षर मानती है। कोई एक खाने में शा और दूसरे
में न्ति भरेगा, जबकि न्ति में न हलन्त, त और छोटी-इ चार वर्ण मिलकर बने
हैं। इनकी फील्डसाइज ओटोमेटिक रूप में कैसे निकलेगी?
आज लगभग सभी लोग मोबाईल का उपयोग कर रहे हैं। अधिकांश लोग हिन्दी के
वाक्य भी रोमन लिपि में लिखकर एसएमएस कर रहे हैं। देवनागरी का प्रयोग इसी
(भ्रान्ति तथा रूढ़िवादिता के कारण उपजी) जटिलता के कारण ही बाधाप्राप्त
हो रहा है। दुख की बात है कि लोग "उत्प्रेरणा" को पढ़ने में कठिनाई
होने का रोना रोते हैं, पर जब यही शब्द रोमन में लिखा एसएमएस मिले -
utprerana तो आराम से पढ़ लेते हैं, और स्वयं टाइप करके जबाब भी दे देते
हैं। देवनागरी/हिन्दी का प्रयोग भूल जाते हैं।
जो पहले शादी-विवाह के निमन्त्रण हिन्दी में देते थे, आजकल अंग्रेजी में
ही करने लगे हैं।
जो सेठ लोग पहले अपने व्यापारिक हिसाब किताब के खाते हिन्दी में ही लिखते
थे, आज कम्प्यूटरीकरण होने पर टाली आदि सॉफ्टवेयरों पर अंग्रेजी में ही
करने लगे हैं।
जिन कार्यालयों में मुद्रित प्रपत्र में वार्षिक गोपनीयता रिपोर्ट या
अप्रेजल हिन्दी में भरे जाते थे, अब SAP के अन्तर्गत कम्प्यूटरीकृत हो
जाने पर मजबूरी में अंग्रेजी में ही करना पड़ रहा है। क्योंकि परम्परागत
रूप में रेण्डरिंग में कठिनाई आती है।
अतः यदि आप जैसे विद्वान भी "जैसा होता आया है, वैसा ही हो" भले ही वह
विज्ञान या तर्कसम्मत हो या न हो - का ही समर्थन करते रहेंगे तो
हिन्दी/देवनागरी का प्रयोग आगे बढ़ेगा या कमेगा - यह निर्णय आप ही करें?
केवल येन-केन प्रकारेण प्रचलित पद्धति में देवनागरी/हिन्दी पाठ को
कम्प्यूटर में टाइप कर लेना, प्रदर्शित/मुद्रित कर लेना भर ही "समग्र
कम्प्यूटिंग" नहीं है। Just typing out text traditionally, not all
that, what computing is.
कम्प्यूटर का प्रमुख कार्य डैटाबेस है, यदि यह मूलतः व सरलता से देवनागरी
में नहीं हो पाता तो देवनागरी/हिन्दी व भारतीय लिपियों का प्रयोग घटेगा
ही।
यदि तीव्रता से हो रहे IT के विकास के साथ कदम मिलाकर न चले तो
"देवनागरी" लिपि सर्वश्रेष्ठ है, यह सिर्फ एक "नारा" मात्र बनकर रह
जाएगी।
अतः यह तकनीकी व वैज्ञानिक हिन्दी वर्ग के सभी विद्वानों को सोचना चाहिए
और रातों रात इसका हल निकालना चाहिए। किसी सरकारी तन्त्र पर, किसी तकनीकी
संस्थान का सहारा लिए बिना ही हमें स्वयंसेवी रूप से निःशुल्क व समर्पण
भाव से इन समस्याओं का सरल समाधान निकालना ही होगा।
संस्कृत में ६ अक्षरों का संयोग तो सुना है पर ९ का नहीं। कृपया यदि ९
वाले संयोग का पता हो तो उद्धृत करें। ६ व्यंजनों का संयोग यह हैः-
तिलान्त्स्त्र्यावपति ( न्+त्+स्+त्+र्+य्) ।
यहाँ तिलान् के बाद वाला त् (डः सि धुट्) वाला है। अर्थात् संधि करने के
कारण उपस्थित हुआ है।
--
»नवनीत कुमार