क्या तकनीकी शब्द सरल होते हैं ?

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narayan prasad

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Oct 31, 2007, 1:20:21 AM10/31/07
to Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)
       पारिभाषिक (तकनीकी) शब्द चाहे किसी भी भाषा के हों, न सरल होते हैं, न सबकी समझ में आने लायक और न ही प्रचलित । डॉ० कामेश्वर शर्मा ने ऐसे सरलतावादियों का मजाक उड़ाते हुए लिखा है - "अंग्रेजी का कौन ऐसा प्राध्यापक है जो Azadirachta Indica और Curmcuma Longa का अर्थ बता सके ? पर अंग्रेज़ी में एक छोटा-सा पत्र भी शुद्ध नहीं लिख सकने वाला वनस्पतिशास्त्री तत्क्षण इसका अर्थ बता देगा - नीम तथा हल्दी ।" इसी तरह तकनीकी कारखानों में काम करने वालों के बीच प्रचलित शब्दावली ग्रहण करने को अव्यावहारिक बताते हुए शर्मा जी कहते हैं - "बाइसिकिल बनाने वाला अंग्रेज़ मिस्त्री Solar cycle, Metonic cycle तथा Cyclic Substitution से माथा खुरचकर भी कुछ नहीं निकाल पायेगा ।"
        पाश्चात्य वनस्पतिशास्त्री हमारी हल्दी को हल्दी रूप में ग्रहण नहीं करता । यह इस छोटे से, सरल और अतिप्रचलित नाम के बदले पारिभाषिक नाम देता है - करक्युमा लौंगा । हमारे वनस्पतिशास्त्री जब अंग्रेज़ी के माध्यम से पढ़ते हैं तो करक्युमा लौंगा ही रटते हैं, हल्दी नहीं । इसके विपरीत हिन्दी वालों पर दबाव बनाया जाता है कि जो कुछ बनाइए सरल बनाइए, प्रचलित बनाइए । लोग यही बात अंग्रेज़ों से क्यों नहीं कहते कि आपके ज्ञान का उपयोग हम भी करते हैं, अतः आप भी सरल बनाइए, प्रचलित बनाइए । क्या पारिभाषिक शब्दावली किसी वैज्ञानिक आधार के बन सकती है ? यदि नहीं तो सरलता के नाम पर हिन्दी विरोध की आवाज बन्द होनी चाहिए ।
        पारिभाषिक शब्द बनाने वालों और बनाने के लिए निर्देश निर्धारित करने वालों को सदा ध्यान रखना चाहिए कि पारिभाषिक शब्द विशिष्ट ज्ञान के सूचक होते हैं । अतः वे विशिष्ट अध्येताओं के लिए ही होते हैं । ऐसी दशा में वे न तो सुगम हो सकते हैं और न लचीले । उनकी शर्त सरलता नहीं सटीकता है । रही प्रचलन की बात तो पारिभाषिक शब्द वैज्ञानिकों के बीच अपने अर्थ की सटीकता और बनावट की कसावट के कारण ही प्रचलित हो सकते हैं, लचीलेपन के कारण नहीं ।
 
[सन्दर्भः डॉ० अवधेश्वर अरुण - "हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण एवं अनुवाद", पृ० 101-110;
यह लेख निम्न पुस्तक में प्रकाशित है -
"अनुवाद-विज्ञान" (1997) - संपादक - डॉ० बालेन्दु शेखर तिवारी; प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-2]
 
--- --- नारायण प्रसाद

On Oct 30, 4:34 pm, "sanjay kareer" <s.kar...@gmail.com> wrote:
> On 10/30/07, Anunad Singh <anu...@gmail.com > wrote:
>
>Subject: Re: [technical-hindi] Re: स्वागत
>
> > जहाँ तक सरलता का सवाल है, आपको पता होगा कि अंग्रेजी में 'सिम्पल
> > इंग्लिश' और 'प्लेन इंग्लिश'  के प्रयोग का आन्दोलन  चलाने वालों  ने
> > दावा किया है कि
>
> अनुनाद जी
>
> मुझे पूरा विश्वास है कि आप इस बारे में पहले से जानते होंगे कि अब से कोई सौ
> साल पहले The Simplified Spelling Society (SSS) का गठन हुआ था और वे
> इंग्लिश में मौजूद बेतुकेपन को खत्‍म करने के लिए निरंतर आंदोलन चला रहे हैं.
>
> आ‍क्‍सफर्ड के शब्‍दकोश में निरंतर दूसरी भाषाओं के शब्‍दों का समावेश किया जा
> रहा है क्‍योंकि वे इंग्लिश को सहज, सरल, और प्रभावी बनाना चाहते हैं. हिंदी
> के शब्‍दों बंद, लूट, ठग, कड़ी, यार, दाल आदि का इस्‍तेमाल अंग्रेजी में इसीलिए
> समाहित किया गया  है कि ये सहज संप्रेषण में सक्षम हैं. यही भाषा (या लिपि) के
> विकास का प्राकृतिक सिद्धांत होना चाहिए.
>
> यदि हिंदी में हमारे पास सरल और सहज शब्‍दावली नहीं है तो साहेबान जबर्दस्‍ती
> गढ़े गए शब्‍दों का भंडार बनाने का कोई औचित्‍य नही. यदि यह बहस केवल सरकारी
> अभिलेखों में इस्‍तेमाल होने वाली उस हिंदी के बारे में है जिसका आम आदमी से
> कोई लेना देना नहीं, तो फिर यह भी निरर्थक है.  मैं फीडबैक को सही समझ सकता हूं
> न कि इसके  पुनर्निवेश जैसे गढ़े गए अर्थों को.
>
> मैं यह भी जानना चाहूंगा कि कार, कैमरा, फ्रिज, टीवी, सीडी, आदि जैसे शब्‍दों
> का रोजमर्रा के बोलचाल में (और अन्‍य माध्‍यमों में भी) इस्‍तेमाल इतने व्‍यापक
> पैमाने पर क्‍यों हो रहा है और तकनीकी हिंदी  इनके लिए कौन से गढ़े हुए शब्‍द
> बना चुकी है?
>
> आम बोलचाल में संगणक शब्‍द का इस्‍तेमाल क्‍यों नहीं किया जाता?

Ravishankar Shrivastava

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Oct 31, 2007, 1:34:39 AM10/31/07
to technic...@googlegroups.com
narayan prasad wrote:
> पारिभाषिक (तकनीकी) शब्द चाहे किसी भी भाषा के हों, न सरल होते हैं, न सबकी
> समझ में आने लायक और न ही प्रचलित ।

जी हाँ, और इसी कारण से हमने 'सरकारी हिन्दी तकनीकी शब्दावली' को 'हिन्दी लिनक्स'
अनुवाद करते समय कूड़ेदान में डाल दिया था. वो न तो समझने लायक हैं और न ही प्रचलित!
और इसी कारण से उनका उपयोग नहीं के बराबर ही होता है. और, किसी ने सर्वोच्च
न्यायालय में रिट लगाई कि सरकारी तकनीकी शब्दावली का प्रयोग किया जाना चाहिए.
न्यायालय ने भी निर्णय दे दिया है कि होना चाहिए. अब यदि भारतीय जनता उसका
इस्तेमाल नहीं करती है तो वो तो न्यायालय की अवमानना हुई? किसी दिन जेल जाने को
तैयार रहिए - सरकारी तकनीकी शब्दों के इस्तेमाल नहीं करने के एवज में!
रवि

Hariram

unread,
Oct 31, 2007, 2:36:35 AM10/31/07
to technic...@googlegroups.com
 
रवि जी, लिनक्स के स्थानीयकरण का उद्देश्य आम जनता के उपयोग के लिए है, अतः वहाँ सरलता जरूरी थी, अतः आपने सही किया। किन्तु यदि किसी चिप या मेनबोर्ड के सर्किट डेवलपर के लिए टेक्निकल गाइड बनाना होता तो आपको सटीक-अर्थ देनेवाले शब्दों का ही प्रयोग करना पड़ता, चाहे वे कितने ही क्लिष्ट क्यों न हो। 
 
संसार में जो कुछ हो रहा है, वह जनता-जनार्द्दन के लिए ही है। लोकतन्त्र "प्रजा के लिए प्रजा के द्वारा प्रजा पर" के सिद्धान्त पर आधारित है। संस्कृत भाषा सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी क्लिष्टता के कारण अधिकांश जनता / आम जनता के प्रयोग की भाषा नहीं बन पाई। बहुत कम लोग वाल्मीकि रामायण पढ़ पाते हैं। जबकि हर घर में गली गली में तुलसीदास की 'रामचरित मानस' के पाठ, पारायण होते हैं। समस्त वैज्ञानिक अनुसन्धानों का उद्देश्य भी तो आम जनता के लिए कुछ सरलता/सुविधा देना होता है।
 
स्वस्थ जीवन के लिए सन्तुलित आहार जरूरी होता है। केवल विटामिन (टेबलेट) ही खाकर कोई जीवित रह सकता है क्या? उलटे पेचिश से लेकर अनेक रोग हो जाएँगे? साहित्य में भी यदि 'केशवदास' के श्लेष अलंकार से परिपूर्ण काव्य ही रचे जाएँ तो कितने लोग उसका सही अर्थ लगा पाएँगे, कितने उसका अनर्थ?
 
अतः स्वस्थ भाषा या समाज के लिए सन्तुलन आवश्यक है। पारिभाषिक शब्दावली में क्लिष्ट शब्दों को तभी शामिल किया जाना चाहिए, जबकि आम बोलचाल की भाषा में उसका कोई सार्थक सटीक अर्थ देनावाला शब्द उपलब्ध न हो।
 
यदि रोटी इतनी कठोर बनाई जाए, कि खानेवाले के दाँत ही टूट जाएँ तो कौन खाएगा? शायद दीमक ही धीरे धीरे खुरच खुरच कर खत्म करेंगी एक दिन!
 
आजकल वैज्ञानिक हों या विद्वान हों प्रयोगशालाओं में आविष्कार करके जो नया उत्पाद बनाते हैं, उन पर उपयोगकर्ताओं की पूरी फीडबैक संग्रह की जाती है, और तदनुसार उत्पाद को सुधारा जाता है, तभी वह उत्पाद बाजार में लोकप्रिय हो पाता है। यदि उपयोक्ता-अनुकूल नहीं हुआ तो मर-खप जाता है।
 
लेकिन तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली के उपयोगकर्ता भी प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और वैज्ञानिक होते हैं, आम जनता नहीं, यदि उनकी फीडबैक सही है, उनके अनुकूल है तो क्लिष्टता को भी सही ही माना जाएगा। लेकिन दुःख की बात है कि चार-पाँच वैज्ञानिक/विशेषज्ञ बैठकर पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण कर लेते हैं। उसी को बिना उपयोगकर्ताओं के किसी फीडबैक/सुधार के 'मान्यता' देकर छाप दिया जाता है और सब पर थोप दिया जाता है।
 
ऐसी ही समस्या तो ISCII और Indic Unicode मानकों के निर्धारण में हुई है, आम उपयोक्ताओं की फीडैबैक/सुधार के बिना ये क्लिष्ट हो गए हैं और अनेक कम्प्यूटिंग अनुप्रयोग भारतीय भाषाओं में सरलता से नहीं हो पा रहे हैं।
 
ऐसी शब्दावलियाँ न तो इण्टरनेट पर उपलब्ध कराई जा पा रही हैं, न ही इनमें सुधार की कोई गुंजाईश छोड़ी गई है। इन शब्दावलियों के संग्रह, निर्धारण, मुद्रण में लाखों/करोड़ों का खर्च हुआ होगा, इनकी प्रतियाँ भी बहुत कम बिकी होंगी। काफी मंहगी भी होंगी। इनके भण्डारण तथा रख-रखाव पर खर्च अलग से बैठ रहा होगा। इस खर्च की कुछ भरपाई हुए बिना यदि वेबसाइट पर निःशुल्क उपलब्ध करा दिया गया तो फिर उन्हें खरीदेगा ही कौन? सभी डाउनलोड करके कॉपी कर लेंगे न? ये प्राचीन लेटरप्रेस में या किसी पुराने फोंट में मुद्रित हुई होंगी, जिन्हें इण्टरनेट पर उपलब्ध कराने में फिर से डैटा-एण्ट्री, फिर से प्रूफ रीडिंग, फिर डैटाबेस प्रबन्धन करके डालना होगा, (जिसमें हिन्दी में अभी काफी समस्याएँ हैं), इसमें भी भारी लागत तो आएगी ही ना?
 
'पारिभाषिक' का उद्देश्य ही यही है कि अर्थ के अनेक प्रचलित पर्यायवाची शब्दों में से किसी एक को 'मानक' माना जाए एवं उस विषय से सम्बन्धित तकनीकी आलेखों में सभी लोग उसी 'मानकीकृत' या 'परिभाषित' शब्द का ही प्रयोग करें, ताकि एकरूपता बनी रहे।
 
अतः सरलता और क्लिष्टता के बीच सन्तुलन आवश्यक है।
 
100 में से 99 करोड़ जनता उन क्लिष्ट परिभाषिक शब्दों का उपयोग नहीं करती है, न ही करेगी, चाहे न्यायालय सबको कारागार में डाल दे। इतनी सारी, इतनी बड़ी जेल ही कहाँ होगी? वैसे दूसरी दृष्टि से देखें तो आज सारा भारत, या यों कहें कि सारी धरती ही 'जेल' जैसी बन गई है। जहाँ हर कोई कष्ट या सजा भुगतने जैसा ही तो जी रहा है।
 
हरिराम 
 
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