रवि जी, लिनक्स के स्थानीयकरण का उद्देश्य आम जनता के उपयोग के लिए है, अतः वहाँ सरलता जरूरी थी, अतः आपने सही किया। किन्तु यदि किसी चिप या मेनबोर्ड के सर्किट डेवलपर के लिए टेक्निकल गाइड बनाना होता तो आपको सटीक-अर्थ देनेवाले शब्दों का ही प्रयोग करना पड़ता, चाहे वे कितने ही क्लिष्ट क्यों न हो।
संसार में जो कुछ हो रहा है, वह जनता-जनार्द्दन के लिए ही है। लोकतन्त्र "प्रजा के लिए प्रजा के द्वारा प्रजा पर" के सिद्धान्त पर आधारित है। संस्कृत भाषा सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी क्लिष्टता के कारण अधिकांश जनता / आम जनता के प्रयोग की भाषा नहीं बन पाई। बहुत कम लोग वाल्मीकि रामायण पढ़ पाते हैं। जबकि हर घर में गली गली में तुलसीदास की 'रामचरित मानस' के पाठ, पारायण होते हैं। समस्त वैज्ञानिक अनुसन्धानों का उद्देश्य भी तो आम जनता के लिए कुछ सरलता/सुविधा देना होता है।
स्वस्थ जीवन के लिए सन्तुलित आहार जरूरी होता है। केवल विटामिन (टेबलेट) ही खाकर कोई जीवित रह सकता है क्या? उलटे पेचिश से लेकर अनेक रोग हो जाएँगे? साहित्य में भी यदि 'केशवदास' के श्लेष अलंकार से परिपूर्ण काव्य ही रचे जाएँ तो कितने लोग उसका सही अर्थ लगा पाएँगे, कितने उसका अनर्थ?
अतः स्वस्थ भाषा या समाज के लिए सन्तुलन आवश्यक है। पारिभाषिक शब्दावली में क्लिष्ट शब्दों को तभी शामिल किया जाना चाहिए, जबकि आम बोलचाल की भाषा में उसका कोई सार्थक सटीक अर्थ देनावाला शब्द उपलब्ध न हो।
यदि रोटी इतनी कठोर बनाई जाए, कि खानेवाले के दाँत ही टूट जाएँ तो कौन खाएगा? शायद दीमक ही धीरे धीरे खुरच खुरच कर खत्म करेंगी एक दिन!
आजकल वैज्ञानिक हों या विद्वान हों प्रयोगशालाओं में आविष्कार करके जो नया उत्पाद बनाते हैं, उन पर उपयोगकर्ताओं की पूरी फीडबैक संग्रह की जाती है, और तदनुसार उत्पाद को सुधारा जाता है, तभी वह उत्पाद बाजार में लोकप्रिय हो पाता है। यदि उपयोक्ता-अनुकूल नहीं हुआ तो मर-खप जाता है।
लेकिन तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली के उपयोगकर्ता भी प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और वैज्ञानिक होते हैं, आम जनता नहीं, यदि उनकी फीडबैक सही है, उनके अनुकूल है तो क्लिष्टता को भी सही ही माना जाएगा। लेकिन दुःख की बात है कि चार-पाँच वैज्ञानिक/विशेषज्ञ बैठकर पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण कर लेते हैं। उसी को बिना उपयोगकर्ताओं के किसी फीडबैक/सुधार के 'मान्यता' देकर छाप दिया जाता है और सब पर थोप दिया जाता है।
ऐसी ही समस्या तो ISCII और Indic Unicode मानकों के निर्धारण में हुई है, आम उपयोक्ताओं की फीडैबैक/सुधार के बिना ये क्लिष्ट हो गए हैं और अनेक कम्प्यूटिंग अनुप्रयोग भारतीय भाषाओं में सरलता से नहीं हो पा रहे हैं।
ऐसी शब्दावलियाँ न तो इण्टरनेट पर उपलब्ध कराई जा पा रही हैं, न ही इनमें सुधार की कोई गुंजाईश छोड़ी गई है। इन शब्दावलियों के संग्रह, निर्धारण, मुद्रण में लाखों/करोड़ों का खर्च हुआ होगा, इनकी प्रतियाँ भी बहुत कम बिकी होंगी। काफी मंहगी भी होंगी। इनके भण्डारण तथा रख-रखाव पर खर्च अलग से बैठ रहा होगा। इस खर्च की कुछ भरपाई हुए बिना यदि वेबसाइट पर निःशुल्क उपलब्ध करा दिया गया तो फिर उन्हें खरीदेगा ही कौन? सभी डाउनलोड करके कॉपी कर लेंगे न? ये प्राचीन लेटरप्रेस में या किसी पुराने फोंट में मुद्रित हुई होंगी, जिन्हें इण्टरनेट पर उपलब्ध कराने में फिर से डैटा-एण्ट्री, फिर से प्रूफ रीडिंग, फिर डैटाबेस प्रबन्धन करके डालना होगा, (जिसमें हिन्दी में अभी काफी समस्याएँ हैं), इसमें भी भारी लागत तो आएगी ही ना?
'पारिभाषिक' का उद्देश्य ही यही है कि अर्थ के अनेक प्रचलित पर्यायवाची शब्दों में से किसी एक को 'मानक' माना जाए एवं उस विषय से सम्बन्धित तकनीकी आलेखों में सभी लोग उसी 'मानकीकृत' या 'परिभाषित' शब्द का ही प्रयोग करें, ताकि एकरूपता बनी रहे।
अतः सरलता और क्लिष्टता के बीच सन्तुलन आवश्यक है।
100 में से 99 करोड़ जनता उन क्लिष्ट परिभाषिक शब्दों का उपयोग नहीं करती है, न ही करेगी, चाहे न्यायालय सबको कारागार में डाल दे। इतनी सारी, इतनी बड़ी जेल ही कहाँ होगी? वैसे दूसरी दृष्टि से देखें तो आज सारा भारत, या यों कहें कि सारी धरती ही 'जेल' जैसी बन गई है। जहाँ हर कोई कष्ट या सजा भुगतने जैसा ही तो जी रहा है।
हरिराम