Regards
Dinesh Kumar Mali
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स्त्री-पुरुष स बन्धों के ऊहापोह में से जन्मी कहानियां
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अलका सैनी की छिटपुट दो-चार कहानियों को छोडक़र एक ही
स्थान पर जमा कहानियों को पढऩे का यह मेरा पहला ही अवसर
है। और फिर इन पर भूमिका जैसा कुछ भी मुझे लिखना है। लगभग
तीन बैठकों में पढ़ीं सभी कहानियों पर त्वरित टिप्पणी के रूप मे
ं कहूँ कि यह कहानियां स्त्री-पुरुष स बन्धों की ऊहापोह में से
जन्मी कहानियां हैं- घोर व्यक्तिगत, पर सामाजिक वर्जनाओं पर
आक्षेप करतीं, एकदम नये ट्रीटमैंट के साथ। स भव है पाठकों को
इन कहानियों में विषय-बोध के सन्दर्भ में अत्याधुनिक न होने का
किंचित आभास मिले पर अलका सैनी अपनी इन कहानियों में कथ्यात्मक
बानगी को कहीं भी शिथिल नहीं होने देतीं। और कथा तेज़ी के
साथ हर पगबाधा पार कर जाती है और लक्ष्य को छूने लगती है।
लाक्षागृह, समर्पण, राम की अग्रि परीक्षा और वजूद जैसी कहानियां
यथार्थवाद में संस्कारित कहानियां हैं-पुरुष की अमानवीय हो रही
व्यवहारिकता के प्रति बोल्ड होतीं, स्त्री विमर्श की ताबड़तोड़
उपेक्षा करतीं। लेखिका की प्रत्येक नायिका के लिए कुछ भी असत्य
नहीं और न ही वह भ्रम के कुहासे में अपनी अस्मिता को दाँव पर
लगाने का रिस्क उठाना चाहतीं है, कम से कम दूसरी या तीसरी बार
तो नहीं। संग्रह की अधिकतर कहानियां पाठकों को न्योता भी
देती हैं और पढऩे पर उद्वेलित भी करती हैं। नि:सन्देह यह क
हानियां सीधे-असीधे तौर पर लेखिका के तल्ख अहसासों का प्रतिफ
लन हैं जो बहुत बार स्वाभाविक विवशता के बाहुपाश में जकड़े
दिखाई देते हैं।
एक विशेष बात ! कि अलका सैनी अपनी कहानियों में सीधे-असीधे
बीमार की नब्ज़ पकडक़र पूरी मजऱ् का खुलासा भी करती हैं जिससे
अपनी जड़ों से कटे व्यक्ति की उठा-पटक कई विशिष्ट संवादों को
जन्म देती हैं और सवालों के जंगल में भटकाती हैं। जब ऐसा कुछ
होता है तो कहानियां पूर्णरूपेण सफलता का दर्जा पा लेती हैं-
यही रचनाकार की सफलता होती है और पाठक को उसका ‘
अपेक्षित’।