आपको यह भ्रम कैसे हो गया कि मैं यूनिकोड की अपेक्षा कृष्णा के प्रयोग को वरीयता देती या पसंद करती हूँ।
मेरे पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के लिए लेखक जाने कहाँ कहाँ के कौन कौन से फॉन्ट में सामग्री भेजते हैं, उन्हें समझाएँ तो भी समझते नहीं और उन्हें बताया जाए कि मैं उस सामग्री को देख नहीं सकती क्योंकि केवल आपके कंप्यूटर में उस फॉन्ट के कारण आप ही देख पा रहे हैं, सब संसार नहीं, तो अधिक से अधिक वे यह करते हैं कि साथ में फॉन्ट भी भेज देते हैं। बहुधा मैं ऐसे लोगों की सामग्री प्रयोग ही नहीं करती। किन्तु कुछ इतने आयुवृद्ध होते हैं कि उन्हें समझा पाना सरल नहीं और न उनकी सामग्री को उनके प्रति सम्मान के चलते फेंक पाना संभव होता है। ऐसे में उस पर मगज़मारी करनी पड़ती है।
मगज़मारी यूनिकोड वालों पर भी करनी पड़ती है क्योंकि लिपि में ऐसा अनाचार हिन्दी में है कि चन्द्रबिन्दु उड़ा देना तो सबसे कम साधारण बात है।
इन सब चीजों को सही किए बिना मैं अपनी किसी नेटपत्रिका/ साईट में सामग्री प्रकाशित करने का जोखिम नहीं उठाती।
...... इसलिए ये सब द्रविड़प्राणायाम करने पड़ते हैं, कर रही हूँ। न कि इसलिए कि यूनिकोड को वरीयता नहीं देती या उसकी अपेक्षा कुछ और प्रयोग करना चाहती हूँ।
आशा है अब आपको दोनों फॉन्ट्स में उदाहरण देने वाली बात अनावश्यक प्रतीत हो गई होगी।
धन्यवाद