जी हाँ, सही कहा कि "कई जगह मूल भाषायी उच्चारण बताने के लिये नुक्ता आवश्यक है।"
यह वास्तव में पढ़े-लिखे टाइप और अनपढ़-ग्रामीण टाइप का अन्तर हो जाता है।
अनपढ़-ग्रामीण व्यक्ति किसी भी वर्ण का कैसे भी उच्चारण कर लेगा, उसका उद्देश्य उसके
विचार को अभिव्यक्त करना भर होता है,
और देखा जाए तो अनपढ़-ग्रामीण या शब्द के शुद्ध रूप या वाक्य की संरचना की भी परवाह
नहीं करते हैं, वो बस कोई भी स्लैंग या देशज शब्द या अंग्रेज़ी शब्दों का भी गाँव-करण (जैसे
influence का इनफुलैन्स) करके उच्चारण कर देते हैं, या वर्ब (verb) को अपने हिसाब से
तोड़ मरोड़ लेते हैं (जैसे "होना है" की जगह "होइबै करी"), या वाक्य को किसी भी तरह से
बना लेते हैं।
उनकी बात व्यक्त तो हो जाती है, लेकिन सुनते ही हमें पता चल जाता है कि वो
अनपढ़-ग्रामीण व्यक्ति है।
जबकि पढ़ा-लिखा शुद्ध रूपों का प्रयोग करता है और नियमों का पालन करता है।
इसलिए अगर हम जानते-बूझते हुए भी, जबरन नुक़्ता हटा कर ग़लत प्रयोग करते हैं, तो सुनने
वाले को यही लगेगा कि यह अनपढ़-ग्रामीण व्यक्ति है।
यही मुख्य वजह है जो मुझे नुक़्ता युक्त यथासम्भव सही उच्चारण को अपनाने के लिए प्रेरित
करती है, भले ही यह अधिक जटिल हो।
जटिल है इसीलिए तो इसका इस्तेमाल करने के लिए अधिक प्रयास और बुद्धि लगती है।
वरना तो मूक-बधिर लोग तो बिना वाक-भाषा के ही साइन लैंन्वेज से भी अपना काम चला लेते हैं।
हिन्दी और इसके स्थानीय वर्जनों जैसे भोजपुरी या निमाड़ी में जो अन्तर है,
वही अन्तर नुक़्ता वाले शुद्ध उच्चारण और बिना नुक़्ते वाले अशुद्ध या लोकलाइज़्ड उच्चारण में हे।
नुक़्ते का सही इस्तेमाल न करना, हिन्दी को मूल भाषा का कोई स्थानीय या गँवारू रूपान्तरण
बना देता है।
अगर आप जानते हैं कि नुक़्ता क्या है, कहाँ लगता है, तो आप उस नुक़्ते वाले वर्ण और शब्द का
सही नुक़्ता-युक्त उच्चारण क्यों नहीं करते हैं?
आपको समस्या क्या है आख़िर?
क्या आपको पता ही नहीं है कि नुक़्ता क्या होते है?
क्या आपसे इसका उच्चारण करते नहीं बनता?
क्या आप भ्रमित हो जाते हैं?
यदि नहीं, तो फिर क्या कारण है?
क्या यह वजह हो सकती है कि यह अरबी से आया, जो मुस्लिमों आदि की भाषा है जिनसे आपका
धार्मिक विरोध है इसलिए आप उनकी भाषा भी नहीं अपनाना चाहते हैं?
तो फिर ध्यान दीजिए कि अरबी का हिन्दीकरण करने के लिए ही उर्दू भाषा को गढ़ा गया
था। कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं, इस उर्दू भाषा का मूल से आरम्भ ही हिन्दी के वर्णों को
अरबी भाषा से मिलान करने के लिए किया गया था।
मतलब कि अरबी वालों ने तो एक पूरी भाषा बना डाली कि भारत की भाषा और उनकी अरबी
भाषा के बीच पुल बने।
और भाई लोग एक रेती के दाने भर नुक़्ते का विरोध करके अपना जीवन सफल मान रहे हैं।
जब हिन्दी का कोई शब्द (जैसे गुरु, योग, बन्द आदि) को अंग्रेज़ी में शामिल किया जाता है,
तब हम हिन्दी वालों को ख़ुशी होती है।
लेकिन हम किसी और भाषा से कुछ भी लेने को तैयार नहीं हैं।
धन्यवाद।
रावत।
On 10/31/2015 7:17 AM, ePandit | ई-पण्डित wrote:
> नुक्ता कई बार अपरिहार्य भी हो सकता है। उदाहरण के लिये अमेरिकन अंग्रेजी के जी (G) और
> ज़ी (Z) को देवनागरी में लिखने पर बिना नुक्ते उनका भेद न हो सकेगा।
>
> मेरे विचार से सामान्य हिन्दी में व्यक्ति चाहे जैसा मर्जी लिखे लेकिन किसी शब्दकोश,
> व्याकरण या भाषा-विज्ञान की पुस्तक में नुक्ते का प्रयोग अवश्य होना चाहिये। हिन्दी भाषा
> की विशेषता इसकी ध्वन्यात्मकता है, इसलिये कई जगह मूल भाषायी उच्चारण बताने के लिये
> नुक्ता आवश्यक है। कई मामलों में नुक्ता लगाना भी उचित है और न लगाना भी। उदाहरण के
> लिये *ख़ान* का उच्चारण हिन्दी पट्टी में *खान* ही प्रचलित है, इसलिये सामान्य तौर पर
> इसे बिना नुक्ते के ही लिखना भी देशज उच्चारण अनुसार सही माना जायगा। हालाँकि किसी
> पाठ्यपुस्तक आदि में ख़ान को खान (mine) से अलग बताने के लिये नुक्ता जरूरी होगा।
>
> जिन अंग्रेजी/अरबी/उर्दू मूल के शब्दों का हिन्दी में उच्चारण बिना नुक्ते वाला देसी हो गया
> है, उन्हें बिना नुक्ते भी लिखना सही है लेकिन जिनका मूल उच्चारण ही कायम है, वहाँ नुक्ता
> अवश्य लगाना चाहिये। साथ ही किसी पाठ्यपुस्तक में छात्रों को मूल शुद्ध उच्चारण से परिचित
> कराने हेतु भी नुक्ता अवश्य लगाना चाहिये।
>
> 29 अक्तूबर 2015 को 11:43 am को, Vinod Sharma <
vinodj...@gmail.com
> <mailto:
vinodj...@gmail.com>> ने लिखा:
>
> बंधुओ,
> मेरा विनम्र निवेदन है कि हिंदी भाषा में नुक्ते का कोई प्रावधान नहीं होता है।
> हमारी भाषा की परंपरा विदेशी शब्दों को आत्मसात करने की है। अर्थात हमारी भाषा
> में आने पर वह हिंदी का ही बन जाता है। उसके साथ हिंदी के अन्य शब्दों जैसा ही
> व्यवहार किया जाता है। अतः किसी आगत शब्द पर विदेशी भाषा के नियमों को लागू
> करना व्यावहारिक भी नहीं है और उचित भी नहीं है। कुछ पुराने लेखक जिन्हें उर्दू का भी
> ज्ञान था, इन नुक्ता युक्त अक्षरों का उपयोग करते रहे हैं। भावी पीढ़ियों के लिए हम
> क्यों अनावश्यक झंझट देकर जाना चाहते हैं।
> नुक्ता लगे हुए अक्षर का उच्चारण भिन्न होता है। हिंदी भाषा से लगभग 50 साल से जुडे
> होने के बावजूद मैं क और क़, ख और ख़, ग और ग़, ज और ज़ के उच्चारणों में अंतर नहीं सीख
> पाया हूँ। हाँ केवल फ और फ़ के उच्चारण में भेद पता है क्योंकि यह भेद अंग्रेजी के एफ और
> हिंदी के फ में मौजूद है।
> मेरी राय में नुक्ते पर ऊर्जा का व्यय निरर्थक है।
>
> 2015-10-29 9:52 GMT+05:30 V S Rawat <
vsr...@gmail.com
> <mailto:
vsr...@gmail.com>>:
> <mailto:
technical-hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>
> <mailto:
technical-hin...@googlegroups.com
> <mailto:
technical-hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>> को
> ईमेल भेजें.
> अधिक विकल्पों के लिए,
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>
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