"मेरा विश्वास युवा पीढ़ी पर- आधुनिक पीढ़ी पर है।
उन्ही में से मेरे कार्यकर्ता निकल कर आगे आयेंगे और सिंह के समान
विश्व की सारी समस्यओं को सुलझा देंगे।"
विश्व की सारी समस्याएँ सुलझाने की क्षमता युवाओं में है ऐसा अदम्य
विश्वास रखने वाला युवा सन्यासी, वह विश्वास कार्यान्वित करने
हेतु कार्यकर्ता निर्माण की- संगठन की क्रांतिकारी योजना बनाने वाला
योद्धा सन्यासी, अपने 39 वर्ष के जीवन काल से इस भारत वर्ष के युवा
पीढ़ी के लिए 1500 वर्षों तक चले ऐसी कार्य योजना देनेवाला यह द्रष्टा
सन्यासी, भारत माँ को फिर से संपन्न समृद्ध करने के प्रस्तुत कार्य
के लिए अपना पूरा जीवन लगाने वाला राष्ट्रभक्त सन्यासी - स्वामी
विवेकानंद ! युवाओं के प्रेरणा स्थान स्वामी विवेकानंद!
1897 में स्वामीजी ने कहा था "आनेवाले 50 वर्ष बाकी सारे देवी
देवताओं को छोड़ केवल एक ही देवता की पूजा करो - भारत माँ की।" वे
कहते थे, “मै तुम से बहुत प्रेम करता हूँ इसलिए चाहता हूँ कि तुम
भारत माँ के लिए अपना जीवन बलिदान करो । मैं उस प्रत्येक
को देशद्रोही समझता हूँ जो अपने देशवासियों के कष्ट पर शिक्षित हुआ
और उनकी और जरा भी ध्यान नहीं देता ।"
जब कभी दुर्बल युवा उनके पास आकर गीता उपनिषद् की बात करता तो
स्वामीजी कहते - ''गीता के सन्देश को समझना चाहते हो तो जाओ - मैदान
में जाकर फुटबॉल खेलो। (अर्जुन जैसे) मजबूत भुजाएँ होगी तभी तुम गीता
का सन्देश समझने के योग्य होंगे। (You will understand Geeta better
with your muscles stronger.)
स्वामीजी को लगता था की प्रत्येक युवा के सामने महावीर हनुमान का
आदर्श हो। वे सोचते थे कुछ तो युवा बचे शादी के बंधन से और अपना
जीवन दूसरों की सेवा में व्यतीत करे। वह कहते थे-“ की वही केवल जीते
है जो दूसरों के लिए जीते है। बाकी सारे मृतवत ही हैं ।“
1901 में एक युवा हेमचन्द्र घोष ने ढाका में स्वामी जी से धर्म के
बारे में चर्चा करनी चाहि। स्वामी विवेकानंद ने केवल एक वाक्य कहा और
हेमचन्द्र घोष को अपने जीवन ध्येय का साक्षात्कार हुआ। स्वामी जी ने
कहा था - "गुलाम का कोई धर्म नहीं होता है। जाओ अपनी माँ को पहले
स्वतंत्र करो।" स्वामी विवेकानंद का उत्तर उसे चुभ गया और प्रखर
क्रन्तिकारी के रूप में वह उभर कर आया ।
जतिन मुखर्जी स्वामी अखंडानंद और भगिनी निवेदिता के माध्यम से स्वामी
विवेकानंद के पास सन्यास लेने की अपेक्षा से गए थे। स्वामी जी ने
उन्हें क्रान्ति कार्य में सक्रिय होने की प्रेरणा दी और फिर
उसने बाघा जतिन नाम से अंग्रेजों की नींद हराम की ।
एक 13 -14 वर्ष के किशोर ने विवेकानंद युवा मंडल बनाया; अपने दोस्तों
के साथ मिलकर स्वामी जी के व्याख्यानों को पढ़ना शुरू किया। बड़ा होकर
ICS (Indian Civil Services) उत्तीर्ण कर के भी अंग्रेजों की गुलामी
अस्वीकार कर भारत माँ के लिए उस सुभाष चंद्र बासु ने अपना जीवन लगा
दिया। आजाद हिन्द सेना के माध्यम से भारत माँ को स्वतंत्र करने का
महत प्रयास अदम्य साहस से किया।
उस समय आवश्यकता थी तो अनेकों युवाओं ने देश के लिए अपना जीवन दिया।
क्या हमारे पूर्वजों ने युवा आयु में अपना रक्त भारत को स्वतंत्र
करने के लिए इसलिए बहाया की हम केवल उसका उपभोग करे? स्वामी
विवेकानंद कहते थे - "हमारे पूर्वजों ने महान कार्य किया है हमें और
भी महान कार्य करना है।"
आज की स्थिति क्या है? आज का युवा क्या सोच रहा है?
आज हम युवाओं को सोचना है - मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या रखा
है मेरे नाम से कार्य जो मुझे कराना ही है जिससे मै मनुष्य हूँ यह
सिद्ध होगा। स्वयं का पेट पालना और परिवार बढ़ाना, परिवार के
सुख-सुविधाओं की व्यवस्था करना ये तो घोंसला बनाने वाली प्रत्येक
चिड़ियाँ करती ही है। ऐशोआराम का आनंदोपभोग कीचड़ में मस्त रहकर सूअर
भी तो लेता ही है। यदि मै भी केवल अपने परिवार और सुख-सुविधाओं की
चिंता करता हूँ तो मुझमें और चिड़ियाँ में, मुझमें और सूअर में अंतर
ही क्या?
स्वामी जी काली माँ से प्रार्थना करते थे - "माँ, मुझे मनुष्य बना
दो" "मनुष्य केवल मनुष्य भर ही चाहिए। शक्तिसंपन्न, धैर्यवान, साहसी
जो सागर को भी लांघने की क्षमता रखता हो ऐसे मनुष्य चाहिए"। वे कहते
थे - "सारी शक्ति हमारे भीतर ही है। हम जैसा सोचे वैसा बन सकते
हैं । आवश्यकता है अपने अन्दर के ईश्वरत्व को जगाने की।"
जो कहते है "आज का युवा बिगड़ा हुआ है, बर्बाद हो रहा है " समझ लेना
वह व्यक्ति बूढ़ा हो गया। प्रत्येक पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को
बिगड़ैल समझती है लेकिन सच तो यह है की प्रत्येक नई पीढ़ी के सामने अलग
अलग माहौल और अलग आह्वान होते हैं।
मुझे सोचना है, मै युवा हूँ इसका अर्थ क्या? क्या मेरी आयु 18 - 40
वर्ष की है इसलिए? क्या मै महाविद्यालय में पढ़ रहा हूँ इसलिए या
नौकरी की खोज में हूँ इसलिए? क्या मैं ताकदवर हूँ और अपनी मस्ती में
रहता हूँ इसलिए युवा हूँ?
युवा होने के मापदंड क्या है ?
युवा वह है जो भविष्य के स्वप्न देखता है और उन स्वप्नों को साकार
करने के लिए काम करता है।
युवा वह है जो अंधेरों में भी कूदने का साहस रखता है।
युवा वह है जो आह्वानों से डरता भागता नहीं बल्कि उन्हें स्विकारने
में तत्पर रहता है।
युवा वह है जो अपने अस्तित्व से आसपास के लोगों का विश्वास बढ़ता है।
युवा वह है जो बुजुर्गों का आधार बनता है।
युवा वह है जो बिना हिसाब किये राष्ट्र के लिए स्वयं को झोंक देता
है।
युवा वह है जो किसी उद्देश्य के लिए कुछ
सकारात्मक-आह्वानात्मक- सृजनात्मक करने के लिए स्वयं को लगाता है।
एक युवा राजकुमार अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढने के लिए राजपाट,
पत्नी और बेटे को छोड़ निर्वाण की खोज में वन में जाता है तो अनेकों
के जीवन में प्रकाश आता है।
एक युवा राजकुमार युवराज्यभिषेक छोड़ भाई और पत्नी के साथ वनवास में
जाता है तो अनेकों वनवासियों के जीवन क्षितिज पर सूर्योदय होता है।
अन्यायी रावण से पृथ्वी माता मुक्त होती है।
एक युवा सन्यासी तो अपनी मुक्ति की - मोक्ष की आशा छोड़ विदेश में
जाकर भारत माँ का झंडा गौरव से लहराता है। भारतीयों का स्वयं में,
अपने पूर्वजों में, अपनी संस्कृति में विश्वास बढ़ाता है।
एक युवा क्रांन्तिकारी सुख-सुविधाओं को छोड़ भारत माँ के मुक्ति का
बेड़ा उठा अपने युवा साथियों के साथ हँसते हँसते फासी पर जाता है तो
अनेकों को राष्ट्र कार्य की प्रेरणा देता है। ब्रिटिश सिंहासन के
नीचे आग लगता है।
महान त्याग से ही महान कार्य संपन्न होते है।
आज भी अनेकों युवा ऐसे है जो कुछ करना चाहते है। प्रतिस्पर्धा की
होइ में सफलता के नाम पर अशांति, अस्वस्थता और अनारोग्य का बलि न
होकर एक ऐसा जीवन जीना चाहते है जिससे समाज का भला हो और स्वयं का भी
उत्थान हो। अपने उद्यम से - परिश्रम और बुद्धि से कुछ परिवर्तन कुछ
विकास लाना चाहते है।
स्वामी विवेकानंद को ऐसे ही युवा अपेक्षित है, जिनके स्नायु लोहे के
हो और मांसपेशियाँ फौलाद की। जिनके ह्रदय में सिंह सा साहस, नचिकेता
सी श्रद्धा और पवित्रता की आग हो। जिनके मन में ईश्वर पर निष्ठा
हो, दीन दुखियों दरिद्रियों के प्रति करुणा हो। जो भारत के कोने
कोने में जाकर मुक्ति का, समता का, सामाजिक उत्थान का, सेवा का
सन्देश देंगे। आज देश के लिए मरने की नहीं किन्तु जीने की आवश्यकता
है। अपने जीवन के कम से कम 2 वर्ष बिना कोई अपेक्षा से राष्ट्र के
लिए समर्पित करने का अनुभव प्रत्येक युवक-युवती ने लेना चाहये। आपके
योगक्षेम की- मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति की जाएगी। 2 वर्षों का यह
अनुभव बाकी जीवन को आधार और संबल देगा।
क्या आप उन एक लाख युवक-युवतियों में से एक हो? तो आईये -
स्वामी विवेकानंद के 150 वे जयंती के - सार्ध शती के शुभ अवसर पर
संकल्प करें और संपर्क करें -
g...@vkendra.org
~ अलकागौरी
जीवनव्रती, विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी समारोह प्रान्त संगठक,
पंजाब और हरियाणा
Todays-Special 9-June in Swami Vivekananda Life
9 June 1894:
Letter To Mrs. G. W. Hale
We are all doing very well here. Last night the sisters (The
daughters of Mrs. Hale: Mary and Harriet.) invited me and Mrs.
Norton and Miss Howe and Mr. Frank Howe. We had a grand dinner
and softshell crab and many other things, and a very nice time.
Miss Howe left this morning. The sisters and Mother Temple (Mrs.
James Matthews, Mr. Hale’s sister.) are taking very good care of
me. Just now I am going to see my "oh-my-dear" Gandhi.1
Narasimha was here yesterday; he wanted to go to Cincinnati
where he says he has more chances of success than anywhere else
in the world. I gave him the passage, and so I hope I have got
the white elephant out of my hands for the time being. How is
Father Pope doing now? Hope he has been much benefited by the
mudfish business. I had a very beautiful letter from Miss
Guernsey of New York, giving you her regards. I am going
downtown to buy a new pair of shoes as well as to get some
money, my purse having been made empty by Narasimha. Nothing
more to write. Yes, we went to see the "Charley's Aunt".3 I
nearly killed myself with laughing. Father Pope will enjoy it
extremely. I had never seen anything so funny.
Probably Mr. Virchand Gandhi, who represented Jainism at the
Chicago World's Parliament of Religions, in 1893.
Mr. and Mrs. Hale were staying at the mineral-springs resort in
Indiana. "Mud baths" were supposed cures for all ailments.
Charley's Aunt was a highly popular comedy of the era.
9th June, 1898. ALMORA,
Letter to Maharaja of Khetri.
Very sorry to learn that you are not in perfect health. Sure you
will be in a few days. I am starting for Kashmir on Saturday
next. I have your letter of introduction to the Resident, but
better still if you kindly drop a line to the Resident telling
him that you have already given an introduction to me. Will you
kindly ask Jagamohan to write to the Dewan of Kishangarh
reminding him of his promise to supply me with copies of
Nimbârka Bhâshya on the Vyâsa-Sutras and other Bhashyas
(commentaries) through his Pandits.
PS. Poor Goodwin is dead. Jagamohan knows him well. I want a
couple of tiger skins, if I can, to be sent to the Math as
present to two European friends. These seem to be most
gratifying presents to Westerners.
9th June 1900.
Letter to Christina
I could not write more, as the last few weeks of my stay in
California was one more relapse and great suffering. However, I
got one great benefit out of it inasmuch as I came to know I
have really no disease, except worry and fear. My kidneys are as
sound as any other healthy man's. All the symptoms of Bright's
disease etc., are only brought on by nerves. I wrote you one,
however, from 770 Oak Street, San Francisco, to which I did not
get any reply. Of course, I was bedridden then and my address
book was not in the place I was in. There was a mistake in
number. I cannot believe you did not reply willingly. As you
see, now I am in New York, and will be here a few days. I have
an invitation from Mrs. Walton of Cleveland, Ohio. I have
accepted it. She writes me you are also invited and have
accepted her invitation. Well, we will meet in Cleveland then. I
am sure to see you before I go to Europe — either there or
anywhere you wish. If you don't think it would be possible for
you to come to Ohio, I will come to any other place you want me
to come to say goodbye. When is your school going to close?
Write me all about your plans — do! Miss Noble wants me very
much to go to Cleveland. I would be very, very glad to get a few
weeks' seclusion and rest before I start with friends who do not
disturb me at all. I know I will find rest and peace that way,
and you can help me any amount in that. In Cleveland, of course,
there will be a few friends always and much talkee-talkee as a
matter of course. So if you think I will have real peace and
rest elsewhere, just write all about it. My reply to the
Cleveland lady depends on your letter. How I wish I were in
Detroit or elsewhere just now, among friends who I know are good
and true always. This is weakness; but when the physical
vitality is lowered and the nerves all unstrung, I feel so, so
much to depend upon somebody. You will be glad to learn I made a
little money in the West. So I will be quite able to pay my
expenses.
Faith