Sustanable Development: A Global Concern (Hindi Article)

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Rusen Kumar

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Jun 25, 2009, 6:57:15 AM6/25/09
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स्थायी विकास: एक वैश्विक चिंता

Sustanable Development: A Global Concern
 
       रूसेन कुमार
 

'स्थायी विकास' दुनियाभर में बुध्दिजीवियों, सरकारों, पर्याविदों, पर्या-वैज्ञानिकों, कारोबार समूहों के मधय पर्यावरणीय और आर्थिक साहित्य में चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थायी विकास के तय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर परिचर्चाओं, कार्यक्रमों परियोजनओं, सभाओं एवं सम्मेलनों का निरंतर आयोजन किया जा रहा है। निश्चित रूप से स्थायी विकास का विचार और महत्ता समकालीन दुनिया में निरंतर लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि स्थायी विकास मानव समुदाय के साथ-साथ पर्यावरण के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। विकास में अस्थिरता उस समय आती है जब प्राकृतिक संसाधनों तथा वातावरण का लंबी अवधि तक क्षय होता रहा हो। इस स्थिति में मानवीय जीवन अस्थिर हो जाएगा और वैश्विक स्तर पर सम्पूर्ण जैव तंत्र नष्ट होने की संभावना बलवती होगी। स्थायी विकास को प्राप्त करने के लिए निर्णय निर्माण में व्यापक जनभागीदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व को मूलभूत आधार माना गया है।

 

स्थायी विकास की अवधारणा

स्थायी विकास, संसाधानों के उपयोग करने का एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करता है, जिसमें पर्यावरण के संरक्षण के साथ-साथ वर्तमान मानवीय जरूरतों को पूरा करते हुए आने वाली भावी पीढ़ियों की आश्यकताओं को भी पूरा करना सुनिश्चित किया जाता है। [1]

 

बल्कि भविष्य की आवश्यकताओं, स्थिर आर्थिक विकास के साथ-साथ पारिस्थितिकीय व्यवस्था की सुरक्षा को भी महत्व देता है। [1]

 

विश्व आयोग  जो कि ग्रो हरलेन ब्रुंडलैंड की अधयक्षता में गठित हुआ था। इस आयोग द्वारा दी गई सतत विकास की परिभाषा सर्वमान्य बन गई है। यह इस प्रकार से है,-

 

'स्थायी विकास वह अवधारणा है, जिसमें भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों को पूरा करते हुए एवं उनकी क्षमताओं में किसी तरह के समझौते किए बगैर वर्तमान जरूरतों को पूरा करना ही विकास है।' [2]

 

दरअसल स्थायी विकास मानव जाति के समक्ष चुनौतियों, प्राकृतिक तथा पारिस्थितिकीय तंत्र को एक साथ लेकर चलने की चिंता है। यह वर्तमान परिस्थितियों एवं सामाजिक चुनौतियों को भी मद्देनजर रखता है। 1970 के दशक के प्रारंभकि काल में ही स्थाई विकास को एक ऐसे अर्थतंत्र को साकार करने के लिए लाया गया, जिसमें कि मूलभूत पर्यावरणीय सहयोग तंत्र कायम रहे। संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित वैश्विक शिखर सम्मेलन-2005 दस्तावेज में स्थायित्व विकास को आर्थिक विकास, सामाजिक विकास एवं पर्यावरणीय संरक्षण से पारस्परिक रूप से जोड़कर देखा गया।

 

स्थायी विकास एक अवधारणा है, जो अपने अंतर्गत विचारों एवं धारणाओं को एक विस्तृत क्षेत्र में शामिल करता है।

 

स्थायी विकास, विकासशील दुनिया को विकास की सीमा निधर्रित करने के लिए कहता है। विकसित देशों ने विकास कार्यों के दौरान बड़े स्तर पर प्रदूषण फैलाया है और वही तीसरी दुनिया के देशों को प्रदूषण कम करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जबकि वे स्वयं प्रदूषण विस्तार में बहुत बड़े कारक हैं। [3]

 

लेकिन कुछ स्वदेशी मंचों जैसे संयुक्त राष्ट्र स्वदेशी स्थाई मंच एवं जैव वैविध्य सभा के माध्यम से स्थायी विकास के निवर्तमान तीन स्तंभों पर सवाल उठाया और इसमें संस्कृति को चौथे स्तंभ के रूप में शामिल करने की वकालत की। [4]

 

संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, वैज्ञानिक, संस्कृतिक संगठन (यूनेस्को, 2001) ने इस धारणा को आगे विस्तार करते हुए यह कहा ''सांस्कृतिक वैविध्य मानव जाति के लिए ठीक उसी तरह जरूरी है जैसे कि जैव विविधता प्रकृति के लिए।''स्थायी विकास को समझने के लिए केवल आर्थिक उन्नति ही पैमाना नहीं है बल्कि स्थायी विकास में संतोषजनक बौध्दिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक अस्तित्व भी पैमाना है। इसी दर्शन को ध्यान रखकर यह कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक वैविध्यता, स्थायी विकास के योजना क्षेत्र का चौथा स्तंभ है। [5]

 

स्थायी विकास के क्षेत्र को चार सामान्य आयामों-सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और संस्थागत में विभक्त किया गया है। इनमें से प्रथम तीन आयाम स्थायीत्व के प्रमुख सिध्दांत हैं जबकि अंतिम संस्थागत नीति और क्षमता विषयों से संबंधित है।  [6]

 

शब्द उत्पत्ति: 'सस्टेनेबल'

'सस्टेनेबल डेव्लपमेंट', मूलत: दो शब्द क्रमश:: 'सस्टेनेबल' व 'डेव्लपमेंट' से मिलकर बना है। हिन्दी भाषा में सस्टेनेबल के लिए 'स्थायी', 'स्थायीत्व', 'सतत', 'समग्र', 'सम्पूर्ण, 'निरंतर' शब्द प्रचलित हैं।

 

'सस्टेनेबल' शब्द 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में यूरोपीय वन-अधिकारियों द्वारा प्राय: प्रयोग में लाया गया। इसके बाद इसका उपयोग सम्पूर्ण दुनिया में बहुताय: होने लगा।

 

18वीं एवं 19वीं शताब्दी में यूरोप में वनों को वाणिज्यिक उद्देश्यों से काटा जाने लगा था क्योंकि उस दिनों वनों से प्राप्त लकड़ी और संसाधन वहां के आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे थे। लकड़ियों का उपयोग घर बनाने, कारखानों की स्थापना, फर्नीचर एवं घरेलू सामान बनाने और इनका व्यापार बहुतायत रूप में होने लगा था। वन, आर्थिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ उपज थे।

 

लेकिन कटे हुए वनों से पुन: उपजे पेड़ यूरोपीय कंपनियों के लकड़ी की जरूरतों को हमेशा पूरा करने में सक्षम नहीं थे। वनरक्षकों, खासकर जर्मन वनरक्षकों ने इस संकट के जवाब में वैज्ञानिक, या स्थायी, वानिकी का विकास किया। इन प्रयासों से ही सस्टेनेबल की प्रासंगिकता सामने आई।

 

उस समय यह नवीन विचार बहुत ही सरल था कि काटे गए वनों के स्थान पर यदि पर्याप्त मात्रा में प्रति वर्ष पेड़ उगाए जाएं तो वनों के विकास की दर सम्पूर्ण रूप से बनी रहेगी और आधुनिक जरूरतों की निरंतर पूर्ति रहेगी। अत: मूल विचार में, स्थायीत्व का अर्थ है, उपयोग/खपत हो चुके संसाधान के स्थान पर उस संसाधान को अधिक मात्रा अथवा संख्या में पुन: उगाना/रोपित करना। आधुनिक दौर में, शब्द 'स्थायी' बहुत ही कठिन संदर्भ है क्योंकि ऐसे बहुत से संसाधान हैं, जैसे तेल या लौह अयस्क, आदि जिसे पुन: नहीं उगाया जा सकता है। [7]

 

शब्द उत्पत्ति: ''डेव्लपमेंट''

शब्द 'डेव्लपमेंट', जिसका हिंदी अभिप्राय 'विकास' है, स्थायी विकास संदर्भ में उपयोग किया जा रहा है, उसका एक अलग ही इतिहास है। शीतयुध्दा के समय, संयुक्त राष्ट्र को तीसरी दुनिया में साम्यवादी चुनौतियों का सामना करना पड़ा और उस समय यह कहा गया कि साम्यवाद अपने साथ जीवन जीने का एक नया स्तर लेकर आएगा। [7]

 

'स्थायी विकास' के संदर्भ में 'विकास' शब्द का मतलब, तीसरी दुनिया अर्थव्यवस्थाओं द्वारा विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष विकास की अवस्था हासिल करना है। इसमें समस्त मानव जाति गरीबी की पीड़ा को कम करना और गरीब देशों में पीड़ित लोगों के लिए और भी ज्यादा समानता दिलाने के कार्य शामिल हैं।

 

इसी बीच प्रमुख जर्मन अधिकारी और अर्थशास्त्री वाल्ट रोस्टोव द्वारा प्रतिस्पर्धी विचारधारा का विकास किया जिसे ''आर्थिक विकास'' की संज्ञा दी गई। राष्ट्र की संपदा का उपयोग लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए किया जाने लगा। तीसरी दुनिया में, गरीबों का इस विचार के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था क्योंकि यह विचारधारा जनता को बेहतर जीवनशैली देने हेतु समर्पित थी।

 

अत: विकास की अवधारणा में वातावरण, मानव एवं प्राकृतिक संसाधानों समुचित उपयोग किए जाने की आवश्यकता है। इस अवधारणा के अंतर्गत एक ऐसा तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें तेज गति से उपयोग किए जाने वाले पदार्थों का पुर्नउत्पादन हो। पर्यावरणविदों ने विकास की सीमाओं की चिंता व्यक्त करते हुए एक वैकल्पिक नियमित अर्थव्यवस्था निर्माण करने की वकालत करते हुए कहा कि प्रत्येक कार्यकलापों में पर्यावरण की चिंताओं को सर्वोच्च महत्व दिया जाए।

 

एजेंडा 21 और स्थायी विकास:

''एजेंडा 21''[8]] संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) स्थायी विकास से संबंधित चलाया जाने वाला एक कार्यक्रम है। ''एजेंडा 21'' एक तुलनात्मक खाका प्रस्तुत करता है, जिस पर वैश्विक, राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर सयुक्त राष्ट्र के संगठनों, सरकारों एवं प्रमुख समूहों को उन जगहों पर कार्यवाही करनी है, जहां पर भी पर्यावरण पर मानवीय प्रभाव पड़ रहे हैं। यहां संख्या 21, 21वीं सदी को प्रदर्शित है।

 

सम्मेलन में 'एजेंडा 21' का विस्तार से खुलासा किया गया और इसे स्वीकृति प्रदान करते हुए इस पर 178 राष्ट्रों ने इस कार्यक्रम के समर्थन में अपने अभिमत दिए।

 

'एजेंडा 21' यह अंतिम पाठ 1989 में एक पखवाड़े तक चले एक विशेष सम्मेलन में आए परस्पर विचार विमर्श, परामर्श और प्रारूप का परिणाम था। इस सम्मेलन में 21 मुद्दे रखे गए थे। एजेंडा 21 में, 21 संख्या इसी का सूचक है। 'एजेंडा 21' में स्थायी विकास को प्राप्त करने के लिए निर्णय निर्माण में व्यापक जनभागीदारी को मूलभूत आधार माना गया है। स्थायीत्व एक प्रक्रिया है, जिसमें मानव जीवन को प्रभावित करने वाले सभी आयामों के बारे में बताया गया है।

 

आर्थिक उन्नति, पर्यावरणीय गुणवत्ता एवं सामाजिक समानता के तीन आयामों को विख्यात रूप से ट्रीपल बाटम लाइन संबोधित किया गया। ट्रीपल बाटम लाइन केवल भविष्य की मंजिल तक पहुंचने के सिर्फ माध्यम है। हालांकि स्थायीत्व के सफर में मंजिल का सामान्य भाव में कोई निश्चित गंतव्य तय नहीं है। जिस तरह से हम सामान्य रूप से गनतव्य की परिभाषा को समझते हैं, स्थायीत्व विकास गन्तव्य में केवल भविष्य तंत्र की विशेषताओं एवं प्रारूप को शामिल करता है।

 

स्थायी विकास को तीन पृथक-पृथक भागों में विभक्त किया गया है। ये इस प्रकार से हैं:

• पर्यावरणीय स्थायित्व/ हरित विकास

• आर्थिक स्थायित्व और

• सामाजिक-राजनीतिक स्थायित्व

 

पर्यावरणीय स्थीरता

स्थायी विकास, मानवकेन्द्रित अधिक न होकर पारस्थितिकीय केंन्द्रित है। स्थायी विकास एक ऐसी व्यवस्था है, जो वर्तमान जरूरतों का पूरा करते हुए भविष्य में जमीन, जल, जंगल, जंतु और मानव जाति का निरंतर परस्पर पोषण होते रहने की वकालत करता है। इसके लिए व्यक्ति का परिवार, पड़ोंस, समाज, दुनिया, प्रकृति के साथ संतुलित तालमेल बना रहना होगा। वही तकनीक उचित अथवा सही मानी जाएगी जिसमें आर्थिक पक्ष के साथ-साथ परस्पर पारिस्थितिकीय एवं नैतिक पक्ष का भी धयान रखा जाए। जबकि मौजूदा समय में लंबी-चौड़ी सड़कों, बड़े बांधों, वृहद आकार के पुलों, और ज्यादा फसल उत्पादन विकास और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बढ़ने को ही विकास का मानदंड बताया जा रहा है, जो कि स्थायी विकास की अवधारणा से परे है।

 

एशियन-अफ्रीकन लीगल रीकंल्टेटिव आर्गनाइजेशन ( asian-africal legal reconsulative organization) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, ''अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एजेंडे में पर्यावरण एवं स्थायी विकास के मुद्दे प्राथमिकता के साथ बहुत ही ऊंचे स्थान पर है। प्राकृतिक संसाधान सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए की गई आर्थिक व सामाजिक विकास, गरीबी उन्मूलन, उत्पादन व खपत के गैर-स्थायीत्व पध्दतियों में बदलाव लाना, स्थायीत्व विकास के परम लक्ष्यों को प्राप्त करने के महत्वपूर्ण आधार हैं। आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा एक दूसरे पर गहराई से निर्भर हैं और स्थायी विकास लाने के लिए इन सभी के मध्य एक वांछनीय एवं सतत संतुलन लाना होगा। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें अधिवेशन में यह समग्र रूप से यह स्वीकार किया गया कि स्थायीत्व विकास को संयुक्त राष्ट्र की परिधि गतिविधियों में प्रमुखता से अपनाया जाना चाहिए। और यह कहा गया कि स्थायी विकास विशेषकर विकास के अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने की कुंजी है। संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी घोषणापत्र में भी इस बात को प्रमुखता से रखा गया । इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ ही साथ 'एजेंडा 21' के सुझावों को भी लागू किया जाना चाहिए  ताकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के स्थायीत्व विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। [9]

 

आर्थिक स्थीरता के लिए 'एजेंडा 21' के अंतर्गत निम्नलिखित की पहचान की गई:

        सूचना

        एकता और

        सहभागिता अथवा भागीदारी

सूचना, एकता और सहभागिता ही विकास की कुंजी हैं, जिनके माधयम से राष्ट्र, स्थायी विकास के परस्पर आश्रित स्तंभों ( पर्यावरणीय स्थीरता, आर्थिक स्थीरता, सामाजिक-राजनीतिक स्थीरता और सांस्कृतिक स्थीरता) को प्राप्त करते है। स्थायी विकास कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति सूचना प्रदाता है और वह सूचना ग्रहणकर्ता भी है। स्थायी विकास के अंतर्गत व्यापार करने के जो परंपरागत पध्दतियां हैं उनके स्थान पर नई पद्धतियां लानी होंगी, जिनमें कि समस्त विकास प्रक्रियाओं में पर्यावरणीय एवं सामाजिक चिंताओं का समावेश हो। इसी नई पहल के आधार पर परस्पर सहयोगात्मक एवं समन्वय के साथ पर्यावरणीय एवं सामाजिक चिंताओं को स्थायी विकास की धारा में जगह मिलेगी। 'एजेंडा 21' में स्थायी विकास को प्राप्त करने के लिए निर्णय निर्माण में व्यापक जनभागीदारी को मूलभूत आधार माना गया है।

 

पर्यावरण केंद्रित हरित विकास की परिकल्पना:

सामान्य रूप से ''हरित विकास'' को स्थायी विकास से अलग रखा गया है। हरित विकास में पर्यावरणीय स्थायीत्व की अधिक प्राथमिकता है।  हरित विकास, स्थायी विकास के आर्थिक एवं सांस्कृतिक घटकों को न शमिल कर स्थायी विकास के केवल पर्यावरणीय घटक को प्राथमिकता देता है। स्थायी विकास के घटक यह प्रदर्शित करते हैं कि किस प्रकार से हरित विकास, स्थायीत्व में चौतरफा सुधार किए बगैर पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सकता है। [10]

 

संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास परिषद द्वारा निर्धारित स्थायी विकास क्षेत्र के दायरे में आने वाले विष्यों की सूची इस प्रकार से हैः

        कृषि

        जल

        वायुमंडल

        जैवतकनीक

        सक्षमता निर्माण

        जलवायु परिवर्तन

        जैव विविधता  

        उपभोग एवं उत्पादन पदंध्दातियां

        जनांकिकी

        मरूस्थलीकरण एवं अकाल

        आपदा नियंत्रण एवं प्रबंधान

        शिक्षा एवं जनजागरण

        ऊर्जा

        पारिस्थितिकीय तंत्र

        वित्त

        वन संपदा

        स्वच्छ जल

        स्वास्थ्य

        मानव विस्थापन

        सूचक

        उद्योग

        सहभागिता एवं निर्णय लेने में सूचना

        अंतरराष्ट्रीय कानून

        पर्यावरण सुदृढ़ता के लिए अंतरराष्ट्रीय परस्पर सहयोग

        संस्थागत व्यवस्था

        भू-प्रबंधान

        प्रमुख समूह

        पर्वत श्रृंखला

        राष्ट्रीय स्थायी विकास नीतियां

        महासागर एवं सागर

        निर्धनता

        स्वच्छता

        विज्ञान

        लघु द्वीप राज्य विकास

        स्थायी पर्यटन

        प्रौद्योगिकी

        जहरीले रसायन

        व्यापार एवं पर्यावरण

        परिवहन

        अपषिश्ट (खतरनाक)

        अपशिष्ट ( रेडियोधर्मी)

        अपशिष्ट (ठोस)

 

स्थायी विकास और सांस्कृतिक वैविध्य

''प्रकृति और संस्कृति का संयोजन ही पर्यावरण है।'' इस परिभाषा को लेकर बहस शुरू हो गई और और शोधकर्ताओं के लिए यह शोधा का प्रमुख विषय बन गया। यूरोपीय संघ द्वारा प्रायोजित 'विविधा दुनिया में सतत विकास' ने बहुसैद्धांतिक क्षमताओं को एकीकृत करना और सांस्कृतिक विविधाताओं की व्याख्या करना, स्थायी विकास की रणनीतियों के प्रमुख अवयव हैं। यद्यपि कुछ अन्य शोधाकर्ताओं की माने तों पर्यावरण और सामाजिक चुनौतियां विकास कार्यों के लिए एक अवसर भी हैं। [12]

 

वातावरणीय सूचकांक में भूमिगत जल की सुरक्षा, एवं वर्षा जल संग्रहण अपार संभावनाएं भूमि का बेहतर उपयोग, वनाच्धादित क्षेत्रों के संरक्षण के साथ, वन क्षेत्रों का विकास करना, लुप्त प्राय जीव जंतुओं के संरक्षण एवं संसाधन के मानवीय उपयोग के पश्चात बेकार पड़े संसाधन के बेहतर प्रबंधन एवं उपयोग पर जोर दिया गया है। आर्थिक विकास के सूचकांकों मे सकल घरेलू उत्पानों को बढ़ावा देने, प्राकृतिक संसाधन (कोयला एवं खनिज, प्रति व्यक्ति उर्जा उपभोग, आदि प्रमुखता से शामिल है। सामाजिक आर्थिक संकेतकों में गरीबी दर को कम करना, रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना, जनसंख्या घनत्व, साक्षरता दर में इजाफा करना, शिशु मृत्यूदर  में कमी लाना, स्वास्थ्य में होने वाले खर्च एवं वातावरण जनित बीमारियां आदि शामिल हैं। [13]

 

जैव विधितता एवं स्थायी विकास

जलवायु परिवर्तन न सिर्फ एक व्यक्ति, क्षेत्र या देश बल्कि यह सम्पूर्ण पारिस्थिकीय तंत्र को प्रभावित करता है। पर्यावरण स्थायीत्व, आर्थिक स्थायित्व, और सामाजिक स्थायित्व ''स्थीर विकास/स्थायी विकास'' के तीन प्रमुख घटक कारक स्वीकार किए गए हैं। इसके माधयम से संसार की गरीबी दूर की जा सकती है और संसाधानों के संरक्षण के साथ-साथ वातावरण को क्षति पहुंचाए बगैर सांस्कृतिक अवरोधाएवं सामाजिक अस्थिरता के बिना विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है।

 

पृथ्वी पर करोड़ों प्रजातियों के जीव व वनस्पतियां उपलब्ध हैं। इन सबकी विशेषता एवं पर्यावास  भिन्न होकर भी यह आपस में सघन प्राकृतिक कड़ियों से जुड़े हैं। पर्यावरण संतुलन में हो रहे बिखराव व बदलाव के कारण जैवविविधाताओं के मधय कड़ियां टूट रही हैं, जिससे पारिस्थितिकीय तंत्र निंरंतर असंतुलित होता जा रहा है।

 

अस्तित्व की चिंता:

अभी भी, विश्व में प्राकृतिक संसाधान जैसे कि वृक्ष, तेल, गैस और अयस्क बहुत ही सीमित हैं। यदि समस्त तेलों और संसाधनों का दोहन कर लिया जाए, तो कुछ भी तेल शेष नहीं बचेगा। अभी भी, यदि सभ्यता के साथ मानवीयता को अगले 1000 वर्षों तक सुरक्षित रखना है, तो हमें अन्य स्त्रोतों से अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करनी होगी जिसको पुन: उत्पादित किया जा सके। पर्यावरण विकास, भूमि संरक्षण और पारस्थितिकीय संतुलन से जुड़े कार्यकलापों को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर अंजाम देना होगा। स्थायी विकास को केवल सामूहिक प्रयासों से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को जिम्मेदारी निभानी होगी।

 

विश्व के देशों में आर्थिक उदारीकरण, वैश्विकरण और औद्योगिकीकरण के बावजूद सरकारों के समक्ष आज भी बड़ी आबादी को मूलभूत सुविधाएं देना, प्राथमिक शिक्षा और भोजन व्यवस्था करना उनकी विकास नीति का एक केंद्रीय अंग बना हुआ है। आवश्यकता है कि वैश्विक स्तर पर पूर्ण निष्ठा एवं दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति की, जिसमें मानव के साथ पर्यावरण की सुरक्षा एवं संतुलन का एक निष्टभाव निहित हो।

 

अत: वर्तमान वर्तमान विकास योजनाओं में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वर्तमान एवं भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए वातावरण को कम से कम क्षति हो। मनुष्य जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं, जिसमें प्राकृतिक, जैव विविधाता और प्राकृतिक संसाधान तथा खाद्य सुरक्षा जैसी चीजें शामिल हैं, उनका संरक्षण किया जाना चाहिए। मानवीय गतिविधियों द्वारा केवल प्राकृतिक संसाधानों का उस मात्रा में उपयोग किया जाना चाहिए, जिस मात्रा में उस प्राकृतिक संसाधान का पुर्नउत्पादन हो रहा है।

 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि सामाजिक उत्तरदायित्व और स्थायी विकास पर्यावरणीय एवं मानवीय अस्तित्व के केंद्र बिंदु हैं।

 

(लेखक  रूसेन कुमार एक जनसम्पर्क पेशेवर है तथा कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के हिंदी पोर्टल (www.indiacsr.in) के अतिथि संपादक हैं)

 
संदर्भः

[1] http://sdnp.nic.in/  

[2] http://www.un.org/documents/ga/res/42/ares42-187.htm  

[3] What Is Sustainable Development? http://www.menominee.edu/sdi/whatis.htm  

[4] http://en.wikipedia.org/wiki/UNESCO  

[5]  http://en.wikipedia.org/wiki/UNESCO  

[6] What Is Sustainable Development? http://www.menominee.edu/sdi/whatis.htm  

[7] http://www.menominee.edu/sdi/whatis.htm  

[8]  (http://en.wikipedia.org/wiki/Agenda_21#Development_of_Agenda_21)

[9]  www.aalco.int/environment-2004.pdf

[10] http://en.wikipedia.org/wiki/Green_development  

[11] United Nations Division for sustainable Development. Documents: Sustainable Development Issues Retrieved: 2007-05-12  

[12] http://www.susdiv.org/

 


 

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