रफी के समकालीन, रफी की नजर में

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पवन झा - Pavan Jha

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Jul 31, 2005, 12:16:39 PM7/31/05
to सुर यात्रा
मन्ना डे
मन्ना डे उम्र में मुझसे 4
साल बड़े हैं। फिल्म लाइन में
भी मुझसे सीनियर हैं। वह
अपने मशहूर चाचा केसी डे की
कितनी ही फिल्मों में
मददगार रहे। फिल्म
'रामराज्य' के लिए उन्होंने
शंकर राव व्यास के
डायरेक्शन में गाया भी था।
लेकिन तकदीर का सितम देखिए,
प्लेबैक सिंगर के तौर पर
गाने का मौका उन्हें काफी
दिनों बाद मिल सका। आखिर
बर्मन दा ने 'मशाल' में गाने
का मौका दिया, जिसके एक गीत 'ओ
दुनिया के लोगो, लो हिम्मत
से काम' में मन्ना डे ने अपनी
उस्तादाना शान दिखाई।
मन्ना डे की आवाज गजब की है।
बड़े सख्त रियाज के जरिए
उन्होंने गायकी में कमाल
हासिल किया है। वो मेरे बहुत
अच्छे दोस्त हैं। उनके साथ
गाने में मुझे बहुत सीखने को
मिलता है। हम दोनों की
दोस्ती इतनी गहरी है कि जब
भी वक्त मिलता है, बड़ी
बेतकल्लुफी के साथ इनके
यहां जा धमकता हूं या वो
मेरे घर आ जाते हैं।


तलत महमूद
तलत महमूद भी मेरे अच्छे
दोस्त हैं। गजल गाने में
इनका जवाब नहीं। शुरू में जब
तलत कलकत्ता से आए, तो यहां
कोई भी म्यूजिक डायरेक्टर
उन्हें नहीं जानता था। यूं
कलकत्ता में गाए हुए उनके
कुछ रिकॉर्ड हिट हो चुके थे
और संगीत के जानकारों ने
पसंद भी किए थे, लेकिन
फिल्मों में कामयाब होने के
लिए उन्हें फिर भी बहुत
मेहनत करना पड़ी। अनिल
बिस्वास ने उन्हें फिल्म
'आरजू' में दिलीप कुमार के
लिए प्लेबैक सिंगर चुना,
जिसमें इनका एक गीत 'ऐ दिल
मुझे' सुपरहिट हुआ। इसके बाद
तो तलत पर काम की बारिश शुरू
हो गई। नौशाद साहब ने भी तलत
को दिलीप कुमार के लिए
प्लेबैक सिंगर बनाया।
पर्दे पर यह गीत उस वक्त
गाया जाता है, जब
हीरो-हीरोइन कश्ती की सवारी
करते हैं। मुखड़े और अंतरे के
बीच एक लाइन उस कश्ती के
मांझी को भी गानी थी। नौशाद
साहब ने तलत को बताया कि यह
लाइन रफी की आवाज में होगी।
रिकॉर्डिंग के बाद तलत
मुझसे कहने लगे- 'यह बात मैं
ख्वाब में भी नहीं सोच सकता
था। आप एक ऐसे गीत में शरीक
होना कुबूल कर लेंगे, जिसकी
मुख्य आवांज एक जूनियर की
हो।' मन्ना दा की तरह तलत के
साथ भी मैंने बहुत से यादगार
गीत गाए हैं। उनकी लंबी
फेहरिस्त है। हां, इतना मुझे
यकीन है कि फिल्म 'हकीकत' का
गीत 'होके मजबूर' आज भी लोग
भूल नहीं सके होंगे।


किशोर कुमार
किशोर कुमार को मैं दादा
कहता हूं। 'किशोर दा' कहने पर
पहले उन्हें एतराज भी हुआ था
और उन्होंने मुझसे कहा भी कि
उन्हें किशोर दा नहीं, सिर्फ
किशोर कहा करूं। उनकी दलील
थी कि उम्र में वह मुझसे
छोटे हैं और गायकी के कैरियर
में भी मुझसे जूनियर हैं।
बंगालियों में दादा, बड़े भाई
को कहा जाता है। लेकिन मेरी
अपनी दलील थी। मैंने उन्हें
समझाया कि मैं सब बंगालियों
को दादा कहता हूं, चाहे वह
उम्र में बड़े हों या छोटे।
ये सुन किशोर दा को मेरी राय
से इत्तिफ़ाक करना पड़ा।
किशोर मुझे बहुत अजीज हैं।
वह बहुत अच्छा गाते हैं। हर
गीत में वह मूड और फिजा को इस
खूबी से रचा देते हैं कि गीत
और भी दिलकश हो जाता है। मैं
उनके गाने बहुत शौक से सुनता
हूं। एक वक्त वो भी आया, जब
मेरे मुकाबिल किशोर ज्यादा
गीत रिकॉर्ड करा रहे थे, मगर
इसका सबब पेशावराना
मुकाबला हरगिज नहीं था। असल
बात यह थी कि मैं हज पर चला
गया था। जब वापस आया, तो देखा
कि शम्मी कपूर, राजेंद्र
कुमार, दिलीप कुमार जैसे
हीरो जिनके लिए मैंने सबसे
ज्यादा प्लेबैक गीत गाए हैं,
धीरे-धीरे नए आने वालों के
लिए जगह खाली कर रहे हैं।
उनकी जगह राजेश खन्ना व
अमिताभ बच्चन संभाल रहे
हैं। नए अदाकारों के साथ लोग
किसी नई आवाज में गीत सुनना
चाहते हैं, इसलिए किशोर दा
की आवाज का जादू चल गया।
फिजा की इस तब्दीली से मुझे
भी खुशी हुई, आखिर दोस्त की
कामयाबी अपनी कामयाबी होती
है। यही सबब है कि हमारे
ताल्लुकात में रंजिश का रंग
कभी पैदा नहीं हुआ। फिर भी,
काम मुझे मिल रहा था और काफी
मिल रहा था। चुनांचे किशोर
दा से मेरी दोस्ती पहले की
तरह बरकरार है।

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