शंकर प्रस्तुत जयमाला

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Pavan Jha

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Apr 25, 2006, 3:36:17 PM4/25/06
to सुर यात्रा
संगीतकार शंकर (शंकर-जयकिशन) की पुण्यतिथि २६ अप्रैल के अवसर पर...


शंकर द्वारा प्रस्तुत जयमाला गोल्ड
रिकार्डिंग : १९७६

शंकर :
फ़ौजी भाइयों को शंकर का नमस्कार..
आज जब आपको अपनी पसन्द के नग़मे सुनाने और आपका मनोरंजन करने बैठा हूं, तो
अजीब क़शमक़श में पड़ गया हूं
पिछले २५-३० साल से शंकर-जयकिशन आपकी सेवा में लगे हैं,इस अर्से में इतनी
धुनों का निर्माण किया कि अब जब उनमें से कुछ आपको सुनाने का सवाल आया तो
उलझ गया हूं
'किसे भूल जाऊं किसे याद रखूं'

सामने रिकार्डॊं का ढेर लगा है, हर गाने के साथ मीठी यादों के सपने सजे
हैं... आंखों के सामने बीते हुए दिन यूं उभर रहे हैं जैसे एक फ़िल्म चल
रही हो
पहला दृश्य उभरता है आर.के. स्टुडिओ में
बैठे हैं मैं यानि शंकर, जयकिशन, शैलेन्द्र, हसरत और राज कपूर साब
और हो रही है गीतों की बरसात

'तक धिना धिन...'

(शंकर फ़िल्मों के नाम लेते हैं और उन फ़िल्मों के गीतों का मेडले बजता है)

बरसात के बाद आवारा.....श्री ४२०......आह.....बूट पालिश....संगम.....कल आज और कल
......जिस देश में गंगा बहती है....मेरा नाम जोकर

और तभी जैसे फिल्म टूट जाती है.. रोशनी हुई तो देखा शैलेंद्र नहीं थे,
जयकिशन भी साथ छोड गये, और जो हैं वो भी बेगाने से.....

[शंकर आह लेकर पढ़ते हैं ] 'रहते थे कभी जिनके दिल में, हम जान से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं उसी के कूचे में, हम आज गुनहगारों की तरह'

और एक आह लेकर सोचने पर मजबूर हो जाता हूं

गीत : "जाने कहां गये वो दिन..."


शंकर :
जाने वाले कभी नहीं आते
जाने वालों की याद आती है

फ़ौजी भाईयों जयकिशन मेरा पार्टनर ही नहीं था, वो मेर भाई था, मेरा साथी
मेरा हमदम था... उसके बिना मैं खुद को अधूरा समझने लगा था..इसी अधूरेपन
को पूरा करने के लिये उसे मैने अपने से दूर नहीं होने दिया.. कोई हमारे
म्युसिक रूम में आकर देखे आज भी पहले की तरह दीवान पे दो मसनदें लगीं
हैं . दो हार्मोनियम उसी तरह रखे हैं जैसे पहले रहते थे
कभी कभी जब पुराने दोस्तों की बदलती नज़रों से मन उदास हो जाता है तो
नज़रें उस हार्मोनियम की तरफ़ उठ जाती हैं लगता है कि जय कह रहा है 'शंकर
भई, इस तरह से हिम्मत हारने से काम नहीं चलेगा.. तुम उसी आत्मविश्वास से
आगे बढ़ते रहो

गीत : 'ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना'

शंकर :
अब जो गीत मैं आपको सुना रहा हूं वो मेरे प्यारे दोस्त शैलेंद्र की फ़िल्म
'तीसरी कसम' का है. सच्ची और खरी बात कहना और सुनना शैलेन्द्र को अच्छा
लगता थ. कई बार गीत के बोलों को लेकर हम खूब झगड़ते थे, लेकिन गीत की बात
जहां खत्म होती, फिर वोही घी-शक्कर.. शैलेन्द्र एक सीधा सच्चा आदमी था,
झूठ से उसे नफ़रत थी क्युंकी उसका विश्वास था, 'ख़ुदा के पास जाना है'

गीत : 'सजन रे झूठ मत बोलो'

जब बरसात का पहला गान रिकार्ड करने की बात आयी, तो राज साहब की तरफ़ से
हमें पूरी छूट दी कि किसी भी गायिका से रेकार्ड करायें.. हमने सोचा हम सब
नये हैं किसी नयी गायिका से ही पहला गाना रिकार्ड करना चाहिये.. एक दिन
मेरी मुलाकात एक ऐसी गायिका से हुई जो नयी नयी आयी थी, फ़ौजी भाईयों, वो
थी , आज दुनिया भर मे प्रसिद्ध गायिका 'लता मंगेशकर'
लता जी की तारीफ़ करना शब्दों में सम्भव नहीं.. लीजिये ये गीत सुनिये..

गीत : 'रसिक बलमा'

अब मैं आपको अपने दो मित्रों से मिलवाता हूं, वैसे ये दो सच्चे मित्र,
'दो झूठ' में साथ आये, एक हैं प्रोड्युसर-डाईरेक्टर सोहन लाल कंवर और
दूसरे गीतकार विट्ठल भाई पटेल.. विट्ठल भाई वैसे तो बड़े बिज़नैस-मैन हैं
पर कविता में भी उनका अपना स्थान है... वो कलम से ही नहीं दिल से भी कवि
हैं.. हर जानने वाले का दुख-दर्द वो बटाते हैं..हर किसी का दर्द उनका
अपना दर्द है... विठ्ठल भाई शैलेन्द्र के बड़े प्रशंसक रहे हैं उनकी अपनी
कविता पर भी शैलेन्द्र का बड़ा असर है.. फ़िल्म दो झूठ का ये गीत सुनकर आप
मेरी बात ज़रूर मान जायेंगे

गीत : 'चलो भूल जायें'

अब सोहन लाल कंवर की फ़िल्म सन्यासी का एक गीत सुनिये कंवर साब एक जीनियस
फ़िल्म मेकर हैं .. वो खुद तो अपना काम अच्छी तरह जानते हैं और दूसरे से
भी अच्छा काम लेना जानते हैं
इस गीत के लेखक हैं विश्वेश्वर शर्मा और गा रहे हैं लता और मुकेश..
मुकेश एक और प्यारा साथी.. मुकेश दर्द भरे गीत गाने मे अपना जवाब नहीं
रखते थे पर इस गीत में उनका रंग बिल्कुल दूसरा है

गीत : 'चल सन्यासी मन्दिर में'

फ़ौजी भाइयों अपने इस जीवन में हमने ना जाने कितने संगीतकारों को उठते
गिरते देखा पर एक संगीतकार ऐसा भी है जो अपने अनोखे ढंग के संगीत से
बराबर अपना स्थान बनाये रहा..
उसका नाम है ओ.पी. नय्यर
'हम सुखन-फ़हम हैं गालिब के तरफ़दार नहीं'
ये गीत सुनिये, फ़िल्म है 'प्राण जाये पर वचन ना जाये' गा रही हैं 'आशा भोसले'

गीत : 'चैन से हमको कभी'

यूं तो अपनी तारीफ़ सुनना सबको अच्छा लगता है, पर उस समय खुशी का कोई
ठिकाना नहीं रहता जब ऐसा आदमी आपकी तारीफ़ करे जिसके आप खुद प्रशसंक हो..
सचिन देव बर्मन ऐसी ही हस्ती थे जिसके हम प्रशंसक थे. एक बार वो रूस से
आये तो कहने लगे कि 'शंकर तुमने बरसात से संगीत की ऐसी वर्षा शुरू की कि
रसिकों का तन मन आज तक भीग रहा है. मैं रूस गया वहां जिसे देखो तुम्हारे
ही गीत गुन-गुना रहा है'. फ़ौजी भाईयों मेरी उस वक्त की खुशी का अन्दाजा
आप लगा सकते हैं... लीजिये बर्मन दादा का 'गाईड' फ़िल्म का ये गीत सुनिये
जो मैं उस महान कलाकार को श्रद्धांजलि के रूप मे पेश कर रहा हूं

गीत : 'कांटों से खींच के ये आंचल'

समय कम है और बातें इतनी कि कभी खत्म ना हो, आज आपसे बातें करते ऐसा लग
रहा है कि जैसे मैं पूरे देश से बातें कर रहा हूं.. ये सच है कि सतरंगी
सभ्यता के इस महान देश के कोने कोने के लोग सिपाही है, जो देश की रक्षा
करता है, वो सिपाहि है... आप सरहदों पर डटे हैं तो हम घर के मोर्चों पे
टक्कर ले रहे हैं हर उस बुराई से जो हमारे देश को नुकसान पहुचने वाली
है..
आइये विदा होने से पहले इस जागृति और खुशहाली का स्वागत करें!

गीत : 'होठों पे सच्चाई रहती है'

विदा!

syed mubasir akheel

unread,
May 4, 2006, 7:15:41 AM5/4/06
to sury...@googlegroups.com
thank you or dhanyavad.please dont mind the late reply I was away

Jaya Goplani

unread,
May 4, 2006, 7:53:37 AM5/4/06
to sury...@googlegroups.com
who is this?


syed mubasir akheel <syedm...@gmail.com> wrote:
thank you or dhanyavad.please dont mind the late reply I was away

On 4/26/06, Pavan Jha wrote:
> संगीतकार शंकर (शंकर-जयकिशन) की पॠणॠयतिथि २६ अपॠरैल के अवसर पर...
>
>
> शंकर दॠवारा पॠरसॠतॠत जयमाला गोलॠड
> रिकारॠडिंग : १९७६
>
> शंकर :
> फ़ौजी भाइयों को शंकर का नमसॠकार..
> आज जब आपको अपनी पसनॠद के नग़मे सॠनाने और आपका मनोरंजन करने बैठा हूं, तो
> अजीब क़शमक़श में पड़ गया हूं
> पिछले २५-३० साल से शंकर-जयकिशन आपकी सेवा में लगे हैं,इस अरॠसे में इतनी
> धॠनों का निरॠमाण किया कि अब जब उनमें से कॠछ आपको सॠनाने का सवाल आया तो
> उलठगया हूं
> 'किसे भूल जाऊं किसे याद रखूं'
>
> सामने रिकारॠडॊं का ढेर लगा है, हर गाने के साथ मीठी यादों के सपने सजे
> हैं... आंखों के सामने बीते हॠठदिन यूं उभर रहे हैं जैसे ठक फ़िलॠम चल
> रही हो
> पहला दृशॠय उभरता है आर.के. सॠटॠडिओ में
> बैठे हैं मैं यानि शंकर, जयकिशन, शैलेनॠदॠर, हसरत और राज कपूर साब
> और हो रही है गीतों की बरसात
>
> 'तक धिना धिन...'
>
> (शंकर फ़िलॠमों के नाम लेते हैं और उन फ़िलॠमों के गीतों का मेडले बजता है)
>
> बरसात के बाद आवारा.....शॠरी ४२०......आह.....बूट पालिश....संगम.....कल आज और
> कल
> ......जिस देश में गंगा बहती है....मेरा नाम जोकर
>
> और तभी जैसे फिलॠम टूट जाती है.. रोशनी हॠई तो देखा शैलेंदॠर नहीं थे,
> जयकिशन भी साथ छोड गये, और जो हैं वो भी बेगाने से.....
>
> [शंकर आह लेकर पॠते हैं ] 'रहते थे कभी जिनके दिल में, हम जान से भी पॠयारों की
> तरह
> बैठे हैं उसी के कूचे में, हम आज गॠनहगारों की तरह'
>
> और ठक आह लेकर सोचने पर मजबूर हो जाता हूं
>
> गीत : "जाने कहां गये वो दिन..."
>
>
> शंकर :
> जाने वाले कभी नहीं आते
> जाने वालों की याद आती है
>
> फ़ौजी भाईयों जयकिशन मेरा पारॠटनर ही नहीं था, वो मेर भाई था, मेरा साथी
> मेरा हमदम था... उसके बिना मैं खॠद को अधूरा समठने लगा था..इसी अधूरेपन
> को पूरा करने के लिये उसे मैने अपने से दूर नहीं होने दिया.. कोई हमारे
> मॠयॠसिक रूम में आकर देखे आज भी पहले की तरह दीवान पे दो मसनदें लगीं
> हैं . दो हारॠमोनियम उसी तरह रखे हैं जैसे पहले रहते थे
> कभी कभी जब पॠराने दोसॠतों की बदलती नज़रों से मन उदास हो जाता है तो
> नज़रें उस हारॠमोनियम की तरफ़ उठ जाती हैं लगता है कि जय कह रहा है 'शंकर
> भई, इस तरह से हिमॠमत हारने से काम नहीं चलेगा.. तॠम उसी आतॠमविशॠवास से
> आगे बॠते रहो
>
> गीत : 'ज़िनॠदगी इक सफ़र है सॠहाना'
>
> शंकर :
> अब जो गीत मैं आपको सॠना रहा हूं वो मेरे पॠयारे दोसॠत शैलेंदॠर की फ़िलॠम
> 'तीसरी कसम' का है. सचॠची और खरी बात कहना और सॠनना शैलेनॠदॠर को अचॠछा
> लगता थ. कई बार गीत के बोलों को लेकर हम खूब ठगड़ते थे, लेकिन गीत की बात
> जहां खतॠम होती, फिर वोही घी-शकॠकर.. शैलेनॠदॠर ठक सीधा सचॠचा आदमी था,
> ठूठ से उसे नफ़रत थी कॠयॠंकी उसका विशॠवास था, 'ख़ॠदा के पास जाना है'
>
> गीत : 'सजन रे ठूठ मत बोलो'
>
> जब बरसात का पहला गान रिकारॠड करने की बात आयी, तो राज साहब की तरफ़ से
> हमें पूरी छूट दी कि किसी भी गायिका से रेकारॠड करायें.. हमने सोचा हम सब
> नये हैं किसी नयी गायिका से ही पहला गाना रिकारॠड करना चाहिये.. ठक दिन
> मेरी मॠलाकात ठक ठसी गायिका से हॠई जो नयी नयी आयी थी, फ़ौजी भाईयों, वो
> थी , आज दॠनिया भर मे पॠरसिदॠध गायिका 'लता मंगेशकर'
> लता जी की तारीफ़ करना शबॠदों में समॠभव नहीं.. लीजिये ये गीत सॠनिये..
>
> गीत : 'रसिक बलमा'
>
> अब मैं आपको अपने दो मितॠरों से मिलवाता हूं, वैसे ये दो सचॠचे मितॠर,
> 'दो ठूठ' में साथ आये, ठक हैं पॠरोडॠयॠसर-डाईरेकॠटर सोहन लाल कंवर और
> दूसरे गीतकार विटॠठल भाई पटेल.. विटॠठल भाई वैसे तो बड़े बिज़नैस-मैन हैं
> पर कविता में भी उनका अपना सॠथान है... वो कलम से ही नहीं दिल से भी कवि
> हैं.. हर जानने वाले का दॠख-दरॠद वो बटाते हैं..हर किसी का दरॠद उनका
> अपना दरॠद है... विठॠठल भाई शैलेनॠदॠर के बड़े पॠरशंसक रहे हैं उनकी अपनी
> कविता पर भी शैलेनॠदॠर का बड़ा असर है.. फ़िलॠम दो ठूठ का ये गीत सॠनकर आप
> मेरी बात ज़रूर मान जायेंगे
>
> गीत : 'चलो भूल जायें'
>
> अब सोहन लाल कंवर की फ़िलॠम सनॠयासी का ठक गीत सॠनिये कंवर साब ठक जीनियस
> फ़िलॠम मेकर हैं .. वो खॠद तो अपना काम अचॠछी तरह जानते हैं और दूसरे से
> भी अचॠछा काम लेना जानते हैं
> इस गीत के लेखक हैं विशॠवेशॠवर शरॠमा और गा रहे हैं लता और मॠकेश..
> मॠकेश ठक और पॠयारा साथी.. मॠकेश दरॠद भरे गीत गाने मे अपना जवाब नहीं
> रखते थे पर इस गीत में उनका रंग बिलॠकॠल दूसरा है
>
> गीत : 'चल सनॠयासी मनॠदिर में'
>
> फ़ौजी भाइयों अपने इस जीवन में हमने ना जाने कितने संगीतकारों को उठते
> गिरते देखा पर ठक संगीतकार ठसा भी है जो अपने अनोखे ढंग के संगीत से
> बराबर अपना सॠथान बनाये रहा..
> उसका नाम है ओ.पी. नयॠयर
> 'हम सॠखन-फ़हम हैं गालिब के तरफ़दार नहीं'
> ये गीत सॠनिये, फ़िलॠम है 'पॠराण जाये पर वचन ना जाये' गा रही हैं 'आशा भोसले'
>
> गीत : 'चैन से हमको कभी'
>
> यूं तो अपनी तारीफ़ सॠनना सबको अचॠछा लगता है, पर उस समय खॠशी का कोई
> ठिकाना नहीं रहता जब ठसा आदमी आपकी तारीफ़ करे जिसके आप खॠद पॠरशसंक हो..
> सचिन देव बरॠमन ठसी ही हसॠती थे जिसके हम पॠरशंसक थे. ठक बार वो रूस से
> आये तो कहने लगे कि 'शंकर तॠमने बरसात से संगीत की ठसी वरॠषा शॠरू की कि
> रसिकों का तन मन आज तक भीग रहा है. मैं रूस गया वहां जिसे देखो तॠमॠहारे
> ही गीत गॠन-गॠना रहा है'. फ़ौजी भाईयों मेरी उस वकॠत की खॠशी का अनॠदाजा
> आप लगा सकते हैं... लीजिये बरॠमन दादा का 'गाईड' फ़िलॠम का ये गीत सॠनिये
> जो मैं उस महान कलाकार को शॠरदॠधांजलि के रूप मे पेश कर रहा हूं
>
> गीत : 'कांटों से खींच के ये आंचल'
>
> समय कम है और बातें इतनी कि कभी खतॠम ना हो, आज आपसे बातें करते ठसा लग
> रहा है कि जैसे मैं पूरे देश से बातें कर रहा हूं.. ये सच है कि सतरंगी
> सभॠयता के इस महान देश के कोने कोने के लोग सिपाही है, जो देश की रकॠषा
> करता है, वो सिपाहि है... आप सरहदों पर डटे हैं तो हम घर के मोरॠचों पे
> टकॠकर ले रहे हैं हर उस बॠराई से जो हमारे देश को नॠकसान पहॠचने वाली
> है..
> आइये विदा होने से पहले इस जागृति और खॠशहाली का सॠवागत करें!
>
> गीत : 'होठों पे सचॠचाई रहती है'
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