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मेरे आंबेडकर
-मोहन मुक्त
('वंचित स्वर' समाचार पत्र में प्रकाशित (यहां कुछ संशोधित और परिवर्धित- “मेरे आंबेडकर”)
निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़
यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए -इक़बाल
अनुवाद - बुलंद नज़र, दिल को उम्मीद देने वाला बात करने का तरीक़ा और दुःख को गहराई से समझने वाली आत्मा ही कारवां के अगुवा शख़्स या लीडर के लिए सफ़र की सबसे ज़रूरी चीजें हैं।

मैंने 2004 से बाबासाहेब के मूल लेखन को और उनकी आलोचनाओं को पढ़ना शुरू किया, कह सकता हूँ कि उनके इकोनॉमिक्स के काम के अलावा मैं उन्हें पूरा पढ़ चुका हूँ.. तकनीकी जानकारी न होने से इकोनॉमिक्स की उनकी पीएचडी थीसिस ख़ुद से नहीं समझ पाया हूँ... आंबेडकर का असल संवैधानिक दर्शन भारत का संविधान नहीं उसकी उद्देशिका और संविधान सभा की बहसें हैं.
आंबेडकर के लेखन में अंतर्विरोध ज़रूर हैं लेकिन उनके बौद्धिक काम या एक्टिविज्म में बेईमानी बिलकुल भी नहीं... जर्मन दार्शनिक कांट ने कहा है कि किसी काम का अच्छा या बुरा होना सही या ग़लत होना कर्ता के इंटेंशन पर निर्भर करता है... आंबेडकर के बौद्धिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक सामाजिक एक्टिविज़्म के इंटेंशन न केवल निर्दोष हैं बल्कि वे किसी भी इंसानी पैमाने पर महान हैं
मेरे लिये आंबेडकर सच्चे डेमोक्रेट और इस उपमहाद्वीप के लोकतंत्रीकरण के लिये सबसे ज़रूरी बौद्धिक एक्टिविस्ट राजनेता और नैतिक प्रेरणा स्रोत हैं
क्या हैं मेरे लिये आंबेडकर???
आंबेडकर सबके हैं, आज ये कहा जा रहा है, ऐसा मैंने भी कहा है,और 'सबके आंबेडकर'शीर्षक से फेसबुक पर एक श्रृंखला भी चलाई, 'सबके आंबेडकर 'एक अच्छी अवधारणा है हालांकि ये अभी हो नहीं पाया है, मैं चाहता हूँ कि ऐसा हो जाए, लेकिन आज मैं आपके सामने
'सबके आंबेडकर 'पर नहीं 'मेरे आंबेडकर' पर बात करने जा रहा हूँ.
मेरे आंबेडकर..... यानि आंबेडकर की मेरे निजी जीवन में, निजी विचार में आंबेडकर की क्या अहमियत है.
दलित पृष्ठभूमि से आने वाले किसी भी औसत समझदारी के व्यक्ति की तरह मैं भी स्वयं को आंबेडकर का ऋणी मानता हूँ, यह इतनी आसान और सहज बात है कि इसे बहुत विस्तार से समझाने की कोई अधिक आवश्यकता नहीं है.
मेरे और मेरे जैसे अनगिनत लोगों के जीवन को आंबेडकर ने जिस तरह बदला है ये उनके समग्र योगदान से लगभग अंजान रहने वाले लोग या कुछ मामलों में उनका नाम तक सही रूप में न जानने वाले लोग जानते हैं महसूस करते हैं....
अपने जीवन में आंबेडकर के प्रत्यक्ष और कभी ना चुकाये जा सकने वाले ऋण के बावजूद मैं आंबेडकर को जब ' मेरे आंबेडकर' कहता हूँ तो ऐसा कहने के पीछे यह महान ऋण मुख्य वजह नहीं है, ज़रूर मेरा मंतव्य इस ऋण से प्रभावित और निर्देशित हुआ है लेकिन निर्धारित नहीं.
मैं आंबेडकर को 'मेरे आंबेडकर 'कहता हूँ क्योंकि उन्होंने मुझे चीजों को देखने की एक दृष्टि दी है, एक तार्किक लोकतान्त्रिक विवेकवान और आधुनिक विश्वदृष्टि की तलाश आंबेडकर को अन्यों के साथ मिलाकर पाई जा सकती है, मैं ये नहीं कह रहा कि अकेले आंबेडकर यह दृष्टि देते हैं लेकिन आंबेडकर के बिना इसे पाना या इसका मुकम्मल हो पाना काफ़ी मुश्किल है.
मैं 'मेरे आंबेडकर 'कहता हूँ क्योंकि जब आंबेडकर कहते हैं
"मैं मूर्तियों का पूजक नहीं हूँ मैं उन्हें तोड़ने में विश्वास करता हूँ "
तो यह साहसिक कथन मुझे लगता है मैं कहना चाहता था, जो ठीक वैसा ही किसी और ने कह दिया है और तब कहा है जब इसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी. वैसे इसकी ज़रूरत तब तक रहेगी जब तक हमारा समाज इतना परिपक्व और विवेकपूर्ण नहीं हो जाता कि हमें किसी नायक की आवश्यकता ही नहीं होगी उस दिन हम नायकपूजक समाज नहीं रहेंगे. और कोई मूर्तियां भी नहीं होंगी जिन्हें तोड़ने की आवश्यकता रह जायेगी. लेकिन सबसे ज़रूरी बात है कि मैं पूरी तरह मुतमईन हूँ आंबेडकर को जाने समझे बिना या उन्हें 'मेरे आंबेडकर' के रूप में वास्तव में अंगीकृत किये बिना हम ऐसा समाज कभी नहीं बन सकते.
क्योंकि 'मेरे आंबेडकर' ने अपने तमाम मोर्चों पर संघर्ष के साथ यह ईमानदार निष्कर्ष निकाला था कि
"कानून से प्राप्त अधिकार तब तक बेमानी हैं जब तक आप उन अधिकारों को इस्तेमाल करने लायक आज़ाद समाज का निर्माण नहीं कर लेते "
मेरे आंबेडकर राजनीतिक आर्थिक विधिक संवैधानिक दायरों में सक्रिय होकर लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को सुनिश्चित करते हैं तो वह साथ ही लोकतंत्र की वास्तविक पैदाइश कहाँ होती है इसे बहुत गहराई से सामने लाते हैं। मेरे आंबेडकर कहते हैं....
"लोकतंत्र की जड़ें शासन के स्वरूप में नहीं बल्कि सामाजिक संबंधों में निहित होती हैं"
साथ ही
"समाज अगर लोकतांत्रिक ना हो तो सरकार कभी लोकतांत्रिक नहीं हो सकती"
यह एक लाईन आंबेडकर की लोकतंत्र की समझ को सामने लाने के लिये काफ़ी है, ये वो एक लाईन है जो लोकतंत्र के लिये काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों, राजनीतिक दलों ,संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार संबंधी प्रकाशनों में और आंबेडकर पर काम करने वाले अधिसंख्य अकादमिकों, सामाजिक संगठनों के चिंतन और कर्म से गायब रहती है.
यह लोकतंत्र की जड़ों को कहाँ पोषित करना चाहिए इसकी प्रबुद्ध समझ है. और इस समझ को मैं जहाँ सबसे गहराई से समाया हुआ पाता हूँ या जहाँ से यह समझ पैदा होती है उस जगह को मैं 'मेरे आंबेडकर' कहता हूँ.
इसी समझ के कारण मेरे आंबेडकर कहते हैं
"Constitutional morality is not a natural sentiment it has to be cultivated. We must realize that our people have yet to learn it. democracy in India is only a top dressing to the Indian soil which is essentially undemocratic"
मेरे आंबेडकर यह शिनाख्त कर पाते हैं कि समाज के अलोकतांत्रिक होने के चलते भारतीय मिट्टी में लोकतंत्र केवल ऊपरी लीपापोती की तरह है. और यह भारतीय मिट्टी अनिवार्यतः अलोकतांत्रिक क्यों है इसकी मूल वजह कहाँ है यह भी उन्होंने अपने विस्तृत लेखन में कई जगह स्पष्ट किया है.
भौतिक वर्चस्व की मूल्य प्रणाली एक स्तरीकृत असमानता (graded inequality ) के सामाजिक आर्थिक राजनैतिक और साथ ही दार्शनिक आध्यात्मिक ढाँचे में ऊपर से नीचे की ओर लगातार प्रवाहित होती रहती है जिसे अंतर्विवाह, पेशों के कठोर वंशानुगत निर्धारण, सापेक्ष अपवित्रता और उससे संलग्न आचारतंत्र के ज़रिये लौह स्वरूप दे दिया गया है. मेरे आंबेडकर इसकी गहरी शिनाख़्त करते हैं वो उत्पादन तंत्र में इसे ऐसे परिभाषित करते हैं -
" जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं है वो श्रमिकों का भी विभाजन है"
लेकिन मेरे आंबेडकर सचेत हैं. वो उत्पादन तंत्र के साथ धार्मिक नैतिक दर्शन और आचार तंत्र के आधारभूत सिद्धांत के रूप में इसे संस्कृति से अनिवार्य रूप से जुडा हुआ पाते हैं -
" तो क्या हिंदू धर्म में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं जिसके समक्ष आपस के तमाम भेदों के बावजूद नतमस्तक होना सभी हिंदू, अपना कर्तव्य मानते हों, मुझे लगता है ऐसा एक सिद्धांत है, और वह सिद्धांत है जाति का सिद्धांत"
इस सिद्धांत को ब्राह्मण धर्म का मूल और अनिवार्य सिद्धांत मानते हुए आंबेडकर इसकी समाप्ति के लिये सहभोज, अंतरजातीय विवाह, स्त्री स्वातंत्र्य के साथ एक क्रांतिकारी सूत्र देते हैं-
"जाति की समाप्ति के लिये धर्म ग्रंथों की सत्ता में डायनामाइट लगाना होगा, वेद और श्रुति के धर्म का नाश करना होगा"
मैं, मेरे आंबेडकर की दृष्टि से ही ये समझ पाया हूँ कि जाति ब्राह्मण संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा है, वो उत्पादन तंत्र से पैदा ज़रूर होती है लेकिन उसका लौह कवच उसे संस्कृति देती है.
जैसा कि कार्ल मार्क्स कहते हैं -
"जब कोई विचार जनता में पैठ बना लेता है तो वो भौतिक शक्ति बन जाता है।"
क्योंकि जाति का जनता द्वारा स्वीकृत विचार एक भौतिक शक्ति है, एक संस्कृति है, वह एक व्यापक जीवन पद्धति है, यहां से जाति विरोधी संघर्ष संस्कृति के व्यापक दायरे में प्रवेश करता है. ये समझ मुझे मेरे आंबेडकर से मिलती है कि जाति की समाप्ति का रास्ता बिना किसी समझौते के पूरी कठोरता के साथ ब्राह्मण धर्म , ब्राह्मण संस्कृति , ब्राह्मण पर्व , ब्राह्मण संस्कार और ब्राह्मण जीवन पद्धति के नकार ,निरोध, विरोध , निषेध और उसका सांस्कृतिक विकल्प तैयार करने का रास्ता है .
लेकिन मेरे आंबेडकर उत्पादन तंत्र की जटिलता में गुथे हुए द्वैध वर्चस्व को भी साफ़ तौर पर समझाते हैं -
"भारत में मजदूर वर्ग के दो शत्रु हैं पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद।"
"ब्राह्मणवाद से तात्पर्य किसी जाति में निहित विशेषाधिकार से नहीं बल्कि उस जीवन प्रणाली और व्यवहार से है जो स्वतंत्रता समानता और भाईचारे का निषेध करती है।"
मेरे आंबेडकर मजदूरों के हड़ताल के अधिकार के समर्थन में कहते हैं
"एक बार जब आप आज़ादी का अधिकार मान लेते हैं, तो हड़ताल का अधिकार भी स्वाभाविक ही मानना पड़ता है क्योंकि जैसा मैंने कहा हड़ताल आज़ादी के अधिकार का ही दूसरा नाम है।
इसलिए मैं कहता हूँ कि हड़ताल को दंडनीय बनाना मतलब मज़दूर को गुलाम बना देना है। गुलामी क्या है? अमेरिका के संविधान में इसे ‘अनैच्छिक सेवा’ कहा गया है। और यही अनैच्छिक सेवा है। यह नैतिकता के खिलाफ है, कानून की भावना के खिलाफ है।"
उत्पादन तंत्र के वर्चस्व से लड़ने के लिये मेरे आंबेडकर स्वतंत्र मजदूर पार्टी बनाते हैं और उत्पीड़क सरकार के खिलाफ़ वामपंथियों की साझेदारी में संघर्ष करते हैं.
उस पार्टी के घोषणापत्र को यदि एक लाईन में कहा जाए तो वो होगा -
" राज्य समाजवाद के ज़रिये शासन प्रशासन में सभी तबकों की उचित भागीदारी वाला सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित करना।"
मेरे आंबेडकर द्वारा चिह्नित दो शत्रु पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद आज ज़्यादा स्पष्ट और ताक़तवर हैं और उनकी इस चेतावनी की अनदेखी का परिणाम हम सब भुगत रहे हैं -
"हिन्दू राष्ट्र से बड़ी विपत्ति और कुछ नहीं हो सकती इसे हर हाल में रोकना होगा।"
मेरे आंबेडकर की वह चेतावनी भी हमने भुला दी -
"26 जनवरी 1950को हम विरोधाभासों से भरे हुए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, हम राजनीतिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक वोट का सिद्धांत स्वीकार करेंगे लेकिन सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य को नकारते रहेंगे, हमें जितनी जल्दी हो इस विरोधाभास को समाप्त कर देना चाहिए अन्यथा सामाजिक और आर्थिक असमानता से पीड़ित लोग इस संवैधानिक ढाँचे को नष्ट कर देंगे।"
यहाँ पर मैं, मेरे आंबेडकर के विचार में बस यह जोड़ता हूँ कि असमानता से पीड़ित लोग संवैधानिक लोकतंत्र को नष्ट नहीं करते बल्कि असमानता को पैदा और मजबूत करने वाले लोग करते हैं, वो ऐसा करते जा रहे हैं... चूंकि मैं, मेरे आंबेडकर को जानता हूँ इसलिये मुझे पता है कि आज उनके यही शब्द होते.
मेरे आंबेडकर के समस्त विचार दर्शन को यदि एक ही शब्द देना हो तो वो होगा
" सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र " जिसकी स्थापना की गुंजाइश और उम्मीद में वो संविधान सभा और सरकार में शामिल हुए, राज्य समाजवाद का विचार रखा, सभा की बहसों में जितने लोकतान्त्रिक प्रगतिशील विचार और प्रस्ताव रख सकते थे, उतने उन्होंने रखे और जब एक अलोकतांत्रिक समाज में विधिक तौर तरीकों की सीमाओं का प्रत्यक्ष अहसास हुआ तो -
"मैं किसी समाज की प्रगति का पैमाना उस समाज की स्त्रियों की प्रगति को मानता हूँ"
कहने वाले वास्तविक फेमिनिस्ट मेरे आंबेडकर यह कहकर कानून मंत्री के पद को ठोकर मारते हैं -
"समाज के विभिन्न वर्गों और स्त्री पुरुषों के बीच असमानता को बनाये रखते हुए आर्थिक सुधारों के लिये कानून पास करना संविधान का मज़ाक उड़ाना है और गोबर के ढेर पर महल बनाने जैसा है"
मेरे आंबेडकर यहीं नहीं रुकते वो यहाँ तक कह डालते हैं -
" मैं संविधान को जलाने वाला पहला आदमी हूँगा।"
साहस और साथ ही ख़ुद की तैयार की हुई चीज को अनुपयोगी समझने पर ऐसी निर्ममता... उफ़्फ़ !
ऐसी निर्लिप्तता मैं भी अपने भीतर चाहूंगा जो मेरे आंबेडकर में है..
अपने समकालीनों में, मेरे आंबेडकर जिस सबसे बड़ी शख़्सियत से टकराये थे वो थे मोहनदास गाँधी,
गाँधी, जिन्हें ना मेरे आंबेडकर ने महात्मा कहा है ना मैं कहूंगा...
जाति को लेकर गाँधी के दकियानूसी विचारों और दलितों के स्वतंत्र निर्वाचन संघ के खिलाफ उनके अनैतिक अनशन के कारण ही आंबेडकर ने गाँधी के विरोध का सबसे मुश्किल रास्ता नहीं चुना, बल्कि आधुनिक काल में ब्राह्मण धर्म को पुनर्जीवित कर रामराज्य की वर्ण आधारित अवधारणा से मेरे आंबेडकर का बुनियादी विरोध था..
मेरे आंबेडकर ने गाँधी की इस पुरातनपंथी और प्रतिक्रियावादी भूमिका के चलते ही कहा
" गाँधी भारतीय इतिहास में दलितों के अब तक के सबसे बड़े दुश्मन हैं "
लेकिन बात इतनी ही नहीं है गाँधी और आंबेडकर के बीच बुनियादी विरोध है- आर्थिक दर्शन और विचारधारा का... गांधीवादी अर्थशास्त्र की आलोचना में मेरे आंबेडकर कहते हैं -
" मशीन और उस पर निर्मित सभ्यता के चलते उत्पन्न आर्थिक बुराइयों के गांधीवादी विश्लेषण में कुछ भी नया नहीं था. यह पुराने सड़े गले तर्क ही थे - रूसो पुश्किन और टॉलस्टॉय के तर्कों को दोहराना भर था. उनका अर्थशास्त्र भ्रांतिपूर्ण था. क्योंकि मशीन आधारित उत्पादन व्यवस्था और सभ्यता से उत्पन्न बुराइयां वस्तुतः मशीन के चलते उत्पन्न नहीं हुई हैं बल्कि वे बुराइयां तो गलत सामाजिक संगठन से पैदा हुई हैं जिसने निजी संपत्ति और व्यक्तिगत लाभ हासिल करने को परम पवित्र बना दिया है लिहाजा निदान मशीन और सभ्यता को कोसने में नहीं है, बल्कि सामाजिक संगठन को बदलने में है, ताकि मुट्ठी भर लोग फायदे को हड़प ना लें, और वह सब लोगों को मिल सके"
मेरे आंबेडकर कम अधिशेष और पिछड़ी और अनिवार्य रूप से शोषक ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्थान पर ज़रूर आधुनिक औद्योगिक नागर अर्थव्यवस्था को बेहतर मानते हैं लेकिन वो अविवेकपूर्ण अंधाधुंध प्रकृति नाशक निजी पूँजी पर आधारित औद्योगिक विकास के समर्थक नहीं बल्कि वो महत्वपूर्ण उद्योगों के सार्वजनिक स्वामित्व को श्रेयस्कर मानते हैं. वो उस विवेक से परिपूर्ण हैं जो आधुनिक समय में सामने आ रही पर्यावरण संबंधी समस्या के निराकरण को अपनी स्वयं की वैचारिक प्रज्ञा से तलाश सकता है... वो इसे आगे की ओर जाकर सुलझाएंगे, गांधी की तरह पीछे की तरफ लौटकर नहीं.... मेरे आंबेडकर जानते हैं कि पीछे लौटने का विकल्प नहीं है..
सौम्यवृत चौधरी जैसे चिंतकों ने आंबेडकर की ऐसी विचार प्रणाली के कारण उन्हें भारत का पहला यूरोपियनिस्ट कहा है. इस बात से सहमति है कि पश्चिम की प्रज्ञा को सही रूप में आंबेडकर ही अंगीकृत कर पाए हैं.
लेकिन मेरे आंबेडकर अकेले प्राच्य या पश्चिम के द्वैध से परिभाषित नहीं किये जा सकते हैं वो निश्चित ही समानता, स्वतन्त्रता और भाईचारे की उदारवादी अवधारणा को जहाँ यूरोप से ग्रहण करते हैं और अपने सामान्य प्रजेंटेशन में यूरोप से प्रभावित दिखते हैं वहीं वो प्रज्ञा, समता और करुणा के महान सिद्धांत बुद्ध से ग्रहण करते हैं. और सार्वजनिक रूप से अपने चिंतन का स्रोत बुद्ध के दर्शन को बताते हैं.
मेरे आंबेडकर पूर्व और पश्चिम की विवेकपूर्ण प्रज्ञा का सुंदरतम मेल हैं.
मेरे आंबेडकर गाँधी की अहिंसा की बजाय बुद्ध और तुकाराम की अहिंसा को स्वीकार करते हैं और बुद्ध के हवाले से कहते हैं- आवश्यकता पड़ने पर हिंसा भी इस्तेमाल की जा सकती है -
"हमारा आंदोलन अहिंसक है. क्योंकि हमने अहिंसा के प्रबल हथियार को अपने हाथों में लिया है, किन्तु यह गाँधी जी की अहिंसा नहीं है. अहिंसा के बारे में गांधी जी की अपनी परिभाषा है और अहिंसा की मेरी अपनी परिभाषा है जो गाँधी जी से एकदम अलग है, अहिंसा के बारे में सन्त तुकाराम का यह कथन ही अहिंसा की मेरी परिभाषा है-
दया उसी का नाम जीवों का पालन !
और उच्छेदन दुश्मनों का !!"
मेरे आंबेडकर और गाँधी के बीच वैचारिक समझौते या जबरन सामंजस्य की कोई गुंजाइश नहीं, दोनों विपरीत ध्रुव हैं, मेरे आंबेडकर में कुटिलता या धोखा नहीं.
मेरे आंबेडकर बुद्ध, फुले और कबीर तीनों को अपना गुरु घोषित कर आजीवक और बौद्ध दर्शनों के संभावित टकराव को भी समाप्त करते हैं. वो उन्हें गैरब्राह्मण दर्शन परम्परा में साझीदार ही देखते हैं.
मेरे आंबेडकर कटु हैं, कठोर हैं, तीखे हैं कर्णप्रिय नहीं हैं, लेकिन वो कुटिल नहीं, वो प्रयोगधर्मी हैं, सुविधा भोगी नहीं, वो अप्रिय लग सकते हैं लेकिन वो संकीर्ण नहीं.
उन्हें अपने योगदान के लिए कोई श्रेय नहीं चाहिए क्योंकि वे जानते हैं कि कथित श्रेय या प्रतिष्ठा भी घातक होती है-
"मैं ऐसे किसी श्रेय या सम्मान की परवाह नहीं करता जो किसी प्रगतिशील समाज में विद्रोहियों को मिलना चाहिए। यदि मैं हिन्दुओं को यह एहसास करा सका कि भारत में वे बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीयों के स्वास्थ्य, खुशहाली व प्रगति के लिए खतरा बन सकती है तो मुझे इससे बड़ा संतोष होगा"
जीवन भर जनता के शोषित हिस्सों की लड़ाई लड़कर राज्य की नीति शोषित समाज के अनुकूल हो और इसके क्रियान्वयन के लिये राज्य को कुछ विशेषाधिकार हों यह मानने के बाद भी उनके भीतर का डेमोक्रेट उनसे यह कहलवाता है -
" यदि कोई मुझसे पूछे कि संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद कौन सा है तो मैं कहूंगा मेरे अनुच्छेद 32, मेरी दृष्टि में यह संविधान का हृदय और आत्मा है "
ग़ौरतलब है कि अनुच्छेद 32 राज्य के विरुद्ध व्यक्ति के मूल अधिकारों को संरक्षण देता है
चूंकि मेरे आंबेडकर सच्चे डेमोक्रेट हैं इसलिये उनसे असहमत हुआ जा सकता है, उनसे सवाल पूछे जा सकते हैं, उनकी अवधारणाओं पर बहस की जा सकती है जैसे उन्होंने बौद्ध धम्म के मूल कहे जाने वाले सिद्धांतों चार आर्य सत्यों को यह कहकर नकार दिया कि “यदि संसार में दुःख ही है तो बुद्ध का सिद्धांत भी किस काम का?”
जिस तर्क प्रणाली से उन्होंने बौद्ध धम्म और दर्शन में से रहस्यवाद को निकालकर उसका परिष्कार किया उसी तरह, सही मंशा और विवेक के साथ मेरे आंबेडकर की भी समीक्षा और आलोचना हो सकती है और होनी चाहिए, मैं वो समीक्षा करते रहता हूँ, और लगभग हर बार मेरे आंबेडकर को अपने और क़रीब पाता हूँ. और हाँ ऐसा भी नहीं है कि मुझे सारे जवाब मिल ही जाते हैं जब मुझे वहाँ जवाब नहीं मिलते तो मैं मेरे आंबेडकर की प्रयोगधर्मिता के रास्ते ही कहीं और भी जाते रहता हूँ...कई बार आंबेडकर मंजिल नहीं प्रस्थान बिंदु होते हैं... और ऐसा होना ही चाहिए।
मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मेरे आंबेडकर मुझे रोकते हैं....क्योंकि वो जानते हैं कि मैं जहाँ भी जाऊं वो मेरे साथ रहेंगे अपने तरीक़े से...
उनके सच्चे डेमोक्रेट का तर्क, विवेक, मंशा विचार, प्रज्ञा, मानवीय मस्तिष्क की स्वतंत्रता के प्रति उनका अनुराग और बुद्ध के इस सिद्धांत में विश्वास मुझे उनसे कभी अलग नहीं कर पाता-
"मैंने तुम्हें विचारों का बेड़ा पार उतरने के लिये दिया है सर पर ढोये फिरने के लिये नहीं "
मैं बहुत ख़ुश हूँ कि मेरे पास आंबेडकर हैं जो कहते हैं -
"Cultivation of mind should be the ultimate aim of human existence "
मैं चाहता हूँ कि मेरे आंबेडकर, सबके आंबेडकर, उनकी अपनी तरह के आंबेडकर हो जाएं..