वैश्विक यातना सूचकांक (Global Torture Index) में भारत की स्थिति :हिरासत में यातना, विधिकढाँचे और मानवाधिकार संबंधी चुनौतियों का मूल्यांकन

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S.R. Darapuri

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Jul 5, 2026, 11:32:44 AM (8 days ago) Jul 5
to Sugava, “Ambedkar Mission Patrika”, Saptahik Nagsen, Mohan Das, Bheempatrika, rkuma...@gmail.com, “Ahwal-e-Mission”, Voice of the Weak, Ramesh Sidhu, Rahul Telang, Dalit Dastak, Begampura, Ved Prakash, Samyak Sarokar, Samachar Safar, Muslim World, Prabuddh Vimarsh, Mookvakta, Mook Nayak, Dastak Times, The People Era, Gurnam Singh, R A Prasad, Diksha Darpan, R.A Kovid, Samay Buddha, People Nayak, Dalit Satta Sangram, naresh wahane, Bodhisatv Babasaheb Today, Forward Press, Vijay Bouddha, Chanan Ram Wadala Vinod Kumar, Chanan Ram Wadala, Devinder Chander, Asha, The Buddhist Times Tv, Jai Kumar, Socialist Party, Prof. Ajit Singh Chahal, Rajendra Gautam

वैश्विक यातना सूचकांक (Global Torture Index) में भारत की स्थिति : हिरासत में यातना, विधिक ढाँचे और मानवाधिकार संबंधी चुनौतियों का मूल्यांकन

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

 

Tibetan Uprising Day

 

प्रस्तावना

यातना (Torture) मानवाधिकारों के सबसे गंभीर उल्लंघनों में से एक है। यह मानव गरिमा पर सीधा आघात करती है, विधि के शासन (Rule of Law) को कमजोर करती है तथा नागरिकों का उन संस्थाओं पर विश्वास कम करती है जिनका दायित्व उनकी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना है। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यातना के पूर्ण निषेध के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा विकसित किया। सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा (1948), नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध (ICCPR, 1966) तथा संयुक्त राष्ट्र यातना-विरोधी अभिसमय (United Nations Convention Against Torture—UNCAT) जैसे दस्तावेज स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि किसी भी परिस्थिति में यातना या क्रूर, अमानवीय अथवा अपमानजनक व्यवहार स्वीकार्य नहीं है।

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और एक संवैधानिक गणराज्य है, जिसने मानवाधिकारों तथा मौलिक अधिकारों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बार-बार व्यक्त की है। इसके बावजूद पुलिस हिरासत में यातना, पुलिस अत्याचार, हिरासत में मृत्यु तथा दोषियों के दण्डमुक्त (Impunity) बने रहने के आरोप लंबे समय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहे हैं। इन्हीं परिस्थितियों के कारण विश्व यातना विरोधी संगठन (World Organisation Against Torture—OMCT) द्वारा 2025 में जारी वैश्विक यातना सूचकांक (Global Torture Index—GTI) में भारत को "उच्च जोखिम (High Risk)" वाले देशों की श्रेणी में रखा गया।

यह सूचकांक केवल यातना की घटनाओं की संख्या नहीं गिनता, बल्कि यह भी मूल्यांकन करता है कि किसी देश की विधिक, प्रशासनिक तथा संस्थागत व्यवस्था यातना को रोकने में कितनी सक्षम है।

वैश्विक यातना सूचकांक (Global Torture Index)

वैश्विक यातना सूचकांक एक अंतरराष्ट्रीय मूल्यांकन प्रणाली है जिसे विश्व यातना विरोधी संगठन (OMCT) ने विकसित किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों में यातना एवं अमानवीय व्यवहार के जोखिम का आकलन करना है। यह सूचकांक निम्नलिखित प्रमुख आयामों का अध्ययन करता है—

यातना के उन्मूलन के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता; पुलिस की बर्बरता एवं संस्थागत हिंसा की रोकथाम; हिरासत में बंद व्यक्तियों की सुरक्षा; यातना के पीड़ितों के अधिकार; जवाबदेही तथा दण्डमुक्ति का अंत; यातना-निरोधक कानूनी एवं संस्थागत सुरक्षा उपाय एवं पारदर्शिता एवं स्वतंत्र निगरानी।

इन सभी मानकों के आधार पर भारत को "उच्च जोखिम" वाले देशों में वर्गीकृत किया गया है।

भारत का संवैधानिक संरक्षण

भारतीय संविधान प्रत्यक्ष रूप से "यातना" शब्द का प्रयोग नहीं करता, किन्तु अनेक प्रावधान इसके विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं।

अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी व्याख्या करते हुए मानव गरिमा तथा यातना से मुक्ति को भी इसमें शामिल माना है।

अनुच्छेद 20(3) किसी भी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य किए जाने से संरक्षण प्रदान करता है।

अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और निरोध की स्थिति में अनेक प्रक्रियात्मक अधिकार सुनिश्चित करता है, जैसे अधिवक्ता से मिलने का अधिकार तथा 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाना।

डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी और हिरासत के संबंध में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए, जिनमें गिरफ्तारी ज्ञापन, चिकित्सीय परीक्षण तथा परिजनों को सूचना देना अनिवार्य किया गया।

फिर भी व्यवहार में इन संवैधानिक प्रावधानों का प्रभावी अनुपालन अनेक स्थानों पर चुनौती बना हुआ है।

भारत को "उच्च जोखिम" श्रेणी में रखने के प्रमुख कारण

1. पृथक यातना-निरोधी कानून का अभाव

भारत में अभी तक ऐसा कोई स्वतंत्र कानून नहीं है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप यातना को एक विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित और दण्डित करता हो।

यद्यपि भारतीय न्याय व्यवस्था में मारपीट, गंभीर चोट तथा अन्य अपराधों के लिए दण्ड का प्रावधान है, फिर भी "यातना" को एक अलग अपराध के रूप में मान्यता नहीं दी गई है।

इसके परिणामस्वरूप—

यातना के मामलों में सामान्य आपराधिक धाराओं का उपयोग करना पड़ता है; वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना कठिन होता है; अपराध की गंभीरता के अनुरूप दण्ड नहीं मिल पाता एवं दोषी लोकसेवकों के विरुद्ध अभियोजन जटिल हो जाता है।

2. संयुक्त राष्ट्र यातना-विरोधी अभिसमय (UNCAT) का अनुसमर्थन न करना

भारत ने 1997 में UNCAT पर हस्ताक्षर तो किए, किन्तु आज तक उसका अनुसमर्थन (Ratification) नहीं किया है।

अनुसमर्थन करने पर भारत को—

यातना को पृथक अपराध घोषित करना, स्वतंत्र जांच व्यवस्था स्थापित करना, पीड़ितों को मुआवजा एवं पुनर्वास देना, हिरासत संबंधी सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना तथा अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्थाओं के साथ सहयोग करना होगा।

भारत ने Optional Protocol to UNCAT (OPCAT) का भी अनुसमर्थन नहीं किया है।

3. हिरासत में हिंसा

पुलिस हिरासत और न्यायिक अभिरक्षा में यातना के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं।

इनमें शामिल हैं—

पूछताछ के दौरान मारपीट, स्वीकारोक्ति कराने के लिए शारीरिक एवं मानसिक यातना, यौन हिंसा, पुलिस हिरासत में मृत्यु एवं  न्यायिक अभिरक्षा में अमानवीय व्यवहार।

इन घटनाओं का शिकार प्रायः अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, धार्मिक अल्पसंख्यक, प्रवासी मजदूर तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग अधिक होते हैं।

4. जेलों की स्थिति

भारत की जेलें लंबे समय से अनेक संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रही हैं।

इनमें प्रमुख हैं—

क्षमता से अधिक कैदी, कर्मचारियों की कमी, अपर्याप्त चिकित्सीय सुविधाएँ, खराब स्वच्छता, विचाराधीन कैदियों की अत्यधिक संख्या एवं गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता का अभाव।

वैश्विक यातना सूचकांक के अनुसार भारत की जेलों में भीड़भाड़ गंभीर समस्या है तथा कुल कैदियों में लगभग तीन-चौथाई विचाराधीन बंदी हैं।

5. पुलिस जवाबदेही की कमजोरी

यातना के आरोपों की निष्पक्ष जांच में अनेक बाधाएँ आती हैं—

पुलिसकर्मियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने में अनिच्छा, पुलिस द्वारा स्वयं पुलिस की जांच, अभियोजन में देरी, दोषसिद्धि की कम दर एवं कुछ मामलों में अभियोजन की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता।

ये परिस्थितियाँ दण्डमुक्ति की धारणा को मजबूत करती हैं।

6. पीड़ितों के अधिकार

यातना के पीड़ितों को न्याय प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है—

प्रतिशोध का भय, गवाह संरक्षण का अभाव, आर्थिक कठिनाइयाँ, लंबी न्यायिक प्रक्रिया एवं पर्याप्त पुनर्वास सुविधाओं का अभाव।

यद्यपि न्यायालयों ने कई मामलों में मुआवजा प्रदान किया है, फिर भी व्यापक वैधानिक पुनर्वास व्यवस्था अभी विकसित नहीं हो सकी है।

न्यायपालिका की भूमिका

भारतीय न्यायपालिका ने हिरासत में यातना रोकने हेतु अनेक महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं।

प्रमुख निर्णय हैं—

डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997); नीलबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (1993) एवं  जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1994)

सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने तथा पूछताछ की वीडियोग्राफी जैसे उपायों पर भी बल दिया है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) हिरासत में मृत्यु और यातना के मामलों की निगरानी करता है तथा— स्वतंत्र जांच, मुआवजा, मजिस्ट्रियल जांच, चिकित्सीय परीक्षण एवं पुलिस के मानवाधिकार प्रशिक्षण

जैसी सिफारिशें करता है। हालांकि इसकी अधिकांश सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं, जिसके कारण उनकी प्रभावशीलता सीमित रह जाती है।

अंतरराष्ट्रीय आलोचना

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न मानवाधिकार संस्थाओं तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने समय-समय पर भारत के संबंध में निम्न चिंताएँ व्यक्त की हैं:—

हिरासत में यातना, अत्यधिक बल प्रयोग, मनमानी गिरफ्तारी, दण्डमुक्ति, निवारक निरोध कानूनों का प्रयोग एवं जेलों की स्थिति।

इन संस्थाओं ने भारत से बार-बार UNCAT का अनुसमर्थन करने तथा व्यापक यातना-निरोधी कानून बनाने का आग्रह किया है।

भारत सरकार का दृष्टिकोण

भारत सरकार का कहना है कि—

संविधान पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है; न्यायपालिका स्वतंत्र एवं सक्रिय है; वर्तमान आपराधिक कानून दोषियों को दण्डित करने में सक्षम हैं; मानवाधिकार आयोग कार्यरत हैं एवं पुलिस आधुनिकीकरण, फोरेंसिक विज्ञान, डिजिटल रिकॉर्ड तथा सीसीटीवी जैसी व्यवस्थाएँ लगातार सुदृढ़ की जा रही हैं।

हालाँकि अनेक विशेषज्ञों का मत है कि इन उपायों का प्रभाव राज्यों के बीच समान नहीं है तथा इनके क्रियान्वयन में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है।

आवश्यक सुधार

भारत में यातना की संभावना को कम करने हेतु निम्न सुधार आवश्यक माने जाते हैं:—

  • अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यापक यातना-निरोधी कानून बनाना;
  • UNCAT तथा OPCAT का अनुसमर्थन करना;
  • हिरासत संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करना;
  • पुलिस प्रशिक्षण तथा वैज्ञानिक जांच प्रणाली को मजबूत करना;
  • पूछताछ की अनिवार्य ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग;
  • जेलों में भीड़भाड़ कम करना;
  • विचाराधीन मुकदमों का शीघ्र निस्तारण;
  • विधिक सहायता को सुदृढ़ करना;
  • गवाह संरक्षण व्यवस्था विकसित करना;
  • पीड़ितों के पुनर्वास एवं मुआवजा प्रणाली को प्रभावी बनाना।

निष्कर्ष

वैश्विक यातना सूचकांक में भारत को "उच्च जोखिम" वाले देश के रूप में वर्गीकृत किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय राज्य यातना की आधिकारिक नीति अपनाता है। इसका आशय यह है कि देश की विधिक एवं संस्थागत संरचना में ऐसी कमियाँ बनी हुई हैं जो हिरासत में यातना और अमानवीय व्यवहार की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाई हैं तथा जवाबदेही की व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी नहीं है।

भारतीय संविधान जीवन, स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा का सशक्त आधार प्रदान करता है तथा न्यायपालिका ने भी अनेक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय विकसित किए हैं। इसके बावजूद पृथक यातना-निरोधी कानून का अभाव, संयुक्त राष्ट्र यातना-विरोधी अभिसमय का अनुसमर्थन न होना, हिरासत में हिंसा के आरोप, जेलों की दयनीय स्थिति तथा दोषियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में आने वाली कठिनाइयाँ गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

यदि भारत व्यापक विधायी सुधार, पुलिस एवं कारागार सुधार, स्वतंत्र निगरानी तंत्र, प्रभावी जवाबदेही तथा पीड़ित-केंद्रित न्याय व्यवस्था को लागू करता है, तो वह न केवल अपने संवैधानिक आदर्शों और लोकतांत्रिक मूल्यों को अधिक प्रभावी ढंग से साकार कर सकेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप अपनी वैश्विक प्रतिष्ठा को भी सुदृढ़ करेगा।


--
S.R. Darapuri I.P.S.(Retd)
National President,
All India Peoples Front
Mob 919415164845

S.R. Darapuri

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Jul 5, 2026, 11:33:46 AM (8 days ago) Jul 5
to Amalendu Upadhyaya Hastakshep, Jun Puth, Janchowk, workers...@gmail.com, NAVSATTA, Tauqeer Siddiqi, Khan Kranti Carvan Lko, Devinder Chander, Bhadas Media, Socialist Party, Dr. Brijesh Kumar Bhartiy Bodhisatva Mission, Rajendra Gautam
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