यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) की नई नियमावली पर एआईपीएफ का बयान
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का मानना है कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में यूजीसी द्वारा प्रस्तावित इक्विटी कमेटियों के गठन में कोई भी गलत बात नहीं है। उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव एक कड़वी सच्चाई है। जिसने भी विश्वविद्यालय या कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की है, वह जानता है कि जातिगत पूर्वाग्रह, सामाजिक बहिष्कार और अपमानजनक व्यवहार काल्पनिक बातें नहीं, बल्कि अनेक परिसरों के दैनिक अनुभव का हिस्सा रहे हैं।
रैगिंग, सामाजिक बहिष्कार, मौखिक उत्पीड़न और जाति आधारित निशाना बनाना जैसी प्रवृत्तियाँ वर्षों से अनेक संस्थानों में मौजूद रही हैं। इन समस्याओं को नजरअंदाज कर देने से वे समाप्त नहीं हो जातीं। अन्याय और भेदभाव से निपटने के लिए संस्थागत और जवाबदेह तंत्र की आवश्यकता होती है।
प्रस्तावित इक्विटी कमेटी की संरचना न तो मनमानी है और न ही पक्षपातपूर्ण। इसमें कुलपति (Vice-Chancellor) अध्यक्ष के रूप में होंगे, साथ ही वरिष्ठ प्रोफेसर, दो छात्र प्रतिनिधि सदस्य होंगे, और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएँ तथा दिव्यांगजन का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है। ऐसा प्रतिनिधित्व परिसरों को अधिक सुरक्षित, लोकतांत्रिक और समावेशी बनाने के लिए आवश्यक है।
एआईपीएफ का स्पष्ट मत है कि भेदभाव के विरुद्ध औपचारिक व्यवस्था बनाना न्याय, गरिमा और शिक्षा में समान अवसर की दिशा में एक आवश्यक कदम है। इसे किसी भी समुदाय के विरुद्ध कदम के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक और अनुचित है।
आज सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई और फैसले के बाद इस मुद्दे का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। किसी भी पक्ष द्वारा भड़काऊ कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। ताकि जनता की बुनियादी मांगों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक अधिकार पर जनता के सभी तबकों और वर्गों की जन पहलकदमी हो सके।
राष्ट्रीय कार्य समिति की तरफ से!
डाक्टर राहुल दास,
राष्ट्रीय महासचिव,
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट।