आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट की कार्यसमिति द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक के संबंध में जारी किया गया बयान
ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक वापस लिया जाए- आईपीएफ
ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक निजता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का विरोधी
लखनऊ, 26 मार्च, 2026
आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट की कार्यसमिति द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक के संबंध में जारी बयान में कहा गया है कि ये संशोधन मूल रूप से लैंगिक पहचान के आत्म-निर्धारण के उस सिद्धांत को नकारते हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने NALSA बनाम भारत संघ (2014) मामले में मान्यता दी थी। इस विधेयक का खंड 2 स्वयं द्वारा महसूस की गई लैंगिक पहचान को मान्यता देने से इनकार करता है और उसकी जगह एक ऐसी परिभाषा लागू करता है, जिसके तहत पहचान के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता वाले एक मेडिकल बोर्ड से प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होगा। इसकी धारा 4 जिला मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि वह पहचान पत्र जारी करने से पहले इन प्रमाण पत्रों की बारीकी से जांच करे; इससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ऐसी दखलंदाजी वाली नौकरशाही और चिकित्सीय निगरानी के अधीन होना पड़ेगा, जो एक तरह की 'निजी निगरानी' की सीमा तक पहुँच जाती है। ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत निजता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों का सीधे तौर पर उल्लंघन करते हैं।
इस संशोधन द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा को बहुत संकीर्ण कर दिया गया है। जहाँ 2019 के अधिनियम में ट्रांस-पुरुषों, ट्रांस-महिलाओं, जेंडर-क्वीयर और विविध लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों को मान्यता दी गई थी, वहीं संशोधित परिभाषा इस मान्यता को मुख्य रूप से कुछ विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों और 'इंटरसेक्स' भिन्नता वाले व्यक्तियों तक ही सीमित कर देती है। 'उद्देश्यों और कारणों के विवरण' में स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि इसमें स्वयं द्वारा महसूस की गई लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों की सुरक्षा का कोई इरादा नहीं है। इस जानबूझकर किए गए बहिष्कार के कारण ट्रांस-पुरुष, नॉन-बाइनरी व्यक्ति और जेंडर-फ्लूइड व्यक्ति कानूनी सुरक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर हो जाते हैं जो कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है।
यह विदित है कि भाजपा सरकार लंबे समय से हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित लिंग और सामाजिक व्यवस्था की सामंती एवं कट्टरपंथी विचारधारा को थोपने का प्रयास कर रही है। यह विधेयक उसी प्रतिगामी सोच को दर्शाता है, जो व्यक्तियों को अपनी पहचान स्वयं परिभाषित करने के अधिकार से वंचित करती है। यह प्रतिगामी मानसिकता सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के उस रुख में भी झलकती है, जिसमें सरकार ने यह कहा था कि वह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले रक्तदान पर लगे भेदभावपूर्ण प्रतिबंध को हटाने के पक्ष में नहीं है।
यह प्रतिगामी संशोधन 2019 के अधिनियम में निहित सीमित सुरक्षा उपायों को व्यवस्थित रूप से समाप्त कर देता है, और उनकी जगह राज्य की निगरानी, चिकित्सीय पहरेदारी और नौकरशाही नियंत्रण वाली एक व्यवस्था लागू कर देता है। यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों पर एक सीधा हमला है और इसे तत्काल वापस लिया जाना चाहिए।
आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट की कार्यसमिति इस बात पर ज़ोर देती है कि किसी भी विशिष्ट समुदाय के अधिकारों और जीवन को प्रभावित करने वाले कानून तब तक नहीं लाए जाने चाहिए, जब तक कि संबंधित हितधारकों के साथ पहले से परामर्श न कर लिया जाए। आईपीएफ ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को वापस लेने की मांग करता है।
एस आर दारापुरी,
राष्ट्रीय अध्यक्ष,
आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट