भारत के वर्तमान आर्थिक संकट के लिए मोदी सरकार कितनी जिम्मेदार है?
एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)
प्रस्तावना
हाल के वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। आर्थिक विकास की धीमी गति, बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई, उपभोग मांग में गिरावट, कृषि संकट तथा बढ़ती आर्थिक असमानता ने देश की आर्थिक स्थिति को चिंताजनक बना दिया है। यद्यपि भारत को अभी भी विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, फिर भी इस विकास की गुणवत्ता, स्थायित्व और समावेशिता को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। हाल ही में सरकार द्वारा “मितव्ययिता” अथवा “सादगी” अपनाने की अपील ने इस बहस को और तीव्र कर दिया है कि वर्तमान आर्थिक संकट के लिए सरकार स्वयं कितनी जिम्मेदार है।
यह प्रश्न कि Narendra Modi की सरकार वर्तमान आर्थिक संकट के लिए कितनी उत्तरदायी है, अत्यंत जटिल और विवादास्पद है। किसी भी आर्थिक संकट के पीछे केवल एक कारण नहीं होता। वैश्विक महामारी, अंतरराष्ट्रीय युद्ध, व्यापारिक अस्थिरता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों जैसी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने भी भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। किंतु अनेक अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि 2014 के बाद मोदी सरकार द्वारा अपनाई गई कई नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को और अधिक गहरा कर दिया।
यह निबंध इसी प्रश्न का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है कि वर्तमान आर्थिक संकट के लिए मोदी सरकार कितनी जिम्मेदार है। इसमें यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि यद्यपि वैश्विक परिस्थितियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, फिर भी नोटबंदी, जीएसटी के दोषपूर्ण क्रियान्वयन, बढ़ती आर्थिक असमानता, रोजगार सृजन में विफलता, अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता तथा आर्थिक निर्णयों के केंद्रीकरण जैसी नीतियों ने संकट को और गंभीर बना दिया है।
वैश्विक परिस्थितियाँ और बाहरी कारण
भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए यह स्वीकार करना आवश्यक है कि विश्व अर्थव्यवस्था स्वयं लंबे समय से संकटग्रस्त रही है। कोविड-19 महामारी ने उत्पादन, व्यापार, रोजगार और आपूर्ति शृंखलाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया। लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को मंदी और महँगाई का सामना करना पड़ा।
इसके अतिरिक्त रूस–यूक्रेन युद्ध तथा पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने ऊर्जा और खाद्यान्न कीमतों को बढ़ा दिया। भारत अपनी आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत के व्यापार घाटे, महँगाई और राजकोषीय स्थिति पर पड़ता है।
अतः यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत की सभी आर्थिक समस्याएँ केवल मोदी सरकार की नीतियों का परिणाम हैं। वैश्विक परिस्थितियों ने भी गंभीर दबाव उत्पन्न किए हैं। किंतु मुख्य प्रश्न यह है कि क्या सरकार की नीतियों ने भारत की आर्थिक क्षमता को मजबूत किया या उसे और अधिक कमजोर बना दिया।
नोटबंदी और असंगठित क्षेत्र का विनाश
मोदी सरकार का सबसे विवादास्पद आर्थिक निर्णय 2016 की नोटबंदी थी। नवंबर 2016 में सरकार ने अचानक ₹500 और ₹1000 के नोटों को अमान्य घोषित कर दिया, जो उस समय प्रचलित मुद्रा का लगभग 86 प्रतिशत थे।
सरकार ने इसके उद्देश्य बताए:
किन्तु इस निर्णय ने भारतीय अर्थव्यवस्था, विशेषकर असंगठित क्षेत्र, को गंभीर रूप से प्रभावित किया। भारत की विशाल आबादी नकद लेन-देन पर निर्भर थी। छोटे व्यापारी, किसान, मजदूर, कुटीर उद्योग और दैनिक श्रमिक अचानक नकदी संकट में फँस गए।
परिणामस्वरूप:
निर्माण, खुदरा व्यापार, परिवहन और छोटे उद्योगों को विशेष नुकसान हुआ। बाद में Reserve Bank of India की रिपोर्ट में यह सामने आया कि लगभग पूरी मुद्रा बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। इससे यह प्रश्न उठा कि यदि अधिकांश धन वापस आ गया, तो काला धन समाप्त करने का उद्देश्य कहाँ तक सफल हुआ।
अनेक अर्थशास्त्रियों ने नोटबंदी को आर्थिक दृष्टि से अविवेकपूर्ण बताया क्योंकि इससे भारी सामाजिक और आर्थिक नुकसान हुआ, जबकि घोषित उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकी।
जीएसटी के क्रियान्वयन की समस्याएँ
2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया। सिद्धांततः इसका उद्देश्य देश में एक समान कर प्रणाली स्थापित करना था। परंतु इसके क्रियान्वयन में अनेक गंभीर समस्याएँ सामने आईं।
मुख्य समस्याएँ थीं:
विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्योगों (SMEs) को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कई छोटे व्यापारी डिजिटल प्रणाली और लेखांकन व्यवस्था के लिए तैयार नहीं थे।
हालाँकि समय के साथ जीएसटी संग्रह में वृद्धि हुई, लेकिन प्रारंभिक वर्षों में इसने व्यापारिक गतिविधियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। आलोचकों का मत है कि जीएसटी ने राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को भी कमजोर किया और आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ाया।
नोटबंदी और जीएसटी के संयुक्त प्रभाव ने असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान पहुँचाया, जो भारत में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है।
बेरोज़गारी का संकट
मोदी सरकार के दौर में बेरोज़गारी सबसे गंभीर आर्थिक समस्याओं में से एक बनकर उभरी है। यद्यपि कुछ वर्षों में GDP वृद्धि दर ऊँची रही, फिर भी रोजगार सृजन पर्याप्त नहीं हो सका। इसलिए कई अर्थशास्त्री इसे “रोजगार-विहीन विकास” (Jobless Growth) कहते हैं।
विशेष रूप से युवाओं में बेरोज़गारी चिंताजनक स्तर तक पहुँच गई है। शिक्षित युवाओं, इंजीनियरों और स्नातकों को भी स्थायी रोजगार नहीं मिल पा रहा।
सरकार ने “मेक इन इंडिया” जैसी योजनाएँ शुरू कीं, जिनका उद्देश्य विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार और रोजगार सृजन था। किंतु विनिर्माण क्षेत्र अपेक्षित स्तर पर विकसित नहीं हो सका।
आलोचकों का मत है कि सरकार ने:
पर अत्यधिक ध्यान दिया, जबकि श्रम-प्रधान उद्योगों और व्यापक रोजगार सृजन की उपेक्षा की गई।
बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक अस्थिरता और लोकतांत्रिक असंतोष का भी कारण बनती है।
बढ़ती आर्थिक असमानता
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक बढ़ती आर्थिक असमानता है। पिछले दशक में भारत में संपत्ति और आय का केंद्रीकरण तेजी से बढ़ा है।
Oxfam International तथा World Inequality Lab जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों ने यह दिखाया है कि आर्थिक विकास का लाभ मुख्यतः धनी वर्गों और बड़े कॉरपोरेट समूहों को मिला है।
इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं:
दूसरी ओर आम जनता को:
का सामना करना पड़ा।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अत्यधिक असमानता दीर्घकालीन आर्थिक विकास को भी कमजोर करती है क्योंकि इससे व्यापक जनसंख्या की क्रय शक्ति घटती है।
अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता
मोदी सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए GST और पेट्रोल-डीजल पर करों जैसे अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई। अप्रत्यक्ष करों का बोझ गरीब और अमीर दोनों पर समान रूप से पड़ता है।
क्योंकि गरीब लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा उपभोग पर खर्च करते हैं, इसलिए अप्रत्यक्ष कर उनके लिए अधिक बोझिल सिद्ध होते हैं।
विशेष रूप से पेट्रोल और डीज़ल पर उच्च उत्पाद शुल्क ने:
को बढ़ाया।
इसका प्रत्यक्ष प्रभाव आम नागरिकों के जीवन स्तर पर पड़ा।
उपभोग मांग में गिरावट
भारतीय अर्थव्यवस्था की एक गंभीर समस्या घरेलू उपभोग मांग में कमी है। जब लोगों की आय घटती है या महँगाई बढ़ती है, तब वे खर्च कम करते हैं। इससे उद्योगों की बिक्री घटती है और निवेश भी कम हो जाता है।
हाल के वर्षों में:
अनेक अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि केवल आधारभूत संरचना निर्माण से अर्थव्यवस्था को स्थायी गति नहीं मिल सकती, जब तक आम जनता की क्रय शक्ति नहीं बढ़े।
आर्थिक निर्णयों का केंद्रीकरण
मोदी सरकार पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि आर्थिक निर्णय लेने की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है। कई महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर पर केंद्रित दिखाई दिए।
आलोचकों का मत है कि इससे:
बेरोज़गारी के आँकड़ों, GDP की गणना तथा सरकारी आँकड़ों की पारदर्शिता को लेकर भी प्रश्न उठे।
सरकार का पक्ष
मोदी सरकार के समर्थक इन आलोचनाओं को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। उनका तर्क है कि कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है।
वे निम्न उपलब्धियों की ओर संकेत करते हैं:
सरकार का यह भी दावा है कि GST और डिजिटलीकरण जैसे सुधार दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तन हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम धीरे-धीरे सामने आएँगे।
निष्कर्ष
भारत की वर्तमान आर्थिक समस्याएँ केवल वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि घरेलू नीतिगत निर्णयों से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। महामारी, युद्ध, तेल कीमतों में वृद्धि और वैश्विक मंदी जैसे बाहरी कारणों ने अवश्य दबाव पैदा किया, किंतु मोदी सरकार की कई नीतियों ने इन संकटों को और गंभीर बना दिया।
नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र को कमजोर किया, GST के दोषपूर्ण क्रियान्वयन ने छोटे व्यापारों को प्रभावित किया, बेरोज़गारी लगातार बढ़ी, आर्थिक असमानता गहरी हुई तथा अप्रत्यक्ष करों के बोझ ने आम जनता की क्रय शक्ति को कमजोर किया।
यद्यपि सरकार ने आधारभूत संरचना, डिजिटल तकनीक और प्रशासनिक क्षमता में कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, फिर भी वह रोजगार, ग्रामीण संकट, असमानता और व्यापक जनकल्याण जैसे मूलभूत प्रश्नों का संतोषजनक समाधान नहीं कर सकी।
अतः यह कहा जा सकता है कि वर्तमान आर्थिक संकट के लिए मोदी सरकार अकेले जिम्मेदार नहीं है, किंतु उसकी नीतियाँ इस संकट को गहरा करने और भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को बढ़ाने के लिए काफी हद तक उत्तरदायी रही हैं।
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक विकास प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसा विकास सुनिश्चित करना है जो न्यायपूर्ण, रोजगारोन्मुख, लोकतांत्रिक और समाज के व्यापक वर्गों के हित में हो।