अरदास

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Baljit Basi

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Aug 31, 2015, 8:56:10 AM8/31/15
to शब्द चर्चा

सिख धर्म की प्रार्थना को अरदास कहा जाता है. अरदास कोई कार्य आरंभ या समापत करने के पश्चात गुरु ग्रन्थ की हजूरी में  समूहक तौर पर ख़ड़े होकर की जाती है.  यह शब्द सिख धर्म की प्रार्थना के लिए एक तरह रूढ़ हो चूका है.  फिर भी इसका और प्रसंगों में भी इस्तेमाल होता है. सिख धर्म के श्रोत इसकी व्युत्पत्ति दो तरह से करते हैं.  1. फ़ारसी अर्जदाशत , (अर्ज़ +दाशत ). इसमें अर्ज़ अरबी का शब्द है जिस का अर्थ विनती, प्राथना जैसा ही है,  जिससे अर्ज़ी बना और दाश्त फ़ारसी का शब्द है जिस  का अर्थ  है  रखना। कुछ जगह इसको दरखास्त का विकसित रूप भी कहा गया है जिस में *खास्त  फारसी ख्वास्तान ,(खाहश ) रखना है. 2.. इस अनुसार अरदास संस्कृत मूल का है जो  बना है अर्द् ( मांगना,याचना )+आशा (उम्मीद). सो अर्थ बना उम्मीद रखते हुए मांगना. फेलन के कोष में भी यही व्युतपति दी गई है. 
 यह तो स्पष्ट है कि अरदास शब्द सिख धर्म से पुराना है. कहा जाता है कि  नाथ योगियों द्वारा यह शब्द प्रचलत किया गया।  कुछ और शब्द भी हैं  जो सिख धर्म के विशेष संकलप  मने जाते हैं  जैसे रहरास ,गुरमुख ,सुहेला आदि. यह सब  नाथ -योगियों की टकसाल के ढले सिक्के हैं. इस लिए अरदास शब्द की संस्कृत वाली व्युत्पत्ति में भी काफी दम है. मेरे पास नाथ-योगी साहित्य के श्रोत नहीं हैं.  क्या कोई दोस्त उचित हवाला दे सकते हैं? इस शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार करें। 
बलजीत बासी

Bharatbhooshan Tiwari

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Aug 31, 2015, 9:09:46 AM8/31/15
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बलजीत जी - नमस्ते. अभी आपका ईमेल देखकर याद आया कि आप से बात करने का कब से मन है. मैं पिछले कुछ महीनों से नार्थ कैरोलाइना में हूँ. कृपया अपना नंबर दीजिये या जब समय मिले तब 336-417-9401 पर  कॉल करिये।
भारत 

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Bharatbhooshan Tiwari

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Aug 31, 2015, 9:11:01 AM8/31/15
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बलजीत जी के नाम यह निजी सन्देश पूरे समूह को चला गया. क्षमा चाहता हूँ.
~ भारत

Abhay Tiwari

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Aug 31, 2015, 9:58:05 AM8/31/15
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धातुपाठ में दोनों अर्थ मिलते हैं- अर्द गतौ याचने च, और अर्द हिंसायाम्। 

धातुपाठ में तमाम धातुएं ऐसी भी हैं-  कुल दो हज़ार में से लगभग आठ सौ तक- जिनका उपयोग संस्कृत में नहीं के बराबर है। मेरा विचार ये है कि पाणिनि ने अपने परिवेश और अपने समय में मौजूद सारी भाषाओं में से धातुएं निकालकर धातुपाठ में संकलित की होंगी। 

अब जैसे अर्द का ही मामला लें। मेरे विचार से अर्द याचने के अर्थ का कोई शब्द संस्कृत में भले हो, भले न हो, पर उसका हमशकल अर्ज़ फ़ारसी में मौजूद है। 

तो, बलजीत भाई! मेरा विचार यह है कि आप संस्कृत अर्द को लें या फ़ारसी अर्ज़ को, दोनों जुड़वां हैं, हमशकल हैं। आप के दोनों विकल्प एक ही ओर इशारा कर रहे हैं- व्युत्पत्ति अर्द धातु से है। 

बाक़ी नाथपंथियों वाले मामले पर मेरे हाथ और स्रोत तंग हैं। 

श्री हनुमानजी सदा सहाय

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Baljit Basi

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Aug 31, 2015, 10:09:27 AM8/31/15
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लेकिन अर्ज़ तो अरबी का शब्द है , फारसी का नहीं। 
बलजीत बासी  

Abhay Tiwari

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Aug 31, 2015, 10:22:51 AM8/31/15
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जी! तब मामला इतना निश्चयात्मक नहीं हो सकता जितना मुझे अपनी भूल के कारण लगा।  

वैसे कई दफ़े अजित भाई ने अरबी संस्कृत के मिलते जुलते अर्थों वाले शब्द बताएं हैं। पर मैं अधिक नहीं जानता। 

मेरी समझ से नाथपंथियों की शरण में ही जाना होगा, आप पहले से ही वहाँ हैं। 
  


श्री हनुमानजी सदा सहाय

Pratik Pandey

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Sep 1, 2015, 6:32:51 AM9/1/15
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मुझे इस बारे में ज़्यादा तो नहीं मालूम, लेकिन ब्रजभाषा में भी 'अरदास' का चलन है। सूरदास का मश्हूर भजन है - "तेरी नगरी में नित्य निवास करूँ, दिन-रात यही अरदास करूँ"।

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