सिख धर्म की प्रार्थना को अरदास कहा जाता है. अरदास कोई कार्य आरंभ या समापत करने के पश्चात गुरु ग्रन्थ की हजूरी में समूहक तौर पर ख़ड़े होकर की जाती है. यह शब्द सिख धर्म की प्रार्थना के लिए एक तरह रूढ़ हो चूका है. फिर भी इसका और प्रसंगों में भी इस्तेमाल होता है. सिख धर्म के श्रोत इसकी व्युत्पत्ति दो तरह से करते हैं. 1. फ़ारसी अर्जदाशत , (अर्ज़ +दाशत ). इसमें अर्ज़ अरबी का शब्द है जिस का अर्थ विनती, प्राथना जैसा ही है, जिससे अर्ज़ी बना और दाश्त फ़ारसी का शब्द है जिस का अर्थ है रखना। कुछ जगह इसको दरखास्त का विकसित रूप भी कहा गया है जिस में *खास्त फारसी ख्वास्तान ,(खाहश ) रखना है. 2.. इस अनुसार अरदास संस्कृत मूल का है जो बना है अर्द् ( मांगना,याचना )+आशा (उम्मीद). सो अर्थ बना उम्मीद रखते हुए मांगना. फेलन के कोष में भी यही व्युतपति दी गई है.
यह तो स्पष्ट है कि अरदास शब्द सिख धर्म से पुराना है. कहा जाता है कि नाथ योगियों द्वारा यह शब्द प्रचलत किया गया। कुछ और शब्द भी हैं जो सिख धर्म के विशेष संकलप मने जाते हैं जैसे रहरास ,गुरमुख ,सुहेला आदि. यह सब नाथ -योगियों की टकसाल के ढले सिक्के हैं. इस लिए अरदास शब्द की संस्कृत वाली व्युत्पत्ति में भी काफी दम है. मेरे पास नाथ-योगी साहित्य के श्रोत नहीं हैं. क्या कोई दोस्त उचित हवाला दे सकते हैं? इस शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार करें।
बलजीत बासी