पात्र

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geet chaturvedi

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Jun 20, 2010, 2:15:06 PM6/20/10
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दोस्‍तो
मैं इस समय 'पात्र' शब्‍द पर अटका हुआ हूं. यह कैसे बना और इसका अर्थ बर्तन, कंटेनर या रोल तक कैसे पहुंचा ? क्‍या है इसका सफ़र ? 

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Geet Chaturvedi
Editor (Magazines)
Dainik Bhaskar,
Dwarka Sadan,
6, Press Complex,
M.P. Nagar,
Bhopal.

farid khan

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Jun 20, 2010, 3:11:58 PM6/20/10
to शब्द चर्चा
आदरणीय गीत जी,
मैं इस शब्द की उत्पत्ति के बारे में नहीं जानता ।
पर मैं भारतीय अभिनय परम्परा के मुताबिक 'पात्र' के बारे में बताने की
कोशिश करता हूँ।

भरतमुनी ने अभिनेता के शरीर को बर्तन (पात्र) बताया है जिसमें किसी भी
भूमिका या चरित्र की आत्मा समा जाती है। इसलिए भारतीय अभिनय परम्परा में
अभिनेताओं का उपरी रंग ढंग नहीं बदलता और वे हर भूमिका में एक से दिखते
हुए भी अलग अलग भूमिका का निर्वाह कर जाते हैं। इसके विपरीत पश्चिमी
अभिनय के तरीके में उपरी रंग ढंग भी बदलता है जैसे कि "पेस्टन जी" में
नसीर साहब ने अपना रूप ही बदल दिया था। इसीलिए पश्चिम में अभिनय के
सन्दर्भ में "पात्र" शब्द चलन में नहीं है.... करैक्टर या रोल शब्द चलन
में है।

इसके विपरीत आप देखेंगे कि अमिताभ बच्चन हर समय अमिताभ बच्चन भी लगते हैं
और क़ुली भी, डॉन भी, सौदागर भी, आदि आदि ....क्यों कि "पात्र" नहीं बदलता
केवल उसकी भूमिका बदलती है।

Abhay Tiwari

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Jun 20, 2010, 10:50:43 PM6/20/10
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जहाँ तक मेरी समझ में आ रहा है यह शब्द पत्‌ धातु से निकला है। जिस के अर्थ हैं- गिरना, उतरना और उड़ना।
इस धातु से निकले अन्य शब्द हैं- पतन, पतित, पत्र/पत्ता, पाताल (गिरने/उतरने के अर्थ में), और पतंग और पताका (उड़ने के अर्थ में)
 
आप्टे जी के कोष में इसके आगे लिखा है -पाति रक्षति। शायद इसका अर्थ होगा गिरे हुए की रक्षा करता है।
पात्र के अर्थ है : कोई भी बर्तन, किसी वस्तु का आधार, जलाशय, योग्य व्यक्ति।
एक और व्युत्पत्ति भी दी है - पा+ष्ट्रन्‌। इस पा धातु का अर्थ है पीना। मतलब हुआ पीने का बर्तन या प्याला।
 
अन्य लोग इसे सुधारें।

अजित वडनेरकर

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Jun 21, 2010, 12:48:45 AM6/21/10
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शब्दों का सफर की एक पुरानी पोस्ट पतुरिया पर लिखी थी। पतुरिया शब्द का मूल पात्र ही है। यह बहुत दिलचस्प शब्द है और इसकी व्युत्पत्ति उसी पा धातु से हुई है जिससे पिता, पालक, पालित, पाल, पति जैसे शब्द बने हैं जिनमें आधार देने, पालन करने जैसे भाव हैं। आज यहां पात्र पर शब्दचर्चा देखी तो नए संदर्भ में उसे कुछ और  संशोधित कर दिया है। अभय भाई इसकी व्युत्पत्ति पत् धातु से बता रहे हैं जो सही नहीं है। हालांकि ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य दोनों ही पत् से पतुरिया के रिश्ते का भ्रम पैदा करते हैं। हालांकि अभयजी पात्र का रिश्ता पत् से जोड़ रहे  हैं। इस बारे में विस्तार से सफर पर लिखा आलेख ज़रूर पढ़ें।
पेश है शब्दों का सफर पर ताजा संशोधित पोस्ट -
कुलटा बन गई पतुरिया


2010/6/21 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



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शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

अभय तिवारी

unread,
Jun 21, 2010, 1:41:07 AM6/21/10
to शब्द चर्चा
अजित भाई,

पात्र के नीचे आप्टे जी ने आप्टे जी के कोष में इसके आगे लिखा है -पाति
रक्षति। इस पा का अर्थ सम्भवतः रक्षा से है, जिस ओर आप इशारा कर रहे हैं,
तो शायद इसका अर्थ होगा - जो रक्षा करता है। लेकिन पा का यहाँ पर एक
दूसरा अर्थ पातिन्‌ से भी हो सकता है जो पत्‌ (गिरना, बहना) धातु से
सम्बन्धित है और जिसका अर्थ है उड़ेला हुआ। अब इसमें ध्यान देने योग्य बात
है कि इसमें पा के साथ त्र लगा हुआ है। इस त्र में त्रै धातु का तारने का
भाव है, उद्धार करने का। 'त्राहि माम' पुकार का अर्थ होता है.. मुझे
बचाओ।

ये मेरा दावा नहीं है.. बस एक प्रस्तावना है.. सम्भव है निराधार हो..

या फिर आप्टे के द्वारा दी हुई दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार पा+ष्ट्रन्‌।
यहाँ पा धातु का अर्थ है पीना। मतलब हुआ पीने का बर्तन या प्याला।

और जैसा आप ने बताया कि पालक पा धातु से निकल रहा है तो पाल्‌ धातु
बेचारी किस को जन्म दे रही है?

अजित वडनेरकर

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Jun 21, 2010, 1:50:22 AM6/21/10
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अभय भाई,
पा ध्वनि (या धातु) ही महत्वपूर्ण है। मिलती-जुलती अर्थध्वनियों वाली धातुएं होती हैं। पा में रक्षित करने, पालने का भाव आप्टेकोश में भी स्पष्ट है। इसे उपसर्ग के साथ देखें-परि-पा, प्रति-पा यानी पालना, बचाना, स्थिर रखना आदि। मूल भाव पा में है। विशिष्ट शब्दों के लिए अधिक शुद्ध धातुओं की खोज हुई। पालक के लिए पाल् इसी कड़ी की धातु है। किन्तु इसमें पा निहित है और इसीलिए पा में निहित रक्षा का भाव भी पाल् में है। ....और गौर करें पा में निहित पीने का भाव भी ग्रहण करने, आधार बनाने या रक्षित करने (गटकने, हड़पने) के अर्थ में प्रकट हो रहा है। गौरतलब है धातु परिशुद्ध अवस्था में कभी नहीं मिलती, उसे तो खोजा जाता है। एक से अधिक रूपों की खोज सिर्फ संदर्भित शब्द के परिशुद्ध मूल तक पहुंचने की प्रक्रिया है। प्रकृति में भी धातुएं कहां शुद्ध मिलती हैं? सोना, चांदी, ताम्बा, जस्ता सभी के पार्थिव यौगिक रूप ही मिलते हैं। इनमें मूल या धातु की तलाश होती है।

2010/6/21 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>

Pritish Barahath

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Jun 21, 2010, 2:14:16 AM6/21/10
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क्या इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि बरतन के रूप में सबसे पहले पेड़ों के पत्तों अर्थात पत्र का उपयोग हुआ जिससे बाद में आविष्कृत सभी बरतनों को पात्र कहा गया और उसका अर्थ विस्तार ही रक्षा करने वाले, समाने वाले, संभालने वाले अर्थों तक गया जैसे पिता आदि। क्या इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है ?
--
Pritish Barahath
Jaipur

अजित वडनेरकर

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Jun 21, 2010, 2:35:27 AM6/21/10
to shabdc...@googlegroups.com
बिलकुल देखा जा सकता है। अर्थवत्ता का विकास इसी तरह होता है। इस तरह पत् धातु का रिश्ता भी जुड़ता है। अभय भाई की टिप्पणी भी कुछ ज्यादा सोचने पर जोर दे रही है।

2010/6/21 Pritish Barahath <priti...@gmail.com>
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