भरतमुनी ने अभिनेता के शरीर को बर्तन (पात्र) बताया है जिसमें किसी भी
भूमिका या चरित्र की आत्मा समा जाती है। इसलिए भारतीय अभिनय परम्परा में
अभिनेताओं का उपरी रंग ढंग नहीं बदलता और वे हर भूमिका में एक से दिखते
हुए भी अलग अलग भूमिका का निर्वाह कर जाते हैं। इसके विपरीत पश्चिमी
अभिनय के तरीके में उपरी रंग ढंग भी बदलता है जैसे कि "पेस्टन जी" में
नसीर साहब ने अपना रूप ही बदल दिया था। इसीलिए पश्चिम में अभिनय के
सन्दर्भ में "पात्र" शब्द चलन में नहीं है.... करैक्टर या रोल शब्द चलन
में है।
इसके विपरीत आप देखेंगे कि अमिताभ बच्चन हर समय अमिताभ बच्चन भी लगते हैं
और क़ुली भी, डॉन भी, सौदागर भी, आदि आदि ....क्यों कि "पात्र" नहीं बदलता
केवल उसकी भूमिका बदलती है।
पात्र के नीचे आप्टे जी ने आप्टे जी के कोष में इसके आगे लिखा है -पाति
रक्षति। इस पा का अर्थ सम्भवतः रक्षा से है, जिस ओर आप इशारा कर रहे हैं,
तो शायद इसका अर्थ होगा - जो रक्षा करता है। लेकिन पा का यहाँ पर एक
दूसरा अर्थ पातिन् से भी हो सकता है जो पत् (गिरना, बहना) धातु से
सम्बन्धित है और जिसका अर्थ है उड़ेला हुआ। अब इसमें ध्यान देने योग्य बात
है कि इसमें पा के साथ त्र लगा हुआ है। इस त्र में त्रै धातु का तारने का
भाव है, उद्धार करने का। 'त्राहि माम' पुकार का अर्थ होता है.. मुझे
बचाओ।
ये मेरा दावा नहीं है.. बस एक प्रस्तावना है.. सम्भव है निराधार हो..
या फिर आप्टे के द्वारा दी हुई दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार पा+ष्ट्रन्।
यहाँ पा धातु का अर्थ है पीना। मतलब हुआ पीने का बर्तन या प्याला।
और जैसा आप ने बताया कि पालक पा धातु से निकल रहा है तो पाल् धातु
बेचारी किस को जन्म दे रही है?