बोली, भाषा, और परिभाषा

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Madhusudan H Jhaveri

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May 5, 2012, 12:18:10 PM5/5/12
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जो व्याख्यायित शब्द पारिभाषिक शब्दावली से आते हैं, वे विशेषज्ञों के विशेष शब्द होते हैं।आम बोलचाल में वैसे शब्द आपको नए होनेके कारण कुछ क्लिष्ट लग सकते हैं। शब्द बार बार प्रायोजित होने से परिचित और फिर रूढ हो जाता है।
इस आधार पर शब्दों के तीन वर्ग किए जा सकते हैं।
(क)बोलचाल की बोली भाषा के शब्द, और  (ख) साहित्यिक भाषा के शब्द। (ग) व्याख्यायित विशेष शब्द।
व्याख्यायित विशेष शब्द जब तक व्याख्यायित हो कर मानक बन कर सामने बार बार नहीं आता, तब तक आपको नया और अपरिचित लग सकता है।
शब्द परिचित और रूढ होने पर स्वीकृत हो जाता है।
६५ वर्ष से स्वतन्त्र होने के बाद भी, आज हम बिलकुल प्राथमिक अवस्था में ही है।
हिन्दी की कल की विकसित अवस्था हम पर निर्भर करती है।
निम्न कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।
प्रश्न:
 आपको अंग्रेज़ी व्याख्यायित शब्द सरल लगता है, या उसका संस्कृत/हिन्दी रूप?
ये शरीर शास्त्र (और anatomy) की पुस्तक से लिए गए हैं।



(१) भ्रू संकोचनी Corrugator supercilli भौंह सिकुडने वाली पेशियां।
(२) नेत्र निमीलनी: Orbicularis Oculi नेत्रों को बंद करनेवाली पेशियां।
(३)नासा संकोचनी: Compressor naris नाक को सिकुडनेवाली पेशियां।
(४)नासा विस्फारणी: Dilator naris नाक विस्फारित करनेवाली पेशियां।

संस्कृत के शब्द अपना अर्थ साथ बहाकर ले जाते हैं। अंग्रेज़ी(लातिनी) के नहीं।

समस्त भारत के लिए संस्कृत प्रचुर (बहुसंख्य शब्द)हिन्दी  स्वीकृत कराने में कम विरोध होगा।
यह बात उत्तर भारतवासियों की समझ में आने में हमेशा कठिनाई अनुभव होती है।
वे (क्षमस्व)हिन्दी को अपना एकाधिकार समझ लेते हैं। ऐसे वर्चस्ववादी पैंतरें से हम हिन्दी को समग्र भारत की भाषा का स्थान दिलाने में कठिनाई अनुभव करेंगे।
यही सूत्र मुझे एक (गुजराती को)हिन्दी के पक्ष में, कहना है। विरोध मेरा निश्चित ही होगा, पर मैं मौन रहकर यह बात कोई और कह नहीं पाएगा। कह नहीं रहा है। सारी प्रतिक्रियाएं पढूंगा, कुछ छुट्टी का समय है।
मधुसूदन

Dhananjay Chaube

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May 5, 2012, 1:13:45 PM5/5/12
to shabdc...@googlegroups.com
मधुसूदन जी,

मैं आपकी बात के पूर्ण समर्थन में हूँ। हिंदी को एक विकसित और आधुनिक
ज्ञान-विज्ञान की वाहक-भाषा बनाने के लिए इसमें सुस्पष्ट और सटीक
पारिभाषिक शब्दावली का विकसित होना आवश्यक है। संस्कृत आधारित पारिभाषिक
शब्द न केवल हिंदी बल्कि लगभग संपूर्ण भारत में सरलता से मान्य हो
सकेंगे। कम से कम मुझे तो यही एकमात्र मार्ग दिखाई देता है।

सादर
धनंजय

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