"संज्ञा" शब्द का अर्थ क्या है?

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sushrut

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Jul 8, 2010, 12:44:35 AM7/8/10
to शब्द चर्चा
संज्ञा शब्द कैसे बनाया गया? जितनी भी भाषा है, वो कैसे तैयार की गई?
सबसे पहले किसने और कौनसा शब्द बोला होगा? उस वक्त उसके मन में क्या चल
रहा होगा (भाषा के बारे में ही, सिर्फ..)?

सुश्रुत.(Sushrut)

अभय तिवारी

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Jul 8, 2010, 1:48:32 AM7/8/10
to शब्द चर्चा
सुश्रुत जी

शब्द चर्चा में आप का स्वागत है।
आप ने एक साथ बहुत कुछ पूछ लिया। अभी सिर्फ़ संज्ञा तक अपनी बात को सीमित
रख रहा हूँ।
संज्ञा = सम्‌+ ज्ञा + अङ्‌ + टाप्‌ (आप्टे जी के कोष से)
सम्‌ यहाँ उपसर्ग है और ज्ञा धातु जिसका अर्थ है जानना, पहचानना, खोजना,
अनुभव करना।
संज्ञा का अर्थ होश/चेतना के रूप में मक़बूल है।

कोई शब्द कैसे बनाया गया, इस प्रक्रिया पर लोग अनुमान ही लगा सकते हैं।
और उसके साक्ष्य भी भाषा में ही मिल सकते हैं। इस शब्द के वैदिक रूप की
कोई जानकारी हो तो इस की रचना-प्रक्रिया पर कुछ रौशनी पड़ सकती है,
क्योंकि माना जाता है वैदिक भाषा प्राकृत है और संस्कृत तो संस्कारित है
ही। पाणिनि ने व्याकरण के नियम बनाए और नए शब्दों को बनाने में भी कुछ
उनकी स्थापनाओं की भूमिका रही ही होगी।

भाषा अकेले मनुष्य के पास नहीं है, चिड़ियों के पास भी है, बन्दरों के पास
भी है, और कुत्तो के पास भी है। उनके पास शब्द अलबत्ता कम ज़रूर हैं,
लेकिन उनके आक्रमण का शब्द, समर्पण का शब्द, प्रेम का शब्द, भय और पीड़ा
का शब्द अलग-अलग होता है । छोटा बच्चा भाषा नहीं जानता लेकिन उसके पास भी
रोने और खिलखिलाने को दो शब्द (ध्वनि) होते हैं। अपने आन्तरिक भाव की
ध्वनि रूप में अभिव्यक्ति ही भाषा है।

वैसे संज्ञा का एक अर्थ सूर्य की पत्नी से भी किया जाता है- यम व यमी की
माता जी।

farid khan

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Jul 8, 2010, 10:17:12 AM7/8/10
to शब्द चर्चा
और संज्ञा को उर्दू में 'इस्म' कहते हैं।

अजित वडनेरकर

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Jul 8, 2010, 1:16:33 PM7/8/10
to shabdc...@googlegroups.com
एक दिलचस्प पोस्ट बनी थी फरीद भाई इस्म पर।
देखें यहां- मोटे असामी का इस्मे-शरीफ़

2010/7/8 farid khan <kfari...@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Ashutosh Kumar

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Jul 8, 2010, 1:59:39 PM7/8/10
to शब्द चर्चा
सब से पहले से क्या मुराद है , सुश्रुत जी?अक्सर भौतिकीविद मानतें है कि
समय की शुरुआत महाविस्फोट से हुयी थी. महाविस्फोट तो अनहद नाद ही था.
सब से पहले ह्युमोनोइड मानव शिशु ने तो, माशाअल्लाह, कहां कहां ही कहा
होगा. तब वह क्या सोच रहा होगा/होगी ?भाषा में तो नहीं सोच रहा होगी/
होगा, जो थी ही नहीं. कहां कहां से भाषा ने जन्म लिया होगा. और फिर इस
सवाल ने कि 'ये कहाँ आ गए हम...'. और यहीं से सोच, दर्शन, धर्म और
विज्ञान की शुरुआत हुयी होगी. ये अटकलबाजी कुछ जमती है, ऋषिवर ?

sumant

unread,
Jul 10, 2010, 1:49:52 AM7/10/10
to शब्द चर्चा
संज्ञा अर्थात सम्यक ज्ञान, किसका? उस परम सत्य का जिससे यह सब कुछ बना
है, जो दृश्यमान है और जो अदृश्य है। अन्तत: जिसका निपात शब्द में होता
है और शब्द स्वयं उस परम तत्व का वाचक है, परम तत्व तो स्वयं प्रकाश रूप
है। शब्द , वह जो अब्द या जलवत है और आबद्ध है उस कवच में जिसे वाक कहते
हैं। अनाहत यदि बिगबैंग है तो आहत क्या है/होगा? आहत और अनहत तो नाद के
विशेअषण हैं।

ashutosh kumar

unread,
Jul 10, 2010, 4:09:07 AM7/10/10
to shabdc...@googlegroups.com
कतिपय जिज्ञासाएं-
जिसका निपात संभव हो  ,क्या  वह परम सत्य हो सकता है?
क्या परम सत्य और परम तत्व एक ही हैं?
व्याकरण में शब्द में शब्द का ही  निपात संभव है. तो  शब्द क्या परम तत्व  का वाचक नहीं, स्वयं परम तत्व  है? क्या वाचक्त्व और तत्तत्व  में एकत्व है?    
परम तत्व यदि प्रकाश रूप  है, तो क्या तत्व और रूप में अभेद है?रूपत्व ही तत्तत्व है?रूप ही तत्व है?रूप  सतत परिवर्तनशील है,क्या तत्व भी?यदि हाँ तो वह परम कैसे है?  
परम सत्य का निपात शब्द में हो जाता है, शब्द वाक् में आबद्ध हो जाता है,वाक् अंतरिक्ष में विलीन  हो जाता है, तो  परम सत्य के परमत्व का क्या होता है? क्या वह पतनशील , आबद्ध्नीय और विलेयमान   है?
क्या सत्य के अनेक संस्तर होतें है, यथा अधम सत्य, औसत सत्य , उत्तम सत्य, उत्तमोत्तम सत्य , परम सत्य, परात्पर सत्य, आदि आदि ?  

नचिकेता प्रसंग से प्रेरित हो कतिपय जिज्ञासाएं उपस्थित करने की धृष्टता कर रहे इस अज्ञानी पामर के अपराध क्षमा  से परे न होंगे , इस अपेक्षा के साथ -
विनीत 
आशुतोष
  

sumant

unread,
Jul 10, 2010, 2:02:44 PM7/10/10
to शब्द चर्चा
तत्व जब तक अनबुद्ध (अनमेनिफेस्ट) रहता है तब तक वह हस्त आमलकवत न तो
दृष्ट होता है और न पकड़ में आता है, जैसे ही उदबुद्ध (मैनिफेस्ट) हो
जाता है, पकड़ में भी आने लगता है और दृष्ट भी हो पड़ता है। यह उदबुद्ध
होना, प्रकट होंना, दृष्ट होंना ही तत्व का सत्य में रूपांतरण है।
सत्तारूप में भासमान तत्वरूप सत्य का ही नाम और रूप है। नाम और रूप से ही
तत्व को जाना जाता है।

जिसका निपात, निवेश, प्रवेश एवं अवतरण सर्वत्र, सार्वकालिक और सर्वव्यापी
होगा, वह परम तत्व ही परम सत्य हो सकता है। निपात कोई पतित होना नहीं है,
केन्द्र से परिधि की ओर जाना है, ऊपर से नीचे की ओर उतरना है, अंदर से
बाहर की ओर प्रकट होंना है।

शब्द स्वयं उस परम तत्व का वाचक है, तस्य वाचक: प्रणव:, यह पहले ही कहा
जा चुका है। शब्द परम तत्व की संतति है, परम तत्व नहीं, इसीलिए वाचक है।
वाचकत्व और तत्तत्व में परमार्थत: एकत्व है, व्यवहार्यत: अनेकत्व है।
इसीलिए कहा गया है कि दो ब्रह्म जाननें योग्य हैं, शब्द ब्रह्म और परम
ब्रह्म।

रूप का सन्निधान अंतत: तत्व में ही निवसित है अतएव अभेद है, किन्तु
रूपायतन, सत्तावान होंने पर ही दृष्टव्य होता है अत: भेद स्वाभाविक है।
इसीलिए रूप तत्व नहीं है। रूपत्व यदि तत्तत्व होता तो प्रियतमा का चित्र
अंतत: पूर्ण रति में निष्पन्न होता। अग्नि या ऊर्जा का स्वभाव है, ताप,
प्रकाश और उष्णता प्रदान करना, रूप भिन्न-भिन्न हो सकते है, यह सभी जानते
हैं। इसलिए रुप परिवर्तनशील हो सकता है, तत्व नहीं। यही अग्नि की सनातनता
है। इसीलिए वह परम (तत्व) है।

नि:सन्देह, परम सत्य का शब्द में, शब्द का वाक में और वाक का लय परम तत्व
में हो जाता है। इसीलिए परम सत्य, परम तत्व में लीन हो जाता है। अंतरिक्ष
स्वयं वाक के गर्भ में है, उसी वाक में विलीन होता है, इसीलिए यह स्रष्ट
हुआ जगत वाङ्‍मय कहा जाता है। इसी को नासदीय सूक्त व्याख्यायित करता है।
इसीलिए कुछ क्षण पहले तक सत्य सा प्रतीत होंने वाला पाँच हाथ का मिट्टी
का पुतला भूमि पर पड़ा रह जाता है, वाक अपनें समस्त आनुषांगिकों के साथ
परम तत्व में लीन होंने चल पड़ती है।

परमार्थत: परम सत्य-परम सत्य ही होता है, व्यवहार्यत: सत्य, दृष्टि
सापेक्ष, स्थिति सापेक्ष और स्रष्टि सापॆक्ष होता है।

पितृव्य के उलाहनें से संतप्त नचिकेता यम के यहाँ तीन दिन तक प्रतीक्षा
के उपरान्त, यम के आग्रह पर तीन समाधान माँगता है, और अंतत: धर्मराज के
उपकृत करनें के पश्चात वह नाचिकेत हो जाता है। यमराज, धर्मराज भी हैं और
नचिकेता, नाचिकेता भी। सचमुच अत्यंत रहस्योदघाटक प्रकरण है। मनोविज्ञान
के संधित्सुओं के लिए तो विशेषकर।

“अनहत यदि बिगबैंग है तो आहत क्या है/होगा? आहत और अनहत तो नाद के विशेषण
है।” यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। सुमंत

Rangnath Singh

unread,
Jul 10, 2010, 4:56:14 PM7/10/10
to shabdc...@googlegroups.com
इसके लिए पूरी तरह आशुतोष जी जिम्मेदार हैं :-)

अजित वडनेरकर

unread,
Jul 11, 2010, 3:51:04 AM7/11/10
to shabdc...@googlegroups.com
सुखिया सब संसार, खावै और सोवै।
दुखिया
दास कबीर जागै और रोवै।।


2010/7/11 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Jul 11, 2010, 3:52:14 AM7/11/10
to shabdc...@googlegroups.com
सुखिया सब संसार  है , खावै अरु सोवै।
दुखिया
दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।


2010/7/11 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>
इसके लिए पूरी तरह आशुतोष जी जिम्मेदार हैं :-)

sushrut jalukar

unread,
Jul 11, 2010, 6:08:29 AM7/11/10
to shabdc...@googlegroups.com, rangna...@gmail.com
:-)

सिर्फ हम जैसे ही आस लगाए और बैठे होवे..।
-------------

2010/7/11 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

ashutosh kumar

unread,
Jul 12, 2010, 6:38:27 AM7/12/10
to shabdc...@googlegroups.com
सप्ताहांत वैसे भी हम जैसे दूर-युगलों  (tele-couples) के लिए ख़ास होता है. तिस पर अबकी शरीकेहयात वन्दना की वर्षगाँठ  भी थी.सो कुछ समय के लिए इस संत सभा से अनुपस्थित रहना पडा. लौट के देखता  हूँ कि  शब्द चर्चा कई प्रकाश वर्ष आगे जा चुकी है.अब इसे शब्द विनोद कहें या ब्रह्म चर्या , महज शब्द चर्चा तो यह रही नहीं. खैर , विशुद्ध कुछ होता नहीं , और शब्द में ब्रह्म की मिलावट न होगी , तो क्या मिटटी के तेल की होगी?
अनुगृहीत हूँ सुमंत जी का  कि  मेरी अबोध जिज्ञासाओं के समाधानं के लिए उन्होंने इतना परिश्रम किया, 

महाविस्फोट अथवा बिग -बैंग किसी आघात से उद्भूत न था, ऐसा इस सिद्धांत के सभी समर्थक  मानते हैं.आघात संभव ही न था , क्योंकी वह एक एकत्व था. ( बिंग बैंग सिंगुलैरिटी - देश और काल का ऐसा  एकत्व , जहां भौतिकी के नियम अपनी वजूद खो  देते है .)आघात के लिए द्वैत जरूरी है. महाविस्फोट से ही देश और काल के द्वैत  और उन के पारस्परिक उद्विकास की यात्रा शुरू होती है,इस पर   लगभग मतैक्य है. नाद या ध्वनि  का उद्भव कम्पन से होता है , और कम्पन का आघात से , इस लिए जहां तक भौतिकी का सम्बन्ध है, महाविस्फोट के अनंतर उद्भूत प्रत्येक ध्वनि आहत ध्वनि है . अनाहत(अनहद) नाद केवल किसी एकत्व के विस्फोट से संभव है , और वह महाविस्फोट के अतिरिक्त केवल ब्लैकहोल के आतंरिक विस्फोट [ सुपरनोवा ] में संभव होता है. यह भी आघातोद्भूत न हो कर , एक अन्तः स्फोट है , जो अपनी ही गहनता को न सम्हाल पाने का फल है.  अन्तः स्फोट को कोई चाहे तो काव्यन्याय  से कबीर की शून्य समाधि से जोड़ सकता है, लेकिन अभी हम विज्ञान के इलाके की बातें कर रहें हैं , न  कि काव्य और दर्शन के.

आप के द्वारा संकेतित नासदीय सू क्त की  दार्शनिको  और  वैज्ञानिकों  के  बीच  समान  लोकप्रियता का रहस्य यही है, उस में बिग बैंग सिंगुलैरिटी के रहस्मय संकेत मिलतें हैं. महाविस्फोट के पूर्व न अस्तित्व था , न अनस्तित्व, क्योंकि ये दोनों स्थितियां देश और काल से निरपेक्ष नहीं हो सकतीं , जबकी  देश  और काल का उद्भव ही महाविस्फोट से होता है .  उसके पहले क्या था यह प्रश्न  ही निरर्थक है, क्योंकि इस प्रश्न में काल अनुस्यूत है,जिस की अवधारणा महाविस्फोट के पूर्व असंभव है. अस्तित्व और अनस्तित्व , दोनों को एक साथ नकारना निश्चय ही सूक्तकार की असाधारण अंतर्दृष्टि का परिणाम है, क्योंकि अवधारणा के स्तर पर भी इस की उद्भावना   महाविस्फोट सिंगुलैरिटी की खोज के पहले संभव न थी.जैसे कि  देश के साथ काल की अनुपस्थिति की अवधारणा भी . 
सूक्तकार की असाधारण मेधा सूक्त के अंतिम शब्दों से भी प्रमाणित होती है , जिस से यह संकेत मिलता है कि ब्रह्मांड के उद्भव के विषय में अंतिम सत्य शायद कोई नहीं जानता. सत्य और ज्ञान की जिस सापेक्षता का संकेत इस वाणी से मिलता है, उस की सैद्धांतिक परिकल्पना आइन्स्टीन के सापेक्षतावाद , हायिजन्बर्ग  के अनिश्चितता के सिद्धांत  और उत्तरसंरचनावादी भाषावैज्ञानिक दार्शनिकता के पूर्व कठिन थी.{ http://home.comcast.net/~prasadmail/nAsadeeyasUktam-s.pdf } 
   
  परम सत्य की किसी भी अवधारणा को ठुकराने वाले, जिज्ञासा और प्र्श्नवाचाकता की अन्यतम दार्शनिक उपलब्धियों की ओर संकेत करने वाले इस सूक्त में आप ने किस विध परम तत्व की व्याख्या ढूंढ निकाली , इस अज्ञानी  पामर के समक्ष किसी भाँती स्पस्ट नहीं हो पा रहा.
व्यवहार्यत: सत्य, दृष्टि
सापेक्ष, स्थिति सापेक्ष और स्रष्टि सापॆक्ष होता है।' आप के इस वाक्यांश से स्पस्ट है कि सापेक्ष सत्य ही व्याव्हारिक है.   जो इस के अतिरिक्त है, अर्थात अव्यावहारिक है, उस की संज्ञा पारब्रह्म हो , परम ब्रह्म हो, परमार्थतः परम सत्य हो , परम तत्व हो , वह एक परम भ्रम के सिवा और कुछ नहीं है. उस का मनोविनोदार्थक  मूल्य जो भी  हो,मानवीय मूल्य कुछ  नहीं है. इस परम भ्रम पर पर्दा डालने के लिए चाहे तत्व रूप में उद्भुध होता हुआ सत्य में रूपांतरित हो जाए, चाहे निपात केंद्र और परिधि के सन्निपात में बदल जाए    चाहे भेद और अभेद का वांग्मय मायारूप और वस्तुसत्य के सन्निधान में बदल जाए !अद्वैतवाद की माया यह है की वो सत्य , ज्ञान , मुक्ति  जैसे jeevanmoolyon का भी kathor  shreneekaran करtee huyi samaajik shreneekaran को एक daarshanik kawach pradaan krne के siwa मानवीय chintan और kalpanaa के उद्विकास में कोई yogdaan नहीं kartee . नासदीय सूक्त , saankhy. और chaaruvaak के ytnon से viksit हो रही taarkik bhaarteey जिज्ञासा की uplabdhiyonn को haashiye पर dhakelne में use kyon और kaise safaltaa mili, इस prasang पर phir kabhee.
hameshaa की tarah aashaa है की meri soch की khaamiyon की ओर संकेत करने में santjan न हिचकेंगे.  main swayam को sanshodhit करने के लिए sadaiv tatpar हूँ , kyon की परम सत्य jaisee कोई vastu  nahee होती . सत्य sadaiv सापेक्ष होता है. haan , सापेक्षता  MANMAANAAPAN  NAHEEN HAI, क्योंकि उस की sambhaavy [probable] deshkaal awasthiti को वैज्ञानिक रूप से theek theek tay किया jaa सकता है. 
                        
 


दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jul 12, 2010, 10:44:53 AM7/12/10
to shabdc...@googlegroups.com
इस महाविस्फोट के सिद्धांत को सांख्य के सिद्धांत के साथ देखें। जहाँ अकेले प्रधान है जिस के तीन घटक सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। ये तीनों अंतर्क्रिया में लीन हैं और साम्य बनाए हुए हैं। जैसे ही इन का साम्य भंग होता है विस्फोट हो कर सृष्टि रचना आरंभ होती है।
फर्क इतना ही है कि हम ने प्रधान को सिंगुलरिटी नाम दे दिया है लेकिन वास्तव में वह सिंगुलरिटी है नहीं। वह भी त्रिगुण घटकों से मिल कर बनती है।
आप चाहें तो अनवरत पर सांख्य की यह श्रंखला पढ़ सकते हैं।

2010/7/12 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,

Rangnath Singh

unread,
Jul 12, 2010, 11:28:12 AM7/12/10
to shabdc...@googlegroups.com
इस चर्चा को पढ़कर परमानन्द की प्राप्ति हुई है।

On 7/12/10, दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com> wrote:
> इस महाविस्फोट के सिद्धांत को सांख्य के सिद्धांत के साथ देखें। जहाँ अकेले
> प्रधान है जिस के तीन घटक सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। ये तीनों अंतर्क्रिया
> में लीन हैं और साम्य बनाए हुए हैं। जैसे ही इन का साम्य भंग होता है विस्फोट
> हो कर सृष्टि रचना आरंभ होती है।
> फर्क इतना ही है कि हम ने प्रधान को सिंगुलरिटी नाम दे दिया है लेकिन वास्तव
> में वह सिंगुलरिटी है नहीं। वह भी त्रिगुण घटकों से मिल कर बनती है।

> *आप चाहें तो अनवरत पर सांख्य की यह श्रंखला पढ़ सकते
> हैं।<http://anvarat.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF>
> *

>> http://home.comcast.net/~prasadmail/nAsadeeyasUktam-s.pdf<http://home.comcast.net/%7Eprasadmail/nAsadeeyasUktam-s.pdf>


>> }
>>
>> परम सत्य की किसी भी अवधारणा को ठुकराने वाले, जिज्ञासा और प्र्श्नवाचाकता
>> की अन्यतम दार्शनिक उपलब्धियों की ओर संकेत करने वाले इस सूक्त में आप ने किस
>> विध परम तत्व की व्याख्या ढूंढ निकाली , इस अज्ञानी पामर के समक्ष किसी
>> भाँती
>> स्पस्ट नहीं हो पा रहा.
>> ' व्यवहार्यत: सत्य, दृष्टि
>> सापेक्ष, स्थिति सापेक्ष और स्रष्टि सापॆक्ष होता है।' आप के इस वाक्यांश से
>> स्पस्ट है कि सापेक्ष सत्य ही व्याव्हारिक है. जो इस के अतिरिक्त है,
>> अर्थात अव्यावहारिक है, उस की संज्ञा पारब्रह्म हो , परम ब्रह्म हो,
>> परमार्थतः
>> परम सत्य हो , परम तत्व हो , वह एक परम भ्रम के सिवा और कुछ नहीं है. उस का
>> मनोविनोदार्थक मूल्य जो भी हो,मानवीय मूल्य कुछ नहीं है. इस परम भ्रम पर

>> पर्दा डालने के लिए चाहे तत्व रूप में उद्भुध होता हुआ सत्य में *रूपांतरित*
>> हो
>> जाए, चाहे निपात केंद्र और परिधि के सन्निपात में बदल जाए * ** **, * चाहे

sumant

unread,
Jul 13, 2010, 6:24:16 AM7/13/10
to शब्द चर्चा
सूर्य, पृथ्वी के चक्कर लगा रहा है-यह दृष्टि सापेक्षता है, पृथ्वी,
सूर्य के चक्कर लगा रही है-यह स्थिति सापेक्षता है और सूर्य,पृथ्वी तथा
अन्यान्य पिण्ड आकाशगंगा के केन्द्र को आधार बना भ्रमण कर रहे हैं-यह
स्रष्टि सापेक्षता है। अर्थात सापेक्षता किसी अपेक्षा से होती है अर्थात
पहले से कुछ है तभी कुछ सापेक्ष होगा। शून्य के सापेक्ष क्या हो सकता
है?

समस्त वैदिक साहित्य विज्ञान सहित ज्ञान की विचारणा करता है। विज्ञान की
उपेक्षा नहीं। वैदिकों की मुख्य धारा विज्ञान विरोधी नहीं है। आधुनिक
विज्ञान उसी की पुष्टि कर रहा है जो वेदादि में संकेतित है। नासदीय
सूक्त, अघमर्षण सूक्त, पुरुष सूक्त एवं हिरण्यगर्भ सूक्त को क्रमवार
देखनें और मनन करनें से चित्र स्पष्ट होता है। आधुनिक विज्ञान की अपनी
परंपरागत शब्दावलि है, उसी भांति वेदादि की अपनी पारंपरिक शब्दावलि है।
समन्वय के अभाव से भ्रम है। वैदिक विज्ञान का प्रायोगिक ज्ञान नष्ट
प्राय: है, आधुनिक विज्ञान उसका पुनरुद्धार कर रहा प्रतीत होता है। ऎसा
पहली बार नहीं हो रह है। वेद, रामायण एव्ं गीता में बार-बार यह दुहराय
गया है कि नष्ट हुआ ज्ञान पुन: प्रदान किया जा रहा है। भौतिक विज्ञान से
उत्पन्न भौतिक अहंकार का परिणाम अंतत: युद्धो में ही परिणत होता देखा
जाता है। इसीलिए ज्ञान सहित विज्ञान की बात भारतीय मनीषा करती रही है।

शुद्ध वैज्ञानिक भ्रमित नहीं हैं, प्रेरित करनें वाले विचार जहाँ से
मिले, वेद से भी, लेनें में संकोच नहीं करते। विज्ञानवादी ही व्यर्थ
कोलाहल करते रहते हैं। ब्रह्माण्ड के उद्‌भव के विषय में वेद भी अंतिम
बात नही करते। इसीलिए ऋषि दीर्घतमा कहते हैं को अद्धा वेद क इह प्रवोचद।
किन्तु जहाँ तक जाना उसके बाद भी कुछ है यह संकेत वह स्पष्ट रूप से कर
रहे हैं। भविष्य में भी वह जाना जा सकेगा, कौन कह सकता है? वस्तुत: जानते
जानते स्थिति तद्‌वत हो जाने वाली हो जाती है। क्या बोधिसत्व के बाद
बुद्ध कुछ बता सके? सिवाय यह कहनें के कि अप्पदीपो भव। क्या लार्ज
हेड्रान कोलाइडर कुछ कह पायेगा, गाड पार्टिकिल के विषय में, और क्या वह
अंतिम बात होगी?

आदरणीय द्विवेदी जी सांख्य की अधूरी व्याख्या चटोपाध्याय जी से प्रेरित
होकर कर , मनोनुकूल ढंग से कर रहे हैं। द्विवेदीजी पुरुष को नकारकर
प्रकृति को स्रष्टा बता रहे हैं। यदि पुरुष के स्थानापन्न, बिगबैंग को ही
एकमात्र कर्ता मान लिया जाए तो क्या अब उसका समबंध सौर परिवार से समाप्त
हो गया? और अगर समबन्ध है तो वह हमें कैसे प्रभावित करता है? विज्ञान
डायनेमिक एनर्जी को कायनेटिक एनर्जी में बदलनें के लिए वाह्‌य बल की बात
करता है, अगर यह बल नेबुला में स्वस्फूर्त है तो विज्ञान के वाह्य बल के
सिद्धांत का क्या होगा? विशेषतया तब जब कि अभी ब्लैक होल के स्वरूप और
क्रियाविधि को समझा जाना शेष है।

सागर में सतत उठती रहनें वाले तरंगो की भाँति स्फोट एक सतत चलनें वाली
क्रिया है, (समझनें के लिए)अनहत भी वैसा ही है, यह तब तक चलेगा जब तक
सूर्य के प्रबल ताप से सागर सूख न जाये। दीर्घ काल तक स्फोटों की ऊर्जा
की संघनित अवस्था से सृजित हिरण्यगर्भ मे संचित ताप की अत्यधिक ऊर्जा से
हुए विस्फोट से स्रष्टि का विस्तार होता है। यहाँ से आहत नाद का कार्य
व्यापार प्रारंभ होता है। सामान्य रुप से हमारा समबंध इसी से रहता है,
किन्तु इनका समबन्ध, अनहत से बना ही रहता है, प्रेरणा, ऊर्जा, चेतना वहीं
से मिलती है।

इस पूरी चर्चा से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आशुतोष जी प्राच्य और नवीन
दोनों विज्ञानों को समझनें मे रत हैं अतएव बधाई के पात्र हैं। चूंकि यह
शब्द चर्चा का मंच है परिचर्चा का नहीं, अत: इसका पटाक्षेप करना ही उचित
होगा, क्योंकि वैतांडिको को ही रस आयेगा, शब्द रसिको को नहीं।

On Jul 12, 8:28 pm, Rangnath Singh <rangnathsi...@gmail.com> wrote:
> इस चर्चा को पढ़कर परमानन्द की प्राप्ति हुई है।


>
> On 7/12/10, दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com> wrote:
>
>
>
> > इस महाविस्फोट के सिद्धांत को सांख्य के सिद्धांत के साथ देखें। जहाँ अकेले
> > प्रधान है जिस के तीन घटक सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। ये तीनों अंतर्क्रिया
> > में लीन हैं और साम्य बनाए हुए हैं। जैसे ही इन का साम्य भंग होता है विस्फोट
> > हो कर सृष्टि रचना आरंभ होती है।
> > फर्क इतना ही है कि हम ने प्रधान को सिंगुलरिटी नाम दे दिया है लेकिन वास्तव
> > में वह सिंगुलरिटी है नहीं। वह भी त्रिगुण घटकों से मिल कर बनती है।
> > *आप चाहें तो अनवरत पर सांख्य की यह श्रंखला पढ़ सकते

> > हैं।<http://anvarat.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%...>
> > *
>
> > 2010/7/12 ashutosh kumar <ashuvand...@gmail.com>

> ...
>
> read more »

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jul 13, 2010, 8:55:27 AM7/13/10
to shabdc...@googlegroups.com
सुमंत जी,
विषय से इतर जाने की मेरी जरा भी मंशा नहीं है। उस के लिए अन्य मंच हैं और बनाए जा सकते हैं। सांख्य मे पुरुष की कोई भूमिका नहीं है। विज्ञान कहता है कि जिस की कोई आवश्यकता नहीं है उस का अस्तित्व नहीं हो सकता। यह सही है कि मैं चटोपाध्याय जी से प्रभावित हूँ। लेकिन इस मान्यता के लिए नहीं अपितु उन के भारतीय दर्शन के योगदान और विज्ञान सम्मत व्याख्याओं के कारण। हर बिंदु पर बहस की गुंजाइश है। फिर सांख्य भी सिद्धांत ही है कोई अटल सत्य नहीं।

2010/7/13 sumant <sumantmis...@gmail.com>



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