सुश्रुत.(Sushrut)
शब्द चर्चा में आप का स्वागत है।
आप ने एक साथ बहुत कुछ पूछ लिया। अभी सिर्फ़ संज्ञा तक अपनी बात को सीमित
रख रहा हूँ।
संज्ञा = सम्+ ज्ञा + अङ् + टाप् (आप्टे जी के कोष से)
सम् यहाँ उपसर्ग है और ज्ञा धातु जिसका अर्थ है जानना, पहचानना, खोजना,
अनुभव करना।
संज्ञा का अर्थ होश/चेतना के रूप में मक़बूल है।
कोई शब्द कैसे बनाया गया, इस प्रक्रिया पर लोग अनुमान ही लगा सकते हैं।
और उसके साक्ष्य भी भाषा में ही मिल सकते हैं। इस शब्द के वैदिक रूप की
कोई जानकारी हो तो इस की रचना-प्रक्रिया पर कुछ रौशनी पड़ सकती है,
क्योंकि माना जाता है वैदिक भाषा प्राकृत है और संस्कृत तो संस्कारित है
ही। पाणिनि ने व्याकरण के नियम बनाए और नए शब्दों को बनाने में भी कुछ
उनकी स्थापनाओं की भूमिका रही ही होगी।
भाषा अकेले मनुष्य के पास नहीं है, चिड़ियों के पास भी है, बन्दरों के पास
भी है, और कुत्तो के पास भी है। उनके पास शब्द अलबत्ता कम ज़रूर हैं,
लेकिन उनके आक्रमण का शब्द, समर्पण का शब्द, प्रेम का शब्द, भय और पीड़ा
का शब्द अलग-अलग होता है । छोटा बच्चा भाषा नहीं जानता लेकिन उसके पास भी
रोने और खिलखिलाने को दो शब्द (ध्वनि) होते हैं। अपने आन्तरिक भाव की
ध्वनि रूप में अभिव्यक्ति ही भाषा है।
वैसे संज्ञा का एक अर्थ सूर्य की पत्नी से भी किया जाता है- यम व यमी की
माता जी।
जिसका निपात, निवेश, प्रवेश एवं अवतरण सर्वत्र, सार्वकालिक और सर्वव्यापी
होगा, वह परम तत्व ही परम सत्य हो सकता है। निपात कोई पतित होना नहीं है,
केन्द्र से परिधि की ओर जाना है, ऊपर से नीचे की ओर उतरना है, अंदर से
बाहर की ओर प्रकट होंना है।
शब्द स्वयं उस परम तत्व का वाचक है, तस्य वाचक: प्रणव:, यह पहले ही कहा
जा चुका है। शब्द परम तत्व की संतति है, परम तत्व नहीं, इसीलिए वाचक है।
वाचकत्व और तत्तत्व में परमार्थत: एकत्व है, व्यवहार्यत: अनेकत्व है।
इसीलिए कहा गया है कि दो ब्रह्म जाननें योग्य हैं, शब्द ब्रह्म और परम
ब्रह्म।
रूप का सन्निधान अंतत: तत्व में ही निवसित है अतएव अभेद है, किन्तु
रूपायतन, सत्तावान होंने पर ही दृष्टव्य होता है अत: भेद स्वाभाविक है।
इसीलिए रूप तत्व नहीं है। रूपत्व यदि तत्तत्व होता तो प्रियतमा का चित्र
अंतत: पूर्ण रति में निष्पन्न होता। अग्नि या ऊर्जा का स्वभाव है, ताप,
प्रकाश और उष्णता प्रदान करना, रूप भिन्न-भिन्न हो सकते है, यह सभी जानते
हैं। इसलिए रुप परिवर्तनशील हो सकता है, तत्व नहीं। यही अग्नि की सनातनता
है। इसीलिए वह परम (तत्व) है।
नि:सन्देह, परम सत्य का शब्द में, शब्द का वाक में और वाक का लय परम तत्व
में हो जाता है। इसीलिए परम सत्य, परम तत्व में लीन हो जाता है। अंतरिक्ष
स्वयं वाक के गर्भ में है, उसी वाक में विलीन होता है, इसीलिए यह स्रष्ट
हुआ जगत वाङ्मय कहा जाता है। इसी को नासदीय सूक्त व्याख्यायित करता है।
इसीलिए कुछ क्षण पहले तक सत्य सा प्रतीत होंने वाला पाँच हाथ का मिट्टी
का पुतला भूमि पर पड़ा रह जाता है, वाक अपनें समस्त आनुषांगिकों के साथ
परम तत्व में लीन होंने चल पड़ती है।
परमार्थत: परम सत्य-परम सत्य ही होता है, व्यवहार्यत: सत्य, दृष्टि
सापेक्ष, स्थिति सापेक्ष और स्रष्टि सापॆक्ष होता है।
पितृव्य के उलाहनें से संतप्त नचिकेता यम के यहाँ तीन दिन तक प्रतीक्षा
के उपरान्त, यम के आग्रह पर तीन समाधान माँगता है, और अंतत: धर्मराज के
उपकृत करनें के पश्चात वह नाचिकेत हो जाता है। यमराज, धर्मराज भी हैं और
नचिकेता, नाचिकेता भी। सचमुच अत्यंत रहस्योदघाटक प्रकरण है। मनोविज्ञान
के संधित्सुओं के लिए तो विशेषकर।
“अनहत यदि बिगबैंग है तो आहत क्या है/होगा? आहत और अनहत तो नाद के विशेषण
है।” यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। सुमंत
On 7/12/10, दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com> wrote:
> इस महाविस्फोट के सिद्धांत को सांख्य के सिद्धांत के साथ देखें। जहाँ अकेले
> प्रधान है जिस के तीन घटक सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। ये तीनों अंतर्क्रिया
> में लीन हैं और साम्य बनाए हुए हैं। जैसे ही इन का साम्य भंग होता है विस्फोट
> हो कर सृष्टि रचना आरंभ होती है।
> फर्क इतना ही है कि हम ने प्रधान को सिंगुलरिटी नाम दे दिया है लेकिन वास्तव
> में वह सिंगुलरिटी है नहीं। वह भी त्रिगुण घटकों से मिल कर बनती है।
> *आप चाहें तो अनवरत पर सांख्य की यह श्रंखला पढ़ सकते
> हैं।<http://anvarat.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF>
> *
>> http://home.comcast.net/~prasadmail/nAsadeeyasUktam-s.pdf<http://home.comcast.net/%7Eprasadmail/nAsadeeyasUktam-s.pdf>
>> }
>>
>> परम सत्य की किसी भी अवधारणा को ठुकराने वाले, जिज्ञासा और प्र्श्नवाचाकता
>> की अन्यतम दार्शनिक उपलब्धियों की ओर संकेत करने वाले इस सूक्त में आप ने किस
>> विध परम तत्व की व्याख्या ढूंढ निकाली , इस अज्ञानी पामर के समक्ष किसी
>> भाँती
>> स्पस्ट नहीं हो पा रहा.
>> ' व्यवहार्यत: सत्य, दृष्टि
>> सापेक्ष, स्थिति सापेक्ष और स्रष्टि सापॆक्ष होता है।' आप के इस वाक्यांश से
>> स्पस्ट है कि सापेक्ष सत्य ही व्याव्हारिक है. जो इस के अतिरिक्त है,
>> अर्थात अव्यावहारिक है, उस की संज्ञा पारब्रह्म हो , परम ब्रह्म हो,
>> परमार्थतः
>> परम सत्य हो , परम तत्व हो , वह एक परम भ्रम के सिवा और कुछ नहीं है. उस का
>> मनोविनोदार्थक मूल्य जो भी हो,मानवीय मूल्य कुछ नहीं है. इस परम भ्रम पर
>> पर्दा डालने के लिए चाहे तत्व रूप में उद्भुध होता हुआ सत्य में *रूपांतरित*
>> हो
>> जाए, चाहे निपात केंद्र और परिधि के सन्निपात में बदल जाए * ** **, * चाहे
समस्त वैदिक साहित्य विज्ञान सहित ज्ञान की विचारणा करता है। विज्ञान की
उपेक्षा नहीं। वैदिकों की मुख्य धारा विज्ञान विरोधी नहीं है। आधुनिक
विज्ञान उसी की पुष्टि कर रहा है जो वेदादि में संकेतित है। नासदीय
सूक्त, अघमर्षण सूक्त, पुरुष सूक्त एवं हिरण्यगर्भ सूक्त को क्रमवार
देखनें और मनन करनें से चित्र स्पष्ट होता है। आधुनिक विज्ञान की अपनी
परंपरागत शब्दावलि है, उसी भांति वेदादि की अपनी पारंपरिक शब्दावलि है।
समन्वय के अभाव से भ्रम है। वैदिक विज्ञान का प्रायोगिक ज्ञान नष्ट
प्राय: है, आधुनिक विज्ञान उसका पुनरुद्धार कर रहा प्रतीत होता है। ऎसा
पहली बार नहीं हो रह है। वेद, रामायण एव्ं गीता में बार-बार यह दुहराय
गया है कि नष्ट हुआ ज्ञान पुन: प्रदान किया जा रहा है। भौतिक विज्ञान से
उत्पन्न भौतिक अहंकार का परिणाम अंतत: युद्धो में ही परिणत होता देखा
जाता है। इसीलिए ज्ञान सहित विज्ञान की बात भारतीय मनीषा करती रही है।
शुद्ध वैज्ञानिक भ्रमित नहीं हैं, प्रेरित करनें वाले विचार जहाँ से
मिले, वेद से भी, लेनें में संकोच नहीं करते। विज्ञानवादी ही व्यर्थ
कोलाहल करते रहते हैं। ब्रह्माण्ड के उद्भव के विषय में वेद भी अंतिम
बात नही करते। इसीलिए ऋषि दीर्घतमा कहते हैं को अद्धा वेद क इह प्रवोचद।
किन्तु जहाँ तक जाना उसके बाद भी कुछ है यह संकेत वह स्पष्ट रूप से कर
रहे हैं। भविष्य में भी वह जाना जा सकेगा, कौन कह सकता है? वस्तुत: जानते
जानते स्थिति तद्वत हो जाने वाली हो जाती है। क्या बोधिसत्व के बाद
बुद्ध कुछ बता सके? सिवाय यह कहनें के कि अप्पदीपो भव। क्या लार्ज
हेड्रान कोलाइडर कुछ कह पायेगा, गाड पार्टिकिल के विषय में, और क्या वह
अंतिम बात होगी?
आदरणीय द्विवेदी जी सांख्य की अधूरी व्याख्या चटोपाध्याय जी से प्रेरित
होकर कर , मनोनुकूल ढंग से कर रहे हैं। द्विवेदीजी पुरुष को नकारकर
प्रकृति को स्रष्टा बता रहे हैं। यदि पुरुष के स्थानापन्न, बिगबैंग को ही
एकमात्र कर्ता मान लिया जाए तो क्या अब उसका समबंध सौर परिवार से समाप्त
हो गया? और अगर समबन्ध है तो वह हमें कैसे प्रभावित करता है? विज्ञान
डायनेमिक एनर्जी को कायनेटिक एनर्जी में बदलनें के लिए वाह्य बल की बात
करता है, अगर यह बल नेबुला में स्वस्फूर्त है तो विज्ञान के वाह्य बल के
सिद्धांत का क्या होगा? विशेषतया तब जब कि अभी ब्लैक होल के स्वरूप और
क्रियाविधि को समझा जाना शेष है।
सागर में सतत उठती रहनें वाले तरंगो की भाँति स्फोट एक सतत चलनें वाली
क्रिया है, (समझनें के लिए)अनहत भी वैसा ही है, यह तब तक चलेगा जब तक
सूर्य के प्रबल ताप से सागर सूख न जाये। दीर्घ काल तक स्फोटों की ऊर्जा
की संघनित अवस्था से सृजित हिरण्यगर्भ मे संचित ताप की अत्यधिक ऊर्जा से
हुए विस्फोट से स्रष्टि का विस्तार होता है। यहाँ से आहत नाद का कार्य
व्यापार प्रारंभ होता है। सामान्य रुप से हमारा समबंध इसी से रहता है,
किन्तु इनका समबन्ध, अनहत से बना ही रहता है, प्रेरणा, ऊर्जा, चेतना वहीं
से मिलती है।
इस पूरी चर्चा से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आशुतोष जी प्राच्य और नवीन
दोनों विज्ञानों को समझनें मे रत हैं अतएव बधाई के पात्र हैं। चूंकि यह
शब्द चर्चा का मंच है परिचर्चा का नहीं, अत: इसका पटाक्षेप करना ही उचित
होगा, क्योंकि वैतांडिको को ही रस आयेगा, शब्द रसिको को नहीं।
On Jul 12, 8:28 pm, Rangnath Singh <rangnathsi...@gmail.com> wrote:
> इस चर्चा को पढ़कर परमानन्द की प्राप्ति हुई है।
>
> On 7/12/10, दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com> wrote:
>
>
>
> > इस महाविस्फोट के सिद्धांत को सांख्य के सिद्धांत के साथ देखें। जहाँ अकेले
> > प्रधान है जिस के तीन घटक सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। ये तीनों अंतर्क्रिया
> > में लीन हैं और साम्य बनाए हुए हैं। जैसे ही इन का साम्य भंग होता है विस्फोट
> > हो कर सृष्टि रचना आरंभ होती है।
> > फर्क इतना ही है कि हम ने प्रधान को सिंगुलरिटी नाम दे दिया है लेकिन वास्तव
> > में वह सिंगुलरिटी है नहीं। वह भी त्रिगुण घटकों से मिल कर बनती है।
> > *आप चाहें तो अनवरत पर सांख्य की यह श्रंखला पढ़ सकते
> > हैं।<http://anvarat.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%...>
> > *
>
> > 2010/7/12 ashutosh kumar <ashuvand...@gmail.com>
> ...
>
> read more »