जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.

506 views
Skip to first unread message

madan mohan arvind

unread,
Dec 15, 2011, 6:33:10 AM12/15/11
to शब्द चर्चा
जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.

lalit sati

unread,
Dec 15, 2011, 6:34:51 AM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
पुल्लिंग

2011/12/15 madan mohan arvind <madanmoh...@gmail.com>

anil janvijay

unread,
Dec 15, 2011, 7:12:30 AM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
मैंने इसके दोनों रूप सुने हैं। लेकिन पश्चिमी उत्तरप्रदेश में इसे पुल्लिंग ही माना जाता है। मैं 'जुगाड़ हो गया' ही कहता हूँ।

2011/12/15 lalit sati <lalit...@gmail.com>

पुल्लिंग


2011/12/15 madan mohan arvind <madanmoh...@gmail.com>
जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.




--
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें


Moscow, Russia
+7 495 422 66 89 ( office)
+7 916 611 48 64 ( mobile)

Baljit Basi

unread,
Dec 15, 2011, 7:15:28 AM12/15/11
to शब्द चर्चा
पंजाबी में तो पुल्लिंग है.

On 15 दिस., 06:33, madan mohan arvind <madanmohanarv...@gmail.com>
wrote:

Ravikant

unread,
Dec 15, 2011, 7:13:59 AM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
मर्द ही सुना है, साहब।

संजय | sanjay

unread,
Dec 15, 2011, 7:23:28 AM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
पैसे का जुगाड़ हो "गया" है. अब आप ही तय कर लो स्त्रीलिंग है या पुलिंग अपने को तो पैसों से मतलब है :) 

2011/12/15 madan mohan arvind <madanmoh...@gmail.com>
जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.



--
संजय बेंगाणी | sanjay bengani
छवि मीडिया एण्ड कॉम्यूनिकेशन
ए-507, स्मिता टावर, गुरूकुल रोड़,
मेमनगर , अहमदाबाद, गुजरात. 



Yogesh Samdarshi

unread,
Dec 15, 2011, 7:30:19 AM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
जुगाड़ तो पुल्लिंग है पर जुगत स्त्रीलिंग है.. जो मेरा मानना है की जुगाड़ का जन्मदाता शब्द हो सकता है... काफी जुगत लगा ली पर जुगाड़ नहीं हो पाया..

ई-स्वामी

unread,
Dec 15, 2011, 10:03:32 PM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
मेरा सोचना रहा है कि  
जुगत का युक्ति से संबंध रहा हो शायद.
अल्टरनेट थ्योरी ये आती है दिमाग में कि जुगाड का जन्म सुगाध से हो सकता है सुगाध होता है फ़ोर्डेबल  -  fordable - नदी का धारा का ऐसा हिस्सा जिसे आसानी से पार किया जा सके - जो की अगाध का उल्टा है. 
कभी कभी लगता है कि जुगाड का संबंध  मराठी के उधाड से हो - लेकिन इसकी संभावना कम ही लगती रही है. 

मैं कल्पना करता हूं कि काश इसका संबंध हडप्पा और मोहन जोदाडो [जोदारो] वले जोदाडो से होता - जोदाडो वाले सारे जुगाडू हो गए होते ... :) ..हमारे उपमहाद्वीपीय जीन-पूल की सबसे बडी खासियत है ये और वैसे सिंधी-पंजाबियों में बहुतायत में पाई जाती है - [मज़ाक कर रहा हूं]!  खैर जिस भी बंदे ने इजाद किया है यह शब्द , सचमुच जुगाडू रहा होगा. शब्द नि:संदेह पुल्लिंग है. 


2011/12/15 Yogesh Samdarshi <yogesh.s...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Dec 15, 2011, 10:30:58 PM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
लगता है इसका सम्बन्ध योग से है। हिन्दी की एक क्रिया मिलती है जुगाना -मतलब किसी के काम में हाथ बँटाना। उसी से मिलता-जुलता पद है- जुगा के रखना यानी इकट्ठा करना। ज़ाहिरन इन दोनों का सीधा रिश्ता योग है। 

इसी जुगा में अड़ प्रत्यय लगा के जुगाड़ बन गया होगा, ऐसी मेरी अटकल है। 

रसाल और फ़ैलन- दोनों में जुगाड़ नहीं मिलता। अलबत्ता जुगाना और जुगा रखना, दोनों फ़ैलन में मिलते हैं। 

2011/12/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Dec 15, 2011, 10:33:03 PM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
संस्कृत को ही प्राचीनतम मानने वाले मान सकते हैं कि इसका मूल संस्कॄत की युज्‌ धातु में है.. 

2011/12/16 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Dec 15, 2011, 10:59:14 PM12/15/11
to shabdc...@googlegroups.com
अभयजी श्यामसुंदर दास के हिंदी शब्दसागर के अनुसार जुगाड़ का उद्गम इस प्रकार है:
1. जुगाड़ † : (page 1777)

कि समय पर काम आए । २. हिफाजत से रखना । सुरक्षित रखना ।यत्न और रक्षापूर्वक रखना ।

जुगाड़ संज्ञा पुं० [देश० अथवा सं० योग (= जोयन) + हिं० आड़ (प्रत्य०)] १. व्यवस्था । कार्यसाधन 


 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 16, 2011, 1:20:59 AM12/16/11
to shabdc...@googlegroups.com
करीब ढाई साल पहले जुगाड़ पर एक पोस्ट लिखी थी शब्दों का सफ़र पर। जस की तस पेश है। हर बार कुछ न कुछ संशोधन की गुंजाइश बनी रहती है:)

Friday, August 14, 2009

जोड़तोड़ में लगा जुगाड़ी

 343724201_c1b3998e11

गातार किसी न किसी तरकीब से आगे बढ़ने, अपना काम निकालने में लगे इन्सान के बारे में कहा जाता है कि जोड़-तोड़ वाला है। कुछ इसी किस्म के इन्सान के लिए बीसवीं सदी में एक शब्द प्रचलित हुआ जुगाड़ू या जुगाड़ी। यह बना है जुगाड़ से जिसका अर्थ हुआ तरकीब, युक्ति। इससे मिलता-जुलता एक शब्दयुग्म और बना लिया गया जिसे क्रियारूप में प्रयोग किया जाता है यह है जोड़-जुगाड़ अर्थात लगातार काम आसान करने का प्रयास करते रहना। येन केन प्रकारेण राह तलाशने का भाव इसमें है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जुगाड़ नाम के एक वाहन ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश की सड़कों से अपना सफर शुरु करते हुए देशभर के ग्रामीण अंचल में परिवहन और सस्ते भारवाहक के तौर पर क्रांति ला दी।
जोड़-तोड़, जुगाड़ और जोड़-जुगाड़ में बहुत गहरी रिश्तेदारी है। मगर ये दोनों अलग-अलग धातु मूल से उपजे मगर एक जैसी अर्थवत्ता वाले शब्द हैं। इस पर बात करने से पहले जानते हैं इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की एक ऐसी धातु के बारे में जिससे बने शब्दों की जितनी तादाद सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम तक फैली है उतनी शायद ही किसी अन्य धातु से निकले शब्दों की होगी। यह धातु है युग अर्थात yeug. संस्कृत में इससे मिलती जुलती धातु है युज्। इन दोनों ही धातुओं के yogaमूल में संयुक्त होना, मिलना, जोड़ना, मिलाना जैसे भाव हैं। इनके मूल में जो ध्वनि है वह है ‘यु’ जिसे संस्कृत में पृथक धातु का दर्जा मिला हुआ है। पाश्चात्य भाषाशास्त्रियों ने युग अथवा युज् से बने शब्दों की व्युत्पत्ति खोजते हुए भारोपीय भाषा परिवार में इससे जुड़े शब्दो का मूल ‘यु’ को क्यों नहीं माना, यह बात समझ में नहीं आती।
संस्कृत की ‘यु’ धातु का जैसा विस्तार भारतीय भाषाओं में हुआ, वैसा अर्थगर्भित विस्तार यूरोपीय भाषाओं में नहीं हुआ, पर जितना भी हुआ वह भी कम नहीं है। किन्हीं दो चीज़ों को मिलाने से अक्सर काम बन जाता है। एक से भले दो। यानी जो काम अकेला नहीं कर सकता उसे दो लोग मिलकर कर सकते हैं। अब दो लोगों के मिलने का भाव पैदा हो रहा है युगल शब्द में। यु अथवा युज् में समाहित अर्थ यहां स्पष्ट हो रहा हैं। कुछ और शब्द देखें। हिन्दी का योग शब्द अपने आप में सिर्फ एक शब्द भर नहीं बल्कि एक दर्शन है। इसकी उत्पत्ति हुई संस्कृत के युज् से जिसमें सम्मिलित होना, जुड़ना, प्रयुक्त होना, काम में लगना आदि शामिल हैं। युज् बना है ‘यु’ धातु से जिसके भी यही सारे अर्थ हैं। युज् से बने योगः में इन सारे अर्थों के अलावा जो भाव महत्वपूर्ण है वह है संपर्क, युक्ति, शारीरिक व्यायाम, मन का संकेन्द्रीकरण, परमात्मचिंतन आदि। संयोग, प्रयोग, नियोग, हठयोग, दुर्योग, सहयोग, जोग, बिजोग, जोगड़ा, जोगी, संजोग जैसे शब्द इसी कड़ी का हिस्सा हैं। जब किसी समस्या पर एक से अधिक लोग मिलकर दिमाग लगाते हैं तो समाधान निकल आता है। इसी तरह किसी वस्तु के साथ दूसरी वस्तु को जोड़ने से भी कुछ तरकीब निकल आती है। कई उपकरणों का आविष्कार ऐसे ही हुआ है। तरकीब के लिए हिन्दी का युक्ति शब्द इसी मूल से पैदा हुआ है।
गौर करें कि जुआ ही वह उपकरण है जो दोनों बैलों को जोड़ता है, मिलाता है। जुआ लगने के बाद ही खेत की जुताई होती है। जुताई, जोतना जैसे शब्दों के मूल में भी यु धातु है। युक्त से ही बना है जुत्त शब्द जिससे जुतना, जुताई जैसे क्रियारूप बने।19323 250px-Bullock_yokes
यह बना है युक्त से। संयुक्त, प्रयुक्त, नियुक्त जैसे शब्द इसी कड़ी में आते हैं। युक्त का ही देसी रूप हुआ जुगत जिसमें तरकीब, युक्ति, उपाय, चतुराई जैसे भाव हैं। जुगत लगानेवाला कहलाता है जुगती अर्थात जुगाड़ी।
ये तमाम शब्द बने हैं संस्कृत धातु ‘यु’ से जिसका मतलब होता है जोड़ना, सम्मिलित होना, बांधना, जकड़ना वगैरह। तरुणाई को युवावस्था कहा जाता है। इसे वयःसंधि के तौर पर देखा जाता है। यह बना है संस्कृत के युवन् से। गौर करें इससे बने युवा, युवक, जवान जैसे शब्दों पर। युवन् से बना है फारसी का जवां, जवांमर्द, जवानी आदि शब्द। अंग्रेजी के यूथ और यंग जैसे शब्द कहीं न कहीं ‘यु’ से संबंधित हैं क्योंकि ये सभी शब्द वयःसंधि की तरफ इशारा कर रहे हैं। युवावस्था कुलमिलाकर जीवन के दो विभिन्नकालों का मिलन ही है। अंग्रेजी में जॉइंट, जंक्शन या जॉइन जैसे शब्दों में बंधन, जोड़, मिलना या युक्त होने के ही भाव है जो इसी मूल से बने हैं।
ब बात जुगाड़ की। जुगाड़ शब्द की व्युत्पत्ति हिन्दी कोशों में नहीं मिलती। इसके मूल में आज भी शब्दकोशों में हिन्दी की पूर्वी शैली में प्रचलित आंचलिक शब्दों को ही स्थान दिया जाना है। जुगाड़ आज की हिन्दी में नया है मगर इसका जन्म हिन्दी की पश्चिमी शैली की कोख से हुआ। हरियाणवी या बांगरू बोली में जुगाड़ शब्द प्रचलित है। यह इसी मूल का है और युज् से जन्मा है। युज् से बने योगः से ही बना है जुआ (योक yoke) यानी लकड़ी का वह उपकरण जिसे बैल के गले में डाला जाता है और जिसके एक सिरे पर हल लगाया जाता है। यह बैलगाड़ी में भी लगाया जाता है। गौर करें कि जुआ ही वह उपकरण है जो दोनों बैलों को जोड़ता है, मिलाता है। जुआ लगने के बाद ही खेत की जुताई होती है। जुताई, जोतना जैसे शब्दों के मूल में भी यु धातु है। युक्त से ही बना है जुत्त शब्द जिससे जुतना, जुताई जैसे क्रियारूप बने। बांगरु में जुआ से ही जुआड़ हुआ जिसने जुगाड़ का रूप ले लिया। आज की तारीख में जुगाड़ का अर्थ यही है कि कोशिश की जाए कि दो और दो पांच हो जाएं अगर नहीं तो यह प्रयास तो होना ही चाहिए कि चार होने में भी उतनी मेहनत न लगे जितनी लगती है। यही है जुगाड़। ऐसा करनेवाला जुगाड़ी। भारतीय महान जुगाड़ी होते हैं।
जुगाड़ के बाद जोड़ की बारी आती है क्योंकि जुगाड़ के लिए किन्हीं चीज़ों को जोड़ना पड़ता है। जोड़ पर विचार करने से पहले याद रखें कि भारोपीय भाषा परिवार की भाषाओं में और ध्वनियों में अदला बदली होती है। संस्कृत का यज्ञअवेस्ता में यश्न बन जाता है और फारसी में जश्न मनने लगता है। जोड़ शब्द बना है संस्कृत की जट् धातु से जिसमें आपस में मिलना, संयुक्त होना, घनत्व, गुत्था होने के भाव हैं। इस जट् और यु में कहीं न कहीं ध्वन्यात्मक परिवर्तन की रिश्तेदारी है। निश्चित ही युत् अर्थात मेल और जुट् में समानता है। युत् का की विकास जुट् में हुआ होगा, ऐसा लगता है। यु निश्चित ही पूर्ववैदिक ध्वनि रही होगी जिसमें जोड़, मेल, युक्त के भाव थे।  जुट् से बना है जोट्य जिसमें भी यही भाव निहित हैं। हिन्दी में प्रचलित जुटना, जुटाना, एकजुट, जटाजूट जैसे शब्द इससे ही बने हैं। गौर करें जटा यानी ऋषि-मुनियों की विशाल केशराशि पर। एक-दूसरे से मिले हुए, गुंथे हुए बालों को ही जटा कहा जाता है। एक अन्य रेशेदार वनस्पति के लिए जूट नाम भी इसी जट् से आ रहा है। इससे ही बना है जड़ शब्द जिसका मतलब होता है वृक्षमूल। पेड़ों को आधार देने का काम वृक्ष करते हैं क्योंकि वे भूमि को बांध लेते हैं जिससे वृक्ष स्थिर रहता है। मूर्ख को भी इसीलिए जड़बुद्धि कहते हैं क्योंकि उसका विकास भी स्थिर हो जाता है। बोलचाल की हिन्दी में सर्वाधिक प्रयुक्त जुड़ना, जोड़ना, जुड़वाना, जुड़ाव जैसे शब्दों के पीछे जट् ही है। जोट्य>जोड्य>जोड> क्रम में बना है जोड़ शब्द जिसमें युक्त करने, मिलाने जोड़ने का भाव ही है।


2011/12/16 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
मोबाइल-
औरंगाबाद- 07507777230

  


e Swami

unread,
Dec 16, 2011, 10:13:51 AM12/16/11
to shabdc...@googlegroups.com
Thanks Ajit ji!

Sent from my iPhone

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Dec 18, 2011, 3:58:51 AM12/18/11
to shabdc...@googlegroups.com
एक अर्थ में जुगाड़ स्त्रीलिंग भी है (कामवासना की पूर्ति के सन्दर्भ में)। कॉलेज में कुछ छात्र इसका स्लैंग रूप में प्रयोग करते थे - एक जगाड़ फंसै लिया।

2011/12/15 madan mohan arvind <madanmoh...@gmail.com>
जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Dec 18, 2011, 8:34:56 AM12/18/11
to shabdc...@googlegroups.com
ई-स्वामी जी,
उस अर्थ में भी जुगाड़ पुर्लिंग ही होगा।

2011/12/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

संजय | sanjay

unread,
Dec 18, 2011, 11:20:03 PM12/18/11
to shabdc...@googlegroups.com
स्वामीजी, स्त्री का जुगाड़, स्त्रीलिंग होगा? 

2011/12/18 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

ई-स्वामी

unread,
Dec 19, 2011, 1:22:06 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
भाई लोग, ई-स्वामी और ई-पंडित में कन्फ़्यूज हो गए हैं  ..जुगाड को स्त्रीलिंग बनाने पर पंडिज्जी आमादा हैं मै नही! :) 

2011/12/18 संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com>

Madan Mohan Sharma

unread,
Dec 19, 2011, 1:36:32 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय, मैंने जुगाड़ के कुछ स्त्रीलिंग प्रयोग भी देखे हैं, आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं, क्या अब जुगाड़ को स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों रूपों में स्वीकार किया जाना चाहिए-
दैनिक भास्कर- अल्पसंख्यकों को लुभाने की जुगाड़, बैठकों में मस्त नेताजी लिंक
http://www.bhaskar.com/article/MH-managed-minorities-2528151.html
दैनिक भास्कर- वहां जगह बनाने की जुगाड़ में साइन नहीं की है हॉलीवुड फिल्म लिंक
http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-the-great-gatesby-is-not-my-gateaway-to-hollywoodamitabh-bachchan-2420307.html
भोपाली अफसरों के लिए टिकट की जुगाड़ लिंक
http://www.patrika.com/news.aspx?id=728018
फिर मंत्री बनने की जुगाड़ में लालू यादव लिंक
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9116406.cms
चाईनीज झालरों ने छीनी कुम्हारों की रोजी, बच्चे पेट की जुगाड़ में सड़कों पर' लिंक
www.bundelkhandsamachar.com


2011/12/19 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 4:21:24 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
लिंग को लेकर जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं वे पत्रकारों की कमअक्ली का प्रतीक हैं। उन्हें मानक मानना हमारी नादानी होगी।
कोई भी अखबार भाषा को लेकर सजग नहीं है।

मध्यकालीन कवियों नें वैसे ही तुकबन्दी के चक्कर में कई शब्दों के ऐसे रूप बदले कि व्युत्पत्ति तलाशने के शौकीन हमेशा चक्कर में पड़ जाते हैं कि किसी शब्द का जन्मसूत्र कहीं मिलता है और उसका रूपान्तर चक्कर में डालने वाला!!! दरअसल तुक और मात्रा के चक्कर में शब्दों के वे रूपान्तर सचमुच जनमानस में रूढ हो गए और हमने सोचा कि वे ज़बान पर चढ़कर हुए रूपान्तर हैं।

बहरहाल बहुत से बदलाव मंजूर हैं, मगर नासमझी के नहीं। हमने भी गलत प्रयोग किया तो जैसा आज हम किन्हीं अखबारों को मानक मान कर उदाहरण
पेश कर रहे हैं (जहाँ भाषा के समझदारों की कमी है) वैसे ही कल को इस समूह का लोग हवाला देंगे कि भई अब तो शब्दचर्चा समूह ने भी मान्यता दे दी है। कम से कम यहाँ तो भाषा के प्रति सम्वेदनशील लोग ही आते हैं और सही नज़रिए से, सही लिखना चाहते हैं न कि परम्परा या शुद्धता की आड़ में।

सो बंधुओं अखबार को मानक न मानें। किसी ज़माने में बोलचाल की भाषा का मानक अखबार था, आज नहीं।

जुगाड़ पुल्लिंग है।

2011/12/19 Madan Mohan Sharma <madanmoh...@gmail.com>

Madan Mohan Sharma

unread,
Dec 19, 2011, 4:23:58 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
यह प्रश्न इस मंच पर रखने का मेरा भी यही उद्देश्य था. धन्यवाद.

2011/12/19 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

संजय | sanjay

unread,
Dec 19, 2011, 5:00:59 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
अखबार को मानक मानने का अर्थ है, कल को सर खुजाना कि यह कौन-"सा" भाषा है :)

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Dec 19, 2011, 7:17:02 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
अजित जी की बात से सहमत हूँ। किसी जमाने में कुछ अखबार मानक हुआ करते थे। लेकिन आज कोई नहीं।

2011/12/19 संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com>

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 8:04:28 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
आपकी बात से मतभेद नहीं है. फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि बहुत से लोग
हैं, जिन में से कई अखबारों में काम करते होंगे जो इस शब्द को
स्त्रीलिंग समझते हैं. उनकी नालायकी इस बात में है कि उनहोंने मानक रूप
देखने का कष्ट नहीं किया. साईकल को आम तौर पर पुल्लिंग माना जाता है
लेकिन कई लोग इसको स्त्रीलिंग की तरह बोलते हैं. दहीं शब्द का भी यही
हाल है, यहाँ तक कि बुल्ले शाह जैसा कवी इसको स्त्रीलिंग बना रहा है.
इसमें आपकी कविता वाली तोलतुकांत वाली मजबूरी भी हो सकती है:
"उत्तों आई धम्मी, दहीं नई जम्मी" ( सुबह होने को है लेकिन अभी तक दहीं
नहीं जमा). वैसे दहीं भी ऐसे शब्दों में है जिनको कई लोग स्त्रीलिंग
समझते हैं. मैंने ऐसा देखा है कि बहुत सारे शब्द जो परम्परा से पुल्लिंग
रहे हैं उनको शहरी लोग स्त्रीलिंग बना रहे हैं. इस मानसिकता को इस मंच पर
विचारना चाहिए. क्यों ना एक छोटी सी सूची बनाई जाये? वचन का भी कुछ ऐसा
ही हाल है. ढाबों वाले आम ही कहते हैं, एक चाय, दो चाय.

On 19 दिस., 04:21, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> लिंग को लेकर जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं वे पत्रकारों की कमअक्ली का प्रतीक
> हैं। उन्हें मानक मानना हमारी नादानी होगी।
> कोई भी अखबार भाषा को लेकर सजग नहीं है।
>
> मध्यकालीन कवियों नें वैसे ही तुकबन्दी के चक्कर में कई शब्दों के ऐसे रूप
> बदले कि व्युत्पत्ति तलाशने के शौकीन हमेशा चक्कर में पड़ जाते हैं कि किसी
> शब्द का जन्मसूत्र कहीं मिलता है और उसका रूपान्तर चक्कर में डालने वाला!!!
> दरअसल तुक और मात्रा के चक्कर में शब्दों के वे रूपान्तर सचमुच जनमानस में रूढ
> हो गए और हमने सोचा कि वे ज़बान पर चढ़कर हुए रूपान्तर हैं।
>
> बहरहाल बहुत से बदलाव मंजूर हैं, मगर नासमझी के नहीं। हमने भी गलत प्रयोग किया
> तो जैसा आज हम किन्हीं अखबारों को मानक मान कर उदाहरण
> पेश कर रहे हैं (जहाँ भाषा के समझदारों की कमी है) वैसे ही कल को इस समूह का
> लोग हवाला देंगे कि भई अब तो शब्दचर्चा समूह ने भी मान्यता दे दी है। कम से कम
> यहाँ तो भाषा के प्रति सम्वेदनशील लोग ही आते हैं और सही नज़रिए से, सही लिखना
> चाहते हैं न कि परम्परा या शुद्धता की आड़ में।
>
> सो बंधुओं अखबार को मानक न मानें। किसी ज़माने में बोलचाल की भाषा का मानक
> अखबार था, आज नहीं।
>
> जुगाड़ पुल्लिंग है।
>

> 2011/12/19 Madan Mohan Sharma <madanmohanarv...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > आदरणीय, मैंने जुगाड़ के कुछ स्त्रीलिंग प्रयोग भी देखे हैं, आपकी सेवामें
> > प्रस्तुत हैं, क्या अब जुगाड़ को स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों रूपों में
> > स्वीकार किया जाना चाहिए-
> > दैनिक भास्कर- अल्पसंख्यकों को लुभाने की जुगाड़, बैठकों में मस्त नेताजी
> > लिंक
> >http://www.bhaskar.com/article/MH-managed-minorities-2528151.html
> > दैनिक भास्कर- वहां जगह बनाने की जुगाड़ में साइन नहीं की है हॉलीवुड फिल्म
> > लिंक
> >http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-the-great-gatesby-i
> > s-not-my-gateaway-to-hollywoodamitabh-bachchan-2420307.html
> > भोपाली अफसरों के लिए टिकट की जुगाड़ लिंक
> >http://www.patrika.com/news.aspx?id=728018
> > फिर मंत्री बनने की जुगाड़ में लालू यादव लिंक
> >http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9116406.cms
> > चाईनीज झालरों ने छीनी कुम्हारों की रोजी, बच्चे पेट की जुगाड़ में सड़कों
> > पर' लिंक
> >www.bundelkhandsamachar.com
>
> > 2011/12/19 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
>
> >> भाई लोग, ई-स्वामी और ई-पंडित में कन्फ़्यूज हो गए हैं  ..जुगाड को
> >> स्त्रीलिंग बनाने पर पंडिज्जी आमादा हैं मै नही! :)
>

> >> 2011/12/18 संजय | sanjay <sanjaybeng...@gmail.com>


>
> >>> स्वामीजी, स्त्री का जुगाड़, स्त्रीलिंग होगा?
>

> >>> 2011/12/18 दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com>


>
> >>>> ई-स्वामी जी,
> >>>> उस अर्थ में भी जुगाड़ पुर्लिंग ही होगा।
>

> >>>> 2011/12/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma.shr...@gmail.com>


>
> >>>>> एक अर्थ में जुगाड़ स्त्रीलिंग भी है (कामवासना की पूर्ति के सन्दर्भ
> >>>>> में)। कॉलेज में कुछ छात्र इसका स्लैंग रूप में प्रयोग करते थे - एक जगाड़
> >>>>> फंसै लिया।
>

> >>>>> 2011/12/15 madan mohan arvind <madanmohanarv...@gmail.com>


>
> >>>>>> जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.
>
> >>>>> --

> >>>>> *Shrish Benjwal Sharma* *(श्रीश बेंजवाल शर्मा <http://hindi.shrish.in>
> >>>>> )*
> >>>>> ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
> >>>>> *If u can't beat them, join them.*
>
> >>>>> ePandit <http://epandit.shrish.in/>:* *http://epandit.shrish.in/
>
> >>>> --
> >>>> *दिनेशराय द्विवेदी, *कोटा, राजस्थान, भारत
> >>>> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
> >>>> *क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत <http://anvarat.blogspot.com/>    तीसरा
> >>>> खंबा <http://teesarakhamba.blogspot.com/>*


>
> >>> --
> >>> संजय बेंगाणी | sanjay bengani

> >>> *छवि मीडिया एण्ड कॉम्यूनिकेशन*


> >>> ए-507, स्मिता टावर, गुरूकुल रोड़,
> >>> मेमनगर , अहमदाबाद, गुजरात.

> >>> chhavi.in | तरकश <http://www.tarakash.com/2/index.php> | मेरा ब्लॉग<http://www.tarakash.com/joglikhi>

> *
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/
> मोबाइल-
> औरंगाबाद- 07507777230- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 8:18:39 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
और अजीत जी कृपया कवियों को तो बख्श दो , उनका तो यह जन्मसिद्ध अधिकार
है . जैसे बच्चे की तुतलाहट मन को भाती है ऐसे ही कवियों का शब्द को
बिगाड़ना अच्छा लगता है. यह एक तरह अलंकार का ही रूप है. कविता आखिर है
क्या,- शब्दों का हेरफेर. पंजाबी में तो शब्द को खूब रगड़ा फेरा जाता है.
'रांझे' को पहले 'रंझेटा' बनाया, इस पर भी तसल्ली नहीं हुई तो और आगे
'रंझेटड़ा' बना दिया!

On 19 दिस., 04:21, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:

> लिंग को लेकर जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं वे पत्रकारों की कमअक्ली का प्रतीक
> हैं। उन्हें मानक मानना हमारी नादानी होगी।
> कोई भी अखबार भाषा को लेकर सजग नहीं है।
>
> मध्यकालीन कवियों नें वैसे ही तुकबन्दी के चक्कर में कई शब्दों के ऐसे रूप
> बदले कि व्युत्पत्ति तलाशने के शौकीन हमेशा चक्कर में पड़ जाते हैं कि किसी
> शब्द का जन्मसूत्र कहीं मिलता है और उसका रूपान्तर चक्कर में डालने वाला!!!
> दरअसल तुक और मात्रा के चक्कर में शब्दों के वे रूपान्तर सचमुच जनमानस में रूढ
> हो गए और हमने सोचा कि वे ज़बान पर चढ़कर हुए रूपान्तर हैं।
>
> बहरहाल बहुत से बदलाव मंजूर हैं, मगर नासमझी के नहीं। हमने भी गलत प्रयोग किया
> तो जैसा आज हम किन्हीं अखबारों को मानक मान कर उदाहरण
> पेश कर रहे हैं (जहाँ भाषा के समझदारों की कमी है) वैसे ही कल को इस समूह का
> लोग हवाला देंगे कि भई अब तो शब्दचर्चा समूह ने भी मान्यता दे दी है। कम से कम
> यहाँ तो भाषा के प्रति सम्वेदनशील लोग ही आते हैं और सही नज़रिए से, सही लिखना
> चाहते हैं न कि परम्परा या शुद्धता की आड़ में।
>
> सो बंधुओं अखबार को मानक न मानें। किसी ज़माने में बोलचाल की भाषा का मानक
> अखबार था, आज नहीं।
>
> जुगाड़ पुल्लिंग है।
>

> 2011/12/19 Madan Mohan Sharma <madanmohanarv...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > आदरणीय, मैंने जुगाड़ के कुछ स्त्रीलिंग प्रयोग भी देखे हैं, आपकी सेवामें
> > प्रस्तुत हैं, क्या अब जुगाड़ को स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों रूपों में
> > स्वीकार किया जाना चाहिए-
> > दैनिक भास्कर- अल्पसंख्यकों को लुभाने की जुगाड़, बैठकों में मस्त नेताजी
> > लिंक
> >http://www.bhaskar.com/article/MH-managed-minorities-2528151.html
> > दैनिक भास्कर- वहां जगह बनाने की जुगाड़ में साइन नहीं की है हॉलीवुड फिल्म
> > लिंक
> >http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-the-great-gatesby-i
> > s-not-my-gateaway-to-hollywoodamitabh-bachchan-2420307.html
> > भोपाली अफसरों के लिए टिकट की जुगाड़ लिंक
> >http://www.patrika.com/news.aspx?id=728018
> > फिर मंत्री बनने की जुगाड़ में लालू यादव लिंक
> >http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9116406.cms
> > चाईनीज झालरों ने छीनी कुम्हारों की रोजी, बच्चे पेट की जुगाड़ में सड़कों
> > पर' लिंक
> >www.bundelkhandsamachar.com
>
> > 2011/12/19 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
>
> >> भाई लोग, ई-स्वामी और ई-पंडित में कन्फ़्यूज हो गए हैं  ..जुगाड को
> >> स्त्रीलिंग बनाने पर पंडिज्जी आमादा हैं मै नही! :)
>

> >> 2011/12/18 संजय | sanjay <sanjaybeng...@gmail.com>


>
> >>> स्वामीजी, स्त्री का जुगाड़, स्त्रीलिंग होगा?
>

> >>> 2011/12/18 दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com>


>
> >>>> ई-स्वामी जी,
> >>>> उस अर्थ में भी जुगाड़ पुर्लिंग ही होगा।
>

> >>>> 2011/12/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma.shr...@gmail.com>


>
> >>>>> एक अर्थ में जुगाड़ स्त्रीलिंग भी है (कामवासना की पूर्ति के सन्दर्भ
> >>>>> में)। कॉलेज में कुछ छात्र इसका स्लैंग रूप में प्रयोग करते थे - एक जगाड़
> >>>>> फंसै लिया।
>

> >>>>> 2011/12/15 madan mohan arvind <madanmohanarv...@gmail.com>


>
> >>>>>> जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.
>
> >>>>> --

> >>>>> *Shrish Benjwal Sharma* *(श्रीश बेंजवाल शर्मा <http://hindi.shrish.in>
> >>>>> )*
> >>>>> ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
> >>>>> *If u can't beat them, join them.*
>
> >>>>> ePandit <http://epandit.shrish.in/>:* *http://epandit.shrish.in/
>
> >>>> --

> >>>> *दिनेशराय द्विवेदी, *कोटा, राजस्थान, भारत
> >>>> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,


> >>>> *क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत <http://anvarat.blogspot.com/>    तीसरा
> >>>> खंबा <http://teesarakhamba.blogspot.com/>*
>

> >>> --
> >>> संजय बेंगाणी | sanjay bengani

> >>> *छवि मीडिया एण्ड कॉम्यूनिकेशन*


> >>> ए-507, स्मिता टावर, गुरूकुल रोड़,
> >>> मेमनगर , अहमदाबाद, गुजरात.

> >>> chhavi.in | तरकश <http://www.tarakash.com/2/index.php> | मेरा ब्लॉग<http://www.tarakash.com/joglikhi>

> *
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/
> मोबाइल-

Abhay Tiwari

unread,
Dec 19, 2011, 8:29:41 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
हिन्दी में लिंग का कोई तार्किक नियम न होने से ऐसी अराजकता होती है.. इस पर विद्वान लोग बड़ी-बड़ी बहसे कर चुके हैं पर हल कोई नहीं निकला..

 इस पर ऊर्जा व्यय करने से कोई लाभ नहीं.. हर आदमी की ज़ुबान नहीं पकड़ी जा सकती.. जैसा है ़चलने दीजिये.. 

यही हमारी हिन्दी का स्वभाव है कि इसमें प्रयोगों की विविधता है। 

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

Rajendra Swarnkar

unread,
Dec 19, 2011, 8:31:01 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com





बहुत अच्छी चर्चा रही है ... 



@ कवियों को तो बख्श दो , उनका तो यह जन्मसिद्ध अधिकार है . 
जैसे बच्चे की  तुतलाहट मन को भाती है ऐसे ही कवियों का शब्द को बिगाड़ना अच्छा लगता  है. 
यह एक तरह अलंकार का ही रूप है. कविता आखिर है क्या,- शब्दों का हेरफेर.
आदरणीय बलजीत जी , पता नहीं आप किस प्रकार के कवियों की बात कर रहे हैं 

मैं आपको आमंत्रित करता  हूं , मेरे ब्लॉग शस्वरं पर पधारें विशुद्ध काव्य का ब्लॉग है ६८ प्रविष्टियों में कोई ७५-८० गीत-ग़ज़ल हैं , एक भी  शब्द गलत खोज कर बताइए ... :)
ये रहा लिंक 









2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 9:06:02 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
@ अभय
फिर आप इसको अराजकता मत कहिये. लिंग संबंधी कोई नियम नहीं होता न मैं ऐसा
नियम घड़ने की बात कर रहा हूँ . मैं तो उस मानसिकता को चर्चा में लाना
चाहता हूँ जो लिंग के प्रचलत रूप को बदलने में रचित है.

@राजेंदर
मैंने परंपरागत कवियों की छंदबद्ध कविता के सिलसिले में यह बात कही है.
आज कल पंजाबी में भी शायद ही कोई ऐसे करता है. फिर भी ढून्ढने पर आज भी
मिसालें मिल जायेंगे. और मैंने तो इसको बुरी बात कहा ही नहीं. हिंदी में
भी ढेर ऐसी कवितायेँ हैं . आपके ब्लॉग में मै ज़रूर पधारूंगा , कविता
मानने के लिए, अशुधियां देखने के लिए नहीं!


On 19 दिस., 08:31, Rajendra Swarnkar <swarnkarrajen...@gmail.com>
wrote:


> बहुत अच्छी चर्चा रही है ...
>
> @ कवियों को तो बख्श दो , उनका तो यह जन्मसिद्ध अधिकार है .
> जैसे बच्चे की  तुतलाहट मन को भाती है ऐसे ही कवियों का शब्द को बिगाड़ना
> अच्छा लगता  है.
> यह एक तरह अलंकार का ही रूप है. कविता आखिर है क्या,- शब्दों का हेरफेर.
> आदरणीय बलजीत जी , पता नहीं आप किस प्रकार के कवियों की बात कर रहे हैं
>

> *मैं आपको आमंत्रित करता  हूं , मेरे ब्लॉग
> शस्वरं<http://shabdswarrang.blogspot.com>पर पधारें विशुद्ध काव्य का


> ब्लॉग है ६८ प्रविष्टियों में कोई ७५-८० गीत-ग़ज़ल

> हैं , एक भी  शब्द गलत खोज कर बताइए ... :)*
> ये रहा लिंकhttp://shabdswarrang.blogspot.com
>
> 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> > > उद्धृत पाठ दिखाए- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

Abhay Tiwari

unread,
Dec 19, 2011, 9:08:18 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
एक मिसाल मेरे ज़ेहन में आती है: तू गंगा की मौज है मैं जमना का धारा 

परम्परा से धारा स्त्रीलिंग है। 

2011/12/19 Rajendra Swarnkar <swarnkar...@gmail.com>

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 9:22:11 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
'सईयां तोरे अंगना की छईयां' - क्या यहाँ शब्दों को बिगाड़ा गया है?

On 19 दिस., 09:08, Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com> wrote:
> एक मिसाल मेरे ज़ेहन में आती है: तू गंगा की मौज है मैं जमना का धारा
>
> परम्परा से धारा स्त्रीलिंग है।
>

> 2011/12/19 Rajendra Swarnkar <swarnkarrajen...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > बहुत अच्छी चर्चा रही है ...
>
> > @ कवियों को तो बख्श दो , उनका तो यह जन्मसिद्ध अधिकार है .
> > जैसे बच्चे की  तुतलाहट मन को भाती है ऐसे ही कवियों का शब्द को बिगाड़ना
> > अच्छा लगता  है.
> > यह एक तरह अलंकार का ही रूप है. कविता आखिर है क्या,- शब्दों का हेरफेर.
> > आदरणीय बलजीत जी , पता नहीं आप किस प्रकार के कवियों की बात कर रहे हैं
>

> > *मैं आपको आमंत्रित करता  हूं , मेरे ब्लॉग शस्वरं<http://shabdswarrang.blogspot.com>पर पधारें विशुद्ध काव्य का ब्लॉग है ६८ प्रविष्टियों में कोई ७५-८० गीत-ग़ज़ल
> > हैं , एक भी  शब्द गलत खोज कर बताइए ... :)*


> > ये रहा लिंक
> >http://shabdswarrang.blogspot.com
>

> > 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> ...
>
> और पढ़ें »- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 9:33:00 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
ट्रक, बैंक, स्कूल, गोदाम जैसे प्रचलित शब्दों का प्रयोग अब अखबारों में स्त्रीवाची की तरह भी होने लगा है।
मेरे जैसे लोग अगर न्यूज़ रूम में न हों तो इन्हें स्त्रीलिंग ही समझा जाता है।
लिहाज़ा मैं अपने साथियों को इन्हे पुरुषवाची की तरह बरतने की सलाह देता हूँ,
अखबार की गलती सुधरवाता हूँ। इसी वजह से अखबारों में किन्हीं शब्दों का दोनो तरह से बर्ताव दिखाई
पड़ता है। यहाँ गूगल-विवेक वाला नुस्खा भी काम नहीं आएगा कि जिसकी प्रविष्टी ज्यादा, वही सर्वमान्य।
सर्वमान्य बातें कभी कभी मूर्खता के दायरे में भी आती हैं:)

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--


अजित

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 9:36:52 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
कवियों द्वारा सुविधानुसार शब्दों को कविताई के अनुकूल बनाने से मुझे सौ फीसद कतई ऐतराज नहीं है।
मैने सिर्फ़ तथ्य सामने रखा है:)

राम से रामू और फिर रामूड़ा और फिर रमड्या, रमट्टा जैसे नामान्तरण किसी न किसी ग्रन्थि को तुष्ट करते हैं।
सुखमय जीवन के लिए यह ज़रूरी है:)

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
और अजीत जी कृपया कवियों को तो बख्श दो , उनका तो यह जन्मसिद्ध अधिकार



--


अजित

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 9:37:42 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
बिल्कुल सही मिसाल दी है अभय जी ने।
गुलज़ार के यहाँ छेड़छाड़ ज्यादा दिखती है:)

2011/12/19 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--


अजित

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 9:42:59 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
राजेन्द्रजी,
शब्दों के रूपान्तर या उन्हें मात्रा के अनुकूल बनाने की परिपाटी तो वेदों में भी मिलती है जहाँ शब्दों के एकाधिक उच्चार मिलते हैं। कविताजगत की यह सार्वदेशिक प्रवृत्ति है। इसमें कोई नकारात्मक अभिव्यक्ति नहीं है। प्राचीन और मध्यकालीन कवियों के यहाँ यह छेड़छाड़ ज्यादा हुई है। कबीर कहीं पर कबीरा है तो कहीं कबिरा। बात वही मात्रा की है। दोनों रूप प्रचलित हैं। यूँ देखा जाए तो कबीर से कबीरा या कबिरा होना ही नहीं चाहिए था। पर रूपान्तर होने से समान मात्रा वाले शब्दों के साथ निर्वाह हो गया और अगली पंक्तियों में रजकता के साथ अर्थवत्ता में भी निरालापन आ गया।

कविताओं के ज़रिए भी भाषा को नए  नए शब्द मिलते हैं।

2011/12/19 Rajendra Swarnkar <swarnkar...@gmail.com>








--


अजित

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 9:46:33 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
कविता में शब्दों का विक्र्तीकरण, निरार्थीकरण (जैसे चाय वाय, हिन्दी
वाले इसको क्या कहते हैं?), वर्णविपर्य आदि हमारी भाषाओँ में शब्द
निर्माण की विशेष विधियाँ हैं और इन पर नाक नहीं चढ़ाना चाहिए, बल्कि
इनका विद्वतापूरण अध्ययन होना चाहिए.

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 10:03:23 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
मेरा ख्याल है *कबीरा तो *कबीर का सम्बोधकी रूप बनाने के लिए किया गया
है. फरीद के सारे श्लोकों में 'फरीदा' आया है ' गुरु नानक ने भी ऐसा
किया है: जो तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ.


On 19 दिस., 09:42, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> राजेन्द्रजी,
> शब्दों के रूपान्तर या उन्हें मात्रा के अनुकूल बनाने की परिपाटी तो वेदों में
> भी मिलती है जहाँ शब्दों के एकाधिक उच्चार मिलते हैं। कविताजगत की यह
> सार्वदेशिक प्रवृत्ति है। इसमें कोई नकारात्मक अभिव्यक्ति नहीं है। प्राचीन और
> मध्यकालीन कवियों के यहाँ यह छेड़छाड़ ज्यादा हुई है। कबीर कहीं पर कबीरा है
> तो कहीं कबिरा। बात वही मात्रा की है। दोनों रूप प्रचलित हैं। यूँ देखा जाए तो
> कबीर से कबीरा या कबिरा होना ही नहीं चाहिए था। पर रूपान्तर होने से समान
> मात्रा वाले शब्दों के साथ निर्वाह हो गया और अगली पंक्तियों में रजकता के साथ
> अर्थवत्ता में भी निरालापन आ गया।
>
> कविताओं के ज़रिए भी भाषा को नए  नए शब्द मिलते हैं।
>

> 2011/12/19 Rajendra Swarnkar <swarnkarrajen...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > बहुत अच्छी चर्चा रही है ...
>
> > @ कवियों को तो बख्श दो , उनका तो यह जन्मसिद्ध अधिकार है .
> > जैसे बच्चे की  तुतलाहट मन को भाती है ऐसे ही कवियों का शब्द को बिगाड़ना
> > अच्छा लगता  है.
> > यह एक तरह अलंकार का ही रूप है. कविता आखिर है क्या,- शब्दों का हेरफेर.
> > आदरणीय बलजीत जी , पता नहीं आप किस प्रकार के कवियों की बात कर रहे हैं
>

> > *मैं आपको आमंत्रित करता  हूं , मेरे ब्लॉग शस्वरं<http://shabdswarrang.blogspot.com>पर पधारें विशुद्ध काव्य का ब्लॉग है ६८ प्रविष्टियों में कोई ७५-८० गीत-ग़ज़ल
> > हैं , एक भी  शब्द गलत खोज कर बताइए ... :)*


> > ये रहा लिंक
> >http://shabdswarrang.blogspot.com
>

> > 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> ...
>
> और पढ़ें »- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 10:10:14 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
बललजीत भाई,
ये सामान्य वृत्ति रही है।
वटुः से बिट्टू, बिट्टा, बेटवा, बेटा, बिट्टी, बिट्टन, बिटुला, बिटुड़ा, बेटू, बिटुड़ी, बिटुड़ली और यहाँ तक कि बेटीबाई जैसे सम्बोधन भी
देखने को मिलते हैं। नामों के रूपान्तरण में लगाव तत्व महत्वपूर्ण होता है। आदर या वात्सल्य दोनों ही स्थितियों में
सम्बोधनों के साथ मनोभाव जुड़ने से रूपान्तर होता है।

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
मेरा ख्याल है  *कबीरा तो *कबीर का सम्बोधकी रूप बनाने के लिए किया गया

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 10:31:23 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
मेरे भतीजे का छोटा नाम बिट्टू है और मैं उसको हमेशा *बटवर्धन कहकर
बुलाता हूँ उसकी माँ उसको *बिट्टां कहती है. अंग्रेज़ी और यूरोपीय भाषाओँ
में नामों के मैंने सौ सौ रूपांतर देखे हैं. नामों के रूपान्तर और विकृत
रूप असीम हैं.

On 19 दिस., 10:10, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> बललजीत भाई,
> ये सामान्य वृत्ति रही है।
> वटुः से बिट्टू, बिट्टा, बेटवा, बेटा, बिट्टी, बिट्टन, बिटुला, बिटुड़ा, बेटू,
> बिटुड़ी, बिटुड़ली और यहाँ तक कि बेटीबाई जैसे सम्बोधन भी
> देखने को मिलते हैं। नामों के रूपान्तरण में लगाव तत्व महत्वपूर्ण होता है।
> आदर या वात्सल्य दोनों ही स्थितियों में
> सम्बोधनों के साथ मनोभाव जुड़ने से रूपान्तर होता है।
>

> 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 10:41:09 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
बटवर्धन मज़ेदार है।
पटवर्धन पराठी सरनेम है।

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
मेरे भतीजे का छोटा नाम बिट्टू है और मैं उसको हमेशा *बटवर्धन  कहकर

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 10:43:25 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
एक और बात, दूसरों को छेड़ने के लिए उनका नाम विकृत किया जाता है. यह
वृत्ति बच्चों में अधिक पाई जाती है. पंजाबी में ऐसे बदले हुए नाम को
*छेड़ या *कुनाँ कहा जाता है. मैं अपनी *छेड़ नहीं बताऊँगा !


On 19 दिस., 10:10, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> बललजीत भाई,
> ये सामान्य वृत्ति रही है।
> वटुः से बिट्टू, बिट्टा, बेटवा, बेटा, बिट्टी, बिट्टन, बिटुला, बिटुड़ा, बेटू,
> बिटुड़ी, बिटुड़ली और यहाँ तक कि बेटीबाई जैसे सम्बोधन भी
> देखने को मिलते हैं। नामों के रूपान्तरण में लगाव तत्व महत्वपूर्ण होता है।
> आदर या वात्सल्य दोनों ही स्थितियों में
> सम्बोधनों के साथ मनोभाव जुड़ने से रूपान्तर होता है।
>

> 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 10:52:20 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
संभव है जब मैंने उसको *बटवर्धन कहना शुरू किया मेरे दिमाग में *पटवर्धन
हो. आपने अच्छा सुझाव दिया है, मैंने अभी तक सोचा ही नहीं.

On 19 दिस., 10:41, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> बटवर्धन मज़ेदार है।
> पटवर्धन पराठी सरनेम है।
>

> 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 10:53:31 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
मेरा घर का नाम "बाळू" साथी इसे हिन्दी का बालू समझें।
मुझसे बड़े बहन-भाई नाराज़ी में मेरे नाम का उल्लेख अन्य पुरुष में शिकायत के स्वर में "त्या बाळट्ल्याने"
अर्थात "उस बालट्टे ने" किया करते थे:)

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
 एक और बात, दूसरों  को छेड़ने के लिए उनका  नाम विकृत किया  जाता है. यह

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 10:54:33 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
पटवर्धन ब्राह्मण-पण्डित होते हैं।

2011/12/19 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
मेरा घर का नाम "बाळू" साथी इसे हिन्दी का बालू समझें।

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 11:01:04 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
मेरा घर का नाम *बिल्लू है और मेरा रंग कुछ अधिक ही गोरा है जो जट्टों
में कम ही पाया जाता है. स्कूल में मेरी छेड़ थी *बिल्लो-गोरी. मैं इससे
बहुत घबराता था.

On 19 दिस., 10:53, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> मेरा घर का नाम "बाळू" साथी इसे हिन्दी का बालू समझें।
> मुझसे बड़े बहन-भाई नाराज़ी में मेरे नाम का उल्लेख अन्य पुरुष में शिकायत के
> स्वर में "त्या बाळट्ल्याने"
> अर्थात "उस बालट्टे ने" किया करते थे:)
>

> 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 11:06:19 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
ये तो चक दे हो गया जी
इसीलिए यहाँ भी घबरा रहे थे बताने में प्राजी


2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
364.gif

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 11:07:15 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
बिल्लू और बालू में छन रही है:)

2011/12/19 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
ये तो चक दे हो गया जी
364.gif

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 11:16:01 AM12/19/11
to शब्द चर्चा

पंजाब में एक टर्म चलती है, जट्ट-ब्राह्मण. जो ब्राह्मण जट्टों जैसे
खाड़कू होते हैं और खेती करते हैं उनको ऐसा कहा जाता है. हमारी थोड़ी सी
खेती थी लेकिन मैं हमेशा खेतों से भागता था. और फिर ब्राहमणों जैसा रंग
भी गोरा है. ऐसे में मैं तो हुआ जट्ट-ब्राह्मण. थोडा थोडा आप के नज़दीक
आने की कोशिश कर रहा हूँ , शायद आप जैसी विद्वता ही आ जाये.

On 19 दिस., 11:07, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> बिल्लू और बालू में छन रही है:)
>
> 2011/12/19 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
>
>
> > *ये तो चक दे हो गया जी
> > इसीलिए यहाँ भी घबरा रहे थे बताने में प्राजी[?]*
> ...
>
> और पढ़ें »
>
>  364.gif
> < 1Kदेखेंडाउनलोड करें- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 11:20:53 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
"ऐसे में मैं तो हुआ जट्ट-ब्राह्मण" में *जट्ट-ब्राह्मण की जगह *ब्राह्मण-
जट्ट पढ़ें.


On 19 दिस., 11:07, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> बिल्लू और बालू में छन रही है:)
>

> 2011/12/19 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
>
>
> > *ये तो चक दे हो गया जी
> > इसीलिए यहाँ भी घबरा रहे थे बताने में प्राजी[?]*

> ...
>
> और पढ़ें »
>
>  364.gif
> < 1Kदेखेंडाउनलोड करें- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 11:22:40 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
ग़ज़ब कर दिया न आपने। साहित्यिकों जैसी विनम्रता का प्रदर्शन?
अब आप प्राजी की जगह ब्राजी हो गए हैं।
मज़ेदार रही यह शृंखला। अब इसे विराम देने का वक्त आ गया है।

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

Anil Janvijay

unread,
Dec 19, 2011, 11:38:26 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
बलजीत बासी जी से क्षमा सहित (यह बात आपके लिए नहीं है)
हिन्दी को अपनी मातृभाषा बताने वाले पंजाबियों ने और हिन्दी में लिखने वाले पंजाबी भाषी लेखकों ने
हिन्दी का जितना बेड़ा ग़र्क किया है, उतना शायद ही किसी ने किया हो। पंजाबीनुमा हिन्दी लिखने वाले
इन लेखकों से मैं कभी-कभी इसलिए चिढ़ जाता हूँ कि वे लोग हिन्दी की टाँग ही नहीं तोड़ते, हिन्दी का
ठेका भी ले लेते हैं कि उनसे बड़ा हिन्दी का विद्वान कोई नहीं है।

2011/12/19 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें


Moscow, Russia
+7 495 422 66 89 ( office)
+7 916 611 48 64 ( mobile)

Hansraj sugya

unread,
Dec 19, 2011, 11:50:17 AM12/19/11
to शब्द चर्चा
बिल्लू और बाळू का जुगाड़ ठीक बैठा, जुगाड़ ठीक बैठी नहीं


सस्नेह,
हंसराज "सुज्ञ"


'सुज्ञ' ब्लॉग






Date: Mon, 19 Dec 2011 21:52:40 +0530
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.
From: wadnerk...@gmail.com
To: shabdc...@googlegroups.com

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 12:35:23 PM12/19/11
to शब्द चर्चा
ये बेचारे दोनों तरफ से दुर्कारे जाते हैं , पंजाबी साहित्यकारों की ओर
से इस लिए कि वह पंजाबी में नहीं लिखते , और हिन्दी वाले उनको ठीक हिन्दी
न लिखने पर मूंह नहीं लगाते! क्या हिन्दू, क्या सिख, क्या मुसलमान यह
पंजाबियों की खूबी है कि वह हर जगह छा जाते हैं. फिल्मिस्तान पर पूरा
कब्ज़ा है. मैं आपको एक सही बात बताता हूँ , अगर पंजाब में धर्म के आधार
पर भाषा न बंटी होती ओर देश का बंटवारा न होता तो पंजाबी का देश की
राष्ट्र भाषा बनने का पूरा दावा होता.

On 19 दिस., 11:38, Anil Janvijay <aniljanvi...@gmail.com> wrote:
> बलजीत बासी जी से क्षमा सहित (यह बात आपके लिए नहीं है)
> हिन्दी को अपनी मातृभाषा बताने वाले पंजाबियों ने और हिन्दी में लिखने वाले
> पंजाबी भाषी लेखकों ने
> हिन्दी का जितना बेड़ा ग़र्क किया है, उतना शायद ही किसी ने किया हो। पंजाबीनुमा
> हिन्दी लिखने वाले
> इन लेखकों से मैं कभी-कभी इसलिए चिढ़ जाता हूँ कि वे लोग हिन्दी की टाँग ही
> नहीं तोड़ते, हिन्दी का
> ठेका भी ले लेते हैं कि उनसे बड़ा हिन्दी का विद्वान कोई नहीं है।
>

> 2011/12/19 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>


>
>
>
> > ग़ज़ब कर दिया न आपने। साहित्यिकों जैसी विनम्रता का प्रदर्शन?
> > अब आप प्राजी की जगह ब्राजी हो गए हैं।
> > मज़ेदार रही यह शृंखला। अब इसे विराम देने का वक्त आ गया है।
>

> > 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> ...
>
> और पढ़ें »- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 19, 2011, 12:42:35 PM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
अनिलजी की हिन्दी पंजाबी की इस बात पर मेरा यक़ीन नहीं है।

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
ये बेचारे दोनों तरफ से दुर्कारे जाते हैं , पंजाबी साहित्यकारों की ओर

Baljit Basi

unread,
Dec 19, 2011, 12:58:22 PM12/19/11
to शब्द चर्चा
मेरा भी ऐसा ही ख्याल है. एक पंजाबी होने के नाते नहीं बल्कि साहित्य के
आलोचनातामिक प्रतिमानों के हिसाब से. पंजाब के हिन्दी लिखने वाले लेखकों
में स्वभावक ही पंजाबी मुहावरा आयेगा . और यह एक जीवंत भाषा की निशानी
है कि वह उसमें अनेक रंगों को जज़्ब करे.

On 19 दिस., 12:42, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> अनिलजी की हिन्दी पंजाबी की इस बात पर मेरा यक़ीन नहीं है।
>

> 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Dec 19, 2011, 10:16:16 PM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
यदि कोई पंजाबी हिन्दी लेखक गद्य लिखे और उस में पंजाबी मुहावरा न आए तो समझिए उस का लेखन अत्यधिक सायास है। यदि मेरी कहानी में कोई पंजाबी पात्र होगा तो पंजाबी मुहावरे के बिना वह बेकार सिद्ध होगी। राजस्थान के लेखक चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की सर्वाधिक चर्चित हिन्दी कहानी 'उस ने कहा था' का जो वाक्य सर्वाधिक स्मरण आता है उसे याद कीजिए।
"तेरी कुड़माई हो गयी"

2011/12/19 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

madan mohan arvind

unread,
Jan 3, 2012, 2:51:52 AM1/3/12
to शब्द चर्चा
आदरणीय अभयजी ने दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें कहीं. पहली बात तो यह कि बहुत
से शब्द ऐसे हैं जिनका लिंग निर्धारण किसी मानक के अंतर्गत संभव नहीं, और
दूसरी प्रयोग वाली बात जो और भी महत्वपूर्ण है, किसी भी जीवित भाषा में
प्रयोग होते ही हैं. इन सारी बातों के अतिरिक्त एक निवेदन जो मैं और
जोड़ना चाहता हूँ वह यह कि जिस तरह हम अख़बारों की भाषा और वर्तनी को
अस्वीकार करते हुए एक ही तर्क देते हैं कि वहां सब नासमझ बैठे हैं मुझे
लगता है कुछ अतिशयोक्ति हो जाती है. हम केवल शब्दकोशों को वरीयता देना
चाहते हैं, जो शब्दों के सूचीबद्ध संग्रह हैं, और उनका उपयोग सन्दर्भ
ग्रन्थ के रूप में होता है, वास्तविकता तो यही है कि शब्दकोष भाषा से
बनते हैं भाषा शब्दकोशों से नहीं. पहले भाषा ही आई होगी. अब एक बार फिर
से अख़बारों की ओर चलें, कोई जानबूझ कर शब्दों में या उनके लिंग में
परिवर्तन नहीं करता, अख़बारों में इतने अनपढ़ लोग नहीं होते कि वे शब्दों
के लिंग परिवर्तन अपनी मर्जी से कर दें या किसी शब्द की वर्तनी में
जानबूझ कर उलटफेर कर दें. वे बहुप्रचलित वाक्य विन्यास को उपयोग में लाते
हैं, और प्रचलन कोई एक व्यक्ति से प्रभाव में नहीं आता, शब्दकोष अगर किसी
एक प्रयोग को स्वीकार और दूसरे को अस्वीकार करता है तो इसका एकमात्र अर्थ
यही नहीं होना चाहिए की दूसरा प्रयोग सर्वथा त्रुटिपूर्ण है, जब तक की
ऐसे प्रयोग के विरुद्ध कोई और प्रमाण उपलब्ध न हो.

On Dec 19 2011, 6:29 pm, Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com> wrote:
> हिन्दी में लिंग का कोई तार्किक नियम न होने से ऐसी अराजकता होती है.. इस पर
> विद्वान लोग बड़ी-बड़ी बहसे कर चुके हैं पर हल कोई नहीं निकला..
>
>  इस पर ऊर्जा व्यय करने से कोई लाभ नहीं.. हर आदमी की ज़ुबान नहीं पकड़ी जा
> सकती.. जैसा है ़चलने दीजिये..
>
> यही हमारी हिन्दी का स्वभाव है कि इसमें प्रयोगों की विविधता है।
>
> 2011/12/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
>


> > आपकी बात से मतभेद नहीं है. फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि बहुत से लोग
> > हैं, जिन में से कई अखबारों   में काम करते होंगे जो इस शब्द को
> > स्त्रीलिंग समझते हैं. उनकी नालायकी इस बात में है कि उनहोंने मानक रूप
> > देखने का कष्ट नहीं किया. साईकल को आम तौर पर पुल्लिंग माना जाता है
> > लेकिन कई लोग इसको  स्त्रीलिंग की तरह बोलते हैं. दहीं शब्द का भी यही
> > हाल है, यहाँ तक कि बुल्ले शाह जैसा कवी इसको स्त्रीलिंग बना रहा है.
> > इसमें आपकी कविता वाली तोलतुकांत वाली मजबूरी  भी हो सकती है:
> > "उत्तों आई धम्मी, दहीं नई जम्मी" ( सुबह होने को है लेकिन अभी तक दहीं
> > नहीं जमा). वैसे दहीं भी ऐसे शब्दों में है जिनको कई लोग स्त्रीलिंग
> > समझते हैं. मैंने ऐसा देखा है कि बहुत सारे शब्द जो  परम्परा से पुल्लिंग
> > रहे हैं उनको शहरी लोग स्त्रीलिंग बना रहे हैं. इस मानसिकता को इस मंच पर
> > विचारना  चाहिए. क्यों ना एक छोटी सी सूची बनाई  जाये? वचन का भी कुछ ऐसा
> > ही हाल है. ढाबों वाले आम ही कहते हैं, एक चाय, दो चाय.
>

> > On 19 दिस., 04:21, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> > > लिंग को लेकर जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं वे पत्रकारों की कमअक्ली का प्रतीक
> > > हैं। उन्हें मानक मानना हमारी नादानी होगी।
> > > कोई भी अखबार भाषा को लेकर सजग नहीं है।
>
> > > मध्यकालीन कवियों नें वैसे ही तुकबन्दी के चक्कर में कई शब्दों के ऐसे रूप

> > > बदले कि व्युत्पत्ति तलाशने के शौकीन हमेशा चक्कर में पड़ जाते हैं कि किसी


> > > शब्द का जन्मसूत्र कहीं मिलता है और उसका रूपान्तर चक्कर में डालने वाला!!!
> > > दरअसल तुक और मात्रा के चक्कर में शब्दों के वे रूपान्तर सचमुच जनमानस में
> > रूढ
> > > हो गए और हमने सोचा कि वे ज़बान पर चढ़कर हुए रूपान्तर हैं।
>

> > > बहरहाल बहुत से बदलाव मंजूर हैं, मगर नासमझी के नहीं। हमने भी गलत प्रयोग
> > किया
> > > तो जैसा आज हम किन्हीं अखबारों को मानक मान कर उदाहरण
> > > पेश कर रहे हैं (जहाँ भाषा के समझदारों की कमी है) वैसे ही कल को इस समूह का
> > > लोग हवाला देंगे कि भई अब तो शब्दचर्चा समूह ने भी मान्यता दे दी है। कम से
> > कम
> > > यहाँ तो भाषा के प्रति सम्वेदनशील लोग ही आते हैं और सही नज़रिए से, सही
> > लिखना
> > > चाहते हैं न कि परम्परा या शुद्धता की आड़ में।
>
> > > सो बंधुओं अखबार को मानक न मानें। किसी ज़माने में बोलचाल की भाषा का मानक
> > > अखबार था, आज नहीं।
>

> > > जुगाड़ पुल्लिंग है।
>
> > > 2011/12/19 Madan Mohan Sharma <madanmohanarv...@gmail.com>
>
> > > > आदरणीय, मैंने जुगाड़ के कुछ स्त्रीलिंग प्रयोग भी देखे हैं, आपकी सेवामें

> > > > प्रस्तुत हैं, क्या अब जुगाड़ को स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों रूपों में


> > > > स्वीकार किया जाना चाहिए-
> > > > दैनिक भास्कर- अल्पसंख्यकों को लुभाने की जुगाड़, बैठकों में मस्त नेताजी
> > > > लिंक
> > > >http://www.bhaskar.com/article/MH-managed-minorities-2528151.html
> > > > दैनिक भास्कर- वहां जगह बनाने की जुगाड़ में साइन नहीं की है हॉलीवुड
> > फिल्म
> > > > लिंक
> > > >http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-the-great-gatesby-i
> > > > s-not-my-gateaway-to-hollywoodamitabh-bachchan-2420307.html
> > > > भोपाली अफसरों के लिए टिकट की जुगाड़ लिंक
> > > >http://www.patrika.com/news.aspx?id=728018

> > > > फिर मंत्री बनने की जुगाड़ में लालू यादव लिंक
> > > >http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9116406.cms

> > > > चाईनीज झालरों ने छीनी कुम्हारों की रोजी, बच्चे पेट की जुगाड़ में सड़कों


> > > > पर' लिंक
> > > >www.bundelkhandsamachar.com
>
> > > > 2011/12/19 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
>
> > > >> भाई लोग, ई-स्वामी और ई-पंडित में कन्फ़्यूज हो गए हैं  ..जुगाड को
> > > >> स्त्रीलिंग बनाने पर पंडिज्जी आमादा हैं मै नही! :)
>
> > > >> 2011/12/18 संजय | sanjay <sanjaybeng...@gmail.com>
>
> > > >>> स्वामीजी, स्त्री का जुगाड़, स्त्रीलिंग होगा?
>
> > > >>> 2011/12/18 दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com>
>
> > > >>>> ई-स्वामी जी,
> > > >>>> उस अर्थ में भी जुगाड़ पुर्लिंग ही होगा।
>
> > > >>>> 2011/12/18 ePandit | ई-पण्डित <sharma.shr...@gmail.com>
>
> > > >>>>> एक अर्थ में जुगाड़ स्त्रीलिंग भी है (कामवासना की पूर्ति के सन्दर्भ
> > > >>>>> में)। कॉलेज में कुछ छात्र इसका स्लैंग रूप में प्रयोग करते थे - एक
> > जगाड़
> > > >>>>> फंसै लिया।
>

> > > >>>>> 2011/12/15 madan mohan arvind <madanmohanarv...@gmail.com>


>
> > > >>>>>> जुगाड़ स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग.
>

> > > >>>>> --
> > > >>>>> *Shrish Benjwal Sharma* *(श्रीश बेंजवाल शर्मा <
> >http://hindi.shrish.in>
> > > >>>>> )*
> > > >>>>> ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
> > > >>>>> *If u can't beat them, join them.*
>
> > > >>>>> ePandit <http://epandit.shrish.in/>:* *http://epandit.shrish.in/
>
> > > >>>> --

> > > >>>> *दिनेशराय द्विवेदी, *कोटा, राजस्थान, भारत
> > > >>>> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,


> > > >>>> *क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत <http://anvarat.blogspot.com/>
> >    तीसरा
> > > >>>> खंबा <http://teesarakhamba.blogspot.com/>*
>
> > > >>> --
> > > >>> संजय बेंगाणी | sanjay bengani
> > > >>> *छवि मीडिया एण्ड कॉम्यूनिकेशन*

> > > >>> ए-507, स्मिता टावर,
>

> ...
>
> read more »

अजित वडनेरकर

unread,
Jan 3, 2012, 3:18:30 AM1/3/12
to shabdc...@googlegroups.com
मैं अखबार में हूँ और कोई अतिशयोक्ति नहीं कर रहा हूँ।
भोपाल में बैठकर मैं किसी बिहारी या कलकतिया की हिन्दी को कैसे कोस सकता हूँ।

मैं एक ही घर में रहते हुए दो लोगों की हिन्दी की बात कर रह हूँ।
एक व्यक्ति बैंक को स्त्रीवाची लिखता है, दूसरा पुरुषवाची तब उदारता से दोनों को सही मान लेने में कोई बुराई नहीं है।
किसी का कुछ नहीं बिगड़ता।
ज़ाहिर है अख़बार को तो पाठक के हाथ में जाना है। उसे किसी एक सही का निर्धारण करना पड़ेगा।
भाषा को लेकर उदासीनता ज्यादा है। जानबूझ कर कौन करता है गलती? अनजाने में ही होती है। शब्दकोश भाषा से ही बनते हैं और इसलिए बनाए
जाते हैं ताकि वर्तनी, उच्चार, अर्थ सम्बन्दी वैसी अराजकता न फैले जैसी आज है।
कोई भी शंका हो तो उसका निराकरण शब्दकोश देख कर कर लिया जाए। वर्ना क्या उपयोग है उनका?

शब्दकोश न देख कर लगातार बगल वाले को ज्ञानी मान कर वर्तनी और उच्चारण पूछने की वृत्ति बढ़ी है। अब बगल वाला भी गलत उच्चार बता दे तो सुबह सम्पादक को उसका नाम बता दिया जाता है कि मैने तो उससे पूछ कर लिखा था।
बड़े बड़े साहित्यकारों से भी वर्तनी की चूक होती है। शब्दकोश बनाने वाले भी किसी शब्द के विभिन्न पर्याय, अर्थ, विलोम या मुहावरे मुँहज़बानी नहीं बता सकते। उन्हें भी इसकी ज़रूरत पड़ती है। यह सन्दर्भ सामग्री है, इसे याद नहीं रखा जा सकता। वे भी इसका ही प्रयोग करेंगे।




2012/1/3 madan mohan arvind <madanmoh...@gmail.com>

Madan Mohan Sharma

unread,
Jan 3, 2012, 4:37:51 AM1/3/12
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय अजित जी, 'एक व्यक्ति बैंक को स्त्रीवाची लिखता है, दूसरा पुरुषवाची तब उदारता से दोनों को सही मान लेने में कोई बुराई नहीं है।' अपनी पिछली पोस्ट में मैंने केवल यही तो स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है, आपने मेरे विचारों को मान्यता दी, आभारी हूँ. मैं भी तो यही कहना चाहता हूँ कि दोनों को सही मान लेने की कृपा की जाय पर अक्सर होता इसका उल्टा है और तब अक्सर शब्दकोष के ही सन्दर्भ दिए जाते हैं. आप जैसे बहुत कम विद्वान हैं जिन्हें दूसरी तरह के प्रयोगों की भी पूरी जानकारी रहती है.इसी कारण दूसरे शब्दों में मेरा निवेदन यह भी था कि केवल शब्दकोष पर ही निर्भर होना पर्याप्त नहीं, कुछ और आसपास हो तो उसकी भी अनदेखी न हो. मैं कोई बहुत बड़ा विद्वान नहीं हूँ, फिर भी जो कुछ मन में आया मंच के विद्वानों के साथ बाँटने का प्रयास किया, जो कहा मेरे निजी विचार हैं, संभव है बहुत लोग इनसे सहमत न हों.
2012/1/3 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Jan 3, 2012, 6:18:24 AM1/3/12
to shabdc...@googlegroups.com
अखबार जैसे माध्यम में वर्तनी की एकरूपता ज़रूरी है।
जो लोग अखबार को सही मानते हैं, उन्हें इससे ग़लतफ़हमी नहीं होगी।

बाकी तो सभी भाषाओं में एक शब्द की एकाधिक वर्तनी होती है। लोकमानस शुद्धता और व्याकरण को ज्यादा महत्व नहीं देता।

2012/1/3 Madan Mohan Sharma <madanmoh...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Jan 3, 2012, 7:35:40 PM1/3/12
to shabdc...@googlegroups.com
भद्रजनों इस मामले में संस्कृत सही है, निर्जीव चीजों को नपुंसक लिंग माना जाता है।

३ जनवरी २०१२ ४:४८ अपराह्न को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/
Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages