प्रीति जिंटा

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ashish Maharishi

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Mar 5, 2013, 10:58:01 PM3/5/13
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मदद कीजिए

प्रीति जिंटा होना चाहिए या फिर प्रिटी जिंटा  ? 

eg

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Mar 5, 2013, 11:05:26 PM3/5/13
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उनसे ही पूछ लीजिये। नाम तो दोनों हो सकते हैं आज के जमाने में! 


On Wed, Mar 6, 2013 at 9:28 AM, ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com> wrote:
मदद कीजिए

प्रीति जिंटा होना चाहिए या फिर प्रिटी जिंटा  ? 

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ashish Maharishi

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Mar 5, 2013, 11:07:22 PM3/5/13
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यदि उनसे पूछ सकता, तो आपसे क्‍यों पूछता। यदि किसी को सही जवाब पता है, तो बताएं। समय न बर्बाद करें।


Regards,

 

Ashish Maharishi
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2013/3/6 eg <girij...@gmail.com>

Sheo S. Jaiswal

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Mar 5, 2013, 11:08:19 PM3/5/13
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यह इस बात पर निर्भर करता है कि नाम हिंदी में 'प्रीति' है या अंग्रेजी में 'Pretty'. 

On 6 March 2013 09:28, ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com> wrote:
मदद कीजिए

प्रीति जिंटा होना चाहिए या फिर प्रिटी जिंटा  ? 

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Dr. S. S. Jaiswal

ashish Maharishi

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Mar 5, 2013, 11:09:39 PM3/5/13
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preity zinta


Regards,

 

Ashish Maharishi
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2013/3/6 Sheo S. Jaiswal <jais...@gmail.com>

Sheo S. Jaiswal

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Mar 5, 2013, 11:15:51 PM3/5/13
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फिर तो 'प्रीति' होना चहिये. उसे 'Preity' लिखना वर्तनी का अंग्रेजीकरण कह सकते हैं. 

Abhay Tiwari

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Mar 6, 2013, 12:37:11 AM3/6/13
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आम चलन में उनका नाम प्रीति ही उवाचा जाता है.. मैंने तो कभी किसी को प्रिटी कहते नहीं सुना..

Sandeep kumar

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Mar 6, 2013, 12:41:34 AM3/6/13
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क्या होना चाहिए यह अलग मसला है, होगा वही जो वह खुद लिखती होंगी। कम से कम नाम के मामले में तो मैंने यही देखा है। बहुत सारे अखबार बांग्ला के प्रणब को हिंदी का प्रणव बना देते हैं मेरे ख्याल से यह गलत है। अरुण नाम वाले बहुतेरे लोगों को मैंने खुद अपना ही नाम अरूण लिखते देखा है। वह हिंदी लिखती होंगी इसकी गुंजाइश बहुत कम है लेकिन हकीकत यही है कि उनके सिवा कोई बता नहीं सकता।
Sandeep

अजित वडनेरकर

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Mar 6, 2013, 1:54:35 AM3/6/13
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हर बार सबूत मिलेंगे। गंभीरता का अभाव है।

2013/3/6 Sandeep kumar <aboutsa...@gmail.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

संजय | sanjay

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Mar 6, 2013, 2:12:11 AM3/6/13
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नाम के मामले में व्यक्ति की चलती है, भाषा, व्याकरण, नियम, कायदे ताक पर रखे जाते है.

2013/3/6 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
संजय बेंगाणी | sanjay bengani । 9601430808
छवि ब्रांड कंसलटींग
ए-511, स्मिता टावर, गुरूकुल रोड़,
मेमनगर , अहमदाबाद, गुजरात. 


अजित वडनेरकर

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Mar 6, 2013, 2:55:44 AM3/6/13
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सही है। थोड़ी नासमझी भी शामिल है। शचीन्द्र को अब सचीन्द्र, सचिन्द्र या शचिन्द्र  लिखा जाता है। सुनने वालों नें श और स का फ़र्क़ नहीं समझा, शचीन्द्र से प्रभावित होकर अपनी संतान का नाम सचिन्द्र रख दिया जो सचिन्दर हो गया।

2013/3/6 संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com>

Durgaprasad Agrawal

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Mar 6, 2013, 2:57:51 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
आशीष, आपने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है. हिंदी फिल्मों और उनसे जुड़े लोगों के नामों के सही उच्चारण को लेकर अक्सर संशय बना रहता है. कोई ऐसा ठिकाना होना चाहिए जहां प्रामाणिक जानकारी मिल सके. कंगना का सरनेम क्या है, रानावत, रानौत, रानाउत? धर्मेन्द्र  के पुत्रगण का सरनेम क्या है - देओल, द्योल या कुछ और? अगर ऐसे किसी ठिकाने की जानकारी किसी सदस्य को तो तो कृपया इस मंच पर साझा करें.
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल 


6 मार्च 2013 12:42 pm को, संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com> ने लिखा:



--

Please read

My blog 'Jog Likhee'
at
http://dpagrawal.blogspot.com

अजित वडनेरकर

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Mar 6, 2013, 3:03:06 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
दुर्गाप्रसाद जी,
आपने जो उदाहरण दिए हैं सटीक हैं। ये अंग्रेजीदाँ लोगों की मूर्खताएँ हैं। जैसा कि अभयभाई कहते हैं, चूँकि फिल्म इंडस्ट्री में रोमन चलती है इसलिए प्रचलित शब्दों के उच्चार तो ठीक कर लिए जाते हैं, बाकी प्रेस रिलीज़ के ज़रिये कुछ नमूने न्यूज़ रूम में तैयार होते हैं।
मूल देवल है उसका देवळ रूप भी कहीं कहीं है। पर अब वे तमाम रूप मौजूद हैं जो आपने गिनाए हैं।
इसी तरह मूल राणावत है पर उसका क्या हाल हुआ, आप सबके सामने हैं।

2013/3/6 Durgaprasad Agrawal <dpagr...@gmail.com>

ई-स्वामी

unread,
Mar 6, 2013, 3:09:10 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
Preity Zinta (pronounced [ˈpriːt̪i ˈzɪɳʈaː]; born 31 January 1975)[1] is an Indian film actress.
http://hindini.com
http://hindini.com/eswami

Durgaprasad Agrawal

unread,
Mar 6, 2013, 3:09:13 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित भाई, आपकी इस बात से शत प्रतिशत सहमत हूं कि ये अंग्रेज़ीदां  लोगों की मूर्खताएं हैं. लेकिन, इसके बावज़ूद मैं यह भी मानता हूं कि हरेक को यह हक़ है कि वो अपना नाम (या उपनाम) क्या रखे! अगर कोई कहे कि उसका उपनाम अग्रवाल है तो, और कोई कहे कि नहीं, अग्गरवाल है - मैं तो दोनों को स्वीकार करूंगा, बिना किसी टिप्पणी  के. और इसी तरह मुझे न द्योल से कोई आपत्ति होगी ना रानौत से. असल सवाल अब भी यही है कि हम हिंदी भाषियों को कैसे पता चले कि कंगना जी अपने नाम के साथ क्या उपनाम लगाती हैं और प्रीति जी प्रीति जी हैं या प्रीटी जी? या कुछ और? इस बारे में  मार्गदर्शन करें!  
दुर्गाप्रसाद 


6 मार्च 2013 1:33 pm को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:

ई-स्वामी

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Mar 6, 2013, 3:26:13 AM3/6/13
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१. अव्वल तो अपना मकसद शब्द चर्चा है, नाम चर्चा नहीं है - अगर नाम अपने आप में कोई अर्थपूर्ण शब्द ना हो.
२. अगर विकी पेज हो तो वहाँ पर अक्सर नाम का उच्चरण भी उपलब्ध होता है।
३. forvo जैसी सुविधाएं भी हैं http://www.forvo.com/word/preity_zinta/



2013/3/6 Durgaprasad Agrawal <dpagr...@gmail.com>



--
http://hindini.com
http://hindini.com/eswami

ePandit | ई-पण्डित

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Mar 6, 2013, 5:31:28 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
बहुत से अखबार प्रिटी ही लिखते हैं। हो सकता है यही असली नाम हो या हो सकता है नाम प्रीति हो और preity वर्तनी अपनायी हो। ये सितारे आमतौर पर काफी अन्धविश्वासी होते हैं और इस फेर में अपने नाम तथा फिल्मों के नाम की वर्तनी में हेराफेरी करते रहते हैं। तो यह भी सम्भव है कि नाम प्रीति हो, वर्तनी preity लिखती हो और अखबार वालों ने उसे प्रिटी बना दिया हो।

कुल मिलाकर असली बात उसे ही पता होगी।

6 मार्च 2013 11:07 am को, Abhay Tiwari <abha...@gmail.com> ने लिखा:



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 6, 2013, 5:34:18 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
आशीष ने नाम का उच्चार पूछा है जो 100 प्रतिशत शब्दचर्चा का विषय है। हाँ, कोई अपनी सद्यजात संतान के नामकरण पर यहाँ चर्चा कराए तो गड़बड़ है।
आपके दूसरे बिन्दु के संदर्भ में निवेदन है कि यह कैसे माना जाए कि विकी ने ठोक बजा कर ही उसका उच्चारण लिखा है।
वहाँ भी आपके हमारे जैसे लोग बैठे हैं।
फोर्वो हिन्दी के उच्चारण उपलब्ध कराता है? मुझे शंका है।



2013/3/6 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>

Baljit Basi

unread,
Mar 6, 2013, 8:36:33 AM3/6/13
to शब्द चर्चा

धर्मेन्द्र का सरनेम तो पंजाबी के हिसाब से 'दिओल' ( ਦਿਉਲ ) है। हिन्दी
में शायद 'द्योल' उचित होगा . प्रिटी जिंटा बोला लिखा जाता है, लेकिन
पंजाबी के हिसाब से प्रीती ज़िंटा होना चाहिए . एक और पंजाबी अभिनेत्री
को आम तौर पर पूनम ढिल्लन लिखा और बोल जाता है लेकिन यह 'पूनम ढिल्लों'
है।
नामों की चर्चा यहाँ ज़रूर होनी चाहिए।

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 6, 2013, 8:48:21 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
बलजीत भाई,
द्योल एकदम ग़लत है। मूल देवल है। बाकी अपनी पारिवारिक परम्परा और रफ़त के हिसाब से जिसे जो लिखना हो, लिखे।
देवल का द्योल उच्चारण अभी डेढ़ दशक में ही सामने आया है। धर्मेन्द्र के घराने के लिए सर्वाधिक प्रचलित उच्चारण देओल रहा है। पंजाबी में इसका रूप दिओल लिखा जाता है। हाँ  देओल को अगर एक तरफ़ रखें तो उपनाम के देवल रूप के ही सर्वाधिक नतीजे भी  गूगल पर मिलेंगी।
 

2013/3/6 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
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Baljit Basi

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Mar 6, 2013, 9:45:54 AM3/6/13
to शब्द चर्चा
अजीत जी इस बात पर मैं आपसे सहमत नहीं हो सकता। हम मूल की बात नहीं कर
रहे। मसला है कि प्रचलित क्या है। पंजाब में 'द्योल' जट बहुत हैं .
पंजाबी में मैंने इसके हिज्जे और उचारण बता दिए हैं, हिंदी में इसको
जैसे भी आप लिखें। यहाँ मेरे शहर के पास ही एक द्योल परिवार रहता है। वह
लुधिआना शहर का है। धर्मेन्द्र भी लुधिआना जिले का है . लुधिआना में बहुत
द्योल हैं।इस जिले में और पंजाब के सभी जगह के 'द्योल'.यही हिजे लिखते
हैं। हाँ कुछ देवल भी लिखते हैं। इन का मानना है कि इनके बजुर्ग का नाम
जगदेओ बंसी देवल था . कई बार ऐसा होता है कि एक ही गोत्र के अलग अलग
हिजे लिखते से दो अलग ही गोत्र हो जाते हैं। लिखते दो अलग सरनेम बन जाते
हैं।मेरे बासी गोत के कुछ लोग बस्सी लिखने लगे हैं . हमारे गाँव के
'बासी' ही एक और गाँव में बसने लगे तो उन्होंने आपना सरनेम 'बांसी' रख
लिया . आपने सरनेम को मैं अंग्रेज़ी में Basi लिखता हूँ , मेरा बड़ा
भाई Bassi .और कई लोग Basy, Bassy . द्योल के बारे में यह बात पक्की है
कि बहुत बड़ी संखिया पंजाबी में ਦਿਉਲ लिखती है।

On 6 मार्च, 08:48, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> बलजीत भाई,
> द्योल एकदम ग़लत है। मूल देवल है। बाकी अपनी पारिवारिक परम्परा और रफ़त के
> हिसाब से जिसे जो लिखना हो, लिखे।
> देवल का द्योल उच्चारण अभी डेढ़ दशक में ही सामने आया है। धर्मेन्द्र के घराने
> के लिए सर्वाधिक प्रचलित उच्चारण देओल रहा है। पंजाबी में इसका रूप दिओल लिखा

> जाता है। हाँ  देओल को अगर एक तरफ़ रखें तो उपनाम के* देवल *रूप के ही


> सर्वाधिक नतीजे भी  गूगल पर मिलेंगी।
>

> 2013/3/6 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>


>
>
>
>
>
>
>
> > धर्मेन्द्र  का सरनेम तो पंजाबी के हिसाब से 'दिओल' ( ਦਿਉਲ ) है। हिन्दी
> > में शायद 'द्योल' उचित होगा . प्रिटी जिंटा  बोला  लिखा जाता है, लेकिन
> > पंजाबी के  हिसाब से प्रीती ज़िंटा होना चाहिए . एक और पंजाबी अभिनेत्री
> > को आम तौर पर पूनम ढिल्लन लिखा और बोल जाता है लेकिन यह 'पूनम ढिल्लों'
> > है।
> >    नामों  की चर्चा यहाँ ज़रूर होनी चाहिए।
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> *
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/
> औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए

Baljit Basi

unread,
Mar 6, 2013, 10:04:20 AM3/6/13
to शब्द चर्चा
मेरे शहर के पास जो द्योल परिवार रहता है उनके बजुर्ग का नाम हरमंदर सिंह
द्योल है। वह लुधियाना गवर्नमेंट कालिज का प्रिंसिपल रह चूका है। इस
कालिज में साहिर लुधियानवी पढ़ा करता था। हम कभे कभी मिलते हैं। उसको किसी
ज़माने में लिखने का शौक भी था। उसकी कोई चालीस साल पुरानी कहानियों की
किताब मेरे पास है जिस पर 'हरमंदर सिंह दिओल' नाम लिखा हुआ है। मज़े की
बात है कि उनको शब्द व्योत्पति का शौक है।

> > उद्धृत पाठ दिखाए- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 6, 2013, 10:23:12 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
आप सही हो सकते हो। मैं भी मूल को जस का तस लिखने की बात नहीं कर रहा हूँ।
देओल का द्योल रूप बीते कुछ वर्षों में हिन्दी में नज़र आने लगा है। यही बताना चाहा है। प्रिन्ट मीडिया से जुड़े लोग मेरी बात की तस्दीक
करेंगे। आप पंजाबी में दिओल बता रहे हैं और हिन्दी में इसके द्योल रूप के सही होने की संभावना जता रहे हैं उस पर मैने उक्त प्रतिक्रिया दी थी।
उच्चारण भिन्नता तो स्वाभाविक है।  देओल से द्योल लिखने का चलन नया है।

2013/3/6 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
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--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

Durgaprasad Agrawal

unread,
Mar 6, 2013, 10:35:31 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित जी और बलजीत जी दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं. इधर राजस्थान में भी 'देवल' सरनेम प्रचलित है, लेकिन यहां मुझे बलजीत जी की बात अधिक स्वीकार्य लगती है. अगर पंजाब में द्योल या दिओल का प्रचलन है तो है! हमें भी उसे स्वीकार करना ही होगा. करना ही चाहिए. 
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल 


6 मार्च 2013 8:53 pm को, अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:



--

Baljit Basi

unread,
Mar 6, 2013, 10:43:53 AM3/6/13
to शब्द चर्चा
मेरे ख्याल में पंजाबी नज़रिए से 'देओल' अंग्रेज़ी में लिखे जाते Deol की
गलत नक़ल/लिपियन्त्र है जैसे 'ढिल्लन' Dhillon की।

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 6, 2013, 10:48:12 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
बिल्कुल । देओल भी मुझे गड़बड़ ही लगता रहा।
ढिल्लन का क्या सही उच्चार है?
धिल्लन? धिल्लों या ढिल्लों ?

2013/3/6 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
मेरे ख्याल में पंजाबी नज़रिए से 'देओल' अंग्रेज़ी में लिखे जाते Deol  की
गलत नक़ल/लिपियन्त्र है जैसे 'ढिल्लन' Dhillon  की।
--
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Baljit Basi

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Mar 6, 2013, 10:52:48 AM3/6/13
to शब्द चर्चा
ढिल्लों

ePandit | ई-पण्डित

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Mar 6, 2013, 11:20:29 AM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com
जब ठाकुर का टैगोर हो सकता है तो देवल का देओल बनना तो कोई बड़ी बात नहीं।

6 मार्च 2013 7:06 pm को, Baljit Basi <balji...@yahoo.com> ने लिखा:
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ashish Maharishi

unread,
Mar 6, 2013, 10:28:31 PM3/6/13
to shabdc...@googlegroups.com

ई स्‍वामी जी धन्‍यवाद। 

पहली बात, हम विकी को विश्‍वसनीय नहीं मानते हैं। दूसरी बात, शब्‍द चर्चा का थीम बताने के लिए धन्‍यवाद। 

यदि जवाब पता है तो बताएं, वरना यहां सभी ज्ञानी हैं। व्‍यक्तिगत मत लीजिए। 



Regards,

 

Ashish Maharishi
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On Thu, Mar 7, 2013 at 8:39 AM, anil manchanda <ams...@gmail.com> wrote:
preeti ho ya pretty
parantu JINTA nahin
wof ZINTA hain ji.


On Wednesday, 6 March 2013 09:28:01 UTC+5:30, ashish maharishi wrote:
मदद कीजिए

प्रीति जिंटा होना चाहिए या फिर प्रिटी जिंटा  ? 

e Swami

unread,
Mar 7, 2013, 5:11:43 PM3/7/13
to shabdc...@googlegroups.com
अबै हम जब हियां हैं त गियानी हैं ही है लेकिन सवाल का २ सौर्स से जबाब दिये चैन ना मिल्लीआ? सीधा छौरी से ट्वीट कर बतावै लव लैटर किस नाम से भैज्जूँ! हद्द है बाई गाट। 

Sent from my iPhone

eg

unread,
Mar 7, 2013, 9:12:09 PM3/7/13
to shabdc...@googlegroups.com
गाम्भीर्य का अभाव 

2013/3/8 e Swami <esw...@gmail.com>
347.png

अजित वडनेरकर

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Mar 8, 2013, 7:23:14 AM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
बहुमत को संभालिए अब।
लौडों वाली भाषा पूरब ने झिलवाई ।  अबै तुबै के नगाड़े पच्छिम से आने ही थे।

2013/3/8 eg <girij...@gmail.com>



--

347.png

ashish Maharishi

unread,
Mar 8, 2013, 8:23:30 AM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
अभय जी 

बददिमाग और बद्जुबानों को यहाँ से हटा ही देना बेहतर होगा। जिन लोगों को बोलने तक की तमीज नही है, उनका इस मंच पर क्या काम ? यदि मैं इ स्वामी नामक जीव को उसी की जुबानी में जवाब दूं तो क्या यह सही रहेगा? 

कृपया मार्गदर्शन करें। 


Regards,

 

Ashish Maharishi
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2013/3/8 e Swami <esw...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Mar 8, 2013, 8:52:57 AM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
देखिये भाई मैं केवल संयोजक हूँ.. हेडमास्टर नहीं.. सभी लोगों को दूसरे सदस्यों की गरिमा को ध्यान में रखकर ही संवाद करना चाहिये.. आशीष, यदि आप किसी जवाब देने वाले साथी से कहेंगे कि यहाँ सभी ज्ञानी हैं तो क्या उसे बुरा नहीं लगेगा..? अगर सभी ज्ञानी हैं तो चर्चा का औचित्य ही क्या है? आपने सवाल रखा है तो जो भी सदस्य कुछ भी कह रहा है तो सहायता की नीयत से ही कह रहा है.. किसी गरज से नहीं.. 

2013/3/8 ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Mar 8, 2013, 9:14:20 AM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
यदि किसी को सही जवाब पता है, तो बताएं। समय न बर्बाद करें।

यह भी कोई अच्छी प्रतिक्रिया न थी। यदि ऐसी प्रतिक्रिया दी जाती रहे तो कोई भी अपनी जानकारी रखने से पहले सोचेगा कि लिखूँ या नहीं।

8 मार्च 2013 7:22 pm को, Abhay Tiwari <abha...@gmail.com> ने लिखा:



--

Sandeep kumar

unread,
Mar 8, 2013, 9:28:26 AM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
वर्चुअल मंच होने के कारण यह कहा नहीं जा सकता है की कौन कब किस  मूड में है। इसका हल यही है की कोई हलकी टिपण्णी यहाँ की ही न जाये. इस थ्रेड पर एक नहीं तमाम टिप्पणियां ऐसी हैं जिन पर किसी न किसी को आपत्ति हो सकती है. 

2013/3/8 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>



--
Sandeep

Prashant Dhyani

unread,
Mar 8, 2013, 9:44:37 AM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
बेंजवाल जी नमस्कार,
आपका कहना बिल्कुल सही है। मैंने प्रीति जिंटा के एक साक्षात्कार में पढा था कि उनका बचपन में नाम प्रीति था लेकिन बाद में इसे अंग्रेजी का प्रिटि कर दिया गया। जिसका हिंदी अर्थ खूबसूरत है। इसलिए अब ये हिंदी का प्रीति न होकर अंग्रेजी का प्रिटि है। अब इसे हिंदी में कैसे लिखा जाए, ये तो आप लोग ही जानें
धन्यवाद


2013/3/6 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

ashish Maharishi

unread,
Mar 8, 2013, 9:49:27 AM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
abay ji

@ jab shabhcharcha ho rhi hai to usi par baat honi chahiye....lekin kuch log puri charcha ko satahi bana dete hain...aise halke logon ke sath charcha kar samay hi barbad karna hai..main wo line kyu likhi thi, uske liye e swami ki pahli post zimedar hai..yadi wo abe tabe kar ke baat karnege to usi bhasha me main bhi jawab de sakta hoon..lekin main unki tarah gir nhi sakta...baki aapki marzi..



Regards,

 

Ashish Maharishi
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2013/3/8 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

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Mar 8, 2013, 9:55:50 AM3/8/13
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"यदि किसी को सही जवाब पता है, तो बताएं। समय न बर्बाद करें"
श्रीशभाई बेशक,
यह वाक्य अच्छा नहीं है अगर प्रथमतः आशीष ने अपनी जिज्ञासा के साथ ही इसे लिखा होता।
यह प्रतिक्रिया थी इसलिए क्योंकि उन्हें तत्काल ही सलाह दी गई कि प्रीति जिंटा से ही पूछा जाए। मेरे खयाल से उन्होंने कुछ ग़लत नहीं कहा। कम से कम "अबे" और "लौंडा" तो नहीं कहा किसी को या समूह के सभी सदस्यों को।



2013/3/8 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>



--

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 8, 2013, 10:03:36 AM3/8/13
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2013/3/8 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 8, 2013, 11:39:40 AM3/8/13
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शब्द चर्चा में क्रिया-प्रतिक्रिया के कारण कुछ ऐसा हो रहा है जिसे वांछनीय नहीं कहा जा सकता। यह पूरे समूह के लिए चिंता का विषय होना चाहिये. सार्वजनिक व्यवहार में भाषा का संयत होना एक तरह की अनिवार्यता है. इस मंच पर कम से कम जान बूझकर असंयत भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिये। गलत भाषा के लिए किसी को टोकते हुए हमारी भाषा भी गलत है तो दूसरा हमारी बात कैसे सुनेगा?     
Dr. S. S. Jaiswal

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 8, 2013, 12:38:18 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
साहेब,
हमेशा मौन सार्थक भी नहीं होता। आपत्ति के मूल भाव को न समझते हुए, वैसा शिष्टाचार न दिखाते हुए अगर बात आगे बढ़ाई जाती रहेगी तो ऐसे प्रसंग लगातार होंगे। पढ़े लिखे लोगों का मंच है। प्रसंगवश परिहास भी अगर है तो भी सोच समझ कर लिखना चाहिए। फिर भी आपत्ति है तो खेदप्रकाश तो किया ही जा सकता है। पिछली दो शृंखलाओं में देखें कि असल में हुआ क्या ? आशीष ने कुछ भी ग़लत या उकसाऊ बात अपने चर्चा सूत्र में नहीं कही।

वैसे तो इस मंच पर आने वाली अधिकांश जिज्ञासाओं पर भी कहा जा सकता है कि शब्दकोश देखें। पर ऐसा आजतक नहीं कहा गया। यह भी उतना ही खीझ पैदा करने वाला वाक्य होगा जितना कि प्रीति जिंटा से पूछने की सलाह। आसान और कठिन, हर तरह की जिज्ञासाओं को गंभीरता से लिया जाकर, अपना वक़्त निकाल कर उसे तार्किक नतीजे तक पहुँचाया जाता है। क्या यह काफ़ी नहीं है कि इस मंच को अधिकांश लोग गंभीरता से ले रहे हैं ?

किसी चर्चा पर मुदित होकर लौंडा शब्द का इस्तेमाल या खीझ कर अबे जैसे शब्दों के प्रयोगों पर मैं बिल्कुल चुप नहीं रहूँगा, यह स्पष्ट कह देना चाहता हूँ। मर्यादा के दायरे में इसका विरोध जारी रहेगा, यही मैने तय किया है। सभी सदस्यों से अनुरोध है कि इसे चलने देना है या नहीं, इस पर विचार कर लें। मैं इस मंच पर गंभीरता देखना चाहता हूँ। वाद-विवाद शब्दों के संदर्भ में हो तो चलेगा किन्तु अहंकार, अड़ियलपन, उकसाऊ रवैया मुझे बर्दाश्त नहीं है। कई सदस्यों ने मुझे व्यक्तिगत रूप से भी इसके बारे में लिखा है क्योंकि अभयभाई ने उदारता के साथ मुझे समूह का सहसंचालक बनाया है। चाहे तो इस समूह से मेरे निष्कासन पर भी चर्चा की जा सकती है, मुझे कोई एतराज नहीं होगा।

सभी मान्यवर सदस्यों के प्रति मेरे व्यवहार में पहले जैसी ही उर्जा और गरमाहट रहेगी। प्रस्तुत प्रसंग में आशीष की कोई ग़लती नहीं देखता। मुझे ऐसा भी लगता है कि अशिष्टता को अनदेखा करने का मानस बनता जा रहा है, जो ठीक नहीं ।

सादर
अजित

ई-स्वामी

unread,
Mar 8, 2013, 2:08:33 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित, 

१. सीधे प्रीति से पूछ लो वाली सलाह कतई खिजाऊ नहीं है - उनकी अपनी वेबसाइट है, ट्विटर अकाउंट है आसानी से पूछा जा सकता है। ये सन ९० का इंटरनेट नहीं है। 

२ यू tube पर वीडियोज हैं जिनमे प्रीति का अपना शो भी है - अवार्ड शोज़ से ले कर सलमान/शाहरुख़ जैसे उन्हें प्रीति कह कर बुला रहे है, उनके शो के गाने में भी उन्हें प्रीति कहा गया है.  सो स्पष्ट है की प्रीति हो या प्रीटी उसे प्रीति  बुलाए जाने पर कोइ आपत्ति नहीं है। इस सवाल का औचित्य नहीं है लेकिन महज थ्रेड को आगे बढाने के लिए जब हरकते की जाए तो अनुभवी आँखों को दिख जाती है। 

३. कथन है की  हम "विकी" को विश्वसनीय नहीं मानते - तो यहाँ पर कही गयी बात को विश्वसनीय किस आधार पर मानोगे? 

४. आशीष ने उकसाया और श्याना बनाने की कोशिश की इसलिए "अब्बे" जैसे संबोधन से नवाजना पडा - मुझे मालूम था की अब ये विक्टिम प्ले करेगा ... "यहाँ सब ज्ञानी हैं  " जैसे डायलोग बचपन में ईजाद कर के और मार के छोड दिए हमने ..जब हमें ही कोई  सुनता है तो लेवल ठीक करना ही पड्ता है - आगे भी किया जाता रहेगा - मैं इस समूह से पहले दिन से जुडा हूँ और स्पष्ट कह रहा हूँ। ऐसी हरकतों से बहुत वाकिफ हूँ और जरूरत पड़ने पर ही प्रतिक्रया देता हूँ. 

५. वैसे भी गूगल खंगालना नौसिखोयों का काम रह गया है - मैं डीप वैब से जुड हूँ और अपना मन टोर ब्राउज़र्स पर अधिक  रमता है - इधर आना कम ही होता है लेकिन समूह का स्तर प्रभावित होता है जब बिना कोइ रीसर्च किए सुभूते के लिए सीधे प्रश्न ठोक दे - इस से ज्यादा बोलने का अभी समय नहीं है। ...आप सब खेलो खाओ खुश रहो। :) 

राम राम 

ई-स्वामी 


2013/3/8 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
साहेब,

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अजित वडनेरकर

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Mar 8, 2013, 4:38:33 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
महामना स्वामीजी,
('जी' की ज़रूरत वैसे नहीं है, पर स्वामी शब्द की भी आखिर कुछ गरिमा है। अलबत्ता यहाँ कोई आपका चेला नहीं कि उसे 'अब्बे' कहा जा सके)

पहले सवाल का उत्तर तो मेरे उसी पत्र में है जिसके जवाब में आप लिख रहे हैं। मैने लिखा कि यहाँ कोई भी यह उत्तर दे सकता है कि डिक्शनरी देखें। आपके बाकी तमाम विकल्प भी यही साबित करते हैं कि इस मंच की कोई उपयोगिता नहीं है। हर चीज़, बात का जवाब इंटरनेट पर है, तब कोई यहाँ वक़्त क्यों खराब करे? किसने, किसे उकसाया ये तो अब इस समूह के विद्वज्जन ही तय करेंगे। फिर भी 'अब्बे' कहने जैसी अशालीन भाषा की अपेक्षा आपके जैसे वरिष्ठ नेटिजन से नहीं है जो सालों से सिखाता आया है कि नेट पर कैसे व्यवहार करना चाहिए। यक़ीन मानिए, आपकी तुलना में कई और भी हैं जो वैसी प्रतिक्रियाएँ दे सकते थे, पर उन्होंने इस मूरे प्रसंग से खिन्नता जताते हुए  मुझे व्यक्तिगत तौर पर लिखा।

विकी और विश्वसनीयता एक तरफ़, समूह पर सभी आदरणीय हैं। 'यहाँ सब ज्ञानी हैं" जैसा वाक्य अगर बचपन में ईज़ाद कर भी लिया गया है तो इसमें सामूहिक चरित्र की बात ही परिलक्षित की आशीष ने। सिर्फ़ इतना बताएँ कि "अब्बे" के साथ व्यक्तिगत कौन हुआ ? वो जो दूसरों को ज्ञान बाँटता रहा? नेट पर क्या करें, कैसे करें?  श्याना बनने के बारे में कौन तय करेगा ? आप खुद ही कह रहे हैं कि 'ज्ञानी' फ्रेज़ पुरानी है तो 'श्याने' का राग वह बेनामी अलाप रहा है जो 'स्वामी' की उपाधि से आभासी होने के दोहरे-तिहरे लाभ की स्थिति में है !!!  आशीष का एक नाम है। वो एक क़िरदार है। आप तो वर्षों से बेनामी हैं।  'स्वामी' तो कोई भी हो सकता है। जैसे आप। ठीक वैसे ही जैसे आशीष के कहे से ...यहाँ सब ज्ञानी हैं। यहाँ सब स्वामी हैं।

आपका मन "टोर ब्राउज़र्स" में अधिक रमता है, यह कह कर आपने उसी बात का समर्थन किया है कि 'यहाँ सब ज्ञानी हैं'। आप सिर्फ़ यही कह रहे हैं कि "नहीं मैं ज्ञान में और भी आगे हूँ" अर्थात कि आप स्वामी से भी ऊंचे दर्जे पर जा बैठे हैं। हम तो बहुत निचली पायदान पर हैं। कृपया महाज्ञानी की पदवी धारण करें, पर शिष्टाचार ज़रूर सीख लें। हम जैसे गूगल सर्च वाली जमात से संवाद करते वक़्त। हाँ "टोर ब्राउज़र्स" तक कभी पहुँचे तो भी कभी ऐसी गर्वोक्ति नहीं करेंगे जो नारद-मंडली के सदस्यों का स्वभाव बन चुकी थी। बुरी आदत अभी तक गई नहीं है:) कैसे जाएगी आख़िर। दम्भ पर खड़ी जो थी एक आभासी इमारत। इमारत भी ढह गई, दम्भ भी पलायन कर रहा है।

"समूह का स्तर प्रभावित होता है जब बिना कोइ रीसर्च किए सुभूते के लिए सीधे प्रश्न ठोक दे"  आपने सिर्फ एक ही बात मार्क की कही है। अलबत्ता संदर्भ फिर ग़लत। यह बात आशीष के संदर्भ में नहीं बल्कि उनके लिए कही होती जिनकी प्रतिक्रिया की आप पैरवी कर रहे हैं तो ज्यादा सही होता। उनके संदर्भ में यह जुमला ज्यादा सही है। हमें भी दिक़्क़त होती है जब बिना संदर्भ के कोई भी शब्द आसमान से टपक पड़ता है। तब भी ऐसी बात नहीं की, जैसी आप कह रहे हैं। हमें बुरा लगा 'लौंडों' जैसे परिहास पर और "अब्बे" जैसे नवाज़ने पर। आशीष ने उकसाया नहीं। पर 'लौंडों' जैसे तथाकथित भ्रष्ट परिहास पर आपका मन नहीं उकसा और 'विकिपीडिया' और 'सब ज्ञानी' पर आप आपा खोते हैं तब आपका 'स्वामित्व' पाखंड लगता है।

आखिरी बात। यहाँ कोई खेलने, खाने नहीं आया है। कुछ लोग हो सकते हैं जिनका ये मक़सद हो। चेहरे खुल रहे हैं। ये ज़रूरी भी होता है, जो इन दिनों यहाँ चल रहा है। सम्भव है अभय भाई खिन्न हो रहे हों। मुझे उनकी फ़िक़्र है। इसीलिए खुद के जुड़े रहने की बाध्यता जैसी कैसी भी सोच से सभी को मुक्त कर रहा हूँ। किसी समूह के मज़बूत होने की स्वाभाविक प्रक्रिया है ये। फ़िलहाल जिस सदस्य से आप मुखातिब हैं वो खेलने खाने की बजाय सार्थक साझेदारी और गंभीरता की ज़िद के साथ यहाँ है। अपने अतीत, वर्तमान और असली नाम के साथ। आभासी दुनिया में अपने असली क़िरदार के साथ। मुझे हमेशा इसी ज़िद पर पाएँगे। उसी की वजह से यहाँ भी हूँ। भरसक संयत प्रतिक्रिया दी है। तो भी बुरा न लगे इसकी गारंटी नहीं। हाँ, 'अबे' और 'लौडों' टाइप की शब्दावली और उसकी पैरवी तो ताज़िंदगी सार्वजनिक मंच पर नहीं करूंगा।

व्यक्तिगत तौर पर आपको कुछ बातें विचलित कर सकती हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है। वो सब कहने के लिए भी आपके पत्र ने ही विवश किया है।
शुभेच्छु

अजित





2013/3/9 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>



--

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 8, 2013, 4:41:32 PM3/8/13
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ashish Maharishi

unread,
Mar 8, 2013, 9:02:52 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
ई स्‍वामी 

मुझे लग रहा है कि आप जैसे घटिया लोगों के कारण ही यह मंच अब चर्चा के लायक बचा नहीं है। आपके स्‍तर तक गिर सकता हूं। लेकिन मैं एक युवा हूं और सठियाने की उम्र अभी आई नहीं है। 



Regards,

 

Ashish Maharishi
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ashish Maharishi

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Mar 8, 2013, 9:27:40 PM3/8/13
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मुझे पता है कि मेरी प्रतिक्रिया के कारण मंच के कई माननीय सदस्‍य नाराज हुए होंगे। इसके लिए मैं क्षमा मांगता हूं। लेकिन इसकी शुरूआत ई स्‍वामी ने 'अबे' और 'लौडों' जैसी भाषा के कारण हुई। 


मैं मंच के वरिष्‍ठ और सम्‍मानित लोगों से पूछता हूं कि यदि आपको कोई 'अबे' और 'लौडों'  कहे तो क्‍या आपको गुस्‍सा नहीं आएगा। मैंने प्रिटी और प्रीति नाम के बारे में पूछा तो मुझे जवाब दिया गया कि इस सवाल का जवाब प्रीति ही दे पाएंगी। 


यदि मैं प्रीति से जवाब ले पाता तो इस मंच से क्‍यों जुड़ता। कई बार से यह देखने को मिल रहा है कि कुछ सदस्‍यों के कारण मंच पर गंभीर चर्चा भी विवादों में फंस जाती है। 


मुझे पता है कि मंच से कई ज्ञानी, महापंडित लोग जुड़े हुए हैं। हमारे जैसे युवा ऐसे मंचों पर ही इसी लिए आते हैं ताकि हम अपनी भाषा को सुधार सकें और ज्ञान ले सकें आप लोगों से। लेकिन यहां आकर जब 'अबे' और 'लौडों' जैसी भाषा सुनने को मिलती है तो क्‍या दिमाग खराब नहीं होगा ? 





2013/3/9 ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com>

PRAVEEN TRIVEDI "प्रवीण त्रिवेदी"

unread,
Mar 8, 2013, 9:57:43 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
मुझे लगता है कि मूल थ्रेड से काफी अलग यह चर्चा हो चुकी है। कुछ हम जैसे परदे के पीछे के पढने वालों के ऊपर भी रहम किया जाना चाहिए
एक कदम आगे बढ़कर अपनी गलती को स्वीकारने की प्रवत्ति में आयी कमी से ऐसे हाल हो रहे हैं शायद? 
जो भी हो ..... कुछ नयी चर्चा चालू हो तो ..... इस मुद्दे पर राम राम तमाम हो :)

ashish Maharishi

unread,
Mar 8, 2013, 10:14:34 PM3/8/13
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प्रवीण भाई, सहमत हूं। 


Regards,

 

Ashish Maharishi
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2013/3/9 PRAVEEN TRIVEDI "प्रवीण त्रिवेदी" <praveent...@gmail.com>
मुझे लगता है कि मूल थ्रेड से काफी अलग यह चर्चा हो चुकी है। कुछ हम जैसे परदे के पीछे के पढने वालों के ऊपर भी रहम किया जाना चाहिए
एक कदम आगे बढ़कर अपनी गलती को स्वीकारने की प्रवत्ति में आयी कमी से ऐसे हाल हो रहे हैं शायद? 
जो भी हो ..... कुछ नयी चर्चा चालू हो तो ..... इस मुद्दे पर राम राम तमाम हो :)

--

ई-स्वामी

unread,
Mar 8, 2013, 10:15:43 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित,
जैसे कुत्तों को मुफ्त का घी हजम नहीं होता वैसे ही हिन्दी चिट्ठाकारो को नारद और ब्लोगवाणी जैसी मुफ्त की सुविधाये हजम ना होनी थी ना हुई। अलबत्ता जिन्होंने वो काम किए गरिए गए और आज तक वही  हो रहा है। आखिर अपने यहाँ कोइ नेकी बिना दण्डित हुए नहीं रहती - कलयुग है. हाँ उसके बाद के जो काम जिनका जिक्र हिन्दीपट्टि में नहीं बढ़िया चल रहे हैं।
वैसे बाते तो  मैंने सारी ही मार्के की कही हैं आपकी राय अलग हो सकती है। कहें तो प्रीति को ट्वीट कर उच्चरण पुछ्वा लू?

वैसे  "अबे" का प्रयोग सोच-समझ कर ही किया है और सारी प्रतिक्रियाएं बिलकुल उम्मीद के हिसाब से ही आ रही हैं।
[टोर और डीप वैब पे गूगल भी कर ही ली होगी .. देखें सु-सु-प्रसिद्द हिन्दी समाचार पत्रों में इस पर २० पेज का स्लाईड कब आता है  .. चाहता हूँ लोग इस बारे में जाने ;-) ]

ई-स्वामी

2013/3/8 ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com>

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 8, 2013, 10:19:12 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
प्रिय अजित जी,
यह महज संयोग है कि मेरी प्रतिक्रिया आपके तुरंत बाद आई। मैं लक्ष्य उन लोगों को कर रहा था जिनका इस चर्चा कई बार उल्लेख हो चुका है. शिष्टता की मर्यादा के बाहर के कुछ शब्दों का प्रतिक्रिया स्वरुप प्रयोग भी मैं उचित नहीं मानता। यह कौन कर रहे हैं, ज़ाहिर है. उनको टोकना भी उचित था. अब जो स्थिति बनी है, वह हमारे सामने है. इसके लिए जो ज़िम्मेदार हैं, वे तर्क देकर अपने को बरी मान लेंगे। जो नुकसान उन्होंने किया है, उसकी भरपाई होगी नहीं। इस मंच पर एक और चर्चा में गलत न होने पर भी आपने गलती के लिए माफ़ी की बात कही, तभी मुझे लगा था कि मौन रहने वालों को बोलना चाहिए। मैंने उस चर्चा को बाद में देखा. बोलने के लिए अवसर हो और न बोलने से बात बिगड़ती हो तो भी मौन रहना अनुचित है। शिष्टता की रक्षा के लिए भी कभी-कभी बोलना ज़रूरी होता है. भाषा से व्यक्ति के संस्कार झलकते हैं. इस मंच पर हम स्वयं को अपने सही और संस्कारित रूप में ही पेश करें, यह सर्वाधिक हमारे अपने हित में है.   

2013/3/9 ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com>

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 8, 2013, 10:47:19 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय स्वामी जी,
क्या आपको समझने में लोग अब भी गलती कर सकते हैं? आपको स्वयं को इतना अधिक स्पष्ट करना ज़रूरी क्यों लग रहा है? आपकी बातें (अगर भाषा और तेवर को छोड़ दें) एक अलग मानसिक स्तर प्रकट करती हैं। क्या आप निरंतर उसी का आभास देना गलत मानते हैं? इस मंच को बिखरने न देने की ज़िम्मेदारी हम सब की है. आपकी भी। ज्ञान के साथ अहंकार और अशिष्टता का कोई मेल नहीं होना चाहिये। पता नहीं आपको यह सब कहने का हक़ मुझे आप देंगे या नहीं, परन्तु जो स्थिति बन गयी है, उसमें पूरी विनम्रता और आपके प्रति आदर के साथ यह निवेदन करना मुझे बहुत ज़रूरी लगा. 
सादर    

2013/3/9 Sheo S. Jaiswal <jais...@gmail.com>स्वामी 

Vinod Sharma

unread,
Mar 8, 2013, 10:49:24 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
मुझे लगता है कि इस चर्चा को विराम देना ही उचित होगा। एक विनम्र निवेदन यह है कि नाम व्यक्ति की नितांत निजी संपत्ति होता है। हिंदी मे तो संभव नहीं हो पाता, लेकिन लोग अनेक कारणों से अपने अंग्रेजी नामों की वर्तनी लीक से हटकर रख लेते हैं। कहीं ज्योतिष का दखल होता है कहीं अंक-ज्योतिष का। अत:बनावटी नाम पर चर्चा ही अर्थहीन है, क्योंकि वह शब्द किसी शब्दकोश में है ही नहीं, उसे तो किसी विशेष प्रयोजन से गढ़ा गया है। अंग्रेजी में वर्तनी पर न जाकर केवल हिंदी शब्दों तक ही सीमित रहें तो चर्चा भी सार्थक होगी। उस शब्द की उत्पत्ति एवं विकास यात्रा का पूर्ण इतिहास भी ढूंढा जा सकेगा। दूसरी बात, प्राय: विद्वत्ता के साथ अहं या स्वाभिमान? का साथ सामान्य बात है। अब स्वाभिमान और अहं के बीत की विभेदक दीवार इतनी महीन है कि सीमावर्ती मामलों में इनमें अंतर करना कठिन है। व्यक्ति के स्वभाव पर भी निर्भर करता है। कई लोग जीवनपर्यंत अपने को बदल नहीं पाते, इससे उस व्यक्ति और समाज दोनों को ही नुकसान होता है। इसका सब से बड़ा उदाहरण आचार्य किशोरीदास बाजपेयी का है। अपने अक्खड़ स्वभाव के लिए वे मशहूर थे। जब एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा उनको सम्मानित किया जाना था, उनका नाम पुकारे जाने पर वे अपनी कुर्सी से हिले तक नहीं। आयोजकों ने काफी मिन्नत की, लेकिन उन्होंने कहा कि सम्मान मेरा किया जाना है, तो प्रधानमंत्री को मेरे पास आना चाहिए, मैं उनके पास क्यों जाऊँ। अंतत: प्रधानमंत्री को उनके पास जाकर ही सम्मानित करना पड़ा। मुझे नहीं पता यह दृष्टांत प्रासंगिक है या नहीं और फिर आचार्यजी की विद्वत्ता निर्विवाद थी, अतुल्य थी, इसलिए लोगों ने उनके अक्खड़ स्वभाव को स्वीकार कर लिया था।
किंतु आज स्थिति वह नहीं है। आप देखेंगे कि एक 5 वर्ष का बच्चा भी अपना स्वाभिमान रखता है। आप उस बच्चे को जरा भी जोर से या अबे-तबे कर के बोलिए और फिर उसकी प्रतिक्रिया
देखिए। तात्पर्य यही है कि यह सार्वजनिक मंच है, यहाँ सभी इस समूह के सदस्य हैं और सबका अपना-अपना स्वाभिमान है, जिसके वे हकदार हैं। 
चर्चा में प्रयुक्त भाषा मर्यादित, शालीन और किसी व्यक्तिगत आक्षेप के बिना हो तो सदस्यों के बीच सौहार्द का वातावरण बना रहेगा। 
बात किसी को अप्रिय लगे तो क्षमा याचना सहित,
सादर,
विनोद शर्मा


2013/3/9 ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com>



--
bestregards.gif
विनोद शर्मा

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 8, 2013, 10:58:01 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
विनोद जी ने बहुत सही कहा है. 

2013/3/9 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>



--
Dr. S. S. Jaiswal

Vinod Sharma

unread,
Mar 8, 2013, 10:59:06 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय अभय भाई,
मैं जायसवालजी के विचार से पूर्णत: सहमत हूँ। इसके लिए मेरा एक सुझाव है- यदि आप सहमत हों तो इसे तुरंत लागू कर दें। अभी-अभी एक ‘विद्वान’ सदस्य की जो पोस्ट आई है उसमें नितांत अस्वीकार्य, अमर्यादित, गाली जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। अभय भाई से निवेदन है कि इस प्रकार की निम्नकोटि की, गाली-गलौज वाली अशिष्ट भाषा वाले पोस्ट को तत्काल इस मंच से हटा दिया जाए। एक बार उस सदस्य को चेतावनी दी जाए और यदि उसके बाद भी उस सदस्य का आचरण उसी प्रकार का रहता है तो उसकी सदस्यता निलंबित/रद्द करदी जाए। यह मंच हिंदी-सेवकों का, सभ्य और शिष्ट लोगों का है। गली-मोहल्ले की गाली-गलौज के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं होना चाहिए।  
सादर,
विनोद शर्मा 

2013/3/9 Sheo S. Jaiswal <jais...@gmail.com>



--

ashish Maharishi

unread,
Mar 8, 2013, 11:06:32 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
पहले ई स्‍वामी ने मुझे लौंडा और अबे कहा और अब वह कह रहे हैं कि जैसे कुत्तों को मुफ्त का घी हजम नहीं होता वैसे ही हिन्दी चिट्ठाकारो को नारद और ब्लोगवाणी जैसी मुफ्त की सुविधाये हजम ना होनी थी ना हुई। 

मंच के माननीय सदस्‍य बताएं क्‍या यह सही है ? यदि मैंने मर्यादा को साइड में रखकर कुछ बोला है तो मैं क्षमा मांगता हूं। लेकिन क्‍या ई स्‍वामी की भाषा सही है ?





2013/3/9 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Mar 8, 2013, 11:21:31 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com, abha...@gmail.com
अभय भाई कृपया इस पोस्ट को इस कड़ी से निकाल दें।
सादर,
विनोद सर्मा 

2013/3/9 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
अजित,



--

संजय | sanjay

unread,
Mar 8, 2013, 11:48:55 PM3/8/13
to shabdc...@googlegroups.com
कोई कहता है कि यहाँ सब ज्ञानी है तो उसे यह कहने का अधिकार नहीं है क्योंकि समूह में मैं एक अल्पमति भी सदस्य हूँ.

नारद-दल को अहंकारी न कहें. मैं भी सदस्य था और विभिन्न विचारों वाले लोग मिल कर अच्छी खासी मेहनत करते थे, सब सही था जब तक कि विशेष विचार रखने वाले क्रांतिकारियों का पदार्पण नहीं हुआ.  आदर्शवादियों द्वारा मुझे गंदा नैपकिन तक कहा गया. यह हमारी सफलता थी कि आज भी नारद को याद किया जाता है. खूशी होती है.

नाम के संदर्भ में एक सच्चा उदाहरण देता हूँ शायद प्रीति और प्रिटी से सम्बन्धित लगे भी.

मेरे एक परिवारीक बंगाली मित्र है, उनकी माताजी मुझे संजोय कहती है जबकि मैं देवनागरी, गुजराती, बंगाली व रोमन लिपि में 'संजय' ही लिखता हूँ. दुसरी ओर एक बंगाली संजय है जो बंगाली लिपि में संजय लिखते है मगर खुद को  संजोय कहते है और रोमन व देवनागरी में संजोय लिखते है.

मुझे लगता है फिल्मी नायिका खुद को 'प्रिटी' कहती है अतः यही लिखा जाना चाहिए. हाँ भारतीय नाम 'प्रिति' जरूर है.

2013/3/8 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
बहुमत को संभालिए अब।
लौडों वाली भाषा पूरब ने झिलवाई ।  अबै तुबै के नगाड़े पच्छिम से आने ही थे।

2013/3/8 eg <girij...@gmail.com>
गाम्भीर्य का अभाव 


2013/3/8 e Swami <esw...@gmail.com>
अबै हम जब हियां हैं त गियानी हैं ही है लेकिन सवाल का २ सौर्स से जबाब दिये चैन ना मिल्लीआ? सीधा छौरी से ट्वीट कर बतावै लव लैटर किस नाम से भैज्जूँ! हद्द है बाई गाट। 

Sent from my iPhone

On Mar 6, 2013, at 7:28 PM, ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com> wrote:


ई स्‍वामी जी धन्‍यवाद। 

पहली बात, हम विकी को विश्‍वसनीय नहीं मानते हैं। दूसरी बात, शब्‍द चर्चा का थीम बताने के लिए धन्‍यवाद। 

यदि जवाब पता है तो बताएं, वरना यहां सभी ज्ञानी हैं। व्‍यक्तिगत मत लीजिए। 


Regards,

 

Ashish Maharishi
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On Thu, Mar 7, 2013 at 8:39 AM, anil manchanda <ams...@gmail.com> wrote:
preeti ho ya pretty
parantu JINTA nahin
wof ZINTA hain ji.


On Wednesday, 6 March 2013 09:28:01 UTC+5:30, ashish maharishi wrote:
मदद कीजिए

प्रीति जिंटा होना चाहिए या फिर प्रिटी जिंटा  ? 

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छवि ब्रांड कंसलटींग
ए-511, स्मिता टावर, गुरूकुल रोड़,
मेमनगर , अहमदाबाद, गुजरात. 


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ashish Maharishi

unread,
Mar 8, 2013, 11:55:38 PM3/8/13
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संजय जी, 


हमनें प्रिटी ही लिखना तय किया है। 



Regards,

 

Ashish Maharishi
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2013/3/9 संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com>
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संजय | sanjay

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Mar 8, 2013, 11:58:36 PM3/8/13
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शब्द चर्चा सार्थक हुई :) सदस्यों को बधाई.

2013/3/9 ashish Maharishi <ashish.m...@gmail.com>
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anil manchanda

unread,
Mar 9, 2013, 3:31:02 AM3/9/13
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ashish ji,

सठियाने की उम्र par thoda prakash daaliye!

anil manchanda

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 9, 2013, 3:42:07 AM3/9/13
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"बोलिबो न सीखो, सब सीखो गयो धूरि में"

स्वामीजी,

मेरा संदेश स्पष्ट था। उसकी प्रतिक्रिया भी यही अपेक्षित थी- दुखती-रग, नारद-वीणा, अनर्गल-प्रलाप। नारद-वारद कुछ नहीं था। आप जैसे कुछ लोगों के दंभ ने उसे उठाकर फेंक दिया गया है कूड़ेदान में। नारदियों में कुछ लोग मनुष्य भी थे,  वे आज भी हैं।
हमारे अपने इस छोटे से मंच पर भी हालिया प्रसंग में कुछ लोगों के असली चेहरे सामने लाना मक़सद था। वो कामयाब रहा। सुना है कि आप मालवी हो तो
टोऱ्यागीरी आपको मुबारक। डीप ब्लॉगिंग के लिए मैने कोई सर्च वर्च नहीं की। समय कहाँ है मित्र। हो भी तो तकनीकी अक्षमता है।
सो मज़े के लिए भी और मुफ्तिया ज्ञान के लिए भी ( जिसे बाद में झाड़ा जा सके और खुद के जुक़ाम के चलते नज़ला किसी पर गिरे तो ऐतराज करने वाले समूह को कभी अबे, कुत्ता या लौडा कहा जाए) ऐसी चीज़ों पर लार नहीं टपकती। एक स्थायी ऑफ़र तो आपकी तरफ़ से भी है ही अपने पास- हिन्दिनी वाला।

मज़े करो मित्र, कहीं भी विचरण करो, कही भी खेलो खाओ। बस, भाषा का संस्कार बना रहे। आभासी दुनिया में रहते हुए इसे कायम रखना ज्यादा ज़रूरी है। भाषा मंच पर तो अत्यावश्यक है। मगर आप तो चेतावनी पर उतारू हैं कि फिर ऐसा करेंगे अगर...यानी किसी ने असहमति जताई। यहाँ सब ज्ञानी है जैसे सामाजिक चरित्र की बात करने पर आप लबादा उतार कर अपनी असली अबे और कुत्तों वाली भाषा पर आ जाते हैं। अब सदस्यों को देखना है कि इस मंच पर वे आपको भविष्य में किस रूप में देखना चाहते हैं। आपने तो ईमानदारी से बता ही दिया है। मैं इस बात का सम्मान करता हूँ।
शुभेच्छु
अजित






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संजय | sanjay

unread,
Mar 9, 2013, 3:53:02 AM3/9/13
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अगर ई-स्वामी शुरू से ही शब्दचर्चा पर थे तो उनके जैसे लोगों के होने के बाद भी अब तक यह मंच बचा हुआ कैसे रहा? अगर अब तक सर-फुटोवल नहीं हुई तो अब क्यों हो रही है?

मस्त मंच है. यहाँ शब्द ब्रह्म है और हम उसके उपासक. यहाँ यही धर्म है और यही विचारधारा. 

2013/3/9 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
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ePandit | ई-पण्डित

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Mar 26, 2013, 4:47:51 AM3/26/13
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मित्रों, आज प्रसंगवश यह सूत्र फिर याद आया।

मेरी पत्नी जी का नाम प्रीति है लेकिन प्रमाण पत्रों में अंग्रेजी वर्तनी Preety लिखी है। शायद स्कूल के शुरुआती समय में किसी अध्यापक ने यह वर्तनी लिख दी होगी। ससुर जी दिवंगत थे, सासू जी निरक्षर थी, किसी ने ध्यान नहीं दिया तो साल-दर-साल यही चलती रही, बाद में इसे ढोना मजबूरी बन गया।

आज पत्नी जी का आधार कार्ड के लिये फार्म भरने लगा तो फिर द्वन्द में पड़ा कि चल रहा Preety लिखूँ या सही Preeti लिखूँ। फार्म में विकल्प दिया है कि थोड़ा संशोधन चल सकता है।

अब अंग्रेजी में लिखे इस Preety को भी कोई प्रिटी जैसा कुछ पढ़ सकता है तो सम्भावित है प्रीति/प्रिटी जिंटा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ हो। :)

8 मार्च 2013 8:14 pm को, Prashant Dhyani <dhyani....@gmail.com> ने लिखा:
बेंजवाल जी नमस्कार,
आपका कहना बिल्कुल सही है। मैंने प्रीति जिंटा के एक साक्षात्कार में पढा था कि उनका बचपन में नाम प्रीति था लेकिन बाद में इसे अंग्रेजी का प्रिटि कर दिया गया। जिसका हिंदी अर्थ खूबसूरत है। इसलिए अब ये हिंदी का प्रीति न होकर अंग्रेजी का प्रिटि है। अब इसे हिंदी में कैसे लिखा जाए, ये तो आप लोग ही जानें
धन्यवाद
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