मीरा का कृष्ण के लिये 'गिरिधर नागर' प्रयोग मुझे असहज करता रहा है। गोवर्धन धारण किया तो वे गाँव में थे फिर नागर क्यों?
कृष्ण के लिये 'नट नागर' शब्द का भी प्रयोग होता है। नट से नागर का क्या सम्बन्ध है? कहीं ग्रामीण जन शहरी जन के छ्ल छ्द्म को देख उन्हें नाटकी तो नहीं मानते थे? कृष्ण के लिये क्यों प्रयुक्त होता है नटनागर? छलिया थे इसलिये?
'नट' को 'नृत्य' के अर्थ में पहले प्रयोग किया जाता था, मन्दिरों के नृत्यमंडप नटमंडप भी कहलाते थे। शायद उन मंडपों में नृत्य के अलावा नाटक भी खेले जाते रहे होंगे। आधुनिक काल में 'नृत्य नाटिका' की भी अवधारणा है। उलझ सा गया हूँ।
सुधी जन प्रकाश डालेंगे क्या?