'अठोंचा-नवोंचा-दहोंचा' बनाम 'विकट पहाड़ा'

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narayan prasad

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Aug 6, 2013, 5:51:53 AM8/6/13
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'धोंचा-पोंचा-खोंचा' पर पहले चर्चा हो चुकी है -

हाल में मुझे पहाड़े की एक बहुत पुरानी पुस्तक में 'विकट पहाड़ा' मिला जिसमें 1.5 x 1.5 से 1.5 x 10.5 तक ... 4.5 x 1 से 4.5 x 10.5 तक का पहाड़ा है । सिवाय एक (1.5 x 1.5 = 2.25) के पहले मैंने कुछ अधिक सुना नहीं । यहाँ सबसे बड़ी समस्या है कि इसे पढ़ा कैसे जाय । प्रिंसेप ने केवल सतोंचा (7.5) तक का ही उल्लेख किया है । परन्तु यहाँ तो 8.5, 9.5 और 10.5 भी पहाड़ा में आते हैं । फिर इन संख्याओं का भी नामकरण होना चाहिए । मैंने अनुरूपता (analogy) के आधार पर इन्हें क्रमशः अठोंचा, नवोंचा, दहोंचा लिखा है । उपर्युक्त पहाड़े को परिवर्द्धित करके 10.5 x 1 से 10.5 x 10.5 तक को सम्मिलित किया है । देखें - विकट पहाड़ा
इस पर आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा है ।
--- नारायण प्रसाद

दिनेशराय द्विवेदी

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Aug 6, 2013, 6:07:59 AM8/6/13
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पहाड़े तो कितने ही बनाए जा सकते हैं और उन का नामकरण भी किया जा सकता है। लेकिन इस केलकुलेटर और कम्यूटर के जमाने में उन की उपयोगिता क्या रह गई है?


2013/8/6 narayan prasad <hin...@gmail.com>

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दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
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अजित वडनेरकर

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Aug 6, 2013, 6:55:13 AM8/6/13
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बहुत बढ़िया नारायणजी,
आपकी मेहनत भी विकट है...
धन्यवाद एक पारम्परिक चीज से परिचित कराने के लिए।


2013/8/6 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>



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अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
वाराणसी 08392946250


  

narayan prasad

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Aug 7, 2013, 12:49:29 AM8/7/13
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<<लेकिन इस केलकुलेटर और कम्यूटर के जमाने में उन की उपयोगिता क्या रह गई है?>>

पहाड़े की जरूरत व्यावहारिक जीवन में पग-पग पर पड़ती है और इसकी कीमत वे लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं जिन्होंने अधिक से अधिक पहाड़ा सीखा है, जैसे - 40 तक का पहाड़ा, सवैया, डेउढ़ा, अढ़इया, गरहाँ (11 x 11 से 11 x 20 ---> 20 x 11 से 20 x 20 तक) आदि । पहाड़ा का अच्छा ज्ञान हो तो गणित का काम भी बहुत कुछ आसान हो जाता है और व्यावहारिक कार्यों के लिए अकसर पेपर-पेंसिल या कलकुलेटर-पीसी आदि की जरूरत नहीं पड़ती ।

गाँव के लोग साधारणतः बिना पेपर-पेंसिल के बहुत कुछ हिसाब जोड़ लेते हैं जो आजकल के अंग्रेजी माध्यम में केवल 10 तक के पहाड़े रटे बच्चों से यह सब बिलकुल संभव नहीं ।

बचपन की एक घटना मुझे याद आती है । खेत में एक लगभग अनपढ़ आदमी अपने आलू के खेत में पैदा हुए (एक पैकेट में पचास किलो के हिसाब से) कुल ग्यारह पैकेट आलू को 'मन' में परिवर्तित करने के लिए बोला - "एगारऽ से पुन चौदऽ" (अर्थात् 11 x 1.25 = 13.75) अर्थात् पौने चौदह मन आलू हुआ । उस वक्त मुझे सवैया सीखने के लिए बहुत उत्सुकता हुई और पाठशाला पर बच्चों को सवैया का पाठ करने के लिए निवेदन किया । ऐसे करके मैंने सवैया सीखा । उसी तरह गरहाँ भी ।

पुस्तकेषु च या विद्या, परहस्तेषु यद्धनम् ।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥


--- नारायण प्रसाद

2013/8/6 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

दिनेशराय द्विवेदी

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Aug 7, 2013, 1:02:56 AM8/7/13
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नारायण जी,
मैं आप से सहमत हूँ। चालीस तक और पव्वा, अद्धा, पौणा, सवाया, डेढ़ा, ... हूँठा (3.5) तक के पहाड़े मैं ने भी याद किए हैं। उन का उपयोग भी हुआ। लेकिन बाद में ये सब उपयोग में न आने के कारण उस का एक बड़ा हिस्सा विस्मृत भी कर गया हूँ। इन पहाड़ों को याद करने और लगातार याद रखने में कम श्रम नहीं होता। आज कल पढ़ाई में अनेक नए विषय जुड़ गए हैं। वैसी स्थिति में जरूरत के अनुसार पहाड़े याद कर लेना पर्याप्त है। मेरी समझ में बीस तक पहाड़े तथा पव्वा, अद्धा, पौणा, सवाया और ड्योढ़ा व ढैया तक के पहाड़े पर्याप्त हैं। इस से आगे के पहाड़े याद करना निर्रथक बोझ लगता है। हाँ लाख दो लाख की आबादी मे एक दो व्यक्ति इस तरह की क्षमता का उपयोग कर सकते हैं।

2013/8/7 narayan prasad <hin...@gmail.com>

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narayan prasad

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Aug 7, 2013, 2:34:01 AM8/7/13
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<<चालीस तक और पव्वा, अद्धा, पौणा, सवाया, डेढ़ा, ... हूँठा (3.5) तक के पहाड़े मैं ने भी याद किए हैं।>>

तब तो इस मामले में आप मेरी अपेक्षा कहीं बढ़-चढ़कर हैं । मैं सवैया के ऊपर गया ही नहीं था । अगर हो सके तो पौणा, डेढ़ा, अढ़ैया और हूँठा का पाठ कैसे करते हैं यह अपनी मातृभाषा में लिखकर मुझे व्यक्तिगत मेल करने की कृपा करें । पव्वा और अद्धा संबंधित मौखिक गणना करना अपेक्षाकृत बहुत आसान है । इसलिए इन दोनों की आवश्यकता नहीं ।
सादर

नारायण प्रसाद
2013/8/7 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

पीयूष ओझा

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Aug 8, 2013, 6:14:36 PM8/8/13
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"पहाड़े तो कितने ही बनाए जा सकते हैं और उन का नामकरण भी किया जा सकता है। लेकिन इस केलकुलेटर और कम्यूटर के जमाने में उन की उपयोगिता क्या रह गई है?"

जैसे भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के लिए शब्दों से मैत्री करनी पड़ती है, वैसे ही गणित की गहरी समझ हासिल करने के लिए अंकों से मैत्री करनी पड़ती है। मन ही मन गुणा-भाग करने की सामर्थ्य इसमें सहायक होती है।

मंगलवार, 6 अगस्त 2013 10:51:53 am UTC+1 को, Narayan Prasad ने लिखा:

पीयूष ओझा

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Aug 8, 2013, 6:33:30 PM8/8/13
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इस विषय पर डॉ. मधुसूदन झवेरी की टिप्पणी:

पीयुष जी नितांत सही बात कही आपने।
और एक लाभ मैने देखा।
(१) पहाडे कण्ठस्थ होने के कारण, भरतीय छात्र भी पी. एच. डी. की क्वालिफ़ाईंग में सशक्त स्पर्धा कर सकता है। वैयक्तिक अनुभव से जाना।
(२) और पढाते समय भी अनुभव किया है।
(३)इस परम्परा को अबाधित रखना चाहिए।
मेरी टिप्पणी शब्दचर्चा पर कुछ कारणवश पहुंच नहीं रही है।
अनुरोध: आप कृपया-अग्रेषित कीजिए।


डॉ. मधुसूदन झवेरी


मंगलवार, 6 अगस्त 2013 10:51:53 am UTC+1 को, Narayan Prasad ने लिखा:
'धोंचा-पोंचा-खोंचा' पर पहले चर्चा हो चुकी है -

दिनेशराय द्विवेदी

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Aug 8, 2013, 10:44:58 PM8/8/13
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पाव का पहाड़ा
एक पव्वा पव्वा
दो पव्वा आधा
तीन पव्वा पौण
चार पव्वा एक
पाँच पव्वा सवाया
छे पव्वा डेढ़
सात पव्वा पौने दो
आठ पव्वा दो
नौ पव्वा सवा दो
दस पव्वा ढाई।।


2013/8/9 पीयूष ओझा <piyus...@gmail.com>

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दिनेशराय द्विवेदी

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Aug 8, 2013, 11:01:26 PM8/8/13
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पौणा का पहाड़ा
एक पौणा पौणा
दो पौणा डेढ़
तीन पौणा सवा दो
चार पौण का तीन
पाँच पौणा पौणी चार
छह पौणा साढ़े चार
सात पौणा सवा पाँच
आठ पौण का छै
नौ पौणा पौणी सात
दस पौणा साढ़ी सात।।

2013/8/9 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
Aug 9, 2013, 2:40:54 AM8/9/13
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धन्यवाद द्विवेदी जी ।

पौना के पहाड़े से 75 का पहाड़ा भी हो जाता है, केवल दशमलव चिह्न का अन्तर होता है । सवैया से 125 का पहाड़ा । उसी तरह हूँठा, धोंचा, खोंचा, सतोंचा, ... दहोंचा से न केवल भिन्न (fraction) का, बल्कि क्रमशः 35, 45, 65, 75, ..., 105 का पहाड़ा भी ।

व्यावहारिक रूप से पौना और सवैया का अधिक महत्त्व है ।

--- नारायण प्रसाद


दिनेशराय द्विवेदी

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Aug 9, 2013, 3:04:27 AM8/9/13
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बाकी भी लिख भेजता हूँ। थोड़ी प्रतीक्षा करें।


2013/8/9 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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अजित वडनेरकर

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Aug 10, 2013, 10:39:39 AM8/10/13
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वाह द्विवेदी जी
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