<<लेकिन इस केलकुलेटर और कम्यूटर के जमाने में उन की उपयोगिता क्या रह गई है?>>
पहाड़े की जरूरत व्यावहारिक जीवन में पग-पग पर पड़ती है और इसकी कीमत वे लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं जिन्होंने अधिक से अधिक पहाड़ा सीखा है, जैसे - 40 तक का पहाड़ा, सवैया, डेउढ़ा, अढ़इया, गरहाँ (11 x 11 से 11 x 20 ---> 20 x 11 से 20 x 20 तक) आदि । पहाड़ा का अच्छा ज्ञान हो तो गणित का काम भी बहुत कुछ आसान हो जाता है और व्यावहारिक कार्यों के लिए अकसर पेपर-पेंसिल या कलकुलेटर-पीसी आदि की जरूरत नहीं पड़ती ।
गाँव के लोग साधारणतः बिना पेपर-पेंसिल के बहुत कुछ हिसाब जोड़ लेते हैं जो आजकल के अंग्रेजी माध्यम में केवल 10 तक के पहाड़े रटे बच्चों से यह सब बिलकुल संभव नहीं ।
बचपन की एक घटना मुझे याद आती है । खेत में एक लगभग अनपढ़ आदमी अपने आलू के खेत में पैदा हुए (एक पैकेट में पचास किलो के हिसाब से) कुल ग्यारह पैकेट आलू को 'मन' में परिवर्तित करने के लिए बोला - "एगारऽ से पुन चौदऽ" (अर्थात् 11 x 1.25 = 13.75) अर्थात् पौने चौदह मन आलू हुआ । उस वक्त मुझे सवैया सीखने के लिए बहुत उत्सुकता हुई और पाठशाला पर बच्चों को सवैया का पाठ करने के लिए निवेदन किया । ऐसे करके मैंने सवैया सीखा । उसी तरह गरहाँ भी ।
पुस्तकेषु च या विद्या, परहस्तेषु यद्धनम् ।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥
--- नारायण प्रसाद