बूर्ज़ुआ

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farid khan

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Jul 6, 2010, 3:52:26 PM7/6/10
to शब्द चर्चा
बारह पन्द्रह साल हो गये होंगे, ‘बूर्ज़ुआ’ शब्द सुनने को कान तरस गये।

मेरा पूरा बचपन ही वामपंथियों के साथ गुज़रा है।
घर के अन्दर भी और घर के बाहर भी।
माँ बहन की गाली मुँह से न निकालने वालें के लिए सबसे प्रिय और सहज गाली
थी, ‘बूर्ज़ुआ’।

जैसे ही किसी ने सत्ता पक्ष का सर्मथन किया, “साला बूर्ज़ुआ है”।
जैसे ही कोई जींस और टी-शर्ट पहनकर सामने से गुज़रा, “साला बूर्ज़ुआ है”।
जैसे ही किसी ने औद्योगिकरण की बात की, “साला बूर्ज़ुआ है”।

यहाँ तक कि अगर किसी ने दार्जिलिंग टी, वह भी बिना दूध और बिना निम्बू के
बना कर पी लिया तो वह भी ‘बूर्ज़ुआ’ कहलाता था।

खादी कांग्रेस का प्रतीक था। जींस अमेरिकी था। वे दोनों अलग अलग
‘बूर्ज़ुआजी’ थे। पर दोनों का कम्बीनेशन यानी खादी का कुर्ता और जींस
पहनने वाले वामपंथी कहलाते थे।

हिन्दी भाषी वामपंथियों के सामने अगर कोई अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ा, अपनी
धौंस जमा कर निकल जाता, तो इनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी, क्योंकि
इनकी समझ में कुछ आता नहीं था। उसके जाने के बाद ये कहते थे, “साला कहता
तो सही है, लेकिन है साला बूर्ज़ुआ”।

मैं किसी को आहत नहीं करना चाहता, केवल पुरानी बातें याद कर रहा हूँ। एक
फ़्रांसीसी नाटककार ‘मौलियर’ ने मध्ययुग में एक नाटक लिखा था “बूर्ज़ुआ
जेंटलमैन”।

मुझे केवल इतना ही पता है कि यह फ़्रांसीसी शब्द है। पर इसका अर्थ नहीं
पता। एक ज़माने में हिन्दी में इसका बहुत इस्तेमाल हुआ। तो क्या हम इसे
हिन्दी का शब्द मान सकते हैं ?
अगर संभव हो तो अर्थ भी बताएँ।

अजित वडनेरकर

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Jul 6, 2010, 4:35:52 PM7/6/10
to shabdc...@googlegroups.com
फरीद भाई, इस शब्द के बारे में सफर पर
कुछ माह पहले लिखा था-
बुर्जुआ वर्ग का बुर्ज

2010/7/7 farid khan <kfari...@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Abhay Tiwari

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Jul 6, 2010, 11:06:03 PM7/6/10
to shabdc...@googlegroups.com
बृहस्पति वाले बृह से बरो और बुर्ज होते हुए बुर्ज़ुआ का रिश्ता अजित भाई ने बख़ूबी बताया है। इसका मार्क्सवादी अर्थ कुछ ऐसा है-
 
मार्क्सवादी हलक़ो में इसे गाली की तरह प्रयोग यूं करते हैं क्योंकि मध्यकाल में योरोप या फ़्रांस में तीन प्रमुख सामाजिक वर्ग थे; कुलीन सामन्त, छोटे-मोटे व्यापारी और आम जनता। औद्यौगीकरण के साथ, और फ़्रांसीसी क्रांति के बाद कुलीन सामन्ती वर्ग तो सत्ताहीन कर दिया गया और असली सत्ता इस तथाकथित मध्यवर्ग या बुर्ज़ुआ के हाथ में आ गई क्योंकि वो अपने पैसे की ताक़त से उत्पादन के साधनों पर क़ब्ज़ा कर के पूँजीपति बन बैठा। तो ऐसा ग़ैर-कुलीन वर्ग जिसने अपने शिक्षा और सम्पदा के ज़रिये उत्पादन के साधनों पर क़ब्ज़ा कर लिया वह है बुर्ज़ुआ।
इस के अलावा एक और शब्द है पेटी बुर्ज़ुआ- इसका भी मार्क्सवादी मतलब वही है और इस वर्ग के अरमान भी वही हैं लेकिन औक़ात ज़रा कम है। 

Abha Mishra

unread,
Jul 7, 2010, 12:06:06 AM7/7/10
to shabdc...@googlegroups.com
मित्रों
शब्द चर्चा हो ठीक है लेकिन हर शब्द की हिंदी हो यह जरूरी तो नहीं।
कभी-कभी शब्दों को उनके मूल रूप में स्वीकार कर लेने से हिंदी का हित ही
होगा। बुर्जुआ को स्वीकार कर लिया गया है।
जो पारिभाषिक शब्द हैं उन्हें अपना लेने में ही भला है। यह शब्द पिछले
50- 60 सालों से हिंदी में छप रहा है। अब तो उसे हिंदी ही मानिए।


2010/7/7 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>:

--
aabha
mumbai-67

ravikant

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Jul 7, 2010, 12:44:31 AM7/7/10
to shabdc...@googlegroups.com
मज़ा आ गया! फ़रीद भाई ने क्या तार छेड़ा है। हमसे इतिहास में ये सवाल अक्सर पूछा जाता
था कि फ़्रांसीसी क्रांति का चरित्र बताएँ। और हम पूरे साल या कई साल इस सवाल का
जवाब काफ़ी बारीकी से कातते रहे। पर अजित भाई के चिट्ठे से जो मालूमात हासिल हुए, वे
अन्यत्र दुर्लभ हैं। पेटी बुर्ज़ुआ परे एक वाक़या याद आता है। उसी ज़माने में जब हम बुर्ज़ुआ
क्रांति और पेरिस कम्यून की ज़रूरत और उसकी विफलता को समझ रहे थे, एक साथी अपनी कॉलर
चढ़ा कर हमारे पास आया और बोला, तो, तुम तो हमें बुर्ज़ुआ समझते होगे, जिसके जवाब में एक
निहायत प्रत्युत्पन्नमति साथी ने बड़ी हिकारत से कहा: हँ!‍ बड़े चले हैं बुर्ज़ुआ बनने, तुम पेटी
बुर्ज़ूआ हो, और रहोगे, क्षुद्र और तुच्छ! और हम हँस-हँस के पागल हो गए, जो बाय द वे,
हमारे यहाँ बाकल का एक और, भाषायी दृष्टि से सहज, भावांतर है।

अजित साहब ने 'पुर' = क़िला(वैदिक उदा. पुरंदर=इन्द्र) की चर्चा की है, उसको थोड़ा और
खींचने की संभावना है।

रविकान्त

Abhay Tiwari wrote:
> बृहस्पति वाले बृह से बरो और बुर्ज होते हुए बुर्ज़ुआ का रिश्ता अजित भाई ने बख़ूबी बताया
> है। इसका मार्क्सवादी अर्थ कुछ ऐसा है-
>
> मार्क्सवादी हलक़ो में इसे गाली की तरह प्रयोग यूं करते हैं क्योंकि मध्यकाल में योरोप या
> फ़्रांस में तीन प्रमुख सामाजिक वर्ग थे; कुलीन सामन्त, छोटे-मोटे व्यापारी और आम जनता।
> औद्यौगीकरण के साथ, और फ़्रांसीसी क्रांति के बाद कुलीन सामन्ती वर्ग तो सत्ताहीन कर
> दिया गया और असली सत्ता इस तथाकथित मध्यवर्ग या बुर्ज़ुआ के हाथ में आ गई क्योंकि वो
> अपने पैसे की ताक़त से उत्पादन के साधनों पर क़ब्ज़ा कर के पूँजीपति बन बैठा। तो ऐसा
> ग़ैर-कुलीन वर्ग जिसने अपने शिक्षा और सम्पदा के ज़रिये उत्पादन के साधनों पर क़ब्ज़ा कर
> लिया वह है बुर्ज़ुआ।
> इस के अलावा एक और शब्द है पेटी बुर्ज़ुआ- इसका भी मार्क्सवादी मतलब वही है और इस
> वर्ग के अरमान भी वही हैं लेकिन औक़ात ज़रा कम है।
>
> ----- Original Message -----

> *From:* अजित वडनेरकर <mailto:wadnerk...@gmail.com>
> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>
> *Sent:* Wednesday, July 07, 2010 2:05 AM
> *Subject:* Re: बूर्ज़ुआ


>
> फरीद भाई, इस शब्द के बारे में सफर पर
> कुछ माह पहले लिखा था-

> *बुर्जुआ वर्ग का बुर्ज
> <http://shabdavali.blogspot.com/2010/04/blog-post_21.html>*
>
> 2010/7/7 farid khan <kfari...@gmail.com
> <mailto:kfari...@gmail.com>>

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