संबंधित कड़ी-होनहार भूत और अनहोनी

On 7 नव, 10:09, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> इसी सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण संशोधन छूट गया था। अच्छ में जो छ है वह छत
> अर्थात छाया का प्रतीक है। संस्कृत की छद् धातु में छत, छाया, ढके होने का भाव
> है। मोनियर विलियम्स के कोश के मुताबिक यह अ+च्छ है। इसमें जो च्छ है वह छद्
> से आ रहा है। इस तरह अच्छ का अर्थ हुआ जो ढका हुआ न हो, जो उजागर है, पूरी तरह
> स्पष्ट है, पारदर्शी है, साफ है। इस तरह संवाद होने के बाद अन्त में जब अच्छा
> कहा जाता है तब अभिप्राय यही होता है कि अब सब कुछ स्पष्ट है, कुछ भी छुपा हुआ
> नहीं है।
>
> 2011/11/7 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
>
>
> > अच्छा…हाँ हाँ… <http://shabdavali.blogspot.com/2011/11/blog-post_07.html>
>
> > संबंधित कड़ी-*होनहार भूत* और अनहोनी
> > <http://shabdavali.blogspot.com/2011/10/blog-post.html>[image:
> > hindi-ki-bindi]<http://lh4.ggpht.com/-z1Xv4MPrITU/Tre5DaXHTuI/AAAAAAAAR8k/GcwvOBuqcJ8...>
> > सु बह से शाम तक सामान्य बोलचाल में ऐसे कितने ही शब्द हैं जो क़रीब क़रीब
> > प्रत्येक वार्तालाप या संवाद का ज़रूरी हिस्सा होते हैं।* ‘अच्छा’* और* ‘हाँ’
> > * का शुमार भी इनमें है। प्रायः सम्बोधित किए जाने वाले प्रत्येक वाक्य के
> > बाद सुनने वाले का प्रत्युत्तर या प्रतिक्रिया ‘अच्छा’ या ‘हाँ’ में होती है।
> > अगर कोई किस्सा, प्रसंग या प्रबोधन चल रहा हो तो भी ‘अच्छा’ ही कहा जाता है।
> > इस *‘अच्छा’ / ‘हाँ’* में संतुष्टि का भाव भी रहता है और यह स्वीकार और
> > सम्मति सूचक शब्द भी है। इसके अलावा इसमें सुनाई पड़ने का संकेत भी निहित है
> > जैसे हूँ, ‘हाँ’ करना। निर्देशात्मक, आदेशात्मक सम्बोधन के बाद सुनने वाले
> > पक्ष की ओर से प्रायः स्वीकार सूचक* ‘हाँ’* का प्रयोग सामान्य शिष्टाचार में
> > शामिल है। वाक्यरचना के विशिष्ट रूपों के मद्देनज़र यह क्रिया विशेषण (अव्यय)
> > हैं। किन्हीं वाक्यों में एक साथ ये दोनों अ्व्यय होते हैं जैसे कुछ याद आने
> > का विस्मय और फिर उसकी स्वीकारोक्ति वाले वाक्य जैसे-*अच्छा…हाँ हाँ, याद
> > आया। *
> > *स*बसे पहले *‘हाँ’* की बात। सामान्य वार्तालाप के दौरान अगर इस ‘हाँ’ का
> > इस्तेमाल न किया जाए तो संवाद आगे ही नहीं बढ़ सकता। ‘अच्छा’ से भी ज्यादा इस
> > ‘हाँ’ की अहमियत है। किसी संवाद के दौरान अगर यह *‘हाँ’* सुनाई नहीं पड़े तो
> > समझिए कि बहरा होने का उलाहना अब मिलने ही वाला है। ‘हाँ’ की व्युत्पत्ति
> > संस्कृत के ‘*आम्’* से मानी जाती है और इस अव्यय को विद्वानों ने अलग अलग
> > नाम दिए हैं, मगर मूल भाव एक ही है-स्वीकृति, सहमति, समर्थन आदि का। आम् के
> > मूल में विद्वानों का मानना है कि हिन्दी का ‘हाँ’ अव्यय संस्कृत के आम् से
> > बना है। इसका विकासक्रम यूँ रहा है-*सं.आम् >(पाली) आम > (प्राकृत) अम्ह। *आंचलिक
> > रूपों में ‘म्’ की अनुनासिकता* ‘ह’* में समा गई। फिर ‘अ’ स्वर भी ‘ह’ से
> > जुड़ गया। यह क्रम कुछ यूँ रहा*-(प्राकृत) अम्ह > अहँ > हआँ > ‘हाँ’*।
> > मोनियर विलियम्स और आप्टे कोश के मुताबिक आम् संस्कृत अव्यय है। आप्टे लिखते
> > हैं कि यह विस्मयादि द्योतक अव्यय है और अंगीकरण, स्वीकृति जैसे भावों अर्थात
> > ओह, *‘हाँ’* को अभिव्यक्त करता है। उदय नारायण तिवारी इसे सम्मतिसूचक अव्यय
> > कहते हैं तो वाशि आप्टे, भोलानाथ तिवारी इसे विस्मयबोधक अव्यय मानते हैं। इन
> > तमाम अर्थों में ‘हाँ’ का प्रयोग सिर्फ़ ‘हाँ’ कह कर भी किया जाता है अथवा
> > ‘हाँ’ के साथ वाक्य के जरिए। मिसाल के तौर पर- आपने कुछ खाया? जवाब में सिर्फ़
> > * ‘हाँ’* भी कहा जा सकता है और ‘हाँ’, अभी कुछ देर पहले ही...” भी कहा जा
> > सकता है। विशेष स्थितियों में *‘हाँ’* के प्रयोग से भी वार्तालाप का सिरा
> > पकड़ा जाता है जैसे, ‘हाँ’, बताइये...या फिर, ‘हाँ’, क्या कह रहे थे आप...।
> > *इ*सी तरह दूसरा स्वीकृति सूचक अव्यय है ‘अच्छा’। आप्टे कोश के मुताबिक
> > प्राप्ति के द्योतन वाला यह अव्यय संस्कृत के *‘अच्छ’* से बना है।
> > व्युत्पत्तिमूलक अर्थ देखें तो ‘अच्छ’ में विशुद्ध, निर्मल, उज्ज्वल, पारदर्शी
> > जैसे भाव हैं अर्थात जो कुछ स्वच्छ है, वही ‘अच्छ’ है। अब अव्यय के रूप में
> > सहमतिसूचक या कहे विस्मयादिबोधक के तौर पर ‘अच्छ’ के इन व्युत्पत्तिमूलक भावों
> > की क्या व्याख्या हो सकती है? आमतौर पर सहमति, स्वीकृति या अनुमोदन करते हुए-
> > *‘अच्छा’*, तो ऐसा ही करते हैं,* ‘अच्छा’*, अब और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं
> > है या *‘अच्छा’*, देखते हैं और क्या कर सकते हैं। इन तमाम वाक्यों में यह *
> > ‘अच्छा’* शब्द सिर्फ़ संवाद के उपसंहार की औपचारिकता के लिए नहीं बोला गया
> > है बल्कि इसमें यह निश्चय भी झलक रहा है कि बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है।*‘अच्छा’
> > * में जो पारदर्शिता, निर्मलता या उज्ज्वलता है, अव्यय के रूप में अच्छ में
> > उसका अभिप्राय स्पष्टता से है। यानी संवाद के बाद जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब
> > यह संकेत होता है कि सब कुछ स्पष्ट हो गया है। “अच्छी बात है, चलते हैं” का
> > अर्थ यह नहीं कि कोई बहुत
>
> ...
>
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On 8 नव, 14:54, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> आपने सन्दर्भित पिछली पोस्ट नहीं पढ़ी बलजीत भाई।
> एक बार उसे ज़रूर देख लें। हूँ का रिश्ता उससे ज्यादा है।
> अलबत्ता हूँकार रह गई थी, सो वो बाद में जोड़ देंगे। हूँकार, हूँ ध्वनि के लिए
> ही है।
>
> 2011/11/9 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
On 9 नव, 01:17, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> सही है।
> मुझे लगा कि आप का अभिप्राय उसी *हूँ *से है।
>
> मित्रों, यहाँ बताना ज़रूरी है कि ख्यात चिन्तक डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल के
> आग्रह पर यह आलेख तैयार किया गया। उन्होंने क़रीब एक महिने पहले इन शब्दों के
> बारे में लिखने को कहा था। वक्त की कमी थी, सो दो बार के तकाज़ों के बाद इसे
> सोमवार को लिखा गया। निश्चित ही *थ्री सिक्सटी* की कोशिश हर बार रहती है, मगर
> कई बार कुछ कोण छूट जाते हैं। इस बार भी वैसा ही हुआ है। छूटने में कोई खराबी
> नहीं है, खारिज़ करने में है, क्योंकि तब आप बहस को न्योत रहे होते हैं।
>
> मुझे बहस अच्छी नहीं लगती:)
>
> 2011/11/9 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>