अच्छा…हाँ हाँ…

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अजित वडनेरकर

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Nov 7, 2011, 9:44:06 AM11/7/11
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अच्छा…हाँ हाँ…

संबंधित कड़ी-होनहार भूत और अनहोनी hindi-ki-bindi

सु बह से शाम तक सामान्य बोलचाल में ऐसे कितने ही शब्द हैं जो क़रीब क़रीब प्रत्येक वार्तालाप या संवाद का ज़रूरी हिस्सा होते हैं। ‘अच्छा’ और ‘हाँ’ का शुमार भी इनमें है। प्रायः सम्बोधित किए जाने वाले प्रत्येक वाक्य के बाद सुनने वाले का प्रत्युत्तर या प्रतिक्रिया ‘अच्छा’ या ‘हाँ’ में होती है। अगर कोई किस्सा, प्रसंग या प्रबोधन चल रहा हो तो भी ‘अच्छा’ ही कहा जाता है। इस ‘अच्छा’ / ‘हाँ’ में संतुष्टि का भाव भी रहता है और यह स्वीकार और सम्मति सूचक शब्द भी है। इसके अलावा इसमें सुनाई पड़ने का संकेत भी निहित है जैसे हूँ, ‘हाँ’ करना। निर्देशात्मक, आदेशात्मक सम्बोधन के बाद सुनने वाले पक्ष की ओर से प्रायः स्वीकार सूचक ‘हाँ’ का प्रयोग सामान्य शिष्टाचार में शामिल है। वाक्यरचना के विशिष्ट रूपों के मद्देनज़र यह क्रिया विशेषण (अव्यय) हैं। किन्हीं वाक्यों में एक साथ ये दोनों अ्व्यय होते हैं जैसे कुछ याद आने का विस्मय और फिर उसकी स्वीकारोक्ति वाले वाक्य जैसे-अच्छा…हाँ हाँ, याद आया।
बसे पहले ‘हाँ’ की बात। सामान्य वार्तालाप के दौरान अगर इस ‘हाँ’ का इस्तेमाल न किया जाए तो संवाद आगे ही नहीं बढ़ सकता। ‘अच्छा’ से भी ज्यादा इस ‘हाँ’ की अहमियत है। किसी संवाद के दौरान अगर यह ‘हाँ’ सुनाई नहीं पड़े तो समझिए कि बहरा होने का उलाहना अब मिलने ही वाला है। ‘हाँ’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘आम्’ से मानी जाती है और इस अव्यय को विद्वानों ने अलग अलग नाम दिए हैं, मगर मूल भाव एक ही है-स्वीकृति, सहमति, समर्थन आदि का। आम् के मूल में विद्वानों का मानना है कि हिन्दी का ‘हाँ’ अव्यय संस्कृत के आम् से बना है। इसका विकासक्रम यूँ रहा है-सं.आम् >(पाली) आम > (प्राकृत) अम्ह। आंचलिक रूपों में ‘म्’ की अनुनासिकता ‘ह’ में समा गई। फिर ‘अ’ स्वर भी ‘ह’ से जुड़ गया। यह क्रम कुछ यूँ रहा-(प्राकृत) अम्ह > अहँ > हआँ > ‘हाँ’। मोनियर विलियम्स और आप्टे कोश के मुताबिक आम् संस्कृत अव्यय है। आप्टे लिखते हैं कि यह विस्मयादि द्योतक अव्यय है और अंगीकरण, स्वीकृति जैसे भावों अर्थात ओह, ‘हाँ’ को अभिव्यक्त करता है। उदय नारायण तिवारी इसे सम्मतिसूचक अव्यय कहते हैं तो वाशि आप्टे, भोलानाथ तिवारी इसे विस्मयबोधक अव्यय मानते हैं। इन तमाम अर्थों में ‘हाँ’ का प्रयोग सिर्फ़ ‘हाँ’ कह कर भी किया जाता है अथवा ‘हाँ’ के साथ वाक्य के जरिए। मिसाल के तौर पर- आपने कुछ खाया? जवाब में सिर्फ़ ‘हाँ’ भी कहा जा सकता है और ‘हाँ’, अभी कुछ देर पहले ही...” भी कहा जा सकता है। विशेष स्थितियों में ‘हाँ’ के प्रयोग से भी वार्तालाप का सिरा पकड़ा जाता है जैसे, ‘हाँ’, बताइये...या फिर, ‘हाँ’, क्या कह रहे थे आप...।
सी तरह दूसरा स्वीकृति सूचक अव्यय है ‘अच्छा’। आप्टे कोश के मुताबिक प्राप्ति के द्योतन वाला यह अव्यय संस्कृत के ‘अच्छ’ से बना है। व्युत्पत्तिमूलक अर्थ देखें तो ‘अच्छ’ में विशुद्ध, निर्मल, उज्ज्वल, पारदर्शी जैसे भाव हैं अर्थात जो कुछ स्वच्छ है, वही ‘अच्छ’ है। अब अव्यय के रूप में सहमतिसूचक या कहे विस्मयादिबोधक के तौर पर ‘अच्छ’ के इन व्युत्पत्तिमूलक भावों की क्या व्याख्या हो सकती है? आमतौर पर सहमति, स्वीकृति या अनुमोदन करते हुए- ‘अच्छा’, तो ऐसा ही करते हैं, ‘अच्छा’, अब और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है या ‘अच्छा’, देखते हैं और क्या कर सकते हैं। इन तमाम वाक्यों में यह ‘अच्छा’ शब्द सिर्फ़ संवाद के उपसंहार की औपचारिकता के लिए नहीं बोला गया है बल्कि इसमें यह निश्चय भी झलक रहा है कि बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। ‘अच्छा’ में जो पारदर्शिता, निर्मलता या उज्ज्वलता है, अव्यय के रूप में अच्छ में उसका अभिप्राय स्पष्टता से है। यानी संवाद के बाद जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब यह संकेत होता है कि सब कुछ स्पष्ट हो गया है। “अच्छी बात है, चलते हैं” का अर्थ यह नहीं कि कोई बहुत बढ़िया बात कही गई है और जाने की इजाज़त मांगी जा रही है। इसका अर्थ है- “सब कुछ स्पष्ट है, अब कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। अब वार्तालाप में जो कुछ तय हुआ है उस पर अमल किया जाएगा।” कृपा कुलकर्णी के मराठी कोश में तो ‘अच्छा’ का अर्थ ही अत्यर्थम् या स्वच्छम् बताते हुए स्वचछ्म् की व्युत्पत्ति सु+अच्छम् बताई है। अच्छम् यानी जो शुद्ध है। ज़ाहिर है शुद्धता का बड़ा गुण निर्मलता ही है। निर्मलता में ही स्पष्टता है।
विशेषण के तौर पर तो ‘अच्छा’ का अर्थ रूप, गुण और योग्यता में औरों से बढ़ कर या काबिलेतारीफ़ वाला भाव है जैसे ‘अच्छा’ शहर। शुभ मुहूर्त को ‘अच्छा’ दिन कहा जाता है। यहाँ ‘अच्छा’ में मंगलकारी भाव है। कई बार निर्दोष वस्तु के तौर पर भी ‘अच्छा’ का प्रयोग होता है जैसे ‘अच्छा’ वस्त्र, ‘अच्छा’ खाना। क्रिया विशेषण या अव्यय के रूप में हमेशा ‘अच्छा’ ही प्रयोग होता है, वैसे ‘अच्छा’ का बहुवचन अच्छे होता है जैसे अच्छे बच्चे, अच्छे लोग। व्यंग्य या नकारात्मक भाव के तौर पर भी अच्छे का प्रयोग होता है जैसे, काम बिगाड़ देने वाले के लिए कहा गया जुमला- बहुत अच्छे ! ‘अच्छा’ की अभिव्यक्ति हिन्दी समेत अनेक भाषाओं में होती है। टर्नर कोश के मुताबिक, कश्मीरी में यह ओछू है, सिन्धी में अछो है, तो बांग्ला में आच्च्छा, राजस्थानी में आछो, कुमाऊनी में आछो है। ‘अच्छा’ के इस्तेमाल में ‘ह’ का प्रयोग भी मिलता है जैसे लहँदा और पंजाबी में ‘अच्छा’ (हच्छा) है तो पहल्वी की पश्चिमी शैली या भद्रवाही में हच्च्छो सुनाई पड़ता है।

अजित वडनेरकर

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Nov 7, 2011, 10:09:28 AM11/7/11
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इसी सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण संशोधन छूट गया था। अच्छ में जो छ है वह छत अर्थात छाया का प्रतीक है। संस्कृत की छद् धातु में छत, छाया, ढके होने का भाव है। मोनियर विलियम्स के कोश के मुताबिक यह अ+च्छ है। इसमें जो च्छ है वह छद् से आ रहा है। इस तरह अच्छ का अर्थ हुआ जो ढका हुआ न हो, जो उजागर है, पूरी तरह स्पष्ट है, पारदर्शी है, साफ है। इस तरह संवाद होने के बाद अन्त में जब अच्छा कहा जाता है तब अभिप्राय यही होता है कि अब सब कुछ स्पष्ट है, कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।

2011/11/7 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
मोबाइल-
औरंगाबाद- 07507777230

  


Bodhi Sattva

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Nov 7, 2011, 11:56:13 PM11/7/11
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अवध में आछो-आछो करना एक मुहावरा है। जब कोई किसी का अतिरिक्त आदर सत्कार करता है
जिसमें कुछ चापलूसी भी शामिल हो तो उसे आछो-आछो करना कहते हैं। वाक्य कुछ ऐसे होगा। बहुत आछो-आछो कर रहे थे उस दिन सक्सेना साहब आपकी की....कुछ लोग अच्छाई से आच्छादित रहते हैं और सबकी आछो-आछो करते हैं..
--
Dr. Bodhisatva, mumbai
0-9820212573

अजित वडनेरकर

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Nov 8, 2011, 10:08:38 AM11/8/11
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बहुत बढ़िया बोधि भाई।

आपकी बात से याद आया कि राजस्थानी में भी यह आछो चलता है।
मोरिया आछो रे बोल्यो रे ढळती रात मां

पर यहाँ क्रिया विशेषण रूप ही है।



2011/11/8 Bodhi Sattva <abo...@gmail.com>

Baljit Basi

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Nov 8, 2011, 2:09:20 PM11/8/11
to शब्द चर्चा
थोड़ी हैरानी हुई कि आपने 'हूँ' का उलेख क्यों नहीं किया. पंजाबी में हाँ
और हूँ दोनों चलते हैं लेकिन अलग अलग सन्दर्भों में जैसे 'हाँ, तां मैं
कह रिहा सी' चलेगा 'हूँ, तां मैं कह रिहा सी' नहीं. मुझे और भी हैरानी
हुई कि आपने ऐसे शब्दों के लिए ' हुंगारा ' पद का इस्तेमाल नहीं किया.
मुझे लगता है यह हिन्दी में कम चलता है वह भी शायद पंजाबी के प्रभाव
से . 'हुंगारा' भी हूँ से ही बना है.गारा' 'कार' का रूपांतर लगता है जो
लगातारता का सूचक है. 'हूँ' मुझे संस्कृत ' हूम्' से व्युतप्त हुआ लगता
है. क्या ख्याल है? हूँ-हाँ करना मुहवरा भी होता है, जिस का मतलब किसी
की मांग के प्रति अधिक ध्यान न देना है. एक अस्वीकृति सूचक अव्यय होता है
जो लिखने में कम आता है जैसे 'ऊँहूँ'. दिलचस्प बात है पंजाबी में इसके
उल्ट होता है यानि 'हुंऊँ'. कुछ भी हो, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि
अन्य भाषाओँ जैसे अंग्रेज़ी में भी ऐसे अव्ययों का लगभग ऐसा ही ध्वनि
रूप है. अच्छा के बीर फिर सही.

On 7 नव, 10:09, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> इसी सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण संशोधन छूट गया था। अच्छ में जो छ है वह छत
> अर्थात छाया का प्रतीक है। संस्कृत की छद् धातु में छत, छाया, ढके होने का भाव
> है। मोनियर विलियम्स के कोश के मुताबिक यह अ+च्छ है। इसमें जो च्छ है वह छद्
> से आ रहा है। इस तरह अच्छ का अर्थ हुआ जो ढका हुआ न हो, जो उजागर है, पूरी तरह
> स्पष्ट है, पारदर्शी है, साफ है। इस तरह संवाद होने के बाद अन्त में जब अच्छा
> कहा जाता है तब अभिप्राय यही होता है कि अब सब कुछ स्पष्ट है, कुछ भी छुपा हुआ
> नहीं है।
>

> 2011/11/7 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
>
>
> > अच्छा…हाँ हाँ… <http://shabdavali.blogspot.com/2011/11/blog-post_07.html>
>
> > संबंधित कड़ी-*होनहार भूत* और अनहोनी
> > <http://shabdavali.blogspot.com/2011/10/blog-post.html>[image:
> > hindi-ki-bindi]<http://lh4.ggpht.com/-z1Xv4MPrITU/Tre5DaXHTuI/AAAAAAAAR8k/GcwvOBuqcJ8...>


> > सु बह से शाम तक सामान्य बोलचाल में ऐसे कितने ही शब्द हैं जो क़रीब क़रीब

> > प्रत्येक वार्तालाप या संवाद का ज़रूरी हिस्सा होते हैं।* ‘अच्छा’* और* ‘हाँ’
> > * का शुमार भी इनमें है। प्रायः सम्बोधित किए जाने वाले प्रत्येक वाक्य के


> > बाद सुनने वाले का प्रत्युत्तर या प्रतिक्रिया ‘अच्छा’ या ‘हाँ’ में होती है।
> > अगर कोई किस्सा, प्रसंग या प्रबोधन चल रहा हो तो भी ‘अच्छा’ ही कहा जाता है।

> > इस *‘अच्छा’ / ‘हाँ’* में संतुष्टि का भाव भी रहता है और यह स्वीकार और


> > सम्मति सूचक शब्द भी है। इसके अलावा इसमें सुनाई पड़ने का संकेत भी निहित है
> > जैसे हूँ, ‘हाँ’ करना। निर्देशात्मक, आदेशात्मक सम्बोधन के बाद सुनने वाले

> > पक्ष की ओर से प्रायः स्वीकार सूचक* ‘हाँ’* का प्रयोग सामान्य शिष्टाचार में


> > शामिल है। वाक्यरचना के विशिष्ट रूपों के मद्देनज़र यह क्रिया विशेषण (अव्यय)
> > हैं। किन्हीं वाक्यों में एक साथ ये दोनों अ्व्यय होते हैं जैसे कुछ याद आने

> > का विस्मय और फिर उसकी स्वीकारोक्ति वाले वाक्य जैसे-*अच्छा…हाँ हाँ, याद
> > आया। *
> >  *स*बसे पहले *‘हाँ’* की बात। सामान्य वार्तालाप के दौरान अगर इस ‘हाँ’ का


> > इस्तेमाल न किया जाए तो संवाद आगे ही नहीं बढ़ सकता। ‘अच्छा’ से भी ज्यादा इस

> > ‘हाँ’ की अहमियत है। किसी संवाद के दौरान अगर यह *‘हाँ’* सुनाई नहीं पड़े तो


> > समझिए कि बहरा होने का उलाहना अब मिलने ही वाला है। ‘हाँ’ की व्युत्पत्ति

> > संस्कृत के ‘*आम्’* से मानी जाती है और इस अव्यय को विद्वानों ने अलग अलग


> > नाम दिए हैं, मगर मूल भाव एक ही है-स्वीकृति, सहमति, समर्थन आदि का। आम् के
> > मूल में विद्वानों का मानना है कि हिन्दी का ‘हाँ’ अव्यय संस्कृत के आम् से

> > बना है। इसका विकासक्रम यूँ रहा है-*सं.आम् >(पाली) आम > (प्राकृत) अम्ह। *आंचलिक
> > रूपों में ‘म्’ की अनुनासिकता* ‘ह’* में समा गई। फिर ‘अ’ स्वर भी ‘ह’ से
> > जुड़ गया। यह क्रम कुछ यूँ रहा*-(प्राकृत) अम्ह > अहँ > हआँ > ‘हाँ’*।


> > मोनियर विलियम्स और आप्टे कोश के मुताबिक आम् संस्कृत अव्यय है। आप्टे लिखते
> > हैं कि यह विस्मयादि द्योतक अव्यय है और अंगीकरण, स्वीकृति जैसे भावों अर्थात

> > ओह, *‘हाँ’* को अभिव्यक्त करता है। उदय नारायण तिवारी इसे सम्मतिसूचक अव्यय


> > कहते हैं तो वाशि आप्टे, भोलानाथ तिवारी इसे विस्मयबोधक अव्यय मानते हैं। इन
> > तमाम अर्थों में ‘हाँ’ का प्रयोग सिर्फ़ ‘हाँ’ कह कर भी किया जाता है अथवा
> > ‘हाँ’ के साथ वाक्य के जरिए। मिसाल के तौर पर- आपने कुछ खाया? जवाब में सिर्फ़

> > * ‘हाँ’* भी कहा जा सकता है और ‘हाँ’, अभी कुछ देर पहले ही...” भी कहा जा
> > सकता है। विशेष स्थितियों में *‘हाँ’* के प्रयोग से भी वार्तालाप का सिरा


> > पकड़ा जाता है जैसे, ‘हाँ’, बताइये...या फिर, ‘हाँ’, क्या कह रहे थे आप...।

> > *इ*सी तरह दूसरा स्वीकृति सूचक अव्यय है ‘अच्छा’। आप्टे कोश के मुताबिक
> > प्राप्ति के द्योतन वाला यह अव्यय संस्कृत के *‘अच्छ’* से बना है।


> > व्युत्पत्तिमूलक अर्थ देखें तो ‘अच्छ’ में विशुद्ध, निर्मल, उज्ज्वल, पारदर्शी
> > जैसे भाव हैं अर्थात जो कुछ स्वच्छ है, वही ‘अच्छ’ है। अब अव्यय के रूप में
> > सहमतिसूचक या कहे विस्मयादिबोधक के तौर पर ‘अच्छ’ के इन व्युत्पत्तिमूलक भावों
> > की क्या व्याख्या हो सकती है? आमतौर पर सहमति, स्वीकृति या अनुमोदन करते हुए-

> > *‘अच्छा’*, तो ऐसा ही करते हैं,* ‘अच्छा’*, अब और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं
> > है या *‘अच्छा’*, देखते हैं और क्या कर सकते हैं। इन तमाम वाक्यों में यह *
> > ‘अच्छा’* शब्द सिर्फ़ संवाद के उपसंहार की औपचारिकता के लिए नहीं बोला गया
> > है बल्कि इसमें यह निश्चय भी झलक रहा है कि बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है।*‘अच्छा’
> > * में जो पारदर्शिता, निर्मलता या उज्ज्वलता है, अव्यय के रूप में अच्छ में


> > उसका अभिप्राय स्पष्टता से है। यानी संवाद के बाद जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब
> > यह संकेत होता है कि सब कुछ स्पष्ट हो गया है। “अच्छी बात है, चलते हैं” का
> > अर्थ यह नहीं कि कोई बहुत
>

> ...
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अजित वडनेरकर

unread,
Nov 8, 2011, 2:54:49 PM11/8/11
to shabdc...@googlegroups.com
आपने सन्दर्भित पिछली पोस्ट नहीं पढ़ी बलजीत भाई।
एक बार उसे ज़रूर देख लें। हूँ का रिश्ता उससे ज्यादा है।
अलबत्ता हूँकार रह गई थी, सो वो बाद में जोड़ देंगे। हूँकार, हूँ ध्वनि के लिए ही है।

2011/11/9 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

दिनेशराय द्विवेदी

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Nov 8, 2011, 9:11:53 PM11/8/11
to shabdc...@googlegroups.com
हाड़ौती में एक कहावत है-
ख्याणी क्ह र' काचरा, हूँकारा दे र' बहरा
आंधा न' चोर पकड़्यो, दौड़जे र' लंगड़ा
अब हूँकारा दिए बिना तो कहानी आगे बढ़ नहीं सकती, इस का उल्लेख तो जरूरी था।

2011/11/9 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



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दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
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Baljit Basi

unread,
Nov 8, 2011, 9:51:20 PM11/8/11
to शब्द चर्चा
पढ़ लिया और याद आया कि पहले भी पढ़ा हुआ था. वर्तमान आलेख में आप हूँ/
हाँ शब्द की एक क्रिया विशेषण/ विस्मय के रूप में चर्चा कर रहे हैं जब
कि पिछली कड़ी में इनको सहायक क्रिया के तौर पर लिया गया है. दोनों में
ध्वनिमूलक साँझ तो है लेकिन निरिक्तक साँझ नहीं दर्शाई गई, तो फिर दोनों
का आपस में संबंध क्या है? वर्तमान हूँ/हाँ को आप सं.आम् से निकला बता
रहे हैं जबकि सहायक क्रिया वाला हूँ/हाँ अस/ भू से व्युतप्त हुआ बताया
गया है.मैंने यह कहा था कि पंजाबी में *हूँ शब्द एक हुन्गारे (हूँकारे)
के तौर पर भी प्रयुक्त होता है जैसे किसी वार्तालाप में.क्या हिंदी में
नहीं होता? अगर होता है तो इसकी चर्चा नहीं की गई.


On 8 नव, 14:54, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> आपने सन्दर्भित पिछली पोस्ट नहीं पढ़ी बलजीत भाई।
> एक बार उसे ज़रूर देख लें। हूँ का रिश्ता उससे ज्यादा है।
> अलबत्ता हूँकार रह गई थी, सो वो बाद में जोड़ देंगे। हूँकार, हूँ ध्वनि के लिए
> ही है।
>

> 2011/11/9 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Nov 9, 2011, 1:17:14 AM11/9/11
to shabdc...@googlegroups.com
सही है।
मुझे लगा कि आप का अभिप्राय उसी हूँ से है।

मित्रों, यहाँ बताना ज़रूरी है कि ख्यात चिन्तक डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल के आग्रह पर यह आलेख तैयार किया गया। उन्होंने क़रीब एक महिने पहले इन शब्दों के बारे में लिखने को कहा था। वक्त की कमी थी, सो दो बार के तकाज़ों के बाद इसे सोमवार को लिखा गया। निश्चित ही थ्री सिक्सटी की कोशिश हर बार रहती है, मगर कई बार कुछ कोण छूट जाते हैं। इस बार भी वैसा ही हुआ है। छूटने में कोई खराबी नहीं है, खारिज़ करने में है, क्योंकि तब आप बहस को न्योत रहे होते हैं।

मुझे बहस अच्छी नहीं लगती:)

2011/11/9 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

Baljit Basi

unread,
Nov 9, 2011, 8:11:15 AM11/9/11
to शब्द चर्चा
हर काम में कसर तो रह ही जाती है. हम यहाँ एक दुसरे का काम देखते है और
समझ के अनुसार टिपण्णी करते हैं. एक दुसरे से प्रेरित होकर और आगे सोचते
हैं. हमें आप की उपलब्धियों पर फखर है; आप से उमीदें भी अधिक हैं . आपके
एक आलेख से मुझे पांच दस और शब्दों की निरुकति सूझ जाती है. आपके यह
कहने का क्या भाव है, 'मुझे बहस अच्छी नहीं लगती:)

On 9 नव, 01:17, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> सही है।

> मुझे लगा कि आप का अभिप्राय उसी *हूँ *से है।


>
> मित्रों, यहाँ बताना ज़रूरी है कि ख्यात चिन्तक डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल के
> आग्रह पर यह आलेख तैयार किया गया। उन्होंने क़रीब एक महिने पहले इन शब्दों के
> बारे में लिखने को कहा था। वक्त की कमी थी, सो दो बार के तकाज़ों के बाद इसे

> सोमवार को लिखा गया। निश्चित ही *थ्री सिक्सटी* की कोशिश हर बार रहती है, मगर


> कई बार कुछ कोण छूट जाते हैं। इस बार भी वैसा ही हुआ है। छूटने में कोई खराबी
> नहीं है, खारिज़ करने में है, क्योंकि तब आप बहस को न्योत रहे होते हैं।
>
> मुझे बहस अच्छी नहीं लगती:)
>

> 2011/11/9 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Nov 9, 2011, 8:40:27 AM11/9/11
to shabdc...@googlegroups.com
आप स्माइली नहीं देख रहे प्राजी।
मौज है.....

2011/11/9 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
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