दावँ - दाँव

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Rangnath

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Jun 12, 2013, 9:35:12 AM6/12/13
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हिन्दी शब्दसागर के अनुसार दावँ या दाँवँ सही है लेकिन हिन्दी मिडिया में दाँव ज़्यादा प्रचलित है.

शब्द-चर्चा के साथियों की इस पर क्या राय है ?

narayan prasad

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Jun 13, 2013, 7:01:03 AM6/13/13
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शब्द के अन्त में 'व' का दो तरह से उच्चारण हो सकता है - 'व्' या ह्रस्व 'ओ' । जैसे - शव --> (1) शव् (2) शऒ [सन्दर्भ - उल्त्सिफ़ेरोव(2005): "प्राक्तिचेस्कयऽ ग्रमातिका लितेरातुर्नवऽ यिज़िका हिन्दी", पृष्ठ 48 ] । दाँवँ लिखना तभी सही होगा जब वकार का उच्चारण स्वर जैसा होगा, अन्यथा यह वर्तनी अशुद्ध होगी । मेरे मत में, जैसे 'कुआँ' का असली उच्चारण 'कुँआँ' होता है, 'दुनिया' का 'दुनियाँ', 'धनिया' का धनियाँ' आदि, परन्तु इन्हें इस तरह लिखने की परम्परा नहीं है; उसी तरह 'दाँव' को चलने देना चाहिए । यह ध्यातव्य है कि दूसरे स्वर में अनुनासिकत्व पूर्व अनुनासिक 'आँ' के प्रभाव के कारण है ।
---नारायण प्रसाद

2013/6/12 Rangnath <rangna...@gmail.com>

Anil Janvijay

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Jun 13, 2013, 7:23:14 AM6/13/13
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मैं नारायण जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ।  यह सिर्फ़ अनुनासिकता की प्रतिध्वनि ही है, जो सुनाई देती है, लेकिन बोली नहीं जाती। दाँवँ बोलना तो वैसे भी सम्भव नहीं है। हिन्दी में ऐसा कोई शब्द नहीं है, जिसमें एक के बाद एक लगातार दो अक्षरों पर चन्द्रबिन्दु या बिन्दु लगाया जाता हो। हिन्दी की ध्वनि प्रकृति को देखते हुए कुँआँ  भी ग़लत है। या तो सिर्फ़ कुँआ बोला जा सकता है या फिर कुआँ, जिनमें से कुआँ शुद्ध उच्चारण है। दुनिया तो शब्द ही अरबी का है जो तुर्की-फ़ारसी  के रास्ते हिन्दी तक चला आया है। इसलिए दुनियाँ तो दुनिया का असली उच्चारण हो ही नहीं सकता। हाँ हिन्दी पट्टी के कुछ इलाकों में यह शब्द दुनियाँ बोला जाता है क्योंकि वहाँ और भी कई दूसरे शब्दों को अनुनासिक बोलने की प्रवृत्ति है।  
 

2013/6/13 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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narayan prasad

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Jun 13, 2013, 10:31:37 AM6/13/13
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<< इसलिए दुनियाँ तो दुनिया का असली उच्चारण हो ही नहीं सकता।>>

परन्तु 'दुनिया' उच्चारण कभी मुझे सुनाई नहीं दिया ।
ये दुनियाँ, ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं ...
   (फ़िल्म - लैला-मजनूँ)

--- नारायण प्रसाद

2013/6/13 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>

Abhay Tiwari

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Jun 13, 2013, 11:06:37 AM6/13/13
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हम तो दुनिया ही बोलते-सुनते आए हैं.. वैसे शुद्ध उच्चारण दुन्या माना जाता है.. 


2013/6/13 narayan prasad <hin...@gmail.com>

Anil Janvijay

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Jun 13, 2013, 11:09:08 AM6/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
अब यह बात तो सन्तों को ही तय करनी चाहिए। दुनिया है या दुनियाँ?  नारायण जी, इस पर आपसे बहस नहीं करूँगा। असली शब्द और असली उच्चारण दुनिया ही है। आप बेशक न मानें।

2013/6/13 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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Anil Janvijay

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Jun 13, 2013, 11:11:26 AM6/13/13
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हाँ, अरबी उच्चारण  'दुन्या' ही है। अभय जी की बात ठीक है।

2013/6/13 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>

Rangnath Singh

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Jun 13, 2013, 11:40:42 AM6/13/13
to शब्द चर्चा
नारायण जी और अनिल जी, उम्मीद से ज्यादा जानकारी मिली. दिल से आभार.


2013/6/13 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>

narayan prasad

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Jun 13, 2013, 12:26:04 PM6/13/13
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<<दुनिया है या दुनियाँ?>>

लिखित रूप 'दुनिया' ही है, लेकिन मेरा कहना था कि मुझे हमेशा उच्चारित रूप 'दुनियाँ' ही सुनने को मिला है । फ़िल्मी गीत में भी 'दुनिया' के बदले 'दुनियाँ' ही सुनने को मिलता है । इस मामले में भी अन्तिम 'या'  का अनुनासिक उच्चारण उसके ठीक पहले अनुनासिक 'नि' का ही प्रभाव है । लिखा जाय 'मामा' या 'माँमाँ' - उच्चारण समान होगा । उसी तरह 'मा' हो या 'माँ' - उच्चारण तो समान ही होगा ।

--- नारायण प्रसाद

2013/6/13 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>
अब यह बात तो सन्तों को ही तय करनी चाहिए। दुनिया है या दुनियाँ?  नारायण जी, इस पर आपसे बहस नहीं करूँगा। असली शब्द और असली उच्चारण दुनिया ही है। आप बेशक न मानें।

Anil Janvijay

unread,
Jun 13, 2013, 12:54:53 PM6/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
नारायण जी,
मुझे यह मालूम नहीं है कि आपकी मातृभाषा क्या है, लेकिन हिन्दी तो नहीं ही है। या हिन्दी पट्टी में आप उस इलाके के रहने वाले नहीं हैं, जिस इलाके के उच्चारण को शुद्ध माना जाता है।  हिन्दी में 'मा' और 'माँ' दोनों का उच्चारण अलग-अलग है। मैं स्पष्ट मामा बोलता हूँ। कभी माँमाँ नहीं बोल पाता। मैंने पहले ही निवेदन किया है कि हिन्दी में ऐसे शब्द ही नहीं हैं, जिनमें दो अक्षरों पर एक साथ अनुनासिक ध्वनियाँ आएँ।
जिस गीत का आप ज़िक्र कर रहे हैं, वह गीत मोहम्मद रफ़ी ने गाया है। मोहम्मद रफ़ी पंजाबी थे और लाहौर के रहने वाले थे। पंजाबी लोग दुनिया को दुनियाँ बोलते हैं, लेकिन यह उनकी भाषा की प्रकृति  का प्रभाव है। उर्दू में यह शब्द दुनिया ही है। हिन्दी में भी दुनिया ही है।
सादर

 
2013/6/13 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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Abhay Tiwari

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Jun 13, 2013, 1:01:18 PM6/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
मा और माँ में कोई अन्तर नहीं? मैं ऐसा नहीं समझता.. दोनों भिन्न हैं! 


2013/6/13 narayan prasad <hin...@gmail.com>

Anil Janvijay

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Jun 14, 2013, 5:09:53 AM6/14/13
to shabdc...@googlegroups.com
कृपया उदयप्रकाश की यह टिप्पणी पढ़ें। नारायण जी, विशेष रूप से आपके और मेरे लिए।

कई बार, बल्कि लागातार मैं कहता-लिखता रहा हूं कि 'हिंदी' कोई एक मानकीकृत, सर्वानुमोदित और सर्वस्वीकृत, लोकानुमोदित भाषा नहीं है. यह एक 'हिंदी' नहीं बहुल हिंदियां है. उत्तर-भारत के कुछ परिचित केंद्रों -बनारस, इलाहाबाद या फिर इन्हीं जाने-माने केंद्रों के वर्चस्व से संचालित दिल्ली और राज्यों की अन्य राजधानियों के संस्थानों से प्रचारित 'हिंदी' आधिकारिक भले हो, वह भले ही 'राजभाषा' या कार्पोरेट भाषा का दर्जा हासिल कर ले, लेकिन 'हिंदी' की क्षेत्रीय-जनपदीय या उप-राष्ट्रीय बहुलताओं को किसी बुल्डोज़र के ज़रिये सपाट और एकात्मक नहीं बना सकती. समूचा 'जनतंत्र' इसके सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है. 'लोकतंत्र' एकात्मक, मानकीकृत, राजभाषा 'हिंदी' के सामने एक अलंघ्य बाधा है.
'हिंदी' का कौन-सा शब्द 'शुद्ध' है, व्युत्पत्ति-वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित है, यह एक ऐसी उलझी हुई गांठ है, जैसे आज कोई पूछे कि कौन सी कार या ट्रैक्टर, कौन-सा बोइंग विमान, कौन-सी बकरी या घोड़ा जैविक-तकनीकी दृष्टि से 'विशुद्ध' या 'प्योर' है. जैविक प्राणियों की तरह ही, भाषा के लोक में भी इतने सारे विविध सूत्र या कारक हैं, जो 'हिंदी' या 'अंग्रेज़ी' जैसी बहु-व्यवहृत भाषा की लोकतांत्रिक बहुलता को सिद्ध करती हैं. एक बार 'एकोनोमिक टाइम्स' के भाषा-विवाद में दो-तीन साल पहले भी मैंने विनम्रता के साथ अर्ज किया था कि जिस 'हिंदी' भाषा को हमारे समाज की जातीय और राजनीतिक व्यवस्था पुष्ट कर रही है, वह भले ही बाज़ार (मार्केट), सरकार (गवर्नमेंट) और संचा्र (मीडिया) की प्रभुत्वशाली भाषा बनाई जा रही हो, उसका ग्रासरूट उसी तरह से कमज़ोर बल्कि गैरहाज़िर है, जैसे कभी संस्कृत या फ़ारसी का था. (इसका अर्थ यह न लिया जाय कि एलीट-सत्ता की भाषा में उत्कृष्ट रचनाएं संभव नहीं होतीं. बिल्कुल होती हैं. संस्कृत में सौंदर्य-शास्त्र और काव्य-नाट्य की महान कालजयी रचनाएं हमारे साहित्य-चिंतन की श्रेष्ठ परंपरा का हिस्सा हैं, लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए इससे इतर भाषिक अभिव्यक्तियों में कुछ भी उत्कृष्ट लिखा ही नहीं गया. बल्कि सच इसके ठीक विपरीत है. जीवंत साहित्य बहुतायत में जीवित भाषा में ही लिखा-रचा गया.
एक चुट्कुला मुझे, इस संदर्भ में याद आता है. जिस इलाके का मैं हूं और मेरी 'हिंदी' है, उसी इलाके के किसी कस्बे के एक मिडिल स्कूल में बनारस-इलाहाबाद की सवर्ण राजभाषा 'हिंदी' का एक विद्वान स्कूल प्रिंसपल बन कर आया. स्कूल के बाकी सारे कर्मचारी और अध्यापक विंध्य-छत्तीसगढ़ के 'हिंदी' भाषी थे. एक दिन क्या हुआ कि स्कूल के एक 'हिंदी' अध्यापक की छुट्टी की अर्ज़ी प्रिंसपल साहेब की मेज़ तक पहुंची. उस अर्जी में लेखा हुआ था -
''मान्यवर पूजनीय प्रिंसपल महोदय,
सविनय नम्र निवेदन है कि मेरा घींच कई दिन से बहुत पिरा रहा है इसलिए कृपा करके मुझे चार दिवस की छुट्टी दे कर अनुग्रहीत करें.
विनीत
राधेलाल तमेर,
साहित्य शिरोमणि."
प्रिंसपल ने अर्जी देखी. लिपि तो निस्संदेह 'देव-नागरी' थी, कुछ शब्द तत्सम भी थे, लेकिन कुछ ठीक से समझ नहीं आ रहा था. इसलिए उन्होंने स्कूल के एक दूसरे 'हिंदी' अध्यापक को बुलाया और पूछा ये 'घींच' क्या होता है ? कौन-सा अंग?
स्कूल अध्यापक ने आश्चर्य से कहा - 'सर जी, आप 'घींच' नहीं जानते? अरे , सर घींच माने 'घोंघा' !'
'घोंघा' ? -यूपी के प्रिंसपल साहेब फिर चौंके - 'घोंघा' ? आपका आशय क्या है, बंधु ?'
'सर..सर...! 'घोंघा' माने 'नटई' !
'नटई' ? -प्रिंसपल.
'नटई' का अर्थ हुआ ''घुटकी'' !
'घुटकी' ? -प्रिंसपल.
'ओह ..सरजी, आप 'हिंदी' नहीं जानते ? 'घुटकी' मतलब 'गटई' ...!
खैर, बनारस-इलाहाबाद के 'हिंदी' आचार्य को सिर्फ़ 'गर्दन' और 'गले' तक पहुंचने के लिए १३ से अधिक 'हिंदी' शब्दों की सुरंग से गुजरना पड़ा.
यह चुट्कुला इसीलिए महज एक चुटकुला नहीं रह जाता बल्कि 'हिंदी' के मानकीकरण के विराट संगठित, सांस्थानिक उद्यमों के सामने उसके विपुल शब्द भंडार को नेस्तनाबूद करने वाली एक बड़ी जातीय-पूंजीजीवी सत्ता-प्रणाली का उपनिवेश बनने के विरुद्ध किसी बहुजन-प्रतिरोध के रूप में खड़ी होती है.
अभी पिछले साल दो-चार महीने मैं उसी क्षेत्र के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर काम कर रहा था. मेरी चिंताओं में एक चिंता यह भी थी कि उस क्षेत्र में बोली-समझी जाने वाली बहुत बड़ी लेकिन हाशिये में धकेल दी गयीं भाषाऒं को संरक्षित करने या उनमें शिक्षा देने का काम किया जा सकता है...और वहां के 'हिंदी विभाग' में क्या वह पाठ्यक्रम और वहां की हिंदी के विद्वान प्राध्यापक नियुक्त हैं ?
लेकिन सच यह था, कि वह हिंदी विभाग भी वही था, जो मेरे चर्चित, लगभग समस्त भारतीय भाषाओं मे अनुदित और अब अमेरिका के प्रतिष्ठित येल विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित -'पीली छतरी वाली लड़की' के केंद्र में है.
यानी, उस विंध्य-छत्तीसगढ़ी 'हिंदी' को उच्च-साहित्यिक शिक्षा से वंचित करने के सरकारी-राजनीतिक खेल में ८० प्रतिशत प्राध्यापक बनारस-इलाहाबाद से ही नियुक्त हैं. ..और वहां भी वही संकीर्तन हो रहा है, जो बाकी जगहों पर है.
यह कैसे बदलेगा ? और 'हिंदी' इस जंजाल से मुक्त कैसे होगी ?



2013/6/13 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

narayan prasad

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Jun 14, 2013, 5:19:39 AM6/14/13
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अनिल जी,
    इस पर तो किसी और सन्दर्भ में हमलोग पढ़ चुके हैं और इस पर चर्चा भी हो चुकी है ।

--- नारायण प्रसाद

2013/6/14 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>

कृपया उदयप्रकाश की यह टिप्पणी पढ़ें। नारायण जी, विशेष रूप से आपके और मेरे लिए।

कई बार, बल्कि लागातार मैं कहता-लिखता रहा हूं कि 'हिंदी' कोई एक मानकीकृत, सर्वानुमोदित और सर्वस्वीकृत, लोकानुमोदित भाषा नहीं है. यह एक 'हिंदी' नहीं बहुल हिंदियां है. उत्तर-भारत के कुछ परिचित केंद्रों -बनारस, इलाहाबाद या फिर इन्हीं जाने-माने केंद्रों के वर्चस्व से संचालित दिल्ली और राज्यों की अन्य राजधानियों के संस्थानों से प्रचारित 'हिंदी' आधिकारिक भले हो, वह भले ही 'राजभाषा' या कार्पोरेट भाषा का दर्जा हासिल कर ले, लेकिन 'हिंदी' की क्षेत्रीय-जनपदीय या उप-राष्ट्रीय बहुलताओं को किसी बुल्डोज़र के ज़रिये सपाट और एकात्मक नहीं बना सकती. समूचा 'जनतंत्र' इसके सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है. 'लोकतंत्र' एकात्मक, मानकीकृत, राजभाषा 'हिंदी' के सामने एक अलंघ्य बाधा है.
------------ Message curtailed ----------

अजित वडनेरकर

unread,
Jun 14, 2013, 7:19:46 AM6/14/13
to shabdc...@googlegroups.com
हम भी तो बरसों से यही कह रहे हैं कि काशी-इलाहाबाद वालों को सिर पे बिठा कर बहुतों ने जीवन काट लिया। कुए के मेंढकों के लिए उज्जैन, इन्दौर, ग्वालियर, रीवा, रायपुर, जबलपुर, सागर, छतरपुर, जयपुर, जोधपुर, नागपुर, अलवर, अहमदाबाद, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, औरंगाबाद, मुम्बई, लाहौर, अमृतसर, दिल्ली, मेरठ, जम्मू और न जाने कहाँ कहाँ की हिन्दी, हिन्दी नहीं थी। भर गए कुए, मर गए मेंढक। हिन्दी अब हिन्दी की तरह ही बढ़ रही है। यह हिन्दी-समय है। हिन्दी-युग है। यहाँ "हिन्दी-विमर्श" कम और "हिन्दी-सहर्ष" का असर ज्याद नज़र आता है। इलाहाबाद-बनारस वालों ने अपनी हिन्दी की जैसी दुर्गति की है वैसी दुश्मन की भी न हो।


2013/6/14 narayan prasad <hin...@gmail.com>

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अजित

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औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

Rangnath Singh

unread,
Jun 16, 2013, 7:22:23 AM6/16/13
to शब्द चर्चा
अजित जी, भावनाओं में बहकर आपने नितांत आपत्तिजनक बयान दिया है. आप जैसे वरिष्ठ और अनुभवी साथी के ऐसे बयान से घोर निराशा हूई है.

मुझे आश्चर्य है कि इस समूह के संचालक अभय जी को आपकी टिप्पणी पर कोई आपत्ति क्यों नहीं हुई. अन्यथा "विषय से भटकने" को लेकर अति-सचेत संचालक से उम्मीद है कि वो  इस मामले पर भी अपनी राय स्पष्ट करेंगे.




2013/6/14 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Jun 16, 2013, 7:57:55 AM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
चाहे भारतेंदु हरिश्चंद्र का युग रहा हो या मंडन मिश्र का काशी-प्रयाग की हिंदी सोच के अनुयायियों की देश के अन्य भागों के मतावलंबियों से सदैव ही मत-भिन्नता रही है।
अजितजी ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हींदी की सर्वग्राह्यता पर जोर देने के लिए इसकी व्यापकता को ही सामने रखा है। इसमें आपत्तिजनक कुछ नहीं होना चाहिए। यह विभिन्न विचारधाराओं और हिंदी के प्रति दृष्टिकोणों को व्यक्त करता है।



2013/6/16 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>



--
bestregards.gif
विनोद शर्मा


अजित वडनेरकर

unread,
Jun 16, 2013, 9:21:46 AM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
रंगनाथजी,
आपकी भावना मैं नहीं समझ पाया हूँ। कैसी आपत्ति ?
पहले अपनी बात तो स्पष्टता से समझा दीजिए। मैने अनिलजी की बात पर प्रतिक्रिया दी है।
आपत्तिजनक कुछ नहीं है। न ही व्यंग्य है। अपनी बात कही है।
मस्त रहिए। फालतु फिक्र छोड़िये, निर्मल आनंद लीजिए।
शुभकामनाओं सहित


2013/6/16 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

Rangnath Singh

unread,
Jun 16, 2013, 9:28:52 AM6/16/13
to शब्द चर्चा
" इलाहाबाद-बनारस वालों ने अपनी हिन्दी की जैसी दुर्गति की है वैसी दुश्मन की भी न हो"

इस बयान को मैं आपत्तिजनक समझता हूँ. बाकी लोगों को अगर इसे अनापत्तिजनक समझने का हक है तो मुझे भी हक है कि मैं इसे आपत्तिजनक समझ सकूँ.

आपकी सलाह पहले से ही सिर आँखों पर  है. उम्मीद है कि आप भी इस पर अमल करेंगे.
सस्नेह


2013/6/16 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 16, 2013, 9:54:00 AM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
इस में क्या आपत्तिजनक है?


2013/6/16 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

Sheo S. Jaiswal

unread,
Jun 16, 2013, 10:10:23 AM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित जी का बयान सामान्य नहीं है. बड़ी बात कही गयी है और किंचित आक्रोश में कही गयी है. बनारस-इलाहाबाद   वालों को कुंए के मेढक कोई वैसे ही नहीं कहेगा. फिर अजित जी जैसा हिंदी भाषाविद ऐसा कह रहा है तो उसके पीछे कोई बड़ा कारण होगा. उसे समझने -समझाये जाने की आवश्यकता है. 


2013/6/16 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>



--
Dr. S. S. Jaiswal

Rangnath Singh

unread,
Jun 16, 2013, 10:49:38 AM6/16/13
to शब्द चर्चा
दिनेश जी, आपकी बात पर इतना ही कहना चाहूँगा कि "राजस्थान और मध्यप्रदेश वालों ने देश की जैसी दुर्गति की है वैसी दुश्मन की भी न हो"


2013/6/16 Sheo S. Jaiswal <jais...@gmail.com>

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 16, 2013, 12:51:15 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
किसी प्रदेश के लोगों ने देश की दुर्गति करने में कसर रखी है क्या?



2013/6/16 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>
दिनेश जी, आपकी बात पर इतना ही कहना चाहूँगा कि "राजस्थान और मध्यप्रदेश वालों ने देश की जैसी दुर्गति की है वैसी दुश्मन की भी न हो"



--

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 16, 2013, 12:51:55 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
वैसे बहस क्या थी? और कहाँ पहुँच गई? यह ठीक नहीं है।


2013/6/16 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 16, 2013, 12:54:56 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित जी ने कह दिया। अपराध किया? फिर रंगनाथ जी ने कहा। प्रतिवाद में ही सही पर अपराध किया? पर क्या यहाँ भी फौजदारी अदालत खोलिएगा क्या? इस सूत्र को विराम दो और आगे बढ़ो। वैसे  अजित जी ने जो कुछ कहा उस का आशय सही था। आप लोग शब्दों को पकड़ कर बैठ गए हैं। क्या यह उचित है?

Vinod Sharma

unread,
Jun 16, 2013, 12:56:45 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
सोने की चिड़िया के पर नोचने में सब प्रदेशों ने सक्रिय भूमिका निभाई है।

2013/6/16 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Jun 16, 2013, 12:58:33 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
इस देश का सदियों का इतिहास गवाह है, यहाँ सबसे ज्यादा झगड़े भाषा पर ही हुए हैं।

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 16, 2013, 1:07:07 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
जिस बात पर अजित जी को गुस्सा है वही मैं भी कह रहा हूँ। आज राजस्थान में राजस्थानी के लिए आंदोलन चल रहा है। पर हो क्या रहा है? यही न कि केवल मारवाड़ी बोली को राजस्थानी के रूप में प्रतिष्ठित किया जा रहा है। हाड़ौती, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती आदि की उपेक्षा कर के। इस से राजस्थानी को कोई लाभ नहीं होगा। इस लिए हिन्दी को लोगों को जैसे भी वे चाहते हैं विकसित करने दें।हालांकि लोगों ने ही हिन्दी विकसित की है और करते रहेंगे। लेकिन लोग उसे तरह तरह से बांध कर उस के विकास में रोड़ा तो न बनें।


2013/6/16 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

Rangnath Singh

unread,
Jun 16, 2013, 2:04:16 PM6/16/13
to शब्द चर्चा
दिनेश जी, आप बेवजह नाराज हो रहे हैं. मैंने जो कहा वो मेरे विचार नहीं है. 
मैंने तो बस अजित जी के वाक्य में भाषा की जगह देश को फिट कर दिया. ताकि आप उनकी बात की तासीर समझ सकें.

जिस तरह दो प्रदेश देश की बर्बादी की लिए जिम्मेवार नहीं ठहराए जा सकते उसी तरह दो शहरों को भी किसी भाषा की बर्बादी के लिए जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता.


Baljit Basi

unread,
Jun 16, 2013, 5:15:21 PM6/16/13
to शब्द चर्चा
भाषा में भी जिस की लाठी उस की भैंस चलती रही है।

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 16, 2013, 9:04:31 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
रंगनाथ जी,
फिर बात बहुत तकनीकी हो चली है। समाज में प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं जो अपने निजि लाभों के लिए अपनी अपनी शक्तियों का प्रयोग करने से नहीं चूकतीं। वे भाषा के साथ भी दुर्व्यवहार करने से नहीं झिझकतीं। इन प्रवृत्तियों ने भाषाओं के विकास को जो हानि पहुँचाई है उस से हम सभी अनभिज्ञ नहीं हैं। उन पर अनेक बार चर्चा हो चुकी है। लेकिन बार बार उसी बात को फिर फिर कर जब दुहराया जाएगा तो एक स्वाभाविक भाषा प्रेमी को क्रोध आना भी स्वाभाविक है। आप उस पर पूरी संसद या न्यायालय चलाने के मूड में नजर आ रहे हैं। पर मेरा ख्याल है शब्द चर्चा में कोई संसद या न्यायालय मौजूद नहीं है।


On Mon, Jun 17, 2013 at 2:45 AM, Baljit Basi <balji...@yahoo.com> wrote:
भाषा में भी जिस की लाठी उस की भैंस चलती रही है।
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lalit sati

unread,
Jun 16, 2013, 11:14:01 PM6/16/13
to shabdc...@googlegroups.com
मेरे विचार से अजित जी का वक्तव्य बहसतलब हो सकता है, लेकिन "आपत्तिजनक" किसी भी रूप में नहीं। बहुत सब्ज़ेक्टिव होकर सोचेंगे तो इस वक्तव्य से रोष उत्पन्न हो सकता है, लेकिन यथार्थ में तो कुछ ऐसा ही हुआ है, हो रहा है। क्यों न इसे भाषा के जनतांत्रीकरण के रूप में देखा जाए? भाषाशास्त्रियों की ज़रूरत व उनके सकारात्मक योगदान से भला कौन इनकार कर सकता है। किंतु कुछ टापुओं पर बैठे सिद्धपुरुषों द्वारा भाषा पर एकतरफा थोपी हदों और वहीं से प्रेरणा पाकर बने सरकारी तटबंधों को टूटना ही चाहिए था। हदें टूटी हैं। बहता नीर हद से अनहद की ओर उन्मुख हुआ है। यह बहता नीर "हद अनहद दोनों चले" की स्थिति में होता, ऐसी हमारी सदिच्छा हो सकती है, लेकिन ऐसा हमेशा होता नहीं। यह जनतांत्रीकरण भले ही अराजक जान पड़े, लेकिन भाषा आम जन के और करीब आई है। नीर की वेगवान लहरों ने "प्रतिष्ठित" मठों पर प्रहार किया है। हालांकि यह बात भी अन्यत्र उचित ही चर्चाधीन रही है कि इसी दौर में तमाम स्थानीय भाषाओं के बिला जाने का खतरा भी पैदा हुआ। पर फ़िलहाल वर्तमान चर्चाबिंदु पर ही केंद्रित करें तो मठों के टूटने का शोक हम क्यों मनाएं?


2013/6/17 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

Madhusudan H Jhaveri

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Jun 16, 2013, 7:11:55 PM6/16/13
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भाषा में भी जिस की लाठी उस की भैंस?

(१) राष्ट्र की समस्याएं राष्ट्रीय दृष्टि बिना हल हो नहीं सकती।
(२) गोवर्धन परबत उठाने में, सभी को अपना योगदान देना चाहिए। उस गोवर्धन परबत पर चढकर भार बढाने से परबत नहीं उठेगा।{मैं एक गुजराती बनकर, उसकी ओर गुजराती की भलाई के लिए निर्णय में जोड तोड नहीं कर सकता।}
(३) (क) राजनितिज्ञों को, (ख) अपनी अपनी भाषाकी डफली बजानेवालों को,(ग) वोट बॅन्क की राजनीति करने वालों को,(घ) भाषा वर्चस्ववादियों को——इत्यादि संकुचित दृष्टिवाले लोगों को भी—
दूर रखकर विशुद्ध राष्ट्रीय दृष्टिकोण से प्रतिबद्ध ऐसे, आयोग द्वारा,तटस्थता से आकलन करके, निर्णय लिया जाए।

(४) उस निर्णय को लागू करने में रणनीति का उपयोग किया जाए; निर्णय लेने में नहीं।

जैसे बालक को औषधि खाने के बाद, आप उसे मीठी गोली(राण नीति) देते हैं।

नीति है, बालक का स्वास्थ्य।

इस दृष्टिसे, कोई (एक या अनेक) राष्ट्रीय वृत्तिका सशक्त चिंतक, आलेख डाले।

चिन्तक प्रादेशिक निष्ठा का नहीं होना चाहिए। उसको समग्र देश की दृष्टि से देखने की आवश्यकता मानता हूँ।
पर कूटनीति निर्णय लेने में बिलकुल नहीं। लागू करने में स्वीकार्य हो।

निर्णय समन्वयी दृष्टिसे ही आ सकता है। संकुचित प्रादेशिक निष्ठा(ओं) से नहीं।
इसका उत्तर भी मंथन से निकलेगा। 

मधुसूदन

Uday Prakash

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Jun 17, 2013, 2:46:57 AM6/17/13
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यह मान कर कि बहस सिर्फ़ विचारोत्तेजना को ही जन्म देगी,
वैयक्तिक-स्थानिक उत्तेजनाओं को नहीं, मैं कुछ 'भाषेतर' ऐतिहासिक संदर्भ
रखना चाहूंगा, जिससे 'हिंदी' के नियोजित विवादस्पद 'मानकीकरण'
(स्टैंडर्डाइज़ेशन/ एकरूपता / भषिक-एकात्मकता) के क्षेत्र में कुछ 'शहरों
/ नगरों' की वर्चस्वशील (हेजेमोनिक) भूमिका पर विचार किया जा सके। मुझे
लगता है, यदि हम १९वीं सदी के प्रारंभि दशकों से ले कर अंतिम दशक के बीच
के हलचलों को ध्यान में रखें और आधुनिक-खड़ी बोली 'हिंदी' के निर्माण को
उस समय के टेक्नोलोजिकल, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों से काट
कर, ( सामान्य रूप से प्रचलन की अवधारणाओं में यथास्थिति बनाए रखने की
आसानी के लिए) न देखें तो हम दूसरे निष्कर्षों तक पहुंच सकते हैं.
सबसे पहले तो यही कि उस ऐतिहासिक दौर में हमारी संस्कृति और सामाजिक
मूल्यों-बनावटों पर अपना दबाव और प्रभाव डालने वाली सर्वोच्च केंद्रीय
सत्ता देशी या 'राष्ट्रीय' (?) नहीं, ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता थी.
परिवहन, संचार प्रणाली, संप्रेषण, बाज़ार और अर्थनीतियों के निर्धारण में
उस औपनिवेशिक सत्ता की परिवर्तनकारी भूमिका थी. पहली रेलगाड़ी चलने पर
राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद और भारतेंदु के अनेक प्रशंसात्मक संस्मरण और
निबंध उपलब्ध हैं. जिस 'टेलिग्राम' (तार) को हम आज अपने समय में, २०१३
में, खत्म हुआ देख रहे हैं, टेलिप्रिंटर के साथ उस अवधि में हासिल हुआ वह
एक सशक्त फ़ौरी संप्रेषण का तकनीकी-भाषिक माध्यम था. उन टेलिप्रिंटर्स
में 'हिंदी' या अन्य भारतीय भाषाओं के लिए उसी तरह रोमन लिपि का प्रयोग
किया जाता था, जैसे आज भी मोबाइल, नेट या अन्य तकनीकी-संचार-संप्रेषण के
माध्यमों में हम करते हैं. एक पराई लिपि में किसी अन्य स्थानिक लिपि में
व्यवहृत भाषा के प्रयोग से उसमें कोई परिवर्तन न हो, यह मानना, मेरी
दृष्टि में तार्किक नहीं है.
फिर उसी औपनिवेशिक काल में प्रिंटिग-प्रेस का आगमन एक ऐसा महत्वपूर्ण
निर्धारक तथ्य है, जिसकी भूमिका की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए. . 'हिंदी'
खड़ी बोली के आधुनिक गद्य का निर्माण बिना इस प्रेस के संभव न होता.
उपन्यास, कहानियां और प्रारंभिक 'हिंदी' काव्य-ग्रंथ पुस्तकों के रूप में
प्रकाशित हो कर बाज़ार में आना तभी संभव हो सका. (यह एक बहुत सामान्य-सा,
सतह पर दिखाई देता तथ्य है, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है) इसी से जुड़ा और
इसी का आनुषंगिक तथ्य यह भी है कि इसी के 'प्रमुख' कारणों से व्रज, अवधी,
बघेली, बुंदेली, भोजपुरी आदि अन्य अधिक पुरानी और अधिक संपन्न भाषाओं का
एलीट-सांस्कृतिक उत्पादों, जिसमें साहित्य और पत्रकारिता प्रमुख हैं, का
विस्थापन हुआ. उनकी गद्दियां पलट दी गयीं लेकिन उनकी महान
सांस्कृतिक-साहित्यिक 'मूर्तियों' को इस लिए नहीं हटाया गया, क्योंकि
इससे इस ब्रिटिश-भारतमाता के गर्भ से जनम लेती 'आधुनिक हिंदी' के पास कुछ
भी, दरिद्रता और परंपरा-विहीनता के अतिरिक्त कुछ न बचता.
फिर एक के बाद एक खुलने वाले कालेज, जो आधुनिक-लोकतांत्रिक शिक्षा के नये
केंद्र बने और जिनका इतिहास फ़ोर्ट विलियम कालेज से शुरू होता है, उसकी
निर्णायक भूमिका को कैसे भुलाएंगे. क्या 'हिंदी', 'हिंदुई', 'हिंदवी',
'हिंदुस्तानी' के उस निर्णायक ऐतिहासिक विमर्श और उपक्रम में जान
गिलक्राइस्ट, प्रोफ़. वार्ड समेत उनके भाषाई-मुंशियों के योगदान को नकारा
जा सकता है.
ध्यान में रहे, जिस तरह से आज भी इस 'नव-ब्राह्मणवादी' 'नव-संस्कृत'
राजभाषा हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए आज की सरकार, राजनीतिक
सक्तियां, प्रशासन और कार्पोरेट पूंजी कर रही है, उस दौर के भी तथ्य इसी
का समानांतर साक्ष्य देते हैं. अंतर सिर्फ़ इतना है कि अब जहां मौज़ूदा
'हिंदी' के माध्यम से, इसके 'तत्सम-प्रधान' शब्द-भंडार के बलात उपयोग से
जहां ज्योतिष, धार्मिक-कर्मकांड, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक, और सवर्णवादी
जातिगत मूल्यों-मान्यताओं को बाज़ारू उपभोक्तावाद के साथ साठ-गांठ के साथ
प्रतिष्ठित करने में जहां 'देशी' सरकार और अन्य शक्ति-केंद्र हैं, वहीं
उस दौर में, यानी १९वीं सदी में , यही भूमिका ब्रिटिश-साम्राज्य की थी.
(पहले ईस्ट-इंडिया कंपनी की सरकार और बाद में क्वीन विक्टोरिया और फिर और
बाद में ब्रिटिश-हाउस आफ़ लार्ड्स और हौस आफ़ कामन्स)
इसीलिए, यह मानने के अनेक साक्ष्य हैं कि आधुनिक हिंदी के निर्माण और
इसके प्रारंभिक रूप-निर्धारण में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का महत्वपूर्ण
योगदान है. तत्कालीन नवजात 'हिंदी खड़ी बोली' के साथ-साथ ४० अन्य भारतीय
भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद और प्रिंटिंग प्रेस से उसका वितरण और प्रसार
ठीक आज के ब्राह्मणवादी धार्मिक-कर्मकांड और तीज-त्यौहार,
मूल्यों-मान्यताओं का समानांतर समरूप है.
लेकिन तब भी गनीमत यह थी कि उस औपनिवेशिक काल में निर्मित हो रही हिंदी
में फिर भी पश्चिमी आधुनिक लोकतांत्रिक विचारों के अंतस्तत्व थे, वह अपने
स्वरूप में जाति-धर्म निरपेक्ष थी, उसमें फ़ारसी, अरबी, पाली, व्रज-अवधी
आदि भाषाओं के भी शब्द बहुतायत में उपलब्ध थे, बाद में कैसे उसे 'शुद्ध'
किया गया और उसका 'धर्मांतरण' किया गया और कैसे इस भाषा को
'राष्ट्र-भाषा' कहने-मनवाने का अखिल-भारतीय अभियान चला (जो आज भी ज़ारी
है) भाषा में होने वाले इस घातक जातिवादी-सांप्रदायिक 'सबोटाज़' का ही
परिणाम था कि १९४७ में देश हिंदी और उर्दू के दो कौमी भाषाओं के देश के
रूप में टूट गया और फिर सरहद के इस पार इस 'राज-देव भाषा हिंदी' में सारी
महानताएं कुछ उच्च हिंदू जाति के मीडियाकर के हिस्से में आ गयीं.

इस पूरी प्रक्रिया में उत्तर भारत के प्रमुख हिंदू तीर्थ नगरों, बनारस और
इलाहाबाद की भूमिका को एक बार फिर से देखिये. (लेकिन पीछे क्यों देखते
हैं? शव-साधना हम थोड़ी ही कर रहे हैं, आगे देखिये और अपने चारों ओर
देखिये, आज की तारीख में, क्या दिखता है?)
कई ऐसी कहावते हैं जिनमें किसी अत्यंत छोटी लगती इकाई की भूमिका बहुत
बड़ी बताई जाती है. जैसे -'हांडी के एक चावल के दाने को देख कर भात के पक
जाने की बात, एक सड़ी हुई मछली के कारण पूरे सरोवर के गंदे हो जाने की
बात वगैरह ...
इटली का एक शहर मिलान और जर्मनी का एक शहर बर्लिन सिर्फ़ एक शहर भर नहीं
थे जिन्होंने पूरी दुनिया को फ़ाशीवाद और नाज़ीवाद के खतरों में
ढकेला..उसी तरह बनारस और इलाहाबाद सिर्फ़ कोई लोकल शहर भर नहीं हैं,
जिन्होंने एक समूची भाषा से सारे देश के अन्यों को बे-दखल किया, उन्हें
नर्क और साइबेरिया जैसे कालेपानी का जीवन जीने के लिए मज़बूर किया...
माफ़ करें, भाषा के भीतर के इलाके में ये शहर, अगर मैं अभी भी हिंदी का
ही लेखक हूं ...तो बहुत डरावने लगते हैं....!
पुराने मिलान और बर्लिन की तरह ..!
>> *दिनेशराय द्विवेदी, *कोटा, राजस्थान, भारत
>> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
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>> तीसरा
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Uday Prakash

unread,
Jun 17, 2013, 2:47:52 AM6/17/13
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इसके मानी ये हुए कि मैं अजित जी और दिनेश जी की बातों से बहुत दूर तक सहमत हूं..!

Rangnath Singh

unread,
Jun 17, 2013, 4:30:38 AM6/17/13
to शब्द चर्चा
उदय जी, आप को अपने जिस वक्तव्य के मानी बताना पड़ा मैं भी उससे मैं बहूत दूर तक असहमत हूँ.

आपकी पुरानी मान्यता रही है कि हिन्दी भाषा ब्राह्मणवाद के वर्चस्व वाली भाषा है. 

इलाहाबाद और बनारस को ब्राह्मणवादी संस्कृति का पोषण और संरक्षण करने वाले शहरों में मुख्य शहर मानने में मुझे कोई एतराज नहीं.

लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं कि हिन्दी भाषा में ब्राह्मणवादी प्रवृत्तियों के वर्चस्व के लिए सिर्फ ये दो शहर जिम्मेदार हैं. और इन शहरों के तमाम लेखक भी बहुमत से हिन्दी भाषा में ब्राह्मणवाद के संरक्षण के लिए दत्तचित्त थे.

इन शहरों के ब्राह्मणवादी लेखकों का संज्ञान लेते समय आप अपनी सुविधानुसार उन लेखकों को कैसे भूल सकते हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद की मुखालफत की.

शब्दचर्चा इस तरह के विषयों का मंच नहीं है इसलिए मैं ज़्यादा विस्तार में नहीं जा रहा. मेरा जो एतराज मैं उसे व्यक्त कर चुका हूँ इसलिए इस सूत्र पर इसे मेरा आखिरी कमेंट समझा जाए.

कहना न होगा मतभेद का अर्थ मनभेद नहीं होता.


2013/6/17 Uday Prakash <udaypr...@gmail.com>

Anil Janvijay

unread,
Jun 17, 2013, 4:47:09 AM6/17/13
to shabdc...@googlegroups.com

एक हिन्दी यह भी है।
बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा के फादर अशोक चोपड़ा की मंडे दोपहर डेथ हो गई. वह लास्‍ट टू वीक से कोकिलाबेन धीरूभाई अम्बानी हॉस्पिटल, मुम्बई में एडमिट थे. वहां उनका कैंसर का इलाज चल रहा था. हॉस्पिटल के सीओओ राम नरायन के मुताबिक, अशोक चोपड़ा का पिछले कुछ सालों से कैंसर का इलाज चल रहा था. मंडे शाम ओशिवारा क्रेमेटोरियम में उनके लास्‍ट राइट कंप्‍लीट हुए. शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण, रणबीर कपूर, रनवीर सिंह और करन जौहर ने श्मशान घाट पहुंचकर दिवंगत आत्मा को श्रृद्धांजलि दी.

प्रियंका अपने डाक्‍टर फादर से बेहद अटैच थीं. उन्‍होंने अपनी हर सक्‍सेज में अपने फादर को अपने साथ खड़े पाया था और यही वजह थी कि वो उनके लिए कुछ भी करने के लिए रेडी रहती थीं. अपने फादर के गाने के शौक को देखते हुए उन्‍होंने उनका एल्‍बम बनवाया और खुद भी सिंगिंग को एक आप्‍शन की तरह सेव कर रही थीं यही बजह है कि अभी उनका एक म्‍यूजिक एल्‍बम भी लॉच हुआ था.



2013/6/17 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>



--

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 17, 2013, 5:21:54 AM6/17/13
to shabdc...@googlegroups.com
अनिल जी ये तो हिन्दी नहीं शुद्ध हिंग्लिश है।


2013/6/17 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 17, 2013, 5:23:20 AM6/17/13
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इलाहाबाद और बनारस कह देने से बड़ा गज़ब हुआ। बेचारे मुरादाबाद वालों का क्या हाल रहा होगा इतिहास में?

Uday Prakash

unread,
Jun 17, 2013, 8:50:27 AM6/17/13
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प्रिय रंगनाथ जी,
आपसे किसी भी कोण या दृष्टिकोण से मन-भेद होने का सवाल ही नहीं पैदा
होता। यही बात सहमत या असहमत अन्य भागीदार मित्रों के प्रति भी है।
'ब्राह्मणवाद' जब एक पद के रूप में मैं उद्धृत करता हूं, तो आशय
वर्णाश्रम व्यवस्था को सशक्त और जड़ीभूत करने वाली स्मृति-ग्रंथों की वह
परंपरा है, जो मोटे तौर पर औपनिषिदिक परंपरा से दूर बल्कि उसके विरुद्ध
जाती है। जाति के रूप में 'ब्राह्मण' , बौद्धिक और दार्शनिक-चिंतक के रूप
में इन दोनों ही परंपराओं में प्रमुख भूमिकाओं में थे, इसलिए मेरा आशय
'ब्राह्मण' की जातिगत संज्ञा को संबोधित करना नहीं था। इस बहस में भी
देखें तो इस जातिवाचक संज्ञा के रूप में वे सशक्त रूप से 'हिंदी' के
लोकतांत्रिकीकरण और उसके विकेंद्रीकरण के पक्ष में हैं। अजित जी और दिनेश
जी दोनों ही 'हिंदी' की बहुलता और उसके बदलाव के पक्ष में हैं।
लेकिन यह भी एक तथ्य हुआ करता है कि 'बहुमत' को प्रभावित करने वाली,
बदलने वाली और उसे अपने पक्ष में करने वाला केंद्र या नाभिक की तो कहीं
कोई अवस्थिति होती ही है।
बस यही कहने का प्रयास था ...और है।
आखिर दिल्ली और बवाना -आगरा के रहने वाले 'करखनदारों' की एक भाषा भी तो
हुआ करती थी, और एक ज़माने में 'रेख्ते' या 'खड़ी-बोली' की एक स्थानिकता
इस इलाके में भी थी। और उसकी भी भाषा के निर्माण-विस्तार में कम भूमिका
नहीं ही रही होगी। मिर्ज़ा गालिब भी तो मीर तकी मीर को उसी रेख्ते का
उस्ताद मानते थे। ...और रहीम, दाग और पीछे .... अमीर खुसरो ...!
भौगोलिक शिफ़्ट तो हुआ, ऐसा मुझे लगता है।
बस यही कहना है।

Rangnath Singh

unread,
Jun 17, 2013, 10:13:43 AM6/17/13
to शब्द चर्चा
उदय जी, आपकी बात पूरी तरह स्पष्ट है. मैंने अपने कमेंट में भी ब्राह्मणवाद शब्द का प्रयोग किया है.

बाकी इस मंच की सीमाओं के बारे में मैंने ऊपर जो लिखा है उसमें यह भी जोड़ना चाहूँगा कि इस विषय पर अभी मैं इतनी समझ नहीं बना पाया हूँ कि इस पर होने वाली बहस को किसी निर्णायक अंत तक पहुँचा सकूँ.

क्या नहीं है, यह कुछ हद तक समझ में आता है. क्या है, इस पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ.

सस्नेह


2013/6/17 Uday Prakash <udaypr...@gmail.com>

Uday Prakash

unread,
Jun 17, 2013, 10:36:56 PM6/17/13
to shabdc...@googlegroups.com
आभार
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