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अब यह बात तो सन्तों को ही तय करनी चाहिए। दुनिया है या दुनियाँ? नारायण जी, इस पर आपसे बहस नहीं करूँगा। असली शब्द और असली उच्चारण दुनिया ही है। आप बेशक न मानें।
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कृपया उदयप्रकाश की यह टिप्पणी पढ़ें। नारायण जी, विशेष रूप से आपके और मेरे लिए।कई बार, बल्कि लागातार मैं कहता-लिखता रहा हूं कि 'हिंदी' कोई एक मानकीकृत, सर्वानुमोदित और सर्वस्वीकृत, लोकानुमोदित भाषा नहीं है. यह एक 'हिंदी' नहीं बहुल हिंदियां है. उत्तर-भारत के कुछ परिचित केंद्रों -बनारस, इलाहाबाद या फिर इन्हीं जाने-माने केंद्रों के वर्चस्व से संचालित दिल्ली और राज्यों की अन्य राजधानियों के संस्थानों से प्रचारित 'हिंदी' आधिकारिक भले हो, वह भले ही 'राजभाषा' या कार्पोरेट भाषा का दर्जा हासिल कर ले, लेकिन 'हिंदी' की क्षेत्रीय-जनपदीय या उप-राष्ट्रीय बहुलताओं को किसी बुल्डोज़र के ज़रिये सपाट और एकात्मक नहीं बना सकती. समूचा 'जनतंत्र' इसके सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है. 'लोकतंत्र' एकात्मक, मानकीकृत, राजभाषा 'हिंदी' के सामने एक अलंघ्य बाधा है.
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दिनेश जी, आपकी बात पर इतना ही कहना चाहूँगा कि "राजस्थान और मध्यप्रदेश वालों ने देश की जैसी दुर्गति की है वैसी दुश्मन की भी न हो"
भाषा में भी जिस की लाठी उस की भैंस चलती रही है।
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भाषा में भी जिस की लाठी उस की भैंस?
(१) राष्ट्र की समस्याएं राष्ट्रीय दृष्टि बिना हल हो नहीं सकती।
(२) गोवर्धन परबत उठाने में, सभी को अपना योगदान देना चाहिए। उस गोवर्धन
परबत पर चढकर भार बढाने से परबत नहीं उठेगा।{मैं एक गुजराती बनकर, उसकी ओर
गुजराती की भलाई के लिए निर्णय में जोड तोड नहीं कर सकता।}
(३) (क) राजनितिज्ञों को, (ख) अपनी अपनी भाषाकी डफली बजानेवालों को,(ग) वोट
बॅन्क की राजनीति करने वालों को,(घ) भाषा वर्चस्ववादियों को——इत्यादि
संकुचित दृष्टिवाले लोगों को भी—
दूर रखकर विशुद्ध राष्ट्रीय दृष्टिकोण से प्रतिबद्ध ऐसे, आयोग द्वारा,तटस्थता से आकलन करके, निर्णय लिया जाए।
(४) उस निर्णय को लागू करने में रणनीति का उपयोग किया जाए; निर्णय लेने में
नहीं।
जैसे बालक को औषधि खाने के बाद, आप उसे मीठी गोली(राण नीति) देते हैं।
नीति है, बालक का स्वास्थ्य।
इस दृष्टिसे, कोई (एक या अनेक) राष्ट्रीय वृत्तिका सशक्त चिंतक, आलेख डाले।
चिन्तक प्रादेशिक निष्ठा का नहीं होना चाहिए। उसको समग्र देश की दृष्टि से देखने की आवश्यकता मानता हूँ।
पर कूटनीति निर्णय लेने में बिलकुल नहीं। लागू करने में स्वीकार्य हो।