उल्टे बाँस बरेली जाना

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V S Rawat

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Aug 27, 2010, 7:45:27 AM8/27/10
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"उल्टे बाँस बरेली जाना" क्या होता है और कहाँ से उत्पन्न हुआ?

वैसे शायद बाँसबरेली भी किसी जगह का नाम है तब यह "उल्टे बाँसबरेली जाना" हो सकता
है जो उतना कठिन या गूढ़ नहीं लगता।

रावत

ashutosh kumar

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Aug 27, 2010, 7:56:43 AM8/27/10
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बरेली  बांसों  के  लिए  मशहूर  है . बांस खूब हैं वहाँ.बांस के उत्पाद भी. वहाँ से बांस सब जगह जातें है. कोई बाहर से वहाँ बांस ले जाए ,   वैसे ही  है जैसे कोई  बरफ जाए ले  हिमालय  

Baljit Basi

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Aug 27, 2010, 8:38:23 AM8/27/10
to शब्द चर्चा
यूपी के शहर बरेली को ही बांसबरेली कहा जाता है. यहाँ बांस बहुत होते
हैं तो वहां बांस ले जाने का कोई तुक नहीं , इसी लिए निरर्थक काम के
अर्थों में यह कहावत बनी. खोज से पता चला कि बांसबरेली नाम यहाँ अधिक
बांस होने से नहीं, बल्कि यहाँ के किसी राजे के दो बेटों, बांसल देव
और बराल देव के नामों से पड़ा .
अंग्रेज़ी में भी ऐसी कहावत है to carry coals to Newcastle. जर्मन में
कहावत है taking owls to Athens समझा जाता है कि एथनअज़
के लोग बहुत अक्लमंद होते हैं इस लिए उनको और अकल देने का क्या लाभ.
हमारे उल्ट, यूरप में उल्लू को अकल्मन्द समझा जाता है. यहाँ से मैं आपको
एक और आपने मुहावरे की ओर ले जाता हूँ: अपना उलू सीधा करना. मुझे अभी तक
समझ में नहीं आया यह कैसे बना होगा. कोई समझा सकता है?
बलजीत बासी

V S Rawat

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Aug 27, 2010, 9:06:34 AM8/27/10
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On 8/27/2010 6:08 PM India Time, _Baljit Basi_ wrote:

> यूपी के शहर बरेली को ही बांसबरेली कहा जाता है. यहाँ बांस बहुत होते

बहुत सरल और सटीक उत्तर है। जितना पूछा था उससे अधिक मालूम पड़ा। धन्यवाद।

> हमारे उल्ट, यूरप में उल्लू को अकल्मन्द समझा जाता है.

वैसे हमारे यहाँ भी उल्लू खुद को अक्लमंद ही समझते हैं। ;-) ;-) ;-)

रावत

Baljit Basi

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Aug 27, 2010, 9:10:57 AM8/27/10
to शब्द चर्चा
बेटों के नाम कुछ गलत लिखे गए यह हैं: 'बंशदेव' और 'बरेलदेव'. वे राजा
जगत सिंह कोटिया के पुत्र थे . यह क़स्बा १६ वीं सदी में बसा.
बलजीत

> > जैसे कोई  बरफ जाए ले  हिमालय- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए

Abhay Tiwari

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Aug 27, 2010, 10:18:03 AM8/27/10
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'अपना उल्लू सीधा करने' की जगह फ़ैलन के मुहावरा कोष में 'अपना उल्लू कहीं नहीं
गया' दिया है.. अर्थ वही है कि कोई न कोई मिल ही जाएगा उल्लू बनाने के लिए.. या
सवारी करने के लिए.. यहाँ पर ये उल्लेखनीय है कि उल्लू लक्ष्मी जी की सवारी
है.. उल्लू पर ही बैठ कर लक्ष्मी आती हैं.. बिना उल्लू के कैसे आयेंगी.. तो
किसी एक को उनकी लिए सवारी बन कर उनके आगे का मार्ग प्रशस्त करना होगा..

इसी से मिलती बात है उल्लू बनाना.. इसे ऊपर की व्याख्या के प्रकाश में देंखेगे
तो मतलब यही निकलेगा.. किसी एक को वाहन बनना होगा.. सारा बोझा उसे ही ढोना
होगा.. मगर उसे कुछ नहीं मिलेगा..

मार्क्स ने भी पूँजी की निर्माण की ऐसी ही व्याख्या की है.. मज़दूर के मेहनताने
का एक हिस्सा पूंजीपति रख लेता है और उस से कैपिटल की रचना होती है.. तंत्र में
इसे बलि देना के समान्तर समझा जा सकता है..

Pratik Pandey

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Aug 27, 2010, 10:57:55 AM8/27/10
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"उल्लू सीधा करना" कहावत के बारे में एक बार कादम्बिनी में एक लेख प्रकाशित हुआ था। लेखक के मुताबिक़ यहाँ उल्लू से अर्थ उल्लू नामक पक्षी से नहीं है। पुराने ज़माने में खेतों में सिंचाई करने के लिए पानी की दिशा को एक "L" आकार के यंत्र से नियंत्रित किया जाता था। यह बाँस का बना होता था और इसे उल्लू कहते थे। आस-पास के खेत वाले किनारे पर लगा दूसरे का उल्लू अपने खेत में घुमा लेते थे और पानी हड़प लेते थे। इसी से कहावत बनी "उल्लू सीधा करना"।

2010/8/27 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

सुमितकुमार ओम कटारिया

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Aug 27, 2010, 11:01:00 AM8/27/10
to शब्द चर्चा
सही हवाला नहीं दे पा रहा हूँ। शायद कादम्बिनी पत्रिका में इब्बार रब्बी
के स्तंभ में ही इस पर पूरा लेख था। खेती का कोई उपकरण होता था जिसे
उल्लू ही कहते थे, और किसानों के बीच इसके ताल्लुक में मतलबीपन आ जाता
था, जिससे मतलबीपन के लिए यह मुहाविरा चल निकला। लेख में चित्र नहीं था
इसलिए जब पढ़ा था, तब भी समझ नहीं पाया था। इब्बार रब्बी "शब्दों का सफर"
जैसा स्तंभ लिखते हैं।

Baljit Basi

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Aug 27, 2010, 11:28:26 AM8/27/10
to शब्द चर्चा
आपके संकेतों से मेरा उल्लू कुछ सीधा होता नज़र आ रहा है. धन्यवाद
बलजीत बासी

> > बलजीत बासी- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

ashutosh kumar

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Aug 27, 2010, 11:54:22 AM8/27/10
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सौ टंच सही बात है. पक्षी उल्लू पहले ही इतना सीधा होता है. उसे और कोई क्या सीधा करेगा. 

Abhay Tiwari

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Aug 27, 2010, 12:56:00 PM8/27/10
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मित्रो,
ये इब्बार रब्बी के नाम से की जा रही व्याख्या मुझे निहायत खोखली लग रही है। उल्लू नाम के किसी कृषि यंत्र का नाम मैंने नहीं सुना, मैं तो खेती के बारे में कुछ नहीं जानता मगर रसाल जी को भी नहीं मालूम, अरविन्द कुमार जी को भी नहीं मालूम?  और फिर उसकी जो व्याख्या है वो भी तार्किक नहीं लगती। उसमें मुहावरे का केन्द्रीय छल भाव कहाँ है? किसका उल्लू है? सीधा कर लिया माने क्या? टेढ़ा था? टेढ़ा क्यों पड़ा था? बिलकुल नहीं जमती है बात!
 
और उल्लू को लेकर और भी कहावते हैं- १) उल्लू बनाना, २) उल्लू समझना, ३) उल्लू बोलना.. क्या इन में से किसी में उल्लू को कृषिय यंत्र की तरह लिया जा सकता है? चूंकि हम कहावत को समझ नहीं पा रहे हैं तो एक ऐसी व्याख्या पर यक़ीन कर लें जो स्वयं बहुत स्पष्ट नहीं है?
 
उल्लू सीधा करने की एक और व्याख्या पर विचार कीजिये-
 
सीधा हमेशा टेढ़े का उलटा नहीं होता। सीधा करने का अर्थ काम को साधना भी होता है, इसे सिद्ध करने का बिगड़ा रूप भी समझा जा सकता है। इस नज़रिये से कम से कम हित तो नज़र आता है जिस से छल की पैदाइश हो सकती है।  अगर इसे इसी रूप में मान लिया जाय  तो कहावत कुछ यूं दिखेगी- अपना उल्लू सिद्ध करना। इस को यहीं छोड़ दीजिये.. और अब मुहावरे के अर्थ के बराबर मुहावरे के बदले हुए रूप को रखिये-
 
किसी को बेवक़ूफ़ बना कर अपना काम निकालना = अपना उल्लू सिद्ध करना
 
काम निकालना = सिद्ध करना = सीधा करना
अपना = अपना
 
मुहावरे में बच गया उल्लू, और अर्थ में बच गया - किसी को बेवक़ूफ़ बनाकर। इनको बराबर में रखते हैं-
उल्लू = किसी को बेवक़ूफ़ बना कर = किसी को बेवक़ूफ़ बनाना
 
इस में क्या दिक़्क़त है?

Pritish Barahath

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Aug 30, 2010, 1:46:10 AM8/30/10
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आपकी बातें सही हो सकती हैं लेकिन सिद्ध नहीं हो रही हैं।
 
यहाँ उल्लू अपना है पराया नहीं है, और अपना जो सिद्ध किया जा रहा है वह उल्लू है
कहावत के अनुसार छल अनिवार्य नहीं है बिना छल के भी अपना उल्लू सीधा होता है तब भी कहावत यही  काम में ली जाती है बात सिर्फ़ इतनी है कि पर-प्रपंच में नहीं पड़कर अपने ध्येय पर ही ध्यान ज्यादा रहता है।
वैसे भी मुहावरों का शाब्दिक अर्थ नहीं होता है
और मैंने अनेकों ऐसी कहानियां सुनी हैं जिनके प्रसंग से कोई मुहावरा लोक में प्रचलित होता है
आप लक्ष्मण रेखा खींचना मुहावरे का अर्थ करने के लिये लक्ष्मण, रेखा और खींचना शब्दों के अर्थ करने बैठेंगे तो कभी इस का अर्थ नहीं पायेंगे, इसके स्थान पर आपको लक्ष्मण रेखा का प्रसंग लेना होगा।

2010/8/27 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

Abhay Tiwari

unread,
Aug 30, 2010, 1:56:08 AM8/30/10
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ठीक है प्रीतीश, लेकिन अगर किसी कोष में लक्ष्मण नाम से राम का कोई भाई न मिले तो आप क्या करेंगे? अगर आप या और कोई इसे और बेहतर जानकारी देकर सिद्ध करे तो मैं ज़रूर मान लूंगा इस कृषि यंत्र वाली व्याख्या को.. लेकिन अभी तो यह मानने योग्य नहीं है..

Abha Mishra

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Aug 30, 2010, 2:44:28 AM8/30/10
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आशुतोष कुमार से सहमत होते हुए,आगे यह कहना चाहूँगी कि यह मुहावरा होना
चाहिए था - अपना सुतुरर्मुग सीधा करना.:)

2010/8/30 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>:

--
aabha
mumbai-67

Pritish Barahath

unread,
Aug 30, 2010, 3:25:49 AM8/30/10
to shabdc...@googlegroups.com
उल्लू नाम का कृषियंत्र मैंने भी नहीं सुना है और मेरी टिप्पणी उसके समर्थन में है भी नहीं। मैं तो आपके खारिज करन के तरीके से असहमत था। वैसे उल्लू सीधा न कर पल्लू सीधा हो जाये तब भी बात तो बन जायेगी।

2010/8/30 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

ashutosh kumar

unread,
Aug 30, 2010, 9:01:48 PM8/30/10
to shabdc...@googlegroups.com


ऊंची टीप , आभाजी. 
अ. हा. (अट्टहास!)

 

Abha Mishra

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Sep 1, 2010, 3:43:15 AM9/1/10
to shabdc...@googlegroups.com
शुक्रिया , आशुतोष जी :)

2010/8/31 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>:


>
>
> ऊंची टीप , आभाजी.
> अ. हा. (अट्टहास!)
>

--
aabha
mumbai-67

ravikant

unread,
Dec 8, 2010, 2:23:10 AM12/8/10
to shabdc...@googlegroups.com
अभय,

कल मैं अपनी कन्या के साथ एकलव्य की पत्रिका /चकमक/ पढ़ रहा था, उसमें भी इब्बार रब्बी
के हवाले से इस मुहावरे को समझाया गया था। फ़र्क़ इतना है कि इस संस्करण में उल्लू ऐसी
मोटी लकड़ी का लट्ठा मालूम पड़ता है, जिसका इस्तेमाल खेत में पानी ले जाने के लिए करते थे,
जिसे चतुर-सुजान अपने खेत की सीध में कर लेते थे। कहीं उस लट्ठ को इसलिए तो उल्लू नहीं कहा
जाता था कि वो रात में जल-प्रवाह की पहरेदारी करता था?

..बस सोच रहा हूँ।

रविकान्त

> *From:* ashutosh kumar <mailto:ashuv...@gmail.com>
> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>
> *Sent:* Friday, August 27, 2010 9:24 PM
> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: उल्लू सीधा करना

anil janvijay

unread,
Dec 8, 2010, 10:33:59 AM12/8/10
to shabdc...@googlegroups.com
अभय जी की बात से एकदम सहमत हूँ। चार-पाँच साल पहले कभी मैंने भी यहाँ मास्को में अपने रूसी छात्रों को
यही व्याख्या समझाई थी। लेकिन यहाँ संतों से डर लगता है कि मैं कोई बात ऐसी न कह दूँ कि संत लोग
मुझे ही उल्लू और नादान मानने लगें। लेकिन अभय जी की ही व्याख्या हमारा उल्लू सीधा करती है।

2010/12/8 ravikant <ravi...@sarai.net>



--
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें
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सुमितकुमार ओम कटारिया

unread,
Dec 9, 2010, 1:58:08 AM12/9/10
to शब्द चर्चा
रविकांतजी, चकमक बच्चों के लिए विज्ञान की पत्रिका है। उसमें चित्र होते
हैं। क्या उस लेख में यह बात आरेख के साथ समझाई हुई है? आप उस पन्ने को
स्केन करके ला सकते हैं? दरअसल मैंने जब पढ़ा था तो मुझे समझ में नहीं
आया था।

ravikant

unread,
Dec 9, 2010, 2:09:03 AM12/9/10
to shabdc...@googlegroups.com
सुमित जी,

चकमक में आजकल सब कुछ छपता है: साहित्य, सिनेमा भी। मेरे ख़याल से उल्लू की कोई तस्वीर
नहीं छपी थी, मैं फिर से देखता हूँ, अगर कुछ मार्के की बात लगी तो स्कैन करके भेज दूँगा।

रविकान्त

Pritish Barahath

unread,
Dec 9, 2010, 7:06:44 AM12/9/10
to shabdc...@googlegroups.com
ये उल्लू तो लगता है उल्लू बनाके ही छोड़ेगा ! एसे ही लच्छन लग रहे हैं इसके ;)

2010/12/9 ravikant <ravi...@sarai.net>



--
Pritish Barahath
Jaipur

Ashutosh Kumar

unread,
Jan 25, 2011, 12:39:16 PM1/25/11
to शब्द चर्चा

अभी उस दिन भेंट हो गयी इब्बार रब्बी से. मैं पूछे बिना न रह सका की
उल्लू आखिर कैसे सीधा होता है . पता चला किला की उल्लू नामक वृक्ष अभी
हाल तक मंदी हाउस के इर्द गिर्द देखी जा सकते थे. इसी उल्लू पेड़
की लकड़ी से बनता है वह खेतों में पानी पहुंचाने वाला पाइपनुमा यंत्र ,
जो खुद भी उल्लू कहलाता है. तो जिस ने पाइप का रुख अपने खेतों की और
मोड़ लिया , उसी ने अपना उल्लू सीधा किया. अक्सर रातबिरात लोग पड़ोसी
के खेत से अपने खेत की और उस का रुख मोड़ कर अपना उल्लू सीधा कर लिया
करते है , और मुंह अँधेरे उस वापस पड़ोसी की ओर ठेल देते हैं.इस तरह खेत
पट जातें हैं और बिल पड़ोसी के नाम आता है.

अगर मुझे इंसानी भाव भंगिमा की तनिक भी पहचान है, तो वे झूठ बोलते या
सामने वाले को उल्लू बनाते से न लगे.

lalit sati

unread,
Jan 25, 2011, 12:52:12 PM1/25/11
to shabdc...@googlegroups.com


Artocarpus altilis (Hawaiian Name: ulu), लेकिन हिंदी में इसे उल्लू नहीं कहते।

हिंदी में कोई उल्लू नामक वृक्ष है क्या?

2011/1/25 Ashutosh Kumar <ashuv...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Jan 25, 2011, 1:04:32 PM1/25/11
to shabdc...@googlegroups.com
इस पर पहले भी बात हो चुकी है।

इस बार उल्लू पेड़ वाली नई है। अरलू [oroxylum indicum] नाम का एक पेड़ होता है
जिसे उल्लू भी कहा जाता है। इसका ट्र्म्पेट जैसा फूल रात को खिलता है और
चमगादडों द्वारा उसका परागण होता है। इस पेड़ को उगने के लिए इतना पानी चाहिये
होता है कि ये दिल्ली की रिज पर होता ही नहीं।

लेकिन इस के बाद की बात का सुर निहायत बेसुरा मालूम दे रहा है अब भी।
हम तो यही जानते हैं कि नहर/ नलकूप का पानी या तो पाइप से आता है या मेंड़ से।
उल्लू पेड़ की लकड़ी का ऐसा कोई उपयोग नहीं मिल रहा है, मान लीजिये अगर हो भी तो
सवाल यह है कि किस प्रदेश में ऐसा यंत्र होता है? जगह-जगह चीज़ों के नाम बदलते
हैं!
और अगर पड़ोसी के खेत से उल्लू अपने खेत की ओर मोड़ा गया तो अपना उल्लू सीधा हुआ
कि पड़ोसी का? तार्किक तो यह होगा कि उल्लू टेढ़ा कर लिया!

कोई ये नहीं कह रहा कि रब्बी साहब झूठ बोल रहे हैं.. लेकिन इसका अर्थ ये नहीं
कि वे सही ही बोल रहे हैं..

और अगर रब्बी साहब की व्युत्पत्ति सही है तो बतायें ये किस भौगोलिक क्षेत्र से
सम्बन्धित है.. वहाँ के ग्रामीण अंचल से इसका सत्यापन होते देर न लगनी चाहिये..

-


---- Original Message -----
From: "Ashutosh Kumar" <ashuv...@gmail.com>
To: "शब्द चर्चा" <shabdc...@googlegroups.com>

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jan 25, 2011, 1:42:36 PM1/25/11
to shabdc...@googlegroups.com
मुझे लगता है कि यहाँ शब्दों की व्युत्पत्ति के बीच साहित्य भी रचा जा रहा है। आखिर उल्लू  सीधा करना जगत्प्रवृत्ति बन गई है।

2011/1/25 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

अजित वडनेरकर

unread,
Jan 25, 2011, 2:58:16 PM1/25/11
to shabdc...@googlegroups.com
बहुत दिलचस्प।

2011/1/26 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Pritish Barahath

unread,
Jan 27, 2011, 6:20:30 AM1/27/11
to shabdc...@googlegroups.com
यूँ तो अभयजी कभी किसी को उल्लू नहीं बनाते हैं लेकिन ये आसानी से किसी का उल्लू सीधा भी नहीं होने देते।


 
2011/1/25 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

anil janvijay

unread,
Jan 27, 2011, 10:39:02 AM1/27/11
to shabdc...@googlegroups.com
अभय जी ! और अन्य संत !
इब्बार रब्बी इस मुहावरे को लेकर हमें उल्लू बना रहे हैं या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन रुहेलखण्ड में इस यंत्र को उल्लू ही कहा जाता है, जिसका ज़िक्र रब्बी जी ने किया है। मैंने अपने बचपन में सैंकड़ों बार लोगों को उल्लू खरीदते, उल्लू लगाते और उल्लू बेचते देखा है। मैं बरेली में रहता था और वहाँ 'किले' के इलाके में ऐसी बहुत-सी दुकानें थीं जो खेतों के लिए 'उल्लू पम्प' बेचा करती थीं। इन 'उल्लू-पम्पों' के विज्ञापन भी दुकानों पर लटके रहते थे । उल्लू का पेड़ और उल्लू की लकड़ी भी होती है । कम से कम हमारे रुहेलखंड के इलाके में तो उसका ज़िक्र बार-बार आता था।
 
कोई कारण नहीं है कि हम अपने सीमित ज्ञान के आधार पर दूसरों के द्वारा दी जाने वाली जानकारी पर संदेह व्यक्त करें। हाँ, हम ये कह सकते हैं कि हमें इसकी जानकारी नहीं है।  "उल्लू सीधा" क्यों होता है, इसकी खोज हम लोग आगे भी जारी रख सकते हैं।

सादर, सविनय

=============================
2011/1/27 Pritish Barahath <priti...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Jan 27, 2011, 11:04:40 AM1/27/11
to shabdc...@googlegroups.com
उल्लू पम्प का नाम जीवन में कभी नहीं सुना।
टुल्लू पम्प ज़रूर खूब लोकप्रिय था। लघु किसानों के बीच इसकी काफी साख थी।

खुद को बेहद पढ़ाकू (टैक्स्ट बुक्स से इतर चीजें पढ़ने में) मानने के बावजूद मुझे कोई मैग़ज़ीन उल्लू पम्प के विज्ञापन से सुशोभित नज़र नहीं आई। मेरे पास नवनीत और कादम्बिनी के सन 1962 से 64 तक की जिल्दें सुरक्षित हैं जिसमें उस दौर के अनेक विज्ञापन हैं। तब नवनीत बेहद सफल व्यावसायिक पत्रिका थी।

टुल्लू पम्प ही याद आ रहा है।

2011/1/27 anil janvijay <anilja...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Jan 27, 2011, 11:06:45 AM1/27/11
to shabdc...@googlegroups.com
मैं दूसरों द्वारा दी गई जानकारी पर आँख मूँद कर भरोसा नहीं करता। मेरी जानकारी सीमित है, तो दूसरों की भी। ज्ञान की सीमाएं सन्देह से ही तोड़ी जाती हैं। सन्देह को मानअपमान का प्रश्न न बनाया जाय.. 
 
उल्लू पेड़ की जानकारी मुझे पहले से ही है.. ज़ाहिर है उल्लू पेड़ की लकड़ी को भी उल्लू ही कहेंगे.. और उस से बने पम्प को उल्लू पम्प कहना भी तार्किक है.. लेकिन पंप जैसी नई मशीन से उल्लू सीधा करना जैसी कहावत का जन्म होना मेरे लिए अब भी संदेहास्पद है..  

Abhay Tiwari

unread,
Jan 27, 2011, 11:25:40 AM1/27/11
to shabdc...@googlegroups.com
टुल्लू तो हमारे कानपुर में आज भी लोकप्रिय है.. घर में टुल्लू का ही पम्प लगा है..
----- Original Message -----

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Jan 27, 2011, 12:20:11 PM1/27/11
to shabdc...@googlegroups.com
मेरे अल्पज्ञान के लिये क्षमा करना लेकिन ये इब्बार रब्बी महोदय कौन हैं?

२७ जनवरी २०११ ९:०९ अपराह्न को, anil janvijay <anilja...@gmail.com> ने लिखा:



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/

ashutosh kumar

unread,
Jan 27, 2011, 12:56:00 PM1/27/11
to shabdc...@googlegroups.com


अब जब अनिल जनविजय  ने उल्लू का देश गाँव  बता दिया है , तो फिर उस के सीधेपन के बारे में रब्बी  की बातों पर भरोसा किया जा सकता है. अभय तो ,लगता है,  किसी का क्या उल्लू का भी उल्लू सीधा न होने देंगे. रब्बी हिंदी के सम्मानित  समकालीन कवि हैं.

anil janvijay

unread,
Jan 28, 2011, 2:50:45 AM1/28/11
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय अजित जी! टूल्लू पम्प का जन्म ही उल्लू पम्प की प्रतिद्वन्द्विता में हुआ था। पहले तो उल्लू पम्प ही था। बाद में कोई दूसरी कम्पनी टूल्लू पम्प लेकर आई थी और यह कहती थी कि उसका पम्प उल्लू पम्प से बेहतर है ।

2011/1/27 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Jan 28, 2011, 3:14:01 AM1/28/11
to shabdc...@googlegroups.com
टुल्लू पम्प में कोई लकड़ी नहीं लगती.. न ही उसका मुँह घुमा कर सीधा या उलटा किया जा सकता है.. शायद यही उसकी बेहतरी हो  :)
 
आशुतोष चाहे जितना इब्बार रब्बी के एहतराम और भरोसे में नहाए जायें मेरा सन्देह बना हुआ है..
----- Original Message -----

Pritish Barahath

unread,
Jan 28, 2011, 5:36:20 AM1/28/11
to shabdc...@googlegroups.com
जैसा कि सर्वविदित यह चर्चा पहले भी हो चुकी है, तब तक मुझ समेत अभयजी ने भी कभी किसी उल्लू नामक कृषि यंत्र का नाम नहीं सुना था। बेचारे वे साथी जिन्होंने पहली बार यह बताया था शायद लौटकर नहीं आये। इतनी चर्चा हो जाने के बाद मुझे तो भरोसा हो चला है कि उल्लू नामक कृषि यंत्र होता होगा जो खेतों में पानी देने के काम आता होगा, शायद अभयजी ने भी बावजूद शाश्वत संदेह के यह अब मान लिया है, टुल्लू में लकड़ी होती हो या न होती हो और अब भले ही उल्लू में भी न होती हो लेकिन लेकिन पहले के उल्लू लकड़ी के होते होंगे मुझे इसका (इस पर नहीं :))संदेह है, वे सीधे-टेढ़े भी किये जाते होंगे। वावजूद संदेहशील होने के मेरी विनम्र असहमति अभयजी से इतनी ही है कि वे मुहावरों में शब्दों के प्रयोग पर बहुत व्याकरणिक कसौटी रख देते हैं, मुहावरे में शब्द अपने व्युत्पत्ति जनक अर्थों को ही वहन करते रहें जरूरी नहीं है, वे विपरीत अर्थ भी देने लग जाते हैं। आपकी तर्क पद्धति के अनुसार तो कहावत को यूं होना चाहिये -  अपना मतलब सिद्ध करना। उल्लू टेढ़ा क्यूं नहीं होता सीधा क्यों होता है ? तो मैं यह कहकर काम चला सकता हूं कि उल्लू तो हमेशा ही सीधे होते हमारी नज़र के कारण टेढ़े दिखाई पड़ते हैं, वैसे उल्लू सीधा क्यूं होता है इसकी स्थापना स्वयं अभयजी ने पूर्व-चर्चा में की थी, अब वे खुद पर भी संदेह कर रहे हैं :)
सादर
 

 
2011/1/28 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

अजित वडनेरकर

unread,
Jan 28, 2011, 6:15:23 AM1/28/11
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अनिलभाई,
मुझे यह पूरी शृंखला दिलचस्प लग रही है। आपकी कही उल्लू पम्प वाली बात पर कोई संदेह नहीं। अचरज इस बात पर कि आज तक इसका संदर्भ मुझसे कैसे छूटा!!

पश्चिमी उत्तरप्रदेश के रास्ते अपने ननिहाल हरिद्वार बचपन से अब तक गुज़रना होता आया है। गुड़ बनाने के काम आने वाला रसायन कलाली हाईड्रो जैसे दर्जनो अन्य उत्पाद दिल्ली से आगे निकलते ही सड़कों के दोनों ओर लगे इश्तेहारों में नज़र आने लगते हैं। उल्लू पम्प क्यों नहीं दिखा, अचरज इस पर है।

2011/1/28 Pritish Barahath <priti...@gmail.com>

Umesh Vats

unread,
Jan 28, 2011, 7:43:24 AM1/28/11
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यह खोज जारी  रहे तो ओर भी तार्किक व सार्थक बाते निकल कर आएंगी। वैसे मै भी 11-12 राज्यो का भ्रमण कर चुका हूं किन्तु उल्लू वम्प नही सुना , स्वयं पर आश्चर्य हो रहा है।

2011/1/28 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



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भवदीय:
उमेश प्रताप वत्स
9416966424

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