पौ

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अभय तिवारी

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Dec 24, 2010, 3:47:45 AM12/24/10
to शब्द चर्चा
सुबह होती है तो कहते हैं कि पौ फट रही है। क्या है यह पौ जो फटती है? पौ
का एक और अर्थ एक की संख्या भी है। पांसों में जब एक का आंकड़ा आता है तो
उसे भी पौ ही कहा जाता है।
संतजन विवेचना करें!

Baljit Basi

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Dec 24, 2010, 8:51:28 AM12/24/10
to शब्द चर्चा
यह शायद प्रभा से ही बना है. वैसे प्लेटस इसे अप+उषाः बताता है.

Baljit Basi

unread,
Dec 24, 2010, 8:55:40 AM12/24/10
to शब्द चर्चा
फटने का भाव तो अंग्रेज़ी में भी है जैसे: Daybreak, crack of dawn.

> > संतजन विवेचना करें!- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए

अजित वडनेरकर

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Dec 24, 2010, 9:24:53 AM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
हिन्दी शब्दसागर में पौ के लिए पादः या प्रभा का हवाला दिया है। संस्कृत में उगने के संदर्भ में अनेक स्थानों पर पाद का प्रयोग किरण या रश्मियों के रूप में हुआ है। जबकि उप् + उषः से उपौष या उपोष जैसे किसी पद की निर्मिति होनी चाहिए तब उसका पौ रूप सामने आएगा। मुझे ऐसे किसी शब्द का संदर्भ नहीं मिला है। उप् उषः की बजाय पाद पाय पाव के क्रम में पौ की व्युत्पत्ति अधिक संभाव्य है क्योंकि पाद का संदर्भ किरण या उगने के अर्थ में कई स्थानों पर है।



2010/12/24 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Baljit Basi

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Dec 24, 2010, 9:45:13 AM12/24/10
to शब्द चर्चा
टर्नर इसकी व्युत्पति प्रभा से मानता लगता है. प्राकृत में आगे पभा और
पहा हैं. पंजाबी में पहु है.

On 24 दिस., 09:24, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> हिन्दी शब्दसागर में पौ के लिए *पादः* या *प्रभा* का हवाला दिया है। संस्कृत
> में उगने के संदर्भ में अनेक स्थानों पर *पाद* का प्रयोग किरण या रश्मियों के
> रूप में हुआ है। जबकि *उप् + उषः* से उपौष या उपोष जैसे किसी पद की निर्मिति


> होनी चाहिए तब उसका पौ रूप सामने आएगा। मुझे ऐसे किसी शब्द का संदर्भ नहीं मिला

> है। उप् उषः की बजाय *पाद पाय पाव* के क्रम में* पौ *की व्युत्पत्ति अधिक


> संभाव्य है क्योंकि पाद का संदर्भ किरण या उगने के अर्थ में कई स्थानों पर है।
>

> 2010/12/24 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>


>
> > फटने का भाव तो अंग्रेज़ी में भी है जैसे: Daybreak, crack of dawn.
>
> > On 24 दिस., 08:51, Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com> wrote:
> > > यह शायद प्रभा से ही बना है. वैसे प्लेटस इसे अप+उषाः बताता है.
>
> > > On 24 दिस., 03:47, अभय तिवारी <abhay...@gmail.com> wrote:
>
> > > > सुबह होती है तो कहते हैं कि पौ फट रही है। क्या है यह पौ जो फटती है? पौ
> > > > का एक और अर्थ एक की संख्या भी है। पांसों में जब एक का आंकड़ा आता है तो
> > > > उसे भी पौ ही कहा जाता है।
> > > > संतजन विवेचना करें!- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> > > उद्धृत पाठ दिखाए
>
> --
> शुभकामनाओं सहित

> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/

Abhay Tiwari

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Dec 24, 2010, 9:52:29 AM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
एक संख्या के अर्थ में भी एक पाद यानी एक घर चलने की बात सटीक मालूम देती है।

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 24, 2010, 10:05:06 AM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
ठीक बात है बलजीत भाई,
प्रभा से ही सर्वाधिक निकटतम है पौ।

2010/12/24 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

अजित वडनेरकर

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Dec 24, 2010, 10:28:07 AM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
मैं लिखना चाहता था कि  प्रभा से पौ की व्युत्पत्ति भी तार्किक है। मगर तत्काल जवाब देने और फंसे होने के चलते वाक्य यूँ बना प्रभा से ही सर्वाधिक निकटतम है पौ।
आगे से ध्यान रखूंगा

2010/12/24 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
360.gif

Abhay Tiwari

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Dec 24, 2010, 11:00:14 AM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
ये दिलचस्प है कि एक पौ की व्युत्पत्ति प्रभा से और दूसरे की पाद से होती दिख रही है।

Baljit Basi

unread,
Dec 24, 2010, 12:02:02 PM12/24/10
to शब्द चर्चा
पौ का संबंध संस्कृत *प्रहा से लगता है जिस का मतलब पासे की जीत वाली
फेंक होता है. हम पौ बारां कहते हैं. प्रहा = प्र+ हा

On 24 दिस., 11:00, "Abhay Tiwari" <abhay...@gmail.com> wrote:
> ये दिलचस्प है कि एक पौ की व्युत्पत्ति प्रभा से और दूसरे की पाद से होती दिख रही है।
>
>
>
>   ----- Original Message -----
>   From: अजित वडनेरकर
>   To: shabdc...@googlegroups.com
>   Sent: Friday, December 24, 2010 8:35 PM
>   Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: पौ
>
>   ठीक बात है बलजीत भाई,
>   प्रभा से ही सर्वाधिक निकटतम है पौ।
>

>   2010/12/24 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

>  http://shabdavali.blogspot.com/- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

Abhay Tiwari

unread,
Dec 24, 2010, 12:07:54 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
पौ बारह में अगर पौ का अर्थ यहाँ पाद से लें तो कहा जाएगा कि बारह पाद आए जो कि
दो पांसो में आने वाला अधिकतम आँकड़ा है। चौपड़ या और भी किसी दूसरे बोर्ड गेम
में गोटी चलती हैं, उनके पैर होते हैं यानी पाद। इसलिए मुझे एक वाले पौ की
व्युत्पत्ति पाद से एकदम सही लग रही है।

आप के द्वारा बताए प्र+हा का अर्थ मैं समझ नहीं पा रहा।

----- Original Message -----
From: "Baljit Basi" <balji...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 24, 2010, 12:07:57 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
हिन्दी बोलियों के विशाल अंचल में पुह, पोह जैसे रूपों की उपस्थिति खोजी जा सके तब प्रभा से इसकी व्युत्पत्ति पुष्ट हो सकेगी। पंजाबी का पहु इसे पुष्ट कर रहा है कि पौ के पीछे प्रभा है। मगर हिन्दी शब्दसागर के अनुसार पाद -पाय -पाव से पौ की व्युत्पत्ति भी तार्किक है। पाव का अगला रूप निश्चित ही पौ बनेगा। मगर दिक्कत ये है कि पाद के पाय और पाव जैसे रूपों का चलन पैर के लिए तो मराठी समेत कई बोलियों में है किन्तु सुबह, रोशनी, किरण या प्रभात के अर्थ में इनका प्रयोग मेरे देखने में नहीं आया। इस तरह प्रभा के पक्ष में पंजाबी के पुह वाला साक्ष्य तो है ही।

2010/12/24 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 24, 2010, 12:10:27 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
अलबत्ता पाद से दूसरे पौ की व्युत्पत्ति मज़बूत है। जैसा की अभय भाई को भी लग रहा है।

2010/12/24 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
हिन्दी बोलियों के विशाल अंचल में पुह, पोह जैसे रूपों की उपस्थिति खोजी जा सके तब प्रभा से इसकी व्युत्पत्ति पुष्ट हो सकेगी। पंजाबी का पहु इसे पुष्ट कर रहा है कि पौ के पीछे प्रभा है। मगर हिन्दी शब्दसागर के अनुसार पाद -पाय -पाव से पौ की व्युत्पत्ति भी तार्किक है। पाव का अगला रूप निश्चित ही पौ बनेगा। मगर दिक्कत ये है कि पाद के पाय और पाव जैसे रूपों का चलन पैर के लिए तो मराठी समेत कई बोलियों में है किन्तु सुबह, रोशनी, किरण या प्रभात के अर्थ में इनका प्रयोग मेरे देखने में नहीं आया। इस तरह प्रभा के पक्ष में पंजाबी के पुह वाला साक्ष्य तो है ही।

Baljit Basi

unread,
Dec 24, 2010, 12:49:36 PM12/24/10
to शब्द चर्चा
मैंने संस्कृत में इसके ऐसे रूप की मौजूदगी बताई है और इस के आगे मेरा
अनुमान है. मोनिएर विलिअम्ज़ : प्रहा - A good throw at dice, any gain
or advantage. (= प्र-हन्तृ)
इस को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि पुराने ज़माने में यह खेल कैसे
खेली जाती होगी. अगर प्रभा से पौ बन सकता है तो प्रहा से तो बन ही सकता
है.

On 24 दिस., 12:10, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> अलबत्ता पाद से दूसरे पौ की व्युत्पत्ति मज़बूत है। जैसा की अभय भाई को भी लग
> रहा है।
>

> 2010/12/24 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > हिन्दी बोलियों के विशाल अंचल में पुह, पोह जैसे रूपों की उपस्थिति खोजी जा
> > सके तब प्रभा से इसकी व्युत्पत्ति पुष्ट हो सकेगी। पंजाबी का पहु इसे पुष्ट कर
> > रहा है कि पौ के पीछे प्रभा है। मगर हिन्दी शब्दसागर के अनुसार पाद -पाय -पाव
> > से पौ की व्युत्पत्ति भी तार्किक है। पाव का अगला रूप निश्चित ही पौ बनेगा। मगर
> > दिक्कत ये है कि पाद के पाय और पाव जैसे रूपों का चलन पैर के लिए तो मराठी समेत
> > कई बोलियों में है किन्तु सुबह, रोशनी, किरण या प्रभात के अर्थ में इनका प्रयोग
> > मेरे देखने में नहीं आया। इस तरह प्रभा के पक्ष में पंजाबी के पुह वाला साक्ष्य
> > तो है ही।
>

> > 2010/12/24 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
> >  ये दिलचस्प है कि एक पौ की व्युत्पत्ति प्रभा से और दूसरे की पाद से होती
> >> दिख रही है।
>
> >> ----- Original Message -----

> >> *From:* अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
> >> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> >> *Sent:* Friday, December 24, 2010 8:35 PM
> >> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: पौ


>
> >> ठीक बात है बलजीत भाई,
> >> प्रभा से ही सर्वाधिक निकटतम है पौ।
>

> >> 2010/12/24 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> >> *अजित*


> >>http://shabdavali.blogspot.com/
>
> > --
> > शुभकामनाओं सहित

> > *अजित*


> >http://shabdavali.blogspot.com/
>
> --
> शुभकामनाओं सहित

> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

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Dec 24, 2010, 1:06:59 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
बलजीत भाई की बात में दम है क्योंकि फेंकने के अर्थ में पासा शब्द की व्युत्पत्ति हिन्दी शब्दसागर पाशक से बता रहा है। पाशक वह गोटी है जिस पर बिन्दियों के जरिये मान निर्धारित होता है।

2010/12/24 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
मैंने संस्कृत में इसके ऐसे रूप की मौजूदगी बताई है और इस के आगे मेरा
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

अजित वडनेरकर

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Dec 24, 2010, 1:13:05 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
मगर गोटी या चाल के अर्थ में जो व्यंजना पाद में नजर आ रही है उसमें भी वज़न है। बारह का पासा पड़ना के अर्थ में पौ बारह ठीक है। यहां पासे से ही तात्पर्य है। पासा फेंकना के अर्थ में प्रहा क्रिया पर विचार कर सकते हैं अभय भाई?

2010/12/24 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Baljit Basi

unread,
Dec 24, 2010, 1:16:49 PM12/24/10
to शब्द चर्चा
शायद पासे में लगे निशानों के 'अच्छा मिल्न' का अर्थ है, जैसे ज्योतिष
में लगन होता है. आप पासे के निशानों की तरफ जाएँ , पांव की तरफ नहीं.

> >> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

Abhay Tiwari

unread,
Dec 24, 2010, 1:21:34 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
रसाल जी के कोष में दोनों पौ का सम्बन्ध पाद से बताया है।

Abhay Tiwari

unread,
Dec 24, 2010, 1:24:57 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
पौ का अर्थ 'एक' ही है। किसी भी अच्छे दाँव को पौ नहीं कहते। पौ बारह ज़रूर बहुत
अच्छा दाँव है क्योंकि वह वैसे ही जैसे छक्का। इस नज़र से [इस] पौ का अर्थ पाद
से नज़दीक़ बैठता है।

----- Original Message -----
From: "Baljit Basi" <balji...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 24, 2010, 3:14:25 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
पौ का अर्थ निश्चित ही एक है। हमारे मालवा में अष्टा चंगा पै या अष्टा चंगा पौ खेला जाता है जिसमें पौ का अर्थ एक ही है। पद से पौ की यह रिश्तेदारी तो दिख रही है। पौ बारह की व्याख्या इस पौ यानी एक के संदर्भ में होनी चाहिए। एक बात और । गोटी में एक से छह तक ही बिन्दियाँ होती हैं क्योंकि गोटी के छह आयाम ही होते हैं।  सो इस गोटी से बारह का रिश्ता नहीं जुड़ता। पौ बारह वाली पौ में तो पाद ही समाया है, ऐसा लगता है। अब इसके बारह पर विचार करना चाहिए।

कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी खास अंक के आने पर खिलाड़ी को दो बार पासा खेलने का अवसर मिलता था। आमतौर पर चंगा यानी चार आने पर दो बार चांस मिलता था या छह आने पर एक चांस और मिलता था। अगर अगली चाल में भी चंगा या छक्का आया तो फिर खेलने को मिलता और और खिलाड़ी के अंक बढ़ते जाते। इसे मुगल काल में फारसी प्रभाव से पौ बारहा कहा गया होगा अर्थात ऐसी चाल जो बार बार मिले, बारहा मिले। बाद में यह पौ बारह हो गई। एक बात सूझी है। विचार करें। यहां बारह का  संदर्भ भी तार्किक लग रहा है और पौ का रिश्ता पाद से भी बना हुआ  है।


2010/12/24 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
पौ का अर्थ 'एक' ही है। किसी भी अच्छे दाँव को पौ नहीं कहते। पौ बारह ज़रूर बहुत अच्छा दाँव है क्योंकि वह वैसे ही जैसे छक्का। इस नज़र से [इस] पौ का अर्थ पाद से नज़दीक़ बैठता है।
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

Baljit Basi

unread,
Dec 24, 2010, 3:28:42 PM12/24/10
to शब्द चर्चा
एक खेल में गोटी के चार पासे होते थे और उन में एक से चार चार तक अक्ष
(निशान) होते थे. इसका मतलब चार अक्षों वाली फेंक सब से बड़ी थी . इस
खेल में तीन गोटियाँ फेंकी जाती थीं या एक ही गोटी को तीन बार फेंका जाता
था. स्पष्ट है कि अगर तीन बार चार चार अक्ष ऊपर आ गाए तो उन की संख्या
बारह बनेगी.

On 24 दिस., 15:14, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> पौ का अर्थ निश्चित ही एक है। हमारे मालवा में अष्टा चंगा पै या अष्टा चंगा पौ
> खेला जाता है जिसमें पौ का अर्थ एक ही है। पद से पौ की यह रिश्तेदारी तो दिख
> रही है। पौ बारह की व्याख्या इस पौ यानी एक के संदर्भ में होनी चाहिए। एक बात
> और । गोटी में एक से छह तक ही बिन्दियाँ होती हैं क्योंकि गोटी के छह आयाम ही
> होते हैं।  सो इस गोटी से बारह का रिश्ता नहीं जुड़ता। पौ बारह वाली पौ में तो
> पाद ही समाया है, ऐसा लगता है। अब इसके बारह पर विचार करना चाहिए।
>
> कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी खास अंक के आने पर खिलाड़ी को दो बार पासा खेलने का
> अवसर मिलता था। आमतौर पर चंगा यानी चार आने पर दो बार चांस मिलता था या छह आने
> पर एक चांस और मिलता था। अगर अगली चाल में भी चंगा या छक्का आया तो फिर खेलने

> को मिलता और और खिलाड़ी के अंक बढ़ते जाते। इसे मुगल काल में फारसी प्रभाव से *पौ
> बारहा* कहा गया होगा अर्थात ऐसी चाल जो बार बार मिले, *बारहा* मिले। बाद में यह
> *पौ बारह* हो गई। एक बात सूझी है। विचार करें। यहां बारह का  संदर्भ भी तार्किक


> लग रहा है और पौ का रिश्ता पाद से भी बना हुआ  है।
>

> 2010/12/24 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
>
>
> > पौ का अर्थ 'एक' ही है। किसी भी अच्छे दाँव को पौ नहीं कहते। पौ बारह ज़रूर
> > बहुत अच्छा दाँव है क्योंकि वह वैसे ही जैसे छक्का। इस नज़र से [इस] पौ का अर्थ
> > पाद से नज़दीक़ बैठता है।
>

> > ----- Original Message ----- From: "Baljit Basi" <baljit_b...@yahoo.com>

> >>> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/-उद्धृत पाठ छिपाएँ -


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> ...
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अजित वडनेरकर

unread,
Dec 24, 2010, 3:35:35 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
यह भी सही है। हमने भी दो गोटियों से खेला है। इस तरह अगर दोनों ही गोटियां छह का अंक ले आएं तो पौ बारह तो हो गई
ये पौ बारह मज़ेदार होता जा रहा है। किसी खेल की तरह ही।

2010/12/25 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/
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Baljit Basi

unread,
Dec 24, 2010, 4:38:31 PM12/24/10
to शब्द चर्चा
जर्मन के Heinrich Luders नामक भाषाविज्ञानी ने भारत की पांसे वाली
खेलों पर शोध किया है. लेकिन यह जर्मन में होगा. मुझे नहीं पता इसका
अंग्रेज़ी अनुवाद है या नहीं. अगर आप उसका कहीं से अंग्रेज़ी रूपांतरण
हासिल कर सकें तो आपको शब्दों और मुहावरों का खज़ाना मिल सकता है. बहरहाल
इस का संक्षिप्तत यहाँ देखें :
http://www.mahabharata-resources.org/ola/dice.game.pdf


On 24 दिस., 15:35, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> यह भी सही है। हमने भी दो गोटियों से खेला है। इस तरह अगर दोनों ही गोटियां छह

> का अंक ले आएं तो पौ बारह तो हो गई[?]


> ये पौ बारह मज़ेदार होता जा रहा है। किसी खेल की तरह ही।
>

> 2010/12/25 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> ...
>
> और पढ़ें »
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Abhay Tiwari

unread,
Dec 24, 2010, 9:03:06 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
ये शोध तो दिलचस्प है..

ashutosh kumar

unread,
Dec 24, 2010, 9:20:48 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com


हमारी तो पौ बारह , संतों!

Laxman Bisht

unread,
Dec 24, 2010, 10:03:35 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
वाकई बहुत सारी नई जानकारिया मिली. धन्यवाद. 

2010/12/25 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>



हमारी तो पौ बारह , संतों!



--
L. S Bisht, Batrohi
Former Head of Hindi Dept and Dean, Faculty of Arts, Kumaon University,
Director, Mahadevi Verma Srijan Peeth,
Kumaon University,Ramgarh, Nainital.
Ph# 05942-281283(O), 09412084322(M)




दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Dec 24, 2010, 10:09:27 PM12/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
अजित भाई,
ये 'चंगा पौ' तो हमने भी बहुत खेला है। इस में पासे के स्थान पर इमली के बीजों को बीच से चीर कर बनाई गई चार आधी चितारों का उपयोग किया जाता है, जो एक और से काली और दूसरी ओर सफेद होती हैं। यदि एक सफेद और तीन काली चितार खुलती है तो यह दाँव पौ कहलाता है। खेल में पौ का महत्व यह है कि उस के बिना आप का दाँव आरंभ नहीं हो सकता। यानी अगर दो या तीन चितार सफेद खुलती हैं तो वह दो या तीन घर आप की गोटी को चला सकती है लेकिन आरंभिक घर से निकाल नहीं सकती। चार काली चितार का अर्थ है चंगा+पौ अर्थात चार व एक पौ इसी तरह चार सफेद चितार खुलने का अर्थ है (अष्टाह) आठ+पौ चूँ कि चंगा और अष्टाह के साथ पौ जु़ड़ी हुई हैं इस कारण से इस से आप की गोटी आरंभिक घर से निकल सकती हैं। यदि आप के चंगा या अष्टाह की चितारें खुलती हैं तो आप को एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता है। यदि एक बार चंगा, फिर अष्टाह खुलता है फिर एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता है। इस मौके को हम "पौ बारह" कहा करते थे।
यदि इस खेल के मुताबिक पौ पर विचार करें तो लगता है कि पौ वह कदम है जो आरंभिक घर के बाहर आने का अवसर देता है। इसी तरह सुबह के समय रात के अंधेरे को चीर कर निकली पहली किरण को हम पौ फटना कह सकते हैं। इस तरह पौ केवल पाद नहीं है अपितु घर से बाहर निकलने को रखा गया पहला कदम अर्थात प्रथम पाद है। इसे लक्ष्य की ओर रखा गया प्रथम पाद भी कहा जा सकता है।

2010/12/25 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>



हमारी तो पौ बारह , संतों!



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 25, 2010, 2:43:58 AM12/25/10
to shabdc...@googlegroups.com
आपकी विवेचना से सहमत हूँ दिनेशजी।

2010/12/25 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 25, 2010, 2:52:52 AM12/25/10
to shabdc...@googlegroups.com
हेनरिख़ लुडर्स का शोध दिलचस्प है। पूरा इंटरनेट आर्काइव्ज पर मौजूद है।

2010/12/25 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Baljit Basi

unread,
Dec 25, 2010, 3:06:40 AM12/25/10
to शब्द चर्चा
आप का विवेचन तो बहुत अच्छा है लेकिन परिणाम मुझे ठीक नहीं लगता. आप एक
काविमई ढंग से दोनों पौ को जोड़ रहे हैं. फिर भी आपकी व्याख्या
मूल्यवान है. पंजाबी में एक मुहावरा है, शायद हिन्दी में भी हो, अठो-अठ
मारना ( हिन्दी में आठो आठ मारना, या आठ के आठ मारना, हो सकता है) जिस का
मतलब सब कुछ जीत लेना अर्थात बहुत लाभकारी स्थिति में होना होता है. आप
की विवेचना से इसका अर्थ खुलता है. एक तीन काने भी होते हैं जो ठुस होते
हैं. पंजाबी में एक और मुहावरा होता है, न तीनों में न तेरों (तेरह) में
अर्थात जो किसी गिनती में न हो.पांसे की बहुत तरह की खेलें हैं. शब्द या
मुहावरे एक दूसरे में खल्त-मलत हो जाते हैं.अच्छा मौका है अगर संत जन ऐसे
ही और शब्द सुझाएँ.

On 24 दिस., 22:09, दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com> wrote:
> अजित भाई,
> ये 'चंगा पौ' तो हमने भी बहुत खेला है। इस में पासे के स्थान पर इमली के बीजों
> को बीच से चीर कर बनाई गई चार आधी चितारों का उपयोग किया जाता है, जो एक और से
> काली और दूसरी ओर सफेद होती हैं। यदि एक सफेद और तीन काली चितार खुलती है तो यह
> दाँव पौ कहलाता है। खेल में पौ का महत्व यह है कि उस के बिना आप का दाँव आरंभ
> नहीं हो सकता। यानी अगर दो या तीन चितार सफेद खुलती हैं तो वह दो या तीन घर आप
> की गोटी को चला सकती है लेकिन आरंभिक घर से निकाल नहीं सकती। चार काली चितार का
> अर्थ है चंगा+पौ अर्थात चार व एक पौ इसी तरह चार सफेद चितार खुलने का अर्थ है
> (अष्टाह) आठ+पौ चूँ कि चंगा और अष्टाह के साथ पौ जु़ड़ी हुई हैं इस कारण से इस
> से आप की गोटी आरंभिक घर से निकल सकती हैं। यदि आप के चंगा या अष्टाह की
> चितारें खुलती हैं तो आप को एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता है। यदि एक
> बार चंगा, फिर अष्टाह खुलता है फिर एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता है। इस
> मौके को हम "पौ बारह" कहा करते थे।
> यदि इस खेल के मुताबिक पौ पर विचार करें तो लगता है कि पौ वह कदम है जो आरंभिक
> घर के बाहर आने का अवसर देता है। इसी तरह सुबह के समय रात के अंधेरे को चीर कर

> निकली पहली किरण को हम पौ फटना कह सकते हैं। *इस तरह पौ केवल पाद नहीं है अपितु
> घर से बाहर निकलने को रखा गया पहला कदम अर्थात प्रथम पाद है। *इसे लक्ष्य की ओर


> रखा गया प्रथम पाद भी कहा जा सकता है।
>

> 2010/12/25 ashutosh kumar <ashuvand...@gmail.com>


>
>
>
> > हमारी तो पौ बारह , संतों!
>
> --
> दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,

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> खंबा <http://teesarakhamba.blogspot.com/>*

anil janvijay

unread,
Dec 25, 2010, 8:13:29 AM12/25/10
to shabdc...@googlegroups.com
दिनेश जी,
आपकी बात एकदम ठीक है। मैं भी करीब-करीब यही बात कहना चाहता था । लेकिन 'चितार' शब्द याद नहीं आ रहा था। अट्ठाईस बरस से रूस में हूँ, इस तरह के बहुत से शब्द भूल गया हूँ। 'चंगा-पौ' बचपन में हमारा प्रिय खेल होता था। 

2010/12/25 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>



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सुमितकुमार ओम कटारिया

unread,
Dec 25, 2010, 11:02:40 PM12/25/10
to शब्द चर्चा
इधर हमारे दो सदस्य नारायणजी और सुयश सुप्रभ जर्मन जानते हैं।

ravikant

unread,
Dec 27, 2010, 4:59:40 AM12/27/10
to shabdc...@googlegroups.com
जो कड़ी आई उसमें कौड़ियों का ज़िक्र भी है। हम भी बचपन में 'पचीसी' खेला करते थे,
कौड़ियों से ही, जो चौपड़-जैसा ही बिसाती खेल होता था। छ: कौड़ियाँ होती थीं, जिनके
चित या पट से पाँसे का मूल्य तय होता था। पचीसी नाम शायद इसलिए पड़ा क्योंकि पच्चीस
का सबसे बड़ा दान/दाँव होता था। पच्चीस या दस के दान आने पर 'पह'(एक और दाँव, एक
अतिरिक्त प्वॉइंट) मिलता था, जबकि दो, तीन, चार, छ: या बारह पर नहीं। सारी
कौड़ियाँ पट होने पर आपको छ: मिलते थे, जबकि सारी चित होने पर बारह, पाँच पट और एक
चित से दस, और एक पट, पाँच चित से पचीस। जैसा कि दिनेश जी ने फ़रमाया, पह से आपकी
गोटी पैदा होती थी, या फिर लाल, अगर 'कंठ' में जा अटकी है तो। लेकिन आप पह से एक
घर चल भी सकते थे, जैसे कि 'पह चीरा ओवार दस', यानि पह से चीरा आ गए और दस से एक
और चीरा पहुँच गए, जो उस चीरे के ठीक सामने होता था, जैसा कि लूडो में होता है, हलाँकि
लूडो में इस दूरी में दस से कम घर होते हैं। लूडो जैसे ही, चीरे में आपकी गोटी वध से सुरक्षित
होती थी।

काफ़ी मज़ेदार रहा ये, शुक्रिया। पचीसी हम मगही में ही खेलते थे। ये खेल आम तौर पर बरसात
के दिनों में खेला जाता था, और माना ये जाता था कि बारिश लंबी खिंच जाए तो उसे रोकने
के लिए पचीसी खेलना सबसे कारगर उपाय है।

रविकान्त

anil janvijay wrote:
> दिनेश जी,
> आपकी बात एकदम ठीक है। मैं भी करीब-करीब यही बात कहना चाहता था । लेकिन
> 'चितार' शब्द याद नहीं आ रहा था। अट्ठाईस बरस से रूस में हूँ, इस तरह के बहुत
> से शब्द भूल गया हूँ। 'चंगा-पौ' बचपन में हमारा प्रिय खेल होता था।
>
> 2010/12/25 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com

> <mailto:drdwi...@gmail.com>>


>
> अजित भाई,
> ये 'चंगा पौ' तो हमने भी बहुत खेला है। इस में पासे के स्थान पर इमली के बीजों को
> बीच से चीर कर बनाई गई चार आधी चितारों का उपयोग किया जाता है, जो एक और
> से काली और दूसरी ओर सफेद होती हैं। यदि एक सफेद और तीन काली चितार खुलती है
> तो यह दाँव पौ कहलाता है। खेल में पौ का महत्व यह है कि उस के बिना आप का दाँव
> आरंभ नहीं हो सकता। यानी अगर दो या तीन चितार सफेद खुलती हैं तो वह दो या
> तीन घर आप की गोटी को चला सकती है लेकिन आरंभिक घर से निकाल नहीं सकती।
> चार काली चितार का अर्थ है चंगा+पौ अर्थात चार व एक पौ इसी तरह चार सफेद
> चितार खुलने का अर्थ है (अष्टाह) आठ+पौ चूँ कि चंगा और अष्टाह के साथ पौ जु़ड़ी हुई
> हैं इस कारण से इस से आप की गोटी आरंभिक घर से निकल सकती हैं। यदि आप के चंगा
> या अष्टाह की चितारें खुलती हैं तो आप को एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता
> है। यदि एक बार चंगा, फिर अष्टाह खुलता है फिर एक बार चितारें फैंकने का अवसर
> मिलता है। इस मौके को हम "पौ बारह" कहा करते थे।
> यदि इस खेल के मुताबिक पौ पर विचार करें तो लगता है कि पौ वह कदम है जो
> आरंभिक घर के बाहर आने का अवसर देता है। इसी तरह सुबह के समय रात के अंधेरे को

> चीर कर निकली पहली किरण को हम पौ फटना कह सकते हैं। *इस तरह पौ केवल पाद


> नहीं है अपितु घर से बाहर निकलने को रखा गया पहला कदम अर्थात प्रथम पाद है।

> *इसे लक्ष्य की ओर रखा गया प्रथम पाद भी कहा जा सकता है।
>
> 2010/12/25 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com
> <mailto:ashuv...@gmail.com>>


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>
> हमारी तो पौ बारह , संतों!
>
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