> > संतजन विवेचना करें!- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए
On 24 दिस., 09:24, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> हिन्दी शब्दसागर में पौ के लिए *पादः* या *प्रभा* का हवाला दिया है। संस्कृत
> में उगने के संदर्भ में अनेक स्थानों पर *पाद* का प्रयोग किरण या रश्मियों के
> रूप में हुआ है। जबकि *उप् + उषः* से उपौष या उपोष जैसे किसी पद की निर्मिति
> होनी चाहिए तब उसका पौ रूप सामने आएगा। मुझे ऐसे किसी शब्द का संदर्भ नहीं मिला
> है। उप् उषः की बजाय *पाद पाय पाव* के क्रम में* पौ *की व्युत्पत्ति अधिक
> संभाव्य है क्योंकि पाद का संदर्भ किरण या उगने के अर्थ में कई स्थानों पर है।
>
> 2010/12/24 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
>
> > फटने का भाव तो अंग्रेज़ी में भी है जैसे: Daybreak, crack of dawn.
>
> > On 24 दिस., 08:51, Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com> wrote:
> > > यह शायद प्रभा से ही बना है. वैसे प्लेटस इसे अप+उषाः बताता है.
>
> > > On 24 दिस., 03:47, अभय तिवारी <abhay...@gmail.com> wrote:
>
> > > > सुबह होती है तो कहते हैं कि पौ फट रही है। क्या है यह पौ जो फटती है? पौ
> > > > का एक और अर्थ एक की संख्या भी है। पांसों में जब एक का आंकड़ा आता है तो
> > > > उसे भी पौ ही कहा जाता है।
> > > > संतजन विवेचना करें!- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> > > उद्धृत पाठ दिखाए
>
> --
> शुभकामनाओं सहित
> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/


On 24 दिस., 11:00, "Abhay Tiwari" <abhay...@gmail.com> wrote:
> ये दिलचस्प है कि एक पौ की व्युत्पत्ति प्रभा से और दूसरे की पाद से होती दिख रही है।
>
>
>
> ----- Original Message -----
> From: अजित वडनेरकर
> To: shabdc...@googlegroups.com
> Sent: Friday, December 24, 2010 8:35 PM
> Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: पौ
>
> ठीक बात है बलजीत भाई,
> प्रभा से ही सर्वाधिक निकटतम है पौ।
>
> 2010/12/24 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
> http://shabdavali.blogspot.com/- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
आप के द्वारा बताए प्र+हा का अर्थ मैं समझ नहीं पा रहा।
----- Original Message -----
From: "Baljit Basi" <balji...@yahoo.com>
हिन्दी बोलियों के विशाल अंचल में पुह, पोह जैसे रूपों की उपस्थिति खोजी जा सके तब प्रभा से इसकी व्युत्पत्ति पुष्ट हो सकेगी। पंजाबी का पहु इसे पुष्ट कर रहा है कि पौ के पीछे प्रभा है। मगर हिन्दी शब्दसागर के अनुसार पाद -पाय -पाव से पौ की व्युत्पत्ति भी तार्किक है। पाव का अगला रूप निश्चित ही पौ बनेगा। मगर दिक्कत ये है कि पाद के पाय और पाव जैसे रूपों का चलन पैर के लिए तो मराठी समेत कई बोलियों में है किन्तु सुबह, रोशनी, किरण या प्रभात के अर्थ में इनका प्रयोग मेरे देखने में नहीं आया। इस तरह प्रभा के पक्ष में पंजाबी के पुह वाला साक्ष्य तो है ही।
On 24 दिस., 12:10, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> अलबत्ता पाद से दूसरे पौ की व्युत्पत्ति मज़बूत है। जैसा की अभय भाई को भी लग
> रहा है।
>
> 2010/12/24 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
>
>
>
>
> > हिन्दी बोलियों के विशाल अंचल में पुह, पोह जैसे रूपों की उपस्थिति खोजी जा
> > सके तब प्रभा से इसकी व्युत्पत्ति पुष्ट हो सकेगी। पंजाबी का पहु इसे पुष्ट कर
> > रहा है कि पौ के पीछे प्रभा है। मगर हिन्दी शब्दसागर के अनुसार पाद -पाय -पाव
> > से पौ की व्युत्पत्ति भी तार्किक है। पाव का अगला रूप निश्चित ही पौ बनेगा। मगर
> > दिक्कत ये है कि पाद के पाय और पाव जैसे रूपों का चलन पैर के लिए तो मराठी समेत
> > कई बोलियों में है किन्तु सुबह, रोशनी, किरण या प्रभात के अर्थ में इनका प्रयोग
> > मेरे देखने में नहीं आया। इस तरह प्रभा के पक्ष में पंजाबी के पुह वाला साक्ष्य
> > तो है ही।
>
> > 2010/12/24 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
> > ये दिलचस्प है कि एक पौ की व्युत्पत्ति प्रभा से और दूसरे की पाद से होती
> >> दिख रही है।
>
> >> ----- Original Message -----
> >> *From:* अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
> >> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> >> *Sent:* Friday, December 24, 2010 8:35 PM
> >> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: पौ
>
> >> ठीक बात है बलजीत भाई,
> >> प्रभा से ही सर्वाधिक निकटतम है पौ।
>
> >> 2010/12/24 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
> >> *अजित*
> >>http://shabdavali.blogspot.com/
>
> > --
> > शुभकामनाओं सहित
> > *अजित*
> >http://shabdavali.blogspot.com/
>
> --
> शुभकामनाओं सहित
> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
मैंने संस्कृत में इसके ऐसे रूप की मौजूदगी बताई है और इस के आगे मेरा
> >> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
----- Original Message -----
From: "Baljit Basi" <balji...@yahoo.com>
पौ का अर्थ 'एक' ही है। किसी भी अच्छे दाँव को पौ नहीं कहते। पौ बारह ज़रूर बहुत अच्छा दाँव है क्योंकि वह वैसे ही जैसे छक्का। इस नज़र से [इस] पौ का अर्थ पाद से नज़दीक़ बैठता है।
On 24 दिस., 15:14, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> पौ का अर्थ निश्चित ही एक है। हमारे मालवा में अष्टा चंगा पै या अष्टा चंगा पौ
> खेला जाता है जिसमें पौ का अर्थ एक ही है। पद से पौ की यह रिश्तेदारी तो दिख
> रही है। पौ बारह की व्याख्या इस पौ यानी एक के संदर्भ में होनी चाहिए। एक बात
> और । गोटी में एक से छह तक ही बिन्दियाँ होती हैं क्योंकि गोटी के छह आयाम ही
> होते हैं। सो इस गोटी से बारह का रिश्ता नहीं जुड़ता। पौ बारह वाली पौ में तो
> पाद ही समाया है, ऐसा लगता है। अब इसके बारह पर विचार करना चाहिए।
>
> कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी खास अंक के आने पर खिलाड़ी को दो बार पासा खेलने का
> अवसर मिलता था। आमतौर पर चंगा यानी चार आने पर दो बार चांस मिलता था या छह आने
> पर एक चांस और मिलता था। अगर अगली चाल में भी चंगा या छक्का आया तो फिर खेलने
> को मिलता और और खिलाड़ी के अंक बढ़ते जाते। इसे मुगल काल में फारसी प्रभाव से *पौ
> बारहा* कहा गया होगा अर्थात ऐसी चाल जो बार बार मिले, *बारहा* मिले। बाद में यह
> *पौ बारह* हो गई। एक बात सूझी है। विचार करें। यहां बारह का संदर्भ भी तार्किक
> लग रहा है और पौ का रिश्ता पाद से भी बना हुआ है।
>
> 2010/12/24 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
>
>
> > पौ का अर्थ 'एक' ही है। किसी भी अच्छे दाँव को पौ नहीं कहते। पौ बारह ज़रूर
> > बहुत अच्छा दाँव है क्योंकि वह वैसे ही जैसे छक्का। इस नज़र से [इस] पौ का अर्थ
> > पाद से नज़दीक़ बैठता है।
>
> > ----- Original Message ----- From: "Baljit Basi" <baljit_b...@yahoo.com>
> >>> *अजित*http://shabdavali.blogspot.com/-उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> >>> उद्धृत पाठ दिखाए
>
> ...
>
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On 24 दिस., 15:35, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> यह भी सही है। हमने भी दो गोटियों से खेला है। इस तरह अगर दोनों ही गोटियां छह
> का अंक ले आएं तो पौ बारह तो हो गई[?]
> ये पौ बारह मज़ेदार होता जा रहा है। किसी खेल की तरह ही।
>
> 2010/12/25 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
> ...
>
> और पढ़ें »
>
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हमारी तो पौ बारह , संतों!
हमारी तो पौ बारह , संतों!
On 24 दिस., 22:09, दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com> wrote:
> अजित भाई,
> ये 'चंगा पौ' तो हमने भी बहुत खेला है। इस में पासे के स्थान पर इमली के बीजों
> को बीच से चीर कर बनाई गई चार आधी चितारों का उपयोग किया जाता है, जो एक और से
> काली और दूसरी ओर सफेद होती हैं। यदि एक सफेद और तीन काली चितार खुलती है तो यह
> दाँव पौ कहलाता है। खेल में पौ का महत्व यह है कि उस के बिना आप का दाँव आरंभ
> नहीं हो सकता। यानी अगर दो या तीन चितार सफेद खुलती हैं तो वह दो या तीन घर आप
> की गोटी को चला सकती है लेकिन आरंभिक घर से निकाल नहीं सकती। चार काली चितार का
> अर्थ है चंगा+पौ अर्थात चार व एक पौ इसी तरह चार सफेद चितार खुलने का अर्थ है
> (अष्टाह) आठ+पौ चूँ कि चंगा और अष्टाह के साथ पौ जु़ड़ी हुई हैं इस कारण से इस
> से आप की गोटी आरंभिक घर से निकल सकती हैं। यदि आप के चंगा या अष्टाह की
> चितारें खुलती हैं तो आप को एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता है। यदि एक
> बार चंगा, फिर अष्टाह खुलता है फिर एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता है। इस
> मौके को हम "पौ बारह" कहा करते थे।
> यदि इस खेल के मुताबिक पौ पर विचार करें तो लगता है कि पौ वह कदम है जो आरंभिक
> घर के बाहर आने का अवसर देता है। इसी तरह सुबह के समय रात के अंधेरे को चीर कर
> निकली पहली किरण को हम पौ फटना कह सकते हैं। *इस तरह पौ केवल पाद नहीं है अपितु
> घर से बाहर निकलने को रखा गया पहला कदम अर्थात प्रथम पाद है। *इसे लक्ष्य की ओर
> रखा गया प्रथम पाद भी कहा जा सकता है।
>
> 2010/12/25 ashutosh kumar <ashuvand...@gmail.com>
>
>
>
> > हमारी तो पौ बारह , संतों!
>
> --
> दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
> *क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ... अनवरत <http://anvarat.blogspot.com/> तीसरा
> खंबा <http://teesarakhamba.blogspot.com/>*
काफ़ी मज़ेदार रहा ये, शुक्रिया। पचीसी हम मगही में ही खेलते थे। ये खेल आम तौर पर बरसात
के दिनों में खेला जाता था, और माना ये जाता था कि बारिश लंबी खिंच जाए तो उसे रोकने
के लिए पचीसी खेलना सबसे कारगर उपाय है।
रविकान्त
anil janvijay wrote:
> दिनेश जी,
> आपकी बात एकदम ठीक है। मैं भी करीब-करीब यही बात कहना चाहता था । लेकिन
> 'चितार' शब्द याद नहीं आ रहा था। अट्ठाईस बरस से रूस में हूँ, इस तरह के बहुत
> से शब्द भूल गया हूँ। 'चंगा-पौ' बचपन में हमारा प्रिय खेल होता था।
>
> 2010/12/25 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com
> <mailto:drdwi...@gmail.com>>
>
> अजित भाई,
> ये 'चंगा पौ' तो हमने भी बहुत खेला है। इस में पासे के स्थान पर इमली के बीजों को
> बीच से चीर कर बनाई गई चार आधी चितारों का उपयोग किया जाता है, जो एक और
> से काली और दूसरी ओर सफेद होती हैं। यदि एक सफेद और तीन काली चितार खुलती है
> तो यह दाँव पौ कहलाता है। खेल में पौ का महत्व यह है कि उस के बिना आप का दाँव
> आरंभ नहीं हो सकता। यानी अगर दो या तीन चितार सफेद खुलती हैं तो वह दो या
> तीन घर आप की गोटी को चला सकती है लेकिन आरंभिक घर से निकाल नहीं सकती।
> चार काली चितार का अर्थ है चंगा+पौ अर्थात चार व एक पौ इसी तरह चार सफेद
> चितार खुलने का अर्थ है (अष्टाह) आठ+पौ चूँ कि चंगा और अष्टाह के साथ पौ जु़ड़ी हुई
> हैं इस कारण से इस से आप की गोटी आरंभिक घर से निकल सकती हैं। यदि आप के चंगा
> या अष्टाह की चितारें खुलती हैं तो आप को एक बार चितारें फैंकने का अवसर मिलता
> है। यदि एक बार चंगा, फिर अष्टाह खुलता है फिर एक बार चितारें फैंकने का अवसर
> मिलता है। इस मौके को हम "पौ बारह" कहा करते थे।
> यदि इस खेल के मुताबिक पौ पर विचार करें तो लगता है कि पौ वह कदम है जो
> आरंभिक घर के बाहर आने का अवसर देता है। इसी तरह सुबह के समय रात के अंधेरे को
> चीर कर निकली पहली किरण को हम पौ फटना कह सकते हैं। *इस तरह पौ केवल पाद
> नहीं है अपितु घर से बाहर निकलने को रखा गया पहला कदम अर्थात प्रथम पाद है।
> *इसे लक्ष्य की ओर रखा गया प्रथम पाद भी कहा जा सकता है।
>
> 2010/12/25 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com
> <mailto:ashuv...@gmail.com>>
>
>
>
> हमारी तो पौ बारह , संतों!
>
>
>
>
> --
> दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
> *क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ... अनवरत <http://anvarat.blogspot.com/>
> तीसरा खंबा <http://teesarakhamba.blogspot.com/>*
>
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>
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> --
> anil janvijay
> कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें
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