छकड़े की सवारी

121 views
Skip to first unread message

संजय | sanjay

unread,
Mar 13, 2013, 1:20:52 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
राजस्थान में पशुओं द्वारा ढोई जाने वाली गाड़ियों को 'छकड़ा/छकड़ी' कहते हैं. यहाँ गुजरात के शहर में ऑटो-रिक्शा (टेम्पो) से बड़े इसी प्रकार के वाहन को 'छकड़ा' कहा जाता है. यानी छकड़ा शब्द कम से कम दो भाषाओं और ग्रामिण व शहरी क्षेत्र में देखने को मिल रहा है. ऐसे में यह शब्द महज जूगाड़ी-शब्द भी नहीं होना चाहिए. क्या अन्य जगहों पर भी यह शब्द मिलता है? 

--
संजय बेंगाणी | sanjay bengani । 9601430808

lalit sati

unread,
Mar 13, 2013, 1:33:31 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
हिंदी में छकड़ा गाड़ी खटारा गाड़ी यानी जर्जर हालत वाली गाड़ी के लिए ही कहा जाता है। गुजरात में बुलेट मोटरसाइकिल चालित टैम्पो को भी शायद छकड़ा कहते हैं। उसे इधर यूपी की तरफ जुगाड़ कहा जाएगा।


2013/3/13 संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com>
राजस्थान में पशुओं द्वारा ढोई जाने वाली गाड़ियों को 'छकड़ा/छकड़ी' कहते हैं. यहाँ गुजरात के शहर में ऑटो-रिक्शा (टेम्पो) से बड़े इसी प्रकार के वाहन को 'छकड़ा' कहा जाता है. यानी छकड़ा शब्द कम से कम दो भाषाओं और ग्रामिण व शहरी क्षेत्र में देखने को मिल रहा है. ऐसे में यह शब्द महज जूगाड़ी-शब्द भी नहीं होना चाहिए. क्या अन्य जगहों पर भी यह शब्द मिलता है? 

--
संजय बेंगाणी | sanjay bengani । 9601430808

--
You received this message because you are subscribed to the Google Groups "शब्द चर्चा " group.
To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to shabdcharcha...@googlegroups.com.
For more options, visit https://groups.google.com/groups/opt_out.
 
 

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 1:51:17 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
छकड़ा शब्द से सभी हिन्दी क्षेत्र परिचित हैं। मूलतः यह वाहन था। लोगों को, चीज़ों को ढोता था।
अब इसका ये हाल है कि इसे ढोया जा रहा है:)
शब्दों का सफ़र में इस पर भी है- छकड़े की अधोगति-दुर्गति गाथा
वक्त मिले तो देखें।

2013/3/13 lalit sati <lalit...@gmail.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

संजय | sanjay

unread,
Mar 13, 2013, 2:03:51 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
कड़ी के लिए अजितजी का धन्यवाद. और छकड़ा-गाड़ी जुगाड़ टाइप न हो कर व्यवस्थित बने वहान थे/है. चाहे पशुओं द्वारा ढोई जाने वाली लकड़ी गाड़ियाँ हो या शहर में चलने वाले धातु के बने सीएनजी पर चलते वाहन. अतः यह खटारे नहीं हैं.

2013/3/13 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
छवि ब्रांड कंसलटींग


अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 2:27:10 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
बिल्कुल। मगर आज के मशीनी वाहनों के दौर में छकड़ा शब्द की अर्थवत्ता खटारा की बनी, यह समझना महत्वपूर्ण है। मोटरयान आने के बाद छकड़ा शब्द में आऊटडेटेड का व्यंग्य भाव आया, उस पर गौर करें। इसी के साथ छकड़ा की अधोगति हुई है। आज छकड़ा खटारा, जर्जर, कमज़ोर वाहन ही है और इसी अर्थ में रूढ़ है। इस बहाने हिन्दी को जर्जर, असक्षम वाहन के लिए छकड़ा शब्द तो मिला। शब्द ऐसे ही भी चोला बदलते हैं।

Anil Janvijay

unread,
Mar 13, 2013, 2:43:10 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
मैं अजित जी के इस विश्लेषण से पूरी तरह सहमत हूँ।
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें
www.rachnakosh.com

Moscow, Russia
+7 916 611 48 64 ( mobile)

Abhay Tiwari

unread,
Mar 13, 2013, 2:43:43 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
छकड़े एक रास्ते से चक्र से भी जुड़ता है.. चकरा.. छकड़ा.. कई शब्द इसी तरह से अल्पप्राण से महाप्राण की यात्रा करते हैं.. 

संजय | sanjay

unread,
Mar 13, 2013, 2:47:50 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
ऐसे तो कुछ भी बनाया जा सकता है. छकड़ों में समान लादने के बाद तिरपाल से बाँधने के लिए कड़ियाँ होती है, छह-कड़ियों वाली गाड़ी. छकड़ी. छहकड़ा. :)

2013/3/13 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
ए-511, स्मिता टावर, गुरूकुल रोड़,
मेमनगर , अहमदाबाद, गुजरात. 


दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Mar 13, 2013, 3:13:27 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com

अब पैसेंजर ट्रेन भी तो छकड़ा ही कही जा रही है। पहले नैरो गेज और मीटर गेज को छकड़ा कहते थे।
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

Abhay Tiwari

unread,
Mar 13, 2013, 3:13:32 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
लगभग सभी निरुक्ति कुछ प्रमाण और कुछ अनुमान के आधार पर होती हैं.. बरास्ते शकट एक व्युत्पत्ति मिलती है.. आप्टे ने भी यही बताया है.. पर गाड़ी में सबसे विशिष्ट चीज़ चक्र ही है न कि भार ढोने की उसकी शक्यता.. भार ढोने में तो बैल भी शक्य होता है, उसे तो शकट नहीं कहते?   

तमिल में पहिये को चगर्ट कहते हैं और गाड़ी को चकटम्..  

संजय | sanjay

unread,
Mar 13, 2013, 3:19:23 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
अभय तिवारी जी, मैने विनोद ही किया था, गम्भीर न हो. हमें अपनी सीमाएं पता है :)

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 4:14:41 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com

मोटे तौर अभी जो लगता है उसके मुताबिक व्युत्पत्ति के मद्देनज़र शब्दों के बनने की प्रवृत्ति पर गौर करना ज़रूरी है। प्रायः सभी भाषाओं में ढोने, ले जाने, उठाने जैसी क्रियाओं के आधार पर गतिशीली उपकरणों यान आदि के नाम पड़े हैं। चक्र तो गति का पर्याय है ही। वाहन में वह् यानी ले जाना, ढोना प्रमुख है। अर्थ यान। यान में या महत्वपूर्ण है जिसमें गति का भाव है। इसमें चक्र कहीं नहीं है। अंग्रेजी में कैरियर शब्द में चक्र नहीं ले जाने का भाव है। ट्रेलर, ट्रेन, वैन, वैगन तमाम शब्दों में ले जाने का भाव आता है। इसलिए शकट की अर्थवत्ता शक् से उपजती है, शक् से ही शक्ति यानी ऊर्जा बनती है।  ढोने या ले जाने का सम्बन्ध ऊर्जा से है जो अन्तर्निहित है। पहिया अपने आप में ऊर्जा नहीं है। उसे चलने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। अश्वयान, उष्ट्रयान अथवा अश्ववाहन, उष्ट्रवाहन जैसे समास इन शब्दों के संदर्भ में नहीं बनते जैसे चक्र के संकेत वाले गाड़ी शब्द पर गौर करें। इसकी व्युत्पत्ति गार्त से बताई जाती है। हालाँकि 8 मार्च 2011 को आपने इसी मंच पर गाड़ी की व्युत्पत्ति शटक से बताई थी –यह संस्कृत शब्द शकट से निकला है..शकट > हकट > ख़ट > खड>  गड >गड्डी >गाडी


जबकि गाड़ी गार्त से बना है जिसके मूल में गर्त है। गर्त का  अर्थ रथ होता था।  गार्त यानी गड्ढा। मार्ग के दोनों और रथ के पहियों से बने गड्ढो की वजह से इन्हें  गार्त  कहते थे। रामविलास शर्मा के अनुसार संस्कृत के गर्त यानी रथ  में गर क्रिया जिस चक्र गति की ओर संकेत करती है वह दरअसल पहिये की गति  है। वह, या जिस तरह से गति के पर्याय हैं, चक्र अपने आप ऊर्जा का पर्याय नहीं है। सो गाड़ी के साथ ऊर्जा का स्वरूप स्पष्ट करना ज़रूरी है जो उसे खींच सके मसलन रेलगाड़ी, ऊँटगाड़ी, घोड़ागाड़ी, भैंसागाड़ी, मोटरगाड़ी वगैरह। जबकि वाहन, यान, शकट के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि इसमें वह् अथवा या की तरह शक् यानी ले जाने की क्रिया है जो अन्तर्निहित ऊर्जा से सम्पन्न हो रही है। मूलतः गतिशील भारवाही उपकरण में ले जाने, खींचने, उठाने का भाव महत्वपूर्ण है। वर्ना हर उपकरण के नामकरण में चक्र होना चाहिए था। चक्र से बने कितने वाहन-प्रकार याद आते हैं? आपकी बात सही हो सकती है। मैं अभी और संदर्भों को देख कर अपनी राय बनाऊँगा।

Abhay Tiwari

unread,
Mar 13, 2013, 4:24:18 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
शकट से भी छकड़ा बन ही सकता है, अजित भाई.. जैसे तमिल में तो चकटम है ही..  मेरा कहना यही है कि मूल में पहिये वाला भाव है.. शक् वाला नहीं.. रही बात गार्त की तो संस्कृत साहित्य में इस शब्द की अावृत्ति का पैमाना ये है कि न तो ये आप्टे के कोष में मिलता है न मोनियर-विलियम्स में.. गाड़ी जैसा लोकप्रिय शब्द गार्त से कैसे बना होगा.. जब कि संस्कृत साहित्य में उसका उल्लेख ही नहीं.. इस पर भी विचार करना चाहिये हमें.. 

2013/3/13 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

मोटे तौर अभी जो लगता है उसके मुताबिक व्युत्पत्ति के मद्देनज़र शब्दों के बनने की प्रवृत्ति पर गौर करना ज़रूरी है। प्रायः सभी भाषाओं में ढोने, ले जाने, उठाने जैसी क्रियाओं के आधार पर गतिशीली उपकरणों यान आदि के नाम पड़े हैं। चक्र तो गति का पर्याय है ही। वाहन में वह् यानी ले जाना, ढोना प्रमुख है। अर्थ यान। यान में या महत्वपूर्ण है जिसमें गति का भाव है। इसमें चक्र कहीं नहीं है। अंग्रेजी में कैरियर शब्द में चक्र नहीं ले जाने का भाव है। ट्रेलर, ट्रेन, वैन, वैगन तमाम शब्दों में ले जाने का भाव आता है। इसलिए शकट की अर्थवत्ता शक् से उपजती है, शक् से ही शक्ति यानी ऊर्जा बनती है।  ढोने या ले जाने का सम्बन्ध ऊर्जा से है जो अन्तर्निहित है। पहिया अपने आप में ऊर्जा नहीं है। उसे चलने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। अश्वयान, उष्ट्रयान अथवा अश्ववाहन, उष्ट्रवाहन जैसे समास इन शब्दों के संदर्भ में नहीं बनते जैसे चक्र के संकेत वाले गाड़ी शब्द पर गौर करें। इसकी व्युत्पत्ति गार्त से बताई जाती है। हालाँकि 8 मार्च 2011 को आपने इसी मंच पर गाड़ी की व्युत्पत्ति शटक से बताई थी –यह संस्कृत शब्द शकट से निकला है..शकट > हकट > ख़ट > खड>  गड >गड्डी >गाडी


जबकि गाड़ी गार्त से बना है जिसके मूल में गर्त है। गर्त का  अर्थ रथ होता था।  गार्त यानी गड्ढा। मार्ग के दोनों और रथ के पहियों से बने गड्ढो की वजह से इन्हें  गार्त  कहते थे। रामविलास शर्मा के अनुसार संस्कृत के गर्त यानी रथ  में गर क्रिया जिस चक्र गति की ओर संकेत करती है वह दरअसल पहिये की गति  है। वह, या जिस तरह से गति के पर्याय हैं, चक्र अपने आप ऊर्जा का पर्याय नहीं है। सो गाड़ी के साथ ऊर्जा का स्वरूप स्पष्ट करना ज़रूरी है जो उसे खींच सके मसलन रेलगाड़ी, ऊँटगाड़ी, घोड़ागाड़ी, भैंसागाड़ी, मोटरगाड़ी वगैरह। जबकि वाहन, यान, शकट के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि इसमें वह् अथवा या की तरह शक् यानी ले जाने की क्रिया है जो अन्तर्निहित ऊर्जा से सम्पन्न हो रही है। मूलतः गतिशील भारवाही उपकरण में ले जाने, खींचने, उठाने का भाव महत्वपूर्ण है। वर्ना हर उपकरण के नामकरण में चक्र होना चाहिए था। चक्र से बने कितने वाहन-प्रकार याद आते हैं? आपकी बात सही हो सकती है। मैं अभी और संदर्भों को देख कर अपनी राय बनाऊँगा।

--

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 9:45:40 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com

अभय भाई,

मैं भी यही कह रहा हूँ कि आप्टे या मोनियर विलियम्स भी पैमाना हैं मगर अन्तिम नहीं। आख़िर वो सवा सौ साल पहले सर्वाधिक आधुनिक माना जाने वाला शोध था।इस बीच भाषा-व्युत्पत्ति के नज़रिये से जो कुछ सामाने आया है उसके मद्देनज़र कई चीज़ें वहाँ भी अस्पष्ट हो सकती हैं, वर्ना वाजपेयीजी, भोलानाथजी, दिनकरजी, माचवेजी, रामविलास जी, भगवानसिंह समेत तमाम शब्द कौतुकियों को करने के लिए कुछ बाकी ही नहीं रहता। खास तौर पर ऐतिहासिक भाषा विज्ञान के क्षेत्र में  दर्जनों विद्वानों ने काम किया है। मैं सिर्फ आप्टे या मोवि पर निर्भर नहीं रहता बल्कि हरमुमकिन प्रमाणों तक पहुँचता हूँ।


यह भी सम्भव है कि द्रविड़ चगर्ट संस्कृत के गर्त का रूपान्तर हो जिसमें घूमने का भाव है। या चक्र का विपर्ययी रूपान्तर हो। चकटम् संस्कृत के शकटम् से बना हो। संस्कृत में इसके अन्य रूप यानी शकट, शकटी, शकटिका होने से यह ज्यादा सम्भव लगता है। संस्कृत का और अक्सर द्रविड़ भाषाओं के और में बदलता हैं। द्रविड़ में भी और में घालमेल होता है। अपनी बात के समर्थन में मुझे कुछ प्रमाण मिले हैं। आठवीं सदी की कवयित्री अंदल की कृत्ति थिरुप्पवई में चकटम् का उल्लेख शकटासुर के संदर्भ में आया है। जिसने श्रीकृष्ण का अंत करने के लिए शकट का अवतार धारण किया था। चकटम् का आधार शकटम् हो सकता है। यह शकटम् के मूल और चकटम् के द्रविड़ विकास का बड़ा सबूतकी ओर संकेत तो हो सकता है। यह भी गौरतलब है कि पुराणों की कथाएँ द्रविड़ साहित्य में भी थोड़े बहुत फेरबदल के साथ हैं। नामों के उच्चार और संदर्भों में स्थानीय संदर्भ और स्पर्श आना स्वाभाविक है। तमिल कोश के मुताबिक शकटिका का रूप चकटिकाई, शकट का रूप चकटू, शकटम् का रूप चकटम् और शकटि या शकटी का रूप चकटि है।


इसके अलावा तमिल लैक्सिकन में गोलाई, घुमाव, पहिये के लिए अर, अरि, अरा, अरम, उरुलि जैसे शब्द हैं जो संस्कृत से ही आए हैं। इसके साथ ही रोटाई शब्द है जो निश्चित ही संस्कृत का कहा जा सकता है। संस्कृत में रोटिका यानी रोटी। इसके अलावा वट्टम, तिक्की, चुट्टिरम् जैसे शब्द भी हैं। डेविड मैक्पने की कोर वोकेब्युरी ऑफ़ तमिल में मूलतः चक्रम और चक्कीरम् शब्द मिलते हैं जो भारोपीय परिवार के चक्र के रूपान्तर लगते हैं।

फिर भी और काम की सम्भावना बनी हुई है।

Abhay Tiwari

unread,
Mar 13, 2013, 9:57:36 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित भाई, मेरी यह धारणा बनती जा रही है कि संस्कृत उस काल की अंग्रेजी थी साहित्य और शासन की भाषा.. लोक की भाषा नहीं थी.. और पूरी उदारता से लोक से शब्द लेती थी.. आप भी कहते ही हैं कि विद्वान शब्द नहीं गढ़ते.. जनता गढ़ती है.. इसलिए बहुत मामलों में ऐसा हो सकता है कि लोक का शब्द पुराना हो, मूल हो और लोक से परिष्कार होकर संस्कृत में गया हो..   

निश्चित ही वैदिक बोलने वाले लोग रहे होंगे.. लेकिन वैदिक में भी एकरूपता नहीं है.. एक ही शब्द के अनेक रूप मिलते हैं.. अलग-अलग जनों में एक ही शब्द के अलग रूप थे.. जैसे कि आज की अवधी, ब्रज और भोजपुरी में मिलते हैं.. बहुत बाद में पाणिनि ने संस्कृत को गढ़ा है.. उसके पहले भाषाओं की नदी में बहुत पानी बह चुका था.. अतः संस्कृत मिलने वाले शब्द के रूप को अन्तिम मानना सही नहीं होगा.. ऐसा लगता है.. वो अपने नियम-सिद्धांत के अनुसार शब्दों में बदलाव करती रही होगी (माने विद्वान करते होंगे).. 

2013/3/13 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

अभय भाई,

--

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 10:25:23 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
शकट पर विचार करते हुए मेरे मन में संस्कृतवाद नहीं चल रहा अभय भाई। शकट का छकड़ा बनना और सिर्फ़ यही रूप आज कई आर्यबोलियों में जीवित रहना इस बात का प्रमाण है कि पाणिनीकृत संस्कृत को एक दर्ज़ा ज़रूर मिला हुआ था, पर वह राजकाज की भाषा रही होगी, इस पर शक है। संस्कृत अभिलेखों और साहित्य की तुलना में पाली, प्राकृत, अपभ्रंश साहित्य कई गुना ज्यादा है। द्रविड़ और संस्कृत की रिश्तेदारी पाणिनी के ज़माने से भी पुरानी है। अर्थात वैदिक कालीन भाषाएँ और द्रविड़ भाषाओं में अन्तर्सम्बन्ध था। तब जब वे उत्तरापथ तक फैले थे। इसे गौण मानें कि कौन इधर से उधर गया। पाणिनीकृत संस्कृत का असर सिर्फ़ ग्रन्थों तक रहा। इसलिए अंग्रेजी से उसकी तुलना सही हो सकती है।  बाकी भाषाओं का विकास तो वैदिकी के समानान्तर प्राकृतधारा के ज़रिये होता रहा...मैं संस्कृतेतर आर्यभाषाओं की बात कर रहा हूँ।

पर आपकी दृष्टि से देखने में दिक़्क़त सिर्फ़ यही नज़र आ रही है कि तब शब्दचर्चा थम जाएगी। सब कुछ "हो सकता है, वैसा हो सकता है" पर ही आकर टिक जाएगा। इस मंच पर भी सिर्फ़ अर्थ-प्रयोग चर्चा ही हुआ करेगी, व्युत्पत्ति चर्चा पर रोक लग जाएगी। क्योंकि हर बात अतीत से उभर कर अतीत में ही विलीन होगी। अभी तक तो यह नज़रिया रहा है कि किसी भाषा में किसी शब्द की आमद को कब दर्ज़ किया गया अथवा अभिलेखों में, वाचिक परम्परा में, साहित्यिक संदर्भों में, भाषायी आदान-प्रदान में, वाक्य-रचना में, मुहावरों, कथाओं, परम्पराओं में उसकी उपस्थित या संकेत कैसे हैं।

जिस तरह से शकट शक से आ रहा है (आर्यमूल के हिसाब से), तब चकटम् कहाँ से आ रहा है? क्या चक्रम् से ? या सिर्फ़ चक से ? तम को प्रत्यय मान लें। तब तो घोषित तौर पर चक्र भारोपीय शब्द है। वैसे चकटम् में भी जो चक्र का भाव आ रहा है, जितना मैने पढ़ा है, वह दरअसल उसके छकड़ा होने की वजह से प्रकारान्तर से आ रहा है न कि चक्र से चलने वाला सो शकट, यह नहीं है।

2013/3/13 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Mar 13, 2013, 10:51:10 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
आप स्वयं जानते हैं कि कितनी व्युत्पत्तियां गढ़ी हुई और भ्रामक होती हैं.. कई बार तो शरारतपूर्ण भी.. ख़ुद आपने ही कितनी व्युत्पत्तियों को खण्डित किया है.. इसीलिए कि व्युत्पत्ति को निर्द्वन्द्व नहीं माना जा सकता.. सबसे तार्किक प्रतीत होने वाली निरुक्ति को हम मान लेते हैं.. पर द्वन्द्व की गुंजाईश बनी रहती है इसलिए 'हो सकता है..' जैसी भाषा का प्रयोग अनुचित नहीं बल्कि वांछनीय है..   

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 11:02:31 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
सवाल है शकट पर इस तमाम विमर्श का क्या ? चकटम् व्युत्पत्ति के सूत्र कौन ढूँढेगा? चकटम् चुराने के बाद संस्कृत ने उसका रिश्ता 'शक्' से जोड़ दिया? चीज़ों को उठाने, ले जाने, कैरी करने से जुड़े आशयों से अर्थ ग्रहण करने सम्बन्धी मेरे तर्कों की कोई क़द्र नहीं ? द्रविड़ चकट में छकड़े की अर्थवत्ता चक से आ रही है या कट से। या फिर चट से ? मूल रूप में द्रविड़ में इनका क्या अर्थ रहा होगा? कुछ तो तलाशने की मदद करो भाई?
मैं व्यवहार की बात कर रहा हूँ, आप चकटम् उछालने के बाद से सैद्धान्तिक किए जा रहे हैं:)



2013/3/13 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
आप स्वयं जानते हैं कि कितनी व्युत्पत्तियां गढ़ी हुई और भ्रामक होती हैं.. कई बार तो शरारतपूर्ण भी.. ख़ुद आपने ही कितनी व्युत्पत्तियों को खण्डित किया है.. इसीलिए कि व्युत्पत्ति को निर्द्वन्द्व नहीं माना जा सकता.. सबसे तार्किक प्रतीत होने वाली निरुक्ति को हम मान लेते हैं.. पर द्वन्द्व की गुंजाईश बनी रहती है इसलिए 'हो सकता है..' जैसी भाषा का प्रयोग अनुचित नहीं बल्कि वांछनीय है..   

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 11:03:27 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
 पुनश्चः बातें शब्द रह गया था।
" मैं व्यवहार की बात कर रहा हूँ, आप चकटम् उछालने के बाद से सैद्धान्तिक बातें किए जा रहे हैं:)  "

Abhay Tiwari

unread,
Mar 13, 2013, 11:27:40 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
आप जानते हैं कि 'य र ल व' अन्तस्थ व्यञ्जन हैं.. इनका आगम व लोप होता रहता है.. चकटम के पहले का कोई रूप चकरटम रहा हो सकता है.. और मैं आपको कोई अन्तिम निरुक्ति नहीं बता रहा हूँ.. बस इतना कह रहा हूँ कि शक् मूल से अधिक तार्किक निरुक्ति मुझे बरास्ते चक्र लग रही है.. अब मामला चक्र की निरुक्ति का है तो उस पर अलग से चर्चा करनी होगी.. 

और चकटम रूप बताने का अर्थ यही था कि उसे भी देख लिया जाय.. विचार कर लिया जाय.. इसे कोई दुराग्रह न माना जाय..  

eg

unread,
Mar 13, 2013, 11:46:32 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
क्या भूत में कथित 'द्रविड़' का वर्तमान तमिल, कन्नड़ और मलयालम से परे कोई एक रूप था?  

Abhay Tiwari

unread,
Mar 13, 2013, 11:48:18 AM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
मुश्किल है.. भेद तब भी रहे होंगे.. एक  मूल भाषा की कल्पना ही ग़लत है.. 

2013/3/13 eg <girij...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 13, 2013, 12:19:44 PM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com
मैने हल्की-फुल्की बात कही थी। आपसे संवाद में मज़ा आता है और आपको भी मुझे उलझाने में, झौंकने में आनंद मिलता है। आप खुद कह चुके हैं, मुकरेंगे तो प्रमाण उपस्थित कर दूंगा:)   वैसे मैं भी यही कह रहा हूँ। चक्र तो भारोपीय है, इसे चकला वाली दो कडियों में विस्तार से कई हवालों के साथ लिखा है। हाँ, एक बात और। भारोपीय वर्णों के रूपान्तर सम्बन्धी एक शब्द और मिला है चकत-कुरु यानी। इसका अर्थ है विश्वगुरु।  यह तमिल समास सीधे सीधे जगत् गुरु का रूपान्तर है। द्रविड़ और आर्य भाषाओं का सम्बन्ध बहुत पुराना है और उनका एक दूसरे पर कम ज्यादा प्रभाव रहा है। यह प्रभाव संस्कृत, मराठी, गुजराती व अन्य भाषाओं के मद्देनज़र है। बरो व एमेनो के तमिल व्युत्पत्ति कोश में भी संस्कृत शकट से चकटम् के रूपान्तर होने की बात कही है।
चलिए आनंद रहा। आपकी जे हो:)

vibhas verma

unread,
Mar 13, 2013, 11:53:38 PM3/13/13
to shabdc...@googlegroups.com

'

मृच्छकटिक' का अनुवाद मोहन राकेश ने 'मिट्टी का छकड़ा' नाम से किया था। मोहन राकेश ने कुछ समय तक विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाई थी।   


Rajendra Gupta राजेंद्र गुप्ता

unread,
Mar 14, 2013, 2:15:43 AM3/14/13
to shabdc...@googlegroups.com

विद्वानों के विचार / मनोरंजन के लिए कुछ ध्वनि- साम्यताएँ प्रस्तुत हैं। 

चक्र > चक्रा > चकरा > छकरा > छकड़ा 
 
चक्र > चकर >चकड़ > चकड > चकट (द्रविड़) > शकट (संस्कृत)

चक्र > चर्क्र > चर्कर > चर्कड़ > चर्कड > चर्गट > चगर्ट (द्रविड़) > चगट > चकट (द्रविड़) > कटक कटिक (तमिल, जैसे मृच्च्कटिकम में ) 

चक्र > चकरा > छकरा > राकछा (क्रम उलटने के बाद) > रिकछा > रिक्शा 

राजेंद्र गुप्ता 

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 14, 2013, 3:39:46 AM3/14/13
to shabdc...@googlegroups.com

मृच्छकटिकम् पर ध्यान दें। संधि की जितनी मोटी समझ है यह  मृद्+शकटिक से बना है ।
त+श तथा द+श मिलने से बनता है। यूँ भी के में बदलने की वृत्ति है। षष्ठ=छठ
इस तरह
शकट > छकट > छकड़ा

[मनोरंजन वाली बात सिरमाथे।  व्युत्पत्ति-विचार क्ले-मॉडलिंग जितना आसान काम नहीं है कि एक ही लौंदे से गणेश भी बना लो और गोबर भी, चिड़िया भी बना लो और पेड़ भी। शब्द उंगलियों की हरकत या होठों की थिरकन से नहीं बनते, वे बनते हैं ध्वनि और अर्थ के मेल से। कण्ठ की प्रकृति से। ध्वनिछटाओं से। न तो अब गोबर में गणेश तलाशे जा सकते हैं, न ही गोड़शे में गाँधी। हमारी बात को भी मनोरंजन भाव से ही लिया जाए]

Abhay Tiwari

unread,
Mar 14, 2013, 5:52:19 AM3/14/13
to shabdc...@googlegroups.com
फिर से विचार करने पर मुझे लग रहा है कि ये शब्द संस्कृत में आयातित है.. कारण ये है कि आम तौर पर जब शब्द संस्कृत का ही होता है तो शब्दकोश में उससे मिलते-जुलते और दूसरे शब्द मिलते हैं.. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं है.. शकल का अर्थ है टुकड़ा और शकन का अर्थ है मल.. 

और अगर इस के दूसरे अर्थों पर भी ध्यान दिया जाय तो देखें कि एक अर्थ है - २००० पल की तौल जो एक गाड़ी के बराबर होती है.. यानी ये शब्द बाजार का शब्द था.. और हम जानते हैं कि प्राचीन समाज में संस्कृत बाजार की भाषा नहीं थी.. बाजार में बोले जाने वाले शब्द या तो तद्भव होते थे या उनकी अपनी भाषा के शब्द (आज भी ऐसा ही है).. इस मामले में ये तद्भव ही प्रतीत होता है..मूर्धन्य ट भी इसी की ओर इशारा कर रहा है.. 

उस समाज में संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा थी, शूद्रों की नहीं.. और गाड़ी बनाने वाले तो निश्चित ही शूद्र रहे होंगे.. उन्होने गाड़ी को जो शब्द दिया होगा- तद्भव ही सही- वही लोकप्रिय हो गया होगा.. इतना कि ब्राह्मण भी उसे अपनाने को बाध्य हुए होंगे.. [सब सम्भावनाएं ही हैं अजित भाई! :) ]

वैसे मोनियर विलियम्स ने इस के बारे में लिखा है- ऑफ डाउटफुल डेरिवेशन..  

2013/3/14 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

--

Vinod Sharma

unread,
Mar 14, 2013, 6:47:21 AM3/14/13
to shabdc...@googlegroups.com
निश्चय ही इतने विषद विवेचन से ज्ञानामृत की वर्षा हो रही है और हम जैसे ज्ञान पिपासुओं को बिन माँगे मोती मिल रहे हैं।
अजित भाई और अभय भाई दोनों को साधुवाद!

2013/3/14 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--
bestregards.gif
विनोद शर्मा

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 14, 2013, 7:43:14 AM3/14/13
to shabdc...@googlegroups.com
जै हो अभयभाई:)
शब्दचर्चा जारी रहे, शब्दों का सफ़र चलता रहे
शब्द-संधान समूह को नमन्

2013/3/14 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>



--

Baljit Basi

unread,
Mar 15, 2013, 8:49:02 AM3/15/13
to शब्द चर्चा
बहुत ज्ञानवर्धक चर्चा पढ़ने को मिली . मैं तो इस विषय पर कुछ कहने की
क्षमता नहीं रखता . अजित जी की बातों में दम है लेकिन अभय के नुक्ते भी
विचारे जाने चाहिए। मैं इस बात को नहीं मान सकता कि छकड़ा या ऐसे ही किसी
और शब्द की व्युत्पति के लिए शक्ति पर ही ध्यान दिया जाये .और यह भी कि
चक्र से छकडा शब्द नहीं बन सकता या वाहन के अर्थो वाले शब्दों में ढोने,
ले जाने के भाव ही होने चाहिए। अंग्रेज़ी के टू- व्हीलर, थ्री-व्हीलर, फॉर-
व्हीलर में व्हील (चक्र) ही है . फिर साइकल शब्द ले लो जो चक्र और आगे
शायद व्हील का ही सुजाति है . इससे आगे बाईसिकल, ट्राईसिकल शब्द बने
हैं। इसके सुजाति अवेस्ता शब्द 'चक्श्रा' ( हेजे/ उचारण का भरोसा नहीं)
का अर्थ रथ होता है। चक्र में सिर्फ गोल होने या घूमने के भाव ही नहीं
घुमाने के भाव भी हैं और घुमाया शक्ति से ही जा सकता है। हम निश्चित रूप
से नहीं कह सकते कि चक्र के अर्थों वाले शब्दों से दुनिया भर की तमाम
भाषाओँ में वाहन के अर्थों वाले शब्द विकसित नहीं हो सकते।

On 14 मार्च, 07:43, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> जै हो अभयभाई:)
> शब्दचर्चा जारी रहे, शब्दों का सफ़र चलता रहे
> शब्द-संधान समूह को नमन्
>

> 2013/3/14 Vinod Sharma <vinodjisha...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > निश्चय ही इतने विषद विवेचन से ज्ञानामृत की वर्षा हो रही है और हम जैसे
> > ज्ञान पिपासुओं को बिन माँगे मोती मिल रहे हैं।
> > अजित भाई और अभय भाई दोनों को साधुवाद!
>

> > 2013/3/14 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
> >> फिर से विचार करने पर मुझे लग रहा है कि ये शब्द संस्कृत में आयातित है..
> >> कारण ये है कि आम तौर पर जब शब्द संस्कृत का ही होता है तो शब्दकोश में उससे
> >> मिलते-जुलते और दूसरे शब्द मिलते हैं.. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं है.. शकल
> >> का अर्थ है टुकड़ा और शकन का अर्थ है मल..
>
> >> और अगर इस के दूसरे अर्थों पर भी ध्यान दिया जाय तो देखें कि एक अर्थ है -
> >> २००० पल की तौल जो एक गाड़ी के बराबर होती है.. यानी ये शब्द बाजार का शब्द
> >> था.. और हम जानते हैं कि प्राचीन समाज में संस्कृत बाजार की भाषा नहीं थी..
> >> बाजार में बोले जाने वाले शब्द या तो तद्भव होते थे या उनकी अपनी भाषा के शब्द
> >> (आज भी ऐसा ही है).. इस मामले में ये तद्भव ही प्रतीत होता है..मूर्धन्य ट भी
> >> इसी की ओर इशारा कर रहा है..
>
> >> उस समाज में संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा थी, शूद्रों की नहीं.. और गाड़ी
> >> बनाने वाले तो निश्चित ही शूद्र रहे होंगे.. उन्होने गाड़ी को जो शब्द दिया
> >> होगा- तद्भव ही सही- वही लोकप्रिय हो गया होगा.. इतना कि ब्राह्मण भी उसे
> >> अपनाने को बाध्य हुए होंगे.. [सब सम्भावनाएं ही हैं अजित भाई! :) ]
>
> >> वैसे मोनियर विलियम्स ने इस के बारे में लिखा है- ऑफ डाउटफुल डेरिवेशन..
>

> >> 2013/3/14 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
> >>> *मृच्छकटिकम् *पर ध्यान दें। संधि की जितनी मोटी समझ है यह  मृद्+शकटिक से
> >>> बना है ।
> >>> *त+श* तथा *द+श* मिलने से *छ* बनता है। यूँ भी *श* के *छ* में बदलने की
> >>> वृत्ति है। *षष्ठ=छठ*
> >>> इस तरह
> >>> *शकट > छकट > छकड़ा*
>
> >>> *[मनोरंजन वाली बात सिरमाथे।  व्युत्पत्ति-विचार क्ले-मॉडलिंग जितना आसान


> >>> काम नहीं है कि एक ही लौंदे से गणेश भी बना लो और गोबर भी, चिड़िया भी बना लो
> >>> और पेड़ भी। शब्द उंगलियों की हरकत या होठों की थिरकन से नहीं बनते, वे बनते
> >>> हैं ध्वनि और अर्थ के मेल से। कण्ठ की प्रकृति से। ध्वनिछटाओं से। न तो अब
> >>> गोबर में गणेश तलाशे जा सकते हैं, न ही गोड़शे में गाँधी। हमारी बात को भी

> >>> मनोरंजन भाव से ही लिया जाए]*


>
> >>> --
> >>> You received this message because you are subscribed to the Google
> >>> Groups "शब्द चर्चा " group.
> >>> To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send
> >>> an email to shabdcharcha...@googlegroups.com.

> >>> For more options, visithttps://groups.google.com/groups/opt_out.


>
> >>  --
> >> You received this message because you are subscribed to the Google Groups
> >> "शब्द चर्चा " group.
> >> To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an
> >> email to shabdcharcha...@googlegroups.com.
> >> For more options, visithttps://groups.google.com/groups/opt_out.
>
> > --

> > *[image: bestregards.gif]*


> > विनोद शर्मा
> >http://swatantraanuvaadak.blogspot.in/
>
> >  --
> > You received this message because you are subscribed to the Google Groups
> > "शब्द चर्चा " group.
> > To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an
> > email to shabdcharcha...@googlegroups.com.
> > For more options, visithttps://groups.google.com/groups/opt_out.
>
> --
>

> *
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/
> औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए

Baljit Basi

unread,
Mar 15, 2013, 9:21:04 AM3/15/13
to शब्द चर्चा
सिर्फ मनोरंजनार्थ :

यह सदियों पुरानी बात है, जब सभयता अपने प्रारम्भक दौर में थी . तब
पटरियों पर गाड़ीआं चलती थीं। यह भाप की शक्ति से चलती थीं और चलते समय
'छक छक' सी आवाज़ करती थीं। इसी लिए इन्हें 'छकड़ा' कहा जाने लगा . फिर
ज़माने ने करवट ली और बैल गाड़ी विकसित हुई। छकड़ा बहुत पुरानी घटिया चीज़
लगने लगी . तब इस शब्द की अधोगति हुई और हर खटारा वाहन को छकड़ा कहा जाने
लगा।


On 14 मार्च, 02:15, Rajendra Gupta राजेंद्र गुप्ता

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 9:49:39 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
"हम निश्चित रूपसे नहीं कह सकते कि  चक्र के अर्थों वाले शब्दों से  दुनिया भर की तमाम

में वाहन के अर्थों वाले शब्द विकसित नहीं हो सकते"

ऐसा मैने कहीं नहीं कहा बलजीत भाई।
शकट का मूल शक् से होना ज्यादा सम्भव है, यह बहुत स्पष्टता से कहा है। इसी सिलसिले में ले जाने, ढोने, वहन करने जैसे भावों से बने उन शब्दों की ओर संकेत किया है जिनमें वाहन की अर्थवत्ता है। यूँ तो कैरियर वाहन भी है, बिना पहिए के वाहन जैसे जलयान, स्लेज आदि और ढोने वाला मनुष्य भी। वाहन होना महत्वपूर्ण है। हर वाहन में पहिया ज़रूरी नहीं। हाँ, पहिया अपने आप में किसी भी उपकरण को वाहन नहीं बनाता। वैसे पहिये के आधार पर भी वाहनों के नाम बने हैं। अलबत्ता पहियेदार और बेपहिया दोनो तरह के ऐसे वाहन भी हैं जिनके नामकरण का आधार पहिया नहीं है। इसी आधार पर शकट-चर्चा में मैने अपने विचार रखे थे। मोनियर विलियम्स चाहे शकट की व्युत्पत्ति का आधार पक्का न मानते हों, मगर वे चक्र की सम्भाव्यता के बारे में भी कुछ नहीं कहते। आप्टे सीधे सीधे शकटिका का यानी गाड़ी का मूल शकट बताते हैं और शकट का मूल शक् धातु बताते हैं।

प्रस्तुत चर्चा में शुरू से ही मैने चक्र के विपर्ययी रूपान्तर की बात कही है। मगर तमाम संदर्भों को टटोलने के बाद भी शकट का चक्र से ठोस या कमज़ोर रिश्ता जोड़ने वाली कड़ियाँ मुझे नहीं मिली। अभी तो मनघड़न्त आधार पर रची गई कई संदेहास्पद व्युत्तियाँ पड़ी हैं जिन पर काम होना चाहिए। चलती चर्चा में एक सामान्य शब्द ने ज़रूरत से ज्यादा वक़्त ले लिया, इसका अपराधबोध हो रहा है:(
बाकी जै हो।


2013/3/15 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
For more options, visit https://groups.google.com/groups/opt_out.





--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 10:26:20 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
अगर एक पल के लिए यह मान भी लिया जाय की शकट का मूल शक् धातु में है तो तार्किक बात ये है कि ऐसे कई यंत्र जो शक्ति रखते हैं शकट कहे जा सकते थे.. मगर नहीं कहे जाते.. इसके ठीक विपरीत वह् धातु से बने वाहन को देखिये- गाड़ी भी वाहन है, शकट भी वाहन है, घोड़ा भी वाहन है, पालकी भी वाहन है.. जो वहन करे वो वाहन है.. क्या शकट में यह अर्थवत्ता है?  

2013/3/15 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 10:34:56 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
हाँ बिल्कुल है, तभी तो उसकी व्युत्पत्ति शक् से सम्भावित बताई है विद्वानों ने। शक्ति बाद का शब्द है, मूल बात ले जाने, ढोने में निहित है। वहनीयता ही वाहन बना रही है। शक् में भी यही वहनीयता देखते हुए उससे रिश्ता जोड़ा गया है।  धात्विक अर्थ। शक में तो सामर्थ्य, बल, ऊर्जा, प्रभाव सब आ गए। अपनी पहली प्रतिक्रिया में यही सब तो कहा जिसे आप कह रहे हैं:)

मानें या न मानें, विद्वानों ने जिस दिशा में इशारा किया है उसे ही विश्लेषित कर रहा ह, अपने मन से कुछ नहीं। हाँ, इन्हीं की कोई बात जब रूढ़ या रंजक व्युत्पत्ति से जुड़े होनी की वजह से गड़बड़ लगती है तब उसे भी खोज बीन के आधार पर विश्लेषित करने का प्रयास रहता है।

2013/3/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 10:37:40 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
यानी घोड़े या बैल को शकट कहा जाता है? मैंने तो कहीं भी ऐसा प्रयोग नहीं देखा..
और रिश्ता वह् से कैसे जुड़ गया? निरुक्ति तो शक् से बताई गई है..  

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 10:56:05 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
बाल की खाल। इस तरह के दर्जनों शब्दों की अर्थवत्ता पर सवाल उठाते हुए यही तर्क मैं भी दे सकता हूँ।
मैं बिल्कुल नहीं समझ पा रहा हूँ आप चाहते क्या हैं? मैने सिर्फ़ बलजीत भाई को अपना स्पष्टीकरण दिया था।

वाहन का बताने आशय बताने के लिए वह् धातु नहीं बताऊँगा ? शकट के मूल में वह् धातु है यह बात कैसे कह सकता हूँ। कृपया उस वाक्य को हाईलाइट करें जिससे यह ग़लतफ़हमी हो रही है। शकट की व्याख्या करते हुए घोड़े और बैल जैसा आप तर्क देंगे तब तो मुझे लग रहा है कि मैं बेकार अपना वक्त यहाँ ज़ाया कर रहा हूँ। अपनी बात भी अगर नहीं समझा पा रहा हूँ, मानने और क़ायल हो जाने का तो आग्रह भी नहीं है।

मेरी अभिव्यक्ति क्षमता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है?

2013/3/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 11:00:27 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
सारा मैटर सिलेक्ट होकर बार बार उड़ जाता है। आटो सेव तो होता है पर कुछ ही अंश बरामद होता है। यह समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। खास तौर पर मैसेज बाक्स में लिखते हुए। कृपया निम्न वाक्य को ठीक से पढ़ें-


"वाहन का बताने आशय बताने के लिए वह् धातु नहीं बताऊँगा ? "

वाहन का संदर्भ बताने के लिए उसकी धातु वह् का उल्लेख नहीं करूँगा ?

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 11:02:13 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
"हाँ बिल्कुल है, तभी तो उसकी व्युत्पत्ति शक् से सम्भावित बताई है विद्वानों ने।"

यहाँ आप कह रहे हैं कि शकट में वही अर्थवत्ता है जो वाहन में है-  इसलिए मैं पूछ रहा हूँ कि आप ये किस आधार पर कह रहे हैं? क्य़ा घोड़े और बैल को शकट कहा जा सकता है?  


"शक् में भी यही वहनीयता देखते हुए उससे रिश्ता जोड़ा गया है। "
यहाँ पर आप शकट को वह़ से जोड़ रहे हैं.. इस से ग़लतफ़हमी हो रही है.. 

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 11:10:38 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
शक् का अर्थ आप्टे के ही कोश में: योग्य होना, सक्षम होना, सबल होना,  सहन करना, शक्तिशाली होना, व्यवहार में योग्य होना, समर्थ होना.. 

क्या कभी भीम को या हनुमान को शकट कहा गया? या राम को, या किसी नाव को जो पार ले जाने में समर्थ होती है.. 

शकट की अर्थवत्ता निहायत सीमित है.. केवल और केवल चार पहियों वाली गाड़ी.. बस.. एक सैनिक व्यूह जो इस नाम का होता है वो इस आकार का होता है इसलिए.. सारे अर्थ गाड़ी के आकार और अर्थ से ही जुड़ते हैं.. और ऐसा अकारण नहीं होता..  

2013/3/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 11:11:45 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
वाहन की अर्थवत्ता क्या है? जो वहन करे। जो ले जाए। वह् यानी ले जाना।
विद्वानों के मुताबिक, कोशों के मुताबिक शकट की अर्थवत्ता क्या है
जो वहन करे, ढोकर ले जाए। शक् से शकट की व्युत्पत्ति इसी आधार पर स्थापित होती है। शक्ति से शकट नहीं है। शक् से शकट, शकटिका आदि बने हैं।
क्या आप यह समझ रहे हैं कि वाहन और शकट में रिश्तेदारी है या वह धातु से शकट बना है?
ऐसा मैंने नहीं कहा। 
कैरी से बने कैरियर में क्या एक साथ वाहन, व्यक्ति, पशु की अर्थवत्ता नहीं है?


2013/3/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
"हाँ बिल्कुल है, तभी तो उसकी व्युत्पत्ति शक् से सम्भावित बताई है विद्वानों ने।"

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 11:15:09 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
शकट के विपरीत वाक़ई में शक् से निकले शक्ति की अर्थवत्ता देखिये.. कितने व्यापक अर्थ हैं उसके.. वाक् शक्ति भी हो सकती है.. चरित्र की भी.. बल की भी.. अभिधा की भी..  

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 11:16:04 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
वाहन की अर्थवत्ता क्या है? जो वहन करे। जो ले जाए। वह् यानी ले जाना।
विद्वानों के मुताबिक, कोशों के मुताबिक शकट की अर्थवत्ता क्या है -
जो वहन करे, ढोकर ले जाए। शक् में निहित जितने भी भाव हैं, उससे यही अर्थवत्ता बनती है। यही कह रहा हूँ।
शक् से शकट की व्युत्पत्ति इसी आधार पर स्थापित होती है। शक्ति से शकट नहीं है। शक् से शकट, शकटिका आदि बने हैं।
क्या आप यह समझ रहे हैं कि वाहन और शकट में रिश्तेदारी है या वह धातु से शकट बना है?
ऐसा मैंने नहीं कहा। 
कैरी से बने कैरियर में क्या एक साथ वाहन, व्यक्ति, पशु की अर्थवत्ता नहीं है?


2013/3/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
"हाँ बिल्कुल है, तभी तो उसकी व्युत्पत्ति शक् से सम्भावित बताई है विद्वानों ने।"

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 11:16:46 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
यही तो कमाल है अजित भाई, विद्वान व्युत्पत्ति शक् से बता रहे हैं और अर्थ वह् से जोड़ रहे हैं.. 

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 11:18:19 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
फिर सारा मैटर उड़ गया :(


 

वाहन की अर्थवत्ता क्या है? जो वहन करे। जो ले जाए। वह् यानी ले जाना।

विद्वानों के मुताबिक, कोशों के मुताबिक शकट की अर्थवत्ता क्या है -
जो वहन करे, ढोकर ले जाए। शक् में निहित जितने भी भाव हैं, उससे यही अर्थवत्ता बनती है। यही कह रहा हूँ।

https://mail.google.com/mail/u/0/images/cleardot.gifशक् से शकट की व्युत्पत्ति इसी आधार पर स्थापित होती है। शक्ति से शकट नहीं है। शक् से शकट, शकटिका आदि बने हैं।

क्या आप यह समझ रहे हैं कि वाहन और शकट में रिश्तेदारी है या वह धातु से शकट बना है?
ऐसा मैंने नहीं कहा। 
कैरी से बने कैरियर में क्या एक साथ वाहन, व्यक्ति, पशु की अर्थवत्ता नहीं है?

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 11:21:35 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
अजित भाई, विद्वान व्युत्पत्ति शक् से बता रहे हैं और अर्थ वह् से जोड़ रहे हैं..  ये मेरे गले नहीं उतरता.. 

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 11:38:26 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
अब संशयास्पद तो उनके लिए यह था ही। सर्वाधिक उपयुक्तता वाले शब्द पर वे स्थिर हुए होंगे। सक्षम बनाना, योग्य बनाना जैसे भावों से  पहुँचाने, लेजाने का आशय सिद्ध किया गया है। ग़लत नहीं है। वैसे भी यह शब्द अर्थवत्ता, उच्चारण और प्रयोग की दृष्टि से विवादित नहीं है। व्युत्पत्ति में भी मुझे झमेला नज़र नहीं आता । जो भी कहेंगे विद्वान ही कहेंगे । हिन्दी में व्याकरण पर बात करने वाले बहुत हैं, व्युत्पत्ति मे सून है

शकट को चक्र से मानने पर मेरी कोई जकड़न नहीं है बल्कि एकाधिक बार इसका ओर भी सम्भाव्यता जताई है। जैसा आप कह रहे हैं। हाँ, विद्वानों ने चक्र से शकट का रिश्ता नहीं जोड़ा है तो रूपान्तर की किन्हीं प्रवृत्तियों के संदर्भ में ही रहा होगा। वहाँ तक फ़िलहाल मैं नहीं पहुँचा हूँ।

2013/3/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
अजित भाई, विद्वान व्युत्पत्ति शक् से बता रहे हैं और अर्थ वह् से जोड़ रहे हैं..  ये मेरे गले नहीं उतरता.. 

--
You received this message because you are subscribed to the Google Groups "शब्द चर्चा " group.
To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to shabdcharcha...@googlegroups.com.
For more options, visit https://groups.google.com/groups/opt_out.
 
 

Abhay Tiwari

unread,
Mar 15, 2013, 11:47:31 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
हमें भी विद्वान माना जाय.. 

2013/3/15 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
अब संशयास्पद तो उनके लिए यह था ही। सर्वाधिक उपयुक्तता वाले शब्द पर वे स्थिर हुए होंगे। सक्षम बनाना, योग्य बनाना जैसे भावों से  पहुँचाने, लेजाने का आशय सिद्ध किया गया है। ग़लत नहीं है। वैसे भी यह शब्द अर्थवत्ता, उच्चारण और प्रयोग की दृष्टि से विवादित नहीं है। व्युत्पत्ति में भी मुझे झमेला नज़र नहीं आता । जो भी कहेंगे विद्वान ही कहेंगे । हिन्दी में व्याकरण पर बात करने वाले बहुत हैं, व्युत्पत्ति मे सून है

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 11:54:00 AM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
अच्छा, यानी ये जो ट्रेल चल रही है इसका आशय यह लगा रहे हैं कि
आपको विद्वान न मानने के लिए कमर कसे हुए हैं:)
और अगर मान लिया तो पूर्ववर्तियों की रूहें करवटे बदलनें लगेंगी?

2013/3/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
हमें भी विद्वान माना जाय.. 

Baljit Basi

unread,
Mar 15, 2013, 11:57:48 AM3/15/13
to शब्द चर्चा
मैंने यह नहीं कहा कि शकट से छकड़ा शब्द की व्युत्पति पर मुझे इतराज़ है।
यह शत पतिशत सही हो सकती है। मेरा मतलब यह था कि चक्र में भी छकड़ा बनने
की संभावना है। मैंने आपको दो ठोस मिसालें दी अवेस्ता के चक्श्रा (रथ)
और अंग्रेज़ी साइकल की।

On 15 मार्च, 09:49, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> *"हम निश्चित रूपसे नहीं कह सकते कि  चक्र के अर्थों वाले शब्दों से  दुनिया
> भर की तमाम
> में वाहन के अर्थों वाले शब्द विकसित नहीं हो सकते"*


> ऐसा मैने कहीं नहीं कहा बलजीत भाई।
> शकट का मूल शक् से होना ज्यादा सम्भव है, यह बहुत स्पष्टता से कहा है। इसी
> सिलसिले में ले जाने, ढोने, वहन करने जैसे भावों से बने उन शब्दों की ओर संकेत
> किया है जिनमें वाहन की अर्थवत्ता है। यूँ तो कैरियर वाहन भी है, बिना पहिए के
> वाहन जैसे जलयान, स्लेज आदि और ढोने वाला मनुष्य भी। वाहन होना महत्वपूर्ण है।
> हर वाहन में पहिया ज़रूरी नहीं। हाँ, पहिया अपने आप में किसी भी उपकरण को वाहन
> नहीं बनाता। वैसे पहिये के आधार पर भी वाहनों के नाम बने हैं। अलबत्ता
> पहियेदार और बेपहिया दोनो तरह के ऐसे वाहन भी हैं जिनके नामकरण का आधार पहिया
> नहीं है। इसी आधार पर शकट-चर्चा में मैने अपने विचार रखे थे। मोनियर विलियम्स
> चाहे शकट की व्युत्पत्ति का आधार पक्का न मानते हों, मगर वे चक्र की
> सम्भाव्यता के बारे में भी कुछ नहीं कहते। आप्टे सीधे सीधे शकटिका का यानी
> गाड़ी का मूल शकट बताते हैं और शकट का मूल शक् धातु बताते हैं।
>
> प्रस्तुत चर्चा में शुरू से ही मैने चक्र के विपर्ययी रूपान्तर की बात कही है।
> मगर तमाम संदर्भों को टटोलने के बाद भी शकट का चक्र से ठोस या कमज़ोर रिश्ता
> जोड़ने वाली कड़ियाँ मुझे नहीं मिली। अभी तो मनघड़न्त आधार पर रची गई कई
> संदेहास्पद व्युत्तियाँ पड़ी हैं जिन पर काम होना चाहिए। चलती चर्चा में एक
> सामान्य शब्द ने ज़रूरत से ज्यादा वक़्त ले लिया, इसका अपराधबोध हो रहा है:(
> बाकी जै हो।
>

> 2013/3/15 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> ...
>
> और पढ़ें »- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 15, 2013, 12:16:04 PM3/15/13
to shabdc...@googlegroups.com
बेशक। बिल्कुल।

2013/3/15 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>
--
You received this message because you are subscribed to the Google Groups "शब्द चर्चा " group.
To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to shabdcharcha...@googlegroups.com.
For more options, visit https://groups.google.com/groups/opt_out.


Abhay Tiwari

unread,
Mar 20, 2013, 1:36:48 PM3/20/13
to shabdc...@googlegroups.com
एक और बात जो अभी ग़ौर की है वो ये कि तमिळ में ऊष्मन् वर्ग की ध्वनियाँ यानी स श ष और ह नहीं हैं.. कम से कम लिपि में तो नहीं हैं.. लिपि में न होने का यही अर्थ है कि वे मूल भाषा में नहीं थी.. बाद में दूसरे भाषासमूह के सम्पर्क के कारण वे बोलने लगे.. जैसे सूरज के लिए उनका शब्द है शूरियन मगर उसे लिखा जाता है चूरियन.. अब इस बात को एक दूसरे तथ्य की रौशनी में देखा जाय.. जिन लोगों को ज़ बचपन से बोलने का अभ्यास नहीं है वे चतुर दिखने की कोशिश में उन शब्दों में भी ज़ का इस्तेमाल करने लगते हैं जहाँ ज़ नहीं साधारण ज है.. 

अगर शकट को तमिळ में लिखा जाया वो लिखा जाएगा चकट.. और इस शब्द के सही उच्चारण के अति उत्साह में द्रविड़ भाषा प्रधान लोक समाज ने उसे शकट में रूपान्तरित कर दिया हो सकता है.. 

2013/3/15 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 20, 2013, 2:00:05 PM3/20/13
to shabdc...@googlegroups.com
बिल्कुल। अब देखिए सिंदूर के लिए तमिल में इंकुलिकम् है।
इसका संस्कृत रूप हिङ्गुलिका है। ऐसे अनेक शब्द हैं।
मराठी आर्यभाषा परिवार और द्रविड़ परिवार दोनो से लेती रही है।


2013/3/20 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Pratibha Saksena

unread,
Mar 20, 2013, 8:32:44 PM3/20/13
to shabdc...@googlegroups.com
वाह! यहाँ की चर्चाएँ याद दिला जाती हैं, 'काव्य,शास्त्र विनोदेन कालोगच्छति धीमताम्‌' 

- प्रतिभा सक्सेना

2013/3/20 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages