राजस्थान में पशुओं द्वारा ढोई जाने वाली गाड़ियों को 'छकड़ा/छकड़ी' कहते हैं. यहाँ गुजरात के शहर में ऑटो-रिक्शा (टेम्पो) से बड़े इसी प्रकार के वाहन को 'छकड़ा' कहा जाता है. यानी छकड़ा शब्द कम से कम दो भाषाओं और ग्रामिण व शहरी क्षेत्र में देखने को मिल रहा है. ऐसे में यह शब्द महज जूगाड़ी-शब्द भी नहीं होना चाहिए. क्या अन्य जगहों पर भी यह शब्द मिलता है?
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संजय बेंगाणी | sanjay bengani । 9601430808
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मोटे तौर अभी जो लगता है उसके मुताबिक व्युत्पत्ति के मद्देनज़र
शब्दों के बनने की
प्रवृत्ति पर गौर करना ज़रूरी है। प्रायः सभी भाषाओं में ढोने, ले जाने,
उठाने जैसी क्रियाओं के आधार पर गतिशीली
उपकरणों यान आदि के नाम पड़े
हैं। चक्र तो गति का पर्याय है ही। वाहन में वह् यानी ले जाना, ढोना प्रमुख
है। अर्थ यान। यान में या महत्वपूर्ण है जिसमें गति का भाव है। इसमें चक्र कहीं नहीं है। अंग्रेजी में
कैरियर शब्द में चक्र नहीं ले जाने का भाव है। ट्रेलर, ट्रेन, वैन, वैगन तमाम शब्दों में ले जाने का भाव
आता है। इसलिए शकट की अर्थवत्ता शक् से
उपजती है, शक् से ही शक्ति यानी ऊर्जा बनती है। ढोने या ले जाने का सम्बन्ध ऊर्जा से है जो अन्तर्निहित है। पहिया अपने आप में ऊर्जा नहीं है। उसे
चलने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। अश्वयान, उष्ट्रयान अथवा अश्ववाहन, उष्ट्रवाहन जैसे समास इन शब्दों के संदर्भ में नहीं बनते जैसे चक्र के संकेत वाले गाड़ी शब्द पर गौर
करें। इसकी व्युत्पत्ति गार्त से बताई जाती
है। हालाँकि 8 मार्च 2011 को आपने इसी मंच पर गाड़ी
की व्युत्पत्ति शटक से बताई थी –“यह संस्कृत शब्द शकट से निकला है..शकट
> हकट > ख़ट
> खड> गड
>गड्डी >गाडी” ।
जबकि गाड़ी गार्त से बना है जिसके मूल में गर्त है। गर्त का अर्थ रथ होता था। गार्त यानी गड्ढा। मार्ग के दोनों और रथ के पहियों से बने गड्ढो की वजह से इन्हें गार्त कहते थे। रामविलास शर्मा के अनुसार संस्कृत के गर्त यानी रथ में गर क्रिया जिस चक्र गति की ओर संकेत करती है वह दरअसल पहिये की गति है। वह, या जिस तरह से गति के पर्याय हैं, चक्र अपने आप ऊर्जा का पर्याय नहीं है। सो गाड़ी के साथ ऊर्जा का स्वरूप स्पष्ट करना ज़रूरी है जो उसे खींच सके मसलन रेलगाड़ी, ऊँटगाड़ी, घोड़ागाड़ी, भैंसागाड़ी, मोटरगाड़ी वगैरह। जबकि वाहन, यान, शकट के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि इसमें वह् अथवा या की तरह शक् यानी ले जाने की क्रिया है जो अन्तर्निहित ऊर्जा से सम्पन्न हो रही है। मूलतः गतिशील भारवाही उपकरण में ले जाने, खींचने, उठाने का भाव महत्वपूर्ण है। वर्ना हर उपकरण के नामकरण में चक्र होना चाहिए था। चक्र से बने कितने वाहन-प्रकार याद आते हैं? आपकी बात सही हो सकती है। मैं अभी और संदर्भों को देख कर अपनी राय बनाऊँगा।
मोटे तौर अभी जो लगता है उसके मुताबिक व्युत्पत्ति के मद्देनज़र शब्दों के बनने की प्रवृत्ति पर गौर करना ज़रूरी है। प्रायः सभी भाषाओं में ढोने, ले जाने, उठाने जैसी क्रियाओं के आधार पर गतिशीली उपकरणों यान आदि के नाम पड़े हैं। चक्र तो गति का पर्याय है ही। वाहन में वह् यानी ले जाना, ढोना प्रमुख है। अर्थ यान। यान में या महत्वपूर्ण है जिसमें गति का भाव है। इसमें चक्र कहीं नहीं है। अंग्रेजी में कैरियर शब्द में चक्र नहीं ले जाने का भाव है। ट्रेलर, ट्रेन, वैन, वैगन तमाम शब्दों में ले जाने का भाव आता है। इसलिए शकट की अर्थवत्ता शक् से उपजती है, शक् से ही शक्ति यानी ऊर्जा बनती है। ढोने या ले जाने का सम्बन्ध ऊर्जा से है जो अन्तर्निहित है। पहिया अपने आप में ऊर्जा नहीं है। उसे चलने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। अश्वयान, उष्ट्रयान अथवा अश्ववाहन, उष्ट्रवाहन जैसे समास इन शब्दों के संदर्भ में नहीं बनते जैसे चक्र के संकेत वाले गाड़ी शब्द पर गौर करें। इसकी व्युत्पत्ति गार्त से बताई जाती है। हालाँकि 8 मार्च 2011 को आपने इसी मंच पर गाड़ी की व्युत्पत्ति शटक से बताई थी –“यह संस्कृत शब्द शकट से निकला है..शकट > हकट > ख़ट > खड> गड >गड्डी >गाडी” ।
जबकि गाड़ी गार्त से बना है जिसके मूल में गर्त है। गर्त का अर्थ रथ होता था। गार्त यानी गड्ढा। मार्ग के दोनों और रथ के पहियों से बने गड्ढो की वजह से इन्हें गार्त कहते थे। रामविलास शर्मा के अनुसार संस्कृत के गर्त यानी रथ में गर क्रिया जिस चक्र गति की ओर संकेत करती है वह दरअसल पहिये की गति है। वह, या जिस तरह से गति के पर्याय हैं, चक्र अपने आप ऊर्जा का पर्याय नहीं है। सो गाड़ी के साथ ऊर्जा का स्वरूप स्पष्ट करना ज़रूरी है जो उसे खींच सके मसलन रेलगाड़ी, ऊँटगाड़ी, घोड़ागाड़ी, भैंसागाड़ी, मोटरगाड़ी वगैरह। जबकि वाहन, यान, शकट के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि इसमें वह् अथवा या की तरह शक् यानी ले जाने की क्रिया है जो अन्तर्निहित ऊर्जा से सम्पन्न हो रही है। मूलतः गतिशील भारवाही उपकरण में ले जाने, खींचने, उठाने का भाव महत्वपूर्ण है। वर्ना हर उपकरण के नामकरण में चक्र होना चाहिए था। चक्र से बने कितने वाहन-प्रकार याद आते हैं? आपकी बात सही हो सकती है। मैं अभी और संदर्भों को देख कर अपनी राय बनाऊँगा।
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अभय भाई,
मैं भी यही कह रहा हूँ कि आप्टे या मोनियर विलियम्स भी पैमाना हैं मगर अन्तिम नहीं। आख़िर वो सवा सौ साल पहले सर्वाधिक आधुनिक माना जाने वाला शोध था।इस बीच भाषा-व्युत्पत्ति के नज़रिये से जो कुछ सामाने आया है उसके मद्देनज़र कई चीज़ें वहाँ भी अस्पष्ट हो सकती हैं, वर्ना वाजपेयीजी, भोलानाथजी, दिनकरजी, माचवेजी, रामविलास जी, भगवानसिंह समेत तमाम शब्द कौतुकियों को करने के लिए कुछ बाकी ही नहीं रहता। खास तौर पर ऐतिहासिक भाषा विज्ञान के क्षेत्र में दर्जनों विद्वानों ने काम किया है। मैं सिर्फ आप्टे या मोवि पर निर्भर नहीं रहता बल्कि हरमुमकिन प्रमाणों तक पहुँचता हूँ।
यह भी सम्भव है कि द्रविड़ चगर्ट संस्कृत के गर्त
का रूपान्तर हो जिसमें घूमने का भाव है। या चक्र का विपर्ययी रूपान्तर हो। चकटम्
संस्कृत के शकटम् से बना हो। संस्कृत में इसके अन्य रूप यानी शकट, शकटी, शकटिका
होने से यह ज्यादा सम्भव लगता है। संस्कृत का स और श अक्सर द्रविड़
भाषाओं के श और च में बदलता हैं। द्रविड़ में भी श और च
में घालमेल होता है। अपनी बात के
समर्थन में मुझे कुछ प्रमाण मिले हैं। आठवीं सदी की कवयित्री अंदल की कृत्ति
थिरुप्पवई में चकटम् का उल्लेख शकटासुर के संदर्भ में आया है। जिसने श्रीकृष्ण का
अंत करने के लिए शकट का अवतार धारण किया था। चकटम् का आधार शकटम् हो सकता है।
यह शकटम् के मूल और चकटम् के द्रविड़ विकास का बड़ा सबूतकी ओर संकेत तो हो सकता है। यह भी गौरतलब है कि
पुराणों की कथाएँ द्रविड़ साहित्य में भी थोड़े बहुत फेरबदल के साथ हैं। नामों के
उच्चार और संदर्भों में स्थानीय संदर्भ और स्पर्श आना स्वाभाविक है। तमिल कोश के
मुताबिक शकटिका का रूप चकटिकाई, शकट का रूप चकटू, शकटम् का रूप चकटम्
और शकटि या शकटी का रूप चकटि है।
इसके अलावा तमिल लैक्सिकन में गोलाई, घुमाव, पहिये के लिए अर, अरि, अरा, अरम, उरुलि जैसे शब्द हैं जो संस्कृत से ही आए हैं। इसके साथ ही रोटाई शब्द है जो निश्चित ही संस्कृत का कहा जा सकता है। संस्कृत में रोटिका यानी रोटी। इसके अलावा वट्टम, तिक्की, चुट्टिरम् जैसे शब्द भी हैं। डेविड मैक्पने की कोर वोकेब्युरी ऑफ़ तमिल में मूलतः चक्रम और चक्कीरम् शब्द मिलते हैं जो भारोपीय परिवार के चक्र के रूपान्तर लगते हैं।
फिर भी और काम की सम्भावना बनी हुई है।
अभय भाई,
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आप स्वयं जानते हैं कि कितनी व्युत्पत्तियां गढ़ी हुई और भ्रामक होती हैं.. कई बार तो शरारतपूर्ण भी.. ख़ुद आपने ही कितनी व्युत्पत्तियों को खण्डित किया है.. इसीलिए कि व्युत्पत्ति को निर्द्वन्द्व नहीं माना जा सकता.. सबसे तार्किक प्रतीत होने वाली निरुक्ति को हम मान लेते हैं.. पर द्वन्द्व की गुंजाईश बनी रहती है इसलिए 'हो सकता है..' जैसी भाषा का प्रयोग अनुचित नहीं बल्कि वांछनीय है..
'
मृच्छकटिक' का अनुवाद मोहन राकेश ने 'मिट्टी का छकड़ा' नाम से किया था। मोहन राकेश ने कुछ समय तक विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाई थी।
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On 14 मार्च, 07:43, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> जै हो अभयभाई:)
> शब्दचर्चा जारी रहे, शब्दों का सफ़र चलता रहे
> शब्द-संधान समूह को नमन्
>
> 2013/3/14 Vinod Sharma <vinodjisha...@gmail.com>
>
>
>
>
>
> > निश्चय ही इतने विषद विवेचन से ज्ञानामृत की वर्षा हो रही है और हम जैसे
> > ज्ञान पिपासुओं को बिन माँगे मोती मिल रहे हैं।
> > अजित भाई और अभय भाई दोनों को साधुवाद!
>
> > 2013/3/14 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
> >> फिर से विचार करने पर मुझे लग रहा है कि ये शब्द संस्कृत में आयातित है..
> >> कारण ये है कि आम तौर पर जब शब्द संस्कृत का ही होता है तो शब्दकोश में उससे
> >> मिलते-जुलते और दूसरे शब्द मिलते हैं.. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं है.. शकल
> >> का अर्थ है टुकड़ा और शकन का अर्थ है मल..
>
> >> और अगर इस के दूसरे अर्थों पर भी ध्यान दिया जाय तो देखें कि एक अर्थ है -
> >> २००० पल की तौल जो एक गाड़ी के बराबर होती है.. यानी ये शब्द बाजार का शब्द
> >> था.. और हम जानते हैं कि प्राचीन समाज में संस्कृत बाजार की भाषा नहीं थी..
> >> बाजार में बोले जाने वाले शब्द या तो तद्भव होते थे या उनकी अपनी भाषा के शब्द
> >> (आज भी ऐसा ही है).. इस मामले में ये तद्भव ही प्रतीत होता है..मूर्धन्य ट भी
> >> इसी की ओर इशारा कर रहा है..
>
> >> उस समाज में संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा थी, शूद्रों की नहीं.. और गाड़ी
> >> बनाने वाले तो निश्चित ही शूद्र रहे होंगे.. उन्होने गाड़ी को जो शब्द दिया
> >> होगा- तद्भव ही सही- वही लोकप्रिय हो गया होगा.. इतना कि ब्राह्मण भी उसे
> >> अपनाने को बाध्य हुए होंगे.. [सब सम्भावनाएं ही हैं अजित भाई! :) ]
>
> >> वैसे मोनियर विलियम्स ने इस के बारे में लिखा है- ऑफ डाउटफुल डेरिवेशन..
>
> >> 2013/3/14 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
> >>> *मृच्छकटिकम् *पर ध्यान दें। संधि की जितनी मोटी समझ है यह मृद्+शकटिक से
> >>> बना है ।
> >>> *त+श* तथा *द+श* मिलने से *छ* बनता है। यूँ भी *श* के *छ* में बदलने की
> >>> वृत्ति है। *षष्ठ=छठ*
> >>> इस तरह
> >>> *शकट > छकट > छकड़ा*
>
> >>> *[मनोरंजन वाली बात सिरमाथे। व्युत्पत्ति-विचार क्ले-मॉडलिंग जितना आसान
> >>> काम नहीं है कि एक ही लौंदे से गणेश भी बना लो और गोबर भी, चिड़िया भी बना लो
> >>> और पेड़ भी। शब्द उंगलियों की हरकत या होठों की थिरकन से नहीं बनते, वे बनते
> >>> हैं ध्वनि और अर्थ के मेल से। कण्ठ की प्रकृति से। ध्वनिछटाओं से। न तो अब
> >>> गोबर में गणेश तलाशे जा सकते हैं, न ही गोड़शे में गाँधी। हमारी बात को भी
> >>> मनोरंजन भाव से ही लिया जाए]*
>
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> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/
> औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए
यह सदियों पुरानी बात है, जब सभयता अपने प्रारम्भक दौर में थी . तब
पटरियों पर गाड़ीआं चलती थीं। यह भाप की शक्ति से चलती थीं और चलते समय
'छक छक' सी आवाज़ करती थीं। इसी लिए इन्हें 'छकड़ा' कहा जाने लगा . फिर
ज़माने ने करवट ली और बैल गाड़ी विकसित हुई। छकड़ा बहुत पुरानी घटिया चीज़
लगने लगी . तब इस शब्द की अधोगति हुई और हर खटारा वाहन को छकड़ा कहा जाने
लगा।
On 14 मार्च, 02:15, Rajendra Gupta राजेंद्र गुप्ता
"हाँ बिल्कुल है, तभी तो उसकी व्युत्पत्ति शक् से सम्भावित बताई है विद्वानों ने।"
"हाँ बिल्कुल है, तभी तो उसकी व्युत्पत्ति शक् से सम्भावित बताई है विद्वानों ने।"
वाहन की अर्थवत्ता क्या है? जो वहन करे। जो ले जाए। वह् यानी ले जाना।
विद्वानों के मुताबिक, कोशों के मुताबिक शकट की अर्थवत्ता क्या है -
जो वहन करे, ढोकर ले जाए। शक् में निहित जितने भी भाव हैं, उससे यही अर्थवत्ता बनती है। यही कह रहा हूँ।
शक् से शकट की व्युत्पत्ति इसी आधार पर स्थापित होती है।
शक्ति से शकट नहीं है। शक् से शकट, शकटिका आदि बने हैं।
क्या आप यह समझ रहे हैं कि वाहन और शकट
में रिश्तेदारी है या वह धातु से शकट बना है?
ऐसा मैंने नहीं कहा।
कैरी से बने कैरियर में क्या एक साथ वाहन, व्यक्ति, पशु की अर्थवत्ता
नहीं है?
अजित भाई, विद्वान व्युत्पत्ति शक् से बता रहे हैं और अर्थ वह् से जोड़ रहे हैं.. ये मेरे गले नहीं उतरता..
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अब संशयास्पद तो उनके लिए यह था ही। सर्वाधिक उपयुक्तता वाले शब्द पर वे स्थिर हुए होंगे। सक्षम बनाना, योग्य बनाना जैसे भावों से पहुँचाने, लेजाने का आशय सिद्ध किया गया है। ग़लत नहीं है। वैसे भी यह शब्द अर्थवत्ता, उच्चारण और प्रयोग की दृष्टि से विवादित नहीं है। व्युत्पत्ति में भी मुझे झमेला नज़र नहीं आता । जो भी कहेंगे विद्वान ही कहेंगे । हिन्दी में व्याकरण पर बात करने वाले बहुत हैं, व्युत्पत्ति मे सून है
On 15 मार्च, 09:49, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> *"हम निश्चित रूपसे नहीं कह सकते कि चक्र के अर्थों वाले शब्दों से दुनिया
> भर की तमाम
> में वाहन के अर्थों वाले शब्द विकसित नहीं हो सकते"*
> ऐसा मैने कहीं नहीं कहा बलजीत भाई।
> शकट का मूल शक् से होना ज्यादा सम्भव है, यह बहुत स्पष्टता से कहा है। इसी
> सिलसिले में ले जाने, ढोने, वहन करने जैसे भावों से बने उन शब्दों की ओर संकेत
> किया है जिनमें वाहन की अर्थवत्ता है। यूँ तो कैरियर वाहन भी है, बिना पहिए के
> वाहन जैसे जलयान, स्लेज आदि और ढोने वाला मनुष्य भी। वाहन होना महत्वपूर्ण है।
> हर वाहन में पहिया ज़रूरी नहीं। हाँ, पहिया अपने आप में किसी भी उपकरण को वाहन
> नहीं बनाता। वैसे पहिये के आधार पर भी वाहनों के नाम बने हैं। अलबत्ता
> पहियेदार और बेपहिया दोनो तरह के ऐसे वाहन भी हैं जिनके नामकरण का आधार पहिया
> नहीं है। इसी आधार पर शकट-चर्चा में मैने अपने विचार रखे थे। मोनियर विलियम्स
> चाहे शकट की व्युत्पत्ति का आधार पक्का न मानते हों, मगर वे चक्र की
> सम्भाव्यता के बारे में भी कुछ नहीं कहते। आप्टे सीधे सीधे शकटिका का यानी
> गाड़ी का मूल शकट बताते हैं और शकट का मूल शक् धातु बताते हैं।
>
> प्रस्तुत चर्चा में शुरू से ही मैने चक्र के विपर्ययी रूपान्तर की बात कही है।
> मगर तमाम संदर्भों को टटोलने के बाद भी शकट का चक्र से ठोस या कमज़ोर रिश्ता
> जोड़ने वाली कड़ियाँ मुझे नहीं मिली। अभी तो मनघड़न्त आधार पर रची गई कई
> संदेहास्पद व्युत्तियाँ पड़ी हैं जिन पर काम होना चाहिए। चलती चर्चा में एक
> सामान्य शब्द ने ज़रूरत से ज्यादा वक़्त ले लिया, इसका अपराधबोध हो रहा है:(
> बाकी जै हो।
>
> 2013/3/15 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
> ...
>
> और पढ़ें »- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
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