आदिवासी

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अभय तिवारी

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Jun 14, 2010, 11:06:45 PM6/14/10
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इन दिनों कुछ लेख पढ़ रहा था जो भारत की विभिन्न प्रजातियों के इतिहास से
सम्बन्धित हैं। उनको पढ़ते हुए जिज्ञासा हुई कि यह शब्द 'आदिवासी' कितना
पुराना है?
आम तौर पर आदिवासी कहलाए जाने लोग घने जंगलों में क़बीलाई समाज में रहते
हैं जिनके चलते उन्हे कुछ लोग 'वनवासी' कह कर भी पुकारते हैं। ज़ाहिर है
कि यह मामला इस भूमि पर 'कौन सी प्रजाति कब आई' और 'किस ने किस का दमन
किया' से जुड़ा है। वनवासी का प्रयोग वही लोग करते हैं जो मानते हैं कि
'आर्य' कहीं से आए नहीं, यहीं के हैं।
आप कुछ मदद करें!

Abhay Tiwari

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Jun 15, 2010, 10:37:35 AM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
तमाम शब्दकोषों में आदिवासी शब्द की स्थिति यह रही:

मोनियर-विलियम्स (अंग्रेज़ी-संस्कृत) - नहीं है
वामन आप्टे (संस्कृत०हिन्दी) - नहीं है
एस डब्ल्यू फ़ैलन (हिन्दुस्तानी-अंग्रेज़ी) -नहीं है
रसाल (भाषा शब्द कोष)- है, अर्थ के आगे कोष्ठक में एबारिजिनल लिखा है

मोनियर-विलियम्स (१८९९) और आप्टे (१८९०) के कोषों में अनुपस्थिति का अर्थ यह है
कि ये शब्द संस्कृत परम्परा का नहीं है जबकि आदिवासी शब्द के दोनों हिस्से
संस्कृत मूल के हैं।
फ़ैलन के कोष में न होने से यह माना जा सकता है कि उस वक़्त (१८७९) में यह शब्द
आम चलन में नहीं आया था।
१९३६ आते-आते इस शब्द ने हिन्दी चेतना में अपनी जगह बना ली थी तभी रसाल जी ने
अपने कोष में इसे जगह दी।
मालूम देता है ये कि यह शब्द अंग्रेज़ी शब्द एबारिजिनल (aboriginal) का अनुवाद
कर के बनाया हुआ शब्द है, और गोंड, संथाल, मुण्डा आदि जनजातियों के 'आर्यों' व
'द्रविड़ों' से पहले इस देश में बने होने का विचार भी आयातित विचार है। क्योंकि
दूसरों के मुक़ाबले उनके पहले से यहाँ बने होने के प्रमाण किसी और तरह से हमारी
परम्परा में नहीं मिलते। सह-अस्तित्व के ज़रूर मिलते हैं।


ghughuti basuti

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Jun 15, 2010, 10:51:04 AM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
लगता है कि आपकी बात ही ठीक है। नालन्दा अध्यतन कोष में इसका अर्थ किसी देश अथवा राज्य के मूल निवासी या आदिम निवासी दिया गया है।
हो सकता है कि देश में दो तरह के लोग रह रहे थे एक नागरिक या कृषक और दूसरे वनवासी। शायद दोनों ही साथ साथ रह रहे थे।
यदि रामायण आदि की वानर व अन्य जातियों पर ध्यान दिया जाए तो लगता है कि होमो सेपियन्स के साथ साथ कुछ अन्य जातियाँ भी सह अस्तित्व का जीवन जी रही थीं। अब बीच बीच में इस तरह के समाचार समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलते हैं।
घुघूती बासूती

2010/6/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

विनय | Vinay

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Jun 15, 2010, 11:42:43 AM6/15/10
to शब्द चर्चा
दिलचस्प.

प्लैट्स (1884) के शब्दकोष में भी यह नहीं मिलता. इंटरनेट पर एक तुरत खोज
से दो तीन बातें पता चलीं.

1) यह शब्द 1930 में ख़ासकर बनाया गया था.
"Although terms such as atavika (Sanskrit for forest dwellers),
vanvasi or girijan (hill people)[5] are also used for the tribes of
India, adivasi carries the specific meaning of being the original and
autochthonous inhabitants of a given region, and was specifically
coined for that purpose in the 1930s.[6] " (Wikipedia -
http://en.wikipedia.org/wiki/Adivasi#cite_note-barnes1995-5)

2) गाँधी, अंबेडकर, फुले, ठक्कर बप्पा - इन चारों में से एक ने इसे सबसे
पहले इस्तेमाल किया. फुले 1930 में थे नहीं इसलिए उन्हें हटाया जा सकता
है.

पियर्सन सामान्य अध्ययन (http://books.google.com/books?id=dxHalOo-
Ci8C&lpg=RA1-PA192&dq=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE
%E0%A4%B8%E0%A5%80%20%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6&pg=RA1-
PA192#v=onepage&q=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE
%E0%A4%B8%E0%A5%80%20%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6&f=false)

3) भारतीय संविधान आदिवासी शब्द का प्रयोग नहीं करता. इसकी जगह अक्सर
जनजाति शब्द का प्रयोग है.

विनय


On Jun 15, 10:37 am, "Abhay Tiwari" <abhay...@gmail.com> wrote:
> तमाम शब्दकोषों में आदिवासी शब्द की स्थिति यह रही:
>

> मोनियर-विलियम्स (अंग्रेज़ी-संस्कृत) - नहीं है


> वामन आप्टे (संस्कृत०हिन्दी) - नहीं है

> एस डब्ल्यू फ़ैलन (हिन्दुस्तानी-अंग्रेज़ी) -नहीं है


> रसाल (भाषा शब्द कोष)- है, अर्थ के आगे कोष्ठक में एबारिजिनल लिखा है
>
> मोनियर-विलियम्स (१८९९) और आप्टे (१८९०) के कोषों में अनुपस्थिति का अर्थ यह है
> कि ये शब्द संस्कृत परम्परा का नहीं है जबकि आदिवासी शब्द के दोनों हिस्से
> संस्कृत मूल के हैं।

> फ़ैलन के कोष में न होने से यह माना जा सकता है कि उस वक़्त (१८७९) में यह शब्द


> आम चलन में नहीं आया था।
> १९३६ आते-आते इस शब्द ने हिन्दी चेतना में अपनी जगह बना ली थी तभी रसाल  जी ने
> अपने कोष में इसे जगह दी।

> मालूम देता है ये कि यह शब्द अंग्रेज़ी शब्द एबारिजिनल (aboriginal) का अनुवाद


> कर के बनाया हुआ शब्द है, और गोंड, संथाल, मुण्डा आदि जनजातियों के 'आर्यों' व

> 'द्रविड़ों' से पहले इस देश में बने होने का विचार भी आयातित विचार है। क्योंकि
> दूसरों के मुक़ाबले उनके पहले से यहाँ बने होने के प्रमाण किसी और तरह से हमारी
> परम्परा में नहीं मिलते। सह-अस्तित्व के ज़रूर मिलते हैं।

kamal swaroop

unread,
Jun 15, 2010, 12:08:14 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
dalit bhi naya hai opressed ka anuvaad hai

2010/6/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Jun 15, 2010, 12:20:43 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
आटविक अट्ट धातु से बना है और बहुत सामान्य तरीके से कंदराओं में रहनेवाले के लिए प्रयुक्त हो सकता है। पर बात आदिवासी शब्द की हो रही है जो सामासिक शब्द है। आटविक समास नहीं, स्वतंत्र शब्द है।

मेरा पुख्ता विचार है कि यह शब्द बांग्ला आधार से उठा है। काशी, कोलकाता के हिन्दी सेवियों ने अठारहवी सदी में ही हिन्दी कोशों के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। संस्कृत की परम्परा वाले मौलिक शब्दों का जन्म सिर्फ हिन्दी ही नहीं बल्कि मराठी, बांग्ला, उड़िया में भी मिलते हैं और अन्य भाषाओं में भी। हिन्दी में बांग्ला और मराठी से कई शब्द गए हैं जो आज इस कदर घुलमिल गए हैं कि ताज्जुब होता है। आंदोलन, उपहार, उपन्यास जैसे कई शब्द हिन्दी को बांग्ला की देन है। यही नहीं संस्कृत तक ने विभिन्न भाषाओं से शब्द लिए हैं और नए शब्द भी बनाए हैं।

सो मेरा पक्का विश्वास है कि आदिवासी शब्द बांग्ला आधार से उठा शब्द है। बांग्लादेश  की बांग्ला में आज भी आदिवासी शब्द का इस्तेमाल यही साबित करता है कि बांग्ला में इस शब्द का इस्तेमाल हिन्दी से काफी पहले से जारी है।


2010/6/15 विनय | Vinay <vinay...@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

kamal swaroop

unread,
Jun 15, 2010, 12:47:27 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
hum sab gupha se nikalen hain

2010/6/15 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Jun 15, 2010, 12:53:13 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
हिन्दी की तरह बंगला साहित्य का विकास भी सीधे तरह से फ़ोर्ट विलियम्स से जुड़ा हुआ है। माइकेल मधुसूदन दत्त और बंकिमचन्द्र के पहले बंगला में साहित्य की क्या कोई परम्परा थी? फिर 'आदिवासी' जैसे शब्द की ज़रूरत क्यों पड़ने लगी? क्या आदिवासी साहित्य का विषय थे? जबकि उनकी अलग-अलग स्वतंत्र पहचान के शब्द - संथाल, मुण्डा आदि- मौजूद थे तो एक ऐसे शब्द की ज़रूरत क्यों पड़ी जिसके अन्दर कौन पहले आया की पूरी विचारधारा छिपी हो?
 
बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में हड़प्पा की खोज और उसके बाद की कल्पनाओं से आर्यों के हमलावर होने की बात और द्रविड़ों को दक्षिण में धकेलने की बातें होने लगी। उसके पहले १९वीं सदी के मध्य से आर्यों के मध्यएशिया से भारत में प्रवेश करने के काल्पनिक सिद्धान्त चल रहे थे। हड़प्पा की खोज से उन्हे जैसे प्रमाण सा मिल गया। मगर हाल के शोधों से इस कल्पना पर सवाल खड़े हो गए हैं, विशेषकर जेनेटिक वैज्ञानिकों के शोधों से, जिन्होने पाया है कि उत्तर भारतीय जातियों में, आदिवासियों समेत, आपस में कम अन्तर है और उत्तर के ब्राह्मणों और दक्षिण के ब्राह्मणों में अधिक अन्तर हैं। ठेठ भारतीय लोगों में पाई जाने वाली बीमारियों का अध्ययन करने वाले और दूसरे क़िस्म के अध्ययनों का अनुमान है कि भारत में रहने वाले कम से कम पचास हज़ार साल से इसी प्रदेश में निवास कर रहे हैं। कहाँ लोग पाँच हज़ार को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे.. अब बात पचास हज़ार की हो रही है।
 
देखिये सरोजिनी साहू के शोध का सार- http://en.scientificcommons.org/13894665
 
इसीलिए मुझे लगता है कि हमलावर आर्यों बनाम देशज द्रविड़ और सबसे पुराने आदिवासी का सिद्द्धन्त पक कर तैयार हो गया। उस के बाद के सारे इतिहासकार और भाषावैज्ञानिक इस घटनाक्रम को राजा-रानी की कहानी की तरह सुनाने लगे और साल तक गिनाने लगे। कोसाम्बी और सुनीति कुमार चैटर्जी भी इस दोष में नहाए हुए हैं।

ashutosh kumar

unread,
Jun 15, 2010, 1:54:15 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
आदिवासी शब्द की उत्पत्ति के बारे में तुम्हारी परिकल्पना तर्कसंगत है.
लेकिन आदिवासी और आर्य सब एक ही थे तो आदिवासियों के बीच ' दिकू' शब्द कैसे चलन में आया. दिकू माने दिक् करने वाले . दिक्कतें पैदा करने वाले. अब इस शब्द का भी इतिहास जानना चाहिए.

Abhay Tiwari

unread,
Jun 15, 2010, 2:00:10 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
तथाकथित 'आर्य' और 'आदिवासी' एकदम एक नहीं थे मगर उतने दूर भी नहीं थे जितना कि बताया जाता रहा है, ये नए शोधों से निकल के आ रहा है।
दिक ज़रूर करते रहे होंगे.. कोई देवता थोड़ी थे!
वैसे लोग तो बीवी का नाम भी मुसीबत रखते हैं। क्या कीजियेगा! :)
----- Original Message -----
Sent: Tuesday, June 15, 2010 11:24 PM
Subject: Re: आदिवासी

ashutosh kumar

unread,
Jun 15, 2010, 2:12:46 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
या देवता या देवी
 या मियाँ  या बीवी !
बहुत खूब.

2010/6/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Anita Kumar

unread,
Jun 15, 2010, 2:16:14 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
रोचक
अनीता

2010/6/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
हिन्दी की तरह बंगला साहित्य का विकास भी सीधे तरह से फ़ोर्ट विलियम्स से जुड़ा हुआ है। माइकेल मधुसूदन दत्त और बंकिमचन्द्र के पहले बंगला में साहित्य की क्या कोई परम्परा थी? फिर 'आदिवासी' जैसे शब्द की ज़रूरत क्यों पड़ने लगी? क्या आदिवासी साहित्य का विषय थे? जबकि उनकी अलग-अलग स्वतंत्र पहचान के शब्द - संथाल, मुण्डा आदि- मौजूद थे तो एक ऐसे शब्द की ज़रूरत क्यों पड़ी जिसके अन्दर कौन पहले आया की पूरी विचारधारा छिपी हो?



--
http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/
http://anitakumar-meripasand.blogspot.com/
http://manodrishti.blogspot.com/

अजित वडनेरकर

unread,
Jun 15, 2010, 2:18:37 PM6/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
आर्य पश्चिम से आए थे, यह बात अब बतौर फैशन भी कोई नहीं करना चाहता और इस धारणा को चुनौती मिलते हुए भी कई दशक हो चुके हैं। आर्य जाति के लोग अलबत्ता भारत से लेकर पश्चिम एशिया तक पसरे थे इसमें संदेह नहीं।

हां, आदिवासी शब्द को गढ़ा हुआ मानने की जल्दबाजी भी नहीं करनी चाहिए।  

2010/6/15 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

pankaj upadhyay

unread,
Jun 16, 2010, 12:07:11 AM6/16/10
to शब्द चर्चा
"आर्य पश्चिम से आए थे, यह बात अब बतौर फैशन भी कोई नहीं करना चाहता और
इस धारणा
को चुनौती मिलते हुए भी कई दशक हो चुके हैं।"

अजीत जी, सही कहा आपने।
मुझे याद है इस सन्दर्भ में ऑरकुट की एक कम्यूनिटी में एक अच्छा
शास्त्राथ चला था| द्रविड़ों का कहना था कि आर्य यूरोप से आये थे और
यूरोप के कुछ इतिहासविदों ने इस बात का समर्थन किया था| एक विदेशी (नाम
मुझे इस वक़्त याद नहीं) जो BHU से इतिहास में शोध कर रहा था, उसका पूछना
था कि फिर रामायण में द्रविड़ों का उल्लेख क्यूँ नहीं मिलता..| जब राम
अयोध्या से लंका गए तो उस वक़्त रास्ते में उन्हें सिर्फ वानर मिले थे,
द्रविड़ नहीं| इस बारे में एक द्रविड़ का कहना था राम जिस लंका में गए थे
वो भारत में ही कहीं थी लेकिन फिर रामसेतु और अशोक वनों का हवाला दिया
गया जो हनुमान जी ने जलाये थे| श्री लंका में आज भी बड़े बड़े अशोक वन
मिलते हैं|

आदिवासियों के रीति रिवाजों के बारे में जो भी पढता आया हूँ उससे मुझे
यही लगा है कि उनकी संस्कृति/ आचार-विचार तब भी और अब भी बहुत खुली
मानसिकता वाले थे जैसे आदिवासियों में महिलाएं और पुरुष अभी भी हाथ
मिलाते हैं जबकि हमारे यहाँ इसकी इज़ाज़त नहीं| साथ ही साथ महिलाओं के
परिधानों के मामले में भी उनके वहाँ ज्यादा रोकटोक नहीं दिखती| समय के
आरोह में आर्य बदलते गए जबकि आदिवासियों ने अपनी पुरानी संस्कृति को
जीवित रखा| कहीं आदिवासी ही तो भारत के मूल नागरिक नहीं??
"इसीलिए मुझे लगता है कि हमलावर आर्यों बनाम देशज द्रविड़ और सबसे पुराने


आदिवासी का सिद्द्धन्त पक कर तैयार हो गया। उस के बाद के सारे इतिहासकार
और भाषावैज्ञानिक इस घटनाक्रम को राजा-रानी की कहानी की तरह सुनाने लगे
और साल तक गिनाने लगे। कोसाम्बी और सुनीति कुमार चैटर्जी भी इस दोष में
नहाए हुए हैं। "

कहीं मैं भी तो उसी सिद्धांत की बात नहीं कर रहा... :) इस बारे में आप
ज्ञानी लोग थोडा और प्रकाश डालें तो ज्ञान चक्षु खुलें..

साभार,
पंकज उपाध्याय
http://pupadhyay.blogspot.com
http://wakeupbuddha.wordpress.com/

On Jun 15, 11:18 pm, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> आर्य पश्चिम से आए थे, यह बात अब बतौर फैशन भी कोई नहीं करना चाहता और इस धारणा
> को चुनौती मिलते हुए भी कई दशक हो चुके हैं। आर्य जाति के लोग अलबत्ता भारत से
> लेकर पश्चिम एशिया तक पसरे थे इसमें संदेह नहीं।
>
> हां, आदिवासी शब्द को गढ़ा हुआ मानने की जल्दबाजी भी नहीं करनी चाहिए।
>

> 2010/6/15 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> >  तथाकथित 'आर्य' और 'आदिवासी' एकदम एक नहीं थे मगर उतने दूर भी नहीं थे जितना
> > कि बताया जाता रहा है, ये नए शोधों से निकल के आ रहा है।

> > दिक ज़रूर करते रहे होंगे.. कोई देवता थोड़ी थे!


> > वैसे लोग तो बीवी का नाम भी मुसीबत रखते हैं। क्या कीजियेगा! :)
>
> > ----- Original Message -----

> > *From:* ashutosh kumar <ashuvand...@gmail.com>
> > *To:* shabdc...@googlegroups.com
> > *Sent:* Tuesday, June 15, 2010 11:24 PM
> > *Subject:* Re: आदिवासी

अफ़लातून Aflatoon

unread,
Jun 16, 2010, 2:22:19 AM6/16/10
to शब्द चर्चा
ठक्कर बापा द्वारा स्थापित संस्था 'आदिम जाति सेवक संघ ' है | बाबा
साहेब 'प्रिमिटिव ट्राइब्स' का प्रयोग करते थे | दक्षिण गुजरात के एक
आदिवासी इलाके को 'कालीपरज' कहा जाता था उसे गांधीजी के साथी जुगतराम
दावे ने रानीपरज कहना शुरू किया | आज भी रानीपरज कहते हैं |


On Jun 15, 8:42 pm, विनय | Vinay <vinaypj...@gmail.com> wrote:
> दिलचस्प.
>
> प्लैट्स (1884) के शब्दकोष में भी यह नहीं मिलता. इंटरनेट पर एक तुरत खोज
> से दो तीन बातें पता चलीं.
>
> 1) यह शब्द 1930 में ख़ासकर बनाया गया था.
> "Although terms such as atavika (Sanskrit for forest dwellers),
> vanvasi or girijan (hill people)[5] are also used for the tribes of
> India, adivasi carries the specific meaning of being the original and
> autochthonous inhabitants of a given region, and was specifically

> coined for that purpose in the 1930s.[6] " (Wikipedia -http://en.wikipedia.org/wiki/Adivasi#cite_note-barnes1995-5)

> > परम्परा में नहीं मिलते। सह-अस्तित्व के ज़रूर मिलते हैं।- Hide quoted text -
>
> - Show quoted text -

sumant

unread,
Jun 16, 2010, 3:11:23 PM6/16/10
to शब्द चर्चा
आशुतोष भाई कुछ अत्यंत गहरी बात कह रहे हैं, मेरी समझ में रत्ती भर नहीं
आई। दिकू शब्द आआआआआदि वासियों के बीच कैसे पहुँचा? यह गंभीर मसला है और
दिक्कत तलब हरुफ है। वैसे ही जैसे आर्यों में आदि शब्द कैसे पहुँचा? आदि
रामायण, आदिकाल, आदिनाथ आदि-आदि?

नेटिव, अपाचे, एबोरिजिनल, होमोजीनियस, इण्डिजिनस आदि-आदि शब्द पाश्चात्य
चोरों के/ तथाकथित सभ्यों के हैं जो दूसरे देशो पर कब्जा करनें और उनको
गुलाम बनाकर रखनें के लिए गढे़ जाते रहे हैं और आगे भी गढ़े जाते रहेंगे।
अमेरिका के रेडइण्डियंस, कनाड़ा के वाईकिंग, न्यूजीलैण्ड़ , आस्ट्रेलिया
सभी जगह यह कहानी दुहरायी जाती है। पहलें नेटिव फिर ठीक से जमनें के बाद
अपाचे,अबोरिजिनल,होमोजीनियस या इण्डिजिनस इस आधार पर कहा जाता है कि उनकी
भाषा एक नहीं है, कि उनकी शक्ले, रंग-रुप एक से नहीं है कि इसीलिए वे एक
नेशन नहीं कहे जासकते। और यह भी कि कोई ५००००हजार साल पहले अमेरिका आया
था तो कोइ ८०मिलियन बरस पहले न्यूजीलैण्ड में लैण्ड किया था । अत: इन्हें
मूल निवासी नहीं कहा/माना जा सकता। गोरे ब्रिटिश आततायी जो १७वीं सदी के
मध्य में आस्ट्रेलिया पहुँचे थे स्वयं को नेटिव आस्ट्रेलियन कह और लिख
रहे हैं। मूल निवासियों के साथ जितना घ्रणित व्यवहार इन गोरों नें किया
है उसकी तो मिसाल ढ़ूढे न मिलेगी।

फिर भी अपनें दॆश में आदिवासियों, जन-जातियों आदि के नाम पर राजनीति की
गुंजाइश बची हुई है इसलिए यह शब्द इसी भांति अपना चमत्कार दिखाते रहेंगे।
सुमन्त

Ashutosh Kumar

unread,
Jun 17, 2010, 2:44:13 PM6/17/10
to शब्द चर्चा

On Jun 17, 12:11 am, sumant <sumantmishra.kan...@gmail.com> wrote:
> आशुतोष भाई कुछ अत्यंत गहरी बात कह रहे हैं, मेरी समझ में रत्ती भर नहीं
> आई। दिकू शब्द आआआआआदि वासियों के बीच कैसे पहुँचा? यह गंभीर मसला है और
> दिक्कत तलब हरुफ है। वैसे ही जैसे आर्यों में आदि शब्द कैसे पहुँचा? आदि
> रामायण, आदिकाल, आदिनाथ आदि-आदि?

>'' मूल निवासियों के साथ जितना घ्रणित व्यवहार इन गोरों नें किया


है उसकी तो मिसाल ढ़ूढे न मिलेगी।
फिर भी अपनें दॆश में आदिवासियों, जन-जातियों आदि के नाम पर राजनीति की
गुंजाइश बची हुई है इसलिए यह शब्द इसी भांति अपना चमत्कार दिखाते
रहेंगे।''
सुमन्त

गोरे उपनिवेशकों ने दुनिया के साथ जो कुछ किया है वह सारी गाथा जिस
दिन सामने आ जायेगी, दुनिया यह देख कर हैरान रह जायेगी की सभ्यता की
आधुनिक यात्रा कितनी हैवानियत से भरी रही है. जिन्हें भौतिक रूप से नष्ट
न कर सके. उनकी भाषाओं और संस्कृतियों का खात्मा किया . जहां ये भी न हो
सका, वहाँ भी लोगों के स्वाभिमान और आत्मविश्वास की तो ऐसी तैसी कर ही
दी.

अपने देश में आदिवासियों के साथ जो राजनीति हो रही है , वह क्या है?
उन्हें जबरिया अपनी जमीनों से खदेड़ना- उजाड़ना , की उन जमीनों में
छुपा सोना भकोसा जा सके , एक तरह का जनसंहार नहीं है क्या ? इस में साम
दाम दंड भेद सब आजमाया जा रहा है. वह तो माओवादियों ने फच्चर फंसा दिया ,
वरना अब तक ग्रीन हंट निपट चुका होता.

आर्यों के दासों /असुरों / अनार्यों से जितने भी संघर्ष हुए हों,बेशक वे
खींच तान की शक्ल में अधिक थे , क्यों की पुरानी दुनिया में सब के लिए
गुंजाइश थी. यह तो आधुनिक नयी दुनिया है जो पूर्ण वर्चस्व और विनाश की
जरूरत ले कर आई. यह पूंजीवाद की निरंतर विस्तार और एकाधिकार की जरूरत
थी .

जीन विज्ञान के नक्शा-नवीशों ने तो लगभग तय कर दिया है की सारी दुनिया
की पहली पुरखन कोई हब्शन दादी अम्मा ही रहीं.वसुधैव कुटुम्बकम का यह
वैज्ञानिक प्रमाणीकरण हमें तो खुशगवार ही लगता है. अब इस से क्या फर्क
पड़ता है की वे आर्यजन यहीं के थे , या कहीं और से अटकते भटकते आन
पहुंचे थे, जिन्हों ने पहलेपहल यह सिद्धांत प्रस्तावित किया था .वैसे
मुश्किल ही लगता है यह सिद्धांत ऐसे लोगों का होगा , जो पहले ही दुनिया
की ख़ाक न छाने बैठे हों.

फर्क उन को पड़ता है,जिन्हें यह साबित करना है की इस देश में कुछ लोग तो
प्रथम नागरिक हैं , और कुछ जो हैं , वे दूसरे दर्जे के हैं. उन का तो
सारा वजूद , सारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद इसी धारणा पर अवलंबित है. अगर
आर्य भी बाहर से आये थे , तो उन्हें बाद में आने वालों से बदसलूकी करने
का क्या हक बनता है ?गोया रेल के डिब्बे में जो कोई पहले घुस आया , वो
बाद में आने वालों को आँखें दिखाने लगा.

मेरे तईं तो यह प्रश्न अभी अनुत्तरित ही है . और बहुत प्रासंगिक भी नहीं
है. इस सिलसिले में मेरे जानते कुछ गौरतलब बातें यों हैं -

ऋग्वेद ही आर्यों की सब से पुरानी किताब है. ऋग्वेद रचने वाले पंजाब
सिंध (सिन्धु घाटी ) के इलाके से परिचित थे. गंगा जमना के दो-आब से उन का
परिचय नहीं है. यह भूगोल अन्य वेदों में मिलता है, जो बाद में रचे गए. तो
साफ़ है की आर्य सिधु घाटी से पूरब की ओर बढ़ते गएँ हैं.इधर पहले से जो
लोग मौजूद थे , जिन से उनकी लड़ाई भिडाई हुई, जो असुर, दास , नाग वगैरह
कहलाये , वे कौन थे?

इतना तो असंदिग्ध है की सिन्धु घाटी की सभ्यता ( हड़प्पा -मोहन्जोदारो )
ऋग्वेद से पुरानी है. आर्यों को प्राचीनतम साबित करने की जिद में जो लोग
सिन्धु घाटी की लिपि को वैदिक संस्कृत से सम्बन्धित घोषित कर के पढने का
दावा कर रहे थे , उन की पोल पट्टी खुल चुकी है. वे सिधु घाटी की मुद्राओं
में अंकित एक वृषभ जैसे पशु को कम्प्यूटरी छल कपट से घोड़ा साबित करने
की जुगत करते रंगे हाथ पकडे जा चुके हैं.

सिन्धु घाटी वाले घोड़े से परिचित नहीं थे, और आर्य , जिन की पहली बसाहट
सिधु घाटी में ही दिखाई पड़ती है , हमेशा ''घोड़े पर ही सवार'' रहते थे!
गालिबन आज तक रहते हैं.

अब आप ऋग्वेद की संस्कृत पर गौर कीजिये. जनाब , बेहद परिष्कृत और
परिनिष्ठित भाषा है यह. यह भाषा क्या रातों रात आसमान से उतर आई,कुरआन
मजीद की आयतों की तरह? यानी सिन्धु घाटी में आर्यों की मौजूदगी जब से
तस्लीम की जाति है , तभी से यह अत्यंत विकसित भाषा भी मौजूद है .हड़पा
मोहन्जोदारो वाले तो संस्कृत जानते न थे . तो ऋग्वेद की संस्कृत का
क्रमशः विकास कहाँ कैसे हुआ?

आर्य सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी. पुरों के तो वे घोषित अरि थे. सिन्धु
घाटी की सभ्यता तो नगरों और पुरों की सभ्यता थी.

संयोग से आज १७ जून के हिन्दू में ही पार्पोला साहब के बारे में एक लेख
छपा है. पहला क्लासिकल तमिल अवार्ड आप ही को नज़र किया गया है. बन्दे को
तमाम द्रविड़ियन और आर्य भाषाओं में महारत हासिल है. आप ने सिन्धु
घाटी की मुद्राओं और उत्कीर्णनों का अध्ययन किया है.आप कहते है की
सिन्धु घाटी की लिपि को समझने की राह प्राचीन तमिल से गुजरती है.आप
तस्लीम करते हैं की आर्यों ने भी सिन्धु घाटी की तमाम सांस्कृतिक
विरासतों को सहेजने में अपना योगदान दिया है, लेकिन जहां तक लिपि और भाषा
का सवाल है . उस की करीबी तमिल से नज़र आती है, संस्कृत से नहीं.

रोमिला थापर फर्मातीं हैं की हड़प्पा संस्कृति के केन्द्रों में प्रोटो -
ऑस्ट्रेलियाई , भूमध्यसागरीय , अल्पाइन तथा मंगोलियाई अस्थि पंजरों के
अवशेष मिलने प्रमाण हैं , लेकिन आर्य संस्कृति से सम्बंधित प्रजातियों
के नहीं. प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाई भारत की जनसंख्या के आधारभूत अंग थे और उन
की बोली ऑस्ट्रिक भाषा समूह की थी, जिसका एक नमूना कुछ आदिम कबीलों की
मुंडा बोली में आज तक उपलब्ध है. [भारत का इतिहास ]

कौन नहीं जानता है की संस्कृत की सब से अधिक निकटता फारसी से है , और उस
से कुछ ही कम ग्रीक और लैटिन से . इंडो -पर्शियन-यूरोपियन आर्य भाषाओं
की परिकल्पना इसी निकटता से उपजी है .रोमिला का यह कहना गलत नहीं लगता की
आर्यजन बुनियादी तौर पर एक भाषाई समुदाय थे, न की कोई नृतत्व -प्रजाति.

आर्य पश्चिम एशिया से इधर आये हों , या इधर से उधर गएँ हों, या कहीं और
से इधर उधर बिखरें हों, भारत में उनका बढना पंजाब सिन्धु के इलाके से
क्रमशः पूरब और दक्षिण की तरफ हुआ , इतना तो लगभग असंदिग्ध है. इस
बढ़ने में लड़ना भिड़ना भी हुआ ही होगा, बकौक अभय , वे कोई देवता तो थे
नहीं. वे हमलावर थे , या शांति प्रचारक, यह संतजन स्वयं तय करें, लेकिन
वे गोरे उपनिवेशिकों की तरह सभ्यता शिक्षक नहीं थे , जितना उन्होंने
सिखाया , उस से अधिक खुद सीखते चले गए , नहीं तो भारत भर में इतने शिवाले
न भर गए होते. शिव जी महाराज असुर न हों , आर्य तो वे कहीं से नजर आते
नहीं.

आखिर में यह खूबसूरत शेर

हम में कोई hoon कोई शक कोई मंगोल है

दफन है जो बात , अब उस बात को मत छेडिये

अजित वडनेरकर

unread,
Jun 17, 2010, 3:22:45 PM6/17/10
to shabdc...@googlegroups.com
बढ़िया विमर्श

2010/6/18 Ashutosh Kumar <ashuv...@gmail.com>

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Jun 17, 2010, 9:53:43 PM6/17/10
to shabdc...@googlegroups.com
आशुतोष भाई,
आप का बहुत बहुत धन्यवाद!
इन दिनों व्यस्तता के कारण मैं अपनी बात यहाँ नहीं कह सका।
आप ने कसर को पूरा कर दिया।
2010/6/18 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,

Abha Mishra

unread,
Jun 18, 2010, 3:19:29 AM6/18/10
to shabdc...@googlegroups.com
आदिवाशी- मतलब वह अतिरिक्त लोग जो जंगल में वाश करते है ,....यह मेरा मत है.

2010/6/15 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>:

--
aabha
mumbai-67

sumant

unread,
Jun 19, 2010, 11:57:44 AM6/19/10
to शब्द चर्चा
चर्चा ‘आदिवासी’ शब्द पर थी, जिस पर आशुतोषजी की टिप्पड़ी में यह प्रश्न
उठाया गया था कि आदिवासियों में दिकू शब्द कहाँ से पहुँचा (दिक करना-
परेशान करना)। इस पर मेरी टिप्पड़ी में यह कहनें का प्रयास था कि इस
प्रकार के प्रश्न विषय से भटकानें वाले होते हैं क्योंकि वैसे ही आदि
शब्द बाकी की आबादी द्वारा बोली जानें वाली भाषा में कहाँ से आया, यह
प्रश्न उठाया जासकता है।

इस टिप्पड़ी पर आशुतोषजी की जलेबी नुमा टिप्पड़ प्रकट हुआ। इसके निरीक्षण
से दो तथ्य स्पष्ट हुए कि आशुतोषजी आशु तुष्ट होंने वाली प्रजाति के
व्यक्त्तित्व नहीं है क्योंकि विधिज्ञ द्विवेदी जी ‘कसर’ पूरी कर देने की
‘हइया’ हाँका लगाये रहे हैं। कुछ लोग जो कि अति प्रगतिवादी होते हैं, हर
बारह बरस में गोत्र बदल लेते हैं, की स्थिति यह होती है कि गन्ने के खेत
में हरवाहे का टँगा हुआ लाल लँगोट भी उन्हें लाल-क्रांन्ति का प्रतीक
लगनें लगता है।

छ्द्म बुद्धिजीवी और हलवाई में क्या समानता होती है!...एक मैदे की भूल-
भुलइया बनाता है दूसरा शब्दों की। क्या.....कहा..? गलत? तो जरा मुलाहिजा
फरमायें, हुजूर-‘प्रगतिवादी आंदोलन का इतिहास’ पर कर्णसिंह चौहान (पृ० ६)
क्या उद्धृत कर रहे हैं--

‘‘कांग्रेस में विश्व-साहित्य में प्रचलित विभिन्न प्रवृत्तियों पर चर्चा
की गई और समाजवादी यथार्थवाद का नारा दिया गया। अनेंक बुर्जुआ लेखकों के
बीच प्रचलित उन आधुनिकतावादी प्रवृत्तियों को पतनशील और प्रतिगामी करार
दिया गया जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए
रखनें में सहायक थीं और उभरते फासीवाद की मददगार साबित हो रही थीं। साथ
ही उन बुर्जुआ आलोचनात्मक यथार्थवादी लेखकों के योगदान और महत्व को
स्वीकार किया गया जो पूँजीवादी जनतंत्र में विश्चास करते हुए भी उसके
वर्तमान पतनशील रूप के कट्टर विरोधी थे। ऎसे लेखकों को प्रगतिशील लेखकों
और समाजवादी यथार्थवाद का सहयोगी माना गया। लेकिन इसके साथ ही उन लेखकों
से आग्रह किया गया कि अब क्योंकि साहित्य में एक नया और उच्चस्तर का
यथार्थवाद-समाजवादी यथार्थवाद उभरकर सामनें आ गया है, इसलिए वे केवल
आलोचनात्मक रवैये तक ही सीमित न रहें, बल्कि सकारात्मक दृष्टिकोंण
अपनाएँ।”

कुछ समझ में आ जाये तो अपनीं पीठ खुद थपथपा लीजिए, कुछ वैसा ही टिप्पड़
आशुतोष जी का है। बहुत सारे शब्दों के तालमेल-घालमेल में वो कहना क्या
चाहते हैं उन्हें शायद मालूम होगा या शायद नहीं यह भी वही जानते होंगे।
प्रभू, विचार-बिंदु यदि क्रमवार लिख सकें तो चर्चा आगे बढ़ाई जा सकेगी।
एक टिप्पड़ी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विषय में है, थोड़ा स्पष्ट करे कि
संस्कृति और राष्ट्र से आप समझते क्या हैं? सुमन्त

On Jun 15, 11:12 pm, ashutosh kumar <ashuvand...@gmail.com> wrote:
> या देवता या देवी
>  या मियाँ  या बीवी !
> बहुत खूब.
>

> 2010/6/15 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
>
>
> >  तथाकथित 'आर्य' और 'आदिवासी' एकदम एक नहीं थे मगर उतने दूर भी नहीं थे जितना
> > कि बताया जाता रहा है, ये नए शोधों से निकल के आ रहा है।

> > दिक ज़रूर करते रहे होंगे.. कोई देवता थोड़ी थे!


> > वैसे लोग तो बीवी का नाम भी मुसीबत रखते हैं। क्या कीजियेगा! :)
>
> >  ----- Original Message -----

> > *From:* ashutosh kumar <ashuvand...@gmail.com>
> > *To:* shabdc...@googlegroups.com

> >  *Sent:* Tuesday, June 15, 2010 11:24 PM
> > *Subject:* Re: आदिवासी

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