जनार्दन

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अभय तिवारी

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Oct 20, 2010, 3:01:00 AM10/20/10
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दुर्धर्ष (जो किसी से न दबे), परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),
जनार्दन (प्राणियों को दुख देने वाला) जैसे शब्द महाभारत में प्रशंसा के
प्रसंग में प्रयोग होते हैं। इस में से पहले दो पर तो कोई संशय नहीं है
लेकिन तीसरा जनार्दन कृष्ण के लिए विशेषण की तरह प्रयोग होता है- क्या आप
बन्धुओं के पास इस जनार्दन की कोई और व्याख्या है?

मेरी समझ से तो यह जनार्दन, जन+अर्दन से बना है जिसमें अर्दन का अर्थ है
सताने वाला। आपटे जी के कोष में अर्द्‌ धातु का अर्थ है प्रहार करना,
मारना, दुख देना।

Pritish Barahath

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Oct 20, 2010, 3:07:47 AM10/20/10
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इसे जन + आर्त + न करके पढ़ कर देखें तो ! 

2010/10/20 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

narayan prasad

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Oct 20, 2010, 4:14:03 AM10/20/10
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<<परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),>>

समस्त पद "परन्तप" में पर का अर्थ शत्रु है, दूसरा नहीं ।

---
नारायण प्रसाद


2010/10/20 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>
दुर्धर्ष (जो किसी से न दबे), परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),

अभय तिवारी

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Oct 20, 2010, 7:37:15 AM10/20/10
to शब्द चर्चा

और 'आर्त न' वाली व्युत्पत्ति कुछ मनगढ़न्त सी मालूम देती है। जन+अर्दन
पर आप्टे जी की भी मोहर है।
देखें आप्टे कोष में जन प्रविष्टि के अन्तर्गत; मेरे पास जो प्रति है
उसमें पृष्ठ ३९५ पर है।

जैसा कि महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों (परन्तप और दुर्धर्ष)
के प्रयोग से भी पता चलता है कि
पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, लेकिन कालांतर में वे
निन्दनीय हो गए तो
बजाय उन शब्दों को छोड़ने के उनका अर्थ कुछ और किया जाने लगा।

और होता यह भी है कि शब्दकोषों में अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते हैं।
शब्दों की यात्रा में यह अक्सर होता है। नहीं तो बुद्ध, बुद्धू कैसे बन
जाता? भद्र, भद्दा कैसे बन जाता?
लेकिन हिन्दी शब्द सागर में भी यह अर्थ 'सताने वाला' भी मिलता है, देखें
यहाँ:
http://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/philologic/contextualize.pl?p.6.dasahindi.2411944

On Oct 20, 1:14 pm, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> <<परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),>>
>
> समस्त पद "परन्तप" में पर का अर्थ शत्रु है, दूसरा नहीं ।
>
> ---नारायण प्रसाद
>

> 2010/10/20 अभय तिवारी <abhay...@gmail.com>

Pritish Barahath

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Oct 20, 2010, 8:11:55 AM10/20/10
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सही फरमाया 100 प्रतिशत मनघढ़ंत है, कयास है, अनुमान है।  यह  इसके प्रचलित अर्थ के पास पहुँचने के लिये किया गया प्रयास है।
एक अनुमान यह भी है कि इसमें जन किसी व्यक्ति विशेष के लिये हो। इस प्रकार भी नामकरण होता रहा है। यह आपके दिये अर्थ के पास पहुँचने का प्रयास है।
 
एक नयी जिज्ञासा है कि गढ़ंत सही है या घढ़ंत ?

2010/10/20 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

Pritish Barahath

unread,
Oct 20, 2010, 8:15:41 AM10/20/10
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छोछे हिंसक नहीं, शायद वीरता के गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे। आततायी शायद कभी प्रशंसनीय नहीं समझा गया है।

2010/10/20 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

अजित वडनेरकर

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Oct 20, 2010, 9:15:01 AM10/20/10
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अभय भाई,
धातु मूलों में निहित भाव आमतौर पर निरपेक्ष होते हैं। प्रचलित शब्द के संदर्भ में उन भावों की व्याख्या या विवेचना होती है। एक ही धातु से सकारात्मक और नकारात्मक भाव वाले शब्द भी जन्मते हैं।  दबाने, कुचलने, पीसने, मिटाने  की व्याख्या  शूरवीर के लिए बने शब्द के संदर्भ में भी वही होगी जो आतताई के संदर्भ में होगी। बस भाव बदल जाएगा। एक आक्रान्ता अपने समूह में शूरवीर है तो दूसरे समूह में आतताई या हमलावर। आप सही सोच रहे हैं। आप खुद कह रहे हैं कि हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, यहाँ बात थोड़ी ज्यादा साफ़ करने के लिए फिर हिंस् का उदाहरण काफ़ी होगा। हिंसा, शौर्य सौ फीसद पर्याय नहीं है। शौर्य के कई अन्य रूप भी हो सकते हैं जिसमें हिंसाकर्म न हो। हिंस के वर्ण विपर्यय सिंह बना और दुनियाभर के शौर्य प्रतीकों में सिंह का मुकाबला नहीं है जबकि सिंह प्राणीजगत के घनघोर हिंसक जीवों में शुमार है। इसी तरह कोयल और कव्वे की रिश्तेदारी समान धातुमूल से है जबकि दोनों के गुण अलग अलग हैं।


2010/10/20 Pritish Barahath <priti...@gmail.com>



--
शुभकामनाओं सहित
अजित
http://shabdavali.blogspot.com/

अजित वडनेरकर

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Oct 20, 2010, 9:16:00 AM10/20/10
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कृपया सही पढ़े-
हिंसा, शौर्य का सौ फीसद पर्याय नहीं है।

2010/10/20 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Abhay Tiwari

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Oct 20, 2010, 9:47:01 AM10/20/10
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आप की बात सही है अजित भाई, लेकिन इस 'अर्दन' वाले मामले में एक भी उदाहरण ऐसा
न मिला जिसमें विपरीत अर्थ हो। और फिर हिन्दी शब्द सागर भी तो यही कह रहा है?

और प्रीतीश, मेरी समझ से मनगढ़ंत ही सही है। लेकिन घड़ंत को भी गलत क्यों कहा जाय
भला? दोनों 'घटन' से निकले हैं, इस पर अजित भाई पहले विवेचना कर चुके हैं
शायद..

अजित वडनेरकर

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Oct 20, 2010, 10:36:12 AM10/20/10
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अभय भाई,
मैं यही तो कह रहा हूं कि अर्द में जो भाव हैं वे निरपेक्ष हैं। उसके नकारात्मक या सकारात्मक अर्थ उससे बने शब्दों के संदर्भ में उभरते हैं। जनार्दन इसका ही उदाहरण है जिसमें कोई नकारात्मक भाव नहीं है। संभव है अर्द् से बने कोई और शब्द हिन्दी की बोलियों में देशज रूप में हों जिन्हें हम चीन्ह नहीं पाए हों। यह भी संभव है कि पूर्व में प्राकृतों में अर्द् से बने नकारात्मक शब्द हों। यह मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं है।

2010/10/20 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Abhay Tiwari

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Oct 20, 2010, 10:45:39 AM10/20/10
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आप किस आधार पर कह रहे हैं कि जनार्दन में नकारात्मक भाव नहीं है? अगर नहीं है तो श्याम सुन्दर दास उसे सताने वाला क्यों बता रहे हैं?

दिनेशराय द्विवेदी

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Oct 20, 2010, 10:51:04 AM10/20/10
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अजित जी,
जब विघ्न उत्पन्न करने वाले विनायक मंगलकरन औऱ विघ्न हरन हो सकते हैं तो कुछ भी हो सकता है। मैं ने कहा था ना, कि बहुत सारे शब्द अपना इतिहास लिखने की मांग करते हैं।

2010/10/20 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>
अभय भाई,



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

अजित वडनेरकर

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Oct 20, 2010, 10:58:59 AM10/20/10
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जनार्दन संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु । २. शालग्राम की बटिया का का एक भेद । ३. कृष्ण (को०)।
जनार्दनवि० लोगों को कष्ट पहुँचावेवाला । दुःखदायी ।अभयभाई,

लोकप्रचलित अर्थ के आधार पर कह रहा हूं। कोश की पहली प्रविष्टी देखिए जिसमें जनार्दन को विष्णु, कृष्ण अर्थात तारणहार से ही जोड़ा गया है। व्याख्या वही सापेक्ष है। दुष्टों लिए विष्णु और कृष्ण जनार्दन हो सकते हैं मगर लोक के लिए दुष्टों को सतानेवाला, उनका नाश करनेवाला ही जनार्दन है।

जनार्दन की दूसरी प्रविष्टी में जो अर्थ है वह धातु आधारित है। प्रचलित भाषा में मैने आज तक इस अर्थ में जनार्दन का प्रयोग न किया, न सुना न देखा। यह अर्थ तार्किक है पर प्रयोग में नहीं है। कोश में स्थान पाना अलग बात है और उस अर्थ का जनमानस में स्थान पाना अलग। संभव है विराट पुराण साहित्य में किसी दानव, दैत्य का नाम भी जनार्दन निकल आए, जो दूसरे अर्थ को पुष्ट करेगा। इसके बावजूद हमारी आज की भाषा में जनार्दन का प्रयोग तारणहार या विष्णु-कृष्ण के रूप में ही होता है। जनता-जनार्दन मुहावरे में भी यही भाव है अर्थात लोगों का रक्षक न कि लोगों को सतानेवाला।

Bodhi Sattva

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Oct 20, 2010, 11:14:10 AM10/20/10
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ऐसे ही कुछ याद हो आया है
अर्दि-गर्दि मेरवहुं दस सीसा
ऐसेहि बचन कहहिं सब कीसा।
और मर्दन करना मान मर्दन करना भी शायद इसी अर्दन का सगा भाई हो।

2010/10/20 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
Dr. Bodhisatva, mumbai
0-9820212573

अजित वडनेरकर

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Oct 20, 2010, 11:23:45 AM10/20/10
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दुष्टों लिए विष्णु और कृष्ण जनार्दन हो सकते हैं
अर्थात उन्हें सतानेवाले आतताई के अर्थ में

2010/10/20 Bodhi Sattva <abo...@gmail.com>

दिनेशराय द्विवेदी

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Oct 20, 2010, 11:38:31 AM10/20/10
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दुष्टों  के लिए ही क्यों?
आर्यों को प्रमुख देवता इंद्र जब अपने कारनामों से पर्याप्त बदनाम हो गया और उसे जनता अपना देवता मानने से इन्कार करने लगी तो इस देवता का पतन स्वाभाविक था। लेकिन एक नायक के खलनायक में बदल जाने के उपरांत उस के धराशाही हो जाने पर विस्थापित करने वाला नायक भी तो होना चाहिए। इस कारण आर्यों के एक कम महत्वपूर्ण देवता विष्णु को जिसे इंद्र का छोटा भाई कहा जाता था उसे कृष्ण के अवतार के रूप में रंगमंच पर लाया गया। इस कृष्ण ने अपने बड़े भाई इंद्र की पूजा करने देने से मना किया। और इस से इंद्र का जो कोप जनता पर हुआ उस से भी बचाया औऱ स्वयं विस्थापित हो गए। अब जो इंद्र का मान मर्दन कर सकता वह किसी को भी धराशाही कर सकता था। इस तरह विष्णु और उन के अवतार जनार्दन हुए या नहीं। चूंकि वे विनाश कर सकते हैं तो प्रसन्न रहने पर जनार्दन भी हो सकते हैं। जैसे विनायक मंगलकारी हो जाते हैं।

अजित वडनेरकर

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Oct 20, 2010, 11:41:24 AM10/20/10
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सही है द्विवेदी जी। मैं बार बार सापेक्ष शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं।
पौराणिक संदर्भों को छोड़ दें तो क्या आज की भाषा में जनार्दन का प्रयोग हम लोगों को सतानेवाले के अर्थ में करते हैं?
इतनी सी बात है।

2010/10/20 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

ashutosh kumar

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Oct 20, 2010, 1:18:07 PM10/20/10
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अजित  भाई , आज जो है सो है. लेकिन अभी जो मसला है , वह यह है कि 'जन को सताने वाला' देवता कैसे हो गया. शब्द है जनार्दन , न कि 'दुर्जनार्दन'.
अब वैसे तो , बलजीत के मुहावरे में कहूं तो, मैं जानता हूँ कि मेरी दाल नहीं गलेगी, लेकिन मैं भी अपने घोड़े खोलता हूँ. 
जनार्दन शब्द पहेली इस लिए बन गया है कि हम माने बैठे हैं देवता कभी जन को सताने वाला नहीं हो सकता. 
लेकिन ऐसा क्यों माने बैठे हैं हम?
उलटे जन को सताने वाले ही तो देवता होते हैं, वीर होते हैं. 
वे जनसमुदाय , जिन्हें सता कर आर्यों ने अपने देवताओं को स्थापित किया होगा , वे उन देवताओं को 'जनार्दन' क्यों न कहते. हो सकता है , जनार्दन की उपाधि उन अर्दित ( उत्पीडित )समुदायों की ही खोज रही हो , जिसे बाद में आर्यों ने अपना लिया हो!

अब खुशबू से बताइये, दाल गली, या जली ?

anil janvijay

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Oct 20, 2010, 3:28:23 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
बोधिसत्व की बात तो ठीक ही है । अर्दन करना और मर्दन करना दोनों का एक ही
अर्थ में उपयोग किया जाता है । मारने या वध करने के अर्थ में ।

परन्तु अर्दन या अर्दना का एक और अर्थ भी होता है- याचना करना या माँगना
। ’जनता-जनार्दन’ यानी वह जनता जिससे कुछ (शायद वोट) याचना की जाती है ।
कहीं कृष्ण को भी इसी दूसरे अर्थ में तो जनार्दन नहीं कहा गया है। जन से
यानी समाज से कुछ चाहने वाला । जन से यानी जाति से कुछ याचना करने वाला
याचक ।


--
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें
www.kavitakosh.org
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Moscow, Russia
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+7 916 611 48 64 ( mobile)

अजित वडनेरकर

unread,
Oct 20, 2010, 3:34:37 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
आशुभाई, 
आपकी बात सही है। मैं सिर्फ आज के संदर्भ में अपनी बात रख रहा था क्योंकि अभयभाई ने मुझसे आधार पूछा था। भाषाई संदर्भों को टटोलने के लिए अनंत आकाश है। संभव है वैदिक संदर्भों में जनार्दन का वही अर्थ प्रमुखता से मिले जो हिन्दी शब्दसागर की दूसरी प्रविष्टि में दर्ज है। यूँ भी  व्युत्पत्तिमूल के आधार पर यह खरा है ही, कह चुका हूं। 

2010/10/21 anil janvijay <anilja...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

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Oct 20, 2010, 9:06:18 PM10/20/10
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जैसा कि महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों (परन्तप और दुर्धर्ष)  के प्रयोग से भी पता चलता है कि पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे

देखिये पहले शब्द दुर्धर्ष (किसी से न दबने वाला) में तो कोई बुराई नहीं दिखती, किसी से न दबना एक साहसी और स्वाभिमानी पुरुष का गुण है, इसमें कोई हिंसक वाली बात नहीं है।

दूसरे शब्द परन्तप का अर्थ नारायण जी ने स्पष्ट कर ही दिया कि "शत्रु को पीड़ा देने वाला" तो वीर पुरुषों के गुणगान में इस तरह शब्द प्रयोग किये ही जाते हैं। यह केवल महाभारत की ही बात नहीं, सभी समय के काव्य की बात है।

हाँ तीसरे शब्द जनार्दन के अर्थ में अवश्य संशय है।

वैसे ये ध्यान दें कि जहाँ उपर्युक्त "हिंसक" शब्द प्रशंसनीय भाव में प्रयुक्त हुये हैं वहीं "अजातशत्रु" (जिसका शत्रु पैदा न हुआ हो अर्थात ऐसा पुरुष जिसके नम्र स्वभाव के कारण कोई शत्रु न हो) जैसे शब्द भी प्रशंसा के भाव में ही प्रयुक्त हुये हैं।



2010/10/20 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Oct 20, 2010, 9:09:43 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
2010/10/20 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

अजित जी,
जब विघ्न उत्पन्न करने वाले विनायक मंगलकरन औऱ विघ्न हरन हो सकते हैं

विनायक कौन सा विध्न उत्पन्न करते हैं भला?
 

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Oct 20, 2010, 9:19:14 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
वे जनसमुदाय , जिन्हें सता कर आर्यों ने अपने देवताओं को स्थापित किया होगा , वे उन देवताओं को 'जनार्दन' क्यों न कहते. हो सकता है , जनार्दन की उपाधि उन अर्दित ( उत्पीडित )समुदायों की ही खोज रही हो , जिसे बाद में आर्यों ने अपना लिया हो!

शायद आप उन अंग्रेजी इतिहासकारों से सहमत हैं जिन्होंने दुष्प्रचार किया कि आर्य बाहर से आये थे। आर्यों के बाहर से आने की बात पर कभी कहीं अन्य लिखूँगा, यह मंच इस कार्य के लिये उपयुक्त नहीं है।

2010/10/20 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Oct 20, 2010, 9:27:20 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
2010/10/20 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

दुष्टों  के लिए ही क्यों?
आर्यों को प्रमुख देवता इंद्र जब अपने कारनामों से पर्याप्त बदनाम हो गया और उसे जनता अपना देवता मानने से इन्कार करने लगी तो इस देवता का पतन स्वाभाविक था।

सहमत, इन्द्र के अनेक कर्मों के कारण वह बदनाम हो गया था परन्तु जैसा कि आज की तरह देखें कि एक मिनिस्टर बदनाम भी है परन्तु आपके कार्यालय में किसी समारोह में आ रहा है तो आपको मजबूरीवश ही सही उसका स्वागत करना ही पड़ेगा उसी तरह उस समय भी इन्द्र की पूजा करना मजबूरी थी।

लेकिन एक बात आपके ध्यान में लाता चलूँ कि इन्द्र कोई एक व्यक्ति या देवता नहीं बल्कि एक पद है, शास्त्रों में बताया गया है कि अपने पुण्यों से (जैसे सो अश्वमेध यज्ञ करके) कोई भी व्यक्ति इन्द्र पद को प्राप्त कर सकता है। पुण्यों के समाप्त हो जाने पर वह उसका पद समाप्त हो जाता है। नहुष वाले प्रसंग में उससे पहले का इन्द्र ब्रह्महत्या के पाप से एवं नहुष अगस्त्य ऋषि के शाप से पदच्युत हो गये थे।
 
लेकिन एक नायक के खलनायक में बदल जाने के उपरांत उस के धराशाही हो जाने पर विस्थापित करने वाला नायक भी तो होना चाहिए। इस कारण आर्यों के एक कम महत्वपूर्ण देवता विष्णु को जिसे इंद्र का छोटा भाई कहा जाता था

यह आप को किसने बताया कि विष्णु इन्द्र के छोटे भाई थे तथा कम महत्वपूर्ण देवता थे। विष्णु त्रिदेवों में शामिल हैं और सृष्टि के तीन महत्वपूर्ण कार्यों में से एक पालनकर्ता की भूमिका निभाते हैं। और जैसा मैंने बताया कि इन्द्र एक देवता हैं जो कि वस्तुतः एक पद है जिसे पुण्यात्मा ग्रहण करते हैं जबकि विष्णु भगवान के विभिन्न स्वरुपों में से एक हैं।
 

गिरिजेश राव

unread,
Oct 20, 2010, 9:31:25 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
वाल्मीकि रामायण में विष्णु को इन्द्र का छोटा भाई कहा गया है। वैदिक साहित्य में विष्णु की महत्ता इन्द्र से बहुत कम है। कुछ ऋचाओं से पता चलता है कि विष्णु वस्तुत: सूर्य से सम्बन्धित हैं। ध्यातव्य है कि सूर्य पूजा के केन्द्र/मन्दिर बाद में वैष्णव केन्द्र हो गए। सूर्य पूजा की एक समृद्ध परम्परा लुप्त हो गई। 


2010/10/21 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
2010/10/20 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

दुष्टों  के लिए ही क्यों?
आर्यों को प्रमुख देवता इंद्र जब अपने कारनामों से पर्याप्त बदनाम हो गया और उसे जनता अपना देवता मानने से इन्कार करने लगी तो इस देवता का पतन स्वाभाविक था।

सहमत, इन्द्र के अनेक कर्मों के कारण वह बदनाम हो गया था परन्तु जैसा कि आज की तरह देखें कि एक मिनिस्टर बदनाम भी है परन्तु आपके कार्यालय में किसी समारोह में आ रहा है तो आपको मजबूरीवश ही सही उसका स्वागत करना ही पड़ेगा उसी तरह उस समय भी इन्द्र की पूजा करना मजबूरी थी।
2010/10/20 Bodhi Sattva <abo...@gmail.com>





2010/10/20 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
2010/10/20 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
और प्रीतीश, मेरी समझ से मनगढ़ंत ही सही है। लेकिन घड़ंत को भी गलत क्यों कहा जाय भला? दोनों 'घटन' से निकले हैं, इस पर अजित भाई पहले विवेचना कर चुके हैं शायद..



----- Original Message ----- From: अजित वडनेरकर
To: shabdc...@googlegroups.com
Sent: Wednesday, October 20, 2010 6:45 PM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दन



अभय भाई,
धातु मूलों में निहित भाव आमतौर पर निरपेक्ष होते हैं। प्रचलित शब्द के संदर्भ में उन भावों की व्याख्या या विवेचना होती है। एक ही धातु से सकारात्मक और नकारात्मक भाव वाले शब्द भी जन्मते हैं।  दबाने, कुचलने, पीसने, मिटाने  की व्याख्या  शूरवीर के लिए बने शब्द के संदर्भ में भी वही होगी जो आतताई के संदर्भ में होगी। बस भाव बदल जाएगा। एक आक्रान्ता अपने समूह में शूरवीर है तो दूसरे समूह में आतताई या हमलावर। आप सही सोच रहे हैं। आप खुद कह रहे हैं कि हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, यहाँ बात थोड़ी ज्यादा साफ़ करने के लिए फिर हिंस् का उदाहरण काफ़ी होगा। हिंसा, शौर्य सौ फीसद पर्याय नहीं है। शौर्य के कई अन्य रूप भी हो सकते हैं जिसमें हिंसाकर्म न हो। हिंस के वर्ण विपर्यय सिंह बना और दुनियाभर के शौर्य प्रतीकों में सिंह का मुकाबला नहीं है जबकि सिंह प्राणीजगत के घनघोर हिंसक जीवों में शुमार है। इसी तरह कोयल और कव्वे की रिश्तेदारी समान धातुमूल से है जबकि दोनों के गुण अलग अलग हैं।



2010/10/20 Pritish Barahath <priti...@gmail.com>

छोछे हिंसक नहीं, शायद वीरता के गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे। आततायी शायद कभी प्रशंसनीय नहीं समझा गया है।


2010/10/20 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>



और 'आर्त न'  वाली व्युत्पत्ति कुछ मनगढ़न्त सी मालूम देती है। जन+अर्दन

पर आप्टे जी की भी मोहर है।
देखें आप्टे कोष में जन प्रविष्टि के अन्तर्गत; मेरे पास जो प्रति है
उसमें पृष्ठ ३९५ पर है।

जैसा कि महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों (परन्तप और दुर्धर्ष)
के प्रयोग से भी पता चलता है कि
पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, लेकिन कालांतर में वे
निन्दनीय हो गए तो
बजाय उन शब्दों को छोड़ने के उनका अर्थ कुछ और किया जाने लगा।

और होता यह भी है कि शब्दकोषों में अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते हैं।

शब्दों की यात्रा में यह अक्सर होता है। नहीं तो बुद्ध, बुद्धू कैसे बन
जाता? भद्र, भद्दा कैसे बन जाता?
लेकिन हिन्दी शब्द सागर में भी यह अर्थ 'सताने वाला' भी मिलता है, देखें
यहाँ:
http://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/philologic/contextualize.pl?p.6.dasahindi.2411944


On Oct 20, 1:14 pm, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:

<<परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),>>


समस्त पद "परन्तप" में पर का अर्थ शत्रु है, दूसरा नहीं ।

---नारायण प्रसाद


2010/10/20 अभय तिवारी <abhay...@gmail.com>



> दुर्धर्ष (जो किसी से न दबे), परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Oct 20, 2010, 9:39:13 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
धन्यवाद गिरिजेश जी,
वस्तुत- वेद और पुराणों के बीच बहुत अंतराल है। इस अंतराल में बहुत कुछ बदला है। हमें दोनों को जोड़ कर देखने की आदत है और यह गड़बड़ कर देती है।

2010/10/21 गिरिजेश राव <girij...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Oct 20, 2010, 9:55:29 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
ठीक बात है। समय के साथ अर्थ बदलते ही रहते हैं। जो ३३ कोटि देवता कहे गए हैं (अब पहले ये देवता ३३ प्रकार के थे बाद में कोटि के बदले करोड़ हो गए) उनमें १२ आदित्य हैं। अदिति के पुत्र इन बारह आदित्यो में सबसे बड़े इन्द्र और सबसे छोटे विष्णु हैं जिन्होने वामन अवतार लिया था। इस में कोई संशय नहीं यह बात खोजने पर लगभग हर शास्त्र पुराण में मिल जाएगी। कालान्तर में इन्द्र अपमानित होकर अपने स्थान से गिराए गए, विष्णु त्रिमूर्ति में आए, अवतारी पुरुष आए, आदि-आदि तमाम विकास होते रहे।

ashutosh kumar

unread,
Oct 20, 2010, 10:10:45 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
वे जनसमुदाय , जिन्हें सता कर आर्यों ने अपने देवताओं को स्थापित किया होगा , वे उन देवताओं को 'जनार्दन' क्यों न कहते. हो सकता है , जनार्दन की उपाधि उन अर्दित ( उत्पीडित )समुदायों की ही खोज रही हो , जिसे बाद में आर्यों ने अपना लिया हो!

''शायद आप उन अंग्रेजी इतिहासकारों से सहमत हैं जिन्होंने दुष्प्रचार किया कि आर्य बाहर से आये थे। आर्यों के बाहर से आने की बात पर कभी कहीं अन्य लिखूँगा, यह मंच इस कार्य के लिये उपयुक्त नहीं है।''

ईपंडितजी इस विषय पर जरूर लिखें. हम बेहद उत्सुक हैं पढ़ने को. लेकिन आर्यों और अनार्यों के बीच संघर्ष  और  उसमें अक्सर और आखिरकार  आर्यों की जीत  आर्य- स्रोतों से ही सुस्थापित  है . इतनी सी बात के लिए बाहर से आये आक्रमणकारी आर्यों के सिद्धांत   के प्रतिपादक अँगरेज़ / गैर-अँगरेज़ इतिहासकारों से सहमत या  असहमत होने की कोई जरूरत नहीं है.jab do paksh the to donon को  khud को jan और doosare को utpeedak samajhane kaa swaabhaavik adhikaar है. main ab इतनी sadiyon baad kisi ek paartee men shaamil ho kar apanee bhadd kyuun pitwaaun ?  

Abhay Tiwari

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Oct 20, 2010, 10:40:59 PM10/20/10
to shabdc...@googlegroups.com
इस मामले में अनजाने में बहुत भ्रम है और कुछ जानबूझकर पैदा भी किया जाता है।
ऐसा क़तई नहीं है कि आर्य थे और अनार्य थे और वे आमने-सामने थे। तत्कालीन भारत
में भी आज ही की तरह तरह-तरह की जातियां थे और सबका सहअस्तित्व था और आपसी
वैवाहिक सम्बन्ध भी थे। और जो भी पौराणिक इतिहास हमारे पास है, वो किसी एक जाति
का नहीं है, उसमें सभी लोगों का उल्लेख है, हाँ यह ज़रूर है कि वह किसी एक के
नज़रिये से लिखा गया है मगर उस बुराई से बचना आज भी असम्भव है। चूंकि लोग
मूलग्रंथ न पढ़कर सिर्फ़ कुछ राजनीतिक मान्यताएं पढ़ते हैं तो इसलिए यह भ्रम बना
रहता है, और बढ़ता रहता है। दक्षिणपंथियों की ऐतिहासिक समझ तो माशाअल्ला रही ही
है लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि वामपंथी इतिहासकारों ने इस सन्दर्भ में
बहुत राजनीतिक खेल किए हैं।

मैंने भी इस पर कुछ लिखने का मन बनाया हुआ है।

----- Original Message -----
From: ashutosh kumar
To: shabdc...@googlegroups.com

Sent: Thursday, October 21, 2010 7:40 AM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दन

आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति"

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Oct 21, 2010, 1:12:05 AM10/21/10
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अभय जी ने यह बात बिल्कुल सही कही है "  चूंकि लोग मूलग्रंथ न पढ़कर सिर्फ़ कुछ राजनीतिक मान्यताएं पढ़ते हैं तो इसलिए यह भ्रम बना रहता है, और बढ़ता रहता है।" इसीलिये मैं मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति के मूलग्रंथ पर शोध कर रही हूँ. हालांकि इस पर बहुत शोधकार्य हुए हैं, पर सभी अपने किसी विचार को स्थापित करने के उद्देश्य से. मैं खुद ये देखना चाहती हूँ कि वास्तविकता क्या है? पर धर्मग्रन्थ के भी शाब्दिक अर्थों पर ना जाकर उन्हें तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए और इसके लिए इतिहास की मदद लेनी चाहिए. पर विडंबना यह है कि इतिहास भी राष्ट्रवादी, वामपंथी, दलितवादी और नारीवादी दृष्टिकोणों में बंटा हुआ है.

2010/10/21 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
इस मामले में अनजाने में बहुत भ्रम है और कुछ जानबूझकर पैदा भी किया जाता है। ऐसा क़तई नहीं है कि आर्य थे और अनार्य थे और वे आमने-सामने थे। तत्कालीन भारत में भी आज ही की तरह तरह-तरह की जातियां थे और सबका सहअस्तित्व था और आपसी वैवाहिक सम्बन्ध भी थे। और जो भी पौराणिक इतिहास हमारे पास है, वो किसी एक जाति का नहीं है, उसमें सभी लोगों का उल्लेख है, हाँ यह ज़रूर है कि वह किसी एक के नज़रिये से लिखा गया है मगर उस बुराई से बचना आज भी असम्भव है। चूंकि लोग मूलग्रंथ न पढ़कर सिर्फ़ कुछ राजनीतिक मान्यताएं पढ़ते हैं तो इसलिए यह भ्रम बना रहता है, और बढ़ता रहता है।  दक्षिणपंथियों की ऐतिहासिक समझ तो माशाअल्ला रही ही है लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि वामपंथी इतिहासकारों ने इस सन्दर्भ में बहुत राजनीतिक खेल किए हैं।


मैंने भी इस पर कुछ लिखने का मन बनाया हुआ है।

----- Original Message ----- From: ashutosh kumar
To: shabdc...@googlegroups.com
Sent: Thursday, October 21, 2010 7:40 AM

Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दन


वे जनसमुदाय , जिन्हें सता कर आर्यों ने अपने देवताओं को स्थापित किया होगा , वे उन देवताओं को 'जनार्दन' क्यों न कहते. हो सकता है , जनार्दन की उपाधि उन अर्दित ( उत्पीडित )समुदायों की ही खोज रही हो , जिसे बाद में आर्यों ने अपना लिया हो!



''शायद आप उन अंग्रेजी इतिहासकारों से सहमत हैं जिन्होंने दुष्प्रचार किया कि आर्य बाहर से आये थे। आर्यों के बाहर से आने की बात पर कभी कहीं अन्य लिखूँगा, यह मंच इस कार्य के लिये उपयुक्त नहीं है।''


ईपंडितजी इस विषय पर जरूर लिखें. हम बेहद उत्सुक हैं पढ़ने को. लेकिन आर्यों और अनार्यों के बीच संघर्ष  और  उसमें अक्सर और आखिरकार  आर्यों की जीत  आर्य- स्रोतों से ही सुस्थापित  है . इतनी सी बात के लिए बाहर से आये आक्रमणकारी आर्यों के सिद्धांत   के प्रतिपादक अँगरेज़ / गैर-अँगरेज़ इतिहासकारों से सहमत या  असहमत होने की कोई जरूरत नहीं है.jab do paksh the to donon को  khud को jan और doosare को utpeedak samajhane kaa swaabhaavik adhikaar है. main ab इतनी sadiyon baad kisi ek paartee men shaamil ho kar apanee bhadd kyuun pitwaaun ?



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अजित वडनेरकर

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Oct 21, 2010, 3:02:53 AM10/21/10
to shabdc...@googlegroups.com
संतों,
प्राचीन मूलग्रंथों में कहीं जनार्दन का प्रयोग नकारात्मक रूप में मिले या इस नाम का कोई खलचरित्र मिले तो ज़रूर बताइयेगा:) हम तो तलाश ही रहा हूँ।

2010/10/21 आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति" <guddub...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Oct 21, 2010, 3:19:28 AM10/21/10
to shabdc...@googlegroups.com
खलचरित्र नहीं मिलेगा! यही तो कह रहा हूँ, अजित भाई। आप शायद पीछे मैंने क्या
लिखा उसे अनदेखा कर गए। दुबारा ठीक से लिखता हूँ अपनी बात को।

महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों के प्रयोग से पता चलता है कि पहले
ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, और इसीलिए ये तीनों शब्द (जनार्दन,
परन्तप और दुर्धर्ष) महापुरुषों के लिए उनकी प्रशंसा में इस्तेमाल होते हैं।
कालांतर में जब नैतिकता बदलजाने से वे गुण निन्दनीय हो गए तो कुछ शब्द चलन से
बाहर हो गए जैसे दुर्धर्ष और परन्तप, लेकिन जनार्दन बच रहा क्योंकि वह विष्णु
और कृष्ण के विशेषण के रूप में प्रचलित हो गया था।

और शब्दकोषों में से भावार्थ ग़ायब हो जाता है अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते
हैं जो कि इस मिसाल में है- विष्णु या कृष्ण।

अजित वडनेरकर

unread,
Oct 21, 2010, 3:26:06 AM10/21/10
to shabdc...@googlegroups.com
माफ़ी चाहता हूं अभय भाई, तब समझ नहीं पाया था। अब साफ़ समझ में आ रहा है।
काफ़ी शब्द ज़ाया कर दिए मैने:)

2010/10/21 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Oct 21, 2010, 4:44:15 AM10/21/10
to shabdc...@googlegroups.com
आर्यों के मध्यएशिया से आने की बात अब पुरानी पड़ चुकी धारणा मानी जाती है। स्वतंत्र रूप से इस विषय पर तो नहीं मगर अपनी विलक्षण भाषा वैज्ञानिक स्थापनाओं में रामविलास शर्मा ने सफलतापूर्वक यह स्थापित किया है कि आर्यों का मूल स्थान वृहत्तर भारत क्षेत्र ही था। आर्य भाषा परिवार से प्रवाह का क्रम पूर्व से पश्चिम की ओर अधिक था। यह मानना, कि हमने सब लिया है, यहाँ सब आया है, लाया गया है, ग़लत है। आदान प्रदान लगातार रहा है मगर पूर्व से पश्चिम को देन अधिक महत्वपूर्ण रही है। सामी सभ्यता से आर्य संस्कृति के अलबत्ता पुराने रिश्ते रहें हैं और इसके प्रमाण भी हैं। समझा जाता है कि हड़प्पा सभ्यता आर्य सभ्यता ही थी।

2010/10/21 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Rangnath Singh

unread,
Oct 21, 2010, 5:06:00 AM10/21/10
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हमने आधुनिक काल में जनार्दन शब्द का सर्वाधिक प्रयोग जनता-जनार्दन के
रूप में ही सुना है। संतजन इस प्रयोग पर भी टार्च जलाएं।

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Oct 22, 2010, 4:30:35 AM10/22/10
to shabdc...@googlegroups.com
बाकी तो ठीक है अभय भाई, पर यह दुर्धर्ष बोले तो किसी से न दबने में क्या हिंसा है? यह उदाहरण बाकी दो के साथ ठीक नहीं बैठ रहा।

2010/10/21 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Abhay Tiwari

unread,
Oct 22, 2010, 5:01:58 AM10/22/10
to shabdc...@googlegroups.com
ई-पण्डितजी, ये बात ठीक है कि प्रगट रूप में नहीं है लेकिन दबने-दबाने की बात, हिंसा-प्रतिहिंसा का ही एक स्वरूप है। सोचिये क्या तुलसी अपने राम के लिए इस विशेषण का इस्तेमाल करते? वे तो अपने राम को करुणाऐन और कृपासिंधु कहते हैं। अब कहाँ करुनाऐन और कृपासिंधु और कहाँ भयंकर का एक पर्याय दुर्धर्ष?

----- Original Message -----

Pratik Pandey

unread,
Oct 22, 2010, 5:08:57 AM10/22/10
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जनार्दन में जो 'अर्द्' धातु है, उसके अर्थ प्रहार और चोट आदि के अलावा जाना, याचना या निवेदन करना आदि भी हैं। साथ ही आजकल भी "जनता-जनार्दन" के मुहावरे में यह याचना और निवेदन वाला भाव ही अधिक है। ऐसे में जनार्दन के लिए अर्द् के प्रहार वाले अर्थ पर ही ज़ोर क्यों?


2010/10/22 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
ई-पण्डितजी, ये बात ठीक है कि प्रगट रूप में नहीं है लेकिन दबने-दबाने की बात, हिंसा-प्रतिहिंसा का ही एक स्वरूप है। सोचिये क्या तुलसी अपने राम के लिए इस विशेषण का इस्तेमाल करते? वे तो अपने राम को करुणाऐन और कृपासिंधु कहते हैं। अब कहाँ करुनाऐन और कृपासिंधु और कहाँ भयंकर का एक पर्याय दुर्धर्ष?

----- Original Message -----
Sent: Friday, October 22, 2010 2:00 PM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दन

बाकी तो ठीक है अभय भाई, पर यह दुर्धर्ष बोले तो किसी से न दबने में क्या हिंसा है? यह उदाहरण बाकी दो के साथ ठीक नहीं बैठ रहा।

2010/10/21 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
खलचरित्र नहीं मिलेगा! यही तो कह रहा हूँ, अजित भाई। आप शायद पीछे मैंने क्या लिखा उसे अनदेखा कर गए। दुबारा ठीक से लिखता हूँ अपनी बात को।

महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों  के प्रयोग से पता चलता है कि पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, और इसीलिए ये तीनों शब्द (जनार्दन, परन्तप और दुर्धर्ष) महापुरुषों के लिए उनकी प्रशंसा में इस्तेमाल होते हैं। कालांतर में जब नैतिकता बदलजाने से वे गुण निन्दनीय हो गए तो कुछ शब्द चलन से बाहर हो गए जैसे दुर्धर्ष और परन्तप, लेकिन जनार्दन बच रहा क्योंकि वह विष्णु और कृष्ण के विशेषण के रूप में प्रचलित हो गया था।

और शब्दकोषों में से भावार्थ ग़ायब हो जाता है अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते हैं जो कि इस मिसाल में है- विष्णु या कृष्ण।

Abhay Tiwari

unread,
Oct 22, 2010, 11:21:58 PM10/22/10
to shabdc...@googlegroups.com
प्रतीक भाई यह ज़ोर अनायास नहीं है। आप सोचिये, अर्द्‍ का याचना वाल भाव लेकर
क्या अर्थ निकलेगा- जन से याचना करने वाला? या जन की याचना करने वाला? काहे की
या़चना , किस बात के लिए याचना? दोनों ही असंगत मालूम देते हैं।

फिर 'जनता जनार्दन' के पद में जनार्दन को ईश्वर के रूढ़ अर्थ में लिया जा रहा
है। जनता जनार्दन यानी लोकतंत्र में जनता ही ईश्वर है जो सत्ता किसको मिलेगी
इसका निर्णय करती है। जनता जनार्दन में भी याचना वाला अर्थ डालने से कोई अर्थ
नहीं बनेगा। इस्तेमाल कर के देखें!

Mayur Dubey

unread,
Oct 23, 2010, 7:33:30 AM10/23/10
to shabdc...@googlegroups.com
महाभारत में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को अपने विराट स्वरुप के दर्शन कराने का प्रसंग आता है, जिसमे वे एक तरफ सृजन कर रहे हैं, तो दूसरी और काल कि तरह लोगों का संहार भी कर रहे हैं, और उनके द्वारा संहारित सिर्फ दैत्य ही नहीं, अपितु आम जन भी हैं,
वैसे मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मा सृजन के देवता हैं, और शिव संहार के, पर विराट स्वरुप में विष्णु को ही सब कुछ बताया गया है .
तो क्या यहाँ विष्णु को जनार्दन के रूप में जन को मोक्ष देने वाले, या संहार देने वाले के रूप में तो नहीं बताया गया है .

सादर,
मयूर 



2010/10/23 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Oct 23, 2010, 7:47:56 AM10/23/10
to shabdc...@googlegroups.com
मेरी नज़र में जन शब्द उसी तरह निरपेक्ष है जैसे मनुष्य या लोग। जन से जने, जना जैसे देशज शब्द बने है जिन्हें लोग की तरह प्रयोग किया जाता है। जैसे कई जने, कई लोग, कई मनुष्य आदि। जन समूहवाची शब्द भी है और एक वचन की तरह भी इसका प्रयोग होता है। इसी परिप्रेक्ष्य में जनार्दन शब्द का अर्थ पाने की बात कह रहा हूं। यहां जनार्दन शब्द की व्याख्या समूह का नाश करनेवाले की है। पौराणिक संदर्भों में जनार्दन का प्रयोग इसीलिए नकारात्मक नहीं मिलता। जैसा कि कुछ साथियों का अनुमान है कि जनार्दन पहले लोगों को सताते होंगे। इस संदर्भ में इन्द्र भी उल्लेख हुआ है। पर यह अनुमान है। हमारी स्मृतियों में तो जनार्दन का अर्थ विघ्नकारी समूह के विनाशक का ही आता है।

2010/10/23 Mayur Dubey <mayurdu...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Oct 24, 2010, 8:53:02 PM10/24/10
to shabdc...@googlegroups.com
भाई लोगों पौराणिक ग्रन्थों में कई शब्दों का अर्थ प्रसंग के अनुसार होता है तो ये भी देखना चाहिये कि जनार्दन शब्द सबसे पहले जहाँ प्रयुक्त हुआ है वो प्रसंग/श्लोक आदि क्या है?

2010/10/23 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Pritish Barahath

unread,
Oct 25, 2010, 3:03:16 AM10/25/10
to shabdc...@googlegroups.com
पौराणिक प्रसंग की जानकारी आये तो लाभ होगा।
मैं इसे अभी भी जन + आर्त + हरण पढ़ने में सुविधा पा रहा हूँ।
हालांकि मैं सभी टिप्पणियाँ नहीं पढ़ सका हूँ ..
 
क्योंकि कोई जिस जन का अर्दन करे वही जन उसे आदर से, भक्ति से, प्रेम से, श्रद्धा से इन अर्थों में जनार्दन कहकर पूजा करे यह बात कुछ हजम नहीं होती !


2010/10/25 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur

अजित वडनेरकर

unread,
Oct 25, 2010, 3:22:09 AM10/25/10
to shabdc...@googlegroups.com
जन में निहित निरपेक्ष भाव को सज्जन से जोड़कर देखेंगे तो यही मुश्किल आएगी।
जन शब्द का सापेक्ष प्रयोग सोचें। दुर्जन भी होते हैं, सज्जन भी होते हैं। ऐसे में जनार्दन का प्रयोग दुर्जन के अर्थ में ही सार्थक लगेगा। और यही उसका निहितार्थ भी है। कितने आदमी थे? कितने मिनख थे? कितने जने थे? कितने मिनख थे ? जैसे वाक्य सज्जन और दुर्जन दोनों ही समूहों की बाबत कहे जा सकते हैं। जन से यही अभिप्राय है। जन का अर्दन करनेवाला यानी आततायी समूह का नाश करनेवाला। तमाम पौराणिक गाथाएं असुरों, आततायी समूहों, दानवों, राक्षसों की ओर से उभर कर आए संदर्भ हमें नहीं मिलते, बल्कि मनुष्यों और उनके शासकों के संदर्भ सामने आते हैं। ऐसे में जनार्दन का अर्थ क्या हो सकता है? ख़ासतौर पर तब जब पुराणों में भी जनार्दन का खल-चरित्र सामने नहीं मिलता। जनार्दन शब्द पर ज्यादा मग़ज़मारी की गुंजाईश मुझे तो नज़र नहीं आती।

2010/10/25 Pritish Barahath <priti...@gmail.com>
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