मेरी समझ से तो यह जनार्दन, जन+अर्दन से बना है जिसमें अर्दन का अर्थ है
सताने वाला। आपटे जी के कोष में अर्द् धातु का अर्थ है प्रहार करना,
मारना, दुख देना।
<<परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),>>
समस्त पद "परन्तप"
में पर का अर्थ शत्रु है,
दूसरा नहीं ।
---नारायण प्रसाद
दुर्धर्ष (जो किसी से न दबे), परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),
जैसा कि महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों (परन्तप और दुर्धर्ष)
के प्रयोग से भी पता चलता है कि
पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, लेकिन कालांतर में वे
निन्दनीय हो गए तो
बजाय उन शब्दों को छोड़ने के उनका अर्थ कुछ और किया जाने लगा।
और होता यह भी है कि शब्दकोषों में अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते हैं।
शब्दों की यात्रा में यह अक्सर होता है। नहीं तो बुद्ध, बुद्धू कैसे बन
जाता? भद्र, भद्दा कैसे बन जाता?
लेकिन हिन्दी शब्द सागर में भी यह अर्थ 'सताने वाला' भी मिलता है, देखें
यहाँ:
http://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/philologic/contextualize.pl?p.6.dasahindi.2411944
On Oct 20, 1:14 pm, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> <<परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),>>
>
> समस्त पद "परन्तप" में पर का अर्थ शत्रु है, दूसरा नहीं ।
>
> ---नारायण प्रसाद
>
> 2010/10/20 अभय तिवारी <abhay...@gmail.com>
और प्रीतीश, मेरी समझ से मनगढ़ंत ही सही है। लेकिन घड़ंत को भी गलत क्यों कहा जाय
भला? दोनों 'घटन' से निकले हैं, इस पर अजित भाई पहले विवेचना कर चुके हैं
शायद..
अभय भाई,
परन्तु अर्दन या अर्दना का एक और अर्थ भी होता है- याचना करना या माँगना
। ’जनता-जनार्दन’ यानी वह जनता जिससे कुछ (शायद वोट) याचना की जाती है ।
कहीं कृष्ण को भी इसी दूसरे अर्थ में तो जनार्दन नहीं कहा गया है। जन से
यानी समाज से कुछ चाहने वाला । जन से यानी जाति से कुछ याचना करने वाला
याचक ।
--
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जैसा कि महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों (परन्तप और दुर्धर्ष) के प्रयोग से भी पता चलता है कि पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे
अजित जी,
जब विघ्न उत्पन्न करने वाले विनायक मंगलकरन औऱ विघ्न हरन हो सकते हैं
वे जनसमुदाय , जिन्हें सता कर आर्यों ने अपने देवताओं को स्थापित किया होगा , वे उन देवताओं को 'जनार्दन' क्यों न कहते. हो सकता है , जनार्दन की उपाधि उन अर्दित ( उत्पीडित )समुदायों की ही खोज रही हो , जिसे बाद में आर्यों ने अपना लिया हो!
दुष्टों के लिए ही क्यों?
आर्यों को प्रमुख देवता इंद्र जब अपने कारनामों से पर्याप्त बदनाम हो गया और उसे जनता अपना देवता मानने से इन्कार करने लगी तो इस देवता का पतन स्वाभाविक था।
लेकिन एक नायक के खलनायक में बदल जाने के उपरांत उस के धराशाही हो जाने पर विस्थापित करने वाला नायक भी तो होना चाहिए। इस कारण आर्यों के एक कम महत्वपूर्ण देवता विष्णु को जिसे इंद्र का छोटा भाई कहा जाता था
2010/10/20 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>दुष्टों के लिए ही क्यों?
आर्यों को प्रमुख देवता इंद्र जब अपने कारनामों से पर्याप्त बदनाम हो गया और उसे जनता अपना देवता मानने से इन्कार करने लगी तो इस देवता का पतन स्वाभाविक था।
सहमत, इन्द्र के अनेक कर्मों के कारण वह बदनाम हो गया था परन्तु जैसा कि आज की तरह देखें कि एक मिनिस्टर बदनाम भी है परन्तु आपके कार्यालय में किसी समारोह में आ रहा है तो आपको मजबूरीवश ही सही उसका स्वागत करना ही पड़ेगा उसी तरह उस समय भी इन्द्र की पूजा करना मजबूरी थी।
2010/10/20 Bodhi Sattva <abo...@gmail.com>
2010/10/20 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
और प्रीतीश, मेरी समझ से मनगढ़ंत ही सही है। लेकिन घड़ंत को भी गलत क्यों कहा जाय भला? दोनों 'घटन' से निकले हैं, इस पर अजित भाई पहले विवेचना कर चुके हैं शायद..
----- Original Message ----- From: अजित वडनेरकर
To: shabdc...@googlegroups.com
Sent: Wednesday, October 20, 2010 6:45 PM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दन
अभय भाई,
धातु मूलों में निहित भाव आमतौर पर निरपेक्ष होते हैं। प्रचलित शब्द के संदर्भ में उन भावों की व्याख्या या विवेचना होती है। एक ही धातु से सकारात्मक और नकारात्मक भाव वाले शब्द भी जन्मते हैं। दबाने, कुचलने, पीसने, मिटाने की व्याख्या शूरवीर के लिए बने शब्द के संदर्भ में भी वही होगी जो आतताई के संदर्भ में होगी। बस भाव बदल जाएगा। एक आक्रान्ता अपने समूह में शूरवीर है तो दूसरे समूह में आतताई या हमलावर। आप सही सोच रहे हैं। आप खुद कह रहे हैं कि हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, यहाँ बात थोड़ी ज्यादा साफ़ करने के लिए फिर हिंस् का उदाहरण काफ़ी होगा। हिंसा, शौर्य सौ फीसद पर्याय नहीं है। शौर्य के कई अन्य रूप भी हो सकते हैं जिसमें हिंसाकर्म न हो। हिंस के वर्ण विपर्यय सिंह बना और दुनियाभर के शौर्य प्रतीकों में सिंह का मुकाबला नहीं है जबकि सिंह प्राणीजगत के घनघोर हिंसक जीवों में शुमार है। इसी तरह कोयल और कव्वे की रिश्तेदारी समान धातुमूल से है जबकि दोनों के गुण अलग अलग हैं।
2010/10/20 Pritish Barahath <priti...@gmail.com>
छोछे हिंसक नहीं, शायद वीरता के गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे। आततायी शायद कभी प्रशंसनीय नहीं समझा गया है।
2010/10/20 अभय तिवारी <abha...@gmail.com>
और 'आर्त न' वाली व्युत्पत्ति कुछ मनगढ़न्त सी मालूम देती है। जन+अर्दन
पर आप्टे जी की भी मोहर है।
देखें आप्टे कोष में जन प्रविष्टि के अन्तर्गत; मेरे पास जो प्रति है
उसमें पृष्ठ ३९५ पर है।
जैसा कि महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों (परन्तप और दुर्धर्ष)
के प्रयोग से भी पता चलता है कि
पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, लेकिन कालांतर में वे
निन्दनीय हो गए तो
बजाय उन शब्दों को छोड़ने के उनका अर्थ कुछ और किया जाने लगा।
और होता यह भी है कि शब्दकोषों में अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते हैं।
शब्दों की यात्रा में यह अक्सर होता है। नहीं तो बुद्ध, बुद्धू कैसे बन
जाता? भद्र, भद्दा कैसे बन जाता?
लेकिन हिन्दी शब्द सागर में भी यह अर्थ 'सताने वाला' भी मिलता है, देखें
यहाँ:
http://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/philologic/contextualize.pl?p.6.dasahindi.2411944
On Oct 20, 1:14 pm, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
<<परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),>>
समस्त पद "परन्तप" में पर का अर्थ शत्रु है, दूसरा नहीं ।
---नारायण प्रसाद
> दुर्धर्ष (जो किसी से न दबे), परन्तप (दूसरों को पीड़ा देने वाला),
वे जनसमुदाय , जिन्हें सता कर आर्यों ने अपने देवताओं को स्थापित किया होगा , वे उन देवताओं को 'जनार्दन' क्यों न कहते. हो सकता है , जनार्दन की उपाधि उन अर्दित ( उत्पीडित )समुदायों की ही खोज रही हो , जिसे बाद में आर्यों ने अपना लिया हो!
मैंने भी इस पर कुछ लिखने का मन बनाया हुआ है।
----- Original Message -----
From: ashutosh kumar
To: shabdc...@googlegroups.com
Sent: Thursday, October 21, 2010 7:40 AM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दन
इस मामले में अनजाने में बहुत भ्रम है और कुछ जानबूझकर पैदा भी किया जाता है। ऐसा क़तई नहीं है कि आर्य थे और अनार्य थे और वे आमने-सामने थे। तत्कालीन भारत में भी आज ही की तरह तरह-तरह की जातियां थे और सबका सहअस्तित्व था और आपसी वैवाहिक सम्बन्ध भी थे। और जो भी पौराणिक इतिहास हमारे पास है, वो किसी एक जाति का नहीं है, उसमें सभी लोगों का उल्लेख है, हाँ यह ज़रूर है कि वह किसी एक के नज़रिये से लिखा गया है मगर उस बुराई से बचना आज भी असम्भव है। चूंकि लोग मूलग्रंथ न पढ़कर सिर्फ़ कुछ राजनीतिक मान्यताएं पढ़ते हैं तो इसलिए यह भ्रम बना रहता है, और बढ़ता रहता है। दक्षिणपंथियों की ऐतिहासिक समझ तो माशाअल्ला रही ही है लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि वामपंथी इतिहासकारों ने इस सन्दर्भ में बहुत राजनीतिक खेल किए हैं।
मैंने भी इस पर कुछ लिखने का मन बनाया हुआ है।
----- Original Message ----- From: ashutosh kumar
To: shabdc...@googlegroups.com
Sent: Thursday, October 21, 2010 7:40 AM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दन
वे जनसमुदाय , जिन्हें सता कर आर्यों ने अपने देवताओं को स्थापित किया होगा , वे उन देवताओं को 'जनार्दन' क्यों न कहते. हो सकता है , जनार्दन की उपाधि उन अर्दित ( उत्पीडित )समुदायों की ही खोज रही हो , जिसे बाद में आर्यों ने अपना लिया हो!
''शायद आप उन अंग्रेजी इतिहासकारों से सहमत हैं जिन्होंने दुष्प्रचार किया कि आर्य बाहर से आये थे। आर्यों के बाहर से आने की बात पर कभी कहीं अन्य लिखूँगा, यह मंच इस कार्य के लिये उपयुक्त नहीं है।''
ईपंडितजी इस विषय पर जरूर लिखें. हम बेहद उत्सुक हैं पढ़ने को. लेकिन आर्यों और अनार्यों के बीच संघर्ष और उसमें अक्सर और आखिरकार आर्यों की जीत आर्य- स्रोतों से ही सुस्थापित है . इतनी सी बात के लिए बाहर से आये आक्रमणकारी आर्यों के सिद्धांत के प्रतिपादक अँगरेज़ / गैर-अँगरेज़ इतिहासकारों से सहमत या असहमत होने की कोई जरूरत नहीं है.jab do paksh the to donon को khud को jan और doosare को utpeedak samajhane kaa swaabhaavik adhikaar है. main ab इतनी sadiyon baad kisi ek paartee men shaamil ho kar apanee bhadd kyuun pitwaaun ?
महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों के प्रयोग से पता चलता है कि पहले
ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, और इसीलिए ये तीनों शब्द (जनार्दन,
परन्तप और दुर्धर्ष) महापुरुषों के लिए उनकी प्रशंसा में इस्तेमाल होते हैं।
कालांतर में जब नैतिकता बदलजाने से वे गुण निन्दनीय हो गए तो कुछ शब्द चलन से
बाहर हो गए जैसे दुर्धर्ष और परन्तप, लेकिन जनार्दन बच रहा क्योंकि वह विष्णु
और कृष्ण के विशेषण के रूप में प्रचलित हो गया था।
और शब्दकोषों में से भावार्थ ग़ायब हो जाता है अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते
हैं जो कि इस मिसाल में है- विष्णु या कृष्ण।
ई-पण्डितजी, ये बात ठीक है कि प्रगट रूप में नहीं है लेकिन दबने-दबाने की बात, हिंसा-प्रतिहिंसा का ही एक स्वरूप है। सोचिये क्या तुलसी अपने राम के लिए इस विशेषण का इस्तेमाल करते? वे तो अपने राम को करुणाऐन और कृपासिंधु कहते हैं। अब कहाँ करुनाऐन और कृपासिंधु और कहाँ भयंकर का एक पर्याय दुर्धर्ष?
----- Original Message -----
From: ePandit | ई-पण्डित
Sent: Friday, October 22, 2010 2:00 PMSubject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जनार्दनबाकी तो ठीक है अभय भाई, पर यह दुर्धर्ष बोले तो किसी से न दबने में क्या हिंसा है? यह उदाहरण बाकी दो के साथ ठीक नहीं बैठ रहा।
2010/10/21 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>
खलचरित्र नहीं मिलेगा! यही तो कह रहा हूँ, अजित भाई। आप शायद पीछे मैंने क्या लिखा उसे अनदेखा कर गए। दुबारा ठीक से लिखता हूँ अपनी बात को।
महाभारत आदि ग्रन्थों में अन्य दो शब्दों के प्रयोग से पता चलता है कि पहले ऐसे हिंसक गुण प्रशंसनीय समझे जाते थे, और इसीलिए ये तीनों शब्द (जनार्दन, परन्तप और दुर्धर्ष) महापुरुषों के लिए उनकी प्रशंसा में इस्तेमाल होते हैं। कालांतर में जब नैतिकता बदलजाने से वे गुण निन्दनीय हो गए तो कुछ शब्द चलन से बाहर हो गए जैसे दुर्धर्ष और परन्तप, लेकिन जनार्दन बच रहा क्योंकि वह विष्णु और कृष्ण के विशेषण के रूप में प्रचलित हो गया था।
और शब्दकोषों में से भावार्थ ग़ायब हो जाता है अक्सर रूढ़ हो गए अर्थ ही मिलते हैं जो कि इस मिसाल में है- विष्णु या कृष्ण।
फिर 'जनता जनार्दन' के पद में जनार्दन को ईश्वर के रूढ़ अर्थ में लिया जा रहा
है। जनता जनार्दन यानी लोकतंत्र में जनता ही ईश्वर है जो सत्ता किसको मिलेगी
इसका निर्णय करती है। जनता जनार्दन में भी याचना वाला अर्थ डालने से कोई अर्थ
नहीं बनेगा। इस्तेमाल कर के देखें!